160. परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं को मानने के सिद्धांत

(1) प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं के सार और सही अर्थ को समझना आवश्यक है। परमेश्वर की इच्छा को समझो और उसे अपने दिल में बड़ा मानो, ताकि ऐसा न हो कि तुम उसके स्वभाव को नाराज़ कर बैठो;

(2) परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं के माध्यम से सत्य की खोज करना और उसके स्वभाव को जानना आवश्यक है। उसके प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं का सही मायने में पालन करने में सक्षम बनो;

(3) अपने अभ्यास के सिद्धांतों को तैयार करने के लिए व्यक्ति द्वारा अपनी कमज़ोरियों और महत्वपूर्ण दुर्बलताओं को जान लेना आवश्यक है, जिससे परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं का पालन सुनिश्चित हो सके;

(4) परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं से यह बात सबसे अधिक प्रकट होती है कि कोई व्यक्ति मानवता रखता है या नहीं। जो प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकता, वह मानवता बिना का एक व्यक्ति होता है, और उसका हटाया जाना निश्चित है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए

(परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)

1. मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं दिखाना चाहिए, न अपनी बड़ाई करनी चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना और बड़ाई करनी चाहिए।

2. वह सब कुछ करो जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक है और ऐसा कुछ भी न करो जो परमेश्वर के कार्य के हितों के लिए हानिकर हो। परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही और परमेश्वर के कार्य की रक्षा करो।

3. परमेश्वर के घर में धन, भौतिक पदार्थ और समस्त संपत्ति ऐसी भेंट हैं, जो मनुष्य द्वारा दी जानी चाहिए। इन भेंटों का आनंद याजक और परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं ले सकता, क्योंकि मनुष्य की भेंटें परमेश्वर के आनंद के लिए हैं। परमेश्वर इन भेंटों को केवल याजकों के साथ साझा करता है; और उनके किसी भी अंश का आनंद उठाने के लिए अन्य कोई योग्य और पात्र नहीं है। मनुष्य की समस्त भेंटें (धन और आनंद लिए जा सकने योग्य भौतिक चीज़ों सहित) परमेश्वर को दी जाती हैं, मनुष्य को नहीं और इसलिए, इन चीज़ों का मनुष्य द्वारा आनंद नहीं लिया जाना चाहिए; यदि मनुष्य उनका आनंद उठाता है, तो वह इन भेंटों को चुरा रहा होगा। जो कोई भी ऐसा करता है वह यहूदा है, क्योंकि, एक ग़द्दार होने के अलावा, यहूदा ने बिना इजाज़त थैली में रखा धन भी लिया था।

4. मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है और इसके अतिरिक्त, उसमें भावनाएँ हैं। इसलिए, परमेश्वर की सेवा के समय विपरीत लिंग के दो सदस्यों को अकेले एक साथ मिलकर काम करना पूरी तरह निषिद्ध है। जो भी ऐसा करते पाए जाते हैं, उन्हें बिना किसी अपवाद के निष्कासित कर दिया जाएगा।

5. परमेश्वर की आलोचना न करो और न परमेश्वर से संबंधित बातों पर यूँ ही चर्चा करो। वैसा करो, जैसा मनुष्य को करना चाहिए और वैसे बोलो जैसे मनुष्य को बोलना चाहिए, तुम्हें अपनी सीमाओं को पार नहीं करनी चाहिए और न अपनी सीमाओं का उल्लंघन करना चाहिए। अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाओ और ध्यान दो कि कहाँ कदम रख रहे हो, ताकि परमेश्वर के स्वभाव का अपमान न कर बैठो।

6. वह करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए और अपने दायित्वों का पालन करो, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करो और अपने कर्तव्य को धारण करो। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के योग्य नहीं हो और परमेश्वर के घर में रहने के योग्य नहीं हो।

7. कलीसिया के कार्यों और मामलों में, परमेश्वर की आज्ञाकारिता के अलावा, उस व्यक्ति के निर्देशों का पालन करो, जिसे पवित्र आत्मा हर चीज़ में उपयोग करता है। ज़रा-सा भी उल्लंघन अस्वीकार्य है। अपने अनुपालन में एकदम सही रहो और सही या ग़लत का विश्लेषण न करो; क्या सही या ग़लत है, इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं। तुम्हें ख़ुद केवल संपूर्ण आज्ञाकारिता की चिंता करनी चाहिए।

8. जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। किसी व्यक्ति को ऊँचा न ठहराओ, न किसी पर श्रद्धा रखो; परमेश्वर को पहले, जिनका आदर करते हो उन्हें दूसरे और ख़ुद को तीसरे स्थान पर मत रखो। किसी भी व्यक्ति का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और तुम्हें लोगों को—विशेषकर उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य या उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

9. अपने विचार कलीसिया के कार्य पर लगाए रखो। अपनी देह की इच्छाओं को एक तरफ़ रखो, पारिवारिक मामलों के बारे में निर्णायक रहो, स्वयं को पूरे हृदय से परमेश्वर के कार्य में समर्पित करो और परमेश्वर के कार्य को पहले और अपने जीवन को दूसरे स्थान पर रखो। यह एक संत की शालीनता है।

10. सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं रखते (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे पति या पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने को बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है और ऐसे लोगों से इसकी संख्या बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं, जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो ख़ुशी-ख़ुशी विश्वास नहीं करते, उन्हें कलीसिया में बिल्कुल नहीं ले जाना चाहिए। यह आदेश सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और याद दिलाना चाहिए; कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं करते, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं देना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं और कलीसिया में उनके प्रवेश पर जैसे भी ज़रूरी हो, रोक लगाई जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया पर समस्या आती है, तो तुम निर्वासित कर दिए जाओगे या तुम पर प्रतिबंध लगा दिये जाएँगे। संक्षेप में, इस मामले में हरेक का उत्तरदायित्व है, हालांकि तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, न ही इसका इस्तेमाल निजी बदला लेने के लिए करना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से

लोगों को उन अनेक कर्तव्यों का पालन करना होगा, जो उन्हें अवश्य संपन्न करने चाहिए। यही वह चीज है, जिसका लोगों द्वारा दृढ़ता से पालन किया जाना चाहिए, और यही वह चीज है, जिसे उन्हें अवश्य संपन्न करना चाहिए। पवित्र आत्मा को वह करने दो, जो पवित्र आत्मा द्वारा किया जाना चाहिए; मनुष्य इसमें कोई भूमिका नहीं निभा सकता। मनुष्य को वह करना चाहिए, जो उसके द्वारा किया जाना आवश्यक है, जिसका पवित्र आत्मा से कोई संबंध नहीं है। यह उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है, जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और जिसका आज्ञा के रूप में पालन किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह, जैसे पुराने विधान की व्यवस्था का पालन किया जाता है। यद्यपि अब व्यवस्था का युग नहीं है, फिर भी ऐसे कई वचन हैं, जो व्यवस्था के युग में बोले गए वचनों जैसे हैं, और जिनका पालन किया जाना चाहिए। इन वचनों का पालन केवल पवित्र आत्मा के स्पर्श पर भरोसा करके नहीं किया जाता, बल्कि वे ऐसी चीज हैं, जिनका मनुष्य द्वारा निर्वाह किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए : तुम व्यवहारिक परमेश्वर के कार्य पर निर्णय पारित नहीं करोगे। तुम उस मनुष्य का विरोध नहीं करोगे, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। परमेश्वर के सामने तुम लोग अपने स्थान पर रहोगे और स्वच्छंद नहीं होगे। तुम्हें वाणी में संयत होना चाहिए, और तुम्हारे शब्द और काम उस व्यक्ति की व्यवस्थाओं के अनुसार होने चाहिए, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। तुम्हें परमेश्वर की गवाही का आदर करना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य और उसके मुँह से निकले वचनों की उपेक्षा नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के कथनों के लहजे और लक्ष्यों की नकल नहीं करोगे। बाहरी तौर से तुम लोग ऐसा कुछ नहीं करोगे, जो परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति का प्रत्यक्ष रूप से विरोध करता हो। इत्यादि-इत्यादि। ये वे चीजें हैं, जिनका प्रत्येक व्यक्ति को पालन करना चाहिए। प्रत्येक युग में परमेश्वर कई नियम निर्दिष्ट करता है, जो व्यवस्थाओं के समान होते हैं और जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना होता है। इसके माध्यम से वह मनुष्य के स्वभाव पर अंकुश लगाता है और उसकी ईमानदारी का पता लगाता है। उदाहरण के लिए, पुराने विधान के युग के इन वचनों पर विचार करो, "तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना"। ये वचन आज लागू नहीं होते; उस समय ये मनुष्य के मात्र कुछ बाहरी स्वभाव पर अंकुश लगाते थे, और इनका उपयोग परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास की ईमानदारी को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता था। ये परमेश्वर पर विश्वास करने वालों का पहचान चिन्ह भी थे। यद्यपि अब राज्य का युग है, फिर भी, अब भी बहुत-से ऐसे नियम हैं, जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना आवश्यक है। अब अतीत के नियम लागू नहीं होते, और आज मनुष्य के करने के लिए और भी बहुत-से उपयुक्त अभ्यास हैं, जो आवश्यक हैं। इनमें पवित्र आत्मा का कार्य शामिल नहीं है और ये मनुष्य द्वारा ही किए जाने चाहिए।

अनुग्रह के युग में व्यवस्था के युग के बहुत-से अभ्यास हटा दिए गए थे, क्योंकि ये व्यवस्थाएँ उस समय के कार्य के लिए कोई खास कारगर नहीं थीं। उन्हें हटा दिए जाने के बाद कई ऐसे अभ्यास निर्धारित किए गए, जो उस युग के लिए उपयुक्त थे, और जो आज के बहुत-से नियम बन चुके हैं। जब आज का परमेश्वर आया, तो इन नियमों को हटा दिया गया और इनके अनुपालन की अब और आवश्यकता नहीं रही, और आज के कार्य के उपयुक्त कई अभ्यास निर्धारित किए गए। आज ये अभ्यास नियम नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य परिणाम प्राप्त करना है; ये आज के लिए अनुकूल हैं—और कल शायद ये नियम बन जाएँगे। कुल मिलाकर, तुम्हें उसका पालन करना चाहिए, जो आज के कार्य के लिए लाभदायक है। आने वाले कल पर ध्यान न दो : जो आज किया जाता है, वह आज के लिए होता है। हो सकता है, जब कल आए तो बेहतर अभ्यास हों, जिन्हें करने की तुम्हें आवश्यकता होगी—किंतु उस पर अधिक ध्यान मत दो। इसकी बजाय, उसका पालन करो, जिसका आज पालन किया जाना चाहिए, ताकि परमेश्वर का विरोध करने से बचा जाए। आज मनुष्य के लिए निम्नलिखित बातों का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है : तुम्हें उस परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जो तुम्हारी आँखों के सामने खड़ा है, न ही तुम्हें उससे कुछ छिपाना चाहिए। तुम अपने सामने खड़े परमेश्वर के सम्मुख कोई गंदी या अहंकार से भरी बात नहीं कहोगे। तुम परमेश्वर के भरोसे को जीतने के लिए अपनी मीठी और साफ़-सुथरी बातों से अपनी आँखों के सामने खड़े परमेश्वर को धोखा नहीं दोगे। तुम परमेश्वर के सामने अनादर से व्यवहार नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के मुख से बोले जाने वाले समस्त वचनों का पालन करोगे, और उनका प्रतिरोध, विरोध या प्रतिवाद नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के मुख से बोले गए वचनों की अपने हिसाब से व्याख्या नहीं करोगे। तुम्हें अपनी जीभ को काबू में रखना चाहिए, ताकि इसके कारण तुम दुष्टों की कपटपूर्ण योजनाओं के शिकार न हो जाओ। तुम्हें अपने क़दमों के प्रति सचेत रहना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए निर्दिष्ट की गई सीमा का अतिक्रमण करने से बच सको। अगर तुम अतिक्रमण करते हो, तो यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर की स्थिति में खड़े होने और अहंकार भरे और आडंबरपूर्ण शब्द कहने का कारण बनेगा, जिसके लिए परमेश्वर तुमसे घृणा करने लगेगा। तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों को लापरवाही से प्रसारित नहीं करोगे, ताकि कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तुम्हारी हँसी उड़ाएँ और हैवान तुम्हें मूर्ख बनाएँ। तुम आज के परमेश्वर के समस्त कार्य का पालन करोगे। भले ही तुम उसे समझ न पाओ, तो भी तुम उस पर निर्णय पारित नहीं करोगे; तुम केवल खोज और संगति कर सकते हो। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल स्थान का अतिक्रमण नहीं करेगा। तुम एक मनुष्य की हैसियत से आज के परमेश्वर की सेवा करने से अधिक कुछ नहीं कर सकते। तुम एक मनुष्य की हैसियत से आज के परमेश्वर को सिखा नहीं सकते—ऐसा करना मार्ग से भटकना है। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता; अपने शब्दों, कार्यों, और अंतर्तम विचारों में तुम मनुष्य की हैसियत में खड़े हो। इसका पालन किया जाना आवश्यक है, यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, और इसे कोई बदल नहीं सकता; ऐसा करना प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। यह सभी को स्मरण रखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'नये युग की आज्ञाएँ' से उद्धृत

लोग अक्‍सर कहते हैं कि परमेश्‍वर की अपनी प्रशासनिक आज्ञाएँ हैं, और अगर लोग आज्ञा नहीं मानते हैं, तो वह उनको दण्डित करने तथा उनको नियन्त्रित रखने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग करता है। "प्रशासनिक आज्ञाएँ" शब्‍द अक्‍सर उनकी ज़ुबान पर होते हैं—लेकिन वे वास्‍तव में इन शब्‍दों का मूल रूप से जो मतलब है उसे नहीं समझते। सही मानी में ये प्रशासनिक आज्ञाएँ क्‍या हैं? ये मनुष्‍य की प्रकृति और उसके भ्रष्‍ट स्‍वभाव के बारे में परमेश्‍वर द्वारा प्रतिपादित वचन हैं, जिनका उद्देश्‍य मनुष्‍य के आचरण को नियन्त्रित रखना है। प्रशासनिक आज्ञाएँ यहोवा[क] के क़ानून या कोई वैधानिक व्‍यवस्‍था नहीं हैं, और मनुष्‍य की दुनिया के संविधानों से तो उनकी तुलना और भी नहीं की जा सकती। वे मनुष्‍य के आचरण को नियन्त्रित रखने के उद्देश्‍य से परमेश्‍वर द्वारा परिभाषित मापदण्‍डों का संग्रह हैं। इनमें ये बातें शामिल हैं कि परमेश्‍वर से कैसे डरा जाए, परमेश्‍वर की गवाही कैसे दी जाए, और किस तरह परमेश्‍वर के नाम को कलंकित न किया जाए। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्‍वर का आत्‍मा बहुत कुछ कर सकता है। वह लोगों को दण्डित कर सकता है, और हर किसी के साथ जैसा-को-तैसा कर सकता है। फिर, सत्‍य भी है, जो लोगों का मार्गदर्शन करता है। तब फिर प्रशासनिक विधानों की क्‍या ज़रूरत है?" सत्‍य लोगों के जीवन धारण करने से सम्‍बन्‍ध रखता है; यह उनके भ्रष्‍ट स्‍वभाव की विशिष्‍ट अवस्‍थाओं से ताल्‍लुक रखता है। प्रशासनिक आज्ञाएँ स्‍पष्‍ट रूप से परिभा‍षित नियम हैं। आपकी जो भी कोई अवस्‍था हो, आप जिस किसी भी तरह के व्‍यक्ति हों, अगर आप परमेश्‍वर में विश्‍वास रखते हैं, तो आपको प्रशासनिक आज्ञाओं द्वारा निर्देशित सारे नियमों का पालन करना अनिवार्य है—और अगर आप ऐसा नहीं करते, तो आपका नाम मिटा दिया जाएगा, और आप परमेश्‍वर की नज़रों में घृणा और तिरस्‍कार के योग्‍य हो जाएँगे। वास्‍तव में, प्रशानिक आज्ञाएँ परमेश्‍वर में विश्‍वास करने के लिए लोगों से की गयी न्‍यूनतम अपेक्षाएँ हैं, उसी तरह जैसे, व्‍यवस्‍था के युग में यहोवा ने कुछ कार्य किये थे, बहुत-से वचन कहे थे, और अनगिनत नियम बनाये थे, और उन नियमों में ऐसा बहुत कुछ शामिल था जो मनुष्‍य से अपेक्षित था : उदाहरण के लिए, उनको यहोवा से किस तरह डरना चाहिए, या यहोवा के लिए किस तरह बलिदान करना चाहिए, अपनी आय का दसवां हिस्‍सा देना चाहिए, दान करना चाहिए। उस समय इन वचनों को क़ानून कहा जाता था, और अनुग्रह के युग में उन्‍हें ईश्‍वरीय आदेशों के नाम से जाना जाता था।

अनुग्रह के युग के ईश्‍वरीय आदेश आज प्रशासनिक आज्ञाओं की भूमिका नहीं निभा सकते, क्‍योंकि हर युग में मनुष्‍य से भिन्न तरह की अपेक्षाएँ की जाती हैं। हर युग की ईश्‍वरीय आज्ञाएँ होती हैं, और हर युग के अनुरूप मनुष्‍य से परमेश्‍वर की अपेक्षाएँ होती हैं और कसौटिया होती हैं—कसौटियाँ जो युग में आने वाले बदलावों और परमेश्‍वर के कार्य में आने वाले बदलावों के अनुसार बदलती रहती हैं। ... आज, परमेश्‍वर ने मनुष्‍य की अवस्‍थाओं और ज़रूरतों के अनुरूप प्रशासनिक आज्ञाएँ जारी की हैं। कुछ लोग पूछते हैं, "और अधिक प्रशासनिक आज्ञाएँ जारी करने की ज़रूरत क्‍या है? यह तो पहले ही किया जा चुका है, और लोग उनके प्रति सजग हैं और वही करते हैं जो उनसे कहा गया है। यह सिलसिला तो यहीं ख़त्‍म हो जाना चाहिए। नये विधान जारी करते रहने की क्‍या ज़रूरत है?" लोग आज जिस तरह भ्रष्‍ट हैं, उसे देखते हुए क्‍या प्रशासनिक आज्ञाएँ जारी किये बिना काम चल जाएगा? तमाम लोगों के स्‍वभाव भ्रष्‍ट हैं और वे अपनी प्रकृतियों से संचालित हैं; ऐसा नहीं है कि उन्‍होंने एकबार परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार कर लिया और वे ईश्‍वरीय आदेशों का पालन करने लगे, तो वे पवित्र और धार्मिक हो गये। ऐसा नहीं होता। लोग हमेशा ही अपने भ्रष्‍ट स्‍वभावों से घिरे होते हैं, इसलिए उनके इन स्‍वभावों के ही अनुरूप प्रशाननिक आज्ञाओं की ज़रूरत हमेशा बनी रहती है, ताकि उनके आचरण को नियन्त्रित रखा जा सके। अगर लोग वाक़ई इन प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्‍लंघन करते हैं, तो उन्‍हें अनुशासित किया जा सकता है, या उन पर मर्यादाएँ आरोपित की जा सकती हैं, या उनसे छुटकारा पाया जा सकता है और उन्‍हें निष्‍कासित किया जा सकता है। किसी भी तरह का परिणाम हो सकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'राज्य के युग में परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के बारे में वार्ता' से उद्धृत

आज्ञाओं का पालन करने की कुंजी व्यावहारिक परमेश्वर की समझ को पाना है। एक बार तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ प्राप्त हो जाए, तो तुम आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो जाओगे। उनका पालन करने के दो घटक हैं: एक है उसके पवित्रात्मा के सार को थामे रखना और पवित्रात्मा के सामने पवित्रात्मा की परीक्षा को स्वीकार करने में सक्षम होना; दूसरा है परमेश्वर द्वारा धारित देह की वास्तविक समझ प्राप्त करने में सक्षम होना और वास्तविक समर्पण प्राप्त करना। चाहे शरीर के सामने हो या पवित्रात्मा के सामने, परमेश्वर के प्रति हमेशा आज्ञाकारिता और श्रद्धा रखनी चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही पूर्ण बनाए जाने के योग्य है। यदि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की व्यावहारिकता की समझ है, अर्थात् यदि तुम इस परीक्षा में अडिग रहे हो, तब तुम्हारे लिए कुछ भी बहुत अधिक नहीं होगा।

कुछ लोग कहते हैं, "आज्ञाओं का पालन करना आसान है; तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के सामने स्पष्ट रूप से और श्रद्धापूर्वक बिना नाटकबाजी किए बोलने की आवश्यकता है, और यही आज्ञाओं का पालन करना है।" क्या यह सही है? तो अगर तुम परमेश्वर की पीठ पीछे कुछ काम करते हो, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं—क्या उसे आज्ञाओं का पालनकरना माना जाता है? तुम लोगों को इस बात की पूरी समझ अवश्य होनी चाहिए कि आज्ञाओं का पालन करने में क्या शामिल है। यह इस बात के साथ संबंधित है कि क्या तुम्हें परमेश्वर की व्यावहारिकता की एक वास्तविक समझ है या नहीं; यदि तुम्हें व्यावहारिकता की समझ है, और इस परीक्षा के दौरान लड़खड़ाते और गिरते नहीं हो, तो तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में माना जा सकता है जिसके पास मज़बूत गवाही है। परमेश्वर के लिए एक ज़बर्दस्त गवाही देना मुख्य रूप से इस बात से संबंधित है कि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ है या नहीं, और तुम इस व्यक्ति के सामने आज्ञापालन करने में सक्षम हो या नहीं जो कि न केवल साधारण है, बल्कि सामान्य है, और मृत्युपर्यंत भी उसका आज्ञापालन कर पाते हो या नहीं। यदि तुम इस आज्ञाकारिता के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तव में गवाही देते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हो। अगर तुम मृत्यु तक समर्पण कर सकते हो, और उसके सामने शिकायतें नहीं करते, आलोचनाएँ नहीं करते, बदनामी नहीं करते, धारणाएँ नहीं रखते, और कोई गुप्त मंशा नहीं रखते, तो इस तरह परमेश्वर को महिमा मिलेगी। किसी नियमित व्यक्ति जिसे मनुष्य द्वारा तुच्छ समझा जाता है, के सम्मुख समर्पण और किसी भी धारणा के बिना मृत्यु तक समर्पण करने में सक्षम होना—यह सच्ची गवाही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

व्यवहार में, आज्ञाओं के पालन को सत्य को अभ्यास में डालने से जोड़ा जाना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करते हुए, एक व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करना ही चाहिए। सत्य का अभ्यास करते समय, व्यक्ति को आज्ञाओं के सिद्धान्तों का उल्लंघन बिलकुल नहीं करना चाहिए न ही आज्ञाओं के विपरीत जाना चाहिए; परमेश्वर तुमसे जो भी अपेक्षा करे, तुम्हें वो सब करना ही चाहिए। आज्ञाओं का पालन और सत्य का अभ्यास करना परस्पर संबद्ध हैं, विरोधी नहीं। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम आज्ञाओं के सार को बनाए रखने में सक्षम हो जाते हो। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के वचनों को समझोगे जैसा कि आज्ञाओं में अभिव्यक्त है। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना, परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं, वे परस्पर संबद्ध हैं। आरंभ में, आज्ञाओं का पालन करने के बाद ही इंसान सत्य का अभ्यास कर सकता था और पवित्र आत्मा से ज्ञान प्राप्त कर सकता था, किन्तु यह परमेश्वर का मूल इरादा नहीं है। परमेश्वर बस अच्छा व्यवहार ही नहीं चाहता, वो अपेक्षा करता है कि तुम अपना हृदय परमेश्वर की आराधना करने में लगा दो। तुम्हें कम से कम सतही तौर पर ही सही, आज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिए। धीरे-धीरे, अनुभव से, परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त करने के बाद, लोग उसके विरुद्ध विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना बंद कर देंगे, और फिर उसके कार्य के विषय में अपने मन में संदेह रखना बंद कर देंगे। यही एक तरीका है जिससे लोग आज्ञाओं के सार का पालन कर सकते हैं। इसलिए, सत्य के अभ्यास के बिना, मात्र आज्ञाओं का पालन करना प्रभावहीन है और इसे परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि तुमने अभी तक वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त नहीं किया है। सत्य के बिना आज्ञाओं का पालन करना केवल सख्ती से नियमों से चिपके रहने के बराबर है। ऐसा करने से, आज्ञाएँ तुम्हारी व्यवस्था बन जाएँगी, जो तुम्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद नहीं करेगा। बल्कि, वे तुम्हारा बोझ बन जाएँगी, और तुम्हें पुराने नियमों की व्यवस्थाओं की तरह मजबूती से बाँध लेंगी, जिससे तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति गँवा दोगे। इसलिए, सत्य का अभ्यास करके ही तुम प्रभावशाली तरीके से आज्ञाओं का पालन कर सकते हो और तुम आज्ञाओं का पालन इसलिए करते हो कि सत्य का अभ्यास कर सको। आज्ञाओं का पालन करने की प्रक्रिया में तुम और भी अधिक सत्य को अभ्यास में लाओगे, और सत्य का अभ्यास करते समय, तुम आज्ञाओं के वास्तविक अर्थ की गहरी समझ हासिल करोगे। मनुष्य आज्ञाओं का पालन करे, परमेश्वर की इस माँग के पीछे का उद्देश्य और अर्थ उससे बस नियमों का पालन करवाना नहीं है, जैसा कि इंसान सोचता है; बल्कि इसका सरोकार उसके जीवन प्रवेश से है। जीवन में तुम्हारे विकास की सीमा से तय होता है कि तुम किस स्तर तक आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो। यद्यपि आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिए होती हैं, फिर भी आज्ञाओं का सार सिर्फ मनुष्य के जीवन के अनुभव से ही प्रकट होता है। अधिकांश लोग मान लेते हैं कि आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने का अर्थ है कि वे "पूरी तरह तैयार हैं, बस अब उठाया जाना बाकी है।" यह निरंकुश विचार है और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है। ऐसी बातें कहने वाले लोग आगे नहीं बढ़ना चाहते, वे देह की लालसा रखते हैं। यह बकवास है! इसका वास्तविकता के साथ तालमेल नहीं है! वास्तव में आज्ञाओं का पालन किये बिना मात्र सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर की इच्छा नहीं है। ऐसा करने वाले अपाहिज होते हैं; वे किसी लंगड़े व्यक्ति के समान होते हैं। नियमों का पालन करने की तरह बस आज्ञाओं का पालन करना, फिर भी सत्य का न होना—यह भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में सक्षम नहीं है; उन लोगों के समान ऐसा करने वाले भी एक प्रकार की अपंगता के शिकार हैं उसी तरह जैसे वे लोग जिनकी एक आँख नहीं है। यह कहा जा सकता है कि यदि तुम आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करते हो और व्यवहारिक परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारे पास सत्य होगा; तुलनात्मक रूप से, तुमने वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त कर लिया होगा। यदि तुम उस सत्य का अभ्यास करते हो, जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए, तो तुम आज्ञाओं का पालन भी करोगे, ये दोनों बातें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना दो पद्धतियाँ हैं, दोनों ही व्यक्ति के जीवन के अनुभव का अभिन्न अंग हैं। व्यक्ति के अनुभव में आज्ञाओं का पालन और सत्य के अभ्यास का एकीकरण सम्मिलित होना चाहिए, विभाजन नहीं। हालाँकि इन दोनों चीज़ों के बीच में विभिन्नताएँ और संबंध दोनों हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना' से उद्धृत

लंबे समय से कहे जा रहे परमेश्वर के वचनों और कथनों के कारण परमेश्वर के वचनों को पढ़ना और उन्हें याद करना मनुष्य का प्राथमिक कार्य बन गया है। कोई भी अभ्यास पर ध्यान नहीं देता, यहाँ तक कि जिन बातों का तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिए, उनका भी तुम पालन नहीं करते। इससे तुम लोगों की सेवा में बहुत-सी कठिनाइयाँ और समस्याएँ आ गई हैं। यदि परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से पहले तुमने उन बातों का पालन नहीं किया, जिनका पालन तुम्हें करना चाहिए, तो तुम उन लोगों में से हो, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें वह अस्वीकार कर देता है। इन अभ्यासों का पालन करने में तुम्हें गंभीर और ईमानदार होना चाहिए। तुम्हें उन्हें बेड़ियाँ नहीं समझना चाहिए, बल्कि आज्ञाओं की तरह उनका पालन करना चाहिए। आज तुम्हें स्वयं इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि कौन से परिणाम प्राप्त किए जाने हैं; संक्षेप में कहें तो, पवित्र आत्मा इसी प्रकार कार्य करता है, और जो कोई भी अपराध करता है, उसे दंड दिया जाता है। पवित्र आत्मा भावनाशून्य और तुम्हारी वर्तमान समझ से बेध्यान है। यदि तुम आज परमेश्वर का अपमान करते हो, तो वह तुम्हें दंड देगा। यदि तुम उसे उसके अधिकार-क्षेत्र के दायरे के भीतर अपमानित करते हो, तो वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि यीशु के वचनों के अनुपालन में तुम कितने गंभीर हो। यदि तुम परमेश्वर की आज की आज्ञाओं का उल्लंघन करोगे, तो वह तुम्हें दंडित करेगा और तुम्हें मृत्युदंड देगा। तुम्हारे लिए उनका पालन न करना स्वीकार्य कैसे हो सकता है? तुम्हें उनका पालन करना ही चाहिए—भले ही इसका अर्थ कुछ तकलीफ सहना हो! चाहे कोई भी धर्म, क्षेत्र, राष्ट्र या संप्रदाय क्यों न हो, भविष्य में उन सभी को इन अभ्यासों का पालन करना होगा। किसी को भी छूट नहीं दी गई है, और किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा! क्योंकि ये वही कार्य हैं, जो आज पवित्र आत्मा करेगा, और कोई भी उनका उल्लंघन नहीं कर सकता। यद्यपि ये बड़ी बातें नहीं हैं, फिर भी ये हर मनुष्य द्वारा अवश्य की जानी चाहिए, और ये मनुष्य के लिए यीशु द्वारा नियत की गई आज्ञाएँ हैं, जो पुनर्जीवित हुआ था और जिसने स्वर्ग में आरोहण किया था। क्या "मार्ग... (7)" नहीं कहता कि यीशु की यह परिभाषा कि तुम धार्मिक हो या पापी, आज परमेश्वर के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण के अनुसार है? कोई भी इस बिंदु को नजरअंदाज नहीं कर सकता। व्यवस्था के युग में, पीढ़ी-दर-पीढ़ी फरीसियों ने परमेश्वर पर विश्वास किया, परंतु अनुग्रह के युग के आगमन पर वे यीशु को नहीं जानते थे, और उन्होंने उसका विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने जो कुछ भी किया था, वह सब शून्य और व्यर्थ हो गया, और परमेश्वर ने उनके कर्मों को स्वीकार नहीं किया। यदि तुम इसे अच्छी तरह से समझ सको, तो तुम आसानी से पाप नहीं करोगे। बहुत-से लोगों ने शायद स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध आँका है। परमेश्वर का विरोध करने में किस तरह का रस है? यह कड़वा है या मीठा? तुम्हें यह समझना चाहिए; यह ढोंग मत करो कि तुम नहीं जानते हो। अपने हृदयों में कुछ लोग शायद आश्वस्त नहीं होते। फिर भी मैं सलाह देता हूँ कि तुम इसे आजमाकर देखो—देखो कि इसमें कैसा रस है। यह कई लोगों को इस बारे में हमेशा शंकालु रहने से रोकेगा। बहुत-से लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, फिर भी अपने हृदयों में गुप्त रूप से उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर का इस प्रकार विरोध करने के बाद क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं होता, जैसे तुम्हारे दिल में कोई छुरा घोंप दिया गया हो? यदि यह पारिवारिक कलह नहीं है, तो यह शारीरिक कष्ट है, या फिर पुत्रों और पुत्रियों का संताप। यद्यपि तुम्हारी देह को मृत्यु से बख्श दिया जाता है, किंतु परमेश्वर का हाथ तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा। क्या तुम्हें लगता है कि यह इतना आसान है? विशेष रूप से उन बहुत-से लोगों के लिए इस पर ध्यान केंद्रित करना और भी आवश्यक है, जो परमेश्वर के निकट हैं। समय बीतने के साथ-साथ तुम इसे भूल जाओगे और अनजाने में ही प्रलोभन में पड़ जाओगे और हर चीज के बारे में बेपरवाह हो जाओगे, और यह तुम्हारे पाप करने की शुरुआत होगी। क्या यह बात तुम्हें नगण्य लगती है? यदि तुम इसे अच्छी तरह से कर सकते हो, तो तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने—परमेश्वर के सामने आने और स्वयं परमेश्वर के मुँह से उसका मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर है। यदि तुम लापरवाह हो, तो तुम्हारे लिए परेशानी होगी—तुम परमेश्वर के आज्ञाकारी नहीं होगे, तुम्हारे शब्द और कृत्य स्वच्छंद होंगे, और देर-सवेर तुम भयंकर आँधियों और तूफानी लहरों में बह जाओगे। तुममें से प्रत्येक को इन आज्ञाओं पर ध्यान देना चाहिए। अगर तुम इनका उल्लंघन करते हो, तो भले ही वह मनुष्य, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है, तुम्हारी निंदा न करे, किंतु तुम्हारे बारे में परमेश्वर के आत्मा का काम बाकी रहेगा, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। क्या तुम अपने अपराध के परिणाम सहन कर सकते हो? इसलिए, परमेश्वर भले ही कुछ भी कहे, तुम्हें उसके वचनों का अभ्यास अवश्य करना चाहिए, और जिस तरह भी संभव हो, तुम्हें उनका पालन अवश्य करना चाहिए। यह कोई आसान काम नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'नये युग की आज्ञाएँ' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तब तुम्हारे लिए उस काम को करना असंभव होगा जो उसके लिए तुम्हें करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं जानते हो, तो उसके प्रति आदर और भय को धारण करना तुम्हारे लिए असंभव होगा; तुम केवल बेपरवाह यंत्रवत ढंग से काम करोगे और घुमा-फिराकर बात कहोगे, इसके अतिरिक्त असाध्य ईश-निन्दा करोगे। हालाँकि परमेश्वर के स्वभाव को समझना वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है, और परमेश्वर के अस्तित्व के ज्ञान को कभी भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, फिर भी किसी ने भी पूरी तरह इस विषय का परीक्षण नहीं किया है या कोई उसकी गहराई में नहीं गया है। यह बिलकुल साफ-साफ देखा जा सकता है कि तुम सबने मेरे द्वारा दिए गए सभी प्रशासनिक आदेशों को अस्वीकार कर दिया है। यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो बहुत संभव है कि तुम उसके स्वभाव को ठेस पहुँचा दो। उसके स्वभाव का अपमान ऐसा अपराध है जो स्वयं परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के समान है, अगर ऐसा होता है तो अंतत: तुम्हारे क्रियाकलापों का परिणाम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। अब तुम्हें एहसास हो जाना चाहिए कि जब तुम उसके सार को जान जाते हो तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को भी समझ सकते हो, और जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हो तो तुम उसके प्रशासनिक आदेशों को भी समझ जाओगे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासनिक आदेशों में जो निहित है उसमें से काफी कुछ परमेश्वर के स्वभाव का जिक्र करता है, परन्तु उसका सम्पूर्ण स्वभाव प्रशासनिक आदेशों में प्रकट नहीं किया गया है; अत: परमेश्वर के स्वभाव की समझ को और ज़्यादा विकसित करने के लिए तुम्हें एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

हर एक वाक्य जो मैंने कहा है वह अपने भीतर परमेश्वर के स्वभाव को लिए हुए है। तुम सब यदि मेरे वचनों पर सावधानी से मनन करोगे तो अच्छा होगा, और तुम निश्चय ही उनसे बड़ा लाभ पाओगे। परमेश्वर के सार-तत्व को समझना बड़ा ही कठिन काम है, परन्तु मैं भरोसा करता हूँ कि तुम सभी के पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव का कुछ तो अनुमान है। तब, मैं आशा करता हूँ कि तुम सब परमेश्वर को अपमानित न करने वाले कार्य अधिक करोगे और मुझे दिखाओगे भी। तब ही मुझे पुनः आश्वासन मिलेगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर को हर समय अपने दिल में रखो। उसके वचनों के अनुसार कार्य करो। सब बातों में उसके विचारों की खोज करो, और ऐसा कोई भी काम मत करो जिससे परमेश्वर का अनादर और अपमान हो। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को अपने हृदय के भविष्य के खालीपन को भरने के लिए अपने मन के पीछे के कोने में मत रखो। यदि तुम ऐसा करोगे, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुंचाओगे। यदि मान लिया जाए कि तुमने अपने पूरे जीवन में परमेश्वर के विरूद्ध कभी भी ईशनिन्दा की टिप्पणी या शिकायत नहीं की है और मान लिया जाए कि तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ उसने तुम्हें सौंपा है उसे तुम यथोचित रूप से करने में समर्थ रहे हो, साथ ही उसके सभी वचनों के लिए पूर्णतया समर्पित रहे हो, तो तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने से बच गये हो। उदाहरण के लिए, यदि तुम ने कभी ऐसा कहा है, "मैं ऐसा क्यों नहीं सोचता कि वह परमेश्वर है?", "मैं सोचता हूँ कि ये शब्द पवित्र आत्मा के प्रबोधन से बढ़कर और कुछ नहीं हैं", "मैं नहीं सोचता कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सब सही है", "परमेश्वर की मानवीयता मेरी मानवीयता से बढ़कर नहीं है", "परमेश्वर का वचन विश्वास करने योग्य है ही नहीं," या इस तरह की अन्य प्रकार की आलोचनात्मक टीका टिप्पणियाँ की हैं, तो मैं तुम्हें प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम अपने पापों को अंगीकार करो और पश्चाताप करो। अन्यथा, तुम्हें पापों की क्षमा के लिए कभी अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि तुमने किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। तुम मान सकते हो कि तुम मात्र एक मनुष्य की आलोचना कर रहे हो, किन्तु परमेश्वर का आत्मा इस रीति से इसे नहीं देखता है। उसके देह का अनादर उसके अनादर के बराबर है। यदि ऐसा है, तो क्या तुमने परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई है? तुम्हें याद रखना होगा कि जो कुछ भी परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया गया है वह उसके देह में किए गए कार्य का बचाव करने के लिए है और इसलिए किया गया है ताकि इस कार्य को भली भांति किया जा सके। यदि तुम इसे महत्व न दो, तब मैं कहता हूँ कि तुम वो शख्स हो जो परमेश्वर पर विश्वास करने में कभी सफल नहीं हो पायेगा। क्योंकि तुमने परमेश्वर के क्रोध को भड़का दिया है, इस लिए तुम्हें सबक सिखाने के लिए वो उचित दण्ड का इस्तेमाल करेगा।

परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। तुम्हें उसके स्वभाव को समझना होगा। इस तरह से तुम धीरे-धीरे, अनजाने में परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित हो जाओगे, जब तुम इस ज्ञान में प्रवेश कर लोगे, तुम खुद को एक उच्चतर और अधिक ख़ू़बसूरत राज में प्रवेश करता हुआ पाओगे। अंत में तुम अपनी घृणित आत्मा पर लज्जा महसूस करोगे, और तो और तुम अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाओगे। उस समय, तुम्हारे आचरण में ऐसी बातें कम होती चली जाएंगी जो परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचायें, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के निकट होता जाएगा, और धीरे-धीरे उसके लिए तुम्हारे हृदय में प्रेम बढ़ता जाएगा। ये मानवजाति के ख़ूबसूरत राज में प्रवेश करने का एक चिह्न है। परन्तु तुम सबने इसे अभी प्राप्त नहीं किया है। अपनी नियति के लिए यहाँ-वहाँ भटकते हुए परमेश्वर के सार को जानने की रुचि किसमें है? अगर ये जारी रहा तो तुम अनजाने में प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करोगे क्योंकि तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हो। तो क्या अब तुम सब जो कर रहे हो वो परमेश्वर के स्वभाव के विरूद्ध तुम्हारे अपराधों की नींव नहीं डाल रहा? मेरा तुमसे यह अपेक्षा करना कि तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझो, मेरे कार्य के विपरीत नहीं है। क्योंकि यदि तुम लोग बार-बार प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करते रहोगे, तो तुम में से कौन है जो दण्ड से बच पाएगा? तो क्या मेरा कार्य पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो जाएगा? इसलिए, मैं अभी भी माँग करता हूँ कि अपने कार्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के साथ-साथ, तुम जो कदम उठा रहे हो उसके प्रति सावधान रहो। यह एक बड़ी माँग है जो मैं तुम लोगों से करता हूँ और आशा करता हूँ कि तुम सब इस पर सावधानी से विचार करोगे और इस पर ईमानदारी से ध्यान दोगे। यदि एक दिन ऐसा आया जब तुम लोगों के कार्य मुझे प्रचण्ड रूप से क्रोधित कर दें, तब परिणाम सिर्फ तुम्हें ही भुगतने होंगे, और तुम लोगों के स्थान पर दण्ड को सहने वाला और कोई नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

हर व्यक्ति ने अपने जीवन में परमेश्वर में आस्था के दौरान किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर का प्रतिरोध किया है, उसे धोखा दिया है। कुछ गलत कामों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य होते हैं; क्योंकि बहुत से कर्म ऐसे होते हैं जिनसे प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन होता है, जो परमेश्वर के स्वभाव के प्रति अपराध होते हैं। भाग्य को लेकर चिंतित बहुत से लोग पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौनसे हैं। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि तुम प्रकृति से ही अहंकारी और अकड़बाज हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के इच्छुक नहीं हो। इसलिए जब तुम लोग आत्म-चिंतन कर लोगे, तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताँऊगा। मैं तुम लोगों से प्रशासनिक आज्ञाओं के विषय की बेहतर समझ हासिल करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयास करने का आग्रह करता हूँ। अन्यथा, तुम लोग अपनी जबान बंद नहीं रख पाओगे और बड़ी-बड़ी बातें करोगे, तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके अंधकार में जा गिरोगे और पवित्र आत्मा एवं प्रकाश की उपस्थिति को गँवा दोगे। चूँकि तुम्हारे काम के कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम्हें जो नहीं करना चाहिए वह करते हो, जो नहीं बोलना चाहिए वह बोलते हो, इसलिए तुम्हें यथोचित दंड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि, हालाँकि कथन और कर्म में तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन परमेश्वर इन दोनों बातों में अत्यंत सिद्धांतवादी है। तुम्हें दंड मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि जीवन में बार-बार तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हो, तो तुम नरक की संतान ही बनोगे। इंसान को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने कुछ ही कर्म तो ऐसे किए हैं जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, और इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर की निगाह में, तुम पहले ही एक ऐसे इंसान हो जिसके लिए अब पाप करने की कोई और छूट नहीं बची है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और फिर तुममें पश्चाताप के कोई लक्षण भी नहीं दिखते, इसलिए तुम्हारे पास नरक में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जहाँ परमेश्वर इंसान को दंड देता है। परमेश्वर का अनुसरण करते समय, कुछ थोड़े-से लोगों ने कुछ ऐसे कर्म कर दिए जिनसे सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ, लेकिन निपटारे और मार्गदर्शन के बाद, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता का अहसास किया, उसके बाद वास्तविकता के सही मार्ग में प्रवेश किया, और आज वे एक ठोस जमीन पर खड़े हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत तक बने रहेंगे। मुझे ईमानदार इंसान की तलाश है; यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासपात्र हो सकते हो। यदि अपने कामों से तुम परमेश्वर के स्वभाव का अपमान नहीं करते, और तुम परमेश्वर की इच्छा की खोज करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारे मन में आदर है, तो तुम्हारी आस्था मापदंड के अनुरूप है। जो कोई भी परमेश्वर का आदर नहीं करता, और उसका हृदय भय से नहीं काँपता, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि वह परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करेगा। बहुत-से लोग अपनी तीव्र भावना के बल पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती, उसके वचनों में छिपे अर्थों का तो उन्हें कोई भान तक नहीं होता। इसलिए, नेक इरादों के बावजूद वे प्रायः ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा पहुँचती है। गंभीर मामलों में, उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित कर दिया जाता है, नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने नादान नेक इरादों की शक्ति के आधार पर परमेश्वर के घर में काम करते हैं, और अंत में परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर बैठते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में ले आते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें उपयोग में लाने की कोशिश करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि परमेश्वर का स्वभाव किसी मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ते हैं, वे उससे संवाद नहीं कर पाते, क्योंकि परमेश्वर का हृदय इंसान की तरह नहीं है। जब तुम बहुत-से सत्य समझ जाते हो, तभी तुम परमेश्वर को निरंतर जान पाते हो। यह ज्ञान शब्दों या धर्म सिद्धांतों से नहीं बनता, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिससे तुम परमेश्वर के साथ गहरा विश्वास पैदा कर सकते हो और इसे एक प्रमाण के रूप में उपयोग सकते हो कि वह तुमसे प्रसन्न होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से युक्त नहीं हो, तो मनोवेग में की गई तुम्हारी सेवा से परमेश्वर सिर्फ तुमसे घृणा और ग्लानि ही करेगा। अब तक तो तुम समझ ही गए होगे कि परमेश्वर में विश्वास धर्मशास्त्र का अध्ययन मात्र नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "यहोवा" शब्‍द नहीं है।

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