58. कलीसिया का जीवन जीने के सिद्धांत

(1) परमेश्‍वर के वचनों को अधिक-से-अधिक पढ़ना आवश्‍यक है। उनके माध्‍यम से, तुम्‍हें स्‍वयं को जानने और सत्‍य का अभ्‍यास करने के अपने अनुभव से अपनी गवाही पर सहभागिता करनी चाहिए, और एक-दूसरे की मदद और पोषण करना चाहिए।

(2) तुम्‍हें अपना कर्तव्‍य पालन करने के लिए खुद को प्रशिक्षित भी करना चाहिए। कर्तव्‍य पूरा करते हुए अपनी भ्रष्‍टता को जानो और सत्‍य के प्रति समर्पित होना सीखो, दूसरों के साथ तालमेल बिठा कर काम करो, और मनुष्‍य की तरह का जीवन जियो।

(3) काटे-छाँटे और निपटे जाने को स्‍वीकार करना आवश्‍यक है; व्‍यक्ति को सत्‍य की तलाश करनी चाहिए और स्‍वयं को जानना चाहिए, और इस तरह अपनी भ्रष्‍टता का शुद्धिकरण करना चाहिए। इस तरह अभ्‍यास करना जीवन में प्रगति के लिए अत्यंत लाभप्रद है।

(4) सारे मसलों को परमेश्‍वर के वचनों पर आधारित करो, भावनाओं या जीवन के फलसफ़ों पर नहीं। दूसरों के साथ अपने बर्ताव में सिद्धांत पर दृढ़ रहो। एक-दूसरे से प्रेम करो, और एक-दूसरे की देख-भाल और सहायता करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आसपास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि जो तुम संवाद और अनुसरण करते हो, वह आज परमेश्वर के वचनों के आसपास केंद्रित नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से परे हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वो सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वो आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँभी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी काम करें या उनकी पीड़ा जितनी भी ज़्यादा हो या वो कितनी ही भागदौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों की परमेश्वर द्वारा सराहना नहीं की जाती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का अर्थ है, परमेश्वर के लोगों के जीवन की शुरुआत—क्या तुम इस तरह का प्रशिक्षण स्वीकार करने के लिए तैयार हो? क्या तुम तात्कालिकता महसूस करने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के अनुशासन में जीने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना के तहत जीने के लिए तैयार हो? जब परमेश्वर के वचन तुम पर आएँगेऔर तुम्हारी परीक्षा लेंगे, तब तुम क्या करोगे? और जब सभी तरह के तथ्यों से तुम्हारा सामना होगा, तो तुम क्या करोगे? अतीत में तुम्हारा ध्यान जीवन पर केंद्रित नहीं था; आज तुम्हें जीवन-वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। यही है जो राज्य के लोगों द्वारा हासिल किया जाना चाहिए। वो सभी जो परमेश्वर के लोग हैं, उनके पास जीवन होना चाहिए, उन्हें राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनीचाहिए। परमेश्वर राज्य के लोगों से यही अपेक्षा रखता है।

राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ अपेक्षाएं इस प्रकार हैं:

1. उन्हें परमेश्वर के आदेशों को अवश्य स्वीकार करना होगा। इसका अर्थ है, उन्हें आखिरी दिनों के परमेश्वर के कार्य के दौरान कहे गए सभी वचन स्वीकार करने होंगे।

2. उन्हें राज्य के प्रशिक्षण में अवश्य प्रवेश करना होगा।

3. उन्हें प्रयास करना होगा कि परमेश्वर उनके दिलों को स्पर्श करे। जब तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख होजाता है और तुम्हारा जीवन सामान्य रूप से आध्यात्मिक होता है, तो तुम स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहोगे, जिसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के प्रेम की देख-रेख और उसकी सुरक्षा में जिओगे। जब तुम परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहते हो, तभी तुम परमेश्वर के होते हो।

4. उन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त होना होगा।

5. उन्हें पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति बनना होगा।

ये पाँचबातें तुम सबके लिए मेरे आदेश हैं। मेरे वचन परमेश्वर के लोगों से कहे जाते हैं और यदि तुम इन आदेशों को स्वीकार करने के इच्छुकनहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहींकरूँगा—लेकिन अगर तुम सचमुच उन्हें स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा पर चलने में सक्षम होंगे होगे। आज तुम सभी परमेश्वर के आदेश स्वीकार करना शुरू करो और राज्य के लोग बनने की कोशिश करो और राज्य के लोगों के लिए आवश्यक मानक हासिल करने का प्रयास करो। यह प्रवेश का पहला चरण है। यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें इन पाँचआदेशों को स्वीकार करना होगा और यदि तुम ऐसाकर पाने में सक्षम रहे, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के मुताबिक होंगे और परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा महान उपयोग करेगा। आज जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह हैराज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश में आध्यात्मिक जीवन शामिल है। इससे पहले आध्यात्मिक जीवन की कोई बात नहीं होती थी लेकिन आज, जैसे ही तुम राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू करते हो, तुम आधिकारिक तौर पर आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

उपदेशों में एक उचित कलीसिया-जीवन होने की आवश्यकता का प्रायः उल्लेख किया जाता है। तो ऐसा क्यों है कि कलीसिया के जीवन में अभी तक सुधार नहीं हुआ है, और उसमें अभी भी वही पुरानी बात है? उसमें जीवन का एक बिलकुल नया और अलग तरीका क्यों नहीं है? क्या नब्बे के दशक के किसी व्यक्ति का एक बीते युग के सम्राट की तरह जीना सामान्य होगा? यद्यपि अब लोग जो खाते और पीते हैं, वे ऐसे पकवान हैं, जो पिछले युगों में शायद ही कभी चखे गए हों, किंतु कलीसिया के जीवन में कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ है। यह पुरानी शराब को नई बोतलों में डालने जैसा रहा है। तो फिर परमेश्वर के इतना कहने का क्या लाभ है? अधिकांश जगहों पर कलीसिया बिलकुल भी नहीं बदले हैं। मैंने इसे अपनी आँखों से देखा है और यह मेरे हृदय में स्पष्ट है; यद्यपि मैंने स्वयं के लिए कलीसिया के जीवन का अनुभव नहीं किया है, फिर भी मैं कलीसिया की सभाओं की स्थितियों को बहुत अच्छे से जानता हूँ। उन्होंने बहुत प्रगति नहीं की है। यह उस पुरानी कहावत की याद दिलाती है—यह पुरानी शराब नई बोतलों में डालने की तरह है। कुछ भी नहीं बदला! जब कोई उनकी चरवाही करता है, तो वे आग की तरह जलते हैं, लेकिन जब कोई उन्हें सहारा देने के लिए नहीं होता, तो वे बर्फ के एक खंड की तरह होते हैं। ज्यादा लोग व्यावहारिक चीज़ों की बात नहीं कर सकते, और शायद ही कोई पतवार थाम सकता है। यद्यपि उपदेश बुलंद हैं, किंतु शायद ही कभी किसी को प्रवेश मिला है। कुछ ही लोग परमेश्वर के वचन को मानते हैं। जब वे परमेश्वर के वचन को ग्रहण करते हैं, तो वे दुखी हो जाते हैं, और जब उसे एक तरफ रख देते हैं, तो खुश हो जाते हैं; और जब उससे अलग होते हैं, तो निष्प्राण और निस्तेज हो जाते हैं। स्पष्ट रूप से बोलूँ तो, तुम लोग परमेश्वर के वचन को सँजोते नहीं, और उसके अपने मुँह से निकले हुए वचन को आज खज़ाने के रूप में नहीं देखते। तुम बस परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय उत्सुक होते हो और उसे स्मरण करते हुए उत्साही अनुभव करते हो, पर जब उसके वचन पर अमल करने की बात आती है, तो वह कुएँ से रस्सी के बजाय घोड़े की पूँछ के बाल से पानी खींचने की कोशिश करने जैसा होता है—तुम कितना भी कठिन प्रयास क्यों न कर लो, तुम पर्याप्त ऊर्जा लगा ही नहीं पाओगे। परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय तुम हमेशा ऊर्जा से भरे होते हो, लेकिन उसका अभ्यास करते समय लापरवाह हो जाते हो। वास्तव में, ये वचन इतनी शिद्दत से बोले जाने और इतने धैर्य से दोहराए जाने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन यह तथ्य कि लोग परमेश्वर के वचनों को सिर्फ सुनते हैं, उन्हें अभ्यास में नहीं लाते, परमेश्वर के कार्य में बाधा बन गया है। मैं इसका जिक्र नहीं कर सकता, मैं इसके बारे में बात नहीं कर सकता। मैं ऐसा करने के लिए विवश हूँ; ऐसा नहीं है कि मुझे दूसरों की कमज़ोरियाँ उजागर करने में मज़ा आता है। तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारा अभ्यास कमोबेश पर्याप्त है—कि जब प्रकाशन शिखर पर होते हैं, तो तुम्हारा प्रवेश भी शिखर पर होता है? क्या यह इतना आसान है? तुम लोग कभी उस नींव की जाँच नहीं करते, जिस पर अंततः तुम्हारे अनुभव निर्मित होते हैं! फ़िलहाल तुम लोगों की सभाओं को बिलकुल भी उचित कलीसिया-जीवन नहीं कहा जा सकता, न ही वे बिलकुल भी सही आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करते हैं। यह बस लोगों के एक समूह का जमावड़ा है, जिन्हें गपशप करने और गाने में मज़ा आता है। सच कहूँ तो, इसमें ज्यादा वास्तविकता नहीं है। थोड़ा और स्पष्ट करूँ तो, यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो वास्तविकता कहाँ है? क्या यह कहना शेखी बघारना नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है? जो लोग हमेशा कार्य करते हैं, वे अभिमानी और दंभी होते हैं, जबकि जो लोग हमेशा आज्ञापालन करते हैं, वे प्रशिक्षण का कोई अवसर पाए बिना शांत रहते हैं और अपना सिर नीचे रखते हैं। जो लोग कार्य करते हैं, वे सिवाय बातों के कुछ नहीं करते, अपने आडंबरपूर्ण भाषण जारी रखते हैं, और अनुयायी केवल सुनते हैं। कोई रूपांतरण नहीं है, जिसके बारे में बोला जा सके; ये सब बस अतीत के तरीके हैं! आज, तुम्हारा झुकने में समर्थ बिना जाना और हस्तक्षेप करने या मनमाना व्यवहार करने की हिम्मत न करना परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के आगमन के कारण है; यह परिवर्तन तुम्हारे अनुभवों से गुज़रने के माध्यम से नहीं आया है। यह तथ्य कि तुम कुछ चीज़ों को करने का साहस अब और नहीं करोगे जो आज प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करती हैं, इस कारण से है, क्योंकि परमेश्वर के वचनों के कार्य का एक स्पष्ट प्रभाव है और इसने लोगों को जीत लिया है। मुझे किसी से पूछने दो; आज की तुम्हारी कितनी उपलब्धियाँ तुम्हारी अपनी कड़ी मेहनत के पसीने से अर्जित हुई थीं? इनमें से कितना परमेश्वर द्वारा तुम्हें सीधे बताया गया था? तुम क्या जवाब दोगे? क्या तुम भौचक और अवाक् रह जाओगे? ऐसा क्यों है कि दूसरे लोग तुम्हें पोषण प्रदान करने के लिए अपने जीवन के कई वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करने में सक्षम हैं, जबकि तुम सिर्फ दूसरों द्वारा पकाया गया खाना खाने में आनंद लेते हो? क्या तुम्हें शर्म नहीं आती?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वह व्यक्ति उद्धार प्राप्त करता है जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार है' से उद्धृत

कलीसियाई जीवन की सामान्य स्थिति यह होनी चाहिए कि भाई-बहन स्वतंत्र रूप से और बिना किसी रोक-टोक के परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति कर सकें; अपनी अंतर्दृष्टि, समझ और अनुभव के बारे में संगति कर सकें; और अपनी कठिनाइयों के बारे में संगति कर सकें। बेशक, वे कलीसिया के अगुआओं की आलोचना कर सकते हैं, उन्हें उजागर कर सकते हैं और अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं, और साथ ही मदद और सलाह भी दे सकते हैं। ये सभी चीजें स्वतंत्र रूप से की जा सकती हैं और ये सामान्य होनी चाहिए और किसी एक व्यक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं की जानी चाहिए। परमेश्वर के घर में कलीसियाई जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए इस बारे में आदेश, नियम और सिद्धांत हैं कि भाई-बहनों को कैसे बात करनी चाहिए, कैसे कार्य करना चाहिए और कैसे व्यवहार करना चाहिए, साथ ही दूसरों के साथ सामान्य आदान-प्रदान कैसे करना चाहिए, आदि। ये चीजें तय करना किसी के इख्तियार में नहीं हैं। अपने कार्य करने के तरीके में भाई-बहनों को दूसरों की नजरों पर ध्यान देने और दूसरों द्वारा आदेश दिए जाने की आवश्यकता नहीं है, और न ही उन्हें किसी के नियंत्रण में रहने की आवश्यकता है। वहाँ कोई दिशा-निर्देशक नहीं है और कोई चालक नहीं है; एकमात्र चीज, जिसके द्वारा लोग दिशा प्राप्त कर सकते हैं और जिसका पालन किया जाना चाहिए, वे परमेश्वर के घर द्वारा बताए गए सिद्धांत और परमेश्वर के वचन हैं। अगर तुम हमेशा दूसरों के अंकुश में रहते हो और हमेशा दूसरों की नजरों पर ध्यान देते रहते हो, और बोलते समय देखते हो कि कोई सही नजर से नहीं देख रहा है और उनकी त्योरियाँ चढ़ी हुई हैं और वे नाखुश हैं और तुम कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाते हो; और परमेश्वर के वचनों और अपनी समझ और अंतर्दृष्टि के बारे में संगति करते हुए हमेशा दूसरों द्वारा रोके-टोके जाते रहते हो, कभी सहज नहीं हो पाते, सिद्धांत के अनुसार काम नहीं कर पाते, और किसी के शब्द, चेहरा, मुखभाव और लहजा, और उनके शब्दों की चुभती हुई रोक-टोक तुम्हारे सिद्धांत बन जाते हैं, तो तुम उस व्यक्ति के नेतृत्व वाले गिरोह द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हो। यह एक समस्या है। इस तरह का कलीसियाई जीवन और यह स्थिति वैसी नहीं है, जैसी सामान्य कलीसियाई व्यवस्था में अभिव्यक्त होती है। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को आगे आना चाहिए और इन चीजों को हल करना चाहिए, लेकिन भाई-बहनों के पास भी कलीसिया की सामान्य व्यवस्था की रक्षा करने की जिम्मेदारी और अधिकार है। उन्हें उन लोगों को रोकना और उजागर करना चाहिए और उनका विश्लेषण करना चाहिए, जो बीच में बाधा डालते हैं और परेशान करते हैं, गुट बनाते हैं और लोगों को नियंत्रित करते हैं, और उनके द्वारा जीते जाने और नियंत्रित होने से इनकार कर देना चाहिए, ताकि किसी भी कारण से कलीसिया में कोई गुट न बन पाए। उदाहरण के लिए, कलीसिया में लोगों के दर्जे, पदानुक्रम या समूहों में अंतर करने के मानदंड और बहानों के रूप में धन या उम्र, लिंग, सामाजिक हैसियत, शैक्षिक स्तर, रूप-रंग, अच्छी और बुरी मानवता के स्तर आदि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। कलीसिया में किसी भी बहाने से पदानुक्रम और दर्जे के विभाजन और गुटों की उपस्थिति कलीसिया की सामान्य व्यवस्था को बाधित और अव्यवस्थित करेगी। ये वे समस्याएँ हैं, जिन्हें अगुआओं और कार्यकर्ताओं को हल करना चाहिए। संक्षेप में, यदि किसी भी कारण से गिरोह, गुट या समूह बनते हैं और वे एक खास तरह की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, और वे सामान्य कलीसियाई जीवन और कलीसियाई व्यवस्था को प्रभावित और भंग करते हैं, तो इस तरह की स्थिति को रोका और प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, यहाँ तक कि उसमें भाग लेने वालों को अलग भी किया जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। यह वह कार्य है जिसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कलीसियाई जीवन में कोई गुट दिखाई देने पर करना चाहिए, और यह एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसे उन्हें पूरा करना चाहिए। हमें यहाँ क्या समझने की जरूरत है? अगर लोगों का कोई समूह कलीसिया में एक ताकत बन जाता है और वह कलीसिया के अगुआओं, परमेश्वर के घर के कार्य और परमेश्वर के वचनों का प्रतिरोध और विरोध कर सकता है, और अगर वह कलीसियाई जीवन की सामान्य व्यवस्था को भंग और नष्ट कर सकता है, तो ऐसे व्यवहार, कृत्यों और मामलों पर अंकुश लगाया जाना चाहिए और उनसे निपटा जाना चाहिए। क्या गुटों के सदस्यों की संख्या के आधार पर उनमें अंतर किया जा सकता है? एक व्यक्ति को गुट के रूप में नहीं गिना जाता, लेकिन दो या अधिक लोग गिने जाते हैं। अगर दो लोग अच्छी तरह से मिलकर रहते हैं लेकिन किसी भी तरह से कलीसिया को परेशान नहीं करते, तो उनके लिए परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है; लेकिन जैसे ही वे व्यवधान पैदा करते हैं और एक ताकत बन जाते हैं और कोई कार्रवाई करने वाले होते हैं, उन्हें रोका और प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। यही सिद्धांत है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (13)' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों से हम देख सकते हैं कि हमें बचाने और रूपांतरित करने के लिए वह न तो केवल कुछ ऐसे काम ही करता है जो किसी घटना का पूर्वानुभव कराते हैं या उसकी भविष्यवाणी करते हैं और काम पूरा होने पर खत्म हो जाते हैं, न ही वह लोगों के बाहरी व्यवहार में रद्दोबदल करता है। इसके बजाय, वह हमारे हृदय की अंतरतम गहराइयों और हमारे स्वभाव और मूल सार से शुरुआत करते हुए हम में से प्रत्येक को स्रोत पर रूपांतरित करते हुए बदलना चाहता है। यह देखते हुए कि परमेश्वर इसी तरह काम करता है, हमें अपने प्रति किस तरह काम करना चाहिए? हमें अपने स्वभावों, अपनी खोज और अपने सभी कार्यों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, और हमें अपने सभी कार्यों को गंभीरता से लेना चाहिए, किसी भी चीज में ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए, और अपने व्यवहार के सभी पहलुओं की जाँच करने में सक्षम होना चाहिए। हर बार जब तुम कुछ करना समाप्त करते हो, तो उसके जो अंश तुम सोचते हो कि तुमने ठीक किए हैं, उन्हें जाँच के लिए रखना होगा—और, इससे भी बढ़कर, जो अंश तुम सोचते हो कि तुमने गलत किए हैं, उन्हें भी जाँच के लिए रखना होगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि भाई और बहनें मिलकर संगति करने, खोजने और एक-दूसरे की सहायता करने में अधिक समय लगाएँ। जितना अधिक हम संगति करते हैं, उतना ही अधिक प्रकाश हमारे हृदय में प्रवेश करता है; तब परमेश्वर हमारी सभी समस्याओं के संबंध में हमें प्रबुद्ध करेगा। अगर हम में से कोई नहीं बोलता, और हम सब बस अच्छे दिखने के लिए खुद पर आवरण चढ़ाकर दूसरों के मन पर एक अच्छी छाप छोड़ने की उम्मीद करते हैं और चाहते हैं कि वे हमारे बारे में ऊँचा सोचें और हमारा उपहास न करें, तो हमारे पास विकास करने का कोई साधन नहीं होगा। अगर तुम हमेशा अच्छा दिखने के लिए खुद पर आवरण चढ़ा लेते हो, तो तुम विकास नहीं करोगे, और तुम हमेशा अधंकार में ही जियोगे। तुम रूपांतरित होने में भी असमर्थ रहोगे। अगर तुम बदलना चाहते हो, तो तुम्हें मूल्य चुकाना होगा, अपने आपको उजागर करना होगा, और अपना हृदय दूसरों के लिए खोलना होगा, और ऐसा करके तुम अपने को भी लाभान्वित करोगे और दूसरे लोगों को भी। जब कोई कहता है, "तुम हाल के अपने अनुभवों के बारे में कुछ बातें क्यों नहीं कहते?" तो कोई भी सार के मुद्दों के बारे में बात नहीं करता, कोई अपना विश्लेषण नहीं करता, या कोई अपने आपको उजागर नहीं करता। जब लोग शब्दों और सिद्धांतों के बारे में बात करते हैं, तो किसी को कोई समस्या नहीं होती, परंतु जब वे स्वयं को जानने के बारे में बोलते हैं, तो कोई कुछ नहीं कहता। जिन्हें अपने बारे में थोड़ा पता भी होता है, वे भी स्वयं को उजाकर करने की हिम्मत नहीं करते—उनके पास ऐसा करने का साहस नहीं होता। मामला कहाँ समाप्त होता है? जब लोग इकट्ठे होते हैं, तो वे परस्पर चापलूसी करके एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हैं : कोई भी हर एक के द्वारा विश्लेषण किए जाने और जान लिए जाने के लिए अपना असली चेहरा दिखाने का इच्छुक नहीं होता। जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो क्या सच्चा कलीसियाई जीवन हो सकता है? नहीं हो सकता। कुछ लोग कहते हैं, "मैंने कई वर्षों तक कलीसियाई जीवन का अनुभव लिया है, और मैं हमेशा पर्याप्त संतुष्ट महसूस करता हूँ; मैं हर समय आनंद महसूस करता हूँ। सभाओं में जब हम प्रार्थना करते हैं और स्तुति के गीत गाते हैं, तो हम सब इतने द्रवित हो जाते हैं कि हमारे चेहरे से आँसू बहने लगते हैं। कभी-कभी हम इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि हमें पसीना आने लगता है, और सभी भाई और बहन नाचने-गाने लगते हैं। हमारा कलीसियाई जीवन इतना अद्भुत है! जब हम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो हमें महसूस होता है कि वह हमारे हृदय की गहराइयों में बोल रहा है। हम जब संगति करते हैं, तो हर कोई ऊर्जावान महसूस करता है।" इस तरह का कलीसियाई जीवन दसेक साल जी लेने का परिणाम क्या है? कोई भी ईमानदार होने पर ध्यान केंद्रित नहीं करता, कोई भी अपना विश्लेषण नहीं करता, कोई भी अपने भाइयों और बहनों के साथ अपनी वास्तविक स्थिति साझा नहीं करता, और कोई भी अपनी आंतरिक प्रेरणाएँ और अपनी आंतरिक भ्रष्टता उजागर नहीं करता। कलीसियाई जीवन के वे दसेक साल व्यर्थ में जिए गए हैं, सब बस लोगों की भावनाओं और तथाकथित "आनंद" के बीच नाच-गाकर बिता दिए गए। ऐसा आनंद और खुशी कहाँ से आती है? मैं कहने की हिम्मत करता हूँ कि यह वह नहीं है जो परमेश्वर देखना चाहता है, न ही यह उसे संतुष्ट करता है, क्योंकि परमेश्वर जो देखना चाहता है, वह है लोगों में परिवर्तन, और वह लोगों को अपने वचनों को जीते देखना चाहता है। वह यह नहीं देखना चाहता कि जब तुम सभाओं में भाग लो या जब विशेष रूप से उत्साहित महसूस करो, तो अपनी भजनों की किताब थामे रहो या उसकी प्रशंसा में गाओ-नाचो। वह ये चीजें नहीं देखना चाहता। इसके विपरीत, जब परमेश्वर ये चीजें देखता है, तो वह शोकाकुल, उदास और बहुत चिंतित महसूस करता है, क्योंकि उसने लाखों-लाखों वचन कहे हैं, किंतु वे तुम में से किसी में भी कार्यान्वित नहीं हुए या जिए नहीं गए हैं। यही है, जिसके बारे में परमेश्वर चिंता करता है। अकसर तुम लोग कलीसियाई जीवन का अनुभव करने के बाद संतुष्ट महसूस करते हो। जब तुम कुछ खुशी और शांति महसूस करते हो, और जब तुम्हें आनंद और आराम की अनुभूति होती है, या तुम परमेश्वर की स्तुति करने में कुछ आध्यात्मिक तृप्ति महसूस करते हो, तो तुम सोचते हो कि तुमने अपने विश्वास में बहुत अच्छा कार्य किया है। तुम ये झूठी छवियाँ थामे रहते हो और उन्हें अपनी पूँजी समझते हो—अपने विश्वास में प्राप्त चीजें—और तुम उन्हें स्वभाव में बदलाव तथा उद्धार के मार्ग में प्रवेश के स्थानापन्न के रूप में इस्तेमाल करते हो। फिर तुम्हें लगता है कि तुम्हें सत्य का अनुसरण करने या ईमानदार होने का प्रयास करने की जरूरत नहीं; तुम स्वयं को उजागर करने या परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की कोशिश नहीं करते। इस कारण से परमेश्वर तुम्हारे बारे में गहरी चिंता महसूस करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

कलीसिया के अंदर तुम्हें इस तरह का परिवेश रखना चाहिए—हर कोई सत्य पर ध्यान केंद्रित करे और उसे पाने का प्रयास करे। लोग कितने भी बूढ़े अथवा युवा हों, चाहे वे पुराने विश्वासी हों या नए, या चाहे वे कितने भी क़ाबिल हों; जिन चीज़ों को तुम्हें देखना चाहिए, वे हैं कि कौन-से लोग सही तरह से बोलते हैं, कौन-से लोग सत्य के अनुरूप बोलते हैं, कौन-से लोग परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोच रहे हैं और कौन-से लोग उसके कार्य को अपने दिल में सबसे अधिक धारण करते हैं, किन लोगों में सकारात्मक चीज़ों के बारे में अच्छी समझ है, कौन-से लोग धार्मिकता की समझ साझा करते हैं, और कौन-से लोग कीमत चुकाने को तैयार हैं। ऐसे लोगों का उनके भाई-बहनों द्वारा समर्थन और सराहना की जानी चाहिए। ईमानदारी का यह परिवेश, जो सत्य का अनुकरण करने से आता है, कलीसिया के अंदर व्याप्त होना चाहिए; इस तरह से, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा का कार्य होगा, और परमेश्वर तुम्हें आशीष और मार्गदर्शन प्रदान करेगा। अगर कलीसिया के अंदर कहानियाँ सुनाने, एक-दूसरे के साथ उपद्रव करने, एक-दूसरे से द्वेष रखने, एक-दूसरे से ईर्ष्या करने और एक-दूसरे से बहस करने का परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम लोगों के अंदर काम नहीं करेगा। एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करना और गुप्त रूप से लड़ना, धोखा देना, चकमा देना और साज़िश करना—यह बुराई का परिवेश है! अगर कलीसिया के अंदर ऐसा परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से अपना कार्य नहीं करेगा। प्रभु यीशु ने इसके संबंध में एक बात कही थी। क्या तुम लोगों को याद है, वह क्या थी? ("फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" [मत्ती 18:19-20]।) यह सत्य है। परमेश्वर जैसा कहता है, वैसा करता है। अगर तुम उसकी इच्छा के विरुद्ध जाते हो और जैसा वह कहता है, वैसा नहीं करते, तो वह तुमसे दूर हो जाएगा। फलतः, तुम हमेशा दूसरों के दोष देखोगे और इस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरों की कौन-सी बात तुम्हें अप्रसन्न करती है, और निरंतर इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरे तुम्हें नापसंद करते हैं। यह तुम्हारे लिए समस्याएँ पैदा करेगा। अगर पवित्र आत्मा तुम में काम नहीं करती, अगर परमेश्वर तुम्हें आशीष या मार्गदर्शन नहीं देता, अगर तुम केवल अपनी स्वयं की शक्ति और गुणों व क्षमताओं पर ही निर्भर करते हो, तो तुम्हारा किया कुछ भी सही नहीं होगा, तुम्हारा किया कुछ भी परमेश्वर के अनुरूप नहीं होगा, और चाहे तुम कितनी भी मेहनत करो, वह ऊर्जा की बरबादी होगी। तुम अनुभव के जरिये धीरे-धीरे इसे सीख जाओगे। तुम जो कुछ भी करो, उस सबमें तुम्हें एकचित्त होना चाहिए। और तुम एकचित्त कैसे हो सकते हो? तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए; केवल तभी तुम लकड़ियों के गट्ठर की तरह मज़बूत बन पाओगे—सब एक-साथ, और सब एकचित्त।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

पहली बार कलीसिया में आने और अपने कर्तव्य सँभालने पर, और निपटे जाने या काट-छाँट किए जाने से पहले हर कोई नाशपाती के आकार के कैक्टस की तरह कँटीला होता है, वह चाहता है कि हर चीज में उसी की राय अंतिम हो। ऐसे लोग सोचते हैं : "अब चूँकि मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, इसलिए मुझे कलीसिया में अधिकार और स्वतंत्रता है, इसलिए मैं जैसा ठीक समझूँगा, वैसा करूँगा।" लेकिन जब वे निपटे और काट-छाँट किए जाने के एक दौर से गुजर लेते हैं और वे अनुशासित कर दिए जाते हैं, और जब उनके साथ सत्य की संगति कर ली जाती है और वे उपदेश सुन लेते हैं, तो फिर वे इस तरह का व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करते। दरअसल, वे पूरी तरह से संतुलित नहीं होते; वे इस बारे में थोड़ा-बहुत ही जानते हैं कि चीजें कैसे काम करती हैं, और उनमें अधिक समझ नहीं होती। जब दूसरे लोग ऐसी बातें कहते हैं जो अनिवार्य होती हैं, तो वे उनकी यथार्थता स्वीकार कर सकते हैं, और भले ही वे उन चीजों को अच्छी तरह से न समझ पाएँ, तो भी वे उन्हें स्वीकार कर सकते हैं। तब क्या वे पहले से कहीं अधिक संतुलित नहीं हो जाते? उनका इन चीजों को स्वीकार कर पाना दर्शाता है कि उनके व्यवहार में कुछ बदलाव आए हैं। ये बदलाव कैसे आए हैं? ये परमेश्वर के वचनों के उपदेश, प्रेरणा और आश्वासन से उत्पन्न हुए हैं। कभी-कभी ऐसे लोगों को कुछ अनुशासित, निपटे और काट-छाँट किए जाने के साथ-साथ सिद्धांतों पर कुछ संगति की आवश्यकता होती है, यह बताने के लिए कि कोई चीज एक निश्चित तरीके से ही की जानी चाहिए, अन्य तरीके से नहीं। "सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए। वह ठीक हमारे सामने है। कौन इस पर आपत्ति करने की हिम्मत करेगा?" वे सोचते हैं। परमेश्वर के घर में परमेश्वर महान है, सत्य महान है और सत्य का बोलबाला है; इस सैद्धांतिक आधार ने कुछ लोगों को झिंझोड़कर जगा दिया है और उन्हें समझाया है कि परमेश्वर में आस्था रखना क्या होता है। किसी ऐसे व्यक्ति को लो, जो मूलत: क्रूर और लंपट था, पूरी तरह से स्वच्छंद था, और नियमों से, परमेश्वर में आस्था से, परमेश्वर के घर से और परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य-पालन के सिद्धांतों से अनजान था : जब ऐसा व्यक्ति—जो कुछ नहीं जानता—नेक इरादों और उत्साह के साथ, बड़ी आशा-आकांक्षाओं से भरा हुआ परमेश्वर के घर में आता है, और वहाँ परमेश्वर के वचनों से बार-बार प्रेरित और प्रोत्साहित, सिंचित और पोषित किया जाता है, उससे निपटा जाता है और उसकी काट-छाँट की जाती है, उसे ताड़ना दी जाती है और अनुशासित किया जाता है, तो धीरे-धीरे उस व्यक्ति की मानवता में कुछ परिवर्तन होंगे। वे परिवर्तन क्या हैं? वह इंसानी आचरण के कुछ सिद्धांतों को समझने लगता है और जान जाता है कि पहले उसमें मानवता की कमी थी; वह क्रूर, अहंकारी और अति आत्मविश्वासी था; वह बिना सिद्धांतों के बोलता और काम करता था और सत्य की खोज करना नहीं जानता था; वह सोचता था कि परमेश्वर में विश्वास करना, पाशविक शक्ति के साथ, परमेश्वर जो कहे, वह करने और जहाँ जाने के लिए कहे, वहाँ जाने जैसा आसान मामला है; और इतना ही नहीं, ऐसे व्यक्ति को लगता था कि यही परमेश्वर के प्रति वफादारी और प्रेम है। अब वह व्यक्ति इन सभी चीजों को नकारता है और जानता है कि ये शैतानी व्यवहार हैं, और परमेश्वर के विश्वासियों को उसके वचनों पर ध्यान देकर सत्य को महान मानकर सभी चीजों में उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पित होना चाहिए। संक्षेप में, सिद्धांत रूप में और अपने दिल की गहराई में सभी लोगों ने समझ, मान और स्वीकार लिया है कि ये वचन सही हैं—कि ये सत्य, सकारात्मक चीजों की वास्तविकता हैं—चाहे इन वचनों ने उनके दिल में जितनी भी गहरी पैठ बनाई हो और चाहे इन वचनों ने कितनी भी बड़ी भूमिका निभाई हो। बाद में, ताड़ना और अनुशासन की एक अमूर्त मात्रा से गुजरकर उनकी चेतना में कुछ सच्चा विश्वास पैदा होता है। परमेश्वर के संबंध में उनकी शुरुआती अस्पष्ट कल्पनाओं से लेकर उनकी वर्तमान भावना तक—कि परमेश्वर है और वह काफी वास्तविक है—जब लोगों में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में ये भावनाएँ होती हैं, तो उनके विचार और दृष्टिकोण, चीजों को देखने का उनका तरीका और नैतिक मानदंड, और साथ ही उनके सोचने का तरीका धीरे-धीरे बदलना शुरू हो जाता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

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