121. सामान्य मानवता को जीने के सिद्धांत

(1) सामान्य मानवता और भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के बीच के भेद को समझना और प्रत्येक प्रकार की भ्रष्टता की अभिव्यक्ति को सुधारने के लिए सत्य का उपयोग करना सीखना आवश्यक है। केवल इसी तरह से कोई सामान्य मानवता को जी सकता है;

(2) छल-कपट में उलझने और खुद को छुपाने के बजाय, हर समय अपने आप को एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए, और सच्चाई से बोलने और काम करने के लिए, प्रशिक्षित करना आवश्यक है। सत्य का अभ्यास करना और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना सीखो;

(3) दूसरों के साथ प्रेम से बातचीत करो। सहनशीलता और धैर्य, तथा समझ और सम्मान के लिए सक्षम बनो। एक दूसरे की मदद और समर्थन करो। दूसरों की अत्यधिक आलोचना न करो, बल्कि उनके साथ उचित व्यवहार करो;

(4) सभी मामलों में सच्चाई की तलाश करना आवश्यक है। केवल इसी तरह कोई देहासक्ति का त्याग और सत्य का अभ्यास कर सकता है। इससे भी बढ़कर, व्यक्ति को परमेश्वर से प्रेम करने और उसके प्रति समर्पण करने की अपनी तलाश में दृढ़ रहना चाहिए, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह और वफ़ादारी से निभाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की। फिर उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिये पापबलि बना। अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है, जिसे वह आरंभ से करता रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी और समस्त सृष्टि पर अपने अधिकार को बहाल करेगा। मानवता ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद परमेश्वर के प्राणियों के साथ-साथ अपने धर्मभीरु हृदय भी गँवा दिए, जिससे वह परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण और अवज्ञाकारी हो गया। तब मानवता शैतान के अधिकार क्षेत्र में रही और शैतान के आदेशों का पालन किया; इस प्रकार, अपने प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीक़ा नहीं था और वह अपने प्राणियों से भयपूर्ण श्रद्धा पाने में असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में बस गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मानवता के सृजन के पीछे का अर्थ खो दिया। इसलिए मानवता के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवता को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंत में, अपने राज्य को बहाल कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और उचित मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ पथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और अंत:करण का प्रकटीकरण है; और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका अंत:करण अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में ऐसा बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, जो परमेश्वर के हृदय के अनुकूल हो। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "उचित समझ" के मायने हैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना और उसके प्रति निष्ठावान बने रहना, परमेश्वर के लिए तड़पना, परमेश्वर के प्रति पूर्णतया शुद्ध होना, और परमेश्वर के प्रति अंत:करण रखना, यह परमेश्वर के साथ एक हृदय और मन होने को दर्शाता है, जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। पथभ्रष्ट समझ का होना ऐसा नहीं है। चूँकि मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था इसलिये, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, और परमेश्वर के लिए उसके अंदर निष्ठा या तड़प नहीं रही है, परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा की तो बात ही क्या। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता और उस पर दोष लगाता है, और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों का प्रहार करता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाता है, परमेश्वर की आज्ञापालन का उसका कोई भी इरादा नहीं होता, वह सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—जिनकी समझ पथभ्रष्ट होती है—वे अपने घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता पर पछतावा करने के अयोग्य होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; परमेश्वर के प्रति अधिक विद्रोही लोग, जो अपने आप को अब तक नहीं जान पाये, उनमें समझ उतनी ही कम होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

सामान्य मानवता में कौन-से पहलू शामिल हैं? अंतर्दृष्टि, समझ, विवेक, और चरित्र। यदि तुम इनमें से प्रत्येक पहलू में सामान्यता प्राप्त कर सकते हो, तो तुम्हारी मानवता मानक के मुताबिक हो जाएगी। तुममें एक सामान्य इंसान से समरूपताहोनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर केविश्वासी की तरह लगनाचाहिए। तुम्हें बहुत अधिक हासिल नहीं करना है या कूटनीति में संलग्न नहीं होना है; तुम्हें बस एक सामान्य इंसान बनना है जिसके पास सामान्य व्यक्ति की समझ हो, जो चीज़ों को समझने में सक्षम हो, और जो कम से कम एक सामान्य इंसान की तरह दिखाई दे। यह पर्याप्त होगा। आज तुमसे अपेक्षित हर चीज़ तुम्हारी क्षमताओं के भीतर है और किसी भी तरह से तुमसे कुछ ऐसा करवाने के लिए नहीं है जो करने में तुम सक्षम नहीं हो। कोई अनुपयोगी वचन या अनुपयोगी कार्य तुम पर नहीं किया जाएगा। तुम्हारे जीवन में व्यक्त या प्रकट हुई समस्त कुरूपता का अवश्य त्याग कर दिया जाना चाहिए। तुम लोगों को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और तुम लोग शैतान के ज़हर से भरे हुए हो। तुमसे केवल इस भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा पाने के लिए कहा जाता है। तुमसे कोई उच्च पदस्थ व्यक्ति, या एक प्रसिद्ध या महान व्यक्ति बनने के लिए नहीं कहा जाता। इसका कोई अर्थ नहीं है। जो कार्य तुम लोगों पर किया जाता है वह उसके अनुसार होता है जो तुम लोगों में अंतर्निहित है। मैं लोगों से जो अपेक्षा करता हूँ उसकी सीमाएँ होती हैं। यदि तुमने उस तरीके और लहजे से अभ्यास किया है जिसमें बुद्धिजीवी बात करते हैं तो इससे काम नहीं चलेगा; तुम इसे नहीं कर पाओगे। तुम लोगों की क्षमता के हिसाब से तुम्हें कम से कम बुद्धिमानी और कुशलता के साथ बोलने में सक्षम होना चाहिए और चीज़ों को स्पष्ट रूप से और समझ में आने वाले ढंग से बताना चाहिए। अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए बस इतने की ज़रूरत है। कम से कम, यदि तुम अंतर्दृष्टि और समझ प्राप्त कर लेते हो, तो यह पर्याप्त है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है स्वयं के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करना। तुम्हें उस कुरूपता को अवश्य त्याग देना चाहिए जो तुममें व्यक्त होती है। यदि तुमने इन्हें त्यागा नहीं है, तो परम समझ और परम अंतर्दृष्टि की बात कैसे कर सकते हो? यह देखते हुए कि युग बदल गया है, बहुत से लोगों में विनम्रता या धैर्य का अभाव है, और हो सकता है कि उनमें कोई प्रेम या संतों वाली शालीनता भी न हो। ये लोग कितनेबेहूदा हैं! क्या उनमें रत्ती भर भी सामान्य मानवता है? क्या उनके पास कोई बताने लायक गवाही है? उनके पास किसी भी तरह की कोई अंतर्दृष्टि और समझ नहीं है। निस्सन्देह, लोगों के व्यवहार के कुछ पहलुओं को, जो पथभ्रष्ट और गलत हैं, सही किए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, लोगों के अतीत का कठोर आध्यात्मिक जीवन और उनका संवेदनशून्य और मूर्खतापूर्ण रूप—इन सभी चीजों को बदलना होगा। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें स्वच्छंद होने दिया जाए या शरीर में आसक्त होने दिया जाए या तुम जो चाहो वह बोलने दिया जाए। तुम्हें लापरवाही से नहीं बोलना चाहिए। एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करना और बोलना-चालना सुसंगति से बोलना है, जब तुम्हारा आशय "हाँ" होता है तो "हाँ" बोलना, "नहीं" आशय होने पर "नहीं" बोलना। तथ्यों के मुताबिक रहो और उचित तरीके से बोलो। कपट मत करो, झूठ मत बोलो। स्वभाव में बदलाव के संबंध में सामान्य व्यक्ति जिन सीमाओं तक पहुँच सकता है, उन्हें अवश्य समझना चाहिए। अन्यथा तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्षमता को बढ़ाना परमेश्वर द्वारा उद्धार पाने के लिए है' से उद्धृत

सामान्य लोगों के स्वभाव में कोई कुटिलता या धोखेबाज़ी नहीं होती, लोगों का एक-दूसरे के साथ एक सामान्य संबंध होता है, वे अकेले नहीं खड़े होते, और उनका जीवन न तो साधारण होता है और न ही पतनोन्मुख। इसलिए भी, परमेश्वर सभी के बीच ऊँचा है, उसके वचन मनुष्यों के बीच व्याप्त हैं, लोग एक-दूसरे के साथ शांति से, परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हैं, पृथ्वी, शैतान के हस्तक्षेप के बिना, सद्भाव से भरी है, और मनुष्यों के बीच परमेश्वर की महिमा बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे लोग स्वर्गदूतों की तरह हैं: शुद्ध, जोशपूर्ण, परमेश्वर के बारे में कभी भी शिकायत नहीं करने वाले, और पृथ्वी पर पूरी तरह से परमेश्वर की महिमा के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित करने वाले।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 16' से उद्धृत

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। ... यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

लोग स्वयं से तो बहुत ज़्यादा अपेक्षा नहीं करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर से बहुत अपेक्षा होती है। वे परमेश्वर से उन पर विशेष कृपा दर्शाने और उनके प्रति धैर्यवान और सहनशील होने, उन्हें दुलारने, उनका भरण पोषण करने, उन पर मुस्कुराने, और कई तरीकों से उनकी देखभाल करने के लिए कहते हैं। वे अपेक्षा करते हैं की वो उनके प्रति बिल्कुल भी सख़्त न हो या ऐसा कुछ भी न करे जिससे उन्हें ज़रा सा भी परेशानी हो, और वे केवल तभी संतुष्ट होते हैं यदि वह हर एक दिन उनकी खुशामद करता है। मनुष्य में विवेक की कितनी कमी है! लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें कहाँ रहना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें क्या हासिल करना चाहिए, उनके दृष्टिकोण क्या होने चाहिए, परमेश्वर की सेवा में उन्हें किस स्थिति या पद में खड़े होना चाहिए, और किस स्थान पर उन्हें स्थित होना चाहिए। थोड़ी-सी पदवी पाकर लोग खुद को बहुत बड़ा मानने लगते हैं, और वैसे पद के बिना भी लोग खुद को काफी उच्च मानते हैं। लोग खुद को कभी नहीं समझते हैं। यदि आप लोग अपने-अपने विश्वास को जारी रख सकते हैं, कभी भी शिकायत नहीं करते, और सामान्य रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा करते हैं, चाहे आपसे कुछ भी कहा जाए, चाहे आपके साथ कितनी भी कड़ाई से व्यवहार किया जाए और आपको कितना भी अनदेखा किया जाए, तो आप एक परिपक्व और अनुभवी व्यक्ति होंगे, और आप के पास वास्तव में कुछ कद और सामान्य विवेक होगा। आप परमेश्वर से चीजों की अपेक्षा नहीं करेंगे, आपके पास अत्यधिक इच्छा नहीं होगी, और आप उन चीज़ों के आधार पर जिन्हें आप पसंद करते हैं, दूसरों से या परमेश्वर से उनके लिए अनुरोध नहीं करेंगे। इससे पता चलता है कि आपके पास एक हद तक एक व्यक्ति की अनुरूपता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकी होते हैं' से उद्धृत

जब भी कोई भ्रष्ट स्वभाव या भ्रष्ट सोच और भ्रष्ट विचार प्रकट करता है, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। यदि तुम उन्हें दूर करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हो, तो इन भ्रष्टताओं को दूर करना असंभव होगा। दूसरी ओर, यदि तुम तर्कसंगत रूप से सत्य को खोज सको, तो तुम आसानी से अपनी गलती के मूल कारण को समझकर भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के मामले को दूर कर सकोगे। जब तुम प्रतीक्षा करने और खोजने के लिए अपनी आत्मा की ओर लौटने में अधिक सक्षम हो जाओगे, तो तुम परमेश्वर के वचनों से आसानी से ऐसे प्रासंगिक अंश ढूंढ पाओगे जिनसे समस्या के सार को समझ सको। ऐसा करके, तुम्हारी भ्रष्टता कम से कम उजागर होगी और तुम्हारी तर्क-बुद्धि और अधिक सामान्य होगी—और इंसान की तर्क—बुद्धि जितनी अधिक सामान्य होती है, वह उतना ही अधिक मर्यादाओं में रहकर कार्य करता है, फिर वह अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर बोलता या कार्य नहीं करता। "मर्यादाओं में रहकर कार्य करने" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ सामान्य मानवता के मानकों के अनुरूप कार्य करना होता है, अपने विवेक से कार्य करना होता है, परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना होता है। यदि, जैसे ही तुम्हें काम करने हड़बड़ी होती है, तुम गहराई से नहीं सोचते, लेकिन अपने हाथों को लहराते हुए कहते हो, "इस काम को बस ऐसे करो। यह सही हो जाएगा!" तो क्या तुम सामान्य मानवता की सद्बुद्धि से काम कर रहे हो? क्या इसमें सामान्य मानवता की कोई अभिव्यक्ति है? ऐसी अभिव्यक्तियाँ सामान्य मानवता में नहीं होनी चाहिए। इसलिए, तुम्हारे सामने चाहे कोई भी समस्या आए, सबसे पहले शांत होकर उस पर चिंतन करो, परमेश्वर के सामने आओ, अपनी आत्मा में लौटकर शांत हो जाओ—पहले परमेश्वर से विनती करो कि इस काम को कैसे किया जाए और इस पर कैसे चर्चा की जाए। क्या इसके लिए बहुत समय चाहिए? नहीं, बहुत समय नहीं चाहिए। सामान्य मानवता में ये तर्कसंगत चीजें निहित होती हैं और लोग खुद को संयमित करके उन्हें प्राप्त करने योग्य होते हैं; क्या वे इस बात पर भरोसा करते हैं कि वे इस तरह से अभ्यास करने के इच्छुक हैं या नहीं। यदि तुम हमेशा दिखावा करना चाहते हो, हमेशा ऊंचे स्थान पर खड़े रहना चाहते हो, अपना प्रदर्शन करना चाहते हो, दूसरों के दिल में मूर्ति बनकर वहां अपनी छवि स्थापित करना चाहते हो, तो तुम हमेशा उतावलेपन से ही काम करोगे; तुम न तो कभी परमेश्वर के सामने आ पाओगे और न ही कभी अपनी आत्मा में लौट पाओगे। यदि तुम हमेशा अपने तरीके से ही काम करना चाहते हो, और यदि ऐसा करके तुम्हें लगता है कि तुमने कोई बहुत महत्वपूर्ण काम कर दिया है या कोई बहुत बड़ा दायित्व निभा दिया है, तुम कोई सामान्य मनुष्य नहीं, बल्कि बहुत ही प्रतिभाशाली हो, तो इसका मतलब यह है कि तुम सही मार्ग पर नहीं चल रहे हो। तुम्हारा हृदय हर समय शांत रहना चाहिए और जब कोई समस्या आए, तो तुम्हें चिड़चिड़ा और जिद्दी नहीं बनना चाहिए या उतावलेपन से पेश नहीं आना चाहिए। आडंबर या नकली व्यवहार मत करो, बल्कि शांत रहना सीखो और विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करो। इन तरीकों से सामान्य मानवता अभिव्यक्त होनी चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

जब कोई व्यक्ति सत्य को नहीं समझता तो उसकी चेतना कितनी बड़ी भूमिका निभा सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें किस प्रकार की मानवता है। अगर यह व्यक्ति सत्य को नहीं समझता और अपनी चेतना के अनुसार व्यवहार नहीं करता, और तुम न तो उसके कृत्यों के किसी पहलू में परमेश्वर के इरादों के प्रति कोई विचारशीलता देखते हो, और न ही उसमें परमेश्वर के प्रति कोई आदर दिखाई देता है, तो क्या इस व्यक्ति को चेतना और मानवता से संपन्न व्यक्ति कहा जा सकता है? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? बिल्कुल इसी तरह के व्यक्ति को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित क्या जाता है जिसमें मानवता का अभाव है, और जो मानवीय आचरण के न्यूनतम मापदंडों से नीचे गिर चुका है। उसमें चेतना नहीं है, और वह न तो तर्कशीलता और न चेतना के आधार पर चीजें करता है। कुछ लोग बहुत-से सत्यों को नहीं समझते हैं, किसी समस्या से सामना होने पर उन्हें पता नहीं होता कि क्या करना सही है, और उनके कोई पक्के सिद्धांत भी नहीं होते। तो फिर क्या किया जाना चाहिए? जिस न्यूनतम मापदंड पर उन्हें खरा उतरना चाहिए वह है चेतना के अनुसार व्यवहार करना। किसी को अपनी चेतना के अनुसार कैसे व्यवहार करना चाहिए? इसका मुख्य अंग यह है कि जब कोई व्यक्ति कुछ करता है तो उसे वह काम करते हुए एक सच्चे दिल पर निर्भर होना चाहिए, उसे परमेश्वर द्वारा दिए गए इस जीवन का योग्य पात्र होना चाहिए, और उसे उद्धार प्राप्त करने के परमेश्वर द्वारा दिए गए अवसर का योग्य पात्र होना चाहिए। जब तुम इस न्यूनतम मापदंड पर खरे उतर जाते हो, तो तुम्हें एक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है; तुम इतनी आसानी से परमेश्वर की अवज्ञा करने वाले काम नहीं करते, या अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागते, न ही तुम्हारे द्वारा लापरवाह अंदाज से व्यवहार करने की ज्यादा संभावना होगी। तुम अपने पद, प्रसिद्धि, धन-दौलत और भविष्य के लिए इतनी तिकड़में भी नहीं चलोगे। चेतना यही भूमिका निभाती है। किसी व्यक्ति की मानवता के सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण घटक उसके विवेक और सूझ-बूझ हैं। वह किस तरह का व्यक्ति है जिसमें विवेक नहीं है और सामान्य मानवता की सूझ-बूझ नहीं है। सीधे शब्दों में कहा जाये तो, वह ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता का अभाव है, वह एक बुरी मानवता वाला व्यक्ति है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। तुम्हारे आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रत्येक दिन रहते हो, तुम्हें आनंद उठाना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उस व्यक्ति के प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आप को उघाड़ना, और संगति करना, सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। क्रमशः तुम अपने आप को इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक क़रीब और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर सकते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी एक ऐसी मानसिकता होती है जिसके साथ तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा रखने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय उस स्थिति और रवैये के जिसमें कि तुम एक दूसरे के साथ लड़ते हो, एक दूसरे को कुचलते हो, एक दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक दूसरे के लिए छिपे तिरस्कार या घृणा ​​को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी अगले की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बनाता है। यह न केवल तुम्हारे पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें ग़लत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी की इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम उन्हें नापसंद करते हो, और असहज और दुखी महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोच सकते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नखरों, इन क्षुद्र भावनाओं में बंधे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे की ताक़तें क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए स्वयं में गहराई से वापस लौटना होगा। तुम्हें अपने आप में लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, फिर भी तुम दूसरों की ताक़तों से अनजान होकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, उन लोगों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग कर दूसरों को चोट पहुँचाओ और उन्हें बदतर बनाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच एक ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम लोग ये कैसा लगता है, यह महसूस करना चाहोगे?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

एक सामान्य व्यक्ति की समानता को पुनर्स्थापित करने के लिए, अर्थात् सामान्य मनुष्यत्व को प्राप्त करने के लिए लोग केवल अपने शब्दों से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। ऐसा करके वे स्वयं को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं, और इससे उनके प्रवेश या परिवर्तन को कोई लाभ नहीं पहुँचता। अतः परिवर्तन लाने के लिए लोगों को थोड़ा-थोड़ा करके अभ्यास करना चाहिए। उन्हें धीरे-धीरे प्रवेश करना चाहिए, थोड़ा-थोड़ा करके खोजना और जांचना चाहिए, सकारात्मकता से प्रवेश करना चाहिए, और सत्य का व्यवहारिक जीवन जीना चाहिए; अर्थात एक संत का जीवन जीना चाहिए। उसके बाद, वास्तविक विषय, वास्तविक घटनाएँ और वास्तविक वातावरण से लोगों को व्यवहारिक प्रशिक्षण मिलता है। लोगों से झूठे दिखावे की अपेक्षा नहीं की जाती; उन्हें वास्तविक वातावरण में प्रशिक्षण पाना है। पहले लोगों को यह पता चलता है कि उनमें क्षमता की कमी है, और फिर वे सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, प्रवेश करते हैं और सामान्य रूप से अभ्यास भी करते हैं; केवल इसी तरीके से वे वास्तविकता को प्राप्त कर सकते हैं, और इसी प्रकार से प्रवेश और भी अधिक तेजी से हो सकता है। लोगों को परिवर्तित करने के लिए, कुछ व्यवहारिकता होनी ही चाहिए; उन्हें वास्तविक विषयों के साथ, वास्तविक घटनाओं के साथ और वास्तविक वातावरण में अभ्यास करना चाहिए। क्या कोई केवल कलीसियाई जीवन पर निर्भर रहकर सच्चा प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है? क्या लोग इस तरह वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? नहीं! यदि लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करने में असमर्थ हैं, तो वह कार्य करने और जीवन जीने के पुराने तरीकों को बदलने में भी असमर्थ हैं। यह पूरी तरह से लोगों के आलस्य या उनकी अत्यधिक निर्भरता के कारण ही नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य में जीवन जीने की क्षमता नहीं है, और इससे भी बढ़कर, उनमें परमेश्वर के सामान्य मनुष्य की समानता के स्तर की समझ नहीं है। अतीत में, लोग हमेशा बात करते थे, बोलते थे, संवाद करते थे, यहाँ तक की वे "वक्ता" भी बन गए थे; लेकिन फिर भी उनमें से किसी ने भी जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश नहीं की; इसके बजाय, वे आँख मूंदकर गहन सिद्धांतों को खोजते रहे। अतः, आज के लोगों को अपने जीवन में परमेश्वर में विश्वास रखने के इस धार्मिक तरीके को बदलना चाहिए। उन्हें एक घटना, एक चीज़, एक व्यक्ति पर ध्यान देते हुए अभ्यास करना चाहिए। उन्हें यह काम पूरे ध्यान से करना चाहिए—तभी वे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। लोगों में बदलाव उनके सार में बदलाव से आरंभ होता है। कार्य का लक्ष्य लोगों का सार, उनका जीवन, उनका आलस्य, निर्भरता, और दासत्व होना चाहिए, केवल इस तरीके से वे परिवर्तित हो सकते हैं।

... व्यवहारिक विषयों के ज्ञान के बिना, लोग केवल सैद्धांतिक और बौद्धिक समझ ही प्राप्त कर सकते हैं—यह परिवर्तन का प्रभावी तरीका नहीं है। तो इंसान प्रशिक्षण से बुद्धि और अंतर्दृष्टि कैसे प्राप्त कर सकता है? क्या लोग केवल सुनकर, पढ़कर और अपने ज्ञान को बढ़ाकर बुद्धि और अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है? लोगों को वास्तविक जीवन में समझना और अनुभव करना चाहिए! अतः इंसान को प्रशिक्षण लेना चाहिए और उसे वास्तविक जीवन से हटना नहीं चाहिए। लोगों को विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और भिन्न पहलुओं में प्रवेश करना चाहिए : शैक्षणिक स्तर, अभिव्यक्ति, चीजों को देखने की योग्यता, विवेक, परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता, व्यवहारिक ज्ञान, मनुष्यजाति के नियम, और मनुष्यजाति से संबंधित अन्य बातें वो चीज़ें हैं जिनसे लोगों को परिपूर्ण होना चाहिए। समझ प्राप्त करने के बाद लोगों को प्रवेश पर ध्यान देना चाहिए, तभी परिवर्तन किया जा सकता है। यदि किसी ने समझ प्राप्त कर ली है परंतु फिर भी वह अभ्यास की उपेक्षा करता है, तो परिवर्तन कैसे हो सकता है? लोग बहुत कुछ समझते हैं, परंतु वह वास्तविकता को नहीं जीते; इसलिए उनके पास परमेश्वर के वचनों की केवल थोड़ी-सी मूलभूत समझ होती है। तुम केवल आंशिक रूप से प्रबुद्ध हुए हो; तुमने पवित्र आत्मा से केवल थोड़ा-सा प्रकाशन पाया है, फिर भी वास्तविक जीवन में तुम्हारा प्रवेश नहीं हुआ है, या शायद तुम प्रवेश की परवाह भी नहीं करते इस प्रकार, तुम्हारा परिवर्तन कम हो गया है। इतने लंबे समय के बाद, लोग बहुत कुछ समझते हैं। वे सिद्धांतों के अपने ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, परंतु उनका बाहरी स्वभाव वैसा ही रहता है, और उनकी मूल क्षमता पहले जैसी ही बनी रहती है, थोड़ी सी भी आगे नहीं बढ़ती। यदि ऐसा है तो तुम अंततः कब प्रवेश करोगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श' से उद्धृत

जिन लोगों के पास सत्य है, वे वही हैं जो अपने वास्तविक अनुभवों में, कभी पीछे हटे बिना, अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, और जो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों के साथ सामान्य संबंध रख सकते हैं, जो अपने ऊपर कुछ बीतने पर पूर्णतः परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाते हैं, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा अभ्यास और तुम्हारे प्रकाशन परमेश्वर की गवाही हैं, वे मनुष्य का जीवनयापन करना और परमेश्वर की गवाही हैं, और यही वास्तव में परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेना है; जब तुमने इस बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम्हें यथोचित प्रभाव की प्राप्ति हो चुकी होगी। तुम्हारे पास वास्तविक जीवनयापन होता है और तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप अन्य लोगों द्वारा प्रशंसा से देखा जाता है। तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण है, किंतु तुम अत्यंत धर्मनिष्ठता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन संप्रेषित करते हो, तब तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित और प्रबुद्ध किए जाते हो। तुम अपने शब्दों के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा कह पाते हो, वास्तविकता संप्रेषित कर पाते हो, और तुम आत्मा से सेवा करने के बारे में बहुत-कुछ समझते हो। तुम अपनी वाणी में खरे हो, तुम शालीन और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं हो और मर्यादित हो, परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कर पाते हो और जब तुम पर कुछ बीतती है तब तुम अपनी गवाही पर दृढता से डटे रहते हो, और तुम चाहे जिससे निपट रहे हो, हमेशा शांत और संयमित रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने सच में परमेश्वर का प्रेम देखा है। कुछ लोग अब भी युवा हैं, परंतु वे मध्यम आयु के व्यक्ति के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व, सत्य से युक्त होते हैं, और दूसरों से प्रशंसित होते हैं—और ये वे लोग हैं जिनके पास गवाही है और वे परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब उन्होंने एक निश्चित बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तो उनमें परमेश्वर के प्रति एक अंतर्दृष्टि होगी, और उनका बाहरी स्वभाव भी स्थिर हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

जब लोग उस दिन तक अनुभव करते हैं जब तक जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण और उनके अस्तित्व का अर्थ एवं आधार पूरी तरह से बदल नहीं जाते हैं, जब उनका सब कुछ परिवर्तित नहीं हो जाता और वे कोई अन्य व्यक्ति नहीं बन जाते हैं, क्या यह अद्भुत नहीं है? यह एक बड़ा परिवर्तन है; यह एक ऐसा परिवर्तन है जो सब कुछ उलट-पुलट कर देता है। केवल जब दुनिया की कीर्ति, लाभ, पद, धन, सुख, सत्ता और महिमा में तुम्हारी रुचि ख़त्म हो जाती है और तुम आसानी से उन्हें छोड़ पाते हो, केवल तभी तुम एक मनुष्य के समान बन पाओगे। जो लोग अंततः पूर्ण किये जाएंगे, वे इस तरह के एक समूह होंगे। वे सत्य के लिए, परमेश्वर के लिए और धार्मिकता के लिए जीएँगे। यही एक मनुष्य के समान होना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'समझना ही होगा कि लोगों की प्रकृतियों में समानताएँ भी हैं और भिन्नताएँ भी' से उद्धृत

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