162. कलीसिया को मानने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के घर की तमाम कार्य-व्यवस्थाओं और नियमों के प्रति समर्पण करो। यदि कलीसिया के फैसले कार्य-व्यवस्था और परमेश्वर के वचन सत्य के साथ सहमत हों, तो उन्हें मानना चाहिए;

(2) यदि कलीसिया के अगुवाओं और उपयाजकों का कहना सत्य और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं के अनुसार हो, तो परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को उन्हें मानना चाहिए और कभी भी उनका उल्लंघन नहीं करना चाहिए;

(3) जो निर्णय कलीसिया में बहुमत से अनुमोदित हों, और जिनकी कार्य-व्यवस्था के साथ पूर्ण रूप से अनुरूप होने की पुष्टि की जाए, उनको सभी के द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए और उनका अनुपालन होना चाहिए, और न तो उन्हें अस्वीकार करना चाहिए और न ही उनका विरोध करना चाहिए;

(4) अगुवाओं और कार्यकर्ताओं की एक अल्पसंख्या कलीसिया का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। यदि किसी नेता या कार्यकर्ता के कार्य सत्य के अनुरूप न हों, तो उन्हें अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए, और किसी को उनके द्वारा बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

चाहे तुम्हारे साथ जो भी हो या तुम्हें जो भी सुनने को मिले, तुम्हें परमेश्वर के सामने खुद को शांत रखना चाहिए और उससे प्रार्थना करनी चाहिए, सत्य की खोज करनी चाहिए और हर बात परमेश्वर के वचनों के आधार पर करनी चाहिए। चाहे यह बात किसी ने भी कही हो या किसी भी स्तर के अगुआ ने ऐसा कहा हो, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार उनकी बात को समझना चाहिए और वैसे ही बर्ताव करना चाहिए। चाहे ऐसा किसी ने भी कहा हो, अगर यह बात परमेश्वर के वचनों के अनुरूप नहीं है, तो इस पर विश्वास मत करो या इसे स्वीकार मत करो, बल्कि इसे शैतानी वचन या भ्रांति मानकर चलो। जब भी कोई व्यक्ति हमसे कोई काम कराने की कोशिश करता है, अगर यह परमेश्वर के वचनों के अनुरूप नहीं है, तो हमें उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए या उसका पालन नहीं करना चाहिए। हम सिर्फ़ सर्वशक्तिमान परमेश्वर—अंत के दिनों के मसीह—के सभी वचनों में विश्वास करते हैं और हम सिर्फ़ पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये गए इंसान की कार्य व्यवस्थाओं का पालन करते हैं। चाहे अगुआ किसी भी स्तर के हों, हम उनका अनुसरण और आज्ञापालन तभी करते हैं जब उनकी कही बातें सत्य हों और जब उनके द्वारा दिये गए काम ‘ऊपर’ की व्यवस्थाओं के अनुरूप हों। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ व्यवहार का सिद्धांत है। अगर हम इस सिद्धांत पर कायम रहते हैं, तो हम सही मार्ग पर चलने में सक्षम होंगे और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य कर पाएंगे। इस सिद्धांत का उल्लंघन करने से हम आसानी से धोखा खा सकते हैं और अंत में गलत मार्ग पर चल सकते हैं। यहां तक कि हम धोखे में आकर परमेश्वर के साथ विश्वासघात भी कर सकते हैं और एक बार फिर शैतान के अधिकार क्षेत्र में वापस लौट सकते हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है अपने कार्य को पूरा करना और उन कर्तव्यों का निर्वहन करना जो उन्हें परमेश्वर के वचनों और ऊपर की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और सहभागिताओं के अनुसार करना चाहिए। किसी को भी इसमें प्रतिबंध लगाने, रुकावट डालने या हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। अगर कर्तव्यों के निर्वहन से कार्य व्यवस्थाओं का उल्लंघन नहीं होता है तो ऐसा करना सही है। अगर कोई व्यक्ति उन अगुआओं या कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाता है, उन्हें रोकता या परेशान करता है जो कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार सामान्य तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो यह कलीसिया के काम में रुकावट डालना है।

सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास सभी तरह के दुष्ट लोगों से कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार निपटने का अधिकार है। अगर साक्ष्य से इस बात की पुष्टि होती है और तथ्य विश्वसनीय हैं, तो किसी पर भी प्रतिबंध लगाना, रुकावट डालना या हस्तक्षेप करना नहीं चाहिए। सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास कलीसिया की विभिन्न मुश्किल समस्याओं से कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार निपटने और कलीसिया के छोटे-बड़े सभी मामलों में निर्णय लेने का अधिकार है। जब तक उनके काम सत्य सिद्धांतों और कार्य व्यवस्थाओं के अनुरूप हैं और कलीसिया के लिए फ़ायदेमंद हैं, किसी को भी उनके काम में रुकावट डालने, हस्तक्षेप करने या प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

किसी भी पादरी संबंधी क्षेत्र के अगुआ या कार्यकर्ता द्वारा किसी भी व्यक्ति को निष्कासित किये जाने के किसी भी निर्णय को ‘ऊपर’ का समर्थन मिलेगा और उसे कायम रखा जाएगा, अगर स्पष्ट साक्ष्य से उसकी पुष्टि होती हो और वह तथ्यों के अनुरूप हो। जब परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा किसी मसीह विरोधी या कुकर्मी को उजागर किया जाता है और उसकी शिकायत की जाती है, तो साक्ष्य स्पष्ट होने पर, प्रत्येक पादरी संबंधी क्षेत्र के अगुआओं और कार्यकर्ताओं को उन्हें उजागर करना चाहिए और निष्कासन का नोटिस जारी करना चाहिए। कोई भी इस निर्णय का विरोध नहीं कर सकता है। अगर कोई व्यक्ति किसी पादरी क्षेत्र के अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा किसी व्यक्ति को निष्कासित किये जाने के निर्णय का विरोध और निंदा करता है तो वह व्यक्ति दुष्ट है और परमेश्वर का घर उसे कभी माफ़ नहीं करेगा। इसका कारण यह है कि किसी पादरी क्षेत्र के अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा लिये गए निर्णय को कलीसिया में मौजूद परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से अस्सी प्रतिशत की सहमति से पारित किया जाता है; उनके निर्णय परमेश्वर के चुने हुए लोगों के निर्णय का प्रतिनिधित्व करते हैं और वह किसी भी एक स्तर के अगुआ या कार्यकर्ता का निर्णय बिल्कुल भी नहीं होता है। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग यह मानते हैं कि कोई व्यक्ति दुष्ट है और कलीसिया उसे निष्कासित करती है, तो यह लोगों की भावना और स्वर्ग की इच्छा को दर्शाता है और यह पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों ने परमेश्वर के वचनों के आधार पर इस दुष्ट व्यक्ति के प्रकृति सार को समझा है; उन्होंने परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर इस दुष्ट व्यक्ति के कुकर्मी सार को जाना है और उन्होंने उस व्यक्ति के निष्कासन की सहमति में अपने हाथ खड़े किये हैं। इस तरह, यह कलीसिया का निर्णय है और इसे किसी भी व्यक्ति द्वारा रद्द नहीं किया जा सकता। अगर ऐसे कई भ्रमित लोग हैं जो इस निर्णय के ख़िलाफ़ शिकायतें करते हैं और इससे सहमत नहीं होते हैं, जो ‘ऊपर’ से उस व्यक्ति को निष्कासित करने का निर्णय लेने वाले अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बदलने की माँग करते हैं, तो क्या यह सत्य के अनुरूप है? क्या वे बिना वजह के लोगों की निंदा नहीं करते हैं? क्या वे परमेश्वर के घर के कार्य में व्यवधान नहीं डालते हैं? क्या वे जानबूझकर गड़बड़ी पैदा नहीं कर रहे हैं? क्या यह शैतान का स्वभाव नहीं है?

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर के वचनों की रोशनी में सभी समस्याओं को देखना चाहिए; निर्णयों को सिर्फ़ तभी माना जा सकता है जब सत्य की अच्छी समझ रखने वाले कई लोगों द्वारा उसकी पुष्टि की गई हो। अगर सिर्फ़ एक या दो अगुआ किसी व्यक्ति को मसीह विरोधी या दुष्ट व्यक्ति बताते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को आँखें बंद करके इस पर भरोसा नहीं करना चाहिए, ताकि धोखा दिये जाने या छले जाने से बचा जा सके। सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बातों और कर्मों को देखते समय, व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों और ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार ऐसी चीज़ों पर निर्णय लेना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाये जाने से पहले, लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सिर्फ़ मसीह की बातों पर ध्यान देना चाहिए और उसके प्रति समार्पित होना चाहिए; साथ ही उन्हें ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए। सभी चीज़ों में, परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना ही सबसे विश्वसनीय है। अगर अगुआ और कार्यकर्ता ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं और वे ईमानदार एवं उदार दिल वाले लोग हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उनका सहयोग करना चाहिए और उनके काम में मदद करनी चाहिए। अगर यह पता चलता है कि अगुआ और कार्यकर्ता ऐसे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के लिए गवाही देते हों, परमेश्वर का उत्कर्ष करते हों और परमेश्वर का भय मानते हों, बल्कि वे कपटी, अहंकारी, आत्मतुष्ट, स्वार्थी, नीच और दुर्भावनापूर्ण लोग हैं जो सिर्फ़ अपने हित के लिए साजिश रचते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उनकी पहचान करनी चाहिए और उनसे सावधान रहना चाहिए। उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए; उन्हें दुष्ट व्यक्ति की बातें नहीं माननी चाहिए। ऐसा करना बिल्कुल सही है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

अगर कलीसिया में ऐसे झूठे अगुआ और कार्यकर्ता मौजूद हैं जो लोगों को काबू करने के लिए अपने पद और सत्ता का इस्तेमाल करते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उनका विरोध करना चाहिए और उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए; वे उनके साथ सत्य के बारे में सहभागिता कर सकते हैं। सिर्फ़ सत्य और परमेश्वर के वचनों का पालन करो। शैतान के प्रभाव को कभी मत मानो। चाहे कोई भी हो, उसकी बात सिर्फ़ तभी मानी जा सकती है जब उसके वचन और कर्म सत्य के अनुरूप हों। अगर ऐसा नहीं है, तो उन्हें अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। शैतान को ना कहो। यह परमेश्वर की आज्ञाकारिता पर अमल करने का सिद्धांत है। अगर कोई कलीसिया अगुआ यह कहकर तुम्हें काबू में करने के लिए अपने पद और सत्ता का इस्तेमाल करता है, "अगर तुम ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं का पालन करते हो, तो तुम कलीसिया का आज्ञापालन नहीं कर रहे हो और मैं तुम्हें निष्कासित कर दूँगा," तो तुम्हें उनसे यह कहना चाहिए, "आप कलीसिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। आप शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं। मैं ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं का पालन करता हूँ और यह परमेश्वर के कार्य की आज्ञाकारिता की एक अभिव्यक्ति है। मैं शैतान का आज्ञापालन नहीं करूंगा।" इस तरह, शैतान को शर्मिंदा किया जाएगा। जो लोग सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं वे सिर्फ़ उस बात को मानते हैं जो परमेश्वर से आती है, जो सत्य के अनुरूप है और सकारात्मक चीज़ें हैं; उन्हें उस बात को अस्वीकार कर देना चाहिए या उसे ना कहना चाहिए जो शैतान से या इंसान की इच्छा से आती है; जो परमेश्वर के कार्य के लिए फ़ायदेमंद नहीं है या जो सत्य के अनुरूप नहीं है। उन्हें किसी भी अगुआ या कार्यकर्ता द्वारा काबू में नहीं किया जाना चाहिए। सिर्फ़ यही ऐसा व्यक्ति होना है जिसके पास सत्य और वास्तविकता है। परमेश्वर के घर में सर्वोच्च अधिकारी परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, सत्य और ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाएं, उपदेश और सहभागिताएं हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य से आती हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इन चार अधिकारियों की ही बात माननी चाहिए। सिर्फ़ इन चार अधिकारियों का आज्ञापालन करना ही सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन करना है। जब परमेश्वर के चुने हुए सभी लोग परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं, सत्य के अनुसार चलते हैं, एक दिल और एक मन से शैतान के प्रभाव को त्याग देते हैं, तो इससे शैतान पूरी तरह से शर्मिंदा होता है और परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश करते हैं। इसलिए, जब सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बात आती है, तो व्यक्ति को सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों और ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं के आधार पर उनकी बात मानने या उन्हें अस्वीकार का विकल्प चुनना चाहिए। व्यक्ति को खुशामदी होना, दबाव में समर्पण करना, समझौता करना और शैतान का गुलाम बनना नहीं चाहिए। जब कोई इस तरीके से सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर का आज्ञापालन करना और शैतान को ना कहना सीख सकता है, तो समय के साथ वह परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता हासिल करने में सक्षम होगा और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो जाएगा। यही उद्धार पाने का रास्ता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसे साफ़ तौर पर समझना चाहिए और फिर कभी झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों का अनुसरण करके बर्बादी की राह पर नहीं चलना चाहिए। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं सिर्फ़ वे ही वफ़ादारी से शैतान की सेवा कर सकते हैं, सत्ता की पूजा कर सकते हैं, खुशामदी हो सकते हैं और दबाव में आकर समर्पण कर सकते हैं। ऐसे सभी गुलाम लोगों से परमेश्वर नफ़रत करता है और उनका तिरस्कार करता है। अगर वे अभी भी नहीं जगते हैं, सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते हैं तो उन सभी को हटा दिया जाएगा। जिस दिन झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों को दंडित किया जाएगा उस दिन शैतान का अनुसरण करने वाले और उसकी बात मानने वाले ये गुलाम रोएंगे और अपने दांत पीसेंगे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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