11. परमेश्वर के सामने जीने के सिद्धांत

(1) हर दिन, परमेश्वर के वचनों के एक अंश या अनुच्छेद को खाना-पीना, फिर उनके भीतर तलाश और प्रार्थना करना, और वास्तव में उसके साथ समागम करना आवश्यक है;

(2) तुम जिस स्थिति का भी सामना करो, उसमें सत्य की तलाश करने में, और परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसके सामने शांति प्राप्त करने में, सक्षम बनो और साथ ही तुम्हारे पास सत्य के अभ्यास का एक मार्ग हो;

(3) दूसरों के साथ परस्पर प्रेम और सामंजस्य में अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम बनो। यदि तुम कठिनाइयों का सामना करते हो, तो तुमको परमेश्वर के सामने आना चाहिए और उन्हें हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए;

(4) सभी चीज़ों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करो। इस बात पर चिंतन करो कि क्या तुम्हारी बात-चीत, तौर-तरीके, और कर्म सत्य के अनुरूप हैं, और वास्तव में खुद को जान लो;

(5) अपने सम्पूर्ण हृदय और पूरे दिमाग के साथ परमेश्वर के मार्ग का पालन करना आवश्यक है। परमेश्वर से डरो और बुराई से दूर रहो, और सिद्धांत के अनुसार कार्य करो। परमेश्वर के समक्ष जीने का यही अर्थ है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने आना होगा, उसके वचनों को खाना-पीना और उन पर चिंतन करना होगा, और तुम्हें दिए गए अनुशासन और मार्गदर्शन को स्वीकार करना होगा। परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित किये गए परिवेशों, लोगों, चीज़ों और मुद्दों के प्रति समर्पित होना होगा, और जब बात कुछ ऐसी हो जिसकी तुम थाह न पा सको, तो तुम्हें अक्सर सत्य की तलाश में प्रार्थना करनी होगी; केवल परमेश्वर की इच्छा को समझ कर ही तुम आगे का रास्ता खोज सकोगे। तुम्हें परमेश्वर का आदर करते रहना होगा, और तुम्हें जो भी करना है उसे सावधानीपूर्वक करना होगा; तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रहना होगा, और तुम्हें स्वच्छंद नहीं होना चाहिए। जब भी तुम्हारे साथ कोई बात हो जाए, तब कम से कम, तुम्हारी सबसे पहली प्रतिक्रिया खुद को शांत करना और फिर तुरंत प्रार्थना करना होनी चाहिए। प्रार्थना, प्रतीक्षा और तलाश के द्वारा, तुम परमेश्वर की इच्छा की एक समझ हासिल करोगे। यह एक रवैया है जो परमेश्वर के प्रति आदर दिखाता है, है न? यदि तुम अपने हृदय की गहराई में, परमेश्वर का आदर और उसके प्रति समर्पण करते हो, और परमेश्वर के सामने शांत रहकर उसकी इच्छा को समझ सकते हो, तो इस तरह के सहयोग और अभ्यास के माध्यम से तुम सुरक्षित रह सकते हो। तुम प्रलोभनों का सामना नहीं करोगे या परमेश्वर का अपमान नहीं करोगे या उन चीज़ों को नहीं करोगे जो उसकी प्रबंधन योजना में बाधा डालें, न ही तुम परमेश्वर की घृणा को उकसाने की हद तक जाओगे। एक परमेश्वर-भीरु हृदय लेकर, तुम परमेश्वर को नाराज़ करने से डरोगे; जैसे ही तुम प्रलोभन का सामना करोगे, तुम उसके सामने जिओगे, भय से कांपते हुए, और यह उम्मीद करोगे कि सभी बातों में तुम उसके प्रति समर्पण कर उसे संतुष्ट कर सको। केवल इसी तरह से अभ्यास करके, अक्सर एक ऐसी स्थिति में जीकर, और अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रहकर, तुम प्रलोभन और बुराई से अपने आप को बिना सोच-विचार किए ही दूर रख सकोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं रहते हैं, तो वे अपने हृदय में उसके लिए कोई श्रद्धा नहीं रख पाएंगे, और इसलिए वे बुराई से दूर रहने में असमर्थ होंगे। ये बातें जुड़ी हुई हैं। यदि तेरा हृदय अक्सर परमेश्वर के सामने रहता है, तो तू नियंत्रण में रखा जाएगा, और कई चीज़ों में परमेश्वर का भय मानेगा। तू बहुत दूर नहीं जाएगा, या ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो स्वच्छन्द हो। तू वह नहीं करेगा जो परमेश्वर के लिए घृणित हो, और उन वचनों को नहीं बोलेगा जिनका कोई अर्थ नहीं है। यदि तू परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करता है, और परमेश्वर के अनुशासन को स्वीकार करता है, तो तू बहुत से बुरे कार्यों को करने से बचेगा। वैसे, क्या तूने बुराई को दूर न किया होता? यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में, तू अक्सर घबराहट की स्थिति में रहता है, यह नहीं जानता है कि क्या परमेश्वर तेरे हृदय में है, यह नहीं जानता है कि तू अपने हृदय में क्या करना चाहता है, और यदि तू परमेश्वर के सामने शांत होने में असमर्थ है, और जब तेरे साथ कुछ घटित होता है तो परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करता है या सत्य की तलाश नहीं करता है, यदि तू अक्सर अपनी मर्ज़ी के अनुसार कार्य करता है, अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार जीता है और अपने अहंकारी स्वभाव को प्रकट करता है, और यदि तू परमेश्वर की जाँच या परमेश्वर के अनुशासन को स्वीकार नहीं करता है, और तुम परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते हो, तो इस तरह के लोगों के दिल हमेशा शैतान के सामने रहेंगे और शैतान और उनके भ्रष्ट स्वभाव द्वारा नियंत्रित होंगे। इसलिए ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी श्रद्धा से रहित होते हैं। वे बुराई से दूर रहने में बिल्कुल असमर्थ हैं, और भले ही वे दुष्ट चीजें नहीं करते हैं, लेकिन वे जो कुछ भी सोचते हैं वह अभी भी दुष्टता है, और यह सत्य से असंबद्ध है और सत्य के विरुद्ध जाता है। तो क्या बुनियादी तौर पर ऐसे लोगों का परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है? यद्यपि, वे परमेश्वर द्वारा शासित होते हैं, उन्होंने कभी भी परमेश्वर के समक्ष विवरण पेश नहीं किया है, उन्होंने कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं किया है, उन्होंने कभी भी परमेश्वर को वो सृजनकर्ता नहीं माना है जो उन पर शासन करता है, उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया कि परमेश्वर उनका परमेश्वर और उनका प्रभु है, और उन्होंने अपने हृदय में कभी भी परमेश्वर की आराधना करने का विचार नहीं किया है। ऐसे लोगों की समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर से भय मानने का क्या अर्थ है, और वे सोचते हैं कि बुराई करना उनका अधिकार है, वे कहते हैं: "मैं वही करूँगा जो मैं चाहता हूँ। मैं अपने स्वयं के मामलों को खुद सँभाल लूँगा, यह किसी अन्य पर निर्भर नहीं करता है।" वे सोचते हैं कि बुराई करना उनका अधिकार है, और वे परमेश्वर में विश्वास को एक प्रकार के मंत्र के रूप में, एक अनुष्ठान के रूप में मानते हैं। क्या यह उन्हें अविश्वासी नहीं बनाता है? वे अविश्वासी हैं! और परमेश्वर इन लोगों को अपने हृदय में क्या नाम देता है? दिन भर वे लोग मन में बुरी बातें ही सोचते हैं। ये परमेश्वर के घर से पतित कर दिए गए लोग हैं और ऐसे लोगों को परमेश्वर अपने घर का सदस्य नहीं मानता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

एक दिन के दौरान, तुम परमेश्वर के सामने कितने घंटे बिताते हो जिसमें तुम वास्तव में उसके सामने होते हो? तुम्हारे दिन का कितना हिस्सा परमेश्वर को दिया जाता है? कितना देह को दिया जाता है? अपना हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर मोड़े रखना परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर सही रास्ते पर पहला कदम है। अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो-देह के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए, परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो-तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और दृष्टिकोण सब युक्तिसंगत होंगे, और तब तुम परमेश्वर के सामने ऐसे व्यक्ति होगे, जो उसकी प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है वे वो लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर उन्मुख हैं; वे वो लोग हैं जो केवल उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं। जिनसे परमेश्वर घृणा करता है वे वो लोग हैं जो आधे-अधूरे मन से उसकी ओर उन्मुख हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है जो उस पर विश्वास तो करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से खपा नहीं सकते। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्यार करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; वह उनसे घृणा करता है जो धोखा देने के लिए मनोहर और लच्छेदार वचनों का उपयोग करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण या उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है, वे विश्वासघाती लोग हैं और वे प्रकृति से अत्यधिक अभिमानी हैं। जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने वास्तव में आज्ञाकारी नहीं हो सकते, वे तो और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्त्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं वे उसके सामने अपना पूरा अस्तित्व रख देते हैं; वे वास्तव में उसके सभी कथनों का पालन करते हैं, और उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव बनाते हैं, और परमेश्वर के वचनों में अभ्यास करने के हिस्सों को गंभीरता तलाश करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग वास्तव में परमेश्वर के सामने रहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

चाहे कोई भी समस्या आए, हमेशा अपने हितों की ही सुरक्षा मत करो; बल्कि सत्य की खोज करना सीखो और आत्म-चिंतन करो। तुम्हारे अंदर कोई भी भ्रष्टता क्यों न हो, लेकिन तुम उन्हें अनियंत्रित नहीं छोड़ सकते; अगर तुम आत्म-चिंतन करके अपनी भ्रष्टता के सार को पहचान सको तो यह सबसे अच्छा है। अगर तुम हर स्थिति में इस बात पर विचार करो कि अपने भ्रष्ट स्वभाव को कैसे दूर किया जाए, सत्य का अभ्यास कैसे किया जाए और सत्य-सिद्धांत क्या हैं, तो तुम सीख जाओगे कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य का उपयोग कैसे किया जाए। ऐसा करके, तुम धीरे-धीरे वास्तविकता में प्रवेश करोगे। अगर तुम्‍हारा हृदय इस तरह के विचारों से भरा हुआ है कि ऊँचा पद कैसे हासिल किया जाए, या दूसरे लोगों के सामने ऐसा क्‍या किया जाए जिससे वे तुम्‍हारी सराहना करने लगें, तो तुम ग़लत मार्ग पर हो। इसका मतलब है कि तुम शैतान के लिए काम कर रहे हो; तुम उसकी सेवा में लगे हुए हो। अगर तुम्‍हारा हृदय इस तरह के विचारों से भरा हुआ है कि तुम कैसे अपने को इस तरह बदल लो कि तुम अधिक-से-अधिक मनुष्‍य जैसा स्‍वरूप हासिल कर सको, अगर तुम परमेश्‍वर के प्रयोजनों के अनुरूप हो, उसके प्रति स्‍वयं को समर्पित कर सकते हो, उसके प्रति श्रद्धा रखने में और अपने हर कृत्‍य में संयम बरतने सक्षम हो, और उसके परीक्षण को पूरी तरह स्‍वीकार कर सकते हो, तो तुम्‍हारी हालत उत्‍तरोत्‍तर सुधरती जाएगी। परमेश्‍वर के समक्ष जीने वाला व्‍यक्ति होने का अर्थ यही है। वैसे, मार्ग दो हैं : एक जो महज़ आचरण पर, अपनी महत्‍त्‍वाकांक्षाओं, आकांक्षाओं, प्रयोजनों, और योजनाओं को पूरा करने पर बल देता है; यह शैतान के समक्ष और उसके अधिकार-क्षेत्र के अधीन जीना है। दूसरा मार्ग इस पर बल देता है कि परमेश्‍वर की इच्‍छा को किस तरह सन्‍तुष्‍ट किया जाए, सत्‍य की वास्‍तविकता में कैसे प्रवेश किया जाए, परमेश्‍वर के समक्ष समर्पण कैसे किया जाए, कैसे उसको लेकर किसी भी तरह की ग़लतफ़हमियाँ न पाली जाएँ या अवज्ञाएँ न की जाएँ, यह सब इसलिए ताकि परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा अर्जित की जा सके और अपने कर्तव्‍य का ठीक से पालन किया जा सके। परमेश्‍वर के समक्ष जीने का यही अर्थ है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

अपने दैनिक जीवन में, जब तुम लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो और उससे प्रार्थना करते हो, तो तुम लोग इसे बड़ी लापरवाही से करते हो—तुम लोग काम करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। क्या इसे परमेश्वर को अपना हृदय देना कहा जा सकता है? तुम लोग परिवार के मामलों के बारे में या देह-सुख की सोच में डूबे रहते हो; तुम लोग हमेशा दुविधा में रहते हो। क्या इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करना समझा जा सकता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारा हृदय हमेशा बाहरी विषयों से ग्रस्त रहता है, और यह परमेश्वर की ओर लौट नहीं पाता है। यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या जकड़ नहीं पाएगा। और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो परमेश्वर का वचन हर समय अपने आपको तुम पर प्रकट करेगा, और उन सभी चीज़ों के बारे में तुम्हें प्रबुद्ध करेगा जो तुम नहीं समझते—यह सब तुम्हारे सहयोग के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसीलिए परमेश्वर सदैव कहता है, "वे सब लोग जो मेरे साथ सांमजस्य में होकर कार्य करते हैं, मैं उन्हें दुगुना प्रतिफल दूंगा।" तुम लोगों को यह मार्ग स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो। तुम्हें आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो। आरंभ में, तुम शायद इस कोशिश में ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त न कर पाओ, परंतु तुम्हें अपने आपको नकारात्मकता में पीछे हटने या लड़खड़ाने नहीं देना है—तुम्हें कठिन परिश्रम करते रहना है! जितना अधिक आध्यात्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन बातों के प्रति हमेशा चिंतनशील रहेगा और हमेशा इस बोझ को उठाएगा। उसके बाद, तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के द्वारा अपने अंतरतम के सत्यों को परमेश्वर के सामने प्रकट करो, उसे बताओ कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी समझ और उनके बारे में अपने दृष्टिकोण बताओ। कुछ भी न छुपाओ, थोडा-सा भी नहीं! अपने मन में परमेश्वर से वचनों को कहने का प्रयास करो, अपनी सच्ची भावनाएँ परमेश्वर के सामने व्यक्त करो; अगर कोई बात तुम्हारे मन में है तो वह बोलने से बिलकुल न हिचको। जितना अधिक तुम इस तरह बोलते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और तुम्हारा हृदय भी परमेश्वर की ओर उतना ही अधिक आकर्षित होगा। जब ऐसा होता है, तो तुम अनुभव करोगे कि किसी और की अपेक्षा परमेश्वर तुम्हें अधिक प्रिय है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, तुम कभी भी परमेश्वर का साथ नहीं छोड़ोगे। यदि प्रतिदिन तुम इस प्रकार का आध्यात्मिक भक्तिमय समय बिताओ और इसे अपने मन से ओझल न होने दो, बल्कि इसे अपने जीवन की बड़ी महत्ता की वस्तु मानो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे हृदय को भर देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने का अर्थ यही है। यह ऐसा होगा मानो कि तुम्हारा हृदय हमेशा से परमेश्वर के पास हो, जैसे कि तुम जिससे प्रेम करते हो वह सदैव तुम्हारे हृदय में हो। कोई भी तुमसे उसे छीन नहीं सकता। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में उसका एक स्थान होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए लोगों को जो मानदंड पूरे करने चाहिए, वे इस प्रकार हैं : उनका हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, वे परमेश्वर के वचनों का दायित्व उठाते हैं, उनके पास तड़पता हुआ हृदय और सत्य को तलाशने का संकल्प होता है। केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं और वे अकसर प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर इस्तेमाल करता है, वे बाहर से तर्कहीन प्रतीत होते हैं और दूसरों के साथ उनके उचित संबंध नहीं होते, हालाँकि वे औचित्य के साथ बोलते हैं, लापरवाही से नहीं बोलते, और परमेश्वर के सामने हमेशा शांत हृदय रख पाते हैं। यह ठीक उसी तरह का व्यक्ति है, जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे "तर्कहीन" व्यक्तियों के, जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है, दूसरों के साथ उचित संबंध नहीं होते, और वे बाहरी प्रेम या व्यवहारों को उचित सम्मान नहीं देते, लेकिन जब वे आध्यात्मिक चीज़ों पर संवाद करते हैं, तो वे अपना हृदय पूरी तरह खोल पाने में सक्षम होते हैं और निस्स्वार्थ भाव से दूसरों को वह रोशनी और प्रबुद्धता प्रदान करते हैं, जो उन्होंने परमेश्वर के सामने अपने वास्तविक अनुभव से हासिल की होती है। इसी प्रकार से वे परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं और उसकी इच्छा पूरी करते हैं। जब दूसरे सभी लोग उनकी निंदा और उपहास कर रहे होते हैं, तो वे बाहर के लोगों, घटनाओं या चीज़ों द्वारा नियंत्रित होने से बचने में सक्षम होते हैं, और फिर भी परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के पास अपनी स्वयं की अनूठी अंतर्दृष्टियाँ होती हैं। दूसरे लोग चाहे कुछ भी करें, उनका हृदय कभी भी परमेश्वर से दूर नहीं जाता। जब दूसरे लोग प्रसन्नतापूर्वक और मज़ाकिया ढंग से बातें कर रहे होते हैं, उनका हृदय तब भी परमेश्वर के समक्ष रहता है, और वे परमेश्वर के वचनों पर विचार करते रहते हैं या उसकी मंशा जानने की कोशिश करते हुए अपने हृदय में परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना करते रहते है। वे दूसरों के साथ उचित संबंध बनाए रखने को महत्व नहीं देते। लगता है, ऐसे व्यक्ति का जीने के लिए कोई दर्शन नहीं होता। बाहर से ऐसा व्यक्ति जीवंत, प्रिय और मासूम होता है, लेकिन उसमें शांति की भावना भी रहती है। परमेश्वर इसी प्रकार के व्यक्ति का उपयोग करता है। जीवन-दर्शन या "सामान्य तर्क" जैसी चीज़ें इस प्रकार के व्यक्ति में काम ही नहीं करतीं; इस प्रकार के व्यक्ति ने अपना पूरा हृदय परमेश्वर के वचनों को समर्पित कर दिया होता है, और लगता है, उसके हृदय में सिर्फ़ परमेश्वर होता है। यह उस प्रकार का व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर "तर्कहीन" व्यक्ति के रूप में देखता है, और ठीक इसी प्रकार के व्यक्ति का परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की पहचान इस प्रकार है : चाहे कोई भी समय या जगह हो, उसका हृदय हमेशा परमेश्वर के समक्ष रहता है, और दूसरे चाहे जितने भी अनैतिक हों, जितने भी वे वासना और देह में लिप्त हों, इस व्यक्ति का हृदय कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ता, और वह भीड़ के पीछे नहीं जाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है और तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा है, तो तुम अपने हृदय की हर बात उससे कह सकोगे, जिनमें वे बातें भी शामिल हैं, जो तुम अपने विश्वासपात्रों से ही कहते हो। वास्तव में, परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। यदि तुम परमेश्वर को अपना सबसे करीबी विश्वासपात्र मानते हो, अपना परिवार, जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर करते हो, सबसे ज्यादा भरोसा करते हो, सबसे ज्यादा विश्वास करते हो, सबसे ज्यादा यकीन करते हो, जिसके तुम सबसे करीब हो, तो यह असंभव होगा कि परमेश्वर से कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ न हो। यदि तुम्हारे पास हमेशा परमेश्वर से कहने के लिए कुछ है, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के सामने नहीं रहोगे? यदि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने रह सकते हो, तो तुम हर पल यह महसूस करोगे कि परमेश्वर किस तरह तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, किस तरह वह तुम्हारी देखभाल और सुरक्षा करता है, किस तरह वह तुम्हारे लिए शांति और आनंद लाता है, किस तरह वह तुम्हें आशीष प्रदान करता है, किस तरह वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और किस तरह वह तुम्हें डाँटता, अनुशासित करता और ताड़ना देता है और किस तरह वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है; यह सब तुम्हारे हृदय में स्पष्ट और प्रत्यक्ष होगा। तुम प्रतिदिन कुछ भी न जानते हुए, केवल यह कहते हुए कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, केवल अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए और केवल उपस्थित मात्र होने के लिए सभाओं में भाग लेते हुए, केवल दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते और प्रार्थना करते हुए और बस बेमन से सब-कुछ करते हुए भ्रमित नहीं रहोगे—तुम्हारा केवल इस तरह का बाहरी धार्मिक आयोजन नहीं होगा। इसके बजाय, तुम हर क्षण अपने हृदय में परमेश्वर का ध्यान करोगे और उससे प्रार्थना करोगे, तुम हर समय परमेश्वर के साथ संवाद करोगे और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के सामने रह पाने में सक्षम होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

परमेश्वर लोगों के दिलों की जाँच—पड़ताल कैसे करता है? वह केवल अपनी आँखों से ही नहीं देखता है; वह तुम्हारे लिए परिवेशों को निर्धारित करता है, अपने हाथों से तुम्हारे दिलों को छूता है। और मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब परमेश्वर तुम्हारे लिए एक परिवेश बनाता है, तो वह यह देखता है कि तुम विकर्षण और विद्रोह महसूस करते हो, या प्रसन्नता और आज्ञाकारिता; वह देखता है कि क्या तुम चुपचाप प्रतीक्षा करते रहते हो, या सत्य की तलाश करते हो; परमेश्वर यह देखता है कि तुम्हारा हृदय कैसे परिवर्तित होता है, और वह किस दिशा में विकसित हो रहा है। तुम्हारे हृदय के परिवर्तनों को, परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए निर्धारित लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के बारे में तुम्हारे हर विचार और ख़याल को, तुम्हारी भावनाओं के हर परिवर्तन को—परमेश्वर इन सब को महसूस कर सकता है। तुमने इन चीज़ों को किसी को नहीं बताया है, न ही इनके बारे में प्रार्थना की है। तुमने केवल अपने दिल में, अपनी ही दुनिया में उनके बारे में सोचा था—लेकिन परमेश्वर उन्हें अच्छी तरह से जानता है, और वे चीज़ें उसके लिए दिन के उजाले की तरह स्पष्ट होती हैं। लोग तुम्हें अपनी आँखों से देखते हैं, लेकिन परमेश्वर तुम्हारे दिल को अपने दिल से छूता है; वह तुम्हारे इतना अधिक करीब होता है। यदि तुम यह समझ पाते हो कि तुम परमेश्वर के द्वारा जाँचे जा रहे हो, तो तुम परमेश्वर के सामने रह रहे हो। यदि तुम कुछ भी महसूस नहीं करते, तो तुम अपनी ही दुनिया में रहते हो, और उस स्थिति में तो, तुम मुसीबत में हो। तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते हो, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच एक दूरी होती है, तुम उनसे दूर रहते हो, तुम्हारे दिल करीब नहीं हैं, वे स्पर्श नहीं करते हैं, तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं करते हो—और परमेश्वर भी इसे जानता है, वह इसका तीक्ष्णता से बोध कर सकता है। इस प्रकार, जब तुम्हारे पास संकल्प और उद्देश्य होते हैं, और तुम परमेश्वर से परिपूर्ण बनाए जाने की और एक ऐसा व्यक्ति बन जाने की चाह रखते हो जो उसकी इच्छा का अनुसरण करता हो, साथ ही जो परमेश्वर का भय मानता हो और बुराई से दूर रहता हो—एक बार जब तुम्हारे पास यह संकल्प होता है और तुम बार-बार इस तरह की चीज़ों के लिए प्रार्थना करते और उनकी माँग करते हो, और परमेश्वर के सामने रहते हो और उससे दूर नहीं जाते या उसे छोड़ नहीं देते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाएँगी, और वह इस बारे में अवगत होगा। कुछ लोग कहते हैं, "यह मेरे लिए तो स्पष्ट है; क्या परमेश्वर इससे अवगत है?" ऐसे शब्दों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। ऐसा कहना यह साबित करता है कि तुमने कभी भी परमेश्वर के साथ संवाद नहीं किया है, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई रिश्ता नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि कोई रिश्ता नहीं है? क्योंकि तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते हो, और इसलिए तुम्हें पता नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे साथ है या नहीं, क्या वह तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहा है, क्या वह तुम्हारी रक्षा कर रहा है, और जब तुम कुछ गलत करते हो तब क्या वह तुम्हें फटकार लगाता है। यदि तुम इनमें से कुछ भी महसूस नहीं कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते हो। यदि तुम केवल अपने लिए सोचते हो, और अपने में ही लीन रहते हो, तो तुम अपनी दुनिया में जी रहे हो, न कि परमेश्वर के सामने, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई संबंध है ही नहीं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

इन उपदेशों को सुनकर तुम लोगों के मन में जो भी उत्तेजना पैदा होती है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता; सब कुछ कहने-सुनने के बाद, एकमात्र सही मार्ग वह मार्ग है, जिसके कारण तुम परमेश्वर का भय मानते हो और बुराई से दूर रहते हो। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम्हारी आस्था का परमेश्वर से कोई लेना-देना न हो, यदि वह तुम्हारा प्रभु और सृष्टिकर्ता नहीं है, यदि तुम उसे अपनी नियति का शासक नहीं मानते, यदि तुम उस सबके प्रति समर्पित नहीं होते, जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है, यदि तुम उस तथ्य को नहीं मानते कि वह सत्य है, तो तुम्हारा उद्धार पाने का सपना बिखर गया। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम विनाश के पथ पर हो। मान लो, प्रतिदिन जिस पर तुम ध्यान देते हो, जिसे खोजते हो, जिससे प्रार्थना और अनुनय करते हो, उससे तुम्हें लगातार इस बात बोध हो रहा है कि तुम्हें सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए, परमेश्वर तुम्हारा प्रभु है। और मान लो तुम उसकी प्रभुसत्ता और अपने लिए उसके आयोजनों को सहर्ष स्वीकार कर लेते हो, परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो व्यवस्था की है, तुम उसके प्रति और भी प्रसन्नता से समर्पित हो जाते हो, तो तुम्हारी दशा लगातार सामान्य हो रही है, परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध और भी निकटता के बन रहे हैं, उसके लिए तुम्हारा प्रेम और भी शुद्ध हो रहा है और तब तुम्हारी निरर्थक इच्छाएँ कम होती हैं, परमेश्वर से शिकायतें कम होती हैं, उसके प्रति तुम्हारी गलतफहमियाँ कम होती हैं, तुम कम से कम बुरे कार्य करते हो, लगातार उन बुराइयों से दूर होते जाते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय और भी अधिक वास्तविक हो जाता है। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि तुमने उद्धार के मार्ग पर कदम रख दिया है। यदि तुम्हें लगता है कि तुम जिसे खोज रहे हो, उसमें कुछ गलत नहीं है और तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मार्ग सही है, लेकिन फिर तुम्हारी तमाम खोज के बाद, यदि परमेश्वर ने तुम्हें अनुशासित नहीं किया, तुम उसके न्याय और ताड़ना को समझ नहीं पाए, तुम उसकी जाँच के लिए तैयार नहीं हुए, तुमने खुद ही अपना स्वामी बनना चाहा, तो फिर यह मार्ग सही नहीं है। यदि तुम्हारी खोज के साथ यह समझ बढ़ती जाए कि तुम्हें हर समय परमेश्वर के सामने रहना चाहिए, तुम्हें यह डर रहे कि किसी दिन तुमसे कुछ गलत न हो जाए, तुम्हारी लापरवाही कहीं परमेश्वर का अपमान करके तुम्हें मुसीबत में न डाल दे, उस स्थिति में परमेश्वर यकीनन तुम्हें त्याग देगा, और इससे भयंकर बात और कोई नहीं हो सकती और तुम्हें लगे कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास करें, तो उन्हें उससे दूर नहीं होना चाहिए और यदि वो उसके अनुशासन, व्यवहार, काट-छाँट, न्याय और ताड़ना से भागते हैं, तो यह परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को गँवाने के समान है—इन बातों का अहसास होने परतुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे, “हे परमेश्वर! मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मेरा न्याय कर, मुझे ताड़ना दे, मुझे फटकार, मुझे अनुशासित कर, हर समय मेरी जाँच कर, अपने प्रति मेरे मन में श्रद्धा पैदा कर और मुझे इस योग्य बना कि मैं बुराई से दूर रहूँ।” इस मार्ग के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है? यह सही मार्ग है। इस प्रकार, तुम लोगों को इस मानक के सामने खुद को मापना चाहिए : क्या तुम लोग उद्धार के मार्ग पर हो? (नहीं) क्या उद्धार के मार्ग पर चलना आसान है? (हमें परमेश्वर के मार्गदर्शन पर भरोसा करना चाहिए।) तुम लोगों को परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए, यह तुम लोगों के सहयोग पर भी निर्भर करता है। यदि इस संदेश को सुनकर, तुम्हें लगता है कि तुमने अभी तक उद्धार के मार्ग पर कदम नहीं रखा है, लेकिन तुम चिंतित नहीं हो और उस विषय में कुछ नहीं सोच रहे हो, तुम्हें लगता है कि आज नहीं तो कल वह दिन आएगा ही जब तुम सोचोगे—यदि तुम्हारे सोचने का ढंग ऐसा है तो उद्धार के मार्ग पर चलने में तुम्हें परेशानी होगी। इस मार्ग पर कदम बढ़ाने के लिए तुम्हारा संकल्प क्या होना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, "मैंने उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है, इसलिए मैं खतरे में हूँ! परमेश्वर कहता है कि लोगों को हर समय उसके सामने रहना चाहिए, उन्हें अधिक प्रार्थना करनी चाहिए, उनके मन में शांति होनी चाहिए, जलदबाजी नहीं। मुझे तुरंत इस तरह से अभ्यास करना शुरू कर देना चाहिए।" ऐसा सोचने से तुम सही मार्ग के करीब आने लगते हो, है न? यह बिल्कुल आसान है! जो लोग परमेश्वर के वचनों को सुनते ही उन्हें व्यवहार में लाने लगते हैं, उन्हें सत्य से प्रेम होता है। किस तरह के लोग उसके वचनों को सुनकर भी हठी, लापरवाह और उदासीन बने रहते हैं, उन्हें हल्के में लेते हैं, एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं? क्या ऐसे लोग संभ्रमित नहीं होते? लोग हमेशा पूछते रहते हैं कि क्या विश्वास के माध्यम से उद्धार पाने का कोई शॉर्टकट है। कोई शॉर्टकट नहीं है, मैंने तुम लोगों को आसान रास्ता ही बताया है, लेकिन अगर तुम सुनकर भी इसे व्यवहार में नहीं लाते हो, तो तुम लोगों को अच्छे-बुरे का पता ही नहीं। क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? (नहीं।) यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें बचाया ही नहीं जाएगा, लेकिन यह तय है कि उनके सामने बड़ी कठिनाइयाँ आएँगी। शायद किसी दिन वे जागें, सोचें और कहें, "इतने बरसों तक मैंने परमेश्वर में अपनी आस्था को गंभीरता से नहीं लिया; परमेश्वर चाहता है कि लोग हर समय उसके सामने रहें, लेकिन मैं तो ऐसा नहीं करता। अब मुझे तुरंत प्रार्थना करनी चाहिए!" वे सतर्क हो जाते हैं, उन्हें एहसास हो जाता है कि उन्हें अपने अंदर लगन पैदा करनी चाहिए, अभी भी बहुत देर नहीं हुई है! लेकिन बुढ़ापे की प्रतीक्षा मत करो, जब तुम लोग हिलने-डुलने लायक भी न रहो, तुममें इतनी ऊर्जा ही न बचे कि कोई प्रयास कर पाओ; बेकार की चीजों में अधिकतम समय बर्बाद करना व्यर्थ है। जब समय आएगा, तो न तो तुम्हारा कोई गंतव्य होगा न ही कोई परिणाम होगा। उस वक्त तुम्हारे पास यह सोचकर पछताने का समय भी नहीं होगा कि उद्धार पाने के सर्वोत्तम समय को तुमने बर्बाद कर दिया!

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

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