58. कलीसिया का जीवन जीने के सिद्धान्‍त

(1) परमेश्‍वर के वचनों को अधिक-से-अधिक पढ़ना आवश्‍यक है। उनके माध्‍यम से, तुम्‍हें स्‍वयं को जानने और सत्‍य का अभ्‍यास करने के अपने अनुभव के साक्ष्‍य पर संगत करनी चाहिए, और उस अनुभव से एक-दूसरे को अवलम्‍ब और पोषण उपलब्‍ध कराना चाहिए;

(2) तुम्‍हें अपना कर्तव्‍य पालन करने के लिए खुद को प्रशिक्षित भी करना चाहिए। कर्तव्‍य पूरा करते हुए अपनी भ्रष्‍टता को जानो और सत्‍य के प्रति समर्पित होना सीखो, दूसरों के साथ तालमेल बिठा कर काम करो, और मनुष्‍य की तरह का जीवन जियो;

(3) काटे-छाँटे जाने और निपटे जाने को स्‍वीकार करना आवश्‍यक है; व्‍यक्ति को सत्‍य की तलाश करनी चाहिए और स्‍वयं को जानना चाहिए, और इस तरह अपनी भ्रष्‍टता से अपना शुद्धीकरण करना चाहिए। इस तरह अभ्‍यास करना जीवन में प्रगति के लिए अत्‍यन्‍त लाभप्रद है;

(4) सारे मसलों को परमेश्‍वर के वचनों पर आधारित करो, भावनाओं या जीवन के फ़लसफ़ों पर नहीं। दूसरों के साथ अपने बर्ताव में सिद्धान्‍त पर दृढ़ रहो। एक-दूसरे से प्रेम करो, और एक-दूसरे की देख-भाल और सहायता करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना तुम्हारी बातचीत का सिद्धांत होना चाहिए। आमतौर पर, जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत करनी चाहिए, उसके वचन को बातचीत का विषय बनाना चाहिए; बात करना चाहिए कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। जबतक तुम परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। परमेश्वर के वचन के संसार को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के सहयोग की आवश्यकता है। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो तो परमेश्वर अपना काम नहीं कर पाएगा। यदि तुम अपना मुँह बंद रखोगे और परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे तो वह तुम्हें रोशन नहीं कर पाएगा। जब भी तुम कोई दूसरा काम नहीं कर रहे, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करो। व्यर्थ की बातें मत करो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। कोई बात नहीं यदि तुम्हारी सहभागिता सतही है। सतह के बिना कोई गहराई नहीं हो सकती। एक प्रक्रिया का होना ज़रूरी है। अपने प्रशिक्षण द्वारा तुम पवित्र आत्मा से प्राप्त रोशनी को समझ लोगे और यह भी जान लोगे कि परमेश्वर के वचन को प्रभावी तरीके से कैसे खाएँ-पिएँ। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। केवल जब तुम सहयोग करने का संकल्प करोगे तभी पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में तुम समर्थ होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

उपदेशों में एक उचित कलीसिया-जीवन होने की आवश्यकता का प्रायः उल्लेख किया जाता है। तो ऐसा क्यों है कि कलीसिया के जीवन में अभी तक सुधार नहीं हुआ है, और उसमें अभी भी वही पुरानी बात है? उसमें जीवन का एक बिलकुल नया और अलग तरीका क्यों नहीं है? क्या नब्बे के दशक के किसी व्यक्ति का एक बीते युग के सम्राट की तरह जीना सामान्य होगा? यद्यपि अब लोग जो खाते और पीते हैं, वे ऐसे पकवान हैं, जो पिछले युगों में शायद ही कभी चखे गए हों, किंतु कलीसिया के जीवन में कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ है। यह पुरानी शराब को नई बोतलों में डालने जैसा रहा है। तो फिर परमेश्वर के इतना कहने का क्या लाभ है? अधिकांश जगहों पर कलीसिया बिलकुल भी नहीं बदले हैं। मैंने इसे अपनी आँखों से देखा है और यह मेरे हृदय में स्पष्ट है; यद्यपि मैंने स्वयं के लिए कलीसिया के जीवन का अनुभव नहीं किया है, फिर भी मैं कलीसिया की सभाओं की स्थितियों को बहुत अच्छे से जानता हूँ। उन्होंने बहुत प्रगति नहीं की है। यह उस पुरानी कहावत की याद दिलाती है—यह पुरानी शराब नई बोतलों में डालने की तरह है। कुछ भी नहीं बदला! जब कोई उनकी चरवाही करता है, तो वे आग की तरह जलते हैं, लेकिन जब कोई उन्हें सहारा देने के लिए नहीं होता, तो वे बर्फ के एक खंड की तरह होते हैं। ज्यादा लोग व्यावहारिक चीज़ों की बात नहीं कर सकते, और शायद ही कोई पतवार थाम सकता है। यद्यपि उपदेश बुलंद हैं, किंतु शायद ही कभी किसी को प्रवेश मिला है। कुछ ही लोग परमेश्वर के वचन को मानते हैं। जब वे परमेश्वर के वचन को ग्रहण करते हैं, तो वे दुखी हो जाते हैं, और जब उसे एक तरफ रख देते हैं, तो खुश हो जाते हैं; और जब उससे अलग होते हैं, तो निष्प्राण और निस्तेज हो जाते हैं। स्पष्ट रूप से बोलूँ तो, तुम लोग परमेश्वर के वचन को सँजोते नहीं, और उसके अपने मुँह से निकले हुए वचन को आज खज़ाने के रूप में नहीं देखते। तुम बस परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय उत्सुक होते हो और उसे स्मरण करते हुए उत्साही अनुभव करते हो, पर जब उसके वचन पर अमल करने की बात आती है, तो वह कुएँ से रस्सी के बजाय घोड़े की पूँछ के बाल से पानी खींचने की कोशिश करने जैसा होता है—तुम कितना भी कठिन प्रयास क्यों न कर लो, तुम पर्याप्त ऊर्जा लगा ही नहीं पाओगे। परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय तुम हमेशा ऊर्जा से भरे होते हो, लेकिन उसका अभ्यास करते समय लापरवाह हो जाते हो। वास्तव में, ये वचन इतनी शिद्दत से बोले जाने और इतने धैर्य से दोहराए जाने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन यह तथ्य कि लोग परमेश्वर के वचनों को सिर्फ सुनते हैं, उन्हें अभ्यास में नहीं लाते, परमेश्वर के कार्य में बाधा बन गया है। मैं इसका जिक्र नहीं कर सकता, मैं इसके बारे में बात नहीं कर सकता। मैं ऐसा करने के लिए विवश हूँ; ऐसा नहीं है कि मुझे दूसरों की कमज़ोरियाँ उजागर करने में मज़ा आता है। तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारा अभ्यास कमोबेश पर्याप्त है—कि जब प्रकाशन शिखर पर होते हैं, तो तुम्हारा प्रवेश भी शिखर पर होता है? क्या यह इतना आसान है? तुम लोग कभी उस नींव की जाँच नहीं करते, जिस पर अंततः तुम्हारे अनुभव निर्मित होते हैं! फ़िलहाल तुम लोगों की सभाओं को बिलकुल भी उचित कलीसिया-जीवन नहीं कहा जा सकता, न ही वे बिलकुल भी सही आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करते हैं। यह बस लोगों के एक समूह का जमावड़ा है, जिन्हें गपशप करने और गाने में मज़ा आता है। सच कहूँ तो, इसमें ज्यादा वास्तविकता नहीं है। थोड़ा और स्पष्ट करूँ तो, यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो वास्तविकता कहाँ है? क्या यह कहना शेखी बघारना नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है? जो लोग हमेशा कार्य करते हैं, वे अभिमानी और दंभी होते हैं, जबकि जो लोग हमेशा आज्ञापालन करते हैं, वे प्रशिक्षण का कोई अवसर पाए बिना शांत रहते हैं और अपना सिर नीचे रखते हैं। जो लोग कार्य करते हैं, वे सिवाय बातों के कुछ नहीं करते, अपने आडंबरपूर्ण भाषण जारी रखते हैं, और अनुयायी केवल सुनते हैं। कोई रूपांतरण नहीं है, जिसके बारे में बोला जा सके; ये सब बस अतीत के तरीके हैं! आज, तुम्हारा झुकने में समर्थ बिना जाना और हस्तक्षेप करने या मनमाना व्यवहार करने की हिम्मत न करना परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के आगमन के कारण है; यह परिवर्तन तुम्हारे अनुभवों से गुज़रने के माध्यम से नहीं आया है। यह तथ्य कि तुम कुछ चीज़ों को करने का साहस अब और नहीं करोगे जो आज प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करती हैं, इस कारण से है, क्योंकि परमेश्वर के वचनों के कार्य का एक स्पष्ट प्रभाव है और इसने लोगों को जीत लिया है। मुझे किसी से पूछने दो; आज की तुम्हारी कितनी उपलब्धियाँ तुम्हारी अपनी कड़ी मेहनत के पसीने से अर्जित हुई थीं? इनमें से कितना परमेश्वर द्वारा तुम्हें सीधे बताया गया था? तुम क्या जवाब दोगे? क्या तुम भौचक और अवाक् रह जाओगे? ऐसा क्यों है कि दूसरे लोग तुम्हें पोषण प्रदान करने के लिए अपने जीवन के कई वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करने में सक्षम हैं, जबकि तुम सिर्फ दूसरों द्वारा पकाया गया खाना खाने में आनंद लेते हो? क्या तुम्हें शर्म नहीं आती?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वह व्यक्ति उद्धार प्राप्त करता है जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार है' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों से हम देख सकते हैं कि हमें बचाने और रूपांतरित करने के लिए वह न तो केवल कुछ ऐसे काम ही करता है जो किसी घटना का पूर्वानुभव कराते हैं या उसकी भविष्यवाणी करते हैं और काम पूरा होने पर खत्म हो जाते हैं, न ही वह लोगों के बाहरी व्यवहार में रद्दोबदल करता है। इसके बजाय, वह हमारे हृदय की अंतरतम गहराइयों और हमारे स्वभाव और मूल सार से शुरुआत करते हुए हम में से प्रत्येक को स्रोत पर रूपांतरित करते हुए बदलना चाहता है। यह देखते हुए कि परमेश्वर इसी तरह काम करता है, हमें अपने प्रति किस तरह काम करना चाहिए? हमें अपने स्वभावों, अपनी खोज और अपने सभी कार्यों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, और हमें अपने सभी कार्यों को गंभीरता से लेना चाहिए, किसी भी चीज में ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए, और अपने व्यवहार के सभी पहलुओं की जाँच करने में सक्षम होना चाहिए। हर बार जब तुम कुछ करना समाप्त करते हो, तो उसके जो अंश तुम सोचते हो कि तुमने ठीक किए हैं, उन्हें जाँच के लिए रखना होगा—और, इससे भी बढ़कर, जो अंश तुम सोचते हो कि तुमने गलत किए हैं, उन्हें भी जाँच के लिए रखना होगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि भाई और बहनें मिलकर संगति करने, खोजने और एक-दूसरे की सहायता करने में अधिक समय लगाएँ। जितना अधिक हम संगति करते हैं, उतना ही अधिक प्रकाश हमारे हृदय में प्रवेश करता है; तब परमेश्वर हमारी सभी समस्याओं के संबंध में हमें प्रबुद्ध करेगा। अगर हम में से कोई नहीं बोलता, और हम सब बस अच्छे दिखने के लिए खुद पर आवरण चढ़ाकर दूसरों के मन पर एक अच्छी छाप छोड़ने की उम्मीद करते हैं और चाहते हैं कि वे हमारे बारे में ऊँचा सोचें और हमारा उपहास न करें, तो हमारे पास विकास करने का कोई साधन नहीं होगा। अगर तुम हमेशा अच्छा दिखने के लिए खुद पर आवरण चढ़ा लेते हो, तो तुम विकास नहीं करोगे, और तुम हमेशा अधंकार में ही जियोगे। तुम रूपांतरित होने में भी असमर्थ रहोगे। अगर तुम बदलना चाहते हो, तो तुम्हें मूल्य चुकाना होगा, अपने आपको उजागर करना होगा, और अपना हृदय दूसरों के लिए खोलना होगा, और ऐसा करके तुम अपने को भी लाभान्वित करोगे और दूसरे लोगों को भी। जब कोई कहता है, “तुम हाल के अपने अनुभवों के बारे में कुछ बातें क्यों नहीं कहते?” तो कोई भी सार के मुद्दों के बारे में बात नहीं करता, कोई अपना विश्लेषण नहीं करता, या कोई अपने आपको उजागर नहीं करता। जब लोग शब्दों और सिद्धांतों के बारे में बात करते हैं, तो किसी को कोई समस्या नहीं होती, परंतु जब वे स्वयं को जानने के बारे में बोलते हैं, तो कोई कुछ नहीं कहता। जिन्हें अपने बारे में थोड़ा पता भी होता है, वे भी स्वयं को उजाकर करने की हिम्मत नहीं करते—उनके पास ऐसा करने का साहस नहीं होता। मामला कहाँ समाप्त होता है? जब लोग इकट्ठे होते हैं, तो वे परस्पर चापलूसी करके एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हैं : कोई भी हर एक के द्वारा विश्लेषण किए जाने और जान लिए जाने के लिए अपना असली चेहरा दिखाने का इच्छुक नहीं होता। जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो क्या सच्चा कलीसियाई जीवन हो सकता है? नहीं हो सकता। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने कई वर्षों तक कलीसियाई जीवन का अनुभव लिया है, और मैं हमेशा पर्याप्त संतुष्ट महसूस करता हूँ; मैं हर समय आनंद महसूस करता हूँ।” सभाओं में जब हम प्रार्थना करते हैं और स्तुति के गीत गाते हैं, तो हम सब इतने द्रवित हो जाते हैं कि हमारे चेहरे से आँसू बहने लगते हैं। कभी-कभी हम इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि हमें पसीना आने लगता है, और सभी भाई और बहन नाचने-गाने लगते हैं। हमारा कलीसियाई जीवन इतना अद्भुत है! जब हम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो हमें महसूस होता है कि वह हमारे हृदय की गहराइयों में बोल रहा है। हम जब संगति करते हैं, तो हर कोई ऊर्जावान महसूस करता है।” इस तरह का कलीसियाई जीवन दसेक साल जी लेने का परिणाम क्या है? कोई भी ईमानदार होने पर ध्यान केंद्रित नहीं करता, कोई भी अपना विश्लेषण नहीं करता, कोई भी अपने भाइयों और बहनों के साथ अपनी वास्तविक स्थिति साझा नहीं करता, और कोई भी अपनी आंतरिक प्रेरणाएँ और अपनी आंतरिक भ्रष्टता उजागर नहीं करता। कलीसियाई जीवन के वे दसेक साल व्यर्थ में जिए गए हैं, सब बस लोगों की भावनाओं और तथाकथित “आनंद” के बीच नाच-गाकर बिता दिए गए। ऐसा आनंद और खुशी कहाँ से आती है? मैं कहने की हिम्मत करता हूँ कि यह वह नहीं है जो परमेश्वर देखना चाहता है, न ही यह उसे संतुष्ट करता है, क्योंकि परमेश्वर जो देखना चाहता है, वह है लोगों में परिवर्तन, और वह लोगों को अपने वचनों को जीते देखना चाहता है। वह यह नहीं देखना चाहता कि जब तुम सभाओं में भाग लो या जब विशेष रूप से उत्साहित महसूस करो, तो अपनी भजनों की किताब थामे रहो या उसकी प्रशंसा में गाओ-नाचो। वह ये चीजें नहीं देखना चाहता। इसके विपरीत, जब परमेश्वर ये चीजें देखता है, तो वह शोकाकुल, उदास और बहुत चिंतित महसूस करता है, क्योंकि उसने लाखों-लाखों वचन कहे हैं, किंतु वे तुम में से किसी में भी कार्यान्वित नहीं हुए या जिए नहीं गए हैं। यही है, जिसके बारे में परमेश्वर चिंता करता है। अकसर तुम लोग कलीसियाई जीवन का अनुभव करने के बाद संतुष्ट महसूस करते हो। जब तुम कुछ खुशी और शांति महसूस करते हो, और जब तुम्हें आनंद और आराम की अनुभूति होती है, या तुम परमेश्वर की स्तुति करने में कुछ आध्यात्मिक तृप्ति महसूस करते हो, तो तुम सोचते हो कि तुमने अपने विश्वास में बहुत अच्छा कार्य किया है। तुम ये झूठी छवियाँ थामे रहते हो और उन्हें अपनी पूँजी समझते हो—अपने विश्वास में प्राप्त चीजें—और तुम उन्हें स्वभाव में बदलाव तथा उद्धार के मार्ग में प्रवेश के स्थानापन्न के रूप में इस्तेमाल करते हो। फिर तुम्हें लगता है कि तुम्हें सत्य का अनुसरण करने या ईमानदार होने का प्रयास करने की जरूरत नहीं; तुम स्वयं को उजागर करने या परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की कोशिश नहीं करते। इस कारण से परमेश्वर तुम्हारे बारे में गहरी चिंता महसूस करता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

कलीसिया के अंदर तुम्हें इस तरह का परिवेश रखना चाहिए—हर कोई सत्य पर ध्यान केंद्रित करे और उसे पाने का प्रयास करे। लोग कितने भी बूढ़े अथवा युवा हों, चाहे वे पुराने विश्वासी हों या नए, या चाहे वे कितने भी क़ाबिल हों; जिन चीज़ों को तुम्हें देखना चाहिए, वे हैं कि कौन-से लोग सही तरह से बोलते हैं, कौन-से लोग सत्य के अनुरूप बोलते हैं, कौन-से लोग परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोच रहे हैं और कौन-से लोग उसके कार्य को अपने दिल में सबसे अधिक धारण करते हैं, किन लोगों में सकारात्मक चीज़ों के बारे में अच्छी समझ है, कौन-से लोग धार्मिकता की समझ साझा करते हैं, और कौन-से लोग कीमत चुकाने को तैयार हैं। अन्य सभी लोगों की तुलना में केवल इस तरह के लोगों को ही समर्थन और अनुमोदन दिया जाना उचित है। ईमानदारी का यह परिवेश, जो सत्य का अनुकरण करने से आता है, कलीसिया के अंदर व्याप्त होना चाहिए; इस तरह से, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा का कार्य होगा, और परमेश्वर तुम्हें आशीष और मार्गदर्शन प्रदान करेगा। यदि कलीसिया के अंदर कहानियाँ सुनाने, एक-दूसरे के साथ उपद्रव करने, एक-दूसरे से द्वेष रखने, एक-दूसरे से ईर्ष्या करने और एक-दूसरे से बहस करने का परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम लोगों के अंदर काम नहीं करेगा। एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करना और गुप्त रूप से लड़ना, धोखा देना, चकमा देना और साज़िश करना—यह बुराई का परिवेश है! यदि कलीसिया के अंदर ऐसा परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से अपना कार्य नहीं करेगा। प्रभु यीशु ने इसके संबंध में एक बात कही थी। क्या तुम लोगों को याद है, वह क्या थी? ("फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" (मत्ती 18:19-20)।) यह सत्य है। परमेश्वर जैसा कहता है, वैसा करता है। यदि तुम उसकी इच्छा के विरुद्ध जाते हो और जैसा वह कहता है, वैसा नहीं करते, तो वह तुमसे दूर हो जाएगा। फलतः, तुम हमेशा दूसरों के दोष देखोगे और इस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरों की कौन-सी बात तुम्हें अप्रसन्न करती है, और निरंतर इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरे तुम्हें नापसंद करते हैं। यह तुम्हारे लिए समस्याएँ पैदा करेगा। यदि पवित्र आत्मा तुम में काम नहीं करती, यदि परमेश्वर तुम्हें आशीष या मार्गदर्शन नहीं देता, यदि तुम केवल अपनी स्वयं की शक्ति और गुणों व क्षमताओं पर ही निर्भर करते हो, तो तुम्हारा किया कुछ भी सही नहीं होगा, तुम्हारा किया कुछ भी परमेश्वर के अनुरूप नहीं होगा, और चाहे तुम कितनी भी मेहनत करो, वह ऊर्जा की बरबादी होगी। धीरे-धीरे इसे स्वयं अनुभव करो; तुम अनुभव के जरिये धीरे-धीरे इसे सीख जाओगे। तुम जो कुछ भी करो, उस सबमें तुम्हें एकचित्त होना चाहिए। और तुम एकचित्त कैसे हो सकते हो? तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए; केवल तभी तुम लकड़ियों के गट्ठर की तरह मज़बूत बन पाओगे—सब एक-साथ, और सब एकचित्त।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया का जीवन इसलिए बनाया गया है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकें। कलीसियाई जीवन परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने, सत्य समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने का जीवन है। यह सत्य को स्वीकार करने, भ्रष्टता का समाधान करने, और एक सच्चे इंसान की तरह जीने का जीवन भी है। कलीसिया के जीवन के भीतर, परमेश्वर के चुने हुए लोग, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करते हैं और उसके उद्धार को प्राप्त करने के लिए सत्य में प्रवेश करते हैं; ये चीज़ें पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हासिल की जाती हैं। जिनके पास कलीसियाई जीवन नहीं है, उनके लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना आसान नहीं है, क्योंकि कलीसियाई जीवन वह वास्तविक स्थान है जहाँ परमेश्वर के चुने हुए लोग, परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, सत्य पर संगति करते हैं, उसके लिए गवाही देते हैं, और उसके प्रेम का आनंद लेते हैं। यह राज्य के प्रशिक्षण की जगह भी है, जहाँ परमेश्वर के चुने हुए लोग एक दूसरे को संपोषण प्रदान कर सकते हैं, अपने कर्तव्य पूरा कर परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं। केवल कलीसिया के जीवन के भीतर रहकर ही लोग पवित्र आत्मा के और अधिक कार्यों का आनंद ले सकते हैं और परमेश्वर द्वारा अधिक तरीकों से पूर्ण किए जा सकते हैं, सत्य समझने में सक्षम हो सकते हैं और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में अधिक तेज़ी से प्रवेश कर सकते हैं, अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं, और ऐसे लोग बन सकते हैं जो सच में परमेश्वर की आराधना करते हैं और उसे समर्पित होते हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों का अनुभव इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि अपने विश्वास में, यदि हमारे पास एक अच्छा कलीसियाई जीवन नहीं है, तो हम कभी भी परमेश्वर का उद्धार और पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाएंगे। यह एक अकाट्य तथ्य है। इसलिए, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को एक अच्छे कलीसियाई जीवन की आवश्यकता है; यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए उद्धार और पूर्णता प्राप्त करने में भी अपरिहार्य है। जो कलीसियाई जीवन से दूर हो गया है वह पवित्र आत्मा के कार्य से भी रिक्त हो गया है; जो कलीसिया के जीवन से दूर हो गया है उसने परमेश्वर को धोखा दिया है। ऐसे लोगों ने अपनी कब्र खुद ही खोद ली है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

आज कलीसिया के जीवन का अर्थ परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य पर संगति करना और लोगों के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करना है ताकि वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सत्य को समझ सकें, अपने भ्रष्ट सार को जान सकें, सत्य का अभ्यास कर सकें और सत्य प्राप्त कर अंततः उद्धार प्राप्त कर सकें। यदि हम अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुधारने या जीवन और उद्धार प्राप्त करने के अलावा, किन्हीं अन्य उद्देश्यों से परमेश्वर के वचन को पढ़ते हैं, तो परमेश्वर के वचन को पढ़ने की महत्ता खत्म हो जाती है। धर्म में, विश्वासी अक्सर कहते हैं कि उनके पापों को क्षमा कर दिया गया है। वे न कभी अपने अपराधों का उल्लेख करते हैं, न ही दूसरों के अपराधों का, और कोई भी किसी दूसरे का खुलासा नहीं करता है और हर कोई सद्भाव में रहता है। क्या वे खुद को बेवकूफ नहीं बना रहे हैं? परमेश्वर में ऐसी आस्था न तो सत्य की ओर ले जाएगी और न ही जीवन की ओर। अंतत:, यह महता से रहित, एक खोखली बात है। दूसरी ओर, परमेश्वर के घर में, परमेश्वर में विश्वास वास्तविकता से जुड़ा है: अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य लोगों का न्याय करना, उन्हें ताड़ना देना, शुद्ध करना और बचाना है। अगर हम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार नहीं करते हैं, तो हमारे भ्रष्ट स्वभाव कैसे ठीक किए जा सकेंगे? हम शैतान के हर विष, दर्शन, और व्यवस्थाओं को अपने भीतर से कैसे निकालेंगे? अगर हम इन भ्रष्टताओं को न सुधारें, तो हमें कैसे बचाया जा सकता है? इस प्रकार, कलीसिया के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी बात है सत्य को समझने के लिए परमेश्वर के वचन को खाना और पीना, और सभी प्रकार की भ्रष्ट अवस्थाओं को उजागर करना ताकि लोग उन्हें जान सकें। परमेश्वर का वचन लोगों के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है जो उनके प्रकृति-सार के भीतर प्रकट होता है, वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें आसानी से नहीं जाना जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर के वचन को फैलाते हुए हमें उसके वचन में प्रकाशित विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों की विशिष्ट अभिव्यक्तियों को भी उजागर और विश्लेषित करना चाहिए, ताकि प्रत्येक भाई-बहन सच में स्वयं को जान सके, स्पष्ट रूप से समझे कि किस प्रकार के शैतानी स्वभाव और विष उसके भीतर मौजूद हैं। उद्धार की खोज में यह सबसे मूलभूत कार्य है, और कलीसियाई जीवन की केंद्रीय विशेषता भी है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

कलीसिया के जीवन का माहौल, जीवन में हमारे विकास के लिए बहुत लाभकारी है, जो हमारे उद्धार की ओर ले जाता है। क्या समाज में ऐसा माहौल है? समाज में, यदि कोई व्यक्ति किसी चीज़ के बारे में थोड़ा-बहुत सीख ले और थोड़ी-सी क्षमता अर्जित कर ले, तो वह अभिमानी होता जाएगा और धीरे-धीरे अपनी मानवीय सदृशता खो देगा। इसका कारण यह है कि उसका माहौल घिनौना है, यह रंग के एक बड़े कुंड के समान है; जो कोई भी समाज में प्रवेश करेगा, वह अधिक से अधिक भ्रष्ट और अमानवीय हो जाएगा, और अंत में, अधिकाधिक विकृत होकर स्वयं शैतान बन जाएगा। इसलिए, समाज में, लोग सत्य को प्राप्त करने में असमर्थ हैं। लेकिन जब वे कलीसियाई जीवन के परिवेश में प्रवेश करते हैं, तो चीज़ें अलग होती हैं। कलीसिया के जीवन जीने के लिए कई सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए : पहला, लोगों को परमेश्वर का वचन खाना और पीना चाहिए और सत्य पर संगति करनी चाहिए; दूसरा, लोगों को अपने कर्तव्य निभाने के लिए खुद को प्रशिक्षित करना चाहिए, और अपने कर्तव्यों को निभाते हुए एक इंसान की तरह जीना चाहिए; तीसरा, भाई-बहनों को एकदूसरे की काट-छाँट और निपटारा करने का अभ्यास करना चाहिए और एकदूसरे की मदद करनी चाहिए। काट-छाँट, निपटारे और पारस्परिक सहायता के बिना, लोगों के लिए खुद को जानना मुश्किल है, और उनका विकास धीमा हो जाएगा। कलीसिया में, कुछ लोग सीधी बात बोलते हैं, जबकि कुछ चतुरता से बोलते हैं; कुछ लोगों का चीज़ों के प्रति दृष्टिकोण थोड़ा पक्षपाती या गलत होता है, जबकि अन्य लोग सटीकता से चीज़ों को देखते हैं। वहाँ सभी प्रकार के लोग होते हैं; इसलिए, एक व्यक्ति का सामना हर तरह की काट-छाँट और निपटारे से हो सकता है, और उसे इसके सभी प्रकार के स्वाद लेने चाहिए। इसलिए, कलीसिया के जीवन में, अपने भाई-बहनों द्वारा काट-छाँट और निपटारे में कई सबक सीखे जाने हैं। एक व्यक्ति को इसके प्रति एक सही दृष्टिकोण रखना चाहिए, सत्य खोजने का प्रयास करना चाहिए, और स्वयं को जानना चाहिए। अगर कुछ लोगों की बातें पूरी तरह से सही नहीं भी हैं, तो भी इसे पहले स्वीकार करना चाहिए, सहनशील और धैर्यवान होना सीखना चाहिए और सत्य के प्रति समर्पण करना चाहिए। कलीसिया के जीवन का परिवेश, किसी व्यक्ति के जीवन में विकास और परमेश्वर के कार्य के उसके अनुभव के लिए बहुत लाभदायक होता है, जो उद्धार की ओर ले जाता है। यह सत्य का परिवेश है, ऐसा परिवेश जिसमें पवित्र आत्मा शासन करता है और सत्य संप्रभु होता है। यदि लोग इस परिवेश के अनुकूल नहीं हो सकते हैं, तो आधारभूत समस्या क्या है? वे सत्य से प्रेम नहीं करते, और यह नहीं देख सकते कि कलीसियाई जीवन सत्य का परिवेश है। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ परमेश्वर का कार्य किया जाता है, जहाँ पवित्र आत्मा शासन करता है और यह राज्य का प्रशिक्षण स्थल है। यदि लोग राज्य के प्रशिक्षण स्थल को छोड़कर चले जाते हैं, तो वे उद्धार नहीं पा सकते हैं। कुछ लोग एक पेशे की तरह परमेश्वर में विश्वास करते हैं, अपने घर के तुच्छ परिवेश से अपनी आस्था का अभ्यास करते हैं। वे अपने जीवन में बढ़ने में असमर्थ हैं और बचाये नहीं जा सकते हैं। इसलिए, कलीसियाई जीवन का परिवेश एक बहुत ही अच्छी चीज़ है!

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

Iसमझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग,सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के लिए...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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