108. सामान्य मानवता और एक भ्रष्ट स्वभाव के बीच भेद करने के सिद्धांत

(1) यह निर्धारित करो कि क्या कोई व्यक्ति अंतर्विवेकशील और वचन तथा कर्म में समझदार है; क्या वह दूसरों के साथ बातचीत में सिद्धांतवादी है; क्या वह दूसरों के साथ उचित व्यवहार करते हुए, सहिष्णुता और धैर्य रखने में सक्षम है;

(2) यह निर्धारित करो कि क्या कोई व्यक्ति सकारात्मक चीज़ों से, साथ ही सत्य से, प्रेम करता है; जब कोई मुद्दा सामने आता है तो क्या वह सच्चाई की तलाश करता है; क्या वह प्रकाश के लिए तरसता है और जीवन में सही मार्ग पर चलता है;

(3) यह निश्चय करो कि जब न्याय और ताड़ना का सामना करना पड़े या काट-छाँट की जाए और निपटा जाए, तो क्या कोई ये सब परमेश्वर से आते मानकर उन्हें स्वीकार कर सकता है; क्या वह सत्य को स्वीकार कर उसके प्रति समर्पण कर सकता है और आत्म-चिंतन के माध्यम से खुद को जान सकता है;

(4) यह निर्धारित करो कि क्या कोई अपना कर्तव्य निभाने में सच बोलता है और एक ईमानदार व्यक्ति की तरह व्यावहारिक रूप से कार्य करता है, या क्या वह परमेश्वर को चकमा देने के प्रयास में असावधान और लापरवाह, षड्यंत्रकारी और कपटी होता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और उचित मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ पथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और अंत:करण का प्रकटीकरण है; और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका अंत:करण अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में ऐसा बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, जो परमेश्वर के हृदय के अनुकूल हो। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "उचित समझ" के मायने हैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना और उसके प्रति निष्ठावान बने रहना, परमेश्वर के लिए तड़पना, परमेश्वर के प्रति पूर्णतया शुद्ध होना, और परमेश्वर के प्रति अंत:करण रखना, यह परमेश्वर के साथ एक हृदय और मन होने को दर्शाता है, जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। पथभ्रष्ट समझ का होना ऐसा नहीं है। चूँकि मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था इसलिये, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, और परमेश्वर के लिए उसके अंदर निष्ठा या तड़प नहीं रही है, परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा की तो बात ही क्या। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता और उस पर दोष लगाता है, और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों का प्रहार करता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाता है, परमेश्वर की आज्ञापालन का उसका कोई भी इरादा नहीं होता, वह सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—जिनकी समझ पथभ्रष्ट होती है—वे अपने घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता पर पछतावा करने के अयोग्य होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; परमेश्वर के प्रति अधिक विद्रोही लोग, जो अपने आप को अब तक नहीं जान पाये, उनमें समझ उतनी ही कम होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

जब किसी व्यक्ति में अच्छी मानवता, एक सच्चा दिल, चेतना और तर्कशीलता होती है, ये कोई खोखली या अस्पष्ट चीजें नहीं होतीं, जिन्हें देखा या छुआ न जा सके, बल्कि ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें दैनिक जीवन में कहीं भी खोजा जा सकता है, ये सभी वास्तविकता की चीजें हैं। मान लो कि कोई व्यक्ति महान और संपूर्ण है : तुम यह देख, छू या कल्पना भी नहीं कर सकते कि संपूर्ण या महान होना क्या होता है। लेकिन अगर तुम कहते हो कि कोई स्वार्थी है, तो तुम उस व्यक्ति के कृत्यों को देख सकते हो—और क्या वह वर्णन के अनुरूप है? अगर किसी व्यक्ति को ईमानदार और सच्चे दिल वाला कहा जाता है, तो क्या तुम उसके व्यवहार को देख सकते हो? अगर किसी को धोखेबाज, कुटिल और नीच कहा जाता है, तो क्या तुम इन चीजों को देख सकते हो? अगर तुम अपनी आँखें बंद कर लो तब भी तुम उसकी बातों और व्यवहार से यह समझ सकते हो कि किसी व्यक्ति की मानवता हीन स्तर की है या उच्च स्तर की। क्या ऐसा नहीं है? इसलिए "अच्छी या बुरी मानवता" कोई खोखली शब्दावली नहीं है। स्वार्थी और नीच, कुटिल और धोखेबाज, या अहंकारी और आत्म-तुष्ट सभी ऐसी चीजें हैं जिन्हें तुम किसी व्यक्ति के संपर्क में आने पर समझ सकते हो; ये सभी मानवता के नकारात्मक तत्व हैं। इसी तरह, क्या मानवता के वे सकारात्मक तत्व जो लोगों में होने चाहिए—जैसेकि ईमानदारी और सत्य से प्रेम—भी दैनिक जीवन में महसूस किए जा सकते हैं? तब फिर क्या तुम यह देख सकते हो और यह भेद कर सकते हो कि क्या किसी व्यक्ति में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता है, क्या वह परमेश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है, क्या पवित्र आत्मा उसके भीतर कार्य कर रहा है या नहीं? यह भेद कैसे किया जाए? तुम किसी व्यक्ति के जीने के तरीके और उसके कृत्यों के सार से उसकी मानवता की गुणवत्ता को परख सकते हो। जब तुम किसी व्यक्ति के संपर्क में आते हो तो तुम सबसे पहले क्या देखते हो? तुम यह भेद कैसे करोगे कि क्या वह सत्य का प्रेमी है, क्या वह इसे स्वीकार कर सकता है, और क्या वह इसे प्राप्त कर सकता है? सबसे पहले उसकी मानवता की गुणवत्ता को देखो। अगर किसी व्यक्ति के मुंह से शहद-से मीठे शब्द झरते हैं, पर वह सच में कुछ नहीं करता—जब कुछ सचमुच करने का समय आता है, तो वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है और दूसरों के बारे में कभी नहीं सोचता—तो यह किस तरह की मानवता है? (स्वार्थता और नीचता। उसमें कोई मानवता नहीं है।) क्या मानवता के अभाव वाले व्यक्ति के लिए सत्य को प्राप्त करना आसान है? यह उसके लिए मुश्किल काम है। जैसे ही उसका किसी कष्ट की घड़ी से सामना होता है, या उसे कोई मूल्य चुकाना पड़ता है, तो वह सोचता है, “तुम लोग पहले आगे जाओ और ये सब कष्ट झेलो और मूल्य चुकाओ, और जब परिणाम लगभग हासिल किए जा चुके होंगे, तो मैं तुम लोगों में शामिल हो जाऊंगा।” यह किस तरह की मानवता है? इस तरह के व्यवहारों को सामूहिक रूप से "मानवता से विहीन" कहा जाता है। हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होता है, पर कोई समस्या सामने आने पर कुछ लोगों की चेतना काम करने लगती है और वे खुद को धिक्कारते हैं, इसलिए वे उस तरह व्यवहार नहीं करते। भले ही वे सचेतन रूप से ऐसा न कहें, "मैं सत्य की खोज कर रहा हूँ और मुझे एक अच्छा व्यक्ति होना चाहिए," पर उनकी चेतना सक्रिय होती है और वे मन-ही-मन सोचते हैं, "मैं इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकता, मुझे परमेश्वर के अनुग्रह और चुनाव के योग्य होना चाहिए।" तो क्या इस तरह का व्यक्ति अपनी आत्मा के कार्यशील होने पर सत्य को अभ्यास में लाता है? भले ही वह सत्य का अभ्यास न कर रहा हो, फिर भी वह सत्य को अभ्यास में लाने के रास्ते पर है, इसलिए उसके लिए तब सत्य को प्राप्त करना आसान हो जाता है। यह किसी व्यक्ति द्वारा सत्य को प्राप्त करने का सबसे मूल आधार है। किसी समस्या से सामना होने पर कुछ लोग आगे आते हैं, जबकि दूसरे बिदककर पीछे हट जाते हैं। जब कोई खतरा सामने हो, तो कुछ लोग सिर्फ भाग खड़े होना और छिप जाना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग दूसरों को बचाने के लिए तेजी से आगे आते हैं। किसी आयोजन में शामिल होने पर कुछ लोग सहनशीलता और विनम्रता दिखाते हैं, जबकि कुछ बहस और होड़ करते हैं। इसी तरह से तुम किसी व्यक्ति की मानवता की गुणवत्ता को देख सकते हो। क्या मानवता में भिन्नताएँ नहीं हैं?

बहुत-से लोगों ने परमेश्वर के सम्मुख दृढ़ संकल्प किए हैं और शपथें ली हैं, और अपना पूरा जीवन उसे अर्पित करते हुए और इसे उसके लिए खपाते हुए बदले में कुछ नहीं मांगा है। लेकिन बुरी मानवता वाले लोग हमेशा दावे ठोंकते हैं और झगड़ते हैं, न तो झुकते हैं न संयम बरतते हैं, और कभी भी अपनी चेतना के अनुसार व्यवहार नहीं करते। क्या इस तरह के किसी व्यक्ति के लिए सत्य को प्राप्त करना आसान हो सकता है? (नहीं।) किस तरह के व्यक्ति के लिए परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना और सत्य प्राप्त करना आसान है? (अच्छी मानवता वाले लोगों के लिए।) अच्छी मानवता होने का कोई मानक अवश्य होना चाहिए। इसमें संयम का मार्ग अपनाना, सिद्धांतों से चिपके न रहना, किसी को नाराज़ नहीं करने का प्रयत्न करना, जहाँ भी तुम जाओ वहीं चापलूसी करके कृपापात्र बनना, जिससे भी तुम मिलो सभी से चिकनी-चुपड़ी बातें करना, और सभी को अच्छा महसूस कराना शामिल नहीं है। यह मानक नहीं है। तो मानक क्या है? इसमें शामिल है परमेश्वर, अन्य लोगों, और घटनाओं के साथ सच्चे हृदय से बर्ताव करना, उत्तरदायित्व स्वीकार कर पाना, और यह सब इतने स्पष्ट ढंग से करना कि हर कोई देख और महसूस कर सके। इतना ही नहीं, परमेश्वर लोगों के हृदय को टटोलता है और उनमें से हर एक को जानता है। कुछ लोग हमेशा डींग हाँकते हैं कि वे अच्छी मानवता से युक्त हैं, यह दावा करते हैं कि उन्होंने कभी कुछ बुरा नहीं किया, दूसरों का माल-असबाब नहीं चुराया, या अन्य लोगों की चीजों की लालसा नहीं की। यहाँ तक कि जब हितों को लेकर विवाद होता है, तब वे नुक़सान उठाना चुनकर, अपनी क़ीमत पर दूसरों को लाभ उठाने देते हैं, और वे कभी किसी के बारे में बुरा नहीं बोलते ताकि अन्य हर कोई यही सोचे कि वे अच्छे लोग हैं। परंतु, परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभाते समय, वे कुटिल और चालाक होते हैं, हमेशा स्वयं अपने हित में षड़यंत्र करते हैं। वे कभी भी परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचते, वे कभी उन चीजों को अत्यावश्यक नहीं मानते हैं जिन्हें परमेश्वर अत्यावश्यक मानता है या उस तरह नहीं सोचते हैं जिस तरह परमेश्वर सोचता है, और वे कभी अपने हितों को एक तरफ़ नहीं रख सकते ताकि अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें। वे कभी अपने हितों का परित्याग नहीं करते। यहाँ तक कि जब वे कुकर्मियों को बुरा करते देखते हैं, वे उन्हें उजागर नहीं करते; उनके रत्ती भर भी कोई सिद्धांत नहीं हैं। यह अच्छी मानवता का उदाहरण नहीं है। ऐसे व्यक्ति की बातों पर बिल्कुल ध्यान न दो; तुम्हें देखना चाहिए कि वह किस प्रकार का जीवन जीता है, क्या प्रकट करता है, कर्तव्य निभाते समय उसका रवैया कैसा होता है, साथ ही उसकी अंदरूनी दशा कैसी है और उसे क्या पसंद है। अगर अपनी शोहरत और दौलत के प्रति उसका प्रेम परमेश्वर के प्रति निष्ठा से बढ़कर है, अगर अपनी शोहरत और दौलत के प्रति उसका प्रेम परमेश्वर के हितों से बढ़कर है, अगर अपनी शोहरत और दौलत के प्रति उसका प्रेम उस विचारशीलता से बढ़कर है जो वो परमेश्वर के प्रति दर्शाता है, तो उस इंसान में इंसानियत नहीं है। उसका व्यवहार दूसरों के द्वारा और परमेश्वर द्वारा देखा जा सकता है; इसलिए ऐसे इंसान के लिए सत्य को हासिल करना बहुत कठिन होता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण का स्रोत उसका मंद अंत:करण, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसकी विकृत समझ से बढ़कर और किसी में भी नहीं है; यदि मनुष्य का अंत:करण और समझ फिर से उचित होने के योग्य हो पाएँ, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने के योग्य बन जायेगा। सिर्फ इसलिए क्योंकि मनुष्य का अंत:करण हमेशा सुन्न रहा है, मनुष्य की समझ जो कभी भी सही नहीं रही, लगातार मंद होती जा रही है, इस कारण ही मनुष्य लगातार परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना हुआ है, इस हद तक कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और अंतिम दिनों के देहधारी परमेश्वर को अपने घर में प्रवेश देने से इंकार कर रहा है, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर के देह को तुच्छ जानता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह परमेश्वर के देहधारी शरीर के साथ इतना निर्दयी व्यवहार न करता; यदि उसे थोड़ी-सी भी समझ होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ अपने व्यवहार में इतना शातिर न होता; यदि उसमें थोड़ा-सा भी विवेक होता, तो वह देहधारी परमेश्वर को इस ढंग से "धन्यवाद" न देता। मनुष्य देहधारी परमेश्वर के युग में जीता है, फिर भी वह इतना अच्छा अवसर दिये जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने की बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, और प्रकट रूप से इसके विरोध में होता है और इससे ऊबा हुआ है। मनुष्य परमेश्वर के आगमन के प्रति चाहे जैसा भी व्यवहार करे, संक्षेप में, परमेश्वर ने हमेशा धैर्यपूर्वक अपने कार्य को जारी रखा है—भले ही मनुष्य ने परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागत करने वाला रुख़ नहीं रखा है, और अंधाधुंध उससे निवेदन करता रहता है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत शातिर बन गया है, उसकी समझ अत्यंत मंद हो गई है, और उसका अंत:करण दुष्ट के द्वारा पूरी तरह से रौंद दिया गया है और मनुष्य के मौलिक अंत:करण का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया था। मनुष्य, मानवजाति को बहुत अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान करने के लिए देहधारी परमेश्वर का न केवल एहसानमंद नहीं है, बल्कि परमेश्वर के द्वारा उसे सत्य दिए जाने पर वह आक्रोश में भी है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ी-सी भी रूचि नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर के प्रति आक्रोश में आ गया है। मनुष्य न सिर्फ देहधारी परमेश्वर के लिए अपनी जान देने के नाकाबिल है, बल्कि वह उससे उपकार हासिल करने की कोशिश भी करता रहता है, और परमेश्वर से ऐसे सूद की माँग करता है जो उससे दर्जनों गुना बड़ी हैं जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। ऐसे विवेक और समझ के लोग इसे कोई बड़ी बात नहीं मानते हैं, वे अब भी ऐसा मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के लिए स्वयं को बहुत अधिक खर्च किया है, और परमेश्वर ने उन्हें बहुत थोड़ा दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने मुझे सिर्फ एक कटोरा पानी ही दिया है फिर भी अपने हाथ पसार कर माँग करते हैं कि मैं उन्हें दो कटोरे दूध की कीमत चुकाऊँ या मुझे एक रात के लिए कमरा दिया है परन्तु मुझ से कई रातों के किराए की माँग करते हैं। ऐसी मानवता, और ऐसे विवेक के साथ, कैसे तू अब भी जीवन पाने की कामना कर सकता है? तू कितना घृणित अभागा है! इंसान की इसी प्रकार की मानवता और विवेक के कारण ही देहधारी परमेश्वर पूरी धरती पर भटकता फिरता है, वह किसी भी स्थान पर आश्रय नहीं पाता। जो सचमुच विवेक और मानवता को धारण किये हुए हैं उन्हें देहधारी परमेश्वर की आराधना और सच्चे दिल से सेवा इसलिए नहीं करनी चाहिए कि उसने बहुत कार्य किया है, बल्कि तब भी करनी चाहिए अगर उसने कुछ भी कार्य न किया होता। जो लोग सही समझ के हैं उन्हें यह करना चाहिये और यह मनुष्य का कर्तव्य है। अधिकतर लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए शर्तों की बात भी करते हैं : वे परवाह नहीं करते कि वह परमेश्वर है या मनुष्य है, वे सिर्फ अपनी शर्तों की ही बात करते हैं, और सिर्फ अपनी ही इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं। जब तुम लोग मेरे लिए खाना पकाते हो, तो तुम सेवा शुल्क की माँग करते हो, जब तुम लोग मेरे लिए दौड़ते हो, तो तुम लोग मुझसे दौड़ने का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग मेरे लिए काम करते हो तो काम करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग मेरे कपड़े धोते हो तो कपड़े धोने का शुल्क माँगते हो, जब तुम कलीसिया के लिए कुछ करते हो तो स्वास्थ्यलाभ की लागत माँगते हो, जब तुम लोग बोलते हो तो तुम वक्ता का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग पुस्तकें बाँटते हो तो तुम लोग वितरण शुल्क माँगते हो, और जब लिखते हो तो लिखने का शुल्क माँगते हो। जिनके साथ मैं निपट चुका हूँ वे मुझ से मुआवजा तक माँगते हैं, जबकि वे जो घर भेजे जा चुके हैं अपने नाम के नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति की माँग करते हैं; वे जो अविवाहित हैं दहेज की माँग करते हैं, या अपनी खोई हुई जवानी के लिए मुआवजे की माँग करते हैं, वे जो मुर्गे को काटते हैं वे कसाई के शुल्क की माँग करते हैं, वे जो खाने को तलते हैं, तलने का शुल्क माँगते हैं, और वे जो सूप बनाते हैं उसके लिए भी भुगतान माँगते हैं...। यह तुम लोगों की ऊँची और शक्तिशाली मानवता है और ये तुम सबके स्नेही विवेक के द्वारा निर्धारित कार्य हैं। तुम लोगों की समझ कहाँ है? तुम लोगों की मानवता कहाँ है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

सामान्य लोगों के स्वभाव में कोई कुटिलता या धोखेबाज़ी नहीं होती, लोगों का एक-दूसरे के साथ एक सामान्य संबंध होता है, वे अकेले नहीं खड़े होते, और उनका जीवन न तो साधारण होता है और न ही पतनोन्मुख। इसलिए भी, परमेश्वर सभी के बीच ऊँचा है, उसके वचन मनुष्यों के बीच व्याप्त हैं, लोग एक-दूसरे के साथ शांति से, परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हैं, पृथ्वी, शैतान के हस्तक्षेप के बिना, सद्भाव से भरी है, और मनुष्यों के बीच परमेश्वर की महिमा बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे लोग स्वर्गदूतों की तरह हैं: शुद्ध, जोशपूर्ण, परमेश्वर के बारे में कभी भी शिकायत नहीं करने वाले, और पृथ्वी पर पूरी तरह से परमेश्वर की महिमा के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित करने वाले।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 16' से उद्धृत

सामान्य मानवता में कौन-से पहलू शामिल हैं? अंतर्दृष्टि, समझ, विवेक, और चरित्र। यदि तुम इनमें से प्रत्येक पहलू में सामान्यता प्राप्त कर सकते हो, तो तुम्हारी मानवता मानक के मुताबिक हो जाएगी। तुममें एक सामान्य इंसान से समरूपताहोनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर केविश्वासी की तरह लगनाचाहिए। तुम्हें बहुत अधिक हासिल नहीं करना है या कूटनीति में संलग्न नहीं होना है; तुम्हें बस एक सामान्य इंसान बनना है जिसके पास सामान्य व्यक्ति की समझ हो, जो चीज़ों को समझने में सक्षम हो, और जो कम से कम एक सामान्य इंसान की तरह दिखाई दे। यह पर्याप्त होगा। आज तुमसे अपेक्षित हर चीज़ तुम्हारी क्षमताओं के भीतर है और किसी भी तरह से तुमसे कुछ ऐसा करवाने के लिए नहीं है जो करने में तुम सक्षम नहीं हो। कोई अनुपयोगी वचन या अनुपयोगी कार्य तुम पर नहीं किया जाएगा। तुम्हारे जीवन में व्यक्त या प्रकट हुई समस्त कुरूपता का अवश्य त्याग कर दिया जाना चाहिए। तुम लोगों को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और तुम लोग शैतान के ज़हर से भरे हुए हो। तुमसे केवल इस भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा पाने के लिए कहा जाता है। तुमसे कोई उच्च पदस्थ व्यक्ति, या एक प्रसिद्ध या महान व्यक्ति बनने के लिए नहीं कहा जाता। इसका कोई अर्थ नहीं है। जो कार्य तुम लोगों पर किया जाता है वह उसके अनुसार होता है जो तुम लोगों में अंतर्निहित है। मैं लोगों से जो अपेक्षा करता हूँ उसकी सीमाएँ होती हैं। यदि तुमने उस तरीके और लहजे से अभ्यास किया है जिसमें बुद्धिजीवी बात करते हैं तो इससे काम नहीं चलेगा; तुम इसे नहीं कर पाओगे। तुम लोगों की क्षमता के हिसाब से तुम्हें कम से कम बुद्धिमानी और कुशलता के साथ बोलने में सक्षम होना चाहिए और चीज़ों को स्पष्ट रूप से और समझ में आने वाले ढंग से बताना चाहिए। अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए बस इतने की ज़रूरत है। कम से कम, यदि तुम अंतर्दृष्टि और समझ प्राप्त कर लेते हो, तो यह पर्याप्त है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है स्वयं के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करना। तुम्हें उस कुरूपता को अवश्य त्याग देना चाहिए जो तुममें व्यक्त होती है। यदि तुमने इन्हें त्यागा नहीं है, तो परम समझ और परम अंतर्दृष्टि की बात कैसे कर सकते हो? यह देखते हुए कि युग बदल गया है, बहुत से लोगों में विनम्रता या धैर्य का अभाव है, और हो सकता है कि उनमें कोई प्रेम या संतों वाली शालीनता भी न हो। ये लोग कितनेबेहूदा हैं! क्या उनमें रत्ती भर भी सामान्य मानवता है? क्या उनके पास कोई बताने लायक गवाही है? उनके पास किसी भी तरह की कोई अंतर्दृष्टि और समझ नहीं है। निस्सन्देह, लोगों के व्यवहार के कुछ पहलुओं को, जो पथभ्रष्ट और गलत हैं, सही किए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, लोगों के अतीत का कठोर आध्यात्मिक जीवन और उनका संवेदनशून्य और मूर्खतापूर्ण रूप—इन सभी चीजों को बदलना होगा। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें स्वच्छंद होने दिया जाए या शरीर में आसक्त होने दिया जाए या तुम जो चाहो वह बोलने दिया जाए। तुम्हें लापरवाही से नहीं बोलना चाहिए। एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करना और बोलना-चालना सुसंगति से बोलना है, जब तुम्हारा आशय "हाँ" होता है तो "हाँ" बोलना, "नहीं" आशय होने पर "नहीं" बोलना। तथ्यों के मुताबिक रहो और उचित तरीके से बोलो। कपट मत करो, झूठ मत बोलो। स्वभाव में बदलाव के संबंध में सामान्य व्यक्ति जिन सीमाओं तक पहुँच सकता है, उन्हें अवश्य समझना चाहिए। अन्यथा तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्षमता को बढ़ाना परमेश्वर द्वारा उद्धार पाने के लिए है' से उद्धृत

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। ... यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

जिन लोगों के पास सत्य है, वे वही हैं जो अपने वास्तविक अनुभवों में, कभी पीछे हटे बिना, अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, और जो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों के साथ सामान्य संबंध रख सकते हैं, जो अपने ऊपर कुछ बीतने पर पूर्णतः परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाते हैं, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा अभ्यास और तुम्हारे प्रकाशन परमेश्वर की गवाही हैं, वे मनुष्य का जीवनयापन करना और परमेश्वर की गवाही हैं, और यही वास्तव में परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेना है; जब तुमने इस बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम्हें यथोचित प्रभाव की प्राप्ति हो चुकी होगी। तुम्हारे पास वास्तविक जीवनयापन होता है और तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप अन्य लोगों द्वारा प्रशंसा से देखा जाता है। तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण है, किंतु तुम अत्यंत धर्मनिष्ठता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन संप्रेषित करते हो, तब तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित और प्रबुद्ध किए जाते हो। तुम अपने शब्दों के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा कह पाते हो, वास्तविकता संप्रेषित कर पाते हो, और तुम आत्मा से सेवा करने के बारे में बहुत-कुछ समझते हो। तुम अपनी वाणी में खरे हो, तुम शालीन और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं हो और मर्यादित हो, परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कर पाते हो और जब तुम पर कुछ बीतती है तब तुम अपनी गवाही पर दृढता से डटे रहते हो, और तुम चाहे जिससे निपट रहे हो, हमेशा शांत और संयमित रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने सच में परमेश्वर का प्रेम देखा है। कुछ लोग अब भी युवा हैं, परंतु वे मध्यम आयु के व्यक्ति के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व, सत्य से युक्त होते हैं, और दूसरों से प्रशंसित होते हैं—और ये वे लोग हैं जिनके पास गवाही है और वे परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम सबसे विनती करता हूँ कि तुम अपने आपको इतना ऊँचा न समझो; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं कहता हूँ कि कोई भी मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, इस समय तुम मसीह को देखोगे तो तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद कर देगा और बेहद तिरस्कृत करेगा। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारी संगति शायद तुम्हारे बारे में बहुत कुछ न दिखाए, परन्तु जब तुम मसीह के साथ संगति करते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय, तुम्हारी धारणा जड़ पकड़ सकती है, तुम्हारा अहंकार फूटना शुरू कर सकता है, और तुम्हारा विद्रोह फलना-फूलना शुरू कर सकता है। ऐसी मानवता के साथ तुम लोग कैसे मसीह की संगति के काबिल हो सकते हो? क्या तुम उसके साथ प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में परमेश्वर जैसा बर्ताव कर सकते हो? क्या तुममें सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता होगी? तुम सब अपने हृदय में यहोवा के रूप में एक ऊँचे परमेश्वर की आराधना करते हो, लेकिन दृश्यमान मसीह को मनुष्य समझते हो। तुम लोगों की समझ बहुत ही हीन है और तुम्हारी मानवता अत्यंत नीची है! तुम सब सदैव के लिए मसीह को परमेश्वर के रूप में मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम्हारा मन होता है, तुम उसकी ओर लपकते हो और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करने लगते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि उन लोगों का सहभागी जत्था हो जो मसीह के विरूद्ध लड़ते हैं। ऐसे मनुष्यों को भी जो दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाते हैं, इसका प्रतिफल दिया जाता है। फिर भी मसीह को, जिसने तुम्हारे मध्य ऐसा कार्य किया है, न तो मनुष्य का प्रेम मिला है और न ही मनुष्य की तरफ से उसे कोई प्रतिफल या समर्पण मिला है। क्या यह दिल दुखाने वाली बात नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

कुछ लोग यह मान सकते हैं कि यदि परमेश्वर के साथ संगति इतनी खतरनाक है, तो बुद्धिमानी यही होगी कि परमेश्वर से दूर रहा जाए। तब, ऐसे लोगों को भला क्या हासिल होगा? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं? निश्चित ही, परमेश्वर के साथ संगति बहुत कठिन है, परन्तु ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य भ्रष्ट है, न कि इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ नहीं सकता। तुम लोगों के लिए सबसे अच्छा यह होगा कि तुम सब स्वयं को जानने की सच्चाई पर ज़्यादा ध्यान दो। तुम लोग परमेश्वर की कृपा क्यों नहीं प्राप्त कर पाए हो? तुम्हारा स्वभाव उसे घिनौना क्यों लगता है? तुम्हारे शब्द उसके अंदर जुगुप्ता क्यों उत्पन्न करते हैं? जैसे ही तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखाते हो, तो खुद ही तुम अपनी तारीफ करने लगते हो और अपने छोटे से योगदान के लिए पुरस्कार चाहते हो; जब तुम थोड़ी-सी आज्ञाकारिता दिखाते हो तो दूसरों को नीची दृष्टि से देखते हो, और कोई छोटा-मोटा काम संपन्न करते ही तुम परमेश्वर का अनादर करने लगते हो। तुम लोग परमेश्वर का स्वागत करने के बदले में धन-संपत्ति, भेंटों और प्रशंसा की अभिलाषा करते हो। एक या दो सिक्के देते हुए भी तुम्हारा दिल दुखता है; जब तुम दस सिक्के देते हो तो तुम आशीषों की और दूसरों से विशिष्ट माने जाने की अभिलाषा करते हो। तुम लोगों जैसी मानवता के बारे में तो बात करना और सुनना भी अपमानजनक है। क्या तुम्हारे शब्दों और कार्यों में कुछ प्रशंसा योग्य है? वे जो अपने कर्तव्यों को निभाते हैं और वे जो नहीं निभाते; वे जो अगुवाई करते हैं और वे जो अनुसरण करते हैं; वे जो परमेश्वर का स्वागत करते और वे जो नहीं करते; वे जो दान देते हैं और वे जो नहीं देते; वे जो उपदेश देते हैं और वे जो वचन को ग्रहण करते हैं, इत्यादि; इस प्रकार के सभी लोग अपनी तारीफ करते हैं। क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता? तुम लोग भली-भांति जानते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। तुम लोग भली-भांति यह जानते हुए भी कि तुम सब बिल्कुल अयोग्य हो, तुम लोग डींगें मारते रहते हो। क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं होता कि तुम्हारी समझ इतनी खराब हो चुकी है कि तुम्हारे पास अब आत्म-नियंत्रण ही नहीं रहा है? इस तरह की समझ के साथ तुम लोग परमेश्वर के साथ संगति करने के योग्य कैसे हो सकते हो? क्या तुम लोगों को इस मुकाम पर अपने लिए डर नहीं लगता है? तुम्हारा स्वभाव पहले ही इतना खराब हो चुका है कि तुम परमेश्वर के अनुरूप होने में समर्थ नहीं हो। इस बात को देखते हुए, क्या तुम लोगों की आस्था हास्यास्पद नहीं है? क्या तुम्हारी आस्था बेतुकी नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम उस मार्ग का चुनाव कैसे करोगे जिस पर तुम्हें चलना है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

लोग स्वयं से तो बहुत ज़्यादा अपेक्षा नहीं करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर से बहुत अपेक्षा होती है। वे परमेश्वर से उन पर विशेष कृपा दर्शाने और उनके प्रति धैर्यवान और सहनशील होने, उन्हें दुलारने, उनका भरण पोषण करने, उन पर मुस्कुराने, और कई तरीकों से उनकी देखभाल करने के लिए कहते हैं। वे अपेक्षा करते हैं की वो उनके प्रति बिल्कुल भी सख़्त न हो या ऐसा कुछ भी न करे जिससे उन्हें ज़रा सा भी परेशानी हो, और वे केवल तभी संतुष्ट होते हैं यदि वह हर एक दिन उनकी खुशामद करता है। मनुष्य में विवेक की कितनी कमी है! लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें कहाँ रहना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें क्या हासिल करना चाहिए, उनके दृष्टिकोण क्या होने चाहिए, परमेश्वर की सेवा में उन्हें किस स्थिति या पद में खड़े होना चाहिए, और किस स्थान पर उन्हें स्थित होना चाहिए। थोड़ी-सी पदवी पाकर लोग खुद को बहुत बड़ा मानने लगते हैं, और वैसे पद के बिना भी लोग खुद को काफी उच्च मानते हैं। लोग खुद को कभी नहीं समझते हैं। यदि आप लोग अपने-अपने विश्वास को जारी रख सकते हैं, कभी भी शिकायत नहीं करते, और सामान्य रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा करते हैं, चाहे आपसे कुछ भी कहा जाए, चाहे आपके साथ कितनी भी कड़ाई से व्यवहार किया जाए और आपको कितना भी अनदेखा किया जाए, तो आप एक परिपक्व और अनुभवी व्यक्ति होंगे, और आप के पास वास्तव में कुछ कद और सामान्य विवेक होगा। आप परमेश्वर से चीजों की अपेक्षा नहीं करेंगे, आपके पास अत्यधिक इच्छा नहीं होगी, और आप उन चीज़ों के आधार पर जिन्हें आप पसंद करते हैं, दूसरों से या परमेश्वर से उनके लिए अनुरोध नहीं करेंगे। इससे पता चलता है कि आपके पास एक हद तक एक व्यक्ति की अनुरूपता है। वर्तमान में आप लोगों की बहुत अधिक आवश्यकताएँ हैं और वे बहुत ज्यादा हैं। आपके कई इरादे साबित करते हैं कि आप सही स्थिति में खड़े नहीं हैं, आपका पद बहुत ऊँचा है, और आपने खुद को अत्यधिक आदरणीय मान लिया है मानो कि आप परमेश्वर से बहुत कम न हों। इसलिए आप से व्यवहार करना मुश्किल है, और यह वास्तव में शैतान की प्रकृति है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकी होते हैं' से उद्धृत

मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव में एक व्यावहारिक समस्या है जिसके बारे में तुम नहीं जानते; यह एक सबसे गंभीर समस्या है, और यह हर एक व्यक्ति की मानवता में एक आम समस्या है। यह मनुष्यों का सबसे कमजोर बिंदु है। साथ ही, यह मनुष्य की प्रकृति के सार का एक तत्व है जिसका खुलासा करना और जिसे बदलना सबसे मुश्किल है। लोग स्वयं सृष्टि की वस्तु हैं। क्या सृष्टि की वस्तुएं सर्वशक्तिमान हो सकती हैं? क्या वे पूर्णता और निष्कलंकता हासिल कर सकती हैं? क्या वे हर चीज़ में दक्षता हासिल कर सकती हैं, हर चीज़ को समझ सकती हैं, और हर चीज़ को पूरा कर सकती हैं? वे ऐसा नहीं कर सकतीं। हालांकि, मनुष्यों में एक कमजोरी है। जैसे ही लोग किसी कौशल या पेशे को सीख लेते हैं, वे यह महसूस करने लगते हैं कि वे सक्षम हो गये हैं, वे रुतबे और हैसियत वाले लोग हैं, और वे पेशेवर हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे खुद को कितना "सक्षम" समझते हैं, वे सभी अपने तुमको एक आकर्षक रूप में पेश करना चाहते हैं, अपने तुमको बड़े व्यक्तित्वों के छद्म वेश में छिपा लेते हैं, दिखने में पूर्ण और निष्कलंक लगते हैं, जिसमें एक भी दोष नहीं है; दूसरों की नज़रों में, वे महान, शक्तिशाली, पूरी तरह से सक्षम, और कुछ भी कर सकने वाला समझा जाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे किसी मामले में दूसरों की मदद माँगते हैं, तो वे असमर्थ, कमज़ोर और हीन दिखाई देंगे और लोग उन्हें नीची नज़रों से देखेंगे। इस कारण से, वे हमेशा एक झूठा चेहरा बनाए रखना चाहते हैं। जब कुछ लोगों से कुछ करने के लिए कहा जाता है, तो वे कहते हैं कि उन्हें पता है कि यह कैसे करना है, जब कि वे वास्तव में नहीं जानते हैं। बाद में, चुपचाप, वे इसे देखते हैं और यह सीखने की कोशिश करते हैं कि इसे कैसे किया जाए, लेकिन कई दिनों तक इसका अध्ययन करने के बाद भी, वे इसे समझ नहीं पाते हैं; उन्हें कोई सुराग नहीं मिलता है। यह पूछे जाने पर कि वे इसके साथ कैसे चल रहे हैं, वे एक ढोंग करते हैं ताकि अपने दोषों और कमज़ोरियों को उजागर न करना पड़े, बजाय इसके, वे कह देते हैं कि वे जल्द ही इसे समाप्त कर लेंगे। यह किस तरह का स्वभाव है? ऐसे लोग बहुत घमंडी होते हैं, उन्होंने अपना सारा विवेक खो दिया है! वे आम या सामान्य लोगों की तरह होना, या केवल नश्वर जीव बनना, नहीं चाहते हैं। वे तो बस अतिमानव, या विशेष क्षमताओं या शक्तियों वाला कोई व्यक्ति, बनना चाहते हैं। यह तो बहुत बड़ी समस्या है! जहां तक कमजोरी, कमियों, अज्ञानता, मूर्खता, या सामान्य मानवता की समझ न होने की बात है, वे इन चीज़ों को ढँक देते हैं, इनको अच्छे से लपेट देते हैं, दूसरे लोगों को इसे देखने नहीं देते, और फिर खुद को छद्म वेश में छिपाये रखते हैं। इस तरह के लोग आसमान में उड़ते रहते हैं, है कि नहीं? क्या वे सपने नहीं देख रहे हैं? वे यह नहीं जानते कि वे स्वयं क्या हैं, न ही वे सामान्य मनुष्य की तरह जिंदगी जीने का तरीका जानते हैं। उन्होंने एक बार भी व्यवहारिक मनुष्यों की तरह काम नहीं किया है। अपने व्यवहार में, अगर लोग इस तरह के मार्ग को चुनते हैं—अपने पैरों को ज़मीन पर रखने के बजाय हमेशा आसमान में उड़ते रहते हैं—तो वे निश्चित ही समस्याओं का सामना करेंगे। ईमानदारी से कहा जाये तो, अगर तुम ऐसा करते हो, फिर तुम चाहे जैसे भी परमेश्वर में विश्वास करते हो, तुम सत्य को नहीं समझ पाओगे, न ही तुम सत्य को हासिल करने में सक्षम होगे, क्योंकि जीवन में जिस तरह का मार्ग तुमने चुना है वो सही नहीं है, तुम्हारा प्रारंभिक बिंदु ही गलत है। तुम्हें ज़मीन पर चलने का तरीका सीखना होगा, और तुम्हें स्थिरता से, एक बार में एक क़दम उठाकर चलना सीखना होगा। अगर तुम चल सकते हो, तो चलो; दौड़ने का तरीका सीखने की कोशिश मत करो। अगर तुम एक बार में एक ही क़दम चल सकते हो, तो एक बार में दो क़दम चलने की कोशिश मत करो। तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिये जिसके पैर मजबूती से ज़मीन पर टिके हों। अलौकिक, महान, या अभिमानी बनने की कोशिश मत करो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ' से उद्धृत

क्रूर मानवजाति! साँठ-गाँठ और साज़िश, एक-दूसरे से छीनना और हथियाना, प्रसिद्धि और संपत्ति के लिए हाथापाई, आपसी कत्लेआम—यह सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर द्वारा बोले गए लाखों वचनों के बावजूद किसी को भी होश नहीं आया है। लोग अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, भावी संभावनाओं, हैसियत, महत्वाकांक्षा और पैसों के लिए, भोजन, कपड़ों और देह-सुख के वास्ते कार्य करते हैं। पर क्या कोई ऐसा है, जिसके कार्य वास्तव में परमेश्वर के वास्ते हैं? यहाँ तक कि जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, उनमें से भी बहुत थोड़े ही हैं, जो परमेश्वर को जानते हैं। कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते? और इसलिए, परमेश्वर को असंख्य बार बलात् मृत्युदंड दिया गया है, और अनगिनत बर्बर न्यायाधीशों ने परमेश्वर की निंदा की है और एक बार फिर उसे सलीब पर चढ़ाया है। कितने लोगों को इसलिए धर्मी कहा जा सकता है, क्योंकि वे वास्तव में परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

कुछ लोग विपरीत लिंग के साथ संपर्क के प्रति अपने दृष्टिकोण में बहुत बेपरवाह होते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक कुछ भी न हो, न तो दोनों में से कोई भी वासनापूर्ण विचारों में लिप्त हो और न ही किसी अनुचित कामोन्माद को प्रकट करे, तब तक यह कोई बड़ी बात नहीं है। क्या सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति को ऐसे विचार रखने चाहिए? क्या यह सामान्य मानवता का संकेत है? एक बार जब तुम शादी करने की उम्र के हो जाते हो तथा विपरीत लिंग के संपर्क में आते हो, और प्रेम में पड़ना चाहते हो, तो इसे सामान्य रूप से करो, और दूसरा कोई भी हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेकिन कुछ लोग प्रेम में पड़ना नहीं चाहते—जो भी उनकी नज़रों में पड़ जाए, वे कुछ दिनों के लिए उनसे चोंचले करते हैं, और जैसे ही कोई उन्हें भाने लग जाए, वे जिसे चाहते हैं उसके प्रति दिखावा करना शुरू कर देते हैं। और वे कैसे दिखावा करते हैं? एक उठी हुई भौंह, आँख मारना, या बात करते समय उनके स्वर में परिवर्तन, या फिर वे एक निश्चित तरीके से हलचल करते हैं या खुद की सराहना के लिए हास्यपूर्ण टीकाएँ करना शुरू करते हैं; यह दिखावा करना है। जब कोई ऐसा व्यक्ति जो सामान्यतः इस तरह का नहीं होता, इन सूचक लक्षणों का प्रदर्शन करने लगता है, तो तुम यह सुनिश्चित कर सकते हो कि उसके आस-पास विपरीत लिंग के कुछ सदस्य हैं जिन्हें उसने देख लिया है। ऐसे लोग कौन होते हैं? तुम कह सकते हो कि वे असंयमित होते हैं, या पुरुषों और महिलाओं के बीच स्पष्ट सीमाएँ नहीं रखते हैं, लेकिन उन्होंने किसी निंदनीय व्यवहार का प्रदर्शन नहीं किया होता है। कुछ लोग कह सकते हैं कि वे तो बस छिछोरे हैं। दूसरे शब्दों में, वे अपने आप को एक अमर्यादित रूप से पेश करते हैं; उथले लोग आत्म-सम्मान की आवश्यकता को नहीं समझते हैं। कुछ लोग रोज़मर्रा की ज़िदगी में इन लक्षणों का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन उनके कर्तव्यों का निष्पादन इससे प्रभावित नहीं होता है, और न ही यह उनके काम के पूरा होने को प्रभावित करता है, तो क्या यह वास्तव में कोई समस्या है? कुछ लोग कहते हैं: "जब तक यह तुम्हारे लिए सत्य की तलाश में बाधा नहीं बनता है, तब तक क्या इसके बारे में बात करने की कोई आवश्यकता है?" इसका सम्बंध किससे होता है? किसी की मानवता की लज्जा और गरिमा से। एक व्यक्ति की मानवता लज्जा और गरिमा से रहित नहीं हो सकती, और इनके बिना उनकी मानवता, सामान्य मानवता नहीं हो सकती है। कुछ लोग विश्वसनीय होते हैं और वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें वे गंभीर और ज़िम्मेदार होते हैं। वे कड़ी मेहनत करते हैं, और अच्छे चरित्र के होते हैं, लेकिन वे अपने जीवन के बस इस पहलू को गंभीरता से नहीं लेते हैं। जब तुम विपरीत लिंग के किसी सदस्य के साथ छेड़खानी करते हो, तो क्या यह रचनात्मक होता है, या विनाशकारी? क्या होगा यदि तुम जिससे छेड़खानी करते हो, वह तुम्हें प्यार करने लगे? तुम कह सकते हो कि "मैं जो चाहता था वह वो नहीं है"; ठीक है, अगर जो तुम चाहते हो वह यह नहीं लेकिन फिर भी तुम किसी के साथ छेड़खानी करते हो, तो क्या तुम उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे हो? तुम उसे नुकसान पहुँचा रहे हो और अनैतिक काम कर रहे हो! ऐसा करने वाले लोग बहुत हीन मानवता के होते हैं। इसके अलावा, यदि तुम इस सम्बंध को आगे बढ़ाने का इरादा नहीं रखते हो और इसके बारे में गंभीर नहीं हो, और फिर भी तुम विपरीत लिंग के प्रति अपनी भौंहें उठाते और आँख मारते हो, और मस्ती और हास्य के साथ दिखावा करते हो, तथा तुम्हारे पास एक शैली है और तुम एक आकर्षक पुरुष हो यह दिखाने के लिए सब कुछ करते हो, और अपने रूप का प्रदर्शन करते हो—यदि तुम इस तरह दिखावा करते हो, तो तुम वास्तव में क्या कर रहे हो? (लोगों को पथभ्रष्ट कर रहे हो)। तो अब इस तरह का मोहक व्यवहार एक श्रेष्ठ चीज़ है या एक घिनौनी चीज़? (यह एक घिनौनी चीज़ है।) यह वह जगह है जहाँ अब कोई गरिमा नहीं होती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (9)' से उद्धृत

बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार” के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

तुम लोगों का विश्वास बहुत सुंदर है; तुम्हारा कहना है कि तुम अपना सारा जीवन-काल मेरे कार्य के लिए खपाने को तैयार हो, और तुम इसके लिए अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार हो, लेकिन तुम्हारे स्वभाव में अधिक बदलाव नहीं आया है। तुम लोग बस हेकड़ी से बोलते हो, बावजूद इस तथ्य के कि तुम्हारा वास्तविक व्यवहार बहुत घिनौना है। यह ऐसा है जैसे कि लोगों की जीभ और होंठ तो स्वर्ग में हों, लेकिन उनके पैर बहुत नीचे पृथ्वी पर हों, परिणामस्वरूप उनके वचन और कर्म तथा उनकी प्रतिष्ठा अभी भी चिथड़ा-चिथड़ा और विध्वस्त हैं। तुम लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है, तुम्हारा ढंग खराब है, तुम्हारे बोलने का तरीका निम्न कोटि का है, तुम्हारा जीवन घृणित है; यहाँ तक कि तुम्हारी सारी मनुष्यता डूबकर नीच अधमता में पहुँच गई है। तुम दूसरों के प्रति संकीर्ण सोच रखते हो और छोटी-छोटी बात पर बखेड़ा करते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को लेकर इस हद तक झगड़ते हो कि नरक और आग की झील में उतरने तक को तैयार रहते हो। तुम लोगों के वर्तमान वचन और कर्म मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी हैं कि तुम लोग पापी हो। मेरे कार्य के प्रति तुम लोगों का रवैया मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी है कि तुम लोग अधर्मी हो, और तुम लोगों के समस्त स्वभाव यह इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग घृणित आत्माएँ हो, जो गंदगी से भरी हैं। तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ और जो कुछ भी तुम प्रकट करते हो, वह यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम वे लोग हो, जिन्होंने अशुद्ध आत्माओं का पेट भरकर रक्त पी लिया है। जब राज्य में प्रवेश करने का जिक्र होता है, तो तुम लोग अपनी भावनाएँ जाहिर नहीं करते। क्या तुम लोग मानते हो कि तुम्हारा मौजूदा ढंग तुम्हें मेरे स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश कराने के लिए पर्याप्त है? क्या तुम लोग मानते हो कि तुम मेरे कार्य और वचनों की पवित्र भूमि में प्रवेश पा सकते हो, इससे पहले कि मैं तुम लोगों के वचनों और कर्मों का परीक्षण करूँ? कौन है, जो मेरी आँखों में धूल झोंक सकता है? तुम लोगों का घृणित, नीच व्यवहार और बातचीत मेरी दृष्टि से कैसे छिपे रह सकते हैं? तुम लोगों के जीवन मेरे द्वारा उन अशुद्ध आत्माओं का रक्त और मांस पीने और खाने वालों के जीवन के रूप में तय किए गए हैं, क्योंकि तुम लोग रोज़ाना मेरे सामने उनका अनुकरण करते हो। मेरे सामने तुम्हारा व्यवहार विशेष रूप से ख़राब रहा है, तो मैं तुम्हें घृणित कैसे न समझता? तुम्हारे शब्दों में अशुद्ध आत्माओं की अपवित्रताएँ है : तुम फुसलाते हो, भेद छिपाते हो चापलूसी करते हो, ठीक उन लोगों की तरह जो टोने-टोटकों में संलग्न रहते हैं और उनकी तरह भी जो विश्वासघाती हैं और अधर्मियों का खून पीते हैं। मनुष्य के समस्त भाव बेहद अधार्मिक हैं, तो फिर सभी लोगों को पवित्र भूमि में कैसे रखा जा सकता है, जहाँ धर्मी रहते हैं? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा यह घिनौना व्यवहार तुम्हें उन अधर्मी लोगों की तुलना में पवित्र होने की पहचान दिला सकता है? तुम्हारी साँप जैसी जीभ अंततः तुम्हारी इस देह का नाश कर देगी, जो तबाही बरपाती है और घृणा ढोती है, और तुम्हारे वे हाथ भी, जो अशुद्ध आत्माओं के रक्त से सने हैं, अंततः तुम्हारी आत्मा को नरक में खींच लेंगे। तो फिर तुम मैल से सने अपने हाथों को साफ़ करने का यह मौका क्यों नहीं लपकते? और तुम अधर्मी शब्द बोलने वाली अपनी इस जीभ को काटकर फेंकने के लिए इस अवसर का लाभ क्यों नहीं उठाते? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने हाथों, जीभ और होंठों के लिए नरक की आग में जलने के लिए तैयार हो? मैं अपनी दोनों आँखों से हरेक व्यक्ति के दिल पर नज़र रखता हूँ, क्योंकि मानव-जाति के निर्माण से बहुत पहले मैंने उनके दिलों को अपने हाथों में पकड़ा था। मैंने बहुत पहले लोगों के दिलों के भीतर झाँककर देख लिया था, इसलिए उनके विचार मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते थे? मेरे आत्मा द्वारा जलाए जाने से बचने में उन्हें ज्यादा देर कैसे नहीं हो सकती थी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

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