71. कलीसिया में लोगों को अलग-थलग रखे जाने के सिद्धांत

(1) ऐसे लोगों पर पृथक्करण का नियम लागू किया जाना चाहिए जो कलीसिया के जीवन में बार-बार बाधा डालते हैं और उसमें रुकावट पैदा करते हैं, और जिनके व्‍यवहार में, उनसे निपटे जाने और काटे-छाँटे जाने के बाद भी, सुधार नहीं आया है और जिन्‍होंने अपने तौर-तरीके नहीं बदले हैं।

(2) ऐसे झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को जो बुरे लोग तो नहीं हैं लेकिन जो मानवता की दृष्टि से कमजोर हैं, जिन्‍होंने बार-बार अपराध किए हैं, और जो दूसरों पर बुरा प्रभाव डालते हैं, बदल दिया जाना चाहिए और एकांत में आत्म-चिंतन के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।

(3) जो लोग हिरासत में लेकर छोड़ दिए गए हैं, उनकी परिस्थितियाँ चाहे कुछ भी रही हों, उन्‍हें सुरक्षा की दृष्टि से सावधानी के तौर पर छह महीने तक अलग-थलग रखा जाना चाहिए।

(4) कलीसिया अपने सदस्‍यों के बहुमत की सहमति से ही किसी व्‍यक्ति को अलग-थलग कर सकती है, और यह प्रतिबंध तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि वह व्‍यक्ति सच्‍चे मन से पश्‍चाताप नहीं कर लेता।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर दुष्ट हरकतें करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

कलीसिया द्वारा लोगों को छाँटकर अलग करना और निष्कासित किया जाना न्यायोचित है। चूँकि कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने कलीसियाई जीवन की सामान्य व्यवस्था बिगाड़ दी है और लोगों को छाँटकर अलग करने और निष्कासित करने के अपने अधिकार का दुरुपयोग करके परमेश्वर के चुने हुए कई लोगों को नुकसान पहुँचाया है, इसलिए लोगों को छाँटकर अलग करने और निष्कासित करने के उनके अधिकार को निरस्त कर दिया गया है। किंतु कलीसिया द्वारा लोगों को छाँटकर अलग करना और निष्कासित किया जाना न्यायोचित है; और इस अधिकार को बनाए रखा जाना चाहिए। इसकी पूर्व-शर्त यह है कि इसका कार्यान्वयन सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। किन्हीं अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर हमला करने, उनसे बदला लेने और उन्हें फँसाने के मौके ढूँढ़ने और अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अगर कोई कलीसिया किसी व्यक्ति को छाँटकर अलग करती है या उसे निष्कासित करती है, तो इसे उस कलीसिया के 80% से अधिक लोगों द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए; इसमें और किसी अगुआ या कार्यकर्ता द्वारा, या सदस्यों के अल्पमत द्वारा किसी व्यक्ति को छाँटकर अलग करने और निष्कासित करने में अनिवार्य अंतर है—ये दो बिलकुल अलग-अलग बातें हैं। कलीसिया को खुद को छाँटकर अलग करने के लिए बाध्य करने वाला व्यक्ति मुख्य रूप से वह व्यक्ति होता है, जो आदतन कलीसियाई जीवन में रुकावट पैदा करता है और बिना वजह दुर्व्यवहार करता है, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सत्य को समझने में रुकावट पैदा करता है और उन्हें संकट में डालता है, और जो बार-बार अनुशासित किए जाने के बाद भी सलाह पर ध्यान देने और अपने तरीके बदलने से इनकार कर देता है। स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो, छाँटकर अलग किया गया व्यक्ति आम तौर पर या तो दुष्ट व्यक्ति होता है या अविवेकी। अगर किसी ने लगातार कलीसियाई जीवन में रुकावट न डाली हो, तो उसे छाँटकर अलग नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति को छाँटकर अलग करने का तरीका है उसे अन्य छाँटकर अलग किए गए लोगों के साथ सभाओं में हिस्सा लेने के लिए कहना। अगर कलीसिया से सिर्फ एक ही व्यक्ति छाँटकर अलग किया गया है, तो उसे अपने घर पर ही रहकर आध्यात्मिक कार्य करने के लिए कहा जा सकता है। संक्षेप में, उन्हें कलीसियाई जीवन में शामिल होने की अनुमति नहीं है। अब लोगों को सभाओं के लिए समूह क और समूह ख में विभाजित किया जाना चाहिए, जो लोग सत्य का बिलकुल भी अनुसरण नहीं करते, बल्कि जो अविवेकी हैं और मनमाने ढंग से काम करते हैं, उन्हें सभाओं में हिस्सा लेने के लिए एक-साथ रखा जाना चाहिए; यह पूरी तरह से सामान्य कलीसियाई जीवन को बनाए रखने और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन-प्रवेश के लिए लाभकारी है। अगर छाँटकर अलग किए गए लोग समूह 'ख' में रखे जाने के बाद भी पश्चात्ताप नहीं करते, तो उन्हें निष्कासित किया जा सकता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

जो लोग अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए ऐसा मनमाना व्यवहार करते हैं, जिसका अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण कलीसिया के काम में गंभीर रुकावट और परेशानी पैदा होती है, जो सत्य को स्वीकार करने और उसका पालन करने से इनकार करते हैं, जिनका काट-छाँट किए जाने, निपटे जाने और सख्ती से अनुशासित किए जाने के बाद भी पश्चात्ताप करने का कोई इरादा नहीं होता, उन्हें छाँटकर अलग कर दिया जाना चाहिए। छाँटकर अलग किए जाने और आत्मचिंतन के दौरान वे सिर्फ सुसमाचार के प्रचार का कर्तव्य निभा सकते हैं। जो लोग सचमुच पश्चात्ताप किए बिना काफी समय तक उथल-पुथल मचाए रखते हैं और अड़ियल बनकर अपना दोष स्वीकार करने से मना करते हैं और जो वास्तव में दुष्ट लोग हैं, उनके बुरे कर्म और शैतानी प्रकृति परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा उजागर की जानी चाहिए और फिर उन्हें छाँटकर अलग कर देना चाहिए। अगर वे फिर भी पश्चात्ताप करने से मना करते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा उन्हें पूरी तरह से निष्कासित किया और त्यागा जा सकता है। अगर वे सुसमाचार का प्रचार करके सेवा करने में सक्षम हैं, तो वे सभाओं के लिए समूह 'ख' में रह सकते हैं। अगर वे सुसमाचार का प्रचार करके सेवा करने में असमर्थ हैं या सेवा नहीं करना चाहते, तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाना चाहिए।

जिन लोगों ने कई सालों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन अभी भी न तो सत्य को समझते हैं और न ही परमेश्वर के वचनों या उपदेशों और सहभागिताओं को समझते हैं, वे निश्चित रूप से भ्रमित लोग हैं, जो सत्य से प्रेम नहीं करते। जो लोग सत्य की पहचान करना बिलकुल नहीं जानते, दृढ़तापूर्वक नियमों से चिपके रहते हैं और बिना सोचे-समझे नियमों का पालन करते हैं, जो अकसर दूसरों द्वारा बहका दिए जाते हैं, सत्ता के आगे झुक जाते हैं और दूसरों की कही बातों को दोहराते हैं, वे सभी बेतुके लोग हैं, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते। चाहे भ्रमित हों या बेतुके, अगर लोगों ने कभी भी सत्य को नहीं समझा है, तो वे रुकावट डालने वाले बुद्धिहीन लोग हैं और परमेश्वर के चुने हुए असली लोग तो बिलकुल भी नहीं हैं। जो लोग अपने कर्तव्य निभाते हुए अपने मुख्य कार्य पर ध्यान नहीं देते, जो परमेश्वर के कार्य को कायम नहीं रखते, जो अकसर किसी न किसी व्यक्ति की आलोचना या निंदा करने में दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, जिन्हें हर दूसरे व्यक्ति में समस्याएँ दिखती है लेकिन खुद में कोई गलती नहीं दिखती, जो लगातार मनमाने काम करते हैं, कलह बोते हैं और विवादों को जन्म देते हैं, वे बिना सोचे-समझे गड़बड़ी और अव्यवस्था पैदा करने वाले लोग हैं, और वे वास्तव में परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं। जो लोग अपने ही जीवन-प्रवेश पर ध्यान नहीं देते, जो अपने ही सत्य के अभ्यास और अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाने पर ध्यान नहीं देते, जो परमेश्वर के चुने हुए ऐसे लोगों के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते जो सचमुच सत्य का अनुसरण करते हैं और निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं, वे बिना सोचे-समझे गड़बड़ी पैदा करने वाले लोग हैं, और वे वास्तव में परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं। उन्हें सिर्फ सभाओं में हिस्सा लेने और आत्मचिंतन करने के लिए समूह 'ख' में रखा जा सकता है, ताकि वे अपने कार्यों को जान सकें। यह उनके लिए पश्चात्ताप करने का एक मौका है। अगर ऐसे लोग बिना सोचे-समझे गड़बड़ी पैदा करने के लिए दुष्ट लोगों का अनुसरण करना जारी रखते हैं, अपने उचित कर्तव्यों का पालन नहीं करते, बेवजह परेशानी खड़ी करते हैं, कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी पैदा करते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कर्तव्य निभाने से रोकते हैं, जिससे परमेश्वर के चुने हुए ज्यादातर लोग उनके प्रति विकर्षण और नफरत महसूस करते हैं, तो ऐसे लोगों को निष्कासित किया जा सकता है। ये सभी गड़बड़ी पैदा करने वाले बुद्धिहीन और अविश्वासी लोगों से निपटने के सिद्धांत हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कलीसियाई जीवन में लागू किए जाने वाले प्रबंधन के सिद्धांत

1. जो लोग गपशप करना पसंद करते हैं और सभाओं के दौरान अकसर धारणाएँ और भ्रांतियाँ फैलाते हैं, उनके साथ काट-छाँट की जानी चाहिए और उनसे निपटा जाना चाहिए। अगर वे बार-बार अनुशासित किए जाने के बावजूद अपने तरीकों में सुधार करने से इनकार करते हैं, तो उन्हें छाँटकर अलग किया जा सकता है।

2. जिन लोगों की काबिलियत बहुत कम है और जो चीजों को समझने में सक्षम नहीं हैं, जो सत्य को बिलकुल भी नहीं समझ सकते, उन्हें सभाओं में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। अगर ऐसे लोग सभाओं में शामिल होने पर जोर देते हैं, तो उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध तब तक अलग नहीं किया जाना चाहिए, जब तक वे आज्ञाकारी रहते हैं और कोई गड़बड़ी पैदा नहीं करते।

3. जो लोग सभाओं में कभी भी परमेश्वर का गुणगान नहीं करते या उसकी गवाही नहीं देते, बल्कि हमेशा अपनी बातें करते हैं और खुद को सही ठहराने के लिए कुतर्क का इस्तेमाल करते हैं या जो हमेशा छिपी हुई मंशाओं के साथ गवाही देते हैं और कपोल-कल्पित बातें कहते हैं, और दूसरों को धोखा देने के लिए कपट का सहारा लेते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो खुद का दिखावा करते हैं ताकि दूसरे लोग उनकी प्रशंसा करें, और वे दूसरों को धोखा देने के लिए केवल झूठी गवाहियाँ देते हैं। ऐसे लोगों में कपटपूर्ण इंसानियत होती है, और वे कई सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद जरा भी नहीं बदलते। वे जो कहना चाहते हैं उसे कभी नहीं कहते, वे जो कहते हैं उसे कभी नहीं करते, और वे केवल पाखंडी होते हैं। ऐसे लोगों की काट-छाँट की जानी चाहिए, उनसे निपटा जाना चाहिए और उन्हें उजागर किया जाना चाहिए। अगर वे पश्चात्ताप नहीं करते, बल्कि दूसरों को धोखा देने के लिए झूठी गवाहियाँ देना जारी रखते हैं, तो उन्हें पूरी तरह से अपमानित करने के लिए उजागर करने और गलत साबित करने के लिए एक योजनाबद्ध दृष्टिकोण लागू किया जा सकता है। अगर वे अभी भी अवज्ञा करते हैं, तो उन्हें अगले छह महीनों के लिए अलग कर दिया जाना चाहिए, और उसके बाद उनके पश्चात्ताप की मात्रा के आधार पर यह पता लगाया जाना चाहिए कि उन्हें फिर से कलीसियाई जीवन शुरू करना चाहिए या नहीं।

4. जिन लोगों में बहुत ही खराब इंसानियत है और जो हमेशा कलीसियाई जीवन में रुकावटें पैदा करते हैं, उनकी काट-छाँट की जानी चाहिए और उनसे निपटा जाना चाहिए। उन पर पाबंदियाँ लगाने और उन्हें निष्कासित करने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोग एक-साथ मिल सकते हैं, ताकि उन्हें पश्चात्ताप करने और बदलने के लिए प्रेरित किया जा सके। अगर वे फिर भी नहीं बदलते, तो उन्हें छाँटकर अलग करने और निष्कासित करने की कार्रवाई की जा सकती है।

5. अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता, जिसने कोई गंभीर अपराध किया हो या जिसे बदला गया हो, सचमुच पश्चात्ताप करता है और बदल जाता है और कलीसियाई जीवन में गड़बड़ी पैदा नहीं करता, तो उनके साथ प्यार से पेश आना चाहिए। अगर वे कलीसियाई जीवन में गड़बड़ी पैदा करते रहते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सत्य में प्रवेश करने पर बहुत बुरा असर डालते हैं, तो उन्हें छाँटकर अलग किया जाना चाहिए या निष्कासित किया जाना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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