20. वे सिद्धांत जिन्हें जीवन-प्रवेश में मानना ही चाहिए

(1) प्रत्येक दिन परमेश्वर के वचनों का कम से कम एक अनुच्छेद पढ़ो, और तब तक उस पर चिंतन करो, जब तक तुम उनके प्रकाश और अभ्यास के एक मार्ग को पा न लो। हर दिन कुछ सत्य बटोरो।

(2) प्रत्येक दिन कम से कम एक मामले में, सत्य की तलाश करने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करो; परमेश्वर मनुष्य से क्या माँगता है, इसका पता लगाओ, सत्य को व्यवहार में लाना सीखो और परमेश्वर के प्रति समर्पण करो।

(3) परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने प्रत्येक शब्द और कर्म पर प्रतिदिन आत्म-चिंतन करो। उन बातों का पता लगाओ जिन्होंने सत्य-सिद्धांत का उल्लंघन किया है, उनके बारे में परमेश्वर को प्रार्थना में बताओ, और परमेश्वर से पश्चाताप करो।

(4) ईमानदार व्यक्ति होने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। सभी बातों में, यह जाँचो कि क्या तुम्हारी बातें सही हैं, क्या तुम्हारा इरादा धोखा देने का है, और क्या तुम दूसरों के साथ सच्चे हो।

(5) लोगों और घटनाओं को परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में देखने के लिए खुद को प्रशिक्षित करो और झूठे अगुवाओं, मसीह-विरोधियों, और अविश्वासियों को पहचानना सीखो। तुम्हें केवल परमेश्वर का आदर करना और मसीह का अनुसरण करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जीवन-प्रवेश क्या है? जीवन-प्रवेश किसी व्यक्ति के जीवन में, उसके कार्यों में, उसके जीवन की दिशा में, और उसकी तलाश के लक्ष्य में होने वाला परिवर्तन है। अतीत में मूर्ख और अज्ञानी रहने, और हमेशा दैहिक विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार काम करने के बाद व्यक्ति अब परमेश्वर के प्रकटनों, सिंचन और पोषण के माध्यम से यह समझ सकता है कि उसे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, ऐसा व्यक्ति दैनिक जीवन में, अपने दृष्टिकोणों और स्वयं को संचालित करने की शैली में, और जीवन में अपनी दिशा और लक्ष्यों के बारे में परमेश्वर के वचनों के आधार पर एक परिवर्तन से गुजरा है। यही जीवन-प्रवेश है। जीवन-प्रवेश का क्या आधार है? (परमेश्वर के वचन।) वह मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों और सत्य से संबंधित होता है। जीवन-प्रवेश परमेश्वर के वचनों से अविभाज्य है; वह सत्य से अविभाज्य है। जिन्होंने जीवन-प्रवेश हासिल कर लिया है, उन लोगों में क्या प्रकट होता है? वे जीने के लिए परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करने में सक्षम होते हैं; उनके कार्य, उनका बोलना, समस्याओं के बारे में उनके विचार, दृष्टिकोण, भंगिमाएँ और परिप्रेक्ष्य, सभी परमेश्वर के वचनों और सत्य पर निर्भर होते हैं। ये जीवन-प्रवेश हासिल कर लेने की अभिव्यक्तियाँ हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

जीवन में प्रवेश पाने की तलाश करते समय, एक व्यक्ति को कौन-सी मुख्य बात समझनी चाहिए? वह बात है कि, परमेश्वर के कहे गए सारे वचनों में, चाहे वे किसी भी पहलू के विषय में हों, तुम्हें पता लगाना होगा कि लोगों के लिए उसकी अपेक्षाएँ और उसके मानक क्या हैं, और उनसे होकर, तुम्हें अभ्यास का एक मार्ग खोजना होगा। तुम्हें अपने आचरण और दृष्टिकोण की जांच करने के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए, और उनके सन्दर्भ में अपनी स्थितियों और अभिव्यक्तियों की भी जांच करनी चाहिए। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हें इन मानकों द्वारा यह निश्चित करना चाहिए कि तुम चीज़ों को कैसे करोगे, अपने कर्तव्यों को करते समय परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करोगे, और कैसे तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के बिलकुल अनुरूप चल सकते हो। एक ऐसे व्यक्ति बनो जिसके पास सत्य की वास्तविकता हो, ऐसे व्यक्ति नहीं जो स्वयं को केवल शब्दों, सिद्धांतों और धार्मिक मतों से लैस करता हो। आध्यात्मिकता का ढ़ोंग न करो; एक नकली आध्यात्मिक व्यक्ति न बनो। तुम्हें अभ्यास करने पर, और अपनी स्थितियों की तुलना और उन पर चिंतन करने के लिए परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल करने पर, ध्यान देना चाहिए, और तब तुम उस दृष्टिकोण और रवैये को बदल डालो जिससे तुम हर तरह की परिस्थिति में बर्ताव करते हो। अंततः, तुम हर परिस्थिति में परमेश्वर का आदर कर सकोगे, और तब तुम फिर कभी अपने ही विचारों का न तो अनुसरण करोगे न उसके अनुसार उतावलेपन से काम न करोगे, अपनी ही इच्छाओं के अनुसार चीज़ों को न करोगे, या एक भ्रष्ट स्वभाव के तहत न जिओगे। इसकी जगह, तुम्हारे सभी काम और तुम्हारे सभी शब्द परमेश्वर के कथनों पर आधारित होंगे और सत्य के अनुरूप होंगे; इस तरह, क्रमशः तुममें परमेश्वर के लिए सम्मान जागेगा। सत्य की तलाश करते समय एक परमेश्वर-भीरु हृदय उत्पन्न होता है; यह संयम से नहीं आता। संयम से सिर्फ़ एक तरह का आचरण पैदा होता है, जो कि एक प्रकार का बाहरी अवरोध है। परमेश्वर के लिए एक सच्चा आदर तब आता है—परमेश्वर में विश्वास करने के दौरान—जब हम सच्चाई के अनुसार अभ्यास करें, क्रमशः अपने भ्रष्ट स्वभाव को कम करें और अपनी स्थितियों को धीरे-धीरे सुधारें ताकि हम परमेश्वर के सामने अक्सर आ सकें; यही वह प्रक्रिया है जिससे सच्चा आदर उत्पन्न होता है। जब वह होता है तब तुम जान पाओगे कि परमेश्वर का आदर करने का क्या अर्थ है और यह कैसा महसूस होता है, और तब तुम जानोगे कि कैसा रवैया, कैसी मनःस्थिति और कैसा स्वभाव लोगों के पास होना चाहिए, इसके पहले कि वे वास्तव में परमेश्वर-भीरु हो सकें और परमेश्वर के प्रति आदर दिखा सकें।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

जीवन में तुम्हारे प्रवेश में, कम से कम तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए तड़पनाचाहिए, तुम्हें सच्चाई में और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उद्देश्यों में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। जब तुम्हारे पास यह शक्ति होती है, तो इससे पता चलता है कि परमेश्वर तुम्हारा स्पर्श कर चुका है और तुम्हारा दिल परमेश्वर उन्मुख होना शुरू हो चुका है।

जीवन में प्रवेश का पहला कदम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में अपना मन लगाना है और दूसरा कदम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करना है। वह क्या प्रभाव है, जो पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करने से मिलना है? यह है एक गहरे सत्य के लिए तड़प, खोज और अन्वेषण करना और सकारात्मक तरीके से परमेश्वर के साथ सहयोग के लिए सक्षमहोना। आज तुम परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, जिसका अर्थ है कि तुम्हारी खोज, तुम्हारी प्रार्थनाओं और परमेश्वर के वचनों से तुम्हारे समागम का एक उद्देश्य है और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करते हो—केवल यही है परमेश्वर के साथ सहयोग करना। यदि तुम केवल परमेश्वर को कार्य करने देने की बात करते हो, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते, न प्रार्थना करते हो और न ही खोज, तो क्या इसे सहयोग कहा जा सकता है? यदि तुम्हारे भीतर सहयोग का अंश तक नहीं और प्रवेश के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण का अभाव है जिसका एक उद्देश्य हो, तो तुम सहयोग नहीं कर रहे हो। कुछ लोग कहते हैं: "सब कुछ परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण पर निर्भर करता है, यह सब स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है; अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया तो मनुष्य कैसे कर सकता था?" परमेश्वर का कार्य सामान्य है और ज़रा भी अलौकिक नहीं है और यह केवल तुम्हारी सक्रिय खोज के माध्यम से ही पवित्र आत्मा कार्य करती है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को मजबूर नहीं करता—तुम्हें परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देना चाहिए और यदि तुम अनुसरण या प्रवेश नहीं करते और अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी भी उत्कंठा नहीं है, तो परमेश्वर के लिए कार्य करने की कोई संभावना नहीं है। तुम किस मार्ग द्वारा परमेश्वर का स्पर्श हासिल करने की तलाश कर सकते हो? प्रार्थना के माध्यम से और परमेश्वर के करीब आकर। मगर याद रखो, सबसे महत्वपूर्ण बात है, यह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव पर खड़ा होना चाहिए। जब तुम परमेश्वर द्वारा अक्सर छू लिए जाते हो, तो तुम शरीर के गुलाम नहीं बनते: पति, पत्नी, बच्चे और धन—ये सब तुम्हें बेड़ियों में बांधने में असमर्थ रहते हैं और तुम केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के समक्ष जीना चाहते हो। इस समय, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

जीवन का अनुसरण करने में, तुम्‍हें दो बातों पर ज़रूर ध्‍यान देना चाहिए : पहली, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर स्‍वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्‍वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्‍वर के वचनों के भीतर सत्य को नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? संसार की सारी पुस्तकें दुष्ट शैतान के सिद्धांतों से संकलित की गई हैं, नहीं क्या? उनमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है! परमेश्‍वर के वचनों में सत्य को समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है परमेश्‍वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, उसके वचनों के भीतर सत्य के सभी पहलुओं को समझना, जैसे स्‍वयं अपनी सच्ची समझ और परमेश्‍वर के वचनों के भीतर मानवता के अस्तित्‍व के अर्थ खोजना। समस्‍त सत्य परमेश्‍वर के वचनों के भीतर है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जबतक कि प्रवेश परमेश्‍वर के वचनों के ज़रिए न किया जाए। वह मुख्‍य परिणाम जो तुम्हें प्राप्त करना है, यह जानना है कि परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और ज्ञान से युक्त होना क्‍या होता है। परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ के साथ, तुम फिर सत्य को समझ सकते हो। यह सबसे बुनियादी बात है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

लोगों की जीवन में प्रवेश की चेष्टा परमेश्वर के वचनों पर आधारित है। पहले, यह कहा गया था कि सब कुछ उसके वचनों के कारण ही पूरा होता है, मगर किसी ने भी इस तथ्य को नहीं देखा। अगर तू वर्तमान चरण को अनुभव करने में प्रवेश करेगा, तो तुझे सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगी और तू भविष्य की परीक्षाओं के लिए एक अच्छी नींव खड़ी करेगा। परमेश्वर चाहे जो कहे, तुझे केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान देना है। जब परमेश्वर कहता है कि वह लोगों को ताड़ना देना शुरू करेगा, तो उसकी ताड़ना को स्वीकार कर। जब परमेश्वर लोगों से प्राण त्यागने को कहे, तो यह परीक्षा स्वीकार कर। यदि तू सदा उसके नए कथनों के भीतर जीवन बिताता है, तो अंत में परमेश्वर के वचन तुझे पूर्ण कर देंगे। जितना अधिक तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, उतनी ही शीघ्रता से तुझे पूर्ण किया जाएगा। क्यों मैं हर संगति में तुम सबसे परमेश्वर के वचनों को जानने और उनमें प्रवेश करने को कहता हूँ? केवल जब तू परमेश्वर के वचनों में अनुसरण करता है और उसका अनुभव करता है, और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तभी पवित्र आत्मा को तेरे अंदर कार्य करने का अवसर मिलेगा। इसलिए परमेश्वर के कार्य की हर पद्धति में तुम सब प्रतिभागी हो, और इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी पीड़ा कितनी अधिक है, अंत में तुम सबको "स्मारिका" मिलेगी। अपनी अंतिम पूर्णता प्राप्त करने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे वचनों में प्रवेश करना होगा। पवित्र आत्मा द्वारा लोगों की पूर्णता एकतरफा नहीं है; वह लोगों का सहयोग चाहता है। वह चाहता है कि हर कोई पूरी मर्ज़ी से उसके साथ सहयोग करे। परमेश्वर चाहे जो भी कहे, तुझे केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान देना है, यह तुम्हारे जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। सारी बातें तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए ही हैं। जब तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, तब तेरा हृदय परमेश्वर द्वारा द्रवित किया जाएगा और तू वह सारी बातें समझ पायेगा जो परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण में प्राप्त करना चाहता है और तुझमें उसे प्राप्त करने का संकल्प होगा। ताड़ना के समय के दौरान, कुछ लोग थे जिनका मानना था कि यह कार्य करने का एक तरीका है और उन्होंने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया। इसके फलस्वरूप, वे शुद्धिकरण से नहीं गुज़रे और बिना कुछ पाये या समझे वे ताड़ना की अवधि से बाहर आ गए। कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने बिना किसी संदेह के इन वचनों में प्रवेश किया; जिन्होंने कहा कि परमेश्वर का वचन अचूक सत्य है और मनुष्यों को ताड़ना मिलनी चाहिए। कुछ समय के लिए उन्होंने अपने भविष्य और गंतव्य को छोड़ने में संघर्ष किया, और जब वे इससे बाहर निकले, तो उनका स्वभाव थोड़ा-बहुत बदल गया था और उन्होंने परमेश्वर की गहरी समझ पा ली थी। जो लोग ताड़ना से निकल आये, उन सब ने परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव किया, और वे जानते थे कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण उनमें परमेश्वर के महान प्रेम के अवतरित होने को मूर्त रूप देता है, यह चरण परमेश्वर के प्रेम का विजय और उद्धार है। उन्होंने यह भी कहा कि परमेश्वर के विचार सदैव अच्छे होते हैं, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य में करता है, वह प्रेम से उपजा है, द्वेष से नहीं। जिन लोगों ने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया, जिन्होंने उन वचनों का सम्मान नहीं किया, जो ताड़ना के समय शुद्धिकरण से नहीं गुज़रे, परिणामस्वरूप उनके साथ पवित्र आत्मा नहीं था, और उन्होंने कुछ भी नहीं पाया। जिन लोगों ने ताड़ना के समय में प्रवेश किया, वे भले ही शुद्धिकरण से होकर गुज़रे, लेकिन पवित्र आत्मा उनके अंदर गुप्त तरीके से कार्य कर रहा था और उसके फलस्वरूप उनके स्वभाव में बदलाव हुआ। कुछ लोग बाहर से हर तरह से, बहुत सकारात्मक दिखते थे, वे सदा आनंदित रहते थे, लेकिन उन्होंने परमेश्वर के वचनों के द्वारा शुद्धिकरण की अवस्था में प्रवेश नहीं किया और इसलिए वे बिल्कुल नहीं बदले, जो कि परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करने का परिणाम था। यदि तू परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं रखता है तो पवित्र आत्मा तेरे अंदर कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उन सबके सामने प्रकट होता है जो उसके वचनों पर विश्वास करते हैं। जो लोग उसके वचनों पर विश्वास रखते हैं और उन्हें स्वीकारते हैं, वे उसका प्रेम प्राप्त कर सकेंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

जीवन-प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु कौन-सा है? अपने कर्तव्य पर टिके रहो—वह पहले आता है। यह सब अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से ही शुरू होता है। तुम्हारा जीवन-प्रवेश तुम्हारे कर्तव्य का निर्वाह करने से शुरू होता है, और जीवन-प्रवेश के माध्यम से तुम थोड़ा-थोड़ा करके सत्य को समझने लगते हो, और सत्य को प्राप्त करने लगते हो। तुम्हें आध्यात्मिक कद मिल जाता है, तुम्हारा जीवन धीरे-धीरे विकसित होने लगता है, तुम्हें सत्य के सच्चे अनुभव होने लगते हैं, और बाद में तुम अभ्यास के विभिन्न सिद्धांत समझने लगते हो, और किसी भी व्यक्ति, चीज या पदार्थ से विवश या परेशान नहीं होते; इस तरह, तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के सम्मुख जीने लगते हो। अगर तुम किसी भी व्यक्ति, चीज या मामले से परेशान नहीं होते हो, और सत्य का अनुभव कर पाते हो, तो जैसे-जैसे तुम्हारे अनुभव समृद्ध होते जाएँगे, तुम परमेश्वर की गवाही देने में ज्यादा सक्षम हो जाओगे। जब तुम परमेश्वर की गवाही देने में ज्यादा सक्षम हो जाओगे, तो तुम धीरे-धीरे उपयोगी व्यक्ति बन जाओगे; जब तुम उपयोगी व्यक्ति बन जाओगे, तो परमेश्वर के घर में तुम्हारा एक स्थान होगा, तुम दृढ रहोगे, और तुम एक अच्छे व्यक्ति, एक सच्चे व्यक्ति बन जाओगे। तब तुम उस सबके योग्य हो जाओगे, जो परमेश्वर तुम्हें प्रदान करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

जीवन प्रवेश का अनुसरण करते हुए, एक व्यक्ति को रोजमर्रा के जीवन में सामने आने वाले हर मामले से अपने शब्दों और कर्मों, सोच और विचारों की जांच करनी चाहिए, और अपनी अवस्थाओं को समझना चाहिए; इसके बाद, सत्य से उनकी तुलना करनी चाहिए, सत्य की तलाश करनी चाहिए, और जिन सत्यों को समझा है उनकी सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए। सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के दौरान, एक व्यक्ति को अपनी अवस्थाओं को समझना चाहिए, और परमेश्वर के सामने प्रार्थना और विनती करने के लिए अक्सर आना चाहिए। उसे खुले दिल से भाइयों और बहनों के साथ अक्सर सहभागिता भी करनी चाहिए, सत्य-वास्तविकता के प्रवेश करने के मार्ग की तलाश करनी चाहिए, और सत्य-सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए। अंततः, उसे पता चलेगा कि रोजमर्रा की जिंदगी में कौन-कौन से स्वभाव वह प्रकट करता है, परमेश्वर को उनसे खुशी मिलती है या नहीं, उसके अभ्यास का रास्ता सही है या नहीं, उसने आत्म-परीक्षण के माध्यम से स्वयं के भीतर पाई गई अवस्थाओं की तुलना परमेश्वर के वचनों के साथ की है या नहीं, उसने इनकी सही-सही जाँच की या नहीं, वे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं या नहीं, और उसने सच में कोई उपलब्धि हासिल की है या नहीं और उन परमेश्वर के वचनों के अनुरूप अवस्थाओं में सकारात्मक प्रवेश किया है या नहीं। जब तुम इन अवस्थाओं में, इन स्थितियों में अक्सर रहोगे, तो धीरे-धीरे, तुम्हें कुछ सत्यों और अपनी व्यावहारिक अवस्थाओं की बुनियादी समझ हासिल हो जाएगी। और जब कोई व्यक्ति इन अवस्थाओं और सत्य के सभी पहलुओं की बुनियादी समझ पा लेता है, तो वह भीतर से समृद्ध और विपुल हो जाता है; फिर वह संवेदनाशून्य, मंदबुद्धि, दरिद्र और दयनीय नहीं रह जाता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है' से उद्धृत

परमेश्वर में अपनी आस्था में विकास प्राप्त करने की मुख्य कुँजी है यह जानना कि परमेश्वर तुम्हारे अनुभव में क्या कार्य करता है, परमेश्वर की मनोहरता का अवलोकन करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की सारी व्यवस्थाओं को मान लो, परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर गढ़ लो ताकि वे तुम्हारा जीवन बन जाएँ और फलस्वरूप परमेश्वर को संतुष्ट करें। अगर तुम्हारी आस्था मूर्खतापूर्ण आस्था है, अगर तुम आध्यात्मिक बातों और अपने जीवन-स्वभाव में आए बदलावों पर कोई ध्यान नहीं देते, अगर तुम सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते, तो क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ पाओगे? अगर तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर क्या चाहता है, तो तुम अनुभव करने के नाकाबिल होगे, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। जब तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करो, तो तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे तुम्हारे अंदर क्या प्रभाव पैदा कर रहे हैं, ताकि तुम परमेश्वर को उसके वचनों से जान सको। अगर तुम मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि उनका अनुभव कैसे करना है, तो क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि तुम आध्यात्मिक मामलों से अनजान हो? इस समय, अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर पाने में असमर्थ हैं और इस तरह वे परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। क्या यह उनका अपने अभ्यास में विफल होना नहीं है? अगर वे ऐसे ही करते रहे, तो वे किस मुकाम पर जाकर चीज़ों को उनकी पूर्णता में अनुभव कर पाने में सक्षम होंगे और अपने जीवन में विकास प्राप्त कर पाएँगे। क्या यह महज़ खोखली बातें करना नहीं है? तुम लोगों में से बहुत लोग ऐसे हैं जो सिद्धांत पर ध्यान देते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक मामलों का कोई ज्ञान नहीं है, और फिर भी वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनका कोई बड़ा इस्तेमाल करे और उन्हें आशीष दे। यह एकदम अवास्तविक बात है! इस तरह, तुम लोगों को इस नाकामी का अंत करना चाहिए, ताकि तुम सब अपने आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग में प्रवेश कर सको, वास्तविक अनुभव ले सको और सचमुच परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें' से उद्धृत

तुम सभी लोग अपने जीवन में विकसित होने और परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने को तैयार हो, तो क्या तुमने अपने सतही तरीकों से छुटकारा पा लिया है? यदि तुम केवल सतही तरीकों से छुटकारा पा लेते हो और विघटनकारी तथा बड़बोलेपन के व्यवहार से दूर रहते हो, तो क्या यह वास्तव में अपने जीवन में विकसित होने का प्रयास करना है? यदि तुम सतही तरीकों से छुटकारा पा लेते हो, लेकिन परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं करते, तो इसका मतलब है कि तुम सक्रिय रूप से प्रगति नहीं कर रहे। सतही व्यवहार का मूल कारण क्या है? क्या तुम्हारे क्रिया-कलाप अपने जीवन में विकसित होने के लिए हैं? क्या तुम परमेश्वर के लोगों की तरह जीने की कोशिश कर रहे हो? जिस चीज़ पर भी तुम ध्यान केंद्रित करोगे, तुम उसी को जिओगे; यदि तुम सतही तरीकों पर ध्यान केंद्रित करोगे, तो तुम्हारा हृदय अकसर बाहर फेंक दिया जाएगा और तुम्हारे पास अपने जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करने का कोई उपाय नहीं होगा। परमेश्वर स्वभाव में बदलाव की अपेक्षा रखता है, लेकिन तुम हमेशा बाहरी चीजों का अनुसरण करते हो; इस प्रकार का व्यक्ति अपने स्वभाव को बदलने में असमर्थ होता है! जीवन में परिपक्व होने की प्रक्रिया में सभी को एक मार्ग पर चलना चाहिए : उन्हें परमेश्वर के वचनों का न्याय, ताड़ना और पूर्ण किया जाना स्वीकार करना चाहिए। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन नहीं हैं, बल्कि तुम केवल अपने आत्मविश्वास और इच्छा पर भरोसा करते हो, तो तुम जो कुछ भी करते हो, वह सिर्फ उत्साह पर आधारित होता है। अर्थात् यदि तुम अपने जीवन में विकास चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को और अधिक खाना-पीना और समझना चाहिए। जो लोग उसके वचनों द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, वे उन्हें जीने में सक्षम होते हैं; जो लोग उसके वचनों के शुद्धिकरण से नहीं गुज़रते, जो लोग उसके वचनों के न्याय से नहीं गुज़रते, वे उसके उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। तो तुम लोग किस स्तर तक उसके वचनों को जीते हो? यदि तुम लोग परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो और अपनी स्थिति के साथ उनकी तुलना करने में सक्षम हो, और मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रकाश में अभ्यास का मार्ग पाते हो, केवल तभी तुम्हारा अभ्यास सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगा। केवल इस प्रकार के अभ्यास वाले व्यक्ति में ही परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

जीवन की खोज कोई जल्दबाजी की चीज़ नहीं है; जीवन में विकास एक या दो दिन में नहीं आता। परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है और इसे एक आवश्यक प्रक्रिया से गुजरना होता है। देहधारी यीशु को क्रूस पर अपने कार्य को समाप्त करने में तेंतीस वर्ष और छः माह लगे, तो मनुष्य को शुद्ध करने और उसका जीवन रूपांतरित करने की बात करना कितना सटीक होगा, जो कि अतिशय मुश्किल कार्य है? एक सामान्य व्यक्ति बनाना, जो परमेश्वर को अभिव्यक्त करता हो, आसान काम नहीं है। यह विशेष रूप से बड़े लाल अजगर के देश में जन्मे लोगों के लिए और भी कठिन है, जिनकी क्षमता कम है, जिन्हें लंबे समय से परमेश्वर के वचन और कार्य की आवश्यकता है। इसलिए परिणाम पाने के लिए जल्दबाजी न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिये तुम्हें पहले से ही सक्रिय होना होगा और परमेश्वर के वचनों पर अधिक से अधिक परिश्रम करना होगा। उसके वचनों को पढ़ने के बाद, तुम्हें इस योग्य हो जाना चाहिए कि तुम वास्तव में उन पर अमल करो, परमेश्वर के वचनों में ज्ञान, अंर्तदृष्टि, परख और बुद्धि को विकसित करते हुए। और इसके द्वारा तुम बदल जाओगे और तुम्हें महसूस भी नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और पढ़ने का सिद्धांत बना लो, उसे जानने लगो, अनुभव करने लगो, अमल में लाने लगो तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम परिपक्वता हासिल कर लोगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद भी उस पर अमल नहीं कर पाते! तुम किस जल्दबाजी में हो? जब तुम एक निश्चित स्थिति तक पहुंच जाओगे तो तुम परमेश्वर के वचन पर अमल करने योग्य बन जाओगे। क्या चार या पांच वर्ष का बालक कहेगा कि वह अपने माता-पिता का सहयोग या आदर करने में असमर्थ है? तुम्हें जान लेना चाहिए कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति क्या है, तुम जिनपर अमल कर सकते हो, अमल करो और परमेश्वर के प्रबंधन को बिगाड़ने वाले मत बनो। केवल परमेश्वर के वचनों को खाओ-पीओ और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना सिद्धांत बना लो। इस समय इस बारे में चिन्ता मत करो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कर सकता है या नहीं। अभी इस विषय में सोच-विचार मत करो। परमेश्वर के वचन जब तुम्हारे सामने आएँ तो केवल उन्हें खाओ-पीओ, परमेश्वर निश्चित ही तुम्हें पूरा करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का एक नियम है। आँखें मूंद करके यह न करो, बल्कि एक ओर उन शब्दों को खोजो जिन्हें तुम्हें जानना चाहिए, अर्थात उन्हें जिनका संबंध दर्शन से है, और दूसरी ओर उसे खोजो जिस पर वास्तव में तुम्हें अमल करना चाहिए, अर्थात, जिसमें तुम्हें प्रवेश करना चाहिए। एक पहलू ज्ञान का है और दूसरा उसमें प्रवेश करने का। जब तुम इन दोनों को पा लेते हो, अर्थात जब तुम उसे समझ लेते हो जिसे तुम्हें जानना चाहिए और जिस पर अमल करना चाहिए, तब तुम सीख लोगे कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाया और पिया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने की कुंजी क्या है? क्या हमेशा अपनी इच्छा व्यक्त करने, हमेशा शपथें खाने और काम करने के संकल्प लेने का कोई लाभ है? यह अवास्तविक है। इस समय सबसे व्यवहारिक मुद्दा इस बात का समाधान करने के माध्यम से जीवन-प्रवेश प्राप्त करना है कि जब तुम अपने कर्तव्य का पालन करते हो, तो उसे कैसे लेना और पूरा करना चाहिए। जीवन-प्रवेश प्राप्त करने को संदर्भित करने का दूसरा तरीका क्या है? सत्य का अनुभव करना। इसी मार्ग से जीवन-प्रवेश प्राप्त किया जाता है। क्या तुम लोगों ने जीवन-प्रवेश प्राप्त कर लिया है? क्या तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो? (नहीं।) क्या तुम्हारे साथ यह मामला है कि तुम अब भी ज्यादातर सिद्धांत से ही चिपके हुए हो, और तुम्हें सत्य का कोई सच्चा ज्ञान या अनुभव नहीं है? अगर तुम सत्य को सचमुच जानने और अनुभव करने में सक्षम नहीं हो, तो तुम परमेश्वर की गवाही देने में भी सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान अधिकांश समय अवधारणात्मक होता है : तुम समझते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं, इसलिए तुम आमीन कहकर सहमत हो जाते हो—पर तुम इन बातों को अपने ऊपर लागू नहीं कर पाते, कुछ करते हुए तुम अब भी भ्रमित हो जाते हो, और नहीं जानते कि अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए तुम्हें किस सत्य का प्रयोग करना चाहिए। क्या तुम लोग ज्यादातर इसी अवस्था में नहीं रहते? तुम काफी कुछ समझते हो, और तुमने काफी कुछ ग्रहण किया है, लेकिन तुम अभी तक उन चीजों को अभ्यास में नहीं लाए या तुमने उन्हें लागू नहीं किया है। जब तुम वे सत्य लागू और और अनुभव करते हो, जिन्हें तुम लोग समझते हो, तो तुम लोगों का जीवन विकसित होने लगता है; यही मापदंड है, यही कसौटी है। और एक दिन, जब तुम सत्य के एक पहलू की समझ प्राप्त कर लेते हो, और तुम इस समझ में से कुछ परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के स्वभाव की, और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान की गवाही देने के लिए बोलने में सक्षम हो जाते हो, तो उस समय तुम परमेश्वर के गवाह बन जाते हो। अगर तुम सिद्धांत को बहुत समझते हो और उसका उपदेश दे सकते हो, लेकिन खुद अपनी समस्याओं को सुलझाने में असमर्थ रहते हो, और नहीं जानते कि उन्हें कैसे सुलझाया जाए, तो तुम क्या समझते हो? (शब्द और सिद्धांत।) इसमें से कुछ सिर्फ शब्द या सिद्धांत नहीं हैं। अधिकांश अवधारणात्मक ज्ञान है : तुम समझते हो कि ये शब्द सही हैं, तुम दूसरे लोगों के कथनों से पहचान करते हो, पर तुम यह नहीं जानते कि इन्हें कैसे अनुभव किया जाए या इन चीजों को अपने ऊपर कैसे लागू किया जाए—यही अवधारणात्मक ज्ञान है। इस समस्या को कैसे सुलझाया जा सकता है? तुम्हें अपने कर्तव्य की तरफ लौटना होगा। थोड़ा-थोड़ा करके, उन विभिन्न प्रकार की भ्रष्टताओं और अपनी विभिन्न अवस्थाओं को जाँचो और समझो, जो अपने कर्तव्य के निर्वाह के दौरान तुम प्रकट करते हो, और फिर उनमें से हरेक को एक-एक करके लगातार दूर करो। तुम्हें स्वयं द्वारा प्रकट की जाने वाली अपनी विभिन्न अवस्थाओं को समझना होगा—अपनी आत्म-तुष्टता, धूर्तता, वह तरीका जिससे तुम हमेशा कोई बात छिपा लेते हो या लापरवाह और असावधान रहते हो—और इन अवस्थाओं के माध्यम से तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझना होगा। क्या तुम्हें यह पता है कि अपने भ्रष्ट स्वभाव की पहचान कर लेने के बाद तुम्हें क्या करना है? उदाहरण के लिए, जब तुम किसी खास मामले में खुद को स्वार्थी दर्शाते हो और सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा के बारे में सोचते हो, तो क्या किया जाना चाहिए? पहले, तुम्हें प्रतिष्ठा से जुड़े सारे विचार त्याग देने चाहिए : "अगर मैंने ऐसा कहा, तो यह मेरी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए होगा। ऐसा कहने के पीछे कोई प्रेरणा होगी, मैं स्वार्थी और नीच हूँगा। यह मेरा भ्रष्ट स्वभाव है, मुझे ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। मुझे अपने-आपको खोलकर रख देना चाहिए, अपने असली रंग दिखाने चाहिए, वही कहना चाहिए जो मेरे दिल में है। मेरी प्रतिष्ठा पर आँच आती है तो आए, मैं उसे बचाने की कोशिश नहीं करूँगा, मैं अपने दंभ को संतुष्ट नहीं करूँगा।" और इस तरह, अपने अहं को त्यागकर और अपने अंतर्तम विचारों को जोर से बोलकर तुम एक तरफ ईमानदार बन जाते हो, तो दूसरी तरफ अपने विचारों के अनुसार व्यवहार करना और अपनी प्रतिष्ठा के बारे में सोचना छोड़ देते हो। तुम सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो जाते हो, और अपने कर्तव्य का बेहतर ढंग से निर्वाह करते हो, और अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी लेने में सक्षम हो जाते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा भले ही खो दो, पर तुम परमेश्वर के घर के हितों और सत्य की रक्षा करने में सफल रहते हो। इसी तरह से जीना उचित और धार्मिक है, और लोगों और परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य है। यह अद्भुत है! इस तरह से अभ्यास करना भले ही थोड़ा कठिन हो, लेकिन अगर तुम्हारे प्रयास और तुम्हारा अभ्यास इसी दिशा में उन्मुख रहे, तो भले ही दो-तीन बार तुम विफल हो जाओ, पर शायद अपने पाँचवें प्रयास में तुम सफल रहोगे। और सफलता का तुम्हारे लिए क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम वह कदम उठाने में सक्षम हो जाते हो जो तुम्हें शैतान के बंधनों से मुक्त करता है, एक ऐसा कदम जो तुम्हें अपने अहं का त्याग करने, अपने मिथ्या अभिमान, प्रतिष्ठा और हितों को एक तरफ रखने, और स्वार्थी और नीच होने से मुक्त होने देता है। तो, इससे तुम क्या देखते हो? जब तुम ऐसा करते हो, तो तुम लोगों को यह दिखाते हो कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम करता है, जो सत्य की कामना करता है, जो धार्मिकता और प्रकाश की कामना करता है। साथ ही, तुम शैतान को शर्मिंदा भी करते हो। शैतान ने तुम्हें भ्रष्ट किया, तुम्हें अपने लिए जीना सिखाया, तुम्हें स्वार्थी और सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा के बारे में सोचने वाला बनाया। लेकिन अब ये शैतानी चीजें तुम्हें और नहीं बाँध सकतीं, तुम उनके बंधनों से छूट चुके हो, तुम अब मिथ्या अभिमान, प्रतिष्ठा या अपने निजी हितों से नियंत्रित नहीं हो, और तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और इसलिए शैतान अपमानित होता है। और जब शैतान अपमानित होता है, तो क्या तुम विजयी नहीं हो जाते? क्या तुम परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ता से खड़े नहीं होते? क्या तुम एक अच्छी लड़ाई नहीं लड़ते? जब तुम एक अच्छी लड़ाई लड़ते हो, तो तुम्हारे मन में शांति, आनंद और राहत की भावना होती है। जब लोग हमेशा अपराध की भावना के साथ जीते हैं, जब वे अस्थिरचित्त होते हैं, उनमें कोई आनंद या शांति की भावना नहीं होती, जब वे सभी तरह की चीजों से अकसर उदास और खिन्न रहते हैं, तो यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि लोग कभी-कभार ही सत्य का अभ्यास करते हैं, वे अक्सर सत्य से अपना मुंह मोड लेते हैं, और ऐसे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीते रहते हैं, जो स्वार्थपूर्ण और घिनौना होता है। यह दर्शाता है कि वे सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा, साख, रुतबे और हितों को देखते हैं, और उनके पास सत्य नहीं होता। इसलिए उनके कष्ट बहुत बड़े होते हैं, उनकी चिंताएँ बहुत ज्यादा होती हैं, और उनकी बेड़ियाँ अनगिनत होती हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

जब परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास की बात आती है, तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से निभाने के अलावा सत्य को समझना, सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना और जीवन में प्रवेश करने के लिए अधिक प्रयास करना महत्वपूर्ण होता है। जब तुम्हारे साथ कुछ घट जाए तो उस अवसर को हाथ से जाने मत दो; अगर तुम्हारे सामने कोई समस्या आ जाए और कुछ विचार मन में आएँ या तुम कुछ व्यवहार प्रकट करने लगो, और तुम्हें लगे कि कुछ गड़बड़ है लेकिन तुम्हें समझ में न आए कि यह क्या हो रहा है, और तुम जान न पाओ कि इस मामले में कैसे अभ्यास करना है, तो तुम्हें इस बारे में सबसे बोलना चाहिए और सभी के साथ संगति करनी चाहिए; यदि तुम्हें पता चलता है कि कोई समस्या है, तो तुम्हें उस पर संगति करनी चाहिए। जब तुम उस पर संगति करोगे, तो अनजाने में ही तुम्हारे सवाल और शंकाएँ कम होती चली जाएँगी और तुम अधिक से अधिक सत्य समझने लगोगे, और इस तरह, अनजाने में ही तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ता चला जाएगा। जब बात सत्य की हो, तो तुम्हें कड़ी मेहनत करनी चाहिए, तुम्हें अपनी पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, "मैं बरसों से परमेश्वर में विश्वास करता आया हूँ और मैंने बहुत सारे सिद्धांत समझ लिए हैं। अब मेरे पास एक आधार है। अब विदेशों में हमारा कलीसियाई जीवन अच्छा है, भाई-बहन परमेश्वर में विश्वास के मामलों में संगति के लिए दिन भर इकट्ठे होते हैं, और इस तरह मुझे अनजाने में ही पोषण मिलता रहता है—और इतना पर्याप्त है। मुझे अपने जीवन-प्रवेश की समस्याएँ या अपने विद्रोह की समस्याएँ दूर करने का प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ती। मैं हर दिन प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, भजन गाने और अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए अपनी समय-सारणी का पालन करता हूँ। मैं वह काम करता हूँ जो मुझे करना चाहिए, एक भी चीज कम नहीं, और अंतत:, अनजाने में ही मेरा जीवन विकसित हो रहा है।" अपने विश्वास में संभ्रमित लोग ऐसा ही सोचते हैं। परमेश्वर में विश्वास का मार्ग सभी मार्गों में सबसे यथार्थवादी मार्ग है; जो लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं लेकिन असलियत में कभी कुछ नहीं करते, उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। किन लोगों को कुछ हासिल होता है? उन्हें, जो सरल होते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर में अपनी आस्था के मार्ग पर कुछ महत्वपूर्ण चीजें समझने में सक्षम होते हैं, वे व्यावहारिक होते हैं, अपना हर काम करते समय, अपने हर काम पर विचार करते समय, हर चीज से रूबरू होते समय और हर सत्य में प्रवेश करते समय वे सरल होते हैं। वे लोग बड़बोले नहीं होते या केवल काम करने पर ही ध्यान नहीं देते। इसके बजाय, वे अपने साथ होने वाली हर चीज को अपने दिल से अनुभव करते हैं, वे जो कुछ भी करते हैं जी-जान से करते हैं, उसके बाद वे अपने साथ होने वाली हर चीज से समझ हासिल करते हैं। जब किसी बात पर उनकी राय अलग होती है या कोई असाधारण परिस्थिति होती है, वे कोई न कोई सबक अवश्य सीखते हैं। ऐसे व्यक्ति में हृदय होता है और ऐसा ही व्यक्ति अंततः सत्य हासिल करता है। अन्यमनस्क लोग अंततः सत्य प्राप्त करने में अक्षम होते हैं; वे लोग केवल शारीरिक श्रम में, काम करने में, दिखावा करने में लगे रहते हैं, और उन्हें सत्य हासिल करने में बहुत कठिनाई होगी। इस पर विचार करो : किस तरह के व्यक्ति सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होते हैं? वे लोग, जो स्थिर बुद्धि के होते हैं, जो अपने दिल का इस्तेमाल करते हैं, जिनके पास दिल होता है। एक तरह से, ऐसे लोग वास्तविकता पर, वास्तविक चीजों पर अधिक ध्यान देते हैं; इसके अलावा, वे अधिक व्यावहारिक होते हैं, वे सकारात्मक चीजें पसंद करते हैं, वे सत्य से प्रेम करते हैं और वे ऐसी चीजों से प्रेम करते हैं, जो वास्तविक होती हैं। ऐसे लोग अंततः सत्य को समझने और हासिल करने में सक्षम होंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश' से उद्धृत

लोग प्रायः परमेश्वर को ही अपना जीवन समझने की बात करते हैं, परंतु उनका अनुभव अभी उस बिंदु तक नहीं पहुंचा है। तुम बस कह भर रहे हो कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि वह प्रतिदिन तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, कि तुम प्रतिदिन उसके वचन खाते और पीते हो, और तुम प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हो, इसलिए वह तुम्हारा जीवन बन गया है। जो ऐसा कहते हैं, उनका ज्ञान बहुत उथला है। कई लोगों में कोई नींव ही नहीं होती; परमेश्वर के वचन उनमें बोए तो गए हैं, किंतु उन्हें अभी अंकुरित होना है, उन पर फल लगना तो और भी दूर की बात है। आज, तुमने किस सीमा तक अनुभव किया है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें यहाँ तक आने के लिए बाध्य करने के बाद ही, अब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ सकते। एक दिन, जब तुम्हारा अनुभव एक निश्चित बिंदु तक पहुँच गया होगा, तब यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़कर जाने के लिए कहे, तो तुम नहीं जा पाओगे। तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम अपने भीतर परमेश्वर के बिना हो ही नहीं सकते; तुम पति, पत्नी या बच्चों के बिना, परिवार के बिना, माता या पिता के बिना, देह के आनंदों के बिना हो सकते हो, परंतु तुम परमेश्वर के बिना नहीं हो सकते। परमेश्वर के बिना होना अपना जीवन खो देने जैसा होगा; तुम परमेश्वर के बिना नहीं जी पाओगे। जब तुम इस बिंदु तक अनुभव कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास का लक्ष्य पा लिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन गया होगा, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन गया होगा। तुम फिर कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे। जब तुम इस सीमा तक अनुभव कर लोगे, तब तुमने परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले लिया होगा, और जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा पर्याप्त निकट संबंध होगा, तब वह तुम्हारा जीवन, तुम्हारा प्रेम होगा, और उस समय तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, तू मेरा जीवन है, मैं अन्य हर चीज के बिना रह सकता हूँ—पर तेरे बिना मैं नहीं जी सकता।" यही लोगों की सच्ची कद-काठी है; यही वास्तविक जीवन है। कुछ लोग आज जितनी दूर आए हैं, वहाँ तक आने के लिए उन्हें बाध्य किया गया है : वे चाहें या न चाहें उन्हें चलते जाना है, और उन्हें हमेशा लगता है कि वे दो पाटों के बीच फँस गए हैं। तुम्हें ऐसा अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि यदि परमेश्वर को तुम्हारे हृदय से दूर ले जाया जाए, तो यह जीवन खो देने जैसा होगा; परमेश्वर अवश्य ही तुम्हारा जीवन होना चाहिए, और तुम्हें उसे छोड़ने में अवश्य ही असमर्थ होना चाहिए। इस तरह, तुमने वास्तव में परमेश्वर का अनुभव कर लिया होगा, और इस समय, जब तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तब तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करोगे, और यह एक विलक्षण, विशुद्ध प्रेम होगा। एक दिन, जब तुम्हारे अनुभव ऐसे होंगे कि तुम्हारा जीवन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच चुका होगा, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे, और परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तब तुम अंदर से परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, न ही तुम उसे चाहकर भी भूल पाओगे। परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन चुका होगा; तुम संसार को भूल सकते हो, तुम अपनी पत्नी, पति या बच्चों को भूल सकते हो, किंतु परमेश्वर को भूलने में तुम्हें कष्ट होगा—ऐसा करना असंभव होगा, यही तुम्हारा सच्चा जीवन और परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम है। जब परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तब किसी भी दूसरे के प्रति उनका प्रेम परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम के बराबर नहीं होता; परमेश्वर से उनका प्रेम सबसे पहले आता है। इस तरह तुम अन्य सब कुछ छोड़ पाते हो, और परमेश्वर से सारे व्यवहार और काट-छाँट स्वीकार करने के इच्छुक होते हो। जब तुमने परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम प्राप्त कर लिया जो अन्य सबसे बढ़कर हो, तब तुम वास्तविकता में और परमेश्वर के प्रेम में जिओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

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