11. परमेश्वर के सामने जीने के सिद्धांत

(1) हर दिन, परमेश्वर के वचनों के एक अंश या अनुच्छेद को खाना-पीना, फिर उनके भीतर तलाश और प्रार्थना करना, और वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद करना आवश्यक है।

(2) तुम जिस स्थिति का भी सामना करो, उसमें सत्य की तलाश करने में, परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसके सामने शांति प्राप्त करने में सक्षम बनो, तुम्हारे पास सत्य के अभ्यास का एक मार्ग होना चाहिए।

(3) दूसरों के साथ शांतिपूर्ण सहयोग में और सत्य के प्रति समर्पण के साथ अपना कर्तव्य निभाना आवश्यक है। यदि तुम कठिनाइयों का सामना करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सामने आना चाहिए और उन्हें हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए।

(4) सभी चीजों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करो। इस बात पर चिंतन करो कि क्या तुम्हारी बातचीत, तौर-तरीके, और कर्म सत्य के अनुरूप हैं, और वास्तव में खुद को जान जाओ।

(5) अपने संपूर्ण हृदय और पूरे दिमाग के साथ परमेश्वर के मार्ग का पालन करना आवश्यक है। परमेश्वर से डरो, बुराई से दूर रहो और सिद्धांत के अनुसार कार्य करो। परमेश्वर के समक्ष जीने का यही अर्थ है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने आना होगा, उसके वचनों को खाना-पीना और उन पर चिंतन करना होगा, और तुम्हें दिए गए अनुशासन और मार्गदर्शन को स्वीकार करना होगा। परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित किये गए परिवेशों, लोगों, चीज़ों और मुद्दों के प्रति समर्पित होना होगा, और जब बात कुछ ऐसी हो जिसकी तुम थाह न पा सको, तो तुम्हें अक्सर सत्य की तलाश में प्रार्थना करनी होगी; केवल परमेश्वर की इच्छा को समझ कर ही तुम आगे का रास्ता खोज सकोगे। तुम्हें परमेश्वर का आदर करते रहना होगा, और तुम्हें जो भी करना है उसे सावधानीपूर्वक करना होगा; तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रहना होगा, और तुम्हें स्वच्छंद नहीं होना चाहिए। जब भी तुम्हारे साथ कोई बात हो जाए, तब कम से कम, तुम्हारी सबसे पहली प्रतिक्रिया खुद को शांत करना और फिर तुरंत प्रार्थना करना होनी चाहिए। प्रार्थना, प्रतीक्षा और तलाश के द्वारा, तुम परमेश्वर की इच्छा की एक समझ हासिल करोगे। यह एक रवैया है जो परमेश्वर के प्रति आदर दिखाता है, है न? यदि तुम अपने हृदय की गहराई में, परमेश्वर का आदर और उसके प्रति समर्पण करते हो, और परमेश्वर के सामने शांत रहकर उसकी इच्छा को समझ सकते हो, तो इस तरह के सहयोग और अभ्यास के माध्यम से तुम सुरक्षित रह सकते हो। तुम प्रलोभनों का सामना नहीं करोगे या उन चीज़ों को नहीं करोगे जो उसकी प्रबंधन योजना में बाधा डालें, न ही तुम परमेश्वर की घृणा को उकसाने की हद तक जाओगे। एक परमेश्वर-भीरु हृदय लेकर, तुम परमेश्वर को नाराज़ करने से डरोगे; जैसे ही तुम प्रलोभन का सामना करोगे, तुम उसके सामने जिओगे, भय से कांपते हुए, और यह उम्मीद करोगे कि सभी बातों में तुम उसके प्रति समर्पण कर उसे संतुष्ट कर सको। केवल इसी तरह से अभ्यास करके, अक्सर एक ऐसी स्थिति में जीकर, और अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रहकर, तुम प्रलोभन और बुराई से अपने आप को बिना सोच-विचार किए ही दूर रख सकोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं रहते हैं, तो वे अपने हृदय में उसके लिए कोई श्रद्धा नहीं रख पाएंगे, और इसलिए वे बुराई से दूर रहने में असमर्थ होंगे। ये बातें जुड़ी हुई हैं। यदि अपने हृदय में तू अक्सर परमेश्वर के सामने रहता है, तो तू नियंत्रण में रहेगा, और कई चीज़ों में परमेश्वर का भय मानेगा। तू बहुत दूर नहीं जाएगा, या ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो स्वच्छन्द हो, न ही तू ऐसा कुछ करेगा जो परमेश्वर के लिए घृणित हो, या तू ऐसे वचन नहीं बोलेगा जिनका कोई अर्थ नहीं है। यदि तू परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करता है, और उसके अनुशासन को स्वीकार करता है, तो तू बहुत से बुरे कार्यों को करने से बचेगा। इस तरह, क्या तू बुराई से दूर नहीं रहेगा? यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में, तू अक्सर घबराहट की स्थिति में रहता है, और यह नहीं जानता कि परमेश्वर तेरे हृदय में है या नहीं, यह नहीं जानता है कि तू मन ही मन क्या करना चाहता है; यदि तू परमेश्वर के सामने शांत होने में असमर्थ है, और जब तेरे साथ कुछ घटित होता है तो तू प्रार्थना नहीं करता है या सत्य की तलाश नहीं करता है, यदि तू अक्सर अपनी मर्जी के अनुसार कार्य करता है, अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार जीता है; और अपने अहंकारी स्वभाव को प्रकट करता है, और यदि तू परमेश्वर की जाँच या उसके अनुशासन को स्वीकार नहीं करता है, तू परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करता है, तो इस तरह के लोग हमेशा शैतान के सामने रहेंगे और शैतान और अपने भ्रष्ट स्वभाव से नियंत्रित होंगे। इसलिए ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी श्रद्धा से रहित होते हैं। वे बुराई से दूर रहने में बिल्कुल असमर्थ हैं, और भले ही वे दुष्ट चीजें नहीं करते हैं, लेकिन वे जो कुछ भी सोचते हैं वह अभी भी दुष्टता है, और सत्य से असंबद्ध है और उसके विरुद्ध जाता है। तो क्या बुनियादी तौर पर ऐसे लोगों का परमेश्वर से कोई संबंध नहीं होता है? यद्यपि, वे उसके द्वारा शासित होते हैं, लेकिन वे कभी भी उसके समक्ष नहीं आए हैं, उन्होंने कभी भी परमेश्वर को परमेश्वर नहीं समझा है, कभी भी उसे सृष्टिकर्ता नहीं माना है जो उन पर शासन करता है, उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया कि वह उनका परमेश्वर और उनका प्रभु है, और उन्होंने कभी भी ईमानदारी से उसकी आराधना करने का विचार नहीं किया है। ऐसे लोगों की समझ में नहीं आता कि परमेश्वर से भय मानने का क्या अर्थ होता है, और वे सोचते हैं कि बुराई करना उनका अधिकार है। वे कहते हैं: "मैं वही करूँगा जो मैं चाहता हूँ। मैं अपने मामलों को खुद सँभाल लूँगा, यह किसी अन्य पर निर्भर नहीं करता है।" वे परमेश्वर में विश्वास को एक प्रकार का मंत्र मानते हैं, एक अनुष्ठान मानते हैं। क्या यह उन्हें अविश्वासी नहीं बनाता है? वे अविश्वासी होते हैं! और परमेश्वर इन लोगों को अपने हृदय में क्या नाम देता है? दिन भर वे लोग मन में बुरी बातें ही सोचते हैं। ये परमेश्वर के घर से पतित कर दिए गए लोग हैं और ऐसे लोगों को परमेश्वर अपने घर का सदस्य नहीं मानता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

एक दिन के दौरान, तुम परमेश्वर के सामने कितने घंटे बिताते हो जिसमें तुम वास्तव में उसके सामने होते हो? तुम्हारे दिन का कितना हिस्सा परमेश्वर को दिया जाता है? कितना देह को दिया जाता है? अपना हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर मोड़े रखना परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर सही रास्ते पर पहला कदम है। अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो-देह के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए, परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो-तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और दृष्टिकोण सब युक्तिसंगत होंगे, और तब तुम परमेश्वर के सामने ऐसे व्यक्ति होगे, जो उसकी प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है वे वो लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर उन्मुख हैं; वे वो लोग हैं जो केवल उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं। जिनसे परमेश्वर घृणा करता है वे वो लोग हैं जो आधे-अधूरे मन से उसकी ओर उन्मुख हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है जो उस पर विश्वास तो करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से खपा नहीं सकते। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्यार करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; वह उनसे घृणा करता है जो धोखा देने के लिए मनोहर और लच्छेदार वचनों का उपयोग करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण या उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है, वे विश्वासघाती लोग हैं और वे प्रकृति से अत्यधिक अभिमानी हैं। जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने वास्तव में आज्ञाकारी नहीं हो सकते, वे तो और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्त्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं वे उसके सामने अपना पूरा अस्तित्व रख देते हैं; वे वास्तव में उसके सभी कथनों का पालन करते हैं, और उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव बनाते हैं, और परमेश्वर के वचनों में अभ्यास करने के हिस्सों को गंभीरता तलाश करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग वास्तव में परमेश्वर के सामने रहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

परमेश्वर लोगों के दिलों की जाँच—पड़ताल कैसे करता है? वह केवल अपनी आँखों से ही नहीं देखता है; वह तुम्हारे लिए परिवेशों की व्यवस्था करता है, अपने हाथों से तुम्हारे दिलों को छूता है। और मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब परमेश्वर तुम्हारे लिए एक परिवेश बनाता है, तो वह यह देखता है कि तुम विकर्षण और घृणा महसूस करते हो, या प्रसन्नता और आज्ञाकारिता; वह देखता है कि तुम चुपचाप प्रतीक्षा करते रहते हो, या सत्य की तलाश करते हो; परमेश्वर यह देखता है कि तुम्हारा हृदय कैसे परिवर्तित होता है, और वह किस दिशा में विकसित हो रहा है। तुम्हारे हृदय के परिवर्तनों को, परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए निर्धारित लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के बारे में तुम्हारे हर विचार और ख़याल को, तुम्हारी भावनाओं के हर परिवर्तन को—परमेश्वर महसूस कर सकता है। तुमने इन चीज़ों को किसी को नहीं बताया है, न ही इनके बारे में प्रार्थना की है। तुमने केवल अपने दिल में, अपनी ही दुनिया में उनके बारे में सोचा था—लेकिन परमेश्वर उन्हें अच्छी तरह से जानता है, और वे चीज़ें उसके लिए दिन के उजाले की तरह स्पष्ट होती हैं। लोग तुम्हें अपनी आँखों से देखते हैं, लेकिन परमेश्वर तुम्हारे दिल को अपने दिल से छूता है; वह तुम्हारे इतना अधिक करीब होता है। यदि तुम यह समझ पाते हो कि तुम परमेश्वर के द्वारा जाँचे जा रहे हो, तो तुम परमेश्वर के सामने रह रहे हो। यदि तुम कुछ भी महसूस नहीं करते, तो तुम अपनी ही दुनिया में रहते हो, और उस स्थिति में तो, तुम मुसीबत में हो। तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते हो, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच एक दूरी होती है, तुम उनसे दूर रहते हो, तुम्हारे दिल करीब नहीं हैं, वे स्पर्श नहीं करते हैं, तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं करते हो—और परमेश्वर भी इसे जानता है, वह इसका तीक्ष्णता से बोध कर सकता है। इस प्रकार, जब तुम्हारे अंदर संकल्प और उद्देश्य होते हैं, और तुम परमेश्वर से परिपूर्ण बनाए जाने की और एक ऐसा व्यक्ति बन जाने की चाह रखते हो जो उसकी इच्छा का अनुसरण करता हो, साथ ही जो परमेश्वर का भय मानता हो और बुराई से दूर रहता हो—एक बार जब तुम्हारे अंदर यह संकल्प आ जाता है और तुम बार-बार इस तरह की चीज़ों के लिए प्रार्थना और उनकी माँग करते हो, और परमेश्वर के सामने रहते हो और उससे दूर नहीं जाते या उसे छोड़ नहीं देते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाएँगी, और वह इस बारे में अवगत होगा। कुछ लोग कहते हैं, "यह मेरे लिए तो स्पष्ट है; क्या परमेश्वर इससे अवगत है?" ऐसे शब्दों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। ऐसा कहना यह साबित करता है कि तुमने कभी भी परमेश्वर के साथ संवाद नहीं किया है, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई रिश्ता नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि कोई रिश्ता नहीं है? क्योंकि तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते हो, और इसलिए तुम्हें पता नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे साथ है या नहीं, क्या वह तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहा है, क्या वह तुम्हारी रक्षा कर रहा है, और जब तुम कुछ गलत करते हो तब क्या वह तुम्हें फटकार लगाता है। यदि तुम इनमें से कुछ भी महसूस नहीं कर पाते, तो तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते हो। यदि तुम केवल अपने लिए सोचते हो, और अपने में ही लीन रहते हो, तो तुम अपनी ही दुनिया में जी रहे हो, न कि परमेश्वर के सामने, तो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई संबंध है ही नहीं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना कोई मामूली बात नहीं है। मुख्य बात है सत्य खोजने पर ध्यान देना और सत्य को अमल में लाना। इन बातों को तुम्हें हर दिन अपने दिल में बैठाना ज़रूरी है। चाहे कोई भी समस्या आए, हमेशा अपने हितों की ही सुरक्षा मत करो; बल्कि सत्य की खोज करना सीखो और आत्म-चिंतन करो। तुम्हारे अंदर कोई भी भ्रष्टता क्यों न हो, लेकिन तुम उन्हें अनियंत्रित नहीं छोड़ सकते; अगर तुम आत्म-चिंतन करके अपनी भ्रष्टता के सार को पहचान सको तो यह सबसे अच्छा है। अगर तुम हर स्थिति में इस बात पर विचार करो कि अपने भ्रष्ट स्वभाव को कैसे दूर किया जाए, सत्य का अभ्यास कैसे किया जाए और सत्य-सिद्धांत क्या हैं, तो तुम सीख जाओगे कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य का उपयोग कैसे किया जाए। ऐसा करके, तुम धीरे-धीरे वास्तविकता में प्रवेश करोगे। अगर तुम्‍हारा हृदय इस तरह के विचारों से भरा हुआ है कि ऊँचा पद कैसे हासिल किया जाए, या दूसरे लोगों के सामने ऐसा क्‍या किया जाए जिससे वे तुम्‍हारी सराहना करने लगें, तो तुम ग़लत मार्ग पर हो। इसका मतलब है कि तुम शैतान के लिए काम कर रहे हो; तुम उसकी सेवा में लगे हुए हो। अगर तुम्‍हारा हृदय इस तरह के विचारों से भरा हुआ है कि तुम कैसे अपने को इस तरह बदल लो कि तुम अधिक-से-अधिक मनुष्‍य जैसा स्‍वरूप हासिल कर सको, अगर तुम परमेश्‍वर के प्रयोजनों के अनुरूप हो, उसके प्रति स्‍वयं को समर्पित कर सकते हो, उसके प्रति श्रद्धा रखने में और अपने हर कृत्‍य में संयम बरतने सक्षम हो, और उसके परीक्षण को पूरी तरह स्‍वीकार कर सकते हो, तो तुम्‍हारी हालत उत्‍तरोत्‍तर सुधरती जाएगी। परमेश्‍वर के समक्ष जीने वाला व्‍यक्ति होने का अर्थ यही है। वैसे, मार्ग दो हैं : एक जो महज़ आचरण पर, अपनी महत्‍त्‍वाकांक्षाओं, आकांक्षाओं, प्रयोजनों, और योजनाओं को पूरा करने पर बल देता है; यह शैतान के समक्ष और उसके अधिकार-क्षेत्र के अधीन जीना है। दूसरा मार्ग इस पर बल देता है कि परमेश्‍वर की इच्‍छा को किस तरह सन्‍तुष्‍ट किया जाए, सत्‍य की वास्‍तविकता में कैसे प्रवेश किया जाए, परमेश्‍वर के समक्ष समर्पण कैसे किया जाए, कैसे उसको लेकर किसी भी तरह की ग़लतफ़हमियाँ न पाली जाएँ या अवज्ञाएँ न की जाएँ, यह सब इसलिए ताकि परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा अर्जित की जा सके और अपने कर्तव्‍य का ठीक से पालन किया जा सके। परमेश्‍वर के समक्ष जीने का यही अर्थ है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

अपने दैनिक जीवन में, जब तुम लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो और उससे प्रार्थना करते हो, तो तुम लोग इसे बड़ी लापरवाही से करते हो—तुम लोग काम करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। क्या इसे परमेश्वर को अपना हृदय देना कहा जा सकता है? तुम लोग परिवार के मामलों के बारे में या देह-सुख की सोच में डूबे रहते हो; तुम लोग हमेशा दुविधा में रहते हो। क्या इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करना समझा जा सकता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारा हृदय हमेशा बाहरी विषयों से ग्रस्त रहता है, और यह परमेश्वर की ओर लौट नहीं पाता है। यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या जकड़ नहीं पाएगा। और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो परमेश्वर का वचन हर समय अपने आपको तुम पर प्रकट करेगा, और उन सभी चीज़ों के बारे में तुम्हें प्रबुद्ध करेगा जो तुम नहीं समझते—यह सब तुम्हारे सहयोग के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसीलिए परमेश्वर सदैव कहता है, "वे सब लोग जो मेरे साथ सांमजस्य में होकर कार्य करते हैं, मैं उन्हें दुगुना प्रतिफल दूंगा।" तुम लोगों को यह मार्ग स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो। तुम्हें आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो। आरंभ में, तुम शायद इस कोशिश में ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त न कर पाओ, परंतु तुम्हें अपने आपको नकारात्मकता में पीछे हटने या लड़खड़ाने नहीं देना है—तुम्हें कठिन परिश्रम करते रहना है! जितना अधिक आध्यात्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन बातों के प्रति हमेशा चिंतनशील रहेगा और हमेशा इस बोझ को उठाएगा। उसके बाद, तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के द्वारा अपने अंतरतम के सत्यों को परमेश्वर के सामने प्रकट करो, उसे बताओ कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी समझ और उनके बारे में अपने दृष्टिकोण बताओ। कुछ भी न छुपाओ, थोडा-सा भी नहीं! अपने मन में परमेश्वर से वचनों को कहने का प्रयास करो, अपनी सच्ची भावनाएँ परमेश्वर के सामने व्यक्त करो; अगर कोई बात तुम्हारे मन में है तो वह बोलने से बिलकुल न हिचको। जितना अधिक तुम इस तरह बोलते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और तुम्हारा हृदय भी परमेश्वर की ओर उतना ही अधिक आकर्षित होगा। जब ऐसा होता है, तो तुम अनुभव करोगे कि किसी और की अपेक्षा परमेश्वर तुम्हें अधिक प्रिय है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, तुम कभी भी परमेश्वर का साथ नहीं छोड़ोगे। यदि प्रतिदिन तुम इस प्रकार का आध्यात्मिक भक्तिमय समय बिताओ और इसे अपने मन से ओझल न होने दो, बल्कि इसे अपने जीवन की बड़ी महत्ता की वस्तु मानो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे हृदय को भर देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने का अर्थ यही है। यह ऐसा होगा मानो कि तुम्हारा हृदय हमेशा से परमेश्वर के पास हो, जैसे कि तुम जिससे प्रेम करते हो वह सदैव तुम्हारे हृदय में हो। कोई भी तुमसे उसे छीन नहीं सकता। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में उसका एक स्थान होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है' से उद्धृत

लोग परमेश्वर के साथ संबंध कैसे बनाए रख सकते हैं? और ऐसा करने के लिए उन्हें किस पर भरोसा करना चाहिए? उन्हें परमेश्वर से याचना करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने और अपने हृदय में परमेश्वर के साथ संवाद करने पर भरोसा करना चाहिए। इस तरह के संबंध के साथ लोग हमेशा परमेश्वर के सामने रहते हैं और ऐसे लोग बहुत शांत होते हैं। कुछ लोग स्वयं को बाहरी कार्यों में व्यस्त रखते हुए अपना पूरा समय बाहरी कार्यों में ही बिता देते हैं। आत्मिक जीवन के बिना एक या दो दिनों के बाद वे कुछ महसूस नहीं करते; तीन या पाँच दिनों या एक या दो महीनों के बाद भी वे कुछ महसूस नहीं करते; उन्होंने प्रार्थना नहीं की, याचना नहीं की या आध्यात्मिक समागम नहीं किया। याचना वह होती है, जब अपने साथ कुछ घटित होने पर तुम परमेश्वर से अपनी सहायता करने, अपना मार्गदर्शन करने, अपने लिए पोषण प्रदान करने, अपने को प्रबुद्ध करने, उसकी इच्छा समझने देने और यह जानने के लिए कहते हो कि सत्य के अनुरूप क्या करना चाहिए। प्रार्थना का दायरा व्यापक है : कभी-कभी तुम परमेश्वर से अपनी कठिनाइयों या नकारात्मकता और कमजोरी के बारे में बात करते हुए वचनों को अपने हृदय में बोलते हो; जब तुम विद्रोही होते हो, तब भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो या फिर तुम उससे अपने साथ हर दिन होने वाली चीज़ों के बारे में बात करते हो, चाहे वे तुम्हें स्पष्ट हों या नहीं। यही प्रार्थना है। प्रार्थना का दायरा मूल रूप से परमेश्वर से बात करना और उसके सामने खुलना है। कभी-कभी यह नियमित समय पर किया जाता है, कभी-कभी नहीं; तुम जब चाहे और जहाँ चाहे प्रार्थना कर सकते हो। आध्यात्मिक समागम अधिक औपचारिक नहीं होता। कभी-कभी वह इसलिए होता है क्योंकि तुम्हें कोई समस्या होती है, कभी-कभी इसलिए कि तुम्हें कोई समस्या नहीं होती। कभी-कभी इसमें वचन शामिल होते हैं, कभी-कभी नहीं। जब तुम्हें कोई समस्या होती है, तो तुम उसके बारे में परमेश्वर से बात करते हो और प्रार्थना करते हो; जब तुम्हें कोई समस्या नहीं होती, तो तुम सोचते हो कि परमेश्वर लोगों से कैसे प्यार करता है, वह लोगों के बारे में कैसे चिंतित रहता है, वह लोगों को कैसे डाँटता है। तुम किसी भी समय या स्थान पर परमेश्वर के साथ समागम कर सकते हो। यही आध्यात्मिक समागम है। कभी-कभी, जब तुम रोज़मर्रा के कामों में संलग्न होते हो और ऐसी किसी चीज़ के बारे में सोचते हो जो तुम्हें परेशान करती है, तो तुम्हें अपने घुटनों के बल बैठने या आँखें बंद करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस अपने हृदय में परमेश्वर से कहना है : "हे परमेश्वर, कृपया इसमें मेरा मार्गदर्शन करो। मैं कमजोर हूँ, मैं इस पर काबू नहीं पा सकता।" तुम्हारा हृदय द्रवित है; तुम कुछ सरल शब्द ही बोलते हो और परमेश्वर जान लेता है। कभी-कभी तुम्हें घर की याद सताती है और तुम कहते हो, "हे परमेश्वर! मुझे वास्तव में घर की याद आती है..." तुम यह नहीं कहते कि तुम विशेष रूप से किसे याद करते हो। तुम बस महसूस करते हो और परमेश्वर से इस बारे में बात करते हो। समस्याएँ तभी हल हो सकती हैं, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और अपने हृदय की बात कहते हो। क्या अन्य लोगों से बात करने से समस्याएँ हल हो सकती हैं? यदि तुम्हारा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो सत्य को समझता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि वह सच्चाई को नहीं समझता—यदि तुम्हारा सामना किसी नकारात्मक और कमजोर व्यक्ति से होता है—तो तुम उस पर प्रभाव डाल सकते हो। यदि तुम परमेश्वर से बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें दिलासा देगा और तुम्हें प्रेरित करेगा। यदि तुम परमेश्वर के सामने उसके वचनों को चुपचाप पढ़ने में सक्षम हो, तो तुम सत्य को समझने और समस्या को हल करने में सक्षम होगे। परमेश्वर के वचन तुम्हें इस छोटी-सी बाधा से पार पाने के लिए मार्ग खोजने देंगे। बाधा से तुम लड़खड़ाओगे नहीं, वह तुम्हें रोक नहीं पाएगी और न ही वह तुम्हारे कर्तव्य के निष्पादन को प्रभावित करेगी। कई बार ऐसा होता है, जब तुम अचानक अपने भीतर थोड़ा उदास या असहज महसूस करते हो। ऐसे समय में, परमेश्वर से प्रार्थना करने में संकोच न करो। हो सकता है, तुम परमेश्वर से कोई याचना न करो, ऐसा कुछ भी न हो जिसे तुम परमेश्वर से करवाना चाहो या उसके द्वारा प्रबुद्ध किया जाना चाहो—तुम बस किसी भी समय, जहाँ भी तुम हो, परमेश्वर से बात करते हो और उसके प्रति खुल जाते हो। तुम्हें हर समय क्या महसूस करना चाहिए? यह कि "परमेश्वर हमेशा मेरे साथ है, उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है, मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। मैं चाहे कहीं भी हूँ या कुछ भी कर रहा हूँ—हो सकता है, आराम कर रहा हूँ या हो सकता है या किसी सभा में हूँ या अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूँ—अपने हृदय में मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरा हाथ पकड़कर मेरी अगुआई कर रहा है, कि उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है।" कभी-कभी यह याद करते हुए कि तुमने पिछले कुछ वर्षों में प्रत्येक दिन कैसे गुज़ारा है, तुम्हें लगता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बड़ा हो गया है, कि परमेश्वर द्वारा तुम्हारा मार्गदर्शन किया गया है, कि परमेश्वर के प्रेम ने हमेशा तुम्हारी रक्षा की है। इन बातों को सोचकर, तुम परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए अपने हृदय में प्रार्थना करते हो : "हे परमेश्वर, मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूँ! मैं बहुत कमजोर और निर्बल हूँ, बहुत ज्यादा भ्रष्ट हूँ। तुम मेरा इस तरह मार्गदर्शन न करते, तो मैं आज खुद पर भरोसा करने लायक न हो पाता।" क्या यह आध्यात्मिक समागम नहीं है? यदि लोग अकसर इस तरह से समागम कर सकते हों, तो क्या उनके पास परमेश्वर से कहने के लिए बहुत-कुछ नहीं होगा? वे बहुत दिनों तक परमेश्वर से कुछ कहे बिना नहीं रह पाएँगे। जब तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने के लिए कुछ नहीं होता, तो परमेश्वर तुम्हारे हृदय से अनुपस्थित हो जाता है। यदि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है और तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा है, तो तुम अपने हृदय की हर बात उससे कह सकोगे, जिनमें वे बातें भी शामिल हैं, जो तुम अपने विश्वासपात्रों से ही कहते हो। वास्तव में, परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। यदि तुम परमेश्वर को अपना सबसे करीबी विश्वासपात्र मानते हो, अपना परिवार, जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर करते हो, सबसे ज्यादा भरोसा करते हो, सबसे ज्यादा विश्वास करते हो, सबसे ज्यादा यकीन करते हो, जिसके तुम सबसे करीब हो, तो यह असंभव होगा कि परमेश्वर से कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ न हो। यदि तुम्हारे पास हमेशा परमेश्वर से कहने के लिए कुछ है, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के सामने नहीं रहोगे? यदि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने रह सकते हो, तो तुम हर पल यह महसूस करोगे कि परमेश्वर किस तरह तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, किस तरह वह तुम्हारी देखभाल और सुरक्षा करता है, किस तरह वह तुम्हारे लिए शांति और आनंद लाता है, किस तरह वह तुम्हें आशीष प्रदान करता है, किस तरह वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और किस तरह वह तुम्हें डाँटता, अनुशासित करता और ताड़ना देता है और किस तरह वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है; यह सब तुम्हारे हृदय में स्पष्ट और प्रत्यक्ष होगा। तुम प्रतिदिन कुछ भी न जानते हुए, केवल यह कहते हुए कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, केवल अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए और केवल उपस्थित मात्र होने के लिए सभाओं में भाग लेते हुए, केवल दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते और प्रार्थना करते हुए और बस बेमन से सब-कुछ करते हुए भ्रमित नहीं रहोगे—तुम्हारा केवल इस तरह का बाहरी धार्मिक आयोजन नहीं होगा। इसके बजाय, तुम हर क्षण अपने हृदय में परमेश्वर का ध्यान करोगे और उससे प्रार्थना करोगे, तुम हर समय परमेश्वर के साथ संवाद करोगे और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के सामने रह पाने में सक्षम होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

अगर तुम कुछ समय परमेश्वर के समक्ष अनुभव करने में बिताते हो, और परमेश्वर के काम और उसके स्वभाव को समझने लगते हो, तो तुम अनजाने में ही अधिक अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लोगे, और तुम्हारा आध्यात्मिक कद धीरे-धीरे बढ़ जाएगा। तुम कई आध्यात्मिक चीजों को बेहतर तरीके से समझोगे, और विशेष रूप से परमेश्वर के काम के बारे में अधिक स्पष्ट होगे। तुम परमेश्वर के शब्द, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर की हर क्रिया, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के स्वरूप और उसकी सत्ता को अपनी जिंदगी के समान स्वीकार कर लोगे। अगर तुम बस दुनिया में भटकने का ही काम करोगे, तो तुम्हारे पंख हमेशा कड़े होते जाएँगे, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा विरोध बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा; तब परमेश्वर तुम्हारा उपयोग कैसे कर सकता है? चूँकि तुम्हारे अंदर "मेरी राय में" की भावना बहुत ज्यादा है, इसलिए परमेश्वर तुम्हारा उपयोग नहीं करता है। जितना अधिक तुम परमेश्वर की उपस्थिति में होगे, उतने ही अधिक अनुभव तुम्हें होंगे। अगर तुम अभी भी दुनिया में एक जानवर की तरह जीते हो—तुम्हारा मुँह तो परमेश्वर पर विश्वास की घोषणा करता है, लेकिन तुम्हारा दिल कहीं और होता है—और अगर तुम अभी भी जीने के सांसारिक फलसफों का अध्ययन करते हो, तो क्या तुम्हारी पिछली सारी मेहनत बेकार नहीं हो जाएगी? इसलिए, लोग जितना अधिक परमेश्वर की उपस्थिति में रहेंगे, उनका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना उतना ही ज्यादा आसान होगा। यह वह मार्ग है, जिसके द्वारा पवित्र आत्मा अपना कार्य करता है। अगर तुम इसे नहीं समझते, तो तुम्हारे लिए सही रास्ते पर प्रवेश करना असंभव होगा, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने में असमर्थ होगे; यह ऐसा होगा, मानो तुम विकलांग हो, और तुम्हारे पास केवल अपनी कड़ी मेहनत होगी, परमेश्वर का कोई कार्य तुम्हारे पास नहीं होगा। क्या यह तुम्हारे अनुभव में गलती नहीं है? ज़रूरी नहीं कि परमेश्वर की मौजूदगी में रहने के लिए तुम्हें प्रार्थना करनी पड़े; कभी-कभी परमेश्वर का चिंतन करने से या उसके काम पर विचार करने से, कभी-कभी कुछ मामलों से निपटने में और कभी-कभी किसी घटना में तुम्हारे अस्तित्व के प्रकट होने से भी तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो। अधिकतर लोग कहते हैं, "चूँकि मैं अकसर प्रार्थना करता हूँ, तो क्या मैं परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं हूँ?" बहुत लोग "परमेश्वर की उपस्थिति में" अंतहीन प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना हमेशा उनके होंठ पर हो सकती है, लेकिन वे वास्तव में परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते। यह एकमात्र तरीका है, जिसके द्वारा ऐसे लोग परमेश्वर की उपस्थिति में होने की अपनी स्थिति बनाए रख सकते हैं; वे हर समय परमेश्वर से जुड़े रहने के लिए अपने दिल का इस्तेमाल करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं, न ही वे अनुभव के साधनों का प्रयोग करते हुए, चाहे अपने मन में सोच-विचार करके, शांत चिंतन करके या परमेश्वर के बोझ पर विचार करने के द्वारा अपने दिलों के भीतर परमेश्वर से जुड़ने के लिए अपने मन का इस्तेमाल करके परमेश्वर के समक्ष आने में समर्थ होते हैं। वे केवल अपने मुँह से स्वर्ग के परमेश्वर को प्रार्थना अर्पित करते हैं। अधिकांश लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं है, और परमेश्वर केवल तभी उनके पास होता है, जब वे परमेश्वर के निकट जाते हैं; लेकिन ज्यादातर समय परमेश्वर उनके पास बिलकुल नहीं होता। क्या यह दिल में परमेश्वर के न होने की अभिव्यक्ति नहीं है? अगर उनके दिलों में वास्तव में परमेश्वर होता, तो क्या वे ऐसी चीजें कर सकते थे, जो लुटेरे या जानवर करते हैं? अगर कोई व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का सम्मान करता है, तो वह अपने सच्चे दिल को परमेश्वर के संपर्क में लाएगा, और उसके विचार और ख़याल हमेशा परमेश्वर के वचनों से भरे होंगे। वे वाणी या क्रिया में ग़लतियाँ नहीं करेंगे, और कोई ऐसी चीज़ नहीं करेंगे, जो जाहिर तौर पर परमेश्वर का विरोध करे। विश्वासी होने का केवल यही एक मानक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अनुभव पर' से उद्धृत

लोग अपने विश्वास में, अगर उद्धार पाना चाहते हैं, तो यह जानना ज़रूरी है कि वे परमेश्वर से डरते हैं या नहीं, और क्या उनके दिलों में परमेश्वर के लिये जगह है। अगर तुम्हारा दिल उसके सामने रहने के काबिल नहीं है, अगर तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई सामान्य रिश्ता नहीं है, तो तुम कभी बचाये नहीं जाओगे। तुम्हारे उद्धार का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा; आगे जाने को कोई रास्ता नहीं होगा। परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास अगर बस नाम के लिए है तो यह विश्वास बेकार हो जाएगा, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा कि तुम कितने सिद्धांत बोल सकते हो या तुमने कितना कष्ट उठाया है, या तुम्हारे कुदरती वरदान कितने महान हैं। परमेश्वर यही कहेंगे, "मुझसे दूर हो जाओ, तुम कुकर्मी हो।" तुम्हें एक कुकर्मी के दर्जे में रखा जाएगा। तुम्हारा परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; वह तुम्हारा शासक नहीं है, वह तुम्हारा सृष्टिकर्ता नहीं है, वह तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तुम उसकी आराधना नहीं करते, न ही उसका अनुसरण करते हो। तुम शैतान और राक्षसों का अनुसरण करते हो। तुम स्वयं अपने प्रभु हो। अंत में, परमेश्वर तुम्हारे जैसे लोगों को हटा देगा, उनसे घृणा करेगा, अस्वीकार करेगा और उन्हें दंडित करेगा। वह ऐसे लोगों को नहीं बचाता। जब लोग यह स्वीकार कर लेते हैं कि परमेश्वर ही उनका प्रभु और शासक है, जब वे यह स्वीकार करते हैं कि वह ही सत्य है, वही मनुष्य के मार्ग और जीवन का स्रोत है, केवल जब उनके सारे काम और जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह सत्य से, परमेश्वर से, उसके समक्ष समर्पण से, और उसके मार्ग का अनुसरण करने से जुड़ा होता है—तभी उन्हें बचाया जाएगा। अन्यथा, परमेश्वर उन्हें दंडित करेगा। क्या यह सही है कि लोग यह आशा लगाए बैठे रहें कि भाग्य उनका साथ देगा? क्या उनका हमेशा अपनी धारणाओं से चिपके रहना सही है? क्या उनका अस्पष्ट और अमूर्त कल्पनाओं से निरंतर चिपके रहना सही है? (नहीं।) यह मत सोचो कि भाग्य तुम्हारा साथ दे देगा; परमेश्वर में अपने विश्वास में यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो, तो और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। ...

इन उपदेशों को सुनकर तुम लोगों के मन में जो भी उत्तेजना पैदा होती है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता; सब कुछ कहने-सुनने के बाद, एकमात्र सही मार्ग वह मार्ग है, जिसके कारण तुम परमेश्वर का भय मानते हो और बुराई से दूर रहते हो। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम्हारी आस्था का परमेश्वर से कोई लेना-देना न हो, यदि वह तुम्हारा प्रभु और सृष्टिकर्ता नहीं है, यदि तुम उसे अपनी नियति का शासक नहीं मानते, यदि तुम उस सबके प्रति समर्पित नहीं होते, जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है, यदि तुम उस तथ्य को नहीं मानते कि वह सत्य है, तो तुम्हारा उद्धार पाने का सपना बिखर गया। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम विनाश के पथ पर हो। मान लो, प्रतिदिन जिस पर तुम ध्यान देते हो, जिसे खोजते हो, जिससे प्रार्थना और अनुनय करते हो, उससे तुम्हें लगातार इस बात बोध हो रहा है कि तुम्हें सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए, परमेश्वर तुम्हारा प्रभु है। और मान लो तुम उसकी प्रभुसत्ता और अपने लिए उसके आयोजनों को सहर्ष स्वीकार कर लेते हो, परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो व्यवस्था की है, तुम उसके प्रति और भी प्रसन्नता से समर्पित हो जाते हो, तो तुम्हारी दशा लगातार सामान्य हो रही है, परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध और भी निकटता के बन रहे हैं, उसके लिए तुम्हारा प्रेम और भी शुद्ध हो रहा है और तब तुम्हारी निरर्थक इच्छाएँ कम होती हैं, परमेश्वर से शिकायतें कम होती हैं, उसके प्रति तुम्हारी गलतफहमियाँ कम होती हैं, तुम कम से कम बुरे कार्य करते हो, लगातार उन बुराइयों से दूर होते जाते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय और भी अधिक वास्तविक हो जाता है। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि तुमने उद्धार के मार्ग पर कदम रख दिया है। यदि तुम्हें लगता है कि तुम जिसे खोज रहे हो, उसमें कुछ गलत नहीं है और तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मार्ग सही है, लेकिन फिर तुम्हारी तमाम खोज के बाद, यदि परमेश्वर ने तुम्हें अनुशासित नहीं किया, तुम उसके न्याय और ताड़ना को समझ नहीं पाए, तुम उसकी जाँच के लिए तैयार नहीं हुए, तुमने खुद ही अपना स्वामी बनना चाहा, तो फिर यह मार्ग सही नहीं है। यदि तुम्हारी खोज के साथ यह समझ बढ़ती जाए कि तुम्हें हर समय परमेश्वर के सामने रहना चाहिए, तुम्हें यह डर रहे कि किसी दिन तुमसे कुछ गलत न हो जाए, तुम्हारी लापरवाही कहीं परमेश्वर का अपमान करके तुम्हें मुसीबत में न डाल दे, उस स्थिति में परमेश्वर यकीनन तुम्हें त्याग देगा, और इससे भयंकर बात और कोई नहीं हो सकती और तुम्हें लगे कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास करें, तो उन्हें उससे दूर नहीं होना चाहिए और यदि वो उसके अनुशासन, व्यवहार, काट-छाँट, न्याय और ताड़ना से भागते हैं, तो यह परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को गँवाने के समान है—इन बातों का अहसास होने परतुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे, "हे परमेश्वर! मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मेरा न्याय कर, मुझे ताड़ना दे, मुझे फटकार, मुझे अनुशासित कर, हर समय मेरी जाँच कर, अपने प्रति मेरे मन में श्रद्धा पैदा कर और मुझे इस योग्य बना कि मैं बुराई से दूर रहूँ।" इस मार्ग के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है? यह सही मार्ग है। इस प्रकार, तुम लोगों को इस मानक के सामने खुद को मापना चाहिए : क्या तुम लोग उद्धार के मार्ग पर हो? (नहीं) क्या उद्धार के मार्ग पर चलना आसान है? (हमें परमेश्वर के मार्गदर्शन पर भरोसा करना चाहिए।) तुम लोगों को परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए, यह तुम लोगों के सहयोग पर भी निर्भर करता है। यदि इस संदेश को सुनकर, तुम्हें लगता है कि तुमने अभी तक उद्धार के मार्ग पर कदम नहीं रखा है, लेकिन तुम चिंतित नहीं हो और उस विषय में कुछ नहीं सोच रहे हो, तुम्हें लगता है कि आज नहीं तो कल वह दिन आएगा ही जब तुम सोचोगे—यदि तुम्हारे सोचने का ढंग ऐसा है तो उद्धार के मार्ग पर चलने में तुम्हें परेशानी होगी। तो इस मार्ग पर कदम बढ़ाने के लिए तुम्हारा संकल्प क्या होना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, "मैंने उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है, इसलिए मैं खतरे में हूँ! परमेश्वर कहता है कि लोगों को हर समय उसके सामने रहना चाहिए, उन्हें अधिक प्रार्थना करनी चाहिए, उनके मन में शांति होनी चाहिए, जलदबाजी नहीं। मुझे तुरंत इस तरह से अभ्यास करना शुरू कर देना चाहिए।" ऐसा सोचने से तुम सही मार्ग के करीब आने लगते हो, है न? यह बिल्कुल आसान है! जो लोग परमेश्वर के वचनों को सुनते ही उन्हें व्यवहार में लाने लगते हैं, उन्हें सत्य से प्रेम होता है। किस तरह के लोग उसके वचनों को सुनकर भी हठी, लापरवाह और उदासीन बने रहते हैं, उन्हें हल्के में लेते हैं, एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं? क्या ऐसे लोग संभ्रमित नहीं होते? लोग हमेशा पूछते रहते हैं कि क्या विश्वास के माध्यम से उद्धार पाने का कोई शॉर्टकट है। कोई शॉर्टकट नहीं है, मैंने तुम लोगों को आसान रास्ता ही बताया है, लेकिन अगर तुम सुनकर भी इसे व्यवहार में नहीं लाते हो, तो तुम लोगों को अच्छे-बुरे का पता ही नहीं। क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? (नहीं।) यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें बचाया ही नहीं जाएगा, लेकिन यह तय है कि उनके सामने बड़ी कठिनाइयाँ आएँगी। शायद किसी दिन वे जागें, सोचें और कहें, "इतने बरसों तक मैंने परमेश्वर में अपनी आस्था को गंभीरता से नहीं लिया; परमेश्वर चाहता है कि लोग हर समय उसके सामने रहें, लेकिन मैं तो ऐसा नहीं करता। अब मुझे तुरंत प्रार्थना करनी चाहिए!" वे सतर्क हो जाते हैं, उन्हें एहसास हो जाता है कि उन्हें अपने अंदर लगन पैदा करनी चाहिए, अभी भी बहुत देर नहीं हुई है! लेकिन बुढ़ापा आने तक प्रतीक्षा मत करो, जब तुम लोग हिलने-डुलने लायक भी न रहो, तुममें इतनी ऊर्जा ही न बचे कि कोई प्रयास कर पाओ; बेकार की चीजों में अधिकतम समय बर्बाद करना व्यर्थ है। जब समय आएगा, तो न तो तुम्हारा कोई गंतव्य होगा और न ही कोई परिणाम होगा। उस वक्त तुम्हारे पास यह सोचकर पछताने का समय भी नहीं होगा कि उद्धार पाने के सर्वोत्तम समय को तुमने बर्बाद कर दिया!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

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