129. सुधार करने और दूसरों से क्षमा माँगने के सिद्धांत

(1) यदि किसी ने एक भाई या बहन से छल किया है या उसे चोट पहुँचाई है और उन्हें नकारात्मक और कमजोर बना दिया है, तो उसे निश्चित रूप से इसे सुधार लेना चाहिए और माफी माँगनी चाहिए और उस व्यक्ति से क्षमा पाने का प्रयास करना चाहिए।

(2) क्षमायाचना तथ्य पर आधारित होनी चाहिए। व्यक्ति को एक नेक और सच्चे दिल से माफी माँगनी चाहिए, न कि केवल जरा-से, अनमने शब्दों की झूठी पेशकश करनी चाहिए।

(3) किसी के द्वारा गलत समझे जाने पर, यदि आवश्यकता हो तो कोई उस व्यक्ति को तथ्यों की सच्चाई समझा सकता है। व्यक्ति को धोखेबाज नहीं होना चाहिए, सिद्धांतों के बिना न तो सुलह करनी चाहिए और न ही माफी माँगनी चाहिए।

(4) अपने भाइयों और बहनों के साथ बातचीत में, व्यक्ति को अक्सर सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए और आत्म-चिंतन करना चाहिए। एक-दूसरे से प्रेम करो और एक-दूसरे के दिलों को जान लो, फिर तुम दूसरों के साथ ताल-मेल स्थापित कर पाओगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

किसी निश्चित पृष्ठभूमि या किसी निश्चित परिवेश में, तुमने महसूस किया होगा कि एक निश्चित तरीके से काम करना काफी बुद्धिमत्तापूर्ण था या तुम्हारे पास वैसा करने के पर्याप्त कारण थे, और इसलिए तुमने उसे किया; बाद में तुम्हें महसूस हुआ कि अपने कार्यों में तुम पूरी तरह से न्यायसंगत थे और तुम्हें कोई पछतावा नहीं हुआ। जब शाम हुई और तुमने अपने द्वारा किए गए कार्यों पर विचार किया—या किसी दिन जब तुम्हें प्रबुद्धता प्राप्त हुई या तुम्हें धिक्कारा गया—तब तुमने महसूस किया कि उस समय तुमने जो कारण दिया था, वह बिलकुल भी कोई कारण नहीं था, और कि तुम्हें किसी दूसरे तरीके से व्यवहार करना चाहिए था। ऐसे समय तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? उदाहरण के लिए, मान लो, तुमने किसी को धोखा दिया या उससे गंदी बातें कहीं और उसमें तुम्हारे अपने गूढ़ प्रयोजन थे। ठीक है, तुम्हें जाकर उस व्यक्ति को ढूँढ़ना चाहिए और अपने कार्यों का विश्लेषण करना चाहिए। तुम्हें कहना चाहिए : "उस समय मैंने जो तुमसे कहा, उसमें मेरा गूढ़ प्रयोजन था। यदि तुम मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर सकते हो, तो कृपया मुझे क्षमा कर दो।" इस तरह तुम अपना विश्लेषण करते हो और स्वयं को उजागर कर देते हो। एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए, जो कि अपना विश्लेषण करता है और स्वयं को उजागर कर देता है, हिम्मत चाहिए। लोग परमेश्वर के सामने चाहे प्रार्थना करने और अपनी गलतियाँ स्वीकार करने के लिए आएँ या पश्चात्ताप करने के लिए, या अपने भ्रष्ट स्वभावों का विश्लेषण करने के लिए, वे जो चाहे कह सकते हैं, क्योंकि लोग अपनी बंद आँखों से कुछ नहीं देख सकते। यह हवा से बात करने जैसा है; वे खुद को प्रकाश में ला सकते हैं, और ऐसा करते समय वे वह सब कह सकते हैं, जो वे पहले सोच और कह रहे थे, जो भी प्रयोजन उन्होंने पाले थे, जिस भी धोखाधड़ी में वे लिप्त रहे थे। जबकि यदि तुम खुद को किसी दूसरे व्यक्ति के सामने उजागर करते हो, तो तुम्हारी हिम्मत जवाब दे सकती है और तुम्हारा ऐसा करने का अपना संकल्प टूट सकता है, क्योंकि तुम अपमान से बचना चाहते हो; इस प्रकार, इन चीजों को व्यवहार में लाना तुम्हारे लिए बहुत मुश्किल होगा। यदि तुम्हें सामान्य रूप से बोलने के लिए कहा जाए, तो तुम यह कहने में सक्षम होते हो कि जो चीजें तुम करते या कहते हो, उनके पीछे कभी-कभी व्यक्तिगत कारण और गूढ़ प्रयोजन होते हैं, और कि तुम्हारे वचनों और कार्यों में विश्वासघात, अशुद्धियाँ, झूठ और धोखेबाजी होती है। लेकिन जब तुम्हारे सामने कोई ऐसी समस्या आती है, जिसमें तुम्हें यह उजागर करना पड़ता है कि शुरू से अंत तक तुम्हारे साथ कैसे क्या हुआ जो तुमने वैसा किया, तुम्हारे द्वारा कहे गए कौन-से शब्द कपट से भरे थे, उनमें किस तरह के गूढ़ प्रयोजन थे, तुम क्या सोच रह थे, और तुम कितने द्वेषपूर्ण और कपटी थे, तब तुम बुरी तरह से घबरा सकते हो और खुद को उस सीमा तक उजागर करने या अपने कथन में उतना विशिष्ट होने के लिए तैयार नहीं होगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी होंगे जो इसे महत्व नहीं देंगे और कहेंगे, "यह उन चीजों में से बस एक ही थी। कहना पर्याप्त है कि मनुष्य बहुत धोखेबाज, कपटी और अविश्वसनीय हैं।" यह अपने भ्रष्ट सार, धोखेबाजी और कपट का सही ढंग से सामना करने में असमर्थता दिखाता है; तुम्हारा रवैया हमेशा कुटिल रहता है, और तुम हमेशा कपटपूर्ण स्थिति में रहते हो। तुम लगातार खुद को क्षमा कर रहे हो, और इस मामले में, तुम पीड़ा सहने या कीमत का भुगतान करने में असमर्थ हो। इसलिए ऐसे अनेक लोग हैं, जो हमेशा यह कहते हुए सालों तक रोए हैं कि "मैं बहुत धोखेबाज और कपटी हूँ, मेरे कामों में अकसर चालबाजी होती है, और मैं दूसरों के प्रति बिलकुल भी सच्चा नहीं हूँ।" फिर भी, वे आज तक पूरी तरह से और सरासर धोखेबाज बने हुए हैं, क्योंकि तुमने उन्हें कभी अपने वचनों और कार्यों में उजागर हुई धोखेबाजी और कपट के लिए पश्चात्ताप करते या उनका विश्लेषण करते नहीं सुना। हमारे पास यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है कि उन्होंने परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार किए हैं या नहीं, और पश्चात्ताप किया है या नहीं, लेकिन दूसरे लोगों को धोखा देने, ठगने या उनसे चालाकी से काम निकालने के बाद उनसे सामना होने पर उन्होंने कभी खेद प्रकट नहीं किया, अपना विश्लेषण नहीं किया, या स्वयं को नहीं जाना, या यह नहीं बताया कि इस मामले से उन्होंने क्या सीखा है। उनका ऐसा नहीं करना कुछ साबित करता है : ऐसे मामलों में उन्होंने कभी अपने खिलाफ विद्रोह नहीं किया है; वे केवल तकिया कलाम और सिद्धांतों की बातें बोलते हैं। वे रुझान का अनुसरण करने के लिए तकिया कलाम और सिद्धांतों की बातें बोल सकते हैं, या अपने परिवेश द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य किए जा सकते हैं। जो भी हो, ऐसे तकिया कलाम और सिद्धांतों की बातें बोलना उन्हें कभी बदल नहीं सकता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उनके प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आपको खोलना और संगति करना सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। तुम धीरे-धीरे अपने आपको इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक आत्मीय और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक-दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर पाते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी ऐसी मानसिकता होती है जिसके कारण तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा बरतने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय एक ऐसी स्थिति और रवैये के जिसमें तुम एक-दूसरे के साथ लड़ते हो, एक-दूसरे को कुचलते हो, एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक-दूसरे के लिए लुके-छिपे तिरस्कार या अवमानना को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी दूसरे की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बना देता है। यह न केवल तुम पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मूलभूत सिद्धांत' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

जो लोग सत्य से प्यार करते हैं, वे परमेश्वर का वचन-सत्य सुनने के बाद जल्दी से उसे अमल में ला सकते हैं, चाहे उन्हें वह जितना भी समझ आए। उदाहरण के लिए, काम करते समय कुछ लोग, किसी मामले के सत्य की स्पष्ट समझ हासिल न कर पाने के कारण, अपने भाई-बहनों की काट-छाँट कर देते हैं और उनसे निपट लेते हैं, लेकिन बाद में समझ आने के उपरांत उन्हें पता चलता है कि उनका उनसे निपटना एक गलती थी; फिर वे उन भाई-बहनों से माफी माँगने के लिए दौड़ पड़ते हैं, उनसे क्षमा माँगते हैं। कुछ लोग काम करते समय हमेशा शब्दों और सिद्धांतों की बात करके दिखावा करने की कोशिश करते हैं। उनकी बातें सुनकर उनके भाई-बहन ऊब जाते हैं, उनके बारे में राय बना लेते हैं और उन्हें धिक्कारते हैं। वे गलती स्वीकार कर सभी से माफी माँग सकते हैं और गारंटी दे सकते हैं कि वे फिर कभी शब्दों और सिद्धांतों के बारे में बात नहीं करेंगे। ऐसे लोग सत्य का अभ्यास करने को तैयार होते हैं, है ना? यदि वे काम के दौरान होने वाले विचलनों या गलतियों को ठीक कर सकें, और सत्य के उन पहलुओं का अभ्यास कर सकें जिन्हें वे समझते हैं, तो ये ऐसे लोग होते हैं जो सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं, और ऐसे लोग सत्य की समझ प्राप्त कर वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। कुछ लोग कोई गलती करने और दूसरों द्वारा गलती बताए जाने के बाद भी ढिठाई से उसे सही ठहराते रहते हैं, और हठपूर्वक गलती मानने से इनकार कर देते हैं। उन जैसे लोग सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, क्योंकि जब वे यही नहीं मान सकते कि उनसे गलती हो गई है, और वे सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं, तो वे उसे अभ्यास में लाने पर विचार भी कैसे कर सकते हैं? यदि किसी ने स्पष्ट रूप से गलती की है, लेकिन फिर भी गलती नहीं मानता, अपनी इज्जत बनाए रखने के लिए दावा करता है कि गलत बात ही सही है, तो यह व्यक्ति किस प्रकार की प्रकृति द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है? क्या यह शैतान की शैतानी प्रकृति नहीं है? क्या यह बड़े लाल अजगर की प्रकृति नहीं है? यदि हमने, जो कि परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वास्तव में गलती की है, तो हमें क्या करना चाहिए? हमें इतना साहसी होना चाहिए कि अपनी गलतियों को प्रकाश में ला सकें, हममें गलती स्वीकार करने का साहस होना चाहिए, एक को एक और दो को दो कहने में सक्षम होना चाहिए, समझना चाहिए कि हमने कहाँ गलती कर दी ताकि हम बदल सकें, और यह आश्वासन देना चाहिए कि भविष्य में हम इस तरह की गलती फिर कभी नहीं करेंगे। सत्य का अभ्यास करने को इच्छुक इंसान होने का मतलब यही है। यदि तुम इस तरह से अभ्यास करने का साहस नहीं रखते, नर्म नहीं पड़ते और अपने कार्यों का औचित्य सिद्ध करना जारी रखते हो, या ऐसे किसी व्यक्ति पर हमला करते और उसे दबाते हो जो तुमसे असंतुष्ट है और तुम्हारे बारे में प्रतिकूल राय रखता है, तो यह दिखाता है कि तुम सत्य का तिरस्कार करते हो और उससे घृणा करते हो, और सत्य का अभ्यास करने वाले व्यक्ति नहीं हो। इसके अलावा, सत्य का अभ्यास करते समय, प्रायश्चित करना और लोगों से माफी माँगना दिल से आना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि तुमने किसी का नुकसान किया है, और तुम मौखिक रूप से माफी माँगना चाहते हो, लेकिन दिल से तुम्हें खेद नहीं है, तो यह माफी शब्दों का एक पुलिंदा भर है; यह सच्ची नहीं है और सिर्फ एक दिखावा है। यह धोखा और झूठ है, है ना? सत्य का अभ्यास भीतर से आना चाहिए; तुम्हें उसका अभ्यास करने की दिली इच्छा होनी चाहिए—तभी तुम सफल हो सकते हो।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

यदि परमेश्वर के चुने हुए लोग तुम्हारी जो आलोचना करते और तुम्हें फटकारते हैं, वह तथ्यों के अनुरूप नहीं है, तो तुम किस तरह प्रतिक्रिया करते हो? क्या तुम उसे सीधे-सीधे नकार देना और उसे स्वीकार करने से इनकार कर देना ठीक समझते हो? तुम्हें उनकी आलोचना स्वीकार करने से शुरुआत करनी चाहिए, और कहना चाहिए, "मैं तुम्हारे द्वारा उठाए गए मुद्दे को पहले नहीं समझ पाया था, लेकिन अपनी भ्रष्ट प्रकृति के तथ्य के आधार पर, मैं निश्चित रूप से ऐसी गलती करने में सक्षम हूँ; मैं अभी तक इसके प्रति सचेत नहीं हुआ था। जो भी हो, मुझे पहले इसे स्वीकार करना चाहिए, लेकिन मैंने खास तौर पर कहाँ अनुचित व्यवहार किया है, उस पर आत्म-मंथन करने और ज्ञान की खोज करने के लिए मुझे कुछ समय निकालना चाहिए। तो अपनी राय मुझे बताने के लिए तुम्हारा धन्यवाद।" क्या ऐसा कहना ठीक होगा? परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अपेक्षाएँ बहुत अधिक नहीं हैं; यदि तुम उचित और विवेकी हो, तो वे समझेंगे। यदि तुम नहीं हो, और उनकी रचनात्मक आलोचना को सही तरह से नहीं लेते, तो यह तुम्हारी समस्या है; इसका मतलब है कि तुम्हारे पास सत्य-वास्तविकता या सामान्य मानवता नहीं है। यदि परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से कोई तुम्हारी बातों को गलत समझ लेता है, और उन्हें अपने लिए दमनकारी मानता है, तो तुम्हें इस स्थिति से कैसे निपटना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, "जब मैंने वे बातें कही थीं, तो तुम्हें दबाने की कोशिश करने का मेरा इरादा बिलकुल नहीं था; मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह तुम्हें इतने दबाव में डाल देगा। यदि तुम ऐसा महसूस करते हो कि मैंने जो कहा वह तुम्हारे प्रति दमनकारी था, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ, क्योंकि वस्तुपरक तथ्यों के परिणामों से आकलन करना भी दमन का एक रूप था। इसलिए मैं तुमसे क्षमा-याचना करता हूँ; मुझे खेद है, और आगे से मैं दोबारा वैसा नहीं करूँगा।" इस तरह बोलना काफी व्यावहारिक और तथ्यों के अनुरूप होगा, क्योंकि यह दिल से बोला गया होगा। भले ही वह अपराध करने का तुम्हारा इरादा कभी न रहा हो, लेकिन तुम्हें आलोचना स्वीकार करनी चाहिए, अपनी गलती माननी चाहिए और पश्चात्ताप करने की इच्छा व्यक्त करनी चाहिए। इस तरह का व्यवहार सामान्य मानवता के मानकों पर खरा उतरता है, और पूरी तरह से सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। भविष्य में जब भी कभी तुम्हारे सामने इस तरह की स्थिति आए, तुम्हें यही करना चाहिए।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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