62. कलीसिया के चुनावों के सिद्धान्‍त

(1) किसी चुनाव के पहले सत्‍य पर सहभागिता और सिद्धान्‍तों की समझ आवश्‍यक है। अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में ऐसे लोगों को चुनो जो कार्य-व्‍यवस्‍था के अनुरूप व्‍यावहारिक कार्य कर सकें;

(2) चुनाव के दौरान सत्‍य का अभ्‍यास करना और लोगों के साथ न्‍याय-संगत ढंग से बरताव करना आवश्‍यक है। खुद को न तो जज्बातों से परिचालित होने दो, न ही निजी लगावों या विद्वेषों से परिचालित होने दो; इसकी बजाय सिद्धान्‍तों पर आधारित निष्‍पक्ष मतदान करो;

(3) कलीसिया में हर व्‍यक्ति को चुनाव में मतदान करने का और चुने जाने का हक़ है। कोई भी व्‍यक्ति मनमाने ढंग से दूसरों को मतदान करने या चुने जाने के उनके हक़ से वंचित नहीं कर सकता;

(4) किसी भी व्‍यक्ति को किसी प्रत्‍याशी को एकतरफ़ा ढंग से नामजद करने की इजाज़त कतई नहीं है, और चुनाव के वैध होने के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्‍यक है कि कलीसिया के कम-से-कम 80% सदस्‍य चुनाव में मतदान करें।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लिए कलीसिया का लोकतांत्रिक चुनाव परमेश्वर के चुने हुए लोगों के परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर चलने से संबंधित है। इसका संबंध कलीसिया जीवन की प्रमुख जिम्मेदारियों से है। अच्छे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के चुनाव से ही, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सत्य की समझ पाने और परमेश्वर में विश्वास करने का सही मार्ग दिखाया जा सकता है। अगर झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों ने कलीसिया में सत्ता हासिल कर ली, तो न केवल वो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के उद्धार में देरी करेंगे, बल्कि वो कलीसिया जीवन में भी परेशानियाँ खड़ी करेंगे। वो कलीसिया पर आपदाएँ ले आयेंगे जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर खतरा मंडराएगा और वे पीड़ित होंगे। इसलिए, परमेश्वर के चुने हुए लोग कलीसिया के चुनावों में किस तरह का बर्ताव करते हैं, यह काफ़ी मायने रखता है। परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों को सत्य की खोज करके गंभीरता के साथ और सिद्धांतों के अनुसार चुनाव करना चाहिए। कलीसिया के लोकतांत्रिक चुनाव के सात सिद्धांत आगे बताये गए हैं, जिन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों को समझना चाहिए और उनका पालन करना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए।

1. कलीसिया में परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों (उन लोगों को छोड़कर जिन्हें छांट दिया जाएगा या निष्कासित किया जाएगा) को चयन करने और चुनाव में खड़े होने का अधिकार है। किसी को भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों के चयन करने और चुने जाने के अधिकार में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

2. कलीसिया में चुनाव के वक्त परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को इस बारे में सूचित किया जाना चाहिए और सभी को चुनाव में भाग लेना चाहिए (यानी वोट देना चाहिए)। जो लोग जानकर भी चुनाव में भाग नहीं लेते, वो अपनी इच्छा से अपने अधिकार खो बैठते हैं। किसी को यह अधिकार नहीं है कि वो केवल कुछ लोगों को चुनाव में भाग लेने के लिए सूचित करे या कुछ लोगों के समूह को भाग नहीं लेने पर मजबूर करे। जो भी दूसरों के वोट देने के अधिकार को छीनेगा या उन्हें वोट देने से रोकेगा, वो एक दुष्ट व्यक्ति है जो मानव अधिकारों का उल्लंघन करता है और सत्य का विरोध करता है।

3. कलीसिया के चुनाव में, किसी को भी किसी उम्मीदवार को नामित करने या कुछ लोगों की इच्छा के अनुसार परमेश्वर के चुने हुए लोगों को वोट देने के लिए मजबूर करने की अनुमति नहीं है। यह ऐसा बर्ताव है जो मानव अधिकारों के साथ हस्तक्षेप करता है और सत्य के खिलाफ जाता है। चुनाव से पहले, केवल सत्य पर सहभागिता करने और अभ्यास करने के सिद्धांतों का प्रचार करने की अनुमति है। यह सत्य पर सहभागिता करने और अपने कर्तव्यों को निभाने का सही तरीका है। अगर कोई अपनी इच्छा के अनुसार किसी उम्मीदवार को नियुक्त करता है या गलत चुनाव करने के लिए लोगों को उकसाता, धोखा देता है या मजबूर करता है, तो इससे चुनाव के परिणामों को अमान्य कर दिया जाएगा।

4. कलीसिया के चुनाव में भाग लेने वाले मतदाताओं की संख्या कलीसिया की सभाओं में शामिल होने वाले लोगों के कम से कम 80% के बराबर होनी चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार, जिलों और इलाकों में भाग लेने वाले मतदाताओं की संख्या अधिकतम हो सकती है। अगर परमेश्वर के कुछ चुने हुए लोग सूचित नहीं किए जाने के कारण मतदान में भाग नहीं ले पाते हैं, तो वह चुनाव अमान्य कर दिया जाएगा।

5. सही तरीके से और विधिवत चुने गए किसी भी अगुआ या कार्यकर्ता को बदलने या हटाने का अधिकार किसी को भी तब तक नहीं है, जब तक कि वो ऐसा व्यवहार नहीं करते जो किसी अगुआ या कार्यकर्ता की भूमिका को निभाने में स्पष्ट रूप से असमर्थ है। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर के चुने हुए कम से कम 80% लोगों को संबंधित अगुआ या कार्यकर्ता पर प्रतिबंध लगाने या आने वाले चुनाव में भाग लेने से रोकने के लिए अपनी मंजूरी देनी होगी।

6. सभी स्तरों पर कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लोकतांत्रिक चुनाव को संस्थागत बना दिया गया है। चुनाव साल में एक बार होते हैं और कार्यकाल एक वर्ष का होता है। किसी को भी कलीसिया के चुनाव के माध्यम से चुने गए किसी भी अगुआ या कार्यकर्ता को किसी भी स्तर पर बदलने का अधिकार नहीं है। अगर किसी चुने गए अगुआ या कार्यकर्ता ने कार्यालय में गंभीर गलतियाँ की हैं जो उन्हें काम जारी रखने में असमर्थ बनाती हैं, तो उनकी जगह किसी और को देने के लिए परमेश्वर के चुने गए ज़्यादातर लोगों की अनुमति से दोबारा चुनाव किया जा सकता है।

7. जिस दिन से परमेश्वर के घर ने कलीसिया की चुनावी प्रणाली को पूरी तरह से लागू करने का एलान किया था, उसी दिन से कलीसिया के सभी स्तरों पर अगुआओं को चुना जाना ज़रूरी है। किसी को भी सभी स्तरों पर कलीसिया के अगुआओं को नामित या नियुक्त करने का अधिकार नहीं है। यह परमेश्वर के घर का प्रशासनिक नियम है जिसमें किसी को भी संशोधन करने का अधिकार नहीं है। जो कोई भी इस प्रशासनिक नियम का उल्लंघन करेगा, उसे एक मसीह विरोधी के रूप में दंडित किया जाएगा।

कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लोकतांत्रिक चुनाव के लिए सात सिद्धांतों को लागू करने के बाद, सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को तदनुसार इस अभ्यास का पालन करना चाहिए। सात सिद्धांतों के अनुसार चुनाव कराने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हर स्तर पर कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं की निगरानी करने का अधिकार है। परमेश्वर के चुने हुए लोग किसी भी स्तर पर इन सात सिद्धांतों का उल्लंघन करनेवाले किसी भी अगुआ या कार्यकर्ता को प्रतिबंधित करने और रोकने के लिए एक साथ आ सकते हैं। अगर वो इसका पालन करने से इनकार करते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोग ऊपरी स्तर के अगुआओं से अपील कर सकते हैं। यह कलीसिया के काम को बनाये रखने के लिए एक न्यायोचित कार्य है। परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को मदद और सहयोग करना चाहिए। केवल इस तरह से नियम लागू करके ही झूठे अगुआओं, झूठे कार्यकर्ताओं और दुष्ट लोगों द्वारा अशांति और गड़बड़ी फ़ैलाये जाने से रोका जा सकता है। कलीसिया के पास ऐसे किसी भी दुष्ट व्यक्ति को निष्कासित करने का पूरा अधिकार है जिसे कलीसिया के चुनाव में साफ़ तौर पर उजागर किया गया है और वह पश्चाताप करके अपने पापों को कबूल करने में विफल रहता है। हालांकि, इसकी कार्रवाई को मंज़ूरी के लिए सूचित किया ज़रूरी है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों का चयन करना एक ऐसा बड़ा मामला है जो इस बात को प्रभावित करता है कि परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को बचाया जा सकता है या नहीं। इस मुद्दे को लेकर परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों का ऐसा ही रवैया होना चाहिए: उसे चुनो जो तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने का सही मार्ग दिखा सकता है; उसे चुनो जो परमेश्वर द्वारा बचाये जाने में आपका मार्गदर्शन कर सकता है।अतीत में चाहे तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार किया गया हो, तुम्हें अपनी निजी दुश्मनी को भूलकर और पूरी तरह से निष्पक्ष होकर वोट देना चाहिए। अगर तुम वाकई परमेश्वर में विश्वास करते हों, तो उसके द्वारा बचाये जाने के लिए, तुम्हें कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों के चुनाव के मामले में सही ढंग से व्यवहार करना होगा। भावनाओं और निजी इच्छाओं के आधार पर वोट देने से तुम्हें ही नुकसान होगा, तुम्हारी ही बर्बादी होगी। इससे कोई फायदा नहीं होगा और न ही यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के हित में है। इसलिए, कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों का चुनाव करते वक्त, परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को उनकी इच्छा को ध्यान में रखकर सत्य का अभ्यास करना चाहिए। भावनाओं में बहकर वोट मत दो; निजी दुश्मनी को भूलकर सिद्धांत के अनुसार काम करो। केवल ऐसा करके ही तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगे और अपने जीवन की जिम्मेदारी ले सकोगे। कलीसिया के हर चुनाव से पहले, अगुआओं और उपयाजकों को चुनने के पीछे के सिद्धांतों पर स्पष्ट रूप से सहभागिता की जानी चाहिए, इसके बाद ही औपचारिक रूप से चयन किया जाना चाहिए। चुनावों के दौरान, ऊँचे पद के अगुआओं और कार्यकर्ताओं को मतदान प्रक्रिया का संचालन और पर्यवेक्षण करना चाहिए। चुनाव के माध्यम से कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों की नियुक्ति निष्पक्ष और उचित है। एक ओर, यह ऊँचे पद के अगुआओं द्वारा की गई नियुक्तियों के परिणाम से होने वाली किसी भी विसंगति का समाधान करता है और दूसरी ओर यह अनुपयुक्त अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कार्यालय में अपना कर्तव्य जारी रखने से रोकता है। यह कलीसिया के काम और परमेश्वर के चुने हुए लोग, दोनों के लिए फायदेमंद है। अतीत में, ऊँचे पद के अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा नियुक्त योग्य अगुआओं और उपयाजकों का अनुपात बहुत कम था, और उनमें काफ़ी विसंगति भी थी। क्योंकि ऐसे भ्रष्ट इंसानों के पास सत्य नहीं होता है जिनका अब तक उद्धार नहीं हुआ है, वे लोगों के प्रकृति सार की थाह नहीं पा सकते, वो अपनी इच्छाओं के अनुसार दूसरे लोगों का इस्तेमाल करते हैं, कोई भी आसानी से उन्हें धोखा दे सकता है, उनके साथ छल कर सकता है, और फायदा भी उठा सकता है। इसलिए, परमेश्वर के घर ने फैसला किया है कि कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों को किसी व्यक्ति द्वारा सीधे नियुक्त किए जाने के बजाय लोकतांत्रिक रूप से चुना जाना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए जिम्मेदारी दिखाने का यही मतलब है। कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों के बाद के चुनाव साल में एक बार आयोजित किए जाएंगे। कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों को चुने जाने के बाद, उन्हें सीधे जिला अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा सिंचन, पोषण और सहयोग प्रदान किया जाएगा। अगर चुना गया व्यक्ति, कुछ समय तक काम करने के बाद, कोई वास्तविक काम करने में असमर्थ होता है या काम के लिए सही साबित नहीं होता है, तो उसका पद किसी और को देने के लिए नया चुनाव किया जा सकता है। प्रभावशाली तरीके से काम करने में सक्षम अगुआओं और उपयाजकों को तब तक फिर से चुना जा सकता है जब तक कि परमेश्वर के चुने हुए लोग उनका समर्थन करना बंद नहीं करते। परमेश्वर का कार्य लोगों को चयन करने की आजादी देता है। अब से, कलीसिया के सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा चुना जाएगा, और उनके द्वारा मंज़ूर नहीं किये गए सभी लोगों को प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। अगर किसी चयनित व्यक्ति को परीक्षणों की प्रक्रिया से गुजरने के दौरान उजागर किया जाता है, तो उसे हटा दिया जाना चाहिए। उसके बाद परमेश्वर के चुने हुए लोगों को फिर से किसी नए व्यक्ति को चुनने करने के लिए वोट देना चाहिए। अगुआओं द्वारा की गयी व्यक्तिगत नियुक्तियाँ ज्यादातर गलत साबित होती हैं और उनमें सफलता की संभावना भी कम होती है, जबकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा चुने गए ज़्यादातर लोग अपेक्षाकृत सही साबित होते हैं और उनमें सफ़लता की काफ़ी संभावना होती है। यह एक तथ्य है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

चुनाव से पहले, हर कलीसिया को सत्य के बारे में सहभागिता करने के लिए तीन से पाँच बार सभा करनी चाहिए, ताकि परमेश्वर के चुने गए लोग चुनाव के महत्व को समझें और जान सकें कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अपने विश्वास में उद्धार पाने के लिए अच्छे अगुआओं का चयन करना ज़रूरी है। अगर चुने गए अगुआ बुरे लोग, झूठे अगुआ या मसीह विरोधी साबित होते हैं तो कलीसिया का जीवन अच्छा नहीं होगा, साथ ही कलीसिया में परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को अपने जीवन में नुकसान भुगतना पड़ेगा। इसलिए, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कलीसिया का अच्छा जीवन मिलेगा या नहीं और उन्हें सत्य की समझ हासिल होगी या नहीं, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि कलीसिया अच्छे अगुआओं का चुनाव करती है या नहीं—जिसका सीधा संबंध परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों के जीवन में प्रवेश से है। अगर इस संबंध में स्पष्ट रूप से सत्य पर सहभागिता की जाती है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोग चुनाव को ज़रूरी समझने लगेंगे। वे अच्छी तरह से विचार कर सकेंगे और पता कर सकेंगे कि सत्य पर सहभागिता करने, परमेश्वर के चुने गए लोगों की व्यावहारिक समस्याएँ सुलझाने और अगुआ की भूमिकाएं निभाने को लेकर कौन से लोग अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं। इन बातों पर विचार करने बाद, वे तदनुसार अपना वोट दे सकते हैं। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है। अगर तुम लोगों के बाहरी प्रदर्शन या अपनी धारणाओं और कल्पना के अनुसार मतदान करोगे, तो इससे समस्या खड़ी होगी। कुछ लोग बहुत उत्साही होते हैं और परमेश्वर के लिए काम करने की चाह में अपनी इच्छाओं का त्याग कर सकते हैं और जगह-जगह भागदौड़ भी कर सकते हैं; वे दूसरों से मिलने-जुलने में काफ़ी मिलनसार और अच्छे भी हो सकते हैं—मगर उन्हें सत्य की समझ नहीं होती, जिसका मतलब है कि वे अगुआ बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। अगर सुसमाचार साझा करने के लिए कार्यकर्ताओं का चयन करना हो, तो इन हालातों पर अपना निर्णय लेना फिर भी ठीक है, मगर अगुआओं के चयन में, सिर्फ़ ये सभी गुण होने से कोई योग्य नहीं बन जाता। अगुआ बनने के लिए सत्य की समझ होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि एक अगुआ का काम लोगों को परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, सत्य को समझने, वास्तविकता में प्रवेश करने, परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर चलने और उद्धार पाने का मार्ग दिखाने में अगुआई करना है। यानी, अगुआ का चुनाव कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। भागदौड़ करने वाला हर कोई अगुआ के तौर पर काम करने के योग्य नहीं होता, अच्छा-खासा ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति सत्य को समझने में दूसरों की मदद नहीं कर सकता है और न ही कोई मिलनसार व्यक्ति समस्याओं को सुलझा सकता है। इसके बजाय, अगुआ को सत्य की समझ होनी चाहिए, उसमें अच्छी इंसानियत होनी चाहिए और उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य भी होना चाहिए। झूठे अगुआओं के पास पवित्र आत्मा का कार्य क्यों नहीं होता? ऐसा इसलिए क्योंकि वे सत्य की खोज या सत्य से प्यार नहीं करते हैं। सत्य की समझ और पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, कोई व्यक्ति कितना भी भागदौड़ करने में सक्षम हो, वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की कौन सी समस्याएं हल कर सकता है? उससे उन्हें क्या फायदे हो सकते हैं? इसलिए, एक ऐसा उत्साही व्यक्ति जो सिर्फ़ इधर-उधर भागदौड़ कर सकता है, वो अगुआ नहीं बन सकता। अगुआ बनने के लिए, सत्य की समझ होना बहुत ज़रूरी है। जिस व्यक्ति के पास सत्य की समझ और वास्तविकता है, जिसके पास अच्छी इंसानियत है, जो सहभागिता करके परमेश्वर के चुने हुए लोगों की समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद कर सकता है, हमें ऐसे व्यक्ति को ही अगुआ बनाने के लिए चुनना चाहिए। ऐसा करना हमारे अपने जीवन के विकास के लिए फायदेमंद तो होगा ही, यह परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को जीवन में प्रवेश हासिल करने में भी मदद करेगा। इसलिए, अगुआ का चयन करते वक्त तुम्हें सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। सिद्धांतों के बिना तुम अपनी इच्छाओं के आधार पर आँखें बंद करके किसी को भी चुन लोगे और उससे कोई फायदा नहीं होगा।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों का चयन कलीसिया में मौजूद परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों द्वारा होना चाहिए, न कि सिर्फ़ कुछ लोगों के द्वारा। अगर कोई छोटे-मोटे कारणों से चुनाव में भाग नहीं लेता है तो मतदान में भाग लेनेवालों की संख्या कलीसिया की पूरी सदस्यता की कम से कम 80 या उससे ज़्यादा प्रतिशत होनी चाहिए; चुनाव के सफ़ल होने का यही एकमात्र तरीका है। इसके अलावा, परमेश्वर के चुने गए सभी लोगों के पास वोट देने और चुनाव में खड़े होने का अधिकार है। छांटे गए या कलीसिया से निकाले गए लोगों को छोड़कर, सभी के पास चुनाव में भाग लेने का अधिकार है। किसी के भी पास इस पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं। लोग अपनी इच्छा से अपना अधिकार त्याग सकते हैं, मगर किसी अगुआ या कार्यकर्ता के द्वारा कुछ लोगों के समूह को चुनाव में भाग लेने से रोकना गलत है। परमेश्वर के घर को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए। कलीसिया के चुनाव में किसी भी व्यक्ति को उम्मीदवार नामित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। उम्मीदवारों का क्षेत्र निर्धारित करना बड़े लाल अजगर की चुनावी प्रक्रिया का बेतुका तरीका है, परमेश्वर के घर को कभी भी इसे अपनाना नहीं चाहिए। उम्मीदवारों को नामित करना शैतान का तरीका है जिसे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अस्वीकार कर देना चाहिए। कलीसिया के चुनावों का संचालन परमेश्वर के चुने हुए लोगों के भरोसे की नींव पर होना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए ज़्यादातर लोगों की राय सटीक और सही होगी। जिन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर भरोसा नहीं है, और जो सिर्फ अपनी राय पर विश्वास करते हैं, वो ऐसे अहंकारी और दंभी लोग हैं जिनके पास विवेक नहीं है। जो लोग कलीसिया के चुनाव के लिए हर बार उम्मीदवारों को नामित करते हैं वो अपनी मंशाओं को छुपाकर रखनेवाले स्वार्थी और नीच होते हैं। जब कलीसिया छोटे समूहों में बैठकें करती है, तब ज़्यादातर लोग एक-दूसरे के लिए अनजान होते हैं। इसलिए, हर समूह को पहले अपने समूह के अंदर से ही एक व्यक्ति को चुनना चाहिए, और आखिर में, अगुआओं और उपयाजकों को चुनने से पहले, सभी समूहों से चुने गए लोग एक साथ आकर एक या दो दिन के लिए कलीसिया के बैठकें कर सकते हैं। इस तरह से, चुनाव की प्रक्रिया पूरी होगी।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर का घर, परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को (सिवाय उनके जिन्हें छांट दिया जाएगा या कलीसिया से निकाला जाएगा) वोट देने और चुनाव में खड़े होने का अधिकार देता है। ऐसी कुछ ऐसी ख़ास परिस्थितियाँ हैं जिन्हें लचीले रवैये के साथ देखा जाना चाहिए:

1. अगर अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत वाले, पहले बदले गए कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास जीवन का वास्तविक अनुभव है, पिछले कुछ सालों में उन्होंने जीवन में काफ़ी प्रगति हासिल की है, और वे सत्य पर सहभागिता करके समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, तो ऐसे लोग अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में चुने जाने के योग्य हैं। इसका कारण यह है कि परमेश्वर का उद्धार का कार्य इस बात पर आधारित है कि क्या लोगों के पास सत्य वास्तविकता है और क्या उन्होंने अपने जीवन स्वभाव में वास्तविक परिवर्तन हासिल किया है; यह इस बात पर आधारित नहीं है कि क्या उन्होंने अतीत में कोई अपराध किया है।

2. परमेश्वर के चुने हुए कुछ लोगों के संबंध में, जिन्हें कुछ साल पहले अधिकारियों द्वारा बुलाया गया था और जिन्हें कलीसिया जीवन से वंचित किया था, उन्हें कलीसिया जीवन में भाग लेना चाहिए, वोट देने और चुनाव में खड़े होने के अधिकार का आनंद उठाना चाहिए, अगर पिछले एक से दो सालों में उनसे किसी तरह की पूछताछ और जांच-पड़ताल नहीं की गई है। इस तरह की स्थिति में, लोगों को मनमाने ढंग से नियमों से चिपके नहीं रहना चाहिए, अन्यथा दूसरों को देरी या नुकसान हो सकता है।

3. अगर कोई अधिकारियों द्वारा बुलाये जाने जा जांच-पड़ताल में शामिल होने के कारण या गंभीर बीमारी से पीड़ित होने के कारण पिछले छह महीनों में अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ रहा है, तो वह वोट दे सकता है, अगर वह चुनाव में हिस्सा लेना चाहता है (व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक नहीं है)। चुनाव में खड़े होने का अधिकार होने के बावजूद, ऐसे लोगों में चुने जाने की योग्यता का अभाव होता है। इसके अलावा, ऐसी स्थिति भी होती है जिसमें कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखने से पहले एक छोटी अवधि के लिए असंयमित या समलैंगिक संबंधों में शामिल रहा हो। अगर आस्था हासिल करने के बाद, इस तरह के लोगों ने यह दिखाया कि उन्होंने सच्चा पश्चाताप किया है और कार्य में अच्छा प्रदर्शन किया है, तो वे भी चुनाव में खड़े होने के पात्र हैं, बशर्ते वे वास्तविक कार्य को पूरा कर सकते हैं।

4. अगर कोई संक्रामक बीमारी से पीड़ित है और वह सत्य को समझता है, उसमें अच्छी इंसानियत है, और वह कार्य करने में सक्षम है, ऐसे में अगर उसकी बीमारी उसके कार्य पर असर नहीं डालती है और वह इस बीमारी को दूसरों में फैलने से बचा सकता है, तो उसे अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में चुना जा सकता है। अगर उसकी सेहत इतनी खराब है कि वह काम नहीं कर सकता है, तो वह अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए उपयुक्त नहीं है।

5. अगुआओं के चुनाव में, दो पुरुषों या दो महिलाओं को चुनने की ज़रूरत नहीं है; एक पुरुष और एक महिला का चयन करना भी ठीक है। हालांकि, जब साथ मिलकर काम करने की बात आती है, तो पुरुष और महिला के बीच अकेले में होने वाली बातचीत से बचना चाहिए।

6. क्षेत्रीय और जिला संबंधी मामलों के प्रमुख और सुसमाचार का प्रचार करने वाले कमांडर कार्यकर्ता हैं और उनका चयन किया जाना चाहिए। सभी अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन किया जाना चाहिए, उन्हें किसी के द्वारा नियुक्त और नामित नहीं किया जाना चाहिए। जो लोग विशेष सामाजिक दायित्व निभाते हैं उन्हें औगाओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत करके चुना जाना चाहिए, हालांकि इस प्रक्रिया के बारे में पूरी कलीसिया से खुले तौर पर चर्चा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। यह खास तौर पर तब सही है जब सुरक्षा सेवाओं में शामिल कर्मियों की बात आती है; इनके बारे में पूरी कलीसिया से खुले तौर पर चर्चा बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए।

जब कोई कलीसिया सभी स्तरों पर अपने अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन कर लेती है, तो इसका सारा काम सही रास्ते पर आ जाता है और परमेश्वर के चुने हुए लोग कलीसिया जीवन में शामिल हो सकते हैं और सामान्य तौर पर अपने कर्तव्य निभा सकते हैं। फिर वे अपने कर्तव्य निभाते हुए और सत्य का अभ्यास करते हुए, किसी के द्वारा नियंत्रित हुए बिना, निष्पक्ष तरीके से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। जो कोई भी सत्य का अभ्यास करता है और जिसके पास वास्तविकता होती है, परमेश्वर के चुने हुए लोग उसका समर्थन करेंगे और उसे ही चुनेंगे; किसी के साथ पक्षपात करने या दूसरों से सुराग लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। उन्हें पूरी तरह से सत्य वास्तविकता के आधार पर खड़े होना चाहिए; इस तरीके से, एक वास्तविक कलीसिया जीवन उभरेगा और परमेश्वर के चुने हुए लोग सचमुच आज़ाद होंगे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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