61. एक कलीसिया की स्थापना के सिद्धांत

(1) जहाँ कहीं भी लगभग 20 लोग परमेश्‍वर के कार्य को सच्‍चे मन से स्‍वीकार करते हैं और कलीसिया का जीवन जीने की इच्‍छा जाहिर करते हैं, वहाँ एक कलीसिया स्‍थापित की जा सकती है।

(2) कलीसिया की स्‍थापना सिर्फ कलीसिया के अगुआओं के मार्गदर्शन में की जानी चाहिए, उन उपयाजकों के मार्गदर्शन में जिन पर सुसमाचार के प्रसार की जि‍म्‍मेदारी है, या सिंचन की जि‍म्‍मेदारी है।

(3) जैसे ही कलीसिया अपने अगुआओं और उपयाजकों को चुन लेती है, वे इसका संचालन करने लगते हैं और कलीसिया के सारे कार्यों तथा उसकी सारी समस्‍याओं के समाधान के लिए जि‍म्‍मेदार हो जाते हैं।

(4) कलीसिया का नामकरण उस जगह के नाम पर किया जा सकता है जहाँ वह स्थित हो, और कलीसिया की स्‍थापना के बाद उसके सदस्‍यों की संख्‍या स्‍थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित की जा सकती है।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

कलीसिया की स्थापना करने के सिद्धांत इस प्रकार हैं : यदि (लगभग 20) लोगों का एक समूह हो जो परमेश्वर के काम को स्वीकार करते हों, जिन्होंने कलीसिया में औपचारिक प्रवेश का एक आवेदन पत्र लिखा हो, और जो अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार हों, तो एक कलीसिया की स्थापना की जा सकती है। यदि केवल 10 के लगभग ही नवागंतुक हों जो इकट्ठा होना चाहते हैं, तो सभा का एक स्थान स्थापित किया जा सकता है, लेकिन कलीसिया स्थापित नहीं की जा सकती। जिन लोगों ने कलीसिया में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से आवेदन नहीं किया है, वे केवल सभा में भाग ले सकते हैं; उन्हें कलीसिया के औपचारिक सदस्य के रूप में नहीं माना जाता है। कलीसियाओं को व्यक्तिगत रूप से कलीसिया के अगुवाओं, सुसमाचार के उपयाजक, या नवागन्तुकों को सिंचित करने वाले किसी उपयाजक द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए। कलीसियाई जीवन के लिए जो लोग नए हैं, उनके बीच की अपरिचितता के कारण चुनाव संभव नहीं हैं। इसलिए, नवागन्तुकों की कलीसियाओं के पहले अगुवाओं और उपयाजकों की नियुक्ति ऐसे लोगों की चर्चा के माध्यम से की जाना चाहिए जो नवागंतुकों से परिचित हैं। यह परीक्षण का समय होगा; छह महीने से एक साल के बाद, जब सभी एक-दूसरे से परिचित हो लें, चुनाव कराना पूरी तरह से उचित होगा। जब एक कलीसिया की स्थापना की जाती है, तो कलीसिया के नव-स्थापित अगुवाओं द्वारा एक प्रार्थना सभा आयोजित की जानी चाहिए। इस बैठक में, पहले कलीसिया की स्थापना की एक औपचारिक घोषणा होगी, जिसके बाद प्रार्थना शुरू होगी। प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना करेगा, यह घोषणा करेगा कि वो औपचारिक रूप से सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करता है और कलीसिया में शामिल हो रहा है, और वो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने, सत्य को स्वीकार करने, परिशोधित होने, और अपनी पूरी शक्ति के अनुसार परमेश्वर को घोषित करने और उसकी गवाही देने के लिए तैयार है। वे लोग अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं के बारे में भी परमेश्वर को बता सकते हैं, और परमेश्वर से अपने दिल की बातें कह सकते हैं। चुने गए लोगों की प्रार्थनाओं के बाद, कलीसिया की स्थापना पूरी हो जाएगी। नवागंतुकों की कलीसिया की स्थापना के बाद की प्रारंभिक अवधि के दौरान, उस जिले के अगुवाओं को लोगों का सिंचन करने, और कलीसिया का जीवन जीने में उनकी मदद करने की व्यवस्था करनी चाहिए। वे नवागंतुक जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, सत्य से प्रेम करते हैं, और अच्छी योग्यता वाले हैं, उनका पोषण भी किया जाना चाहिए ताकि वे सत्य को समझ सकें और जितनी जल्दी हो सके, सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। एक वर्ष के बाद, वे नवागंतुक जो अगुवा और उपयाजक हैं, औपचारिक रूप से कलीसियाई जीवन का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी ले सकते हैं।

कलीसिया में सदस्यों की संख्या लगभग 20-50 हो सकती है। यदि 50 से अधिक लोग हो जाने के कारण, सभा का आयोजन करना कठिन हो जाए, तो बशर्ते कि उपयुक्त अगुवाओं का चयन किया जा सके, एक अलग कलीसिया स्थापित की जा सकती है। एक कलीसिया की स्थापना का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत अगुवाओं के रूप में कार्य करने हेतु सही लोगों का होना है—यह सबसे महत्वपूर्ण है। कलीसिया का नामकरण किसी स्थानीय जगह के नाम पर किया जा सकता है, वैसे ही जैसे बाइबल में दर्ज कुरिन्थ और इफिसुस आदि की कलीसियाएँ हैं। एक बार कलीसिया के स्थापित हो जाने के बाद, नवागंतुकों के निवास स्थानों के आधार पर सभा-समूहों की स्थापना की जा सकती है। प्रत्येक दल में स्थानीय स्थिति के अनुसार लोगों की संख्या कम-ज्यादा होनी चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कलीसिया की प्रशासकीय समीति में पाँच व्यक्तियों की एक टीम होगी, जिसमें समान वरिष्ठता के दो अगुआ तीन उपयाजकों के साथ समन्वय में सेवा करेंगे। तीन उपयाजकों में एक धर्म-प्रचारक उपयाजक, एक सामान्य मामलों का उपयाजक और एक सिंचन उपयाजक शामिल होगा। कलीसिया का जीवन दोनों अगुआओं की सीधी ज़िम्मेदारी है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

अविश्वासियों के बीच नवागंतुकों के लिए, यदि उन्होंने तीन महीने से अधिक समय तक विश्वास किया है और उनकी संख्या 20 के आसपास है, तो वे मिलकर एक नई कलीसिया बना सकते हैं। यदि वे सभी नए विश्वासी हैं और वे अभी भी निश्चित नहीं हैं कि यही सच्चा मार्ग है, तो उनकी संख्या चाहे जितनी भी हो, नई कलीसिया की स्थापना को लेकर जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिए। यदि अविश्वासियों के बीच नवागंतुक कम और बिखरे हुए हैं या सीधे भाई-बहनों के परिवार, रिश्तेदारों या दोस्तों से आए हैं, और उनसे अपेक्षाकृत परिचित हैं, अगर उनका आचरण अच्छा है, तो उन्हें तीन महीने बाद कलीसिया में शामिल किया जा सकता है। यदि, कलीसिया की स्थापना हो जाने के बाद यह पाया जाता है कि इसमें ऐसे लोग हैं जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो उन्हें सभा के लिए समूह ख में रखा जा सकता है ताकि उन पर नजर रखी जा सके।

अविश्वासियों के बीच से आए नए लोगों द्वारा किसी कलीसिया की स्थापना के सिद्धांत और शर्तें ये हैं कि उन्हें उस बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की न्यूनतम समझ होनी चाहिए जो कि किसी ईसाई के लिए अत्यावशयक हैं : 1. उन्हें अपने हृदय में यह स्वीकार करना चाहिए कि केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और उनमें जो कुछ है, वह सब बनाया है और वही ब्रह्मांड की हर एक चीज़ का मालिक है। 2. उन्हें यह पता होना चाहिए कि परमेश्वर में विश्वास, बचाये जाने, पाप से बचने, शैतान के प्रभाव से बचने, पूरी तरह से परमेश्वर के पास लौटने, परमेश्वर को समर्पित होने और उसकी आराधना करने के लिए है; केवल इस तरह से परमेश्वर पर विश्वास करने से ही वे अनंत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। 3. उन्हें सच्चे परमेश्वर के नाम को कायम रखना चाहिए। उन्हें मूर्तियों या दुष्ट आत्माओं की आराधना नहीं करनी चाहिए, और सभी झूठे देवताओं और दुष्ट आत्माओं का त्याग करना चाहिए। 4. उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहिए। उन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक प्रणालियों का पालन करना चाहिए, लेकिन अपने विश्वास में किसी भी राष्ट्र, सरकार या राजनीतिक पार्टी के प्रतिबंधों के अधीन नहीं होना चाहिए; उन्हें केवल परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए, लोगों की नहीं। 5. उन्हें बुद्धिमान होना चाहिए; उनमें जिम्मेदारी की यह भावना होनी चाहिए कि वे परमेश्वर के घर के कार्य और हितों को कायम रखें, यदि वे ऐसा नहीं करते तो वे परमेश्वर का अनुग्रह साझा करने के योग्य नहीं हैं। यदि वे इन चीज़ों को समझते हैं, तो उनके लिए एक नई कलीसिया स्थापित की जा सकती है या उन्हें मौजूदा कलीसिया में स्वीकार किया जा सकता है; यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो एक नई कलीसिया की स्थापना या मौजूदा कलीसिया में उनकी स्वीकृति को स्थगित कर देना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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