126. भाइयों और बहनों के बीच प्रेम का सिद्धांत

(1) उन भाइयों और बहनों को जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, एक दूसरे को प्रेम और प्रोत्साहन देना चाहिए, और सद्भाव में सहयोग करना चाहिए। केवल इसी तरह उनका जीवन वृद्धि पाएगा;

(2) अनुभव के माध्यम से जो कुछ भी ज्ञात हो उसका संचार करते हुए, अक्सर मिलकर परमेश्वर के वचनों को पढ़ो और सत्य पर सहभागिता करो। एक-दूसरे का समर्थन करो, परस्पर मदद करो और सत्य की तलाश करते हुए अपनी प्रगति में साझेदारी करो;

(3) सद्भावना भरा एक दिल रखो, और अपने समकक्ष के लिए सहिष्णुता और दया रखने में समर्थ बनो। यदि तुम पाते हो कि उन्हें कोई समस्या है, तो उनकी सहायता करो; यदि तुम उनकी सहायता नहीं कर सकते, तो उन्हें तुच्छ या छोटा न बनाओ, न ही उनके बारे में पूर्वाग्रह रखो;

(4) पारस्परिक प्रेम को सत्य के सिद्धांत की बुनियाद पर बनाया जाना चाहिए। यदि कोई सिद्धांतों का उल्लंघन करके काम करता है, तो उसकी आलोचना, उसका पर्दाफाश, उसकी काट-छाँट होनी चाहिए और उससे निपटना चाहिए।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो" (यूहन्ना 13:34-35)।

"तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (मत्ती 22:37-39)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध उचित हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? ... लोगों के बीच उचित संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी उचित नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। तुम्हारे आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रत्येक दिन रहते हो, तुम्हें आनंद उठाना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उस व्यक्ति के प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आप को उघाड़ना, और संगति करना, सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। क्रमशः तुम अपने आप को इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक क़रीब और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर सकते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी एक ऐसी मानसिकता होती है जिसके साथ तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा रखने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय उस स्थिति और रवैये के जिसमें कि तुम एक दूसरे के साथ लड़ते हो, एक दूसरे को कुचलते हो, एक दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक दूसरे के लिए छिपे तिरस्कार या घृणा को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी अगले की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बनाता है। यह न केवल तुम्हारे पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें ग़लत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी की इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम उन्हें नापसंद करते हो, और असहज और दुखी महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोच सकते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नखरों, इन क्षुद्र भावनाओं में बंधे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे की ताक़तें क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए स्वयं में गहराई से वापस लौटना होगा। तुम्हें अपने आप में लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, फिर भी तुम दूसरों की ताक़तों से अनजान होकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, उन लोगों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग कर दूसरों को चोट पहुँचाओ और उन्हें बदतर बनाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच एक ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम लोग ये कैसा लगता है, यह महसूस करना चाहोगे?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

परमेश्वर ज़रूरतमंदों को धूल से उठाता है; विनम्र को उच्च बनाया जाना चाहिए। मैं विश्वव्यापी कलीसिया को नियंत्रित करने के लिए, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों को नियंत्रित करने के लिए अपनी बुद्धिमत्ता का उसके सभी रूपों में उपयोग करूँगा, ताकि वे सभी मेरे भीतर हों, और ताकि कलीसिया में उपस्थित तुम सब मेरे सामने समर्पित हो सको। जो लोग पहले आज्ञा नहीं मानते थे, उन्हें अब मेरे सामने आज्ञाकारी होना चाहिए, एक-दूसरे के लिए समर्पित होना चाहिए, एक-दूसरे को सहन करना चाहिए; तुम्हारे जीवन आपस में जुड़े होने चाहिए, और तुम्हें एक-दूसरे से प्यार करना चाहिए, सभी को अपनी कमियों की पूर्ति करने के लिए दूसरों की शक्तियों का उपयोग करना चाहिए, समन्वय के साथ सेवा करनी चाहिए। इस तरह से कलीसिया का निर्माण होगा, और शैतान को शोषण करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। केवल तब मेरी प्रबंधन योजना विफल नहीं होगी। यहाँ मैं तुम लोगों को एक और अनुस्मारक दे दूँ। अपने भीतर इस कारण से गलतफ़हमियाँ उत्पन्न न होने देना, कि ऐसे-ऐसे व्यक्ति का एक खास तरीका है, या वह ऐसे-ऐसे तरीके से कार्य करता है, जिसका परिणाम यह होता है कि तुम अपनी आत्मिक स्थिति में पतित हो जाते हो। जैसा कि मैं देखता हूँ, यह उचित नहीं है, और यह एक बेकार बात है। क्या जिस पर तुम विश्वास करते हो, वह परमेश्वर नहीं है? यह कोई व्यक्ति नहीं है। कार्य समान नहीं हैं। एक शरीर है। प्रत्येक अपना कर्तव्य करता है, प्रत्येक अपनी जगह पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है—प्रत्येक चिंगारी के लिए प्रकाश की एक चमक है—और जीवन में परिपक्वता की तलाश करता है। इस प्रकार मैं संतुष्ट हूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 21' से उद्धृत

तुम युवा भाई-बहन हो या वृद्ध, तुम जानते हो कि तुम्हें क्या कार्य करना है। जो अपनी युवावस्था में हैं, वे अभिमानी नहीं हैं; जो वृद्ध हैं, वे निष्क्रिय नहीं हैं और न ही वे पीछे हटते हैं। इतना ही नहीं, वे अपनी कमियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे के सामर्थ्य का उपयोग करने में सक्षम हैं, और वे बिना किसी पूर्वाग्रह के एक-दूसरे की सेवा कर सकते हैं। युवा और वृद्ध भाई-बहनों के बीच मित्रता का एक पुल बन गया है, और परमेश्वर के प्रेम के कारण तुम लोग एक-दूसरे को बेहतर समझने में सक्षम हो। युवा भाई-बहन वृद्ध भाई-बहनों को हेय दृष्टि से नहीं देखते, और वृद्ध भाई-बहन दंभी नहीं हैं : क्या यह एक सामंजस्यपूर्ण साझेदारी नहीं है? यदि तुम सभी का यही संकल्प हो, तो तुम लोगों की पीढ़ी में परमेश्वर की इच्छा निश्चित रूप से पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें अपने भाइयों और बहनों के साथ तालमेल बिठाकर काम करने में, उनके साथ खुले तौर पर सहभागिता करने में, सब कुछ खुलकर प्रकट करने में, खुले तौर पर, सार्वजनिक रूप से और ईमानदारी से संवाद करने में, और स्पष्ट रूप से बातचीत करने में, स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिए। तब हर कोई काम को बाँट लेता है और सहयोग करता है, सब मिल-झुलकर काम करते हैं। अगर कुछ ऐसा हो जो फिर भी समझ में न आता हो, तो सभी को आपस में मिलना चाहिए और सहभागिता करनी चाहिए। जो समझ सकते हैं, उन्हें बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी समझ पर सहभागिता करनी चाहिए, और जिन लोगों को प्रबोधन की रोशनी मिली है, उन्हें दूसरों के साथ इसे साझा करना चाहिए। जब अन्य लोग अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हों, तब यदि तुम उन्हें अधिक सहायता और समर्थन देने में सक्षम हो, तो तुम्हें ऐसा करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, और कोई संकोच नहीं करना चाहिए। तुच्छ लड़कियाँ क्या सोचने लगती हैं? "मुझे यह पता तो है, लेकिन मैं तुम्हें नहीं बताऊँगी।" "यदि तुम मुझे नहीं बताओगे/बताओगी, तो मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगी।" तुच्छ लड़कियाँ इस तरह सोचती हैं—वे ओछी होती हैं, और बहुत डरती हैं कि दूसरे उनसे बेहतर हो जाएँगे। यह ऐसी सोच नहीं है जो सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति के पास होनी चाहिए। यह सामान्य मानवता या सकारात्मक बात नहीं है; यह एक भ्रष्ट स्वभाव है। ये सभी चीज़ें जो स्वार्थी, ओछी, धोखेबाज, धुँधली, गन्दी, और शर्मनाक होती हैं, सकारात्मक चीज़ें नहीं होती हैं; वे सभी नकारात्मक चीज़ें हैं। इसलिए तुम लोगों को इन चीज़ों को छोड़ना सीखना चाहिए। तुम्हें उन चीज़ों को तुम्हें नियंत्रित या विवश करने, या अपने ऊपर हावी होने नहीं देना चाहिए; तुम्हें उन्हें तोड़कर उनसे परे जाना होगा और एक ऐसे व्यक्ति बनने का यत्न करना होगा जिसके पास सत्य हो, और जो प्रकाश में जीता हो। ईमानदारी, खुलापन, निष्ठा, (रखना और) सहिष्णु, धैर्यवान, और विनम्र होने की क्षमता (रखना); दूसरों की कद्र करना सीखना, दूसरों की मदद करने में खुशी पाना सीखना, अच्छे कर्म करना और एक अच्छा दिल रखना—ये सभी सकारात्मक बातें हैं। जहाँ तक उन नकारात्मक चीज़ों की बात है, एक बार जब तुम्हें पता चले कि तुम्हारे पास ऐसे विचार या ख़याल हैं, या तुम ऐसी स्थितियों में हो, तो तुम्हें उन्हें छोड़ देना और त्याग देना सीखना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो वे चीज़ें तुम्हें नियंत्रित करेंगी, और एक बार जब वे तुम्हें नियंत्रण में ले लेंगी, तो तुम ऐसे काम करने में सक्षम हो जाओगे—और फिर, तुम हमेशा के लिए एक कठपुतली बनकर रह जाओगे, अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के गुलाम और उसके द्वारा नियंत्रित, और तुम कभी भी सत्य को हासिल नहीं करोगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले यह पहचानना होगा कि उनके पास किस तरह के भ्रष्ट स्वभाव हैं, वे उन भ्रष्ट स्वभावों को कैसे व्यक्त करते हैं, उनके विचार क्या हैं, उनके ख़याल क्या हैं, और वे कौन-सी ऐसी स्थितियों में हैं जो सत्य के साथ मेल नहीं खाती हैं। उन्हें इन नकारात्मक, निष्क्रिय चीजों को खुले में ले आना चाहिए और उन्हें पहचानना चाहिए, और फिर उन्हें एक-एक कर कैसे त्याग दें यह सीखने के माध्यम से, उन्हें हल करना चाहिए, उन्हें तोड़ना और छोड़ना चाहिए। उन्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में, कर्तव्यों और अपने जीवन में होने वाली हर एक बात के प्रति अपने दृष्टिकोण में, सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए, और उन्हें सत्य के अनुसार बोलना और कार्य करना सीखना चाहिए। इस तरह, थोड़ा-थोड़ा करके, लोग मानवीय सदृशता के अधिकारी होने लगेंगे; वे अपने कर्तव्यों को निभाने में बेहतर, और बेहतर, होते जाएँगे, और हर कोई अधिकाधिक मिल-झुलकर काम करेगा और सभी तेज़ी से एक हो जाएँगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

भाई-बहनों के बीच प्रेम सत्य-सिद्धांत पर स्थापित होना चाहिए। सत्य को मानक के रूप में लेते हुए, बातें और कर्म, दोनों सत्य के अनुरूप होने चाहिए। तुम्हें अपनी भावनाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए, न ही धोखा या छल करना चाहिए, और विशेष रूप से तुम्हें एक दूसरे का उपयोग तो नहीं ही करना चाहिए। तुम्हें अक्सर सत्य पर संगति करनी चाहिए, जीवन में प्रवेश करने के लिए एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना और मदद करनी चाहिए, और अपने व्यक्तिगत लाभ या हानि पर बेकार बहस नहीं करनी चाहिए। चूँकि लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं, इसलिए बातचीत के दौरान टकराव से बचा नहीं जा सकता, लेकिन तुम्हें एक दूसरे को बर्दाश्त करने, माफ करने, एक साथ सत्य का अनुसरण करने और एक सर्वनिष्ठ लक्ष्य को पूरा करने के लिए ठोस काम करने में सक्षम होना चाहिए। सत्य पर अक्सर संगति करने से, तुम अपने दिल खोल सकते हो और पूर्वाग्रह से मुक्त हो सकते हो, एक-दूसरे की बात मानकर एक-दूसरे को प्रोत्साहित कर सकते हो और जीवन में साझेदार बन सकते हो। आपसी प्रेम ऐसा ही दिखना चाहिए। अगर भाई-बहन एक जैसे चरित्र वाले हैं, तो वे आपसी प्रेम के रिश्ते कायम कर पाएँगे। अपने आपसी प्रेम में वे सामान्य रूप से संगति कर पाएँगे और सत्य की खोज और अनुसरण कर पाएँगे; वे सत्य का उल्लंघन करने या परमेश्वर का विरोध करने का मार्ग अपनाने के लिए काम करने को एक-दूसरे का साथ नहीं देंगे। इसके बजाय, वे परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में एक मन होंगे। यदि कोई बड़ी गलती कर देता है और दूसरे को चोट पहुँचाता है, तो वे दोनों सहनशील और क्षमाशील होंगे। यदि कोई व्यक्ति सत्य के विपरीत कुछ करता है जो कलीसिया के हितों को नुकसान पहुँचाता है तो उसे बचाना नहीं चाहिए। सत्य पर संगति के माध्यम से उसे उसकी समस्याएँ सीधे ही बता देनी चाहिए ताकि उसे पश्चाताप करने और नए सिरे से शुरूआत करने, अपनी गलती का एहसास करने, और जो उसने किया है, उसके लिए पछतावा महसूस करने का मौका मिले। यह सच्चा आपसी प्रेम है। जो लोग एक-दूसरे की मदद करने, सत्य-प्रविष्टि और स्वभावगत बदलाव में एकसाथ आगे बढ़ने में समर्थ होते हैं, उनमें सच्चे आपसी प्रेम के पारस्परिक संबंध होते हैं, जो पूरी तरह से सत्य-सिद्धांत के अनुसार होता है। भावनाओं पर आधारित संबंध चाहे जितना भी अंतरंग हो, यह आपसी प्रेम नहीं होता। जब कलीसिया में दो या तीन लोग साथ मिलते हैं, एक-दूसरे के बुरे काम छिपाते हैं, एक-दूसरे की चापलूसी और रक्षा करते हैं, एक-दूसरे का इस्तेमाल करते और सत्य का ज़रा-भी अभ्यास नहीं करते हैं, तो उनकी साठ-गाँठ बुराई करने के लिए है और वे दुष्टों की टोली हैं। ऐसे लोगों के साथ जुटने से परमेश्वर नफ़रत करता है और इसे अभिशाप देता है। वे सभी जो अक्सर कलीसिया में गुटबंदी करते हैं, जो छोटे उपकार करके दूसरों को जीत लेते हैं, और जो कलीसिया पर नियंत्रण पाने की निरर्थक उम्मीद रखते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और परमेश्वर उन्हें दंड देगा। जब लोग सच्चे दिल से एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, तो इससे न केवल उन्हें जीवन में और सत्य के संबंध में लाभ होता है, बल्कि इससे कलीसिया और कलीसिया के काम को भी लाभ हो सकता है। जिनके पास प्रेमी हृदय होता है, वे आवश्यक रूप से ऐसे लोग होते हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं, और वे हमेशा दूसरे लोगों के साथ मिलजुलकर रह सकेंगे। दूसरों में चाहे जो भी दोष हो, अगर वे सत्य का अनुसरण करते हैं, तो प्रेमी हृदय वाले लोग लोग उनके साथ मिलजुलकर रह सकेंगे। इस तरह का रिश्ता, सत्य पर संगति करने और एक-दूसरे की मदद करने में सक्षम होने की नींव पर बना होता है; यह सच्चा आपसी प्रेम है। आपसी प्रेम, बुराई करने या दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र करने के लिए एक-दूसरे के साथ साठ-गाँठ करने से नहीं आता है, बल्कि अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने के लिए सत्य का अनुसरण करने से आता है। यदि आपसी प्रेम सत्य जीवन का अनुसरण करने की नींव पर नहीं, बल्कि देह के प्रति अनुरक्ति की नींव पर बना है, तो ऐसा आपसी प्रेम निरर्थक है और इससे किसी को लाभ नहीं होता और यह कलीसिया के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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