20. वे सिद्धांत जिन्हें जीवन-प्रवेश में अवश्य मानना होगा

(1) प्रत्येक दिन परमेश्वर के वचनों का कम से कम एक अनुच्छेद पढ़ा करो, और तुम उनके प्रकाश और अभ्यास के मार्ग को समझ लो, तब तक उस पर चिंतन करो। हर दिन सत्य से कुछ बटोर लो;

(2) प्रत्येक दिन कम से कम एक मामले में, सत्य की तलाश करने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करो; परमेश्वर मनुष्य से क्या माँगता है, इसका पता लगाओ, सत्य को व्यवहार में लाना सीखो, और परमेश्वर के प्रति समर्पण करो;

(3) परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने प्रत्येक शब्द और कर्म पर प्रतिदिन आत्म-चिंतन करो। उन बातों का पता लगाओ जिन्होंने सत्य के सिद्धांत का उल्लंघन किया है, उनके बारे में परमेश्वर को प्रार्थना में बताओ, और उसके प्रति पश्चाताप करो;

(4) ईमानदार व्यक्ति होने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। सभी बातों में, यह जाँच लो कि क्या तुम्हारा बोलना सटीक है, क्या तुम्हारा इरादा धोखा देने का होता है, और क्या तुम दूसरों के साथ सच्चे हो;

(5) लोगों और घटनाओं को परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में देखने के लिए खुद को प्रशिक्षित करो, और झूठे अगुवाओं, मसीह-विरोधियों, और अविश्वासियों को पहचानना सीखो। तुम्हें केवल परमेश्वर की आस रखनी चाहिए और मसीह का अनुसरण करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जीवन-प्रवेश क्या है? जीवन-प्रवेश किसी व्यक्ति के जीवन में, उनकी क्रियाओं में, उनके जीवन की दिशा में, और उनकी तलाश के लक्ष्य में हुआ एक परिवर्तन है। अतीत में मूर्ख और अज्ञानी रहने, और हमेशा देहचेतना के विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार काम करने, के बाद एक व्यक्ति अब परमेश्वर के प्रकटनों, सींचन और प्रावधान के माध्यम से, इस समझ को हासिल कर सकता है कि उसे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, ऐसा व्यक्ति दैनिक जीवन में, अपने दृष्टिकोणों और स्वयं को संचालित करने की शैली में, और जीवन में अपनी दिशा और लक्ष्यों के बारे में, परमेश्वर के वचनों के आधार पर एक परिवर्तन से गुज़रता है। यही जीवन-प्रवेश है। जीवन में प्रविष्ठि का आधार क्या होता है? (परमेश्वर के वचन।) यह मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों से और सत्य से संबंधित होता है। जीवन-प्रवेश परमेश्वर के वचनों से अविभाज्य होता है; यह सत्य से अविभाज्य होता है। जिन्होंने जीवन-प्रवेश हासिल कर लिया है, उन लोगों में क्या प्रकट होता है? वे जीने के लिए परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करने में सक्षम होते हैं; उनकी क्रियाएँ, उनका बोलना, समस्याओं के बारे में उनके विचार, दृष्टिकोण, रवैये, और परिप्रेक्ष्य, ये सभी परमेश्वर के वचनों और सत्य पर भरोसा करते हैं। ये जीवन-प्रवेश हासिल कर चुकने की अभिव्यक्तियाँ हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

जीवन में तुम्हारे प्रवेश में, कम से कम तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए तड़पनाचाहिए, तुम्हें सच्चाई में और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उद्देश्यों में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। जब तुम्हारे पास यह शक्ति होती है, तो इससे पता चलता है कि परमेश्वर तुम्हारा स्पर्श कर चुका है और तुम्हारा दिल परमेश्वर उन्मुख होना शुरू हो चुका है।

जीवन में प्रवेश का पहला कदम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में अपना मन लगाना है और दूसरा कदम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करना है। वह क्या प्रभाव है, जो पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करने से मिलना है? यह है एक गहरे सत्य के लिए तड़प, खोज और अन्वेषण करना और सकारात्मक तरीके से परमेश्वर के साथ सहयोग के लिए सक्षमहोना। आज तुम परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, जिसका अर्थ है कि तुम्हारी खोज, तुम्हारी प्रार्थनाओं और परमेश्वर के वचनों से तुम्हारे समागम का एक उद्देश्य है और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करते हो—केवल यही है परमेश्वर के साथ सहयोग करना। यदि तुम केवल परमेश्वर को कार्य करने देने की बात करते हो, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते, न प्रार्थना करते हो और न ही खोज, तो क्या इसे सहयोग कहा जा सकता है? यदि तुम्हारे भीतर सहयोग का अंश तक नहीं और प्रवेश के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण का अभाव है जिसका एक उद्देश्य हो, तो तुम सहयोग नहीं कर रहे हो। कुछ लोग कहते हैं: "सब कुछ परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण पर निर्भर करता है, यह सब स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है; अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया तो मनुष्य कैसे कर सकता था?" परमेश्वर का कार्य सामान्य है और ज़रा भी अलौकिक नहीं है और यह केवल तुम्हारी सक्रिय खोज के माध्यम से ही पवित्र आत्मा कार्य करती है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को मजबूर नहीं करता—तुम्हें परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देना चाहिए और यदि तुम अनुसरण या प्रवेश नहीं करते और अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी भी उत्कंठा नहीं है, तो परमेश्वर के लिए कार्य करने की कोई संभावना नहीं है। तुम किस मार्ग द्वारा परमेश्वर का स्पर्श हासिल करने की तलाश कर सकते हो? प्रार्थना के माध्यम से और परमेश्वर के करीब आकर। मगर याद रखो, सबसे महत्वपूर्ण बात है, यह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव पर खड़ा होना चाहिए। जब तुम परमेश्वर द्वारा अक्सर छू लिए जाते हो, तो तुम शरीर के गुलाम नहीं बनते: पति, पत्नी, बच्चे और धन—ये सब तुम्हें बेड़ियों में बांधने में असमर्थ रहते हैं और तुम केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के समक्ष जीना चाहते हो। इस समय, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

जीवन में प्रवेश पाने की तलाश करते समय, एक व्यक्ति को कौन-सी मुख्य बात समझनी चाहिए? वह बात है कि, परमेश्वर के कहे गए सारे वचनों में, चाहे वे किसी भी पहलू के विषय में हों, तुम्हें पता लगाना होगा कि लोगों के लिए उसकी अपेक्षाएँ और उसके मानक क्या हैं, और उनसे होकर, तुम्हें अभ्यास का एक मार्ग खोजना होगा। तुम्हें अपने आचरण और दृष्टिकोण की जांच करने के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए, और उनके सन्दर्भ में अपनी स्थितियों और अभिव्यक्तियों की भी जांच करनी चाहिए। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हें इन मानकों द्वारा यह निश्चित करना चाहिए कि तुम चीज़ों को कैसे करोगे, अपने कर्तव्यों को करते समय परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करोगे, और कैसे तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के बिलकुल अनुरूप चल सकते हो। एक ऐसे व्यक्ति बनो जिसके पास सत्य की वास्तविकता हो, ऐसे व्यक्ति नहीं जो स्वयं को केवल शब्दों, सिद्धांतों और धार्मिक मतों से लैस करता हो। आध्यात्मिकता का ढ़ोंग न करो; एक नकली आध्यात्मिक व्यक्ति न बनो। तुम्हें अभ्यास करने पर, और अपनी स्थितियों की तुलना और उन पर चिंतन करने के लिए परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल करने पर, ध्यान देना चाहिए, और तब तुम उस दृष्टिकोण और रवैये को बदल डालो जिससे तुम हर तरह की परिस्थिति में बर्ताव करते हो। अंततः, तुम हर परिस्थिति में परमेश्वर का आदर कर सकोगे, और तब तुम फिर कभी अपने ही विचारों का न तो अनुसरण करोगे न उसके अनुसार उतावलेपन से काम न करोगे, अपनी ही इच्छाओं के अनुसार चीज़ों को न करोगे, या एक भ्रष्ट स्वभाव के तहत न जिओगे। इसकी जगह, तुम्हारे सभी काम और तुम्हारे सभी शब्द परमेश्वर के कथनों पर आधारित होंगे और सत्य के अनुरूप होंगे; इस तरह, क्रमशः तुममें परमेश्वर के लिए सम्मान जागेगा। सत्य की तलाश करते समय एक परमेश्वर-भीरु हृदय उत्पन्न होता है; यह संयम से नहीं आता। संयम से सिर्फ़ एक तरह का आचरण पैदा होता है, जो कि एक प्रकार का बाहरी अवरोध है। परमेश्वर के लिए एक सच्चा आदर तब आता है—परमेश्वर में विश्वास करने के दौरान—जब हम सच्चाई के अनुसार अभ्यास करें, क्रमशः अपने भ्रष्ट स्वभाव को कम करें और अपनी स्थितियों को धीरे-धीरे सुधारें ताकि हम परमेश्वर के सामने अक्सर आ सकें; यही वह प्रक्रिया है जिससे सच्चा आदर उत्पन्न होता है। जब वह होता है तब तुम जान पाओगे कि परमेश्वर का आदर करने का क्या अर्थ है और यह कैसा महसूस होता है, और तब तुम जानोगे कि कैसा रवैया, कैसी मनःस्थिति और कैसा स्वभाव लोगों के पास होना चाहिए, इसके पहले कि वे वास्तव में परमेश्वर-भीरु हो सकें और परमेश्वर के प्रति आदर दिखा सकें।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

जीवन का अनुसरण करने में, तुम्‍हें दो बातों पर ज़रूर ध्‍यान देना चाहिए : पहली, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर स्‍वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्‍वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्‍वर के वचनों के भीतर सत्य को नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? संसार की सारी पुस्तकें दुष्ट शैतान के सिद्धांतों से संकलित की गई हैं, नहीं क्या? उनमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है! परमेश्‍वर के वचनों में सत्य को समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है परमेश्‍वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, उसके वचनों के भीतर सत्य के सभी पहलुओं को समझना, जैसे स्‍वयं अपनी सच्ची समझ और परमेश्‍वर के वचनों के भीतर मानवता के अस्तित्‍व के अर्थ खोजना। समस्‍त सत्य परमेश्‍वर के वचनों के भीतर है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जबतक कि प्रवेश परमेश्‍वर के वचनों के ज़रिए न किया जाए। वह मुख्‍य परिणाम जो तुम्हें प्राप्त करना है, यह जानना है कि परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और ज्ञान से युक्त होना क्‍या होता है। परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ के साथ, तुम फिर सत्य को समझ सकते हो। यह सबसे बुनियादी बात है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

जीवन प्रवेश की तलाश करते हुए, एक व्यक्ति को रोज़मर्रा के जीवन के हर मामले में अपने शब्दों, कर्मों, सोच और विचारों की जांच करनी चाहिए। उसे अपनी अवस्थाओं को समझना चाहिए, और फिर सत्य से उनकी तुलना करनी चाहिए, सत्य की तलाश करनी चाहिए, और जिस सत्य को समझा है उसकी वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए। सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने की प्रक्रिया के दौरान, एक व्यक्ति को अपनी अवस्थाओं को समझना चाहिए, और परमेश्वर के सामने प्रार्थना और विनती करने के लिए अक्सर आना चाहिए। उसे खुले दिल से दूसरे भाइयों और बहनों के साथ अक्सर सहभागिता भी करनी चाहिए, सत्य की वास्तविकता के प्रवेश मार्ग की खोज करनी चाहिए, और सत्य के सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए। अंततः, उसे पता चलेगा कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कौन-कौन से स्वभाव वह प्रकट करता है, परमेश्वर को उनसे खुशी मिलती है या नहीं, उसके अभ्यास का रास्ता सही है या नहीं, उसने आत्म-परीक्षण के माध्यम से स्वयं के भीतर पाई गई अवस्थाओं की तुलना परमेश्वर के वचनों के साथ की है या नहीं, इनकी सही-सही जाँच की गई है या नहीं, वे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं या नहीं, और उसने सच में कोई उपलब्धि हासिल की है या नहीं और उन अवस्थाओं में वास्तव में प्रवेश प्राप्त किया है या नहीं जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं। जब तुम इन अवस्थाओं में, इन स्थितियों में अक्सर रहोगे, तो धीरे-धीरे, तुम्हें कुछ सत्यों और तुम्हारी वास्तविक अवस्थाओं की बुनियादी समझ हासिल हो जाएगी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है' से उद्धृत

परमेश्वर में अपनी आस्था में विकास प्राप्त करने की मुख्य कुँजी है यह जानना कि परमेश्वर तुम्हारे अनुभव में क्या कार्य करता है, परमेश्वर की मनोहरता का अवलोकन करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की सारी व्यवस्थाओं को मान लो, परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर गढ़ लो ताकि वे तुम्हारा जीवन बन जाएँ और फलस्वरूप परमेश्वर को संतुष्ट करें। अगर तुम्हारी आस्था मूर्खतापूर्ण आस्था है, अगर तुम आध्यात्मिक बातों और अपने जीवन-स्वभाव में आए बदलावों पर कोई ध्यान नहीं देते, अगर तुम सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते, तो क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ पाओगे? अगर तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर क्या चाहता है, तो तुम अनुभव करने के नाकाबिल होगे, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। जब तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करो, तो तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे तुम्हारे अंदर क्या प्रभाव पैदा कर रहे हैं, ताकि तुम परमेश्वर को उसके वचनों से जान सको। अगर तुम मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि उनका अनुभव कैसे करना है, तो क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि तुम आध्यात्मिक मामलों से अनजान हो? इस समय, अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर पाने में असमर्थ हैं और इस तरह वे परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। क्या यह उनका अपने अभ्यास में विफल होना नहीं है? अगर वे ऐसे ही करते रहे, तो वे किस मुकाम पर जाकर चीज़ों को उनकी पूर्णता में अनुभव कर पाने में सक्षम होंगे और अपने जीवन में विकास प्राप्त कर पाएँगे। क्या यह महज़ खोखली बातें करना नहीं है? तुम लोगों में से बहुत लोग ऐसे हैं जो सिद्धांत पर ध्यान देते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक मामलों का कोई ज्ञान नहीं है, और फिर भी वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनका कोई बड़ा इस्तेमाल करे और उन्हें आशीष दे। यह एकदम अवास्तविक बात है! इस तरह, तुम लोगों को इस नाकामी का अंत करना चाहिए, ताकि तुम सब अपने आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग में प्रवेश कर सको, वास्तविक अनुभव ले सको और सचमुच परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें' से उद्धृत

तुम सभी लोग अपने जीवन में विकसित होने और परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने को तैयार हो, तो क्या तुमने अपने सतही तरीकों से छुटकारा पा लिया है? यदि तुम केवल सतही तरीकों से छुटकारा पा लेते हो और विघटनकारी तथा बड़बोलेपन के व्यवहार से दूर रहते हो, तो क्या यह वास्तव में अपने जीवन में विकसित होने का प्रयास करना है? यदि तुम सतही तरीकों से छुटकारा पा लेते हो, लेकिन परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं करते, तो इसका मतलब है कि तुम सक्रिय रूप से प्रगति नहीं कर रहे। सतही व्यवहार का मूल कारण क्या है? क्या तुम्हारे क्रिया-कलाप अपने जीवन में विकसित होने के लिए हैं? क्या तुम परमेश्वर के लोगों की तरह जीने की कोशिश कर रहे हो? जिस चीज़ पर भी तुम ध्यान केंद्रित करोगे, तुम उसी को जिओगे; यदि तुम सतही तरीकों पर ध्यान केंद्रित करोगे, तो तुम्हारा हृदय अकसर बाहर फेंक दिया जाएगा और तुम्हारे पास अपने जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करने का कोई उपाय नहीं होगा। परमेश्वर स्वभाव में बदलाव की अपेक्षा रखता है, लेकिन तुम हमेशा बाहरी चीजों का अनुसरण करते हो; इस प्रकार का व्यक्ति अपने स्वभाव को बदलने में असमर्थ होता है! जीवन में परिपक्व होने की प्रक्रिया में सभी को एक मार्ग पर चलना चाहिए : उन्हें परमेश्वर के वचनों का न्याय, ताड़ना और पूर्ण किया जाना स्वीकार करना चाहिए। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन नहीं हैं, बल्कि तुम केवल अपने आत्मविश्वास और इच्छा पर भरोसा करते हो, तो तुम जो कुछ भी करते हो, वह सिर्फ उत्साह पर आधारित होता है। अर्थात् यदि तुम अपने जीवन में विकास चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को और अधिक खाना-पीना और समझना चाहिए। जो लोग उसके वचनों द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, वे उन्हें जीने में सक्षम होते हैं; जो लोग उसके वचनों के शुद्धिकरण से नहीं गुज़रते, जो लोग उसके वचनों के न्याय से नहीं गुज़रते, वे उसके उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। तो तुम लोग किस स्तर तक उसके वचनों को जीते हो? यदि तुम लोग परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो और अपनी स्थिति के साथ उनकी तुलना करने में सक्षम हो, और मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रकाश में अभ्यास का मार्ग पाते हो, केवल तभी तुम्हारा अभ्यास सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगा। केवल इस प्रकार के अभ्यास वाले व्यक्ति में ही परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी सामान्य मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

जीवन की खोज कोई जल्दबाजी की चीज़ नहीं है; जीवन में विकास एक या दो दिन में नहीं आता। परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है और इसे एक आवश्यक प्रक्रिया से गुजरना होता है। देहधारी यीशु को क्रूस पर अपने कार्य को समाप्त करने में तेंतीस वर्ष और छः माह लगे, तो मनुष्य को शुद्ध करने और उसका जीवन रूपांतरित करने की बात करना कितना सटीक होगा, जो कि अतिशय मुश्किल कार्य है? एक सामान्य व्यक्ति बनाना, जो परमेश्वर को अभिव्यक्त करता हो, आसान काम नहीं है। यह विशेष रूप से बड़े लाल अजगर के देश में जन्मे लोगों के लिए और भी कठिन है, जिनकी क्षमता कम है, जिन्हें लंबे समय से परमेश्वर के वचन और कार्य की आवश्यकता है। इसलिए परिणाम पाने के लिए जल्दबाजी न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिये तुम्हें पहले से ही सक्रिय होना होगा और परमेश्वर के वचनों पर अधिक से अधिक परिश्रम करना होगा। उसके वचनों को पढ़ने के बाद, तुम्हें इस योग्य हो जाना चाहिए कि तुम वास्तव में उन पर अमल करो, परमेश्वर के वचनों में ज्ञान, अंर्तदृष्टि, परख और बुद्धि को विकसित करते हुए। और इसके द्वारा तुम बदल जाओगे और तुम्हें महसूस भी नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और पढ़ने का सिद्धांत बना लो, उसे जानने लगो, अनुभव करने लगो, अमल में लाने लगो तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम परिपक्वता हासिल कर लोगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद भी उस पर अमल नहीं कर पाते! तुम किस जल्दबाजी में हो? जब तुम एक निश्चित स्थिति तक पहुंच जाओगे तो तुम परमेश्वर के वचन पर अमल करने योग्य बन जाओगे। क्या चार या पांच वर्ष का बालक कहेगा कि वह अपने माता-पिता का सहयोग या आदर करने में असमर्थ है? तुम्हें जान लेना चाहिए कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति क्या है, तुम जिनपर अमल कर सकते हो, अमल करो और परमेश्वर के प्रबंधन को बिगाड़ने वाले मत बनो। केवल परमेश्वर के वचनों को खाओ-पीओ और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना सिद्धांत बना लो। इस समय इस बारे में चिन्ता मत करो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कर सकता है या नहीं। अभी इस विषय में सोच-विचार मत करो। परमेश्वर के वचन जब तुम्हारे सामने आएँ तो केवल उन्हें खाओ-पीओ, परमेश्वर निश्चित ही तुम्हें पूरा करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का एक नियम है। आँखें मूंद करके यह न करो, बल्कि एक ओर उन शब्दों को खोजो जिन्हें तुम्हें जानना चाहिए, अर्थात उन्हें जिनका संबंध दर्शन से है, और दूसरी ओर उसे खोजो जिस पर वास्तव में तुम्हें अमल करना चाहिए, अर्थात, जिसमें तुम्हें प्रवेश करना चाहिए। एक पहलू ज्ञान का है और दूसरा उसमें प्रवेश करने का। जब तुम इन दोनों को पा लेते हो, अर्थात जब तुम उसे समझ लेते हो जिसे तुम्हें जानना चाहिए और जिस पर अमल करना चाहिए, तब तुम सीख लोगे कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाया और पिया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

जीवन प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु कौनसा है? अपने कर्तव्य पर डटे रहो—यह सबसे पहली बात है। यह सब अपने कर्तव्य के निर्वाह से ही शुरू होता है। तुम्हारा जीवन प्रवेश तुम्हारे कर्तव्य निर्वाह से शुरू होता है, और जीवन प्रवेश के माध्यम से तुम थोड़ा-थोड़ा करके सत्य को समझने लगते हो, और सत्य को प्राप्त करने लगते हो। तुम्हारी एक कद-काठी बनने लगती है, तुम्हारा जीवन धीरे-धीरे विकास करने लगता है, तुम्हें सत्य के सच्चे अनुभव होने लगते हैं, और इसके बाद तुम अभ्यास के विभिन्न सिद्धांतों को समझने लगते हो, और कोई भी व्यक्ति, चीज या विषय तुम्हें बाधित या परेशान नहीं कर सकता; इस तरह, तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के सम्मुख जीने लगते हो। अगर तुम किसी भी व्यक्ति, चीज या मामले से परेशान महसूस नहीं करते हो, और सत्य का अनुभव कर पाते हो, तो तुम्हारे अनुभव समृद्ध होने लगते हैं, और तुम परमेश्वर को गवाही देने में ज्यादा सक्षम हो जाते हो। जब तुम परमेश्वर को गवाही देने में ज्यादा सक्षम हो जाते हो, तो तुम धीरे-धीरे ज्यादा उपयोगी होते चले जाओगे; जब तुम ज्यादा उपयोगी हो जाओगे तो परमेश्वर के घर में तुम्हारा एक स्थान होगा, तुम मजबूती से खड़े होगे, और तुम एक भले व्यक्ति, एक सच्चे व्यक्ति बन जाओगे। तब तुम उस सबके योग्य पात्र होगे जो परमेश्वर तुम्हें प्रदान करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की क्या कुंजी है? क्या हमेशा अपनी खुद की इच्छा व्यक्त करने, शपथें खाने और प्रतिज्ञाएँ करने का कोई लाभ है? यह सब यथार्थ से परे है। इस समय, सबसे व्यवहारिक मुद्दा अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये और इसके निर्वाह के माध्यम से जीवन प्रवेश प्राप्त करना है। जीवन प्रवेश प्राप्त करने को व्यक्त करने का दूसरा तरीका क्या है? सत्य को अनुभव करना। इसी रास्ते से जीवन प्रवेश प्राप्त किया जाता है। क्या तुम लोगों ने यह जीवन प्रवेश प्राप्त कर लिया है? क्या तुम परमेश्वर को गवाही देने में सक्षम हो? (नहीं।) क्या तुम्हारे साथ यह मामला है कि तुम अब भी ज्यादातर धर्म-सिद्धांत से ही चिपके हुए हो, और तुम्हें सत्य का कोई सच्चा ज्ञान या अनुभव नहीं है? अगर तुम सत्य को सचमुच जानने और अनुभव करने में सक्षम नहीं हो, तो तुम परमेश्वर की गवाही देने में भी सक्षम नहीं हो पाओगे। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान अधिकांश समय अवधारणा पर आधारित होता है : तुम यह महसूस करते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं, और तुम तथास्तु कहकर सहमत हो जाते हो—पर तुम इन बातों को अपने ऊपर लागू नहीं कर पाते, और कुछ करते हुए तुम अब भी भ्रमित हो जाते हो, और यह नहीं जानते कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए तुम्हें कौनसे सत्य का प्रयोग करना चाहिए। क्या तुम लोग ज्यादातर इसी अवस्था में नहीं रहते हो? तुम काफी कुछ समझते हो, और तुमने काफी कुछ ग्रहण किया है, परंतु क्या तुम इन बातों को अभ्यास में लाए हो या तुमने इन्हें लागू किया है? जब तुम लोग सत्यों को अभ्यास में लाते हो और उन्हें अनुभव करते हो, तो तुम उन्हें समझने लगते हो, तुम्हारे जीवन का विकास होने लगता है; यही मापदंड है, यही कसौटी है। और एक दिन, जब तुम सत्य के एक पहलू की समझ प्राप्त कर लेते हो, और तुम इसमें से कुछ समझ से परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के स्वभाव की, और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान की गवाही देने में सक्षम हो जाते हो, तो ऐसे अवसर पर तुम परमेश्वर के गवाह बन जाते हो। अगर तुम बहुत कुछ समझते हो और तुम घंटों तक धर्म-सिद्धांत पर प्रवचन दे सकते हो, लेकिन तुम खुद अपनी समस्याओं को सुलझाने में असमर्थ हो, और यह भी नहीं जानते कि उन्हें सुलझाया कैसे जाए, तो तुम आखिर क्या समझते हो? (शब्द और धर्म-सिद्धांत।) इसमें से कुछ सिर्फ शब्द या सिद्धांत नहीं हैं। अधिकांश अवधारणात्मक ज्ञान है : तुम यह महसूस करते हो कि ये शब्द सही हैं, तुम दूसरे लोगों के कथनों से सहमति महसूस करते हो, पर तुम यह नहीं जानते कि इसे कैसे अनुभव किया जाए या इन चीजों को अपने ऊपर कैसे लागू किया जाए—यही अवधारणात्मक ज्ञान है। इस समस्या को कैसे सुलझाया जा सकता है? तुम्हें अपने कर्तव्य की तरफ लौटना होगा। अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए उन विभिन्न प्रकार की भ्रष्टताओं और अपनी खुद की उन विभिन्न अवस्थाओं की एक-एक करके जांच करो जो इस कर्तव्य के निर्वाह के दौरान उजागर होती हैं, और इन्हें समझने की कोशिश करो। इसके बाद हर कमी को एक-एक करके दूर करने की कोशिश करो। तुम्हें इस दौरान उजागर हुईं अपनी विभिन्न अवस्थाओं को समझना होगा—तुम्हारी आत्म-तुष्टता, धूर्तता, जिस तरह से तुम किसी बात को छिपा लेते हो, या तुम जैसा बेपरवाह और कामचलाऊ रवैया अपनाते हो—और इन अवस्थाओं के माध्यम से तुम्हें अपने खुद के भ्रष्ट स्वभाव को समझना होगा। क्या तुम्हें यह पता होगा कि अपने भ्रष्ट स्वभाव की पहचान कर लेने के बाद तुम्हें क्या करना है? उदाहरण के लिए, तुम क्या करोगे अगर किसी खास मामले में तुम्हारे सामने यह उजागर हो जाए कि तुम स्वार्थी हो और सिर्फ अपनी खुद की प्रतिष्ठा के बारे में सोचते हो? तुम्हें सबसे पहले प्रतिष्ठा से जुड़े सारे विचारों को एक तरफ झटक देना होगा : "अगर मैंने ऐसा कहा, यह मेरी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए होगा। ऐसा कहने के पीछे कोई मकसद होगा, यह स्वार्थ और नीचता दिखाना हुआ। यह मेरा भ्रष्ट स्वभाव है। मुझे ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। मुझे अपने-आपको खुले तौर पर दिखाना चाहिए, अपना असली रंग दिखाना चाहिए, जो मेरे दिल में है, वही बोलना चाहिए। मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आती है तो आए, मैं इसे बचाने की कोशिश नहीं करूंगा, मैं अपने दंभ को संतुष्ट नहीं करूंगा।" और इस तरह, अपने अहं को त्यागते हुए और अपने अंतर्तम विचारों को अपने मुख से व्यक्त करते हुए, तुम एक तरफ ईमानदार बन जाते हो, वहीं दूसरी तरफ तुम अपने खुद के विचारों के अनुसार व्यवहार करना और अपनी खुद की प्रतिष्ठा के बारे में सोचना छोड़ देते हो। तुम सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो जाते हो, और अपने कर्तव्य का बेहतर ढंग से निर्वाह करते हो, और तुम अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी लेने में भी सक्षम हो जाते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा भले ही खो दो, पर तुम परमेश्वर के घर और सत्य के हितों की रक्षा करने में सफल हो जाते हो। इसी तरह से जीना न्यायोचित और धार्मिक है, और लोगों और परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने के योग्य है। यह अद्भुत है! इस तरह से अभ्यास करना भले ही थोड़ा कठिन हो, लेकिन अगर तुम्हारे प्रयास और तुम्हारा अभ्यास इसी दिशा में उन्मुख है, तो भले ही दो-तीन बार तुम विफल हो जाओ, पर शायद अपने पांचवें प्रयास में तुम सफल रहोगे। और सफलता का तुम्हारे लिए क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम वह कदम उठाने में सक्षम हो जाते हो जो तुम्हें शैतान के बंधनों से मुक्त करता है, एक ऐसा कदम जो तुम्हें अपने अहं का त्याग करने, अपने मिथ्या अभिमान, प्रतिष्ठा और हितों को एक तरफ रखने, और स्वार्थ और नीचता की भावना से मुक्त होने का अवसर देता है। तो, इससे तुम क्या देखते हो? जब तुम ऐसा करते हो, तो तुम लोगों को यह दिखाते हो कि तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो, जो सत्य की कामना करता है, जो धार्मिकता और प्रकाश की कामना करता है। साथ ही, तुम शैतान को भी शर्मिंदा करते हो। शैतान ने तुम्हें भ्रष्ट किया, तुम्हें अपने लिए जीना सिखाया, तुम्हें स्वार्थी और सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा के बारे में सोचने वाला बनाया। लेकिन अब, ये शैतानी चीजें तुम्हें और नहीं बांध सकतीं, तुम उनके बंधनों से छूट चुके हो, तुम अब मिथ्या अभिमान, प्रतिष्ठा, या अपने निजी हितों से नियंत्रित नहीं हो, और तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और इसलिए शैतान पराजित हो चुका है। और जब शैतान पराजित हो चुका है तो क्या तुम विजयी नहीं हो गए? क्या तुम परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ता से नहीं खड़े हो? क्या तुम एक अच्छी लड़ाई नहीं लड़े हो? जब तुम एक अच्छी लड़ाई लड़ते हो तो तुम्हारे मन में शांति, आनंद और राहत की भावना होती है। जब लोग हमेशा एक दोषारोपण की भावना के साथ जीते हैं, जब उनके दिलों का कोई ठौर-ठिकाना नहीं होता, उनमें कोई आनंद या शांति की भावना नहीं होती, जब वे सभी तरह की चीजों से अक्सर उदास और खिन्न रहते हैं, तो इससे क्या पता चलता है? यह दर्शाता है कि लोग कभी-कभार ही सत्य का अभ्यास करते हैं, वे अक्सर सत्य से अपना मुंह मोड लेते हैं, और ऐसे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीते रहते हैं, जो स्वार्थपूर्ण और घिनौना होता है। यह दर्शाता है कि वे सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा, साख, रुतबे और हितों को देखते हैं, और उनके पास सत्य नहीं होता। इसलिए उनके कष्ट बहुत बड़े होते हैं, उनकी चिंताएँ बहुत ज्यादा होती हैं, और उनकी बेड़ियाँ अनगिनत होती हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज़ में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीज़ों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसका कोई मूल्य है या नहीं। तुम वे चीज़ें कर सकते हो जो अर्थपूर्ण हों, लेकिन तुम्हें वे चीज़ें नहीं करनी चाहिए जिनका कोई अर्थ न हो। जहाँ तक उन चीज़ों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीज़ों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें ज़ल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? बुरी या निरर्थक चीज़ें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिक्रियावादी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीज़ें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य की प्रकृति और सार द्वारा निश्चित किया जाता है। एक बार जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम्हारे पास उन चीजों को करने की शक्ति होगी, जो सत्य के अनुरूप हैं। तब यह सामान्य हो जाता है, यहाँ तक कि सहज और सुखद भी, और तुम महसूस करते हो कि कोई नकारात्मक चीज़ करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो और अगर तुम यह सत्य समझते हो कि किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए—किस तरह एक निष्कपट और सीधा-सादा व्यक्ति बनना चाहिए, एक ईमानदार व्यक्ति, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो—तो तुम फिर कभी परमेश्वर की अवहेलना करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें धोखा दे, या कोई दुष्ट तुम्हें उकसाए, तुम वो नहीं करोगे; कोई तुम्हारे साथ कितनी भी ज़बरदस्ती करे, तुम फिर भी वैसा नहीं करोगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से घृणा करने और नकारात्मक चीजों से आंतरिक विरक्ति महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके लिए बुराई करना मुश्किल होगा, क्योंकि उनके जीवन स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिया गया है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

लोग प्रायः परमेश्वर को ही अपना जीवन समझने की बात करते हैं, परंतु उनका अनुभव अभी उस बिंदु तक नहीं पहुंचा है। तुम बस कह भर रहे हो कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि वह प्रतिदिन तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, कि तुम प्रतिदिन उसके वचन खाते और पीते हो, और तुम प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हो, इसलिए वह तुम्हारा जीवन बन गया है। जो ऐसा कहते हैं, उनका ज्ञान बहुत उथला है। कई लोगों में कोई नींव ही नहीं होती; परमेश्वर के वचन उनमें बोए तो गए हैं, किंतु उन्हें अभी अंकुरित होना है, उन पर फल लगना तो और भी दूर की बात है। आज, तुमने किस सीमा तक अनुभव किया है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें यहाँ तक आने के लिए बाध्य करने के बाद ही, अब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ सकते। एक दिन, जब तुम्हारा अनुभव एक निश्चित बिंदु तक पहुँच गया होगा, तब यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़कर जाने के लिए कहे, तो तुम नहीं जा पाओगे। तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम अपने भीतर परमेश्वर के बिना हो ही नहीं सकते; तुम पति, पत्नी या बच्चों के बिना, परिवार के बिना, माता या पिता के बिना, देह के आनंदों के बिना हो सकते हो, परंतु तुम परमेश्वर के बिना नहीं हो सकते। परमेश्वर के बिना होना अपना जीवन खो देने जैसा होगा; तुम परमेश्वर के बिना नहीं जी पाओगे। जब तुम इस बिंदु तक अनुभव कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास का लक्ष्य पा लिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन गया होगा, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन गया होगा। तुम फिर कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे। जब तुम इस सीमा तक अनुभव कर लोगे, तब तुमने परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले लिया होगा, और जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा पर्याप्त निकट संबंध होगा, तब वह तुम्हारा जीवन, तुम्हारा प्रेम होगा, और उस समय तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, तू मेरा जीवन है, मैं अन्य हर चीज के बिना रह सकता हूँ—पर तेरे बिना मैं नहीं जी सकता।" यही लोगों की सच्ची कद-काठी है; यही वास्तविक जीवन है। कुछ लोग आज जितनी दूर आए हैं, वहाँ तक आने के लिए उन्हें बाध्य किया गया है : वे चाहें या न चाहें उन्हें चलते जाना है, और उन्हें हमेशा लगता है कि वे दो पाटों के बीच फँस गए हैं। तुम्हें ऐसा अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि यदि परमेश्वर को तुम्हारे हृदय से दूर ले जाया जाए, तो यह जीवन खो देने जैसा होगा; परमेश्वर अवश्य ही तुम्हारा जीवन होना चाहिए, और तुम्हें उसे छोड़ने में अवश्य ही असमर्थ होना चाहिए। इस तरह, तुमने वास्तव में परमेश्वर का अनुभव कर लिया होगा, और इस समय, जब तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तब तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करोगे, और यह एक विलक्षण, विशुद्ध प्रेम होगा। एक दिन, जब तुम्हारे अनुभव ऐसे होंगे कि तुम्हारा जीवन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच चुका होगा, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे, और परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तब तुम अंदर से परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, न ही तुम उसे चाहकर भी भूल पाओगे। परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन चुका होगा; तुम संसार को भूल सकते हो, तुम अपनी पत्नी, पति या बच्चों को भूल सकते हो, किंतु परमेश्वर को भूलने में तुम्हें कष्ट होगा—ऐसा करना असंभव होगा, यही तुम्हारा सच्चा जीवन और परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम है। जब परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तब किसी भी दूसरे के प्रति उनका प्रेम परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम के बराबर नहीं होता; परमेश्वर से उनका प्रेम सबसे पहले आता है। इस तरह तुम अन्य सब कुछ छोड़ पाते हो, और परमेश्वर से सारे व्यवहार और काट-छाँट स्वीकार करने के इच्छुक होते हो। जब तुमने परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम प्राप्त कर लिया जो अन्य सबसे बढ़कर हो, तब तुम वास्तविकता में और परमेश्वर के प्रेम में जिओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

पिछला: 19. परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध की सुरक्षा के सिद्धांत

अगला: 21. परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के सिद्धांत

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

Iसमझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग,सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के लिए...

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

Iपूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने,हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें