126. भाई-बहनों के बीच प्रेम के सिद्धांत

(1) उन भाइयों और बहनों को जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, एक दूसरे को प्रेम और प्रोत्साहन देना चाहिए, और सद्भाव में सहयोग करना चाहिए। केवल इसी तरह उनका जीवन वृद्धि कर पाएगा।

(2) अक्सर मिलकर परमेश्वर के वचनों को पढ़ो और सत्य पर सहभागिता करो, अनुभव से वे जो जानते हैं, उसके बारे में बात करो। एक-दूसरे का समर्थन करो, परस्पर मदद करो और सत्य की तलाश करते हुए अपनी प्रगति को साझा करो।

(3) सद्भावना भरा एक दिल रखो और अपने समकक्ष के लिए सहिष्णुता और दया रखने में समर्थ बनो। यदि तुम पाते हो कि उन्हें कोई समस्या है, तो उनकी सहायता करो; यदि तुम उनकी सहायता नहीं कर सकते, तो उन्हें तुच्छ या छोटा न बनाओ, न ही उनके बारे में पूर्वाग्रह रखो।

(4) पारस्परिक प्रेम सत्य-सिद्धांत की बुनियाद पर होना चाहिए। यदि कोई सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाले काम करता है, तो उसकी आलोचना, उसका पर्दाफाश, उसकी काट-छाँट होनी चाहिए और उससे निपटना चाहिए।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

"मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो" (यूहन्ना 13:34-35)।

"तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (मत्ती 22:37-39)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यदि तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ़ मुड़ना चाहिए। इस बुनियाद पर, तुम दूसरे लोगों के साथ भी सामान्य संबंध रखोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ऊर्जा लगा दो, वह मानव के जीवनदर्शन से संबंधित ही होगा। तुम दूसरे लोगों के बीच एक मानव-दृष्टिकोण और मानव-दर्शन के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहे हो, ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे, लेकिन तुम लोगों के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचनों का अनुसरण नहीं कर रहे। अगर तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, लेकिन परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर को देने और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो स्वाभाविक रूप से सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हो जाएँगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन-सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? ... लोगों के बीच सामान्य संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे सामान्य नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी सामान्य नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

तुम लोगों को सत्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; तभी तुम जीवन में प्रवेश करोगे। अगर यह पता चले कि दूसरों के कार्य सत्य के विपरीत हैं, तो हमें अधिकतम प्रेम के साथ सत्य के लिए प्रयास करने में उनकी मदद करनी चाहिए। अगर दुसरे लोग सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हों, और उनके काम करने के तरीके में सिद्धांत हों, तो हमें उनसे सीखने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करना चाहिए—यही पारस्परिक प्रेम है। कलीसिया के अंदर तुम्हें इस तरह का परिवेश रखना चाहिए—हर कोई सत्य पर ध्यान केंद्रित करे और उसे पाने का प्रयास करे। लोग कितने भी बूढ़े अथवा युवा हों, चाहे वे पुराने विश्वासी हों या नए, या चाहे वे कितने भी क़ाबिल हों; जिन चीज़ों को तुम्हें देखना चाहिए, वे हैं कि कौन-से लोग सही तरह से बोलते हैं, कौन-से लोग सत्य के अनुरूप बोलते हैं, कौन-से लोग परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोच रहे हैं और कौन-से लोग उसके कार्य को अपने दिल में सबसे अधिक धारण करते हैं, किन लोगों में सकारात्मक चीज़ों के बारे में अच्छी समझ है, कौन-से लोग धार्मिकता की समझ साझा करते हैं, और कौन-से लोग कीमत चुकाने को तैयार हैं। ऐसे लोगों का उनके भाई-बहनों द्वारा समर्थन और सराहना की जानी चाहिए। ईमानदारी का यह परिवेश, जो सत्य का अनुकरण करने से आता है, कलीसिया के अंदर व्याप्त होना चाहिए; इस तरह से, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा का कार्य होगा, और परमेश्वर तुम्हें आशीष और मार्गदर्शन प्रदान करेगा। अगर कलीसिया के अंदर कहानियाँ सुनाने, एक-दूसरे के साथ उपद्रव करने, एक-दूसरे से द्वेष रखने, एक-दूसरे से ईर्ष्या करने और एक-दूसरे से बहस करने का परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम लोगों के अंदर काम नहीं करेगा। एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करना और गुप्त रूप से लड़ना, धोखा देना, चकमा देना और साज़िश करना—यह बुराई का परिवेश है! अगर कलीसिया के अंदर ऐसा परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से अपना कार्य नहीं करेगा। प्रभु यीशु ने इसके संबंध में एक बात कही थी। क्या तुम लोगों को याद है, वह क्या थी? ("फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" [मत्ती 18:19-20]।) यह सत्य है। परमेश्वर जैसा कहता है, वैसा करता है। अगर तुम उसकी इच्छा के विरुद्ध जाते हो और जैसा वह कहता है, वैसा नहीं करते, तो वह तुमसे दूर हो जाएगा। फलतः, तुम हमेशा दूसरों के दोष देखोगे और इस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरों की कौन-सी बात तुम्हें अप्रसन्न करती है, और निरंतर इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरे तुम्हें नापसंद करते हैं। यह तुम्हारे लिए समस्याएँ पैदा करेगा। अगर पवित्र आत्मा तुम में काम नहीं करती, अगर परमेश्वर तुम्हें आशीष या मार्गदर्शन नहीं देता, अगर तुम केवल अपनी स्वयं की शक्ति और गुणों व क्षमताओं पर ही निर्भर करते हो, तो तुम्हारा किया कुछ भी सही नहीं होगा, तुम्हारा किया कुछ भी परमेश्वर के अनुरूप नहीं होगा, और चाहे तुम कितनी भी मेहनत करो, वह ऊर्जा की बरबादी होगी। तुम अनुभव के जरिये धीरे-धीरे इसे सीख जाओगे। तुम जो कुछ भी करो, उस सबमें तुम्हें एकचित्त होना चाहिए। और तुम एकचित्त कैसे हो सकते हो? तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए; केवल तभी तुम लकड़ियों के गट्ठर की तरह मज़बूत बन पाओगे—सब एक-साथ, और सब एकचित्त।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। अपने आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रतिदिन रहते हो, तुम्हें रस लेना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उनके प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आपको खोलना और संगति करना सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। तुम धीरे-धीरे अपने आपको इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक आत्मीय और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक-दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर पाते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी ऐसी मानसिकता होती है जिसके कारण तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा बरतने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय एक ऐसी स्थिति और रवैये के जिसमें तुम एक-दूसरे के साथ लड़ते हो, एक-दूसरे को कुचलते हो, एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक-दूसरे के लिए लुके-छिपे तिरस्कार या अवमानना को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी दूसरे की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बना देता है। यह न केवल तुम पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें गलत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें किसी चीज़ को एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम्हें बुरा लगता है, और तुम असहज और अप्रसन्न महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोचते रहते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नख़रों, इन क्षुद्र भावनाओं में फंसे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, मकड़ी के जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे के गुण क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और आत्म-चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए अपने भीतर गहराई में जाना होगा। तुम्हें अपने आपमें लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, जबकि तुम दूसरों की क्षमताओं से अनजान रहकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर देखो, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, दूसरों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग करके दूसरों को चोट पहुँचाओ और नीचा दिखाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम यह महसूस करना चाहोगे कि यह कैसा लगता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मूलभूत सिद्धांत' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें अपने भाइयों और बहनों के साथ तालमेल बिठाकर काम करने में, उनके साथ खुले तौर पर सहभागिता करने में, सब कुछ खुलकर प्रकट करने में, खुले तौर पर, सार्वजनिक रूप से और ईमानदारी से संवाद करने में, और स्पष्ट रूप से बातचीत करने में, स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिए। तब हर कोई काम को बाँट लेता है और सहयोग करता है, सब मिल-झुलकर काम करते हैं। अगर कुछ ऐसा हो जो फिर भी समझ में न आता हो, तो सभी को आपस में मिलकर सहभागिता करनी चाहिए। जो समझ सकते हैं, उन्हें बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी समझ पर सहभागिता करनी चाहिए, और जिस किसी को प्रबोधन की रोशनी मिली है, उसे तुरंत इस बारे में दूसरों बताना चाहिए। जब अन्य लोग अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हों, तब यदि तुम उन्हें अधिक सहायता और समर्थन देने में सक्षम हो, तो तुम्हें ऐसा करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, और कोई संकोच नहीं करना चाहिए। तुच्छ लड़कियाँ क्या सोचने लगती हैं? "मुझे यह पता तो है, लेकिन मैं तुम्हें नहीं बताऊँगी।" "यदि तुम मुझे नहीं बताओगी, तो मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगी।" तुच्छ लड़कियाँ इस तरह सोचती हैं—वे ओछी होती हैं, और बहुत डरती हैं कि दूसरे उनसे बेहतर हो जाएँगे। सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति के अंदर ऐसी सोच नहीं होनी चाहिए। यह सामान्य मानवता या सकारात्मक बात नहीं है; यह एक भ्रष्ट स्वभाव है। ये सभी चीज़ें जो स्वार्थी, ओछी, धोखेबाज, अस्पष्ट, गन्दी, और शर्मनाक होती हैं, सकारात्मक चीज़ें नहीं होती हैं; वे सभी नकारात्मक चीज़ें होती हैं। इसलिए तुम लोगों को इन चीज़ों को छोड़ना सीखना चाहिए। तुम्हें इन चीज़ों को तुम्हें नियंत्रित या विवश करने, या अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए; तुम्हें उन्हें तोड़कर उनसे परे जाना होगा और एक ऐसा व्यक्ति बनने का यत्न करना होगा जिसके अंदर सत्य हो, और जो प्रकाश में जीता हो। ईमानदारी, खुलापन, निष्ठा, (रखना और) सहिष्णु, धैर्यवान, और विनम्र होने की क्षमता (रखना); दूसरों की कद्र करना सीखना, दूसरों की मदद करने में खुशी पाना सीखना, अच्छे कर्म करना और एक अच्छा दिल रखना—ये सभी सकारात्मक बातें हैं। जहाँ तक उन नकारात्मक चीज़ों की बात है, एक बार जब तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अंदर ऐसे विचार या ख़याल हैं, या तुम ऐसी स्थितियों में हो, तो तुम्हें उन्हें छोड़ देना और त्याग देना सीखना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो वे चीज़ें तुम्हें नियंत्रित करेंगी, और एक बार जब वे तुम्हें नियंत्रण में ले लेंगी, तो तुम ऐसे काम करने लगोगे—और फिर, तुम हमेशा के लिए एक कठपुतली बनकर रह जाओगे, अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के गुलाम और उसके द्वारा नियंत्रित होकर तुम कभी भी सत्य को हासिल नहीं कर पाओगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले यह पहचानना होगा कि उनके अंदर किस तरह के भ्रष्ट स्वभाव हैं, वे उन भ्रष्ट स्वभावों को कैसे व्यक्त करते हैं, उनके विचार क्या हैं, उनके ख़याल क्या हैं, और वे कौन-सी ऐसी स्थितियों में हैं जो सत्य से मेल नहीं खाती हैं। उन्हें इन नकारात्मक, निष्क्रिय चीजों को खुले में लाकर उन्हें पहचानना चाहिए, और फिर उन्हें एक-एक कर कैसे त्याग दें यह सीख कर उन्हें हल करना चाहिए, उन्हें तोड़ना और छोड़ना चाहिए। उन्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में, कर्तव्यों और अपने जीवन में होने वाली हर एक बात के प्रति अपने दृष्टिकोण में, सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए, और उन्हें सत्य के अनुसार बोलना और कार्य करना सीखना चाहिए। इस तरह, थोड़ा-थोड़ा करके, लोग मानवीय सदृशता के अधिकारी होने लगेंगे; वे अपने कर्तव्यों को निभाने में बेहतर, होते जाएँगे, और हर कोई ज्यादा से ज्यादा मिल-जुलकर काम करेगा और सभी निरंतर एकजुट होते जाएँगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

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