15. परमेश्वर के प्रति शपथ लेने के सिद्धांत

(1) यह समझना आवश्यक है कि परमेश्वर द्वारा मनुष्य की जाँच-पड़ताल उसके अंतरतम हृदय तक फैली होती है। सब कुछ उसकी जाँच के अधीन होता है। परमेश्वर के प्रति केवल वे शपथ और प्रतिज्ञाएँ महत्वपूर्ण होती हैं जो उसे संतुष्ट करने के इरादे से की जाती हैं।

(2) परमेश्वर के प्रति शपथ और प्रतिज्ञा करने में, एक ऐसा हृदय अपरिहार्य होता है जो उसका भय मानता हो और उसके प्रति समर्पण करता हो; इस तरह के एक हृदय के साथ, व्यक्ति खुद को न्याय की ओर झुकाने और अपनी गवाही में दृढ़ रहने के लिए प्रेरित होता है।

(3) परमेश्वर के प्रति शपथ और प्रतिज्ञा जीवन-प्रवेश की सेवा में की जाती है। कोई भी अपने स्वयं के इरादों को पूरा करने के लिए झूठी शपथ लेकर परमेश्वर का शोषण नहीं कर सकता।

(4) परमेश्वर के प्रति कोई शपथ और प्रतिज्ञा करने के बाद, इसे निभाना और इसके पूरा करने के लिए जरूरी काम करने का प्रयास करना आवश्यक होता है। ऐसा न करना ज़िम्मेदारी का त्याग है; यह परमेश्वर का शोषण करने और उसे धोखा देने के लिए रचा गया झूठ है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

चूँकि तुम पहले ही मेरी सेवा करने का संकल्प ले चुके हो, इसलिए मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं ईर्ष्यालु परमेश्वर हूँ, और मैं वह परमेश्वर हूँ, जो मनुष्य के प्रति शंकालु है। चूँकि तुमने पहले ही अपने शब्दों को वेदी पर रख दिया है, इसलिए मैं यह बरदाश्त नहीं करूँगा कि तुम मेरी ही आँखों के सामने से भाग जाओ, न ही मैं यह बरदाश्त करूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदी पर और मेरी आँखों के सामने अपने शब्दों को रखने के बाद तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से मुझे मूर्ख कैसे बनाने दे सकता हूँ? क्या तुम्हें लगता था कि तुम अपनी जीभ से यूँ ही मेरे लिए प्रतिज्ञा और शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन की शपथ कैसे ले सकते हो, मेरा सिंहासन, मैं जो सबसे ऊँचा हूँ? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले ही खत्म हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बता दूँ : तुम्हारी देह भले ही खत्म हो जाए, पर तुम्हारी शपथ खत्म नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हें दंड दूंगा। हालाँकि तुम लोगों को लगता है कि अपने शब्द मेरे सामने रखकर मेरा सामना कर लोगे, और तुम लोगों के दिल अशुद्ध और बुरी आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। मेरा क्रोध उन कुत्ते और सुअर जैसे लोगों को कैसे सहन कर सकता है, जो मुझे धोखा देते हैं? मुझे अपने प्रशासनिक आदेश कार्यान्वित करने होंगे, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी पाखंडी, "पवित्र" लोगों को वापस खींचना होगा जिनका मुझमें विश्वास है, ताकि वे एक अनुशासित प्रकार से मेरे लिए "सेवारत" हो सकें, मेरे बैल बन सकें, मेरे घोड़े बन सकें, मेरे संहार की दया पर रह सकें। मैं तुमसे तुम्हारा पिछला संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। मैं ऐसे किसी भी सृजित प्राणी को बरदाश्त नहीं करूँगा, जो मुझे धोखा दे। तुम्हें क्या लगा कि तुम बस बेहूदगी से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने झूठ बोल सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे वचन और कर्म सुने या देखे नहीं? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि में कैसे नहीं आ सकते? मैं लोगों को इस तरह अपने को धोखा कैसे देने दे सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

तुममें से किसने मेरे सम्मुख संकल्प लेकर उन्हें बाद में छोड़ा नहीं है? किसने बार-बार चीज़ों पर ध्यान देने के बजाय मेरे सामने दीर्घकालिक संकल्प लिए हैं? हमेशा, मनुष्य अपने सहूलियत के समय में मेरे सम्मुख संकल्प करते हैं और विपत्ति के समय उन्हें छोड़ देते हैं; बाद में वे अपना संकल्प दोबारा उठा लेते हैं और मेरे सम्मुख स्थापित कर देते हैं। क्या मैं इतना अनादरणीय हूँ कि मनुष्य द्वारा कूड़े के ढेर से उठाये गए इस कचरे को यूँ ही स्वीकार कर लूँगा? कुछ मनुष्य अपने संकल्पों पर अडिग रहते हैं, कुछ पवित्र होते हैं और कुछ अपने बलिदान के रूप में मुझे अपनी सबसे बहुमूल्य चीज़ें अर्पित करते हैं। क्या तुम सभी लोग इसी तरह के नहीं हो? यदि, तुम राज्य में मेरे लोगों के एक सदस्य के रूप में, अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ हो, तो तुम लोग मेरे द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिए जाओगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 14' से उद्धृत

धार्मिक अनुष्ठान की प्रार्थनाओं से ज़्यादा परमेश्वर किसी भी दूसरी चीज़ से अधिक घृणा नहीं करता है। परमेश्वर से की गयी प्रार्थनाएँ तभी स्वीकार होती हैं जब वे सच्ची होती हैं। अगर तुम्हारे पास ईमानदारी से कहने को कुछ नहीं है, तो चुप रहो; उसे धोखा देने की कोशिश करते हुए, उससे कितना प्रेम करते हो और उसके प्रति कितने निष्ठावान बने रहना चाहते हो, यह बताते हुए हमेशा झूठे शब्द न बोलो और परमेश्वर के सामने आँख मूँद कर शपथ मत लो। अगर तुम अपनी इच्छाएँ पूरी करने के काबिल नहीं हो, तुममें यह दृढ़ निश्चय और आध्यात्मिक कद नहीं है, तो किसी भी हालत में, परमेश्वर के सामने ऐसी प्रर्थना मत करो। यह उपहास होता है। उपहास का मतलब किसी का मखौल उड़ाना, उसके साथ तुच्छता से पेश आना होता है। जब लोग इस प्रकार के स्वभाव के साथ परमेश्वर के सामने प्रार्थना करते हैं, तो यह धोखे से कम कुछ नहीं होता। बदतर यह है कि अगर तुम अक्सर ऐसा करते हो, तो तुम बहुत घिनौने चरित्र वाले हो। यदि परमेश्वर को तुम्हें इन कर्मों के लिए दंड देना हो, तो इन्हें ईश-निंदा कहा जाएगा! लोगों में परमेश्वर के प्रति आदर नहीं है, वे उसका सम्मान करना नहीं जानते, या नहीं जानते कि उससे प्रेम कैसे करें, उसे कैसे संतुष्ट करें। यदि वे सत्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, या उनका स्वभाव भ्रष्ट है, तो परमेश्वर इसे जाने देगा। लेकिन वे ऐसे चरित्र के साथ परमेश्वर के सामने चले आते हैं, और परमेश्वर से ऐसे पेश आते हैं जैसे कि अविश्वासी दूसरे लोगों के साथ पेश आते हैं। यही नहीं, वे सत्यनिष्ठा से परमेश्वर के सामने प्रार्थना में घुटने टेकते हैं, इन शब्दों का उपयोग करके उसकी खुशामद करने की कोशिश करते हैं, और सब कर लेने पर उन्हें आत्मनिंदा तो महसूस होती नहीं, बल्कि उन्हें अपने कर्मों की गंभीरता का भी एहसास नहीं होता। स्थिति ऐसी होने पर, क्या परमेश्वर उनके साथ होता है? क्या कोई इंसान जिसके पास परमेश्वर की मौजूदगी है ही नहीं, वह प्रबुद्ध और प्रकाशित हो सकता है? क्या वह सत्य से प्रबुद्ध हो सकता है? (नहीं, नहीं हो सकता।) फिर वे मुसीबत में हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानकर ही तुम सत्‍य की खोज कर सकते हो' से उद्धृत

तुझे हर समय, जब तू प्रार्थना करता है, जब तू अपने भाई-बहनों के साथ बातचीत और संगति करता है, और जब तू अपना कर्तव्य करता है और अपने काम में लगा रहता है, तो तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख अवश्य रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, यदि तेरे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम है, और यदि तू परमेश्वर की देखभाल, संरक्षण और छानबीन की तलाश करता है, यदि ये चीज़ें तेरे इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली होंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोल कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और बिना झूठ बोले परमेश्वर से बोल देता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावशाली होंगी। यदि तू ईमानदारी से अपने दिल में परमेश्वर से प्रेम करता है, तो परमेश्वर से एक प्रतिज्ञा कर : "परमेश्वर, जो कि स्वर्ग में और पृथ्वी पर और सब वस्तुओं में है, मैं तुझसे प्रतिज्ञा करता हूँ : तेरा आत्मा, जो कुछ मैं करता हूँ, उसे जाँचे और मेरी सुरक्षा करे और हर समय मेरी देखभाल करे, इसे संभव बनाए कि मेरे सभी कृत्य तेरी उपस्थिति में खड़े रह सकें। यदि कभी भी मेरा हृदय तुझसे प्यार करना बंद कर दे, या यह कभी भी तुझसे विश्वासघात करे, तो तू मुझे कठोरता से ताड़ना और श्राप दे। मुझे ना तो इस जगत में और न आगे क्षमा कर!" क्या तू ऐसी शपथ खाने की हिम्मत करता है? यदि तू नहीं करता है, तो यह दर्शाता है कि तू कायर है, और तू अभी भी खुद से ही प्यार करता है। क्या तुम लोगों के पास यह संकल्प है? यदि वास्तव में यही तेरा संकल्प है, तो तुझे प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। यदि तेरे पास ऐसी प्रतिज्ञा लेने का संकल्प है, तो परमेश्वर तेरे संकल्प को पूरा करेगा। जब तू परमेश्वर से प्रतिज्ञा करता है, तो वह सुनता है। परमेश्वर तेरी प्रार्थना और तेरे अभ्यास से निर्धारित करता है कि तू पापी है या धार्मिक। यह अब तुम लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया है, और यदि पूर्ण बनाए जाने पर वास्तव में तुझे विश्वास है, तो तू जो कुछ भी करता है, वह सब परमेश्वर के सम्मुख लाएगा और उसकी छानबीन को स्वीकार करेगा; और यदि तू कुछ ऐसा करता है जो उग्र रूप से विद्रोहशील है या यदि तू परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा, और तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तेरे साथ क्या होता है, चाहे वह विनाश हो या ताड़ना, यह तेरे स्वयं का कार्य है। तूने प्रतिज्ञा ली थी, इसलिए तुझे ही इसका पालन करना चाहिए। यदि तूने कोई प्रतिज्ञा की, लेकिन उसका पालन नहीं किया, तो तुझे विनाश भुगतना होगा। चूँकि प्रतिज्ञा तेरी थी, परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा। कुछ लोग प्रार्थना के बाद डरते हैं, और विलाप करते हैं, "सब ख़त्म हो गया! व्यभिचार का मेरा मौका चला गया; दुष्ट चीजें करने का मेरा मौका चला गया; सांसारिक लालचों में लिप्त होने का मेरा मौका चला गया!" ऐसे लोग अभी भी सांसारिकता और पाप को ही प्यार करते हैं, और उन्हें निश्चित ही विनाश को भुगतना पड़ेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

मान लो कि परमेश्वर को दिए गए चढ़ावे की अच्छी देखभाल करने के लिए कोई व्यक्ति एक शपथ लिखता है: सूझ-बूझ और मानवता वाला कोई व्यक्ति क्या लिखेगा? अपने उचित स्थान में खड़े होने और अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने के लिए, उसे किस तरह के लहजे और किन शब्दों में इसे लिखना चाहिए? यह कोई साधारण बात नहीं है—विवेकशील लोग यह बता सकते हैं। ऐसे लोगों को देखें जो असामान्य होते हैं: शैतान, मसीह-विरोधी, काम-चलाऊ—उनके भाषण में एक निश्चित लहजा होता है। उदाहरण के लिए, पहली बात जो जॉन डो कहता है, "अगर मैं, जॉन डो, परमेश्वर को दिए गए प्रसाद के एक पैसे का भी लालच रखूँ, तो मैं एक भयानक मौत के लिए अभिशप्त हो जाऊँ—दरवाजे से बाहर निकलते समय किसी कार से मारा जाऊँ...।" यह किस तरह का लहजा है? यह "मैं" शब्द से शुरू होता है। यह बहुत ही असंयत है; इसके स्वर और इसकी शैली के पीछे की प्रेरणा पाठ में स्पष्ट है। क्या यह एक असंयत शपथ नहीं है? इस तरह की शपथ क्या होती है? यह वही है जो झूठे होने के रूप में जाना जाता है, एक पाखंडी होने के रूप में। यह तो बहुत ही अहंकारी शपथ है—तो इसमें अहंकारी होने की क्या बात है? तुम परमेश्वर के सामने शपथ ले रहे हो; एक सामान्य व्यक्ति संयमित होगा, अपने उचित स्थान पर खड़ा होगा और परमेश्वर से अपनी अंतरात्मा की बात कहेगा। वे शब्द आडंबरपूर्ण और दम्भी नहीं होंगे। शपथ लेते समय भी जो लोग इतने अहंकारी होते हैं, उनका स्वभाव कैसा होता है? और उनकी शपथ सच्ची होती है या झूठी? यह कहना मुश्किल होता है। उनका मतलब यह होता है, "क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है? क्या तुम डरते हो कि मैं परमेश्वर के घर का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा हूँ, क्या तुम्हें डर है कि मैं परमेश्वर को दिए गए चढ़ावे को चुरा लूँगा? तुम मेरा उपयोग तो करते हो, लेकिन मुझ पर विश्वास नहीं करते, और यहाँ तक कि मुझे शपथ भी दिलाते हो। ठीक है, मैं शपथ लूँगा—मुझे देखो!" यह कैसा रवैया है? अहंकारी होने का यही अर्थ होता है, अनैतिक होना; वे परमेश्वर को धमकाने का साहस करते हैं और अपने बुरे इरादे को छिपाने के लिए शपथ का उपयोग करते हैं। क्या यह परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखना है? इसमें तो न्यूनतम पवित्रता भी नहीं होती है। ऐसे लोग शैतान और मसीह-विरोधी होते हैं; इस तरह की बातें मसीह-विरोधी किया करते हैं। यह कैसा स्वभाव होता है जो शपथ ग्रहण करते समय इस तरह शेखी बघारता है? क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? क्या तुम लोगों ने कभी ऐसे लोगों का सामना किया है? तुम लोग ऐसे लोगों के व्यवहार, उद्गार या स्वभाव को नहीं पहचान सकते, क्या तुम पहचान सकते हो? तुममें से कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ये लोग सुलझे हुए और ईमानदार होते हैं, आध्यात्मिक बातों को समझते हैं और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होते हैं। क्या यह विवेक की कमी नहीं है? जब तुम्हें इस तरह के अधम व्यवहार और स्वभाव में कोई ग़लती नहीं दिखती है जो कि उनकी शपथ के शाब्दिक अर्थ और शब्द-रचना से स्पष्ट है, तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुम सच्चाई को बहुत कम समझते हो? ऐसा लगता है कि तुम सब केवल सिद्धांत ही समझते हो। जितनी अधिक विस्तृत और व्यावहारिक कोई चीज़ होती है, उतना ही कम तुम इसे पहचान पाते हो; कोई चीज़ जितनी अधिक सिद्धांत-वादी होती है, तुम उसे व्यक्त करने में उतने ही बेहतर होते हो, लय से खोखले नारे लगाते रहते हो। क्या तुम लोगों ने कभी ऐसी शपथ लिखी है? (हाँ)। संक्षेप में, कोई अंतर नहीं है। शपथ लेना कोई तत्परता से खुद को युद्ध में झोंककर एक नायक की मौत मरने जैसा नहीं होता है; शपथ के लिए इस प्रकार की युद्ध करने की भावना की आवश्यकता नहीं होती है। जब तुम परमेश्वर के सामने कोई शपथ लेते हो, तो ध्यान से सोचो: तुम्हें यह समझना चाहिए कि तुम इसे क्यों लिख रहे हो, किसके लिए तुम यह शपथ ले रहे, और किसे आश्वासन दे रहे हो। परमेश्वर लोगों से एक निश्चित रवैया चाहता है, एक लड़ाई की भावना नहीं। तुम्हारी लड़ाई की भावना दम्भ और शेखी है; यह एक अहंकारी, शैतानी स्वभाव की अभिव्यक्ति है। ऐसा करना धर्मपरायणता नहीं, और वो नहीं जो एक सृजित प्राणी के द्वारा प्रकट किया जाना चाहिए, एक सृजित प्राणी की स्थिति को तो यह और भी कम प्रतिबिंबित करता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना उन्नयन करते हैं और अपने बारे में गवाही देते हैं' से उद्धृत

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