27. परमेश्वर के वचनों द्वारा जीने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना और उन्हें जान लेना आवश्यक है। ऐसा करने का अर्थ यह जानना है कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों को कैसे लागू किया जाए और उनके द्वारा कैसे जीना है;

(2) सभी समस्याओं में सत्य की तलाश करना आवश्यक है। जब कोई समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करता है, तो उसके पास अभ्यास और प्रवेश का एक मार्ग हो जाता है, और वे परमेश्वर के वचनों से अब नहीं भटकेंगे;

(3) लोगों और चीज़ों को परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में देखना, सत्य को समझना और सिद्धांत के साथ कार्य करना आवश्यक है। ऐसा करने से परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में लाया जाता है;

(4) परीक्षणों और क्लेशों के बीच, व्यक्ति को निरंतर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसके लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसके वचनों के प्रबोधन और मार्गदर्शन के साथ, अनुसरण करने का एक मार्ग बन जाता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; मार्ग, लक्ष्‍य और दिशा, जिससे होकर गुज़रना उद्धार पाने के लिए आवश्‍यक है; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिसे सृजित मनुष्य जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों में ही मनुष्य को सत्य और जीवन की आपूर्ति की जा सकती है; केवल इनसे ही मनुष्य की समझ में आ सकता है कि सामान्य मानवता क्‍या है, सार्थक जीवन क्या है, वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि उसे परमेश्वर की परवाह किस तरह करनी चाहिए, सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए, और एक वास्तविक मनुष्य की समानता कैसे प्राप्त करनी चाहिए; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का शासक कौन है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ सकता है कि वह जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों से सृष्टि पर शासन करता है, उसकी अगुआई करता है और उसका पोषण करता है; और केवल इनसे ही मनुष्य समझ-बूझ सकता है कि वह, जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों के ज़रिये मौजूद रहता है, स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करता है और कार्य करता है। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग, मनुष्य के पास परमेश्‍वर के वचनों और सत्‍य का कोई वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक ज़िंदा लाश, पूरा घोंघा होता है, और स्रष्टा से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्‍ता नहीं होता। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे व्यक्ति ने कभी उस पर विश्वास नहीं किया है, न कभी उसका अनुसरण किया है, और इसलिए परमेश्वर न तो उसे अपना विश्वासी मानता है और न ही अपना अनुयायी, एक सच्‍चा सृजित प्राणी मानना तो दूर की बात रही।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर ने मुक्त रूप से अपना जीवन और स्वरूप मनुष्यों को दिया है ताकि वे इसे जी सकें, ताकि वे परमेश्वर के स्वरूप को और जो वो उन्हें देता है उसे जीने के लिए एक दिशा और मार्ग में रूपांतरित कर सकें, अर्थात, वे इस पर निर्भर होकर जी सकें और उसके वचनों को अपना जीवन बना सकें। तो, क्या हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर ने मुक्त रूप से अपना जीवन मनुष्यों को दिया है, जिससे ये उनका जीवन बन गया है? तो फिर मनुष्यों ने परमेश्वर से क्या पाया है? परमेश्वर की अपेक्षा? परमेश्वर की प्रतिज्ञा? क्या? उन्होंने जो परमेश्वर से पाया है वो खोखला वचन नहीं बल्कि परमेश्वर का जीवन है। मनुष्यों को जीवन प्रदान करने के अलावा, एक अपेक्षा जो परमेश्वर उनसे करता है वह यह है कि वे परमेश्वर के इस जीवन को लेकर इसे अपने जीवन में बदल दें, और इसे जीएं। जब परमेश्वर लोगों को इस जीवन को जीते हुए देखता है, तो वह संतुष्ट महसूस करता है। यही परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। इस प्रकार, मनुष्य जो परमेश्वर से प्राप्त करता है वह अनमोल है, और जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों में सबसे अनमोल इस वस्तु मनुष्य को प्रदान कर रहा है, तो परमेश्वर को कुछ भी हासिल नहीं होता है; सबसे बड़ी लाभार्थी मानवजाति है। मनुष्य सबसे बड़ा लाभ उठाते हैं; वे सबसे बड़े लाभार्थी हैं। परमेश्वर के जीवन को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हुए, मनुष्य सत्य को भी समझ जाते हैं, मनुष्य होने के सिद्धांतों को प्राप्त करते हैं, उन जड़ों को विकसित करते हैं जिनकी उन्हें मनुष्य होने के लिए आवश्यकता होती है, और मनुष्य होने के लिए उन्हें जिस दिशा में चलने की आवश्यकता होती है उसे प्राप्त करते हैं। वे अब शैतान से और धोखा नहीं खाते हैं, उसके द्वारा बांधे नहीं जाते हैं, दुष्ट लोगों द्वारा धोखा नहीं खाते और इस्तेमाल नहीं किए जाते, और न ही वे बुरी प्रवृत्तियों द्वारा प्रदूषित और अशुद्ध किए जाते, बांधे या बहकाये जाते हैं। मनुष्य स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आज़ादी से रहते हैं, और वे मुक्त हो जाते हैं। वे अब और बंधे नहीं हैं या कष्ट नहीं सहते हैं। अब और कोई कठिनाइयाँ नहीं हैं, वे मुक्त होकर जीते हैं और वे वास्तव में परमेश्वर के प्रभुत्व में जीने में सक्षम हो जाते हैं, अब कोई भी बुरी या अंधकारमय ताकतें उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं। अर्थात, जब वे इस जीवन को अपना मानते हुए, इस जीवन को जी रहे होते हैं, उन्हें अब किसी भी पीड़ा का अनुभव नहीं होता है, बल्कि वे खुशी से बिना कष्ट के रहते हैं; वे स्वतंत्र रूप से रहते हैं और परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखते हैं। वे अब परमेश्वर के खिलाफ बगावत या विरोध नहीं कर सकते हैं; बल्कि, वे वास्तव में परमेश्वर के प्रभुत्व में रह सकते हैं। वे पूरी तरह से एक सही और उचित जीवन जीते हैं, और वास्तविक मनुष्य बन जाते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना का सर्वाधिक लाभार्थी मनुष्‍य है' से उद्धृत

यदि तुम अक्सर परमेश्वर के वचनों को खा और पी सको, साथ ही परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति सजग रह सको और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सको, तो तुम परमेश्वर के हो, तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों में जी रहा है। क्या तुम शैतान के कब्ज़े से निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा; यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो तुम पवित्र आत्मा को काम करने का ऐसा कोई अवसर नहीं दोगे। पवित्र आत्मा मनुष्यों पर जो काम करता है, वह जो प्रकाश उन पर डालता है, और वह जो विश्वास उन्हें देता है, वह केवल एक ही पल तक रहता है; यदि लोग सावधान न रहें और ध्यान न दें, तो पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य उन्हें छुए बिना ही निकल जाएगा। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों में रहता है, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों में नहीं रहता, तो वह शैतान के बंधन में रहता है। यदि इंसान भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीता है, तो उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति या पवित्र आत्मा का काम नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में रह रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और उसका काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे, बल्कि शैतान के अधीन रह रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में रहकर अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; तभी तुम परमेश्वर के होगे। यदि तुम सचमुच परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ईमानदारी से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम में काम करेगा, और फिर तुम उसके आशीष में रहोगे, उसके मुखमंडल की रोशनी में रहोगे; तुम पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य को समझोगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम-से-कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिए; और सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के वचन के अधीन रहना। किसी भी परिस्थिति में तुम उसके वचन से विमुख नहीं होगे। परमेश्वर को जानना और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, संप्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जाएँगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएँगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जाएगा : इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर पूरी तरह परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार मानवजाति को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और उसकी गवाही देने में सक्षम लोग वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता के रूप में अपनाया है।

वचन के युग अर्थात सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से ही तुम परमेश्वर के वचन को जीने में समर्थ होगे। दूसरे लोगों को आश्वस्त करने के लिए तुम्हें कुछ व्यावहारिक अनुभव पेश करने होंगे। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं जी सकते तो किसी को भी यकीन नहीं दिलाया जा सकता! परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले सभी लोग वे हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जी सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए इस वास्तविकता को पेश नहीं कर सकते तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गए हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की प्यास रखता हो? जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, उनमें सत्य की प्यास है और केवल ऐेसे ही लोगों को परमेश्वर का अशीष प्राप्त है। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत सारी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद वह नास्तिकों के बीच अपनी बात रखता है और उन्हें जीतता है। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किए जाएँगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव में कमी आती है, उसमें इंसानियत का प्रकटन होता है और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव में कमी आती है। वचन मनुष्य में अधिकार के साथ काम करता है और परमेश्वर की ज्योति के भीतर मनुष्य को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करता है, साथ ही उसके कार्य के निर्णायक मोड़, ये सब कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकते हैं। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने से, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके और अपने वास्तविक अनुभव से परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

तुम लोगों को केवल मेरे सामने शांतिपूर्ण रहने के बारे में चिंता करनी चाहिए। मेरे साथ घनिष्ठ समागम में रहो, जहाँ तुम्हें समझ न आए वहाँ अधिक जिज्ञासा करो, प्रार्थनाएँ करो, और मेरे समय की प्रतीक्षा करो। सब-कुछ आत्मा से स्पष्ट रूप से देखो। लापरवाही से कार्य न करो, ताकि खुद को भटकने से बचा सको। तुम्हारा मेरे वचनों को खाना और पीना केवल इसी तरह से फलीभूत होगा। मेरे वचनों को अकसर खाओ और पिओ, मैंने जो कहा है उस पर विचार करो, मेरे वचनों के अभ्यास पर ध्यान दो, और मेरे वचनों की वास्तविकता जिओ; यह मुख्य मुद्दा है। कलीसिया के निर्माण की प्रक्रिया जीवन के विकास की प्रक्रिया भी है। यदि तुम्हारे जीवन का विकास रुक जाता है, तो तुम्हारा निर्माण नहीं किया जा सकता। स्वाभाविकता पर, देह पर, उत्साह पर, योगदान पर, योग्यता पर निर्भरता फ़िज़ूल है; तुम कितने भी अच्छे क्यों न हो, अगर तुम इन चीज़ों पर निर्भर रहोगे, तो तुम्हारा निर्माण नहीं किया जाएगा। तुम्हें जीवन के वचनों में जीना चाहिए, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी में जीना चाहिए, अपनी वास्तविक स्थिति जाननी चाहिए, और एक परिवर्तित व्यक्ति बनना चाहिए। तुम्हारी आत्मा में समान अंतर्दृष्टि होनी चाहिए, नई प्रबुद्धता होनी चाहिए, और तुम्हें नई रोशनी के साथ बढ़ते रहने में सक्षम होना चाहिए। तुम्हें लगातार मेरे करीब आने और मेरे साथ संवाद करने में सक्षम होना चाहिए, दैनिक जीवन के अपने कार्यों को मेरे वचनों पर आधारित करने में सक्षम होना चाहिए, सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीज़ों को मेरे वचनों के आधार पर सही तरह से सँभालने में सक्षम होना चाहिए, और मेरे वचनों को अपना मानक समझना चाहिए और अपने जीवन की सभी गतिविधियों में मेरे स्वभाव को जीना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 21' से उद्धृत

पहले तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा करके अपने भीतर की सभी कठिनाइयों को हल करना होगा। अपने पतित स्वभाव को छोड़ दो और अपनी अवस्था को वास्तव में समझने में सक्षम बनो और यह जानो कि तुम्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए; जो कुछ भी तुम्हें समझ में न आए, उसके बारे में सहभागिता करते रहो। व्यक्ति का खुद को न जानना अस्वीकार्य है। पहले अपनी बीमारी ठीक करो, और मेरे वचनों को खाने और पीने और उन पर चिंतन-मनन द्वारा, अपना जीवन मेरे वचनों के अनुसार जीओ और उन्हीं के अनुसार अपने कर्म करो; चाहे तुम घर पर हो या किसी अन्य जगह पर, तुम्हें परमेश्वर को अपने भीतर शक्ति के प्रयोग की अनुमति देनी चाहिए। देह और स्वाभाविकता को त्याग दो। अपने भीतर हमेशा परमेश्वर के वचनों का प्रभुत्व बना रहने दो। यह चिंता करने की आवश्यकता नहीं है कि तुम लोगों का जीवन बदल नहीं रहा है; समय के साथ, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे स्वभाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। पहले तुम चर्चा में रहने के लिए उतावले रहते थे, किसी की आज्ञा नहीं मानते थे या महत्वाकांक्षी, आत्मतुष्ट या दंभी थे—पर तुम धीरे-धीरे इन चीजों से छुटकारा पा लोगे। यदि तुम इन्हें अभी छोड़ना चाहते हो, तो यह संभव नहीं है! क्योंकि तुम्हारा पुराना अहं दूसरों को इसे छूने की अनुमति नहीं देगा, इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं। अत: तुम्हें व्यक्तिपरक प्रयास करने होंगे, सकारात्मक और सक्रिय रूप से पवित्र आत्मा के कार्य का अनुपालन करना होगा, परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए अपनी इच्छा-शक्ति का उपयोग करना होगा, और मेरे वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक रहना होगा। ... आत्मतुष्ट मत बनो; अपनी कमियों को दूर करने के लिए दूसरों से ताकत बटोरो, और देखो कि दूसरे परमेश्वर के वचनों के अनुसार कैसे जीते हैं; और देखो कि क्या उनके जीवन, कर्म और बोल अनुकरणीय हैं। यदि तुम दूसरों को अपने से कम मानते हो, तो तुम आत्मतुष्ट और दंभी हो और किसी के भी काम के नहीं हो। अब जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है जीवन पर ध्यान केंद्रित करना, मेरे वचनों को और ज्यादा खाना-पीना, मेरे वचनों का अनुभव करना, मेरे वचनों को जानना, मेरे वचनों को सचमुच ही अपना जीवन बना लेना—ये सब मुख्य बातें हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं जी सकता, क्या उसका जीवन परिपक्व हो सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता। तुम्हें हर समय मेरे वचनों के अनुसार जीना चाहिए और मेरे वचनों को जीवन की आचार-संहिता बना लेना चाहिए, इससे तुम लोग महसूस करोगे कि इस आचार-संहिता के साथ व्यवहार करने से परमेश्वर आनंदित होता है, और ऐसा नहीं करने से परमेश्वर घृणा करता है; और धीरे-धीरे तुम सही मार्ग पर चलने लगोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 22' से उद्धृत

सत्य को समझने और उसका अभ्यास करने का उद्देश्य यह है कि लोग सत्य को जीएं, और जिस सत्य को वे समझते हैं और अभ्यास में लाते हैं उसे अपना जीवन बनाएँ। उन्हें अपना जीवन बनाने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि वे तुम्हारे कृत्यों, तुम्हारे जीवन, तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे अस्तित्व का आधार और स्रोत बन जाएँ—वे तुम्हारी जीवन-शैली को बदल दें। पहले लोग किस आधार पर जीते थे? उनमें कोई आस्था हो या न हो, पर वे परमेश्वर के वचनों या सत्य के आधार पर नहीं जीते थे। क्या एक सृजित प्राणी को इस तरह जीना चाहिए? परमेश्वर मनुष्य से क्या चाहता है? (कि लोग उसके वचनों के अनुसार जीएं।) परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना—यह वह लक्ष्य है जो परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को ध्यान में रखना चाहिए। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे ही लोग सच्चे सृजित प्राणी हैं। इसलिए, तुम लोगों को नियमित रूप से यह सोच-विचार करना चाहिए कि तुम्हारे कौनसे शब्द, तुम्हारे कौनसे कृत्य, और तुम्हारे व्यवहार के कौनसे सिद्धांत, तुम्हारे अस्तित्व के लक्ष्य, और तुम्हारे आचरण के कौनसे पहलू परमेश्वर के अनुरूप हैं, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं, और कौनसे परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। अगर तुम अक्सर इन चीजों के बारे में चिंतन-मनन करोगे, तो तुम धीरे-धीरे सत्य में प्रवेश कर सकोगे। अगर तुम इन चीजों के बारे में सोच-विचार नहीं करते, तो सिर्फ सतही प्रयास करने का कोई लाभ नहीं है; उपक्रमों और नियमों के पालन और समारोहों में भाग लेने से अंतत: तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। तो परमेश्वर में आस्था का आखिर क्या अर्थ है? परमेश्वर में आस्था का अर्थ बदलाव की उस प्रक्रिया से गुजरना है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य को परमेश्वर की दृष्टि में एक सच्चा सृजित प्राणी बनाती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर मनुष्य से एकनिष्ठ प्रेम की अपेक्षा करता है; परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके वचनों से भरा रहे और उसके लिए प्यार से भरे हृदय से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों में रहना, उसके वचनों में ढूँढना जो उन्हें खोजना चाहिए, परमेश्वर को उसके वचनों के लिए प्यार करना, उसके वचनों के लिए भागना, उसके वचनों के लिए जीना—ये ऐसे लक्ष्य हैं जिन्हें पाने के लिए इंसान को प्रयास करने चाहिए। सबकुछ परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए; इंसान तभी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा। यदि मनुष्य में परमेश्वर के वचन नहीं होंगे, तो इंसान शैतान के चंगुल में फँसे भुनगे से ज़्यादा कुछ नहीं है! इसका आकलन करो : परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ें जमाई हैं? किन चीज़ों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीते रहे हो? किन चीज़ों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन नहीं जीते रहे हो? यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के प्रभाव में नहीं हो, तो तुम्हारे दिल पर किसने कब्ज़ा कर रखा है? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हो, या परमेश्वर के वचनों ने तुम पर अधिकार कर रखा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों की बुनियाद पर आधारित हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन से अपनी नकारात्मक अवस्था से बाहर आ गए हो? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव की तरह लेना—यही वो है जिसमें सबको प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर से विद्रोह कर रहे हो, तुम उसका विरोध कर रहे हो, और तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो। इस तरह के मनुष्यों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से बदमाशी है, एक विघ्न है। तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार रहा है? तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं रहा है? परमेश्वर के वचनों को तुमसे जो अपेक्षाएँ थीं, उनमें से तुमने कितनी पूरी की हैं? कितनी तुममें खो गई हैं? क्या तुमने ऐसी चीज़ों को बारीकी से देखा है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता बनाए बिना तुम्हारा कोई वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं होता। जब परीक्षा का समय आएगा, तुम निश्चय ही असफल होगे और तब तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद प्रकट हो जाएगा। परंतु जो लोग नियमित रूप से वास्तविकता में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे होते हैं, वे परीक्षाओं का सामना करते हुए परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझ लेंगे। जिनके पास अंतःकरण है और जो परमेश्वर के लिए प्यास रखते हैं, उन्हें परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिए व्यावहारिक रूप में प्रयत्न करना चाहिए। जिनमें वास्तविकता नहीं है, वे छोटी-छोटी बातों का भी सामना नहीं कर सकते। वास्तविक आध्यात्मिक कद वाले और बिना वास्तविक आध्यात्मिक कद वाले लोगों के बीच यही अंतर है। क्यों दोनों ही परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हैं, परंतु उनमें से कुछ परीक्षाओं के समय दृढ़ रहते हैं जबकि दूसरे उससे भाग जाते हैं? स्वाभाविक है कि जो भागते हैं, उनका वास्तव में कोई आध्यात्मिक कद नहीं है; परमेश्वर का वचन उनकी वास्तविकता नहीं है; और परमेश्वर के वचन ने उनमें जड़ें नहीं जमाई हैं। जैसे ही उनकी परीक्षा होती है, उनके पास कोई मार्ग नहीं रहता। क्यों, तब कुछ लोग परीक्षणों के बीच दृढ़ बने रह पाते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य को समझते हैं और उनका एक दर्शन है, और वे परमेश्वर की इच्छा और उसकी अपेक्षाओं को समझते हैं, और इस प्रकार वे परीक्षाओं के बीच दृढ़ बने रह पाते हैं। यही वास्तविक आध्यात्मिक कद है और जीवन भी यही है। कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं परंतु उस पर कभी अमल नहीं करते, उन्हें गंभीरता से नहीं लेते; जो लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते वे अभ्याय को महत्व नहीं देते। जो परमेश्वर के वचन को अपनी वास्तविकता नहीं बनाते उनका वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं होता, और ऐसे लोग परीक्षाओं के बीच दृढ़ नहीं रह सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन जीवन बन सकते थे और सत्य हैं, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका। पतरस की सेवा परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार मुख्‍य रूप से इसीलिए हो सकी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लोग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

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