27. परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना और उन्हें जान लेना आवश्यक है। ऐसा करने का अर्थ यह जानना है कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों को कैसे लागू करना है और उनके अनुसार कैसे जीना है।

(2) सभी समस्याओं में सत्य की तलाश करना आवश्यक है। जब कोई समस्याएँ हल करने के लिए सत्य का उपयोग करता है, तो उसके पास अभ्यास और प्रवेश का एक मार्ग हो जाता है, और वह परमेश्वर के वचनों से अब भटकेगा नहीं।

(3) लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में देखना, सत्य को समझना और सिद्धांत के साथ कार्य करना आवश्यक है। ऐसा करना परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में लाता है।

(4) परीक्षणों और क्लेशों के बीच, व्यक्ति को निरंतर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसके लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसके वचनों के प्रबोधन और मार्गदर्शन के साथ अनुसरण करने का एक मार्ग बन जाता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब लोग सत्य को समझते हैं, और इसके साथ यों जीते हैं मानो यह उनका जीवन हो, तो इसका तात्पर्य किस तरह के जीवन से है? इसका तात्पर्य, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन कर पाने की उनकी योग्यता से है; इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो उनका जीवनयापन परमेश्वर के वचन-सत्य की नींव पर स्थापित होता है, और वे सत्य के क्षेत्र में जी रहे हैं। लोगों का जीवन सत्य को समझना और अनुभव करना होता, और इस आधार के साथ, उस दायरे से बाहर न जाना; सत्य-जीवन प्राप्त करने की बात करते समय, इसी जीवन की चर्चा की जा रही है। तुम सत्य के साथ इस तरह जी सको मानो यह तुम्हारा जीवन है, इसके लिए ऐसा नहीं है कि जीवन का सत्य तुम्हारे अंदर हो, न ही ये बात है कि अगर सत्य तुम्हारे अंदर जीवन की तरह हो, तो तुम सत्य बन जाते हो, और तुम्हारा आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है, यह तो और भी नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य-जीवन हो। आखिरकार, तुम्हारा जीवन इंसान का जीवन ही है। बात केवल इतनी है कि मनुष्य परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रहकर जी सकता है, सत्य का ज्ञान रख सकता है, और इसे गहराई तक समझ सकता है; इस समझ को तुमसे छीना नहीं जा सकता। तुम इन बातों को पूरी तरह से अनुभव करते हो और समझते हो, तुम्हें लगता है कि ये चीजें अच्छी हैं, बहुत कीमती हैं, और तुम उन्हें अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करने लगते हो; साथ ही, तुम इन चीजों पर निर्भर रहते हुए जीते हो, और कोई इसे बदल नहीं सकता : तो, तुम्हारा जीवन यह है। यानी, तुम्हारे जीवन में केवल—समझ, अनुभव और सत्य की अंतर्दृष्टि—यही बातें होती हैं, तुम चाहे कुछ भी करो, तुम अपने जीने का तरीका इन्हीं चीज़ों पर ही आधारित करोगे, और तुम इस दायरे या इन सीमाओं से परे नहीं जाओगे; तुम्हारा जीवन इसी प्रकार का होगा। परमेश्वर के कार्य का अंतिम उद्देश्य यही है कि लोगों को इस तरह का जीवन मिले।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर ने अपना जीवन और स्वरूप लोगों को दिया है ताकि वे इन्हें जी सकें, ताकि वे परमेश्वर के स्वरूप को और जो वह उन्हें देता है उसे जीने के लिए एक दिशा और मार्ग में, अपने जीवन में रूपांतरित कर सकें, ताकि, वे इस जीवन के अनुसार जी सकें। तो, क्या हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर ने मुक्त रूप से अपना जीवन लोगों को दिया है, जिससे ये उनका जीवन बन गया है? तो फिर लोगों ने परमेश्वर से क्या पाया है? परमेश्वर की अपेक्षा? परमेश्वर की प्रतिज्ञा? क्या? उन्होंने जो परमेश्वर से पाया है वह खोखला वचन नहीं बल्कि परमेश्वर का जीवन है! लोगों को जीवन प्रदान करने के अलावा, एक अपेक्षा जो परमेश्वर तुमसे करता है वह यह है कि तुम परमेश्वर के इस जीवन को लेकर इसे अपने जीवन में बदल दो, और इसे जीओ। जब परमेश्वर तुम्हें इस जीवन को जीते हुए देखता है, तो वह संतुष्ट महसूस करता है। यही परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। इस प्रकार, मनुष्य जो परमेश्वर से प्राप्त करता है वह अनमोल है, और जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों में सबसे अनमोल इस वस्तु मनुष्य को प्रदान कर रहा है, तो परमेश्वर को कुछ भी हासिल नहीं होता है; सबसे बड़ी लाभार्थी मानवजाति है। परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हुए, लोग सत्य को भी समझ जाते हैं, मनुष्य होने के सिद्धांतों को प्राप्त करते हैं, उन जड़ों को विकसित करते हैं जिनकी उन्हें मनुष्य होने के लिए आवश्यकता होती है, और मनुष्य होने के लिए उन्हें जिस दिशा का अनुसरण करने की आवश्यकता होती है उसे प्राप्त करते हैं। वे अब शैतान से और धोखा नहीं खाते हैं, उसके द्वारा बांधे नहीं जाते हैं, दुष्ट लोगों द्वारा धोखा नहीं खाते और इस्तेमाल नहीं किए जाते, और न ही वे बुरी प्रवृत्तियों द्वारा प्रदूषित किए या बहकाये जाते हैं। मनुष्य स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आज़ादी से रहते हैं, और वे मुक्त हो जाते हैं। वे वास्तव में परमेश्वर के प्रभुत्व में जीने में सक्षम हो जाते हैं, अब कोई भी बुरी या अंधकारमय ताकतें उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं। अर्थात, जब वे इस जीवन को जी रहे होते हैं, उन्हें अब किसी भी पीड़ा का अनुभव नहीं होता है, बल्कि वे खुशी से बिना कष्ट के रहते हैं; वे स्वतंत्र रूप से रहते हैं और परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखते हैं। वे अब परमेश्वर के खिलाफ बगावत या विरोध नहीं कर सकते हैं; बल्कि, वे वास्तव में परमेश्वर की प्रभुता में रह सकते हैं। वे पूरी तरह से एक सही और उचित जीवन जीते हैं, और असली मनुष्य बन जाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना का सर्वाधिक लाभार्थी मनुष्‍य है' से उद्धृत

लोगों द्वारा सत्य को समझने और उसका अभ्यास करने का उद्देश्य यह है कि वे सत्य को जीएँ, और जिन सत्यों को वे समझते हैं और जिन्हें वे अभ्यास में लाने में सक्षम हैं, उन्हें अपना जीवन बनाएँ। उन्हें अपना जीवन बनाने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि वे तुम्हारे कार्यों, तुम्हारे जीवन, तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे अस्तित्व का आधार और स्रोत बन जाएँ—वे तुम्हारे जीवन का ढंग बदल दें। पहले लोग किस आधार पर जीते थे? उनमें कोई आस्था रही हो या न रही हो, पर वे परमेश्वर के वचनों या सत्य के आधार पर नहीं जीते थे। क्या एक सृजित प्राणी को इसी तरह जीना चाहिए? परमेश्वर मनुष्य से क्या चाहता है? (कि लोग उसके वचनों के अनुसार जीएँ।) परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना—यही वह लक्ष्य है, जो परमेश्वर में वास्तव में विश्वास करने वाले लोगों को रखना चाहिए; सृजित प्राणी को इसी तरह जीना चाहिए। परमेश्वर की दृष्टि में ऐसे लोग ही सच्चे सृजित प्राणी हैं। इसलिए, तुम लोगों को नियमित रूप से यह सोचना चाहिए कि तुम्हारे कौन-से वचन, तुम्हारे कौन-से कार्य, और तुम्हारे व्यवहार के कौन-से सिद्धांत, तुम्हारे अस्तित्व के कौन-से लक्ष्य और तुम्हारे आचरण के कौन-से पहलू परमेश्वर के अनुरूप हैं, परमेश्वर द्वारा तुमसे की जाने वाली अपेक्षाओं से मेल खाते हैं, और कौन-से परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। अगर तुम अकसर इन चीजों के बारे में चिंतन-मनन करोगे, तो तुम धीरे-धीरे प्रवेश हासिल कर लोगे। अगर तुम इन चीजों के बारे में सोच-विचार नहीं करते, तो सिर्फ सतही प्रयास करने का कोई लाभ नहीं है; बेमन से कार्य करने, नियमों का पालन करने और समारोहों में लिप्त होने से अंतत: तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। तो परमेश्वर में आस्था आखिर क्या है? परमेश्वर में आस्था असल में शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य से परमेश्वर की दृष्टि में एक सच्चे सृजित प्राणी में बदलने की प्रक्रिया है। अब जब कोई जीने के लिए शैतान के स्वभाव और उसकी प्रकृति पर निर्भर होता है, तो क्या वह ऐसा सृजित प्राणी होता है, जिससे परमेश्वर अपनी दृष्टि में संतुष्ट होता है? तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो, तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करते हो और यह स्वीकार करते हो कि तुम्हें सब-कुछ परमेश्वर देता है, लेकिन क्या तुम परमेश्वर के वचनों को जीते हो? क्या तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार जीते हो? क्या तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हो? क्या तुम जैसा सृजित प्राणी परमेश्वर के सामने आने और परमेश्वर के साथ रहने के योग्य है? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर-भीरू हृदय है? क्या जिसे तुम जीते हो और जिस रास्ते पर तुम चलते हो, वह परमेश्वर के अनुकूल है? (नहीं।) तो अब परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या तुमने सही रास्ते पर प्रवेश किया है? तुम्हारा परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर के नाम में तुम्हारा विश्वास और स्वीकृति, और तुम्हारा परमेश्वर को अपने सर्जक और अपने संप्रभु के रूप में स्वीकार करना केवल एक औपचारिकता और ठकुरसुहाती है। क्योंकि तुमने सार में परमेश्वर की संप्रभुता या परमेश्वर के आयोजन स्वीकार नहीं किए हैं, और तुम परमेश्वर के साथ पूरी तरह से संगत नहीं हो सकते। अर्थात्, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ पूरी तरह से चरितार्थ नहीं हुआ है। हालाँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, लेकिन तुमने अपनी भ्रष्टता दूर नहीं की है और उद्धार प्राप्त नहीं किया है, और तुमने परमेश्वर में विश्वास के व्यावहारिक पक्ष में प्रवेश नहीं किया है। इसे इस तरह से देखें तो, परमेश्वर पर विश्वास कोई साधारण बात नहीं है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; उद्धार पाने के लिए जो मार्ग उसे अपनाना आवश्‍यक है साथ ही उस मार्ग के लक्ष्य और दिशा; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सत्य-वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिससे सृजित मनुष्य सामान्य मानवता को जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों में ही मनुष्य को सत्य और जीवन की आपूर्ति की जा सकती है; केवल इनसे ही मनुष्य की समझ में आ सकता है कि सामान्य मानवता क्‍या है, सार्थक जीवन क्या है, वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि उसे परमेश्वर की परवाह किस तरह करनी चाहिए, सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए, और एक वास्तविक मनुष्य की समानता कैसे प्राप्त करनी चाहिए; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का शासक कौन है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ सकता है कि वह जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों से सृष्टि पर शासन करता है, उसकी अगुआई करता है और उसका पोषण करता है; और केवल इनसे ही मनुष्य समझ-बूझ सकता है कि वह, जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों के ज़रिये मौजूद रहता है, स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करता है और कार्य करता है। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग, मनुष्य के पास परमेश्‍वर के वचनों और सत्‍य का कोई वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक ज़िंदा लाश, पूरा घोंघा होता है, और स्रष्टा से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्‍ता नहीं होता। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे व्यक्ति ने कभी उस पर विश्वास नहीं किया है, न कभी उसका अनुसरण किया है, और इसलिए परमेश्वर न तो उसे अपना विश्वासी मानता है और न ही अपना अनुयायी, एक सच्‍चा सृजित प्राणी मानना तो दूर की बात रही।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर मनुष्य से एकनिष्ठ प्रेम की अपेक्षा करता है; परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके वचनों से भरा रहे और उसके लिए प्यार से भरे हृदय से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों में रहना, उसके वचनों में ढूँढना जो उन्हें खोजना चाहिए, परमेश्वर को उसके वचनों के लिए प्यार करना, उसके वचनों के लिए भागना, उसके वचनों के लिए जीना—ये ऐसे लक्ष्य हैं जिन्हें पाने के लिए इंसान को प्रयास करने चाहिए। सबकुछ परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए; इंसान तभी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा। यदि मनुष्य में परमेश्वर के वचन नहीं होंगे, तो इंसान शैतान के चंगुल में फँसे भुनगे से ज़्यादा कुछ नहीं है! इसका आकलन करो : परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ें जमाई हैं? किन चीज़ों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीते रहे हो? किन चीज़ों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन नहीं जीते रहे हो? यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के प्रभाव में नहीं हो, तो तुम्हारे दिल पर किसने कब्ज़ा कर रखा है? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हो, या परमेश्वर के वचनों ने तुम पर अधिकार कर रखा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों की बुनियाद पर आधारित हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन से अपनी नकारात्मक अवस्था से बाहर आ गए हो? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव की तरह लेना—यही वो है जिसमें सबको प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर से विद्रोह कर रहे हो, तुम उसका विरोध कर रहे हो, और तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो। इस तरह के मनुष्यों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से बदमाशी है, एक विघ्न है। तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार रहा है? तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं रहा है? परमेश्वर के वचनों को तुमसे जो अपेक्षाएँ थीं, उनमें से तुमने कितनी पूरी की हैं? कितनी तुममें खो गई हैं? क्या तुमने ऐसी चीज़ों को बारीकी से देखा है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

यदि तुम अक्सर परमेश्वर के वचनों को खा और पी सको, साथ ही परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति सजग रह सको और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सको, तो तुम परमेश्वर के हो, तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों में जी रहा है। क्या तुम शैतान के कब्ज़े से निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा; यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो तुम पवित्र आत्मा को काम करने का ऐसा कोई अवसर नहीं दोगे। पवित्र आत्मा मनुष्यों पर जो काम करता है, वह जो प्रकाश उन पर डालता है, और वह जो विश्वास उन्हें देता है, वह केवल एक ही पल तक रहता है; यदि लोग सावधान न रहें और ध्यान न दें, तो पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य उन्हें छुए बिना ही निकल जाएगा। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों में रहता है, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों में नहीं रहता, तो वह शैतान के बंधन में रहता है। यदि इंसान भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीता है, तो उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति या पवित्र आत्मा का काम नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में रह रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और उसका काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे, बल्कि शैतान के अधीन रह रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में रहकर अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; तभी तुम परमेश्वर के होगे। यदि तुम सचमुच परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ईमानदारी से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम में काम करेगा, और फिर तुम उसके आशीष में रहोगे, उसके मुखमंडल की रोशनी में रहोगे; तुम पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य को समझोगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम-से-कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिए; और सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के वचन के अधीन रहना। किसी भी परिस्थिति में तुम उसके वचन से विमुख नहीं होगे। परमेश्वर को जानना और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, संप्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जाएँगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएँगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जाएगा : इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर पूरी तरह परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार मानवजाति को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और उसकी गवाही देने में सक्षम लोग वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता के रूप में अपनाया है।

वचन के युग अर्थात सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से ही तुम परमेश्वर के वचन को जीने में समर्थ होगे। दूसरे लोगों को आश्वस्त करने के लिए तुम्हें कुछ व्यावहारिक अनुभव पेश करने होंगे। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं जी सकते तो किसी को भी यकीन नहीं दिलाया जा सकता! परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले सभी लोग वे हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जी सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए इस वास्तविकता को पेश नहीं कर सकते तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गए हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की प्यास रखता हो? जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, उनमें सत्य की प्यास है और केवल ऐेसे ही लोगों को परमेश्वर का अशीष प्राप्त है। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत सारी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद वह नास्तिकों के बीच अपनी बात रखता है और उन्हें जीतता है। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किए जाएँगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव में कमी आती है, उसमें इंसानियत का प्रकटन होता है और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव में कमी आती है। वचन मनुष्य में अधिकार के साथ काम करता है और परमेश्वर की ज्योति के भीतर मनुष्य को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करता है, साथ ही उसके कार्य के निर्णायक मोड़, ये सब कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकते हैं। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने से, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके और अपने वास्तविक अनुभव से परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लोग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

यदि लोगों को परमेश्वर के स्वभाव की वास्तविक समझ होती है, और वे उसकी पवित्रता और धार्मिकता की हृदयस्पर्शी प्रार्थना दे सकते हैं, तो इसका मतलब है कि वे सच में उसे जानते और सत्य को धारण करते हैं, और केवल तभी वे प्रकाश में जीते हैं। केवल जब दुनिया और जीवन के बारे में एक व्यक्ति का दृष्टिकोण बदलता है, तभी उसमें आधारभूत रूपान्तरण होता है। जब किसी का कोई जीवन लक्ष्य होता है और वह सत्य के अनुसार आचरण करता है, जब वह पूरी तरह से खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पण कर देता है और उसके वचनों के अनुसार जीता है, जब वह अपनी आत्मा में गहराई से शान्त महसूस करता है और रोशन हो उठता है, जब उसका दिल अंधकार से मुक्त होता है, और जब वह पूरी तरह से स्वतंत्र और बाधा मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जी पाता है, केवल तभी वह एक सच्चा मानव जीवन व्यतीत करता है और सत्य धारण करने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुम्हारे पास हैं वह परमेश्वर के वचनों से आए हैं और स्वयं परमेश्वर से आए है। समस्त ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का शासक—परमेश्वर जो सबसे ऊँचा है—तुम्हें वास्तविक मानव जीवन जी रहे एक वास्तविक मनुष्य के रूप में अनुमोदित करता है। परमेश्वर के अनुमोदन से अधिक सार्थक और क्या हो सकता है? सत्य धारण करने का अर्थ यही है। आज के शैतान द्वारा नियंत्रित विश्व में, मानव इतिहास के हजारों वर्षों में, कौन है जिसने जीवन प्राप्त किया है? कोई भी नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य वे सभी लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया है। जिन सब बातों के अनुसार उन्होंने अपना जीवन व्यतीत किया है और जीवित रहे हैं, वे सब शैतान से आती हैं, और शैतान द्वारा स्वीकार की जाती हैं, और वे पूरी तरह परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध हैं। इसलिए, मनुष्य ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जो उसके अभिशाप को झेलते हैं, और जिनके पास ऐसा कोई जीवन नहीं है जिसके बारे में वे बात कर सकें। हालांकि, वे "अपनी छाप छोडना" चाहते हैं, "अपने नाम को सौ पीढ़ियों तक याद रखे जाना" चाहते हैं, "अनंत महिमा का आनंद लेना" चाहते हैं, और "एक कालजयी प्रतिष्ठा प्राप्त करना" चाहते हैं, ये सब शब्द शैतानी शब्द हैं। तथ्य यह है कि उन्हें परमेश्वर ने जल्दी ही अभिशापित कर दिया था, ताकि वे कभी भी पुनर्जन्म न ले सकें। मशहूर लोगों के शब्द, वे जो भी हों, मूल रूप से परमेश्वर के सामने नहीं टिकते हैं, और मरने के बाद नरक के अठारहवें स्तर पर सभी को दंडित किया जाता है। केवल परमेश्वर ही सत्य है। परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और उनकी हर चीज को नियंत्रित करता है और सभी पर उसका प्रभुत्व है। परमेश्वर पर विश्वास न करने, परमेश्वर के समक्ष स्वयं को अर्पित न करने का अर्थ है सत्य प्राप्त न कर पाना। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीते हो, तो तुम अपने दिल की गहराई में प्रकाशवान और शांतचित्त महसूस करोगे और तुम अतुलनीय मिठास का आनंद लोगे। जब ऐसा होगा तो तुम वास्तव में जीवन प्राप्त कर लोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

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775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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