156. परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के अधिकार के प्रति समर्पण करो। परमेश्वर के वचन किसी भी माप-तौल से परे सर्वश्रेष्ठ हैं; वे सर्वोच्च निर्देश और सर्वोच्च आदेश हैं, और उनका पूर्णतः पालन करना चाहिए।

(2) मसीह के अधिकार के प्रति समर्पण करो, और उसके सभी वचनों और कार्यों को स्वीकार करो तथा उनके प्रति समर्पण करो। पुष्टि करो कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।

(3) पवित्र आत्मा के कार्य के अधिकार के प्रति समर्पण करो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन, प्रकाश और मार्गदर्शन से जो कुछ भी प्राप्त हो, उसे स्वीकार करो और उसके प्रति समर्पण करो। जो मनुष्य से आता है, उसे अस्वीकार करो।

(4) सभी मामलों में, सत्य के सिद्धांत की तलाश करो। इस बात की पुष्टि करो कि सत्य की कोई भी समझ परमेश्वर के वचनों पर आधारित होनी चाहिए, और सभी सच्चाइयों के प्रति समर्पित होने में सक्षम बनो। केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण होता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की। फिर उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिये पापबलि बना। अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है, जिसे वह आरंभ से करता रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी और समस्त सृष्टि पर अपने अधिकार को बहाल करेगा। मानवता ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद परमेश्वर के प्राणियों के साथ-साथ अपने धर्मभीरु हृदय भी गँवा दिए, जिससे वह परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण और अवज्ञाकारी हो गया। तब मानवता शैतान के अधिकार क्षेत्र में रही और शैतान के आदेशों का पालन किया; इस प्रकार, अपने प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीक़ा नहीं था और वह अपने प्राणियों से भयपूर्ण श्रद्धा पाने में असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में बस गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मानवता के सृजन के पीछे का अर्थ खो दिया। इसलिए मानवता के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवता को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंत में, अपने राज्य को बहाल कर सकता है। अवज्ञा करने वाले उन पुत्रों का अंतिम तौर पर विनाश भी क्रियान्वित किया जाएगा, ताकि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं के विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है, वह है, जो उसकी आराधना करेगी, जो उसे पूरी तरह समर्पण करेगी और उसकी महिमा का प्रदर्शन करेगी। यदि परमेश्वर भ्रष्ट मानवता को नहीं बचाता, तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर उन शत्रुओं का नाश नहीं करता, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना भी नहीं कर पाएगा। ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के प्रतीक होंगे : मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा, और जब वे अपने-अपने कर्तव्य निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं को समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में विश्वास रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसका आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो यह मायने नहीं रखता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसका आज्ञापालन किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और गैर-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे लोग होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के शत्रु और मसीह विरोधी हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, ऐसे व्यक्ति में कभी भी समर्पण का कोई भाव नहीं होता, न ही उसने कभी खुशी से समर्पण किया होता है या दीनता का भाव दिखाया है। ऐसे लोग दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाते हैं और कभी किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर के सामने, ये लोग वचनों का उपदेश देने में स्वयं को सबसे ज़्यादा निपुण समझते हैं और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझते हैं। इनके कब्ज़े में जो "खज़ाना" होता है, ये लोग उसे कभी नहीं छोड़ते, दूसरों को इसके बारे में उपदेश देने के लिए, अपने परिवार की पूजे जाने योग्य विरासत समझते हैं, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए इनका उपयोग करते हैं जो उनकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में इस तरह के कुछ ऐसे लोग हैं। ये कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल-दर-साल और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अलंघनीय" कर्तव्य को पूरी प्रबलता से लागू करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाता। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बनकर युगों-युगों तक बेकाबू होकर दूसरों पर अत्याचार करते चले आ रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करने और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीती-जागती दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने कैसे अस्तित्व में बने रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी थोड़ा-बहुत ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उन्हें ग्रहण करने की आशा और भी कम नहीं है? विजय-कार्य करने का मेरा उद्देश्य केवल विजय के वास्ते विजय प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य धार्मिकता और अधार्मिकता को प्रकट करना, मनुष्य के दण्ड के लिए प्रमाण प्राप्त करना, दुष्ट को दंडित करना, और उन लोगों को पूर्ण बनाना है जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं। अंत में, सभी को उनके प्रकार के अनुसार पृथक किया जाएगा, और जिन लोगों के सोच-विचार से भरे होते आज्ञाकारिता हैं, अंतत: उन्हें ही पूर्ण बनाया जाएगा। यही काम अंतत: संपन्न किया जाएगा। इस दौरान, जिन लोगों का हर काम विद्रोह से भरा है उन्हें दण्डित किया जाएगा, और आग में जलने के लिए भेज दिया जाएगा जहाँ वे अनंतकाल तक शाप के भागी होंगे। जब वह समय आएगा, तो बीते युगों के वे "महान और अदम्य नायक" सबसे नीच और परित्यक्त "कमज़ोर और नपुंसक कायर" बन जाएँगे। केवल यही परमेश्वर की धार्मिकता के हर पहलू और उसके उस स्वभाव को प्रकट कर सकता है जिसका मनुष्य द्वारा अपमान नहीं किया जा सकता, मात्र यही मेरे हृदय की नफ़रत को शांत कर सकता है। क्या तुम लोगों को यह पूरी तरह तर्कपूर्ण नहीं लगता?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर के देह में होने के दौरान, जिस आज्ञाकारिता की वह लोगों से अपेक्षा करता है, उसमें आलोचना से बचना या विरोध न करना शामिल नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं—इसके बजाय, वह अपेक्षा करता है कि लोग उसके वचनों को अपने जीवन का सिद्धांत और अपने जीवन की नींव बना लें, कि वे उसके वचनों के सार को पूरी तरह से अभ्यास में ले आएँ, और कि वे पूरी तरह से उसकी इच्छा को संतुष्ट करें। देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने की लोगों से अपेक्षा करने का एक पहलू उसके वचनों को अभ्यास में लाने को संदर्भित करता है, और दूसरा पहलू उसकी सादगी और व्यावहारिकता का पालन करने में सक्षम होने को संदर्भित करता है। ये दोनों पूर्ण होने चाहिए। जो लोग इन दोनों पहलुओं को प्राप्त कर सकते हैं, वे ही हैं, जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम है। ये सभी वे लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, और वे सभी परमेश्वर से उतना ही प्यार करते हैं जितना वे अपने जीवन से करते हैं। देहधारी परमेश्वर अपने कार्य में सामान्य और व्यावहारिक मानवता दिखाता है। इस तरह, उसकी सामान्य और व्यावहारिक मानवता, दोनों का बाह्य आवरण लोगों के लिए एक बड़ा परीक्षण बन जाता है; यह उनकी सबसे बड़ी कठिनाई बन जाता है। हालाँकि, परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से बचा नहीं जा सकता है। उसने समाधान खोजने के लिए हर प्रयास किया, लेकिन अंत में वह स्वयं को अपनी सामान्य मानवता के बाहरी आवरण से छुटकारा नहीं दिला सका। यह इसलिए था, क्योंकि अंततः, वह परमेश्वर है जो देह बन गया है, न कि स्वर्ग में आत्मा का परमेश्वर। वह ऐसा परमेश्वर नहीं है, जिसे लोग देख न सकें, बल्कि ऐसा परमेश्वर है, जिसने सृष्टि के एक सदस्य का आवरण पहना है। इस प्रकार, उसे अपने आप को अपनी सामान्य मानवता के आवरण से छुड़ाना किसी भी तरह से आसान नहीं होगा। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह अभी भी उस कार्य को करता है जो वह देह के परिप्रेक्ष्य से करना चाहता है। यह कार्य सामान्य और व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, तो लोगों का इसका पालन न करना कैसे ठीक हो सकता है? परमेश्वर के कार्यों के बारे में लोग आख़िर क्या कर सकते हैं? वह जो भी करना चाहता है, वह करता है; जिससे वह खुश होता है, वह वैसा ही है जैसा वह चाहता है। यदि लोग आज्ञापालन नहीं करते हैं, तो उनके पास और कौनसी ठोस योजनाएँ हो सकती हैं? अभी तक, यह सिर्फ आज्ञाकारिता ही है जो लोगों को बचा सकी है; किसी के पास कोई अन्य बुद्धिमत्तापूर्ण विचार नहीं हैं। यदि परमेश्वर लोगों की परीक्षा लेना चाहता है, तो वे इसके बारे में क्या कर सकते हैं? लेकिन यह सब स्वर्ग के परमेश्वर द्वारा नहीं सोचा गया है; यह देहधारी परमेश्वर द्वारा सोचा गया है। वह ऐसा करना चाहता है, तो कोई भी व्यक्ति इसे बदल नहीं सकता है। देहधारी परमेश्वर जो कुछ करता है, उसमें स्वर्ग का परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता है, तो क्या यह लोगों को उसकी आज्ञा का और अधिक पालन करने का कारण नहीं होना चाहिए? यद्यपि वह व्यावहारिक और सामान्य दोनों है, किंतु वह पूरी तरह से देहधारण किया परमेश्वर है। उसके अपने स्वयं के विचारों के आधार पर, वह जो चाहता है वही करता है। स्वर्ग के परमेश्वर ने उसे सभी कार्य सौंप दिए हैं; वह जो भी करता है तुम्हें उसका पालन करना चाहिए। यद्यपि उसमें मानवता है और वह बहुत सामान्य है, उसने यह सब जान-बूझकर व्यवस्थित किया है, तो लोग उसे कैसे अस्वीकृति के साथ पूरी आँखें खोल कर देख सकते हैं? वह सामान्य होना चाहता है, तो वह सामान्य है। वह मानवता के भीतर रहना चाहता है, तो वह मानवता के भीतर रहता है। वह दिव्यता के भीतर रहना चाहता है, तो वह दिव्यता में रहता है। लोग इसे जैसा चाहें वैसा देख सकते हैं, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा और मनुष्य हमेशा मनुष्य रहेंगे। कुछ मामूली गौण बातों की वजह से उसके सार को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, न ही उसे एक छोटी सी चीज़ के कारण परमेश्वर के "व्यक्ति" के बाहर धकेला जा सकता है। लोगों के पास मानवजाति की आज़ादी है, और परमेश्वर के पास परमेश्वर की गरिमा है; ये एक दूसरे के साथ हस्तक्षेप नहीं करते हैं। क्या लोग परमेश्वर को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता नहीं दे सकते हैं? क्या वे परमेश्वर का थोड़ा अधिक लापरवाह होना सहन नहीं कर सकते हैं? परमेश्वर के साथ इतना कठोर मत बनो! हर किसी में एक-दूसरे के लिए सहिष्णुता होनी चाहिए; तब क्या हर चीज़ का समाधान नहीं हो जाएगा? क्या तब भी कोई मनमुटाव रह जायेगा? यदि कोई इतनी छोटी सी बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता है, तो वह ऐसा कैसे कह सकता है कि "प्रधानमंत्री का दिल इतना बड़ा है कि उसमें नाव तैर सकती है"? वह एक सच्चा आदमी कैसे हो सकता है? यह परमेश्वर नहीं है जो मानवजाति के लिए कठिनाइयों का कारण है, बल्कि मानवजाति ही परमेश्वर को कठिनाई देती है। वे हमेशा राई का पहाड़ बनाकर चीजों को नियंत्रित करते हैं—वे वास्तव में शून्य में से कुछ न कुछ चीजें बना लेते हैं, और यह बहुत अनावश्यक है! जब परमेश्वर सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर कार्य करता है, तो वह जो करता है वह मानवजाति का कार्य नहीं होता है, बल्कि परमेश्वर का कार्य होता है। तथापि, लोगों को उसके कार्य का सार दिखाई नहीं देता है—वे हमेशा उसके मानवता के बाहरी आवरण को देखते हैं। उन्होंने इतना बड़ा कार्य नहीं देखा है, और फिर भी वे परमेश्वर की साधारण और सामान्य मानवता को देखने पर जोर देते हैं और वे इसे छोड़ेंगे नहीं। इसे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना कैसे कहा जा सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर अब पृथ्वी के "परमेश्वर" में बदल गया है, और पृथ्वी का परमेश्वर अब स्वर्ग में परमेश्वर है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता यदि उनके बाह्य रूप-रंग एक से हैं या वे ठीक किस तरह से काम करते है। अंत में, वह जो परमेश्वर का कार्य करता है, वह स्वयं परमेश्वर है। तुम्हें आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए, चाहे तुम करना चाहो या नहीं—यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें तुम्हारे पास कोई विकल्प हो! लोगों द्वारा परमेश्वर की आज्ञा का पालन अवश्य किया जाना चाहिए, और लोगों को जरा सा भी ढोंग किए बिना परमेश्वर की आज्ञा का पूर्णतः पालन अवश्य करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण असली और सही अर्थों में वास्तविक होना चाहिए। सतही तौर पर समर्पण करके परमेश्वर की प्रशंसा नहीं पायी जा सकती, अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास किए बिना परमेश्वर के वचन के मात्र सतही पहलू का पालन करके परमेश्वर के हृदय को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक ही बात है। जो लोग केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते, उन्हें आज्ञाकारी नहीं माना जा सकता, और उन्हें तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता जो सचमुच समर्पण न करके, सतही तौर पर चापलूस होते हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे सभी कार्य से लाभ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य की समझ प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। ऐसे लोग नए कार्य से नया ज्ञान प्राप्त करते हैं और नए कार्य से उनमें बदलाव आता है। ऐसे लोग ही परमेश्वर की प्रशंसा पाते हैं, पूर्ण बनते हैं, और उनके स्वभाव का रूपांतरण होता है। जो लोग खुशी से परमेश्वर के प्रति, उसके वचन और कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, वही परमेश्वर की प्रशंसा पाते हैं। ऐसे लोग ही सही मार्ग पर हैं; ऐसे लोग ही ईमानदारी से परमेश्वर की कामना करते हैं और ईमानदारी से परमेश्वर की खोज करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर की आज्ञापालन की कुंजी नए प्रकाश की सराहना करने, उसे स्वीकार करने और उसे अभ्यास में लाने में है। यही सच्ची आज्ञाकारिता है। जिनमें परमेश्वर के लिए तड़पने की इच्छाशक्ति का अभाव है, जो उसके समक्ष स्वेच्छा से समर्पित नहीं हो पाते और केवल यथास्थिति से संतुष्ट होकर परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं, ऐसा इंसान परमेश्वर का आज्ञापालन इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह अभी भी पहले के प्रभाव में है। जो चीज़ें पहले आईं, उन्होंने लोगों को परमेश्वर के बारे में तमाम तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ दीं, और ये उनके दिमाग़ में परमेश्वर की छवि बन गई हैं। इस प्रकार, वे जिसमें विश्वास करते हैं, वह उनकी स्वयं की धारणाएँ और उनकी अपनी कल्पनाओं के मापदण्ड हैं। यदि तुम अपनी कल्पनाओं के परमेश्वर के सामने उस परमेश्वर को मापते हो जो आज वास्तविक कार्य करता है, तो तुम्हारा विश्वास शैतान से आता है, और तुम्हारी अपनी पसंद की वस्तु से दाग़दार है—परमेश्वर इस तरह का विश्वास नहीं चाहता। इस बात की परवाह किए बिना कि उनकी साख कितनी ऊंची है, और उनके समर्पण की परवाह किए बिना—भले ही उन्होंने उसके कार्य के लिए जीवनभर प्रयास किए हों, और अपनी जान कुर्बान कर दी हो—परमेश्वर इस तरह के विश्वास वाले किसी भी व्यक्ति को स्वीकृति नहीं देता। वह उनके ऊपर मात्र थोड़ा-सा अनुग्रह करता है और थोड़े समय के लिए उन्हें उसका आनन्द उठाने देता है। इस तरह के लोग सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं, पवित्र आत्मा उनके भीतर काम नहीं करता, परमेश्वर बारी-बारी से उन में प्रत्येक को हटा देगा। चाहे कोई युवा हो या बुजुर्ग, ऐसे सभी लोग जो अपने विश्वास में परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते और जिनकी मंशाएँ ग़लत हैं, जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करते और उसमें बाधा डालते हैं, ऐसे लोगों को परमेश्वर यकीनन हटा देगा। वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की दयालुता और मनोरमता की थोड़ी-सी भी समझ है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते, और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों का पालन नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं, लेकिन उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए या पूर्ण नहीं बनाए जाएँगे। परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और उसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का प्रयास करना—यही जागृत रहकर परमेश्वर की आज्ञा मानने का अर्थ है; और परमेश्वर ऐसा ही विश्वास चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के अलावा कुछ नहीं करते, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, प्रेम तथा धैर्य सभी सतही होते हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं, वे परमेश्वर को सच्चे अर्थ में नहीं जान सकते, यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान भी जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला ही होता है, और वे "परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है", या "परमेश्वर मनुष्य के प्रति करुणामय है" जैसी बातें करते हैं। यह मनुष्य के जीवन का द्योतक नहीं है, न ही इससे यह सिद्ध होता है कि लोग सचमुच परमेश्वर को जानते हैं। यदि, जब परमेश्वर के वचन उन्हें शुद्ध करते हैं, या जब उन्हें अचानक परमेश्वर की परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं, तब लोग परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं कर पाते—बल्कि यदि वे संदिग्ध और ग़लत साबित हो जाते हैं—तब वे रत्ती भर भी आज्ञाकारी नहीं रहते हैं। परमेश्वर में विश्वास को लेकर उनके भीतर कई नियम और प्रतिबंध हैं, पुराने अनुभव हैं जो कई वर्षों के विश्वास का परिणाम हैं, या बाइबल पर आधारित विभिन्न नियम हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीज़ों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे कर सकते हैं? उनकी "आज्ञाकारिता" व्यक्तिगत पसंद के अनुसार होती है—क्या परमेश्वर ऐसी आज्ञाकारिता चाहेगा? यह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता नहीं है, बल्कि नियमों से चिपके रहना है; यह खुद को संतोष देना और तुष्ट करना है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन है, तो क्या तुम ईशनिंदा नहीं कर रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

यदि लोग धार्मिक धारणाओं को छोड़ सकें, तो वे आज परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य को मापने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करेंगे, और इसकी बजाय सीधे उनका पालन करेंगे। भले ही परमेश्वर का आज का कार्य साफ़ तौर पर अतीत के कार्य से अलग है, तुम फिर भी अतीत के विचारों का त्याग कर पाने और आज सीधे तौर पर परमेश्वर के वचनों का पालन करने में सक्षम हो। यदि अतीत में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को नजरअंदाज करते हुए, तुम यह समझने में सक्षम हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर के आज के कार्य को सबसे प्रमुख स्थान देना जरूरी है, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो अपनी धारणाओं को छोड़ चुका है, जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है, और जो परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने और उसके पदचिह्नों पर चलने में सक्षम है। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो सचमुच परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है। तुम परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण या जांच नहीं करते हो; यह ऐसा है मानो परमेश्वर अपने अतीत के कार्य को भूल चुका है और तुम भी उसे भूल चुके हो। वर्तमान ही वर्तमान है, और अतीत बीता हुआ कल हो चुका है, और चूँकि आज परमेश्वर ने अतीत में किए गए अपने कार्य को अलग कर दिया है, तुम्हें भी उस पर टिके नहीं रहना चाहिए। केवल ऐसा ही व्यक्ति वह व्यक्ति है जो परमेश्वर का पूरी तरह से आज्ञापालन करता है और जिसने अपनी धार्मिक धारणाओं को पूरी तरह से त्याग दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर के आज के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अधिकांश लोग इस प्रश्न से हैरान हैं। उनके पास व्यावहारिक परमेश्वर और स्वर्ग के परमेश्वर के बारे में हमेशा से दो बिल्कुल भिन्न दृष्टिकोण रहे हैं, जो दिखाता है कि वे आज्ञापालन के लिए नहीं, बल्कि कुछ निश्चित लाभ प्राप्त करने या आपदा के साथ आने वाली तकलीफ़ से बचने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं; केवल तभी वे थोड़े-बहुत आज्ञाकारी होते हैं। उनकी आज्ञाकारिता सशर्त है, यह उनकी व्यक्तिगत संभावनाओं की गरज़ से है, और उन पर जबरदस्ती थोपी गई है। तो, तुम परमेश्वर में विश्वास आखिर क्यों करते हो? यदि यह केवल तुम्हारी संभावनाओं, और तुम्हारे प्रारब्ध के लिए है, तो बेहतर यही होता कि तुम विश्वास ही न करते। इस प्रकार का विश्वास आत्म-वंचना, आत्म-आश्वासन और आत्म-प्रशंसा है। यदि तुम्हारा विश्वास परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की नींव पर आधारित नहीं है, तो तुम्हें उसका विरोध करने के लिए अंततः दण्डित किया जाएगा। वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते, उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, वे उसके वचनों के प्यासे बनें, उसके वचनों को खाएँ-पिएँ और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बन सकें। यदि ये तुम्हारी सच्ची मंशाएँ हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उन्नत करेगा और तुम्हारे प्रति अनुग्रही होगा। कोई भी न तो इस पर संदेह कर सकता है और न ही इसे बदल सकता है। यदि तुम्हारी मंशा परमेश्वर के आज्ञापालन की नहीं है और तुम्हारे उद्देश्य दूसरे हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप भी परमेश्वर के विरोध में होगा। तुम भले ही मृदुभाषी और सौम्य हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति उचित दिखायी दे, और तुम भले ही आज्ञाकारी प्रतीत होते हो, किन्तु जब परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारी मंशाओं और विचारों की बात आती है, तो जो भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में होता है, वह बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं। वे सीधे-सीधे परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से एक-एक को प्रकट करेगा और सबको दिखाएगा कि पवित्र आत्मा उन सभी से, जो पाखण्डी हैं, निश्चित रूप से घृणा करेगा और उन्हें ठुकरा देगा। चिंता नहीं : परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से एक-एक से निपटेगा और उनका हिसाब करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

मैं एक सर्वभक्षी अग्नि हूँ और मैं अपमान बरदाश्त नहीं करता। क्योंकि सभी मानव मेरे द्वारा बनाए गए थे, इसलिए मैं जो कुछ कहता और करता हूँ, उन्हें उसका पालन करना चाहिए और वे विद्रोह नहीं कर सकते। लोगों को मेरे कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, और वे इस बात का विश्लेषण करने के योग्य तो बिलकुल नहीं हैं कि मेरे कार्य और मेरे वचनों में क्या सही या ग़लत है। मैं सृष्टि का प्रभु हूँ, और सृजित प्राणियों को मेरे प्रति श्रद्धापूर्ण हृदय के साथ वह सब-कुछ प्राप्त करना चाहिए, जिसकी मुझे आवश्यकता है; उन्हें मेरे साथ बहस नहीं करनी चाहिए, और विशेष रूप से उन्हें मेरा विरोध नहीं करना चाहिए। मैं अपने अधिकार के साथ अपने लोगों पर शासन करता हूँ, और वे सभी लोग जो मेरी सृष्टि का हिस्सा हैं, उन्हें मेरे अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा' से उद्धृत

यह मापने में कि लोग परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं या नहीं, मुख्य बात यह देखना है कि वे परमेश्वर से असाधारण माँगें कर रहे हैं या नहीं, और उनके गुप्त अभिप्राय हैं या नहीं। अगर लोग हमेशा परमेश्वर से माँगें करते हैं, तो यह साबित करता है कि वे उसके आज्ञाकारी नहीं हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से प्राप्त नहीं कर सकते, सत्य की तलाश नहीं कर सकते, हमेशा अपने व्यक्तिपरक तर्क से बात करते हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि केवल तुम ही सही हो, और यहाँ तक कि अभी भी परमेश्वर पर संदेह करने में सक्षम हो, तो तुम मुश्किल में रहोगे। ऐसे लोग सबसे घमंडी एवं परमेश्वर के प्रति विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे कभी सच में आज्ञापालन नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर से माँग करते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, तुम अपने ही विचार चुन रहे हो, और अपने विचारों के अनुसार ही कार्य कर रहे हो। इसमें तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, और तुममें आज्ञाकारिता नहीं है। परमेश्वर से माँग करना नासमझी है; अगर तुम्हें सचमुच विश्वास है कि वह परमेश्वर है, तो तुम उससे माँग करने की हिम्मत नहीं करोगे, न ही तुम उससे माँग करने के योग्य होगे, चाहे वे माँगें उचित हों या न हों। अगर तुममें सच्चा विश्वास है, और तुम मानते हो कि वह परमेश्वर है, तो तुम्हारे पास उसकी आराधना करने और उसका आज्ञापालन करने के अलावा कोई विकल्प न होगा। आज न सिर्फ़ लोगों के पास विकल्प है, बल्कि वे यह भी माँग करते हैं कि परमेश्वर उनके विचारों के अनुसार कार्य करे। वे अपने खुद के विचार चुनते हैं और कहते हैं कि परमेश्वर उनके अनुसार कार्य करे, और वे खुद से यह अपेक्षा नहीं करते कि वे परमेश्वर के विचारों के अनुसार कार्य करें। इसलिए, मनुष्य में कोई सच्चा विश्वास नहीं होता, कोई सारभूत विश्वास नहीं होता, और वे कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा नहीं पा सकते। जब तुम परमेश्वर से कम माँगें करने में सक्षम हो जाओगे, तो तुम्हारे सच्चे विश्वास और तुम्हारी आज्ञाकारिता में वृद्धि होगी, और तुम्हारी तार्किक समझ भी अपेक्षाकृत सामान्य हो जाएगी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं' से उद्धृत

सृजित प्राणी का अपने सृष्टिकर्ता के प्रति जो एकमात्र दृष्टिकोण होना चाहिए, वह है आज्ञाकारिता, ऐसी आज्ञाकारिता जो बेशर्त हो। यह ऐसी चीज़ है, जिसे आज कुछ लोग स्वीकार करने में असमर्थ हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और उसमें सत्य-वास्तविकता नहीं है। अगर तुम्हारी अवस्था ऐसी ही है तो फिर तुम परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाने से बहुत दूर हो। हालाँकि मनुष्य को परमेश्वर के वचन द्वारा पोषण और सिंचन प्रदान किया जाता है, फिर भी मनुष्य वास्तव में एक ही चीज़ की तैयारी कर रहा है। वह अंततः परमेश्वर के प्रति बेशर्त, पूर्ण समर्पण करने में सक्षम होना है, जिस बिंदु पर तुम, एक सृजित प्राणी, आवश्यक मानक तक पहुँच गए होगे। कभी-कभी परमेश्वर जानबूझकर ऐसे कार्य करता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाते, जो तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ जाता है, या जो सिद्धांतों तक के ख़िलाफ़ जाता प्रतीत होता है, या इंसानी भावनाओं, इंसानियत या संवेदनाओं के ख़िलाफ़ जाता है, और जिसे तुम स्वीकार नहीं कर पाते या समझ नहीं पाते। इसे तुम किसी भी तरीके से देखो, यह सही नहीं लगता, तुम इसे बिलकुल स्वीकार नहीं कर पाते, और तुम्हें लगता है कि उसने जो किया है, वह बिलकुल अनुचित है। तो इन कामों को करने में परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? यह तुम्हें परखने के लिए है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह कैसे और क्यों करता है, तुम्हें इसकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है; तुम्हें बस इतना ही करना है कि अपना यह विश्वास बनाए रखो कि वह सत्य है, और यह पहचानो कि वह तुम्हारा सृजनकर्ता है, तुम्हारा परमेश्वर है। यह सारे सत्यों से ऊँचा है, सारे सांसारिक ज्ञान से ऊँचा है, मनुष्य की तथाकथित नैतिकता, नीति, ज्ञान, शिक्षा, दर्शन या पारंपरिक संस्कृति से ऊँचा है, यहाँ तक कि यह लोगों के बीच स्नेह, मैत्री या तथाकथित प्रेम से भी ऊँचा है—यह अन्य किसी भी चीज़ से ऊँचा है। यदि तुम इसे न समझ पाओ, तो देर-सबेर, तुम्हारे साथ कुछ होने पर, अंतत: पश्चात्ताप करने और परमेश्वर की मनोहरता महसूस करने से पहले और परमेश्वर द्वारा तुम पर किए जाने वाले कार्य का अर्थ समझने से पहले, तुम परमेश्वर से विद्रोह करके भटक सकते हो, या इससे भी बदतर, तुम इसके कारण लड़खड़ाकर गिर सकते हो। यह भयावह नहीं होगा कि परमेश्वर ने तुम्हारा न्याय किया, और न ही यह भयावह होगा कि उसने तुम्हें शाप दिया या ताड़ना दी—तो फिर क्या भयावह होगा? भयावह यह होगा अगर वह कहे, "मैं तुम्हारे जैसे किसी व्यक्ति को नहीं बचाऊँगा; मैं हार मानता हूँ!" वैसा होने पर, तुम्हारा काम तो तमाम हो जाएगा। इसलिए, लोगों को यह कहते हुए बाल की खाल नहीं निकालनी चाहिए कि, "ये वचन—न्याय और ताड़ना के—तो ठीक हैं, लेकिन क्या—शाप, विनाश, निंदा—के इन वचनों का मतलब मेरा अंत हो जाना नहीं होगा? उसके बाद मैं किस तरह का सृजित प्राणी बन सकूँगा? ठीक है; छोड़ दो। तुम जाओ और आगे से तुम मेरे परमेश्वर न सही।" यदि तुम गवाही दिए बिना ही परमेश्वर को त्याग देने का फैसला करते हो, तो वह वास्तव में यह तय कर सकता है कि अब उसे तुम्हारी चाह नहीं है। क्या तुम लोगों ने पहले कभी इसके बारे में सोचा है? भले ही लोगों ने परमेश्वर पर कितने ही समय तक विश्वास किया हो, वे कितनी भी दूर तक साथ चले हों, उन्होंने कितना भी काम किया हो और कितने भी कर्तव्य निभाए हों, यह सारा समय उन्हें एक ही चीज़ के लिए तैयार करता रहा है : तुम अंततः परमेश्वर के प्रति बेशर्त और पूर्ण समर्पण करने में सक्षम हो जाओ। तो "बेशर्त" का क्या मतलब है? इसका मतलब है, अपने व्यक्तिगत कारणों को नज़रअंदाज़ करना, अपने व्यक्तिपरक तर्कों को नज़रअंदाज़ करना, और किसी भी चीज़ पर कहा-सुनी नहीं करना : तुम एक सृजित प्राणी हो, और तुम योग्य नहीं हो। जब तुम परमेश्वर से कहा-सुनी करते हो, तो तुम गलत स्थिति में होते हो; जब तुम परमेश्वर के सामने अपने को सही ठहराने का प्रयास करते हो, तो एक बार फिर तुम गलत स्थिति में होते हो; जब तुम परमेश्वर के साथ बहस करते हो, जब तुम यह पता लगाने के लिए कि वास्तव में क्या हो रहा है, कारण जानना चाहते हो, यदि तुम पहले समझे बिना आज्ञापालन नहीं कर सकते, और सब-कुछ स्पष्ट हो जाने के बाद ही समर्पण करोगे, तो तुम एक बार फिर गलत स्थिति में हो। जब तुम जिस स्थिति में हो, वह गलत है, तो क्या परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता पूर्ण है? क्या तुम परमेश्वर के साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हो जैसा कि किया जाना चाहिए? क्या तुम पूरी सृष्टि के प्रभु के रूप में उसकी आराधना करते हो? नहीं, तुम वैसा व्यवहार नहीं कर रहे, जिसके कारण परमेश्वर तुम्हें नहीं पहचानता। परमेश्वर के प्रति बेशर्त और पूर्ण समर्पण हासिल करने के लिए कौन-सी चीज़ें तुम्हें सक्षम बना सकती हैं? उसका अनुभव कैसे किया जा सकता है? एक ओर, थोड़े विवेक और सामान्य मानवता की समझ की आवश्यकता है; दूसरी ओर, अपने कर्तव्य पूरे करते हुए तुम्हें सत्य के प्रत्येक पहलू को समझना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सको। कभी-कभी मनुष्य की क्षमता कम पड़ जाती है और उसके पास सभी सत्यों को समझने की ताकत या ऊर्जा नहीं होती। लेकिन एक चीज़ है : परिवेश, लोगों, घटनाओं और उन चीज़ों के बावजूद, जो तुम पर आती हैं और जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, तुम्हें हमेशा एक आज्ञाकारी रवैया रखना चाहिए और कारण नहीं पूछना चाहिए। अगर यह रवैया भी तुम्हारी समझ से परे है, और तुम परमेश्वर से सतर्क रहने, उसके बारे में संदेह करने और मन-ही-मन यह सोचने की हद तक भी जा सकते हो कि "मुझे सोचना होगा कि परमेश्वर जो कर रहा है, वह वास्तव में धार्मिक है या नहीं? वे कहते हैं कि परमेश्वर प्रेम है, तो चलो देखते हैं कि वह जो मेरे साथ कर रहा है, उसमें प्रेम है या नहीं, और क्या यह वास्तव में प्रेम ही है?" यदि तुम हमेशा इस बात की जाँच करते हो कि परमेश्वर जो कर रहा है, वह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप है या नहीं, यह देखते हो कि परमेश्वर वही कर रहा है या नहीं जो तुम्हें पसंद है, यहाँ तक कि वह उसका अनुपालन करता है या नहीं जिसे तुम सत्य मानते हो, तो तुम्हारी स्थिति गलत है, इससे तुम्हें परेशानी होगी और इसकी संभावना होगी कि तुम परमेश्वर के स्वभाव का अपमान कर बैठो।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था, तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। उसे नहीं पता था कि परमेश्वर कौनसा कार्य पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने नूह को सिर्फ एक आज्ञा दी थी और अधिक स्पष्टीकरण के बिना उसे कुछ करने का निर्देश दिया था, नूह ने आगे बढ़कर इसे कर दिया। उसने गुप्त रूप से परमेश्वर के इरादों को जानने की कोशिश नहीं की, न ही उसने परमेश्वर का विरोध किया या निष्ठाहीनता दिखाई। वह बस गया और एक शुद्ध एवं सरल हृदय के साथ इसे तदनुसार कर डाला। परमेश्वर उससे जो कुछ भी करवाना चाहता था, उसने किया और कार्यों को करने के लिए परमेश्वर के वचनों को मानने एवं सुनने में विश्वास उसका सहारा बना। इस प्रकार जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था, उसने ईमानदारी एवं सरलता से उसे निपटाया था। उसका सार—उसके कार्यों का सार आज्ञाकारिता थी, अपने अनुमान लगाना या प्रतिरोध नहीं था और इसके अतिरिक्त, अपनी व्यक्तिगत रुचियों और अपने लाभ एवं हानि के विषय में सोचना नहीं था। इसके आगे, जब परमेश्वर ने कहा कि वह जलप्रलय से संसार का नाश करेगा, तो नूह ने नहीं पूछा कब या उसने नहीं पूछा कि चीज़ों का क्या होगा और उसने निश्चित तौर पर परमेश्वर से नहीं पूछा कि वह किस प्रकार संसार को नष्ट करने जा रहा था। उसने बस वैसा ही किया, जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। हालाँकि परमेश्वर चाहता था कि इसे बनाया जाए और जिससे बनाया जाए, उसने बिलकुल वैसा ही किया, जैसा परमेश्वर ने उसे कहा था और तुरंत कार्रवाई भी शुरू कर दी। उसने परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा के रवैये के साथ परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार काम किया। क्या वह आपदा से खुद को बचाने में सहायता करने के लिए यह कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने में कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने बस आज्ञा मानी, सुना और तदनुसार कार्य किया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज़ में परमेश्वर को संतुष्ट करने की चेष्टा की थी, और उस सब की आज्ञा मानने की चेष्टा की थी जो परमेश्वर से आया था। रत्ती भर शिकायत के बिना, वह ताड़ना और न्याय, साथ ही शुद्धिकरण, घोर पीड़ा और अपने जीवन की वंचनाओं को स्वीकार कर पाता था, जिनमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदल नहीं सका था। क्या यह परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम नहीं था? क्या यह परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पूर्ति नहीं थी? चाहे ताड़ना में हो, न्याय में हो, या घोर पीड़ा में हो, तुम मृत्यु पर्यंत आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सदैव सक्षम होते हो, और यह वह है जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना प्राप्त कर सकता है, तो वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी है, और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को इससे बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता हो। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हो, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ हो। इस तरह, तुमने न केवल परमेश्वर के सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा निंदित भी किया जाएगा, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से युक्त नहीं है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है। तुम केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने की परवाह करते हो, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करते हो। तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, और सृष्टिकर्ता का आज्ञापालन या उससे प्रेम नहीं करते हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से अवज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

परमेश्वर के लिए एक ज़बर्दस्त गवाही देना मुख्य रूप से इस बात से संबंधित है कि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ है या नहीं, और तुम इस व्यक्ति के सामने आज्ञापालन करने में सक्षम हो या नहीं जो कि न केवल साधारण है, बल्कि सामान्य है, और मृत्युपर्यंत भी उसका आज्ञापालन कर पाते हो या नहीं। यदि तुम इस आज्ञाकारिता के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तव में गवाही देते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हो। अगर तुम मृत्यु तक समर्पण कर सकते हो, और उसके सामने शिकायतें नहीं करते, आलोचनाएँ नहीं करते, बदनामी नहीं करते, धारणाएँ नहीं रखते, और कोई गुप्त मंशा नहीं रखते, तो इस तरह परमेश्वर को महिमा मिलेगी। किसी नियमित व्यक्ति जिसे मनुष्य द्वारा तुच्छ समझा जाता है, के सम्मुख समर्पण और किसी भी धारणा के बिना मृत्यु तक समर्पण करने में सक्षम होना—यह सच्ची गवाही है। परमेश्वर जिस वास्तविकता में प्रवेश की लोगों से अपेक्षा करता है वह यह है कि तुम उसके वचनों का पालन करने में सक्षम हो जाओ, उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाओ, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने झुकने और अपने स्वयं के भ्रष्टाचार को जानने में सक्षम हो जाओ, उसके सामने अपना हृदय खोलने में सक्षम हो जाओ, और अंत में उसके इन वचनों के माध्यम से उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाओ। जब ये वचन तुम्हें जीत लेते हैं और तुम्हें पूरी तरह उसके प्रति आज्ञाकारी बना देते हैं तो परमेश्वर को महिमा प्राप्त होती है; इसके माध्यम से वह शैतान को लज्जित करता है और अपने कार्य को पूरा करता है। जब तुम्हारी देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता के बारे में कोई धारणा नहीं होती है—अर्थात्, जब तुम इस परीक्षा में अडिग रहते हो, तो तुम एक अच्छी गवाही देते हो। यदि ऐसा दिन आता है जब तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की पूरी समझ हो जाती है और तुम पतरस की तरह मृत्युपर्यंत आज्ञापालन कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाओगे, और उसके द्वारा पूर्ण बना दिए जाओगे। परमेश्वर वह जो कुछ भी करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, वह तुम्हारे लिए एक परीक्षा होती है। यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो इसके लिए तुम्हें कष्ट भुगतने या शुद्ध किए जाने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका कार्य इतना व्यावहारिक है और तुम्हारी धारणाओं से इतना अलग है कि यह तुम्हारे लिए अपनी धारणाओं को छोड़ देना आवश्यक बनाता है। यही कारण है कि यह तुम्हारे लिए एक परीक्षा है। यह परमेश्वर की व्यावहारिकता के कारण है कि सभी लोग परीक्षाओं के बीच में हैं; उसका कार्य व्यावहारिक है, अलौकिक नहीं। किसी भी धारणा को रखे बिना उसके व्यावहारिक वचनों और उसके व्यावहारिक कथनों को पूरी तरह से समझकर, और जैसे-जैसे उसका कार्य बढ़ता है, वैसे-वैसे उसे वास्तव में प्यार करने में सक्षम हो कर, तुम उसके द्वारा प्राप्त किए जाओगे। उन लोगों का समूह जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करेगा वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, अर्थात्, जो उसकी व्यावहारिकता को जानते हैं, और उससे भी ज्यादा ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य का पालन करने में सक्षम हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

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