44. आत्‍म-चिन्‍तन के माध्‍यम से स्‍वयं को जानने के सिद्धान्‍त

(1) परमेश्‍वर के वचनों के उस हर वाक्‍य का, बारम्‍बार आत्‍म-चिन्‍तन के आधार के तौर पर उपयोग करना आवश्‍यक है जिसमें वह मनुष्‍य का न्‍याय करता है और उसे उजागर करता है। व्‍यक्ति को उसके वचनों की एक-एक पंक्ति के बरक्‍स स्‍वयं को रखकर देखने का प्रयास करना चाहिए;

(2) सारे मसलों में, विचार करो कि कहीं वे मसले तुम्‍हारे शब्‍दों, आचरण, या तौर-तरीक़े, या तुम्‍हारे विचारों और धारणाओं में निहित भ्रष्‍टता की अभिव्‍यक्तियाँ तो नहीं हैं; और इस पर भी कि वे सत्‍य के अनुरूप हैं या परमेश्‍वर के स्‍वभाव को ठेस पहुँचाते हैं;

(3) आवश्‍यक है कि व्‍यक्ति जब अपने बारे में विचार करें तो वे अपने अपराधों और भ्रष्‍टता की अभिव्‍यक्तियों को पकड़ें, और वे अपनी प्रकृति तथा सार को जानें और इस बात को समझें कि वे किस क़दर दयनीय हैं;

(4) जब उन्‍हें काटा-छाँटा जा रहा हो और उनसे व्‍यवहार किया जा रहा हो, जब वे परीक्षाओं और शोधन की प्रक्रिया से गुज़र रहे हों, या नाकामयाबियों और मुश्किलों का सामना कर रहे हों, तब उन्‍हें परमेश्‍वर की और भी ज्‍़यादा प्रार्थना करनी चाहिए, ताकि वे सत्‍य के प्रति समर्पित होना सीख सकें और दैहिक इच्‍छाओं का त्‍याग कर सकें। व्‍यक्ति को कभी भी तर्क का सहारा नहीं लेना चाहिए;

(5) अपने बारे में चिन्‍तन करते हुए छद्म अगुआओं और मसीह-विरोधियों के विफलता और गिरावट के तजुरबों का इस्‍तेमाल करना सर्वश्रेष्‍ठ प्रशिक्षण है; इससे, व्‍यक्ति को जो सीखें दी गयी हैं उनमें और भी वृद्धि होती है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर से प्रकाशनों के अनुसार होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के घृणास्पद स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाने के बाद, और तुम्हारे वास्तव में स्वयं से पूरी तरह से नफ़रत करने और शरीर से मुँह मोड़ने में सक्षम हो जाने पर, लगातार परमेश्वर के वचन का पालन करो, और पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने की इच्छा रखो, तब तुम पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपनी भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के बारे में पता होना चाहिए, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति और सार के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो। परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; और इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना मत करो—हमें उनसे अपनी तुलना करनी चाहिए। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें इसका विश्वास न हो, तो खुद अनुभव करके देख लो। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद पर लागू करने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को कुलटाओं और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार हैं, अत: ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए; कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी सेक्स नहीं किया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है; कुछ लोगों का मानना है कि परमेश्वर के ऐसे वचन सुनने में बहुत अप्रिय लगते हैं और वे उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन गलत हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्मचिंतन करने में असमर्थ हैं। यहाँ "कुलटा" और "वेश्या" लोगों के व्यभिचार की भ्रष्टता को संदर्भित करते हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर कोई व्यभिचार की भ्रष्टता से ग्रस्त है—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टाचार का उनका स्तर समान है। क्या यह तथ्य नहीं है? कुछ और करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि हमें परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों में से हर एक वचन को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे सुनने में अच्‍छे लगते हों या नहीं, और चाहे वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का। यही वह दृष्टिकोण है, जिसे हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह भक्ति का दृष्टिकोण है, सहिष्‍णुता का दृष्टिकोण है, या कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की कोई भी पंक्ति बाह्य रूपों के बारे में नहीं है, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सरल रूप के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे ऐसी नहीं हैं। अगर तुम परमेश्वर द्वारा कही गई हर पंक्ति को एक सामान्य प्रकार के इंसानी व्यवहार या बाह्य रूप की तरह देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं है, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, वे बाह्य रूप नहीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

यदि लोगों को खुद को समझना हो, तो उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति को समझना होगा। अपनी स्थिति को समझने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है अपने विचारों और अभिप्रायों की समझ होना। हर कालावधि में, लोगों के विचार एक प्रमुख चीज़ द्वारा नियंत्रित होते रहे हैं। यदि तुम अपने विचारों पर नियंत्रण पा सकते हो, तो तुम उनके पीछे की चीज़ों पर भी नियंत्रण पा सकते हो। लोग अपने विचारों और अभिप्रायों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं लेकिन उन्हें यह जानने की आवश्यकता है कि ये विचार और अभिप्राय कहाँ से आते हैं, उनके पीछे क्या इरादे हैं, ये विचार और अभिप्राय कैसे उत्पन्न होते हैं, वे किसके द्वारा नियंत्रित होते हैं, और उनकी प्रकृति क्या है? तुम्हारे स्वभाव में रूपांतरण होने के बाद, तुम्हारे विचार और अभिप्राय, वे इच्छाएँ जिनका पीछा तुम्हारा हृदय करता है, और अनुसरण के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण—जो तुम्हारे रूपांतरित हिस्सों से पैदा हुए हैं—अलग होंगे। जो विचार और अभिप्राय उन चीजों से उत्पन्न होते हैं जो परिवर्तित नहीं हुए हैं, जिन चीजों को तुम स्पष्ट रूप से नहीं समझते हो, और जिन चीज़ों को तुमने सत्य के अनुभवों से नहीं बदला है—वे सब गंदी, मैली और बदसूरत होते हैं। आजकल जिन लोगों ने कई वर्षों से परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, उनमें इन मामलों की कुछ समझ और भान होता है। जिन्होंने थोड़े ही समय के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है वे अभी तक इन मामलों को नहीं समझते हैं; वे अभी भी अस्पष्ट हैं। वे नहीं जानते कि उनका दुर्बल स्थान कहाँ है या किस क्षेत्र में वे आसानी से गिर सकते हैं! आप लोग अभी नहीं जानते कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं, और भले ही अन्य लोग कुछ हद तक इसे देख पाते हैं कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं, पर इसे आप लोग नहीं भांप सकते। आप लोग अपने सामान्य विचारों या इरादों को स्पष्ट रूप से अलग नहीं कर सकते, और आप लोगों मेंइन मामलों के सार की स्पष्ट समझ नहीं है। किसी पहलू को तुम जितना अधिक समझते हो, उस पहलू में तुम उतना ही अधिक रूपांतरित होते हो; अपने आप में, जिन चीज़ों को तुम करते हो वे सत्य के अनुरूप होंगी, तुम परमेश्वर परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर पाओगे, और तुम परमेश्वर की इच्छा के निकट होगे। केवल इस तरह से खोज करके ही तुम परिणामों को प्राप्त कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकी होते हैं' से उद्धृत

समय या स्थान जो भी हो, और हमारा परिवेश जैसा भी हो, हम खुद को जानने में, अपना आत्म-विश्लेषण करने और गहराई से अपने भीतर झाँकने में, सक्षम हैं—और हम इन मामलों को अपनी उच्चतम प्राथमिकता के रूप में मान सकते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं, तो हमें निश्चित रूप से लाभ होगा, और हम निश्चित रूप से खुद को जानने के मामले में क्रमिक विकास करेंगे, और, जैसे-जैसे हम यह करते हैं, हम सत्य का अभ्यास करने में, सत्य को अधिकाधिक हासिल करने में, सक्षम होंगे और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता और भी अधिक हमारा जीवन बनते जाएगी। हालाँकि, यदि तुम्हारे पास स्वयं को जानने के मामले में कोई प्रविष्टि न हो, तो तुम्हारा सत्य का अभ्यास गलत होगा, क्योंकि तुम कई बाहरी परिघटनाओं द्वारा छले जाओगे। तुम्हें लग सकता है कि तुम्हारे व्यवहार में सुधार हुआ है, कि तुम पहले की तुलना में अधिक सौम्य, दूसरों के प्रति अधिक विचारशील, साथ ही दूसरों के प्रति अधिक सहिष्णु और धैर्यवान, दूसरों के लिए अधिक क्षमाशील हो गए हो; इसलिए तुम सोचते हो कि तुम पहले से ही एक महान, निर्दोष आदर्श हो, जिसके पास सामान्य मानवता है। बहरहाल, परमेश्वर की नज़रों में, तुम उसके मानकों और अपेक्षाओं से बहुत दूर बने रहते हो। यह दर्शाता है कि हम यह नहीं जानते हैं कि हम किस समय वास्तव में सत्य का अभ्यास कर रहे होते हैं, और किस समय हम इसका बिल्कुल अभ्यास नहीं करते, लेकिन हमारे बाहरी व्यवहारों में बस थोड़ा-सा बदलाव आया है। अब ऐसे बहुत-से लोग हैं जो सोचते हैं कि उनका कलीसियाई जीवन काफी सामान्य है, कि वे अपने भाई-बहनों के साथ आपसी सहिष्णुता और सर्वोत्तम संबंधों को निभाने में सक्षम हैं। उन्हें लगता है कि वे किसी के साथ भी, बिना किसी तकरार के, निभा सकते हैं, और यह कि, चाहे जो भी हो, वे धैर्य का प्रयोग कर सकते और सही दृष्टिकोण अपना सकते हैं। उन्हें लगता है कि उनका आध्यात्मिक जीवन भी, विशेष रूप से सामान्य है, और वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में अध्यवसायी हैं, और उसके प्रति एक श्रद्धायुक्त हृदय रखते हैं—फिर भी कई मामलों में उनके विचार सत्य और परमेश्वर के प्रति विरोधी होते हैं। यह इसे दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि उन्होंने अभी तक सच्चाई हासिल नहीं की है। इसलिए, खुद के हर पहलू को जानने के मामले में, हमें सच्चाई की तलाश करनी चाहिए, और अपने आत्म-ज्ञान को गहरा करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है: जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा कर लिया है या सही चीज़ को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, तो उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना तुम्हारे लिए उचित है, और यह देखने के लिए कि तुम में कौन सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन सी चीजें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें गहन परिश्रम करना तुम्हारे लिए उचित है। आओ, एक उदाहरण के रूप में हम पौलुस को लें। पौलुस विशेष रूप से जानकार था, और प्रचार के अपने काम में उसने बहुत कष्ट उठाये थे। बहुत सारे लोगों ने उसका विशेष रूप से सम्मान किया। नतीजतन, बहुत सारा काम पूरा करने के बाद, उसने मान लिया था कि उसके लिए एक अलग मुकुट रखा होगा। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। अगर उस समय, उसने खुद पर चिंतन किया होता और अपना विश्लेषण किया होता, तो उसने ऐसा नहीं सोचा होता। दूसरे शब्दों में, पौलुस ने प्रभु यीशु के वचनों में सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था; उसे केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास था। उसने सोचा था कि जब तक वह कुछ अच्छा काम करेगा और अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन करेगा, तब तक परमेश्वर द्वारा उसकी प्रशंसा की जाएगी और उसे पुरस्कृत किया जाएगा। अंत में, उसकी अपनी धारणाओं और कल्पना ने उसकी आत्मा को अंधा बना दिया और उसके सच्चे चेहरे को ढंक दिया। बहरहाल, लोगों को यह पता नहीं था, और परमेश्वर द्वारा इसे प्रकाश में न लाये जाने से, लोगों ने पौलुस को एक मानक के रूप में स्थापित करना और जीने का एक उदाहरण मान लेना जारी रखा, और वे यही मानते रहे कि वे भी उसकी तरह बनने के लिए तरसते हैं, उन्होंने उसे अपनी खोज का उद्देश्य और अनुकरणीय व्यक्ति माना। पौलुस के बारे में यह कहानी उन सभी के लिए चेतावनी का काम करती है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो है कि जब कभी भी हम महसूस करते हैं कि हमने विशेष रूप से अच्छा किया है, या विश्वास करते हैं कि हम किसी पहलू में विशेष रूप से प्रतिभावान हैं, या सोचते हैं कि किसी संबंध में हमें बदले जाने या हमसे निपटे जाने की आवश्यकता नहीं है, तो हमें उस विशेष संबंध में स्वयं को बेहतर ढंग से जानने और सोच-विचार करने का प्रयास करना चाहिए; यह महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि तुमने, यह देखने के लिए कि क्या उनमें ऐसी चीजें समाविष्ट हैं या नहीं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, निश्चित रूप से अपने उन पहलुओं की खोज नहीं की है, उन पर ध्यान नहीं दिया है, या उनका विश्लेषण नहीं किया है जिन्हें तुम अच्छा समझते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

अपने आपको जानना यह जानना है कि हमारे विचारों और दृष्टिकोण में ऐसी कौन सी बातें हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, सत्य के बिलकुल अनुरूप नहीं हैं और जिनमें सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, मनुष्य का अहंकार, दंभ, झूठ और धोखा भ्रष्ट स्वभाव के ऐसे पहलू जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। कुछ समय तक सत्य पर संगति करके या अक्सर संगति करके या फिर भा‌ई-बहनों द्वारा तुम्हारी स्थिति का उल्लेख करने पर उनका ज्ञान हो सकता है। इसके अलावा, हर व्यक्ति में अलग-अलग स्तर का अहंकार और कपट छिपा होता है। हालांकि, लोगों के विचारों और दृष्टिकोण को जानना आसान नहीं है; इनके बारे में जानना उतना आसान नहीं है जितना कि लोगों के स्वभावों को जानना है। ये गहराई तक समायी हुई चीज़ें हैं। इसलिये जब तुम अपने व्यवहार और बाहरी आचरण में थोड़ा परिवर्तन ले आते हो, तो भी तुम्हारी सोच, धारणाओं, दृष्टिकोण और तुम्हें प्राप्त पारंपरिक संस्कृति की शिक्षा के अनेक पहलू होते हैं जो परमेश्वर के खिलाफ हैं और जिन्हें तुमने अभी तक उजागर नहीं किया गया है। ये गहराई तक समायी हुई ऐसी चीज़ें है जो हमें परमेश्वर का शत्रु बना देती हैं। इसलिए, जब परमेश्वर कुछ करता है, जो तुम्हारी धारणाओं की पुष्टि नहीं करता या ऐसा कुछ जो उससे भिन्न होता है जैसा तुम परमेश्वर से करने की कल्पना करते हो, तुम उसका प्रतिरोध और विरोध करोगे। तुम यह नहीं समझोगे कि परमेश्वर ने इस तरह से कार्य क्यों किया और हालाँकि तुम जानते हो कि परमेश्वर जो भी करता है, उसमें सत्य होता है और हो सकता है तुम समर्पण करना चाहो, तुम ऐसा करने में स्वयं को असमर्थ पाओगे। तुम समर्पण क्यों नहीं कर सकते हो? ऐसा प्रतिरोध और विरोध क्यों? इसकी वजह यह है कि मनुष्य के विचारों और दृष्टिकोण में कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और वे उन सिद्धांतों, जिनके द्वारा वह कार्य करता है और उसके सार के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। इन विचारों और दृष्टिकोण को जानना मनुष्य के लिए कठिन है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

हमारे दिल में मौजूद हर एक चीज़ परमेश्वर के विरोध में है। इसमें वे चीज़ें शामिल हैं जो हमें लगता है कि अच्छी हैं, और वे चीज़ें भी जिन्हें हम पहले से ही सकारात्मक मानते हैं। हमने इन चीज़ों को सत्यों के रूप में, सामान्य मानवता के हिस्से के रूप में और सकारात्मक चीज़ों के रूप में सूचीबद्ध किया है; हालाँकि, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ये वे चीजें हैं जिनसे वह घृणा करता है। परमेश्वर द्वारा बोले गए सत्यऔर जो हम सोचते हैं, उसके बीच की खाई को नापा नहीं जा सकता। इसलिए, हमें स्वयं को जानना चाहिए। हमारे विचारों, दृष्टिकोणों और क्रियाओं से लेकर हमें जो सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त हुई है, उसमें से प्रत्येक चीज़ गहराई से समझने और विश्लेषण किए जाने के योग्य है। इनमें से कुछ चीज़ें सामाजिक परिवेश से आती हैं, कुछ परिवारों से आती हैं, कुछ स्कूली शिक्षा से आती हैं, और कुछ किताबों से आती हैं। कुछ हमारी कल्पनाओं और धारणाओं से भी आती हैं। इस प्रकार की चीज़ें सबसे अधिक भयावह होती हैं, क्योंकि वे हमारे वचनों और कार्यों को बांधती और नियंत्रित करती हैं, हमारे मन पर हावी होती हैं, और हम जो भी करते हैं, उसमें हमारे उद्देश्यों, इरादों और लक्ष्यों का मार्गदर्शन करती हैं। अगर हम इन चीजों को बाहर न निकालें तो हम स्वयं में कभी भी परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाएँ गे, और हम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को बेझिझक स्वीकार कर उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाएँ गे। जब तक तुम अपने स्वयं के विचारों और दृष्टिकोणों को, और जिन चीज़ों को तुम सही मानते हो, उन्हें मन में रखोगे, तब तक तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी पूरी तरह से या बेहिचक स्वीकार नहीं करोगे, न ही तुम उनका मूल रूप में अभ्यास करोगे; निश्चित रूप से पहले अपने मन में उन्हें संसाधित करने के बाद ही तुम उन्हें अभ्यास में डालोगे। तुम इसी तरीक़े से काम करोगे, और दूसरों की मदद करने में भी तुम्हारा यही तरीक़ा होगा : भले ही तुम परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता भी करो, लेकिन इसमें सदैव तुम्हारी अशुद्धियाँ मिली होंगी, तुम्हें लगेगा कि सत्य को अभ्यास में लाने का यही अर्थ है, कि तुमने सत्य को समझ लिया है, और तुम्हारे पास सब कुछ है। क्या मानव जाति की स्थिति दयनीय नहीं है? क्या यह भयावह नहीं है? एक या दो शब्द इन चीज़ों को उनकी संपूर्णता में बताने के लिए, या उन्हें सरल बनाने के लिए, पर्याप्त नहीं हैं। बेशक, जीवन में कई अन्य चीज़ें भी हैं, जैसे कि शैतान के सौ से भी अधिक ज़हर जो पहले सारांशित किए गए हैं। तुम उन वचनों को समझे तो हो, लेकिन तुम उनके सामने माप में कैसे उतरोगे? क्या तुमने कभी आत्म-चिंतन किया है? क्या इन विषों में तुम्हारा भी एक हिस्सा नहीं है? वे यह भी दर्शाते हैं कि तुम कैसे सोचते हो, है ना? जब तुम चीज़ों को करते हो, तो क्या तुम भी इन विषों पर भरोसा नहीं करते हो? तुम्हें अपने व्यक्तिगत अनुभव में गहराई से खोदकर जाँचना चाहिए, और उन वचनों के सामने उसे मापना चाहिए। अगर हम शैतान के विषों की सूची पर केवल एक नज़र डालें या उसे बिना ध्यान दिए पढ़ें, और फिर उसे दरकिनार कर दें, परमेश्वर के वचनों को बेपरवाही से पढ़ें, उन्हें वास्तविकता से जोड़ने में, या हमारी वास्तविक स्थिति को देखने में, असमर्थ बने रहें, और केवल परमेश्वर के वचनों के शब्दों और नियमों का पालन करें, यह मानते हुए कि हम सत्य का अभ्यास कर रहे हैं—तो क्या यह उतनी सरल बात है? लोग जीवित वस्तुएँ हैं: उन सभी के पास विचार हैं, और उनके विचारों के भीतर की कलाकृतियाँ उनके दिलों में जड़ें बनाती हैं। जब एक व्यक्ति कोई कार्रवाई करता है, तो इन कलाकृतियों का उभर आना निश्चित है, क्योंकि वे पहले ही उस व्यक्ति का जीवन बन चुकी हैं। इसलिए, प्रत्येक चीज़ में जो तुम करते हो, एक दृष्टिकोण और एक सिद्धांत होता है जो कि तुम इसे कैसे करते हो, इसे संचालित करता है, जो तुम्हारे मार्ग को निर्देशित करता है। जब तुम कार्य करते हो, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे अंदर ऐसी चीज़ें मौजूद हैं या नहीं। अब, निश्चित रूप से, जब तुम अपने विचारों और दृष्टिकोणों की जाँच करते हो, तो तुम्हें ऐसा लगता है मानो परमेश्वर के प्रति शत्रुता वाली कोई बात है ही नहीं; तुम्हें लगता है कि तुम ईमानदार और वफ़ादार हो, अपने कर्तव्य को करने के लिए ज़रूरत से अधिक तैयार रहते हो, बलिदान करने और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में सक्षम हो, और यह कि तुम हर क्षेत्र में काफ़ी मजबूत हो। फिर भी, अगर परमेश्वर तुम्हारी असलियत का परीक्षण करे, या तुमसे किसी कार्य के दायित्व को उठाने के लिए कहे, या परमेश्वर तुम पर कुछ आ पड़ने दे, तो तुम उसे कैसे संभालोगे? ऐसे समय में, तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण बहुत अडिग रूप से बाहर की ओर बढ़ेंगे, मानो कि बाढ़ का बहता पानी हो; वे तुम्हारे नियंत्रण से बाहर होंगे—तुम्हारे हाथों से परे—और, चाहे तुम उनसे कितनी भी घृणा करो, वे फिर भी बाहर फूट पड़ेंगे, यह ऐसी चीज़ों का एक उछाल होगा जो परमेश्वर की विरोधी होती हैं। जब तुम कहते हो, "मैं इसके बारे में कुछ भी क्यों नहीं कर सका? मैं परमेश्वर का विरोध करना नहीं चाहता, तो फिर मैं क्यों करूँगा? मैं परमेश्वर पर निर्णय पारित करना नहीं चाहता, और मैं नहीं चाहता कि वह जो भी करता है, उसके बारे में मेरी कोई अवधारणाएँ हों, तो फिर मेरे पास ऐसी अवधारणाएँ हो ही कैसे सकती हैं?”—यही वो समय है जब तुम्हें स्वयं को जानने का प्रयास करना चाहिए, यह जाँचने के लिए कि तुम्हारे अंदर क्या है जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हारे अंदर कौन-सी चीज़ उसके वर्तमान कार्य के प्रति शत्रुतापूर्ण और विरोधी है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई सत्य के किस स्वरूप को पाने की कोशिश करता है, चाहे ईमानदार होना या परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करने की आकांक्षा रखना हो या अपने भाइयों और बहनों के साथ मैत्रीपूर्ण ढंग से जुड़ना या सामान्य मानवता जीना, आत्मज्ञान के विषय पर बात करते हुए प्रत्येक सत्य के साथ व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक दिन इसके अभ्यास को अंगीकार कर सकता है। क्या ईमानदार होने की आकांक्षा रखने का स्वयं को जानने के साथ कोई संबंध नहीं है? तुम तब तक ईमानदार होने की आकांक्षा नहीं करोगे जब तक कि तुम अपने स्वयं के छल और बेईमानी को नहीं जानोगे। जब तुम यह जान जाओगे कि तुम परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असफल रहे हो, तब तुम उसके प्रति आज्ञाकारिता का अभ्यास करोगे या यह खोजोगे कि उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए। अगर तुम स्वयं को नहीं जानते हो, तो ईमानदार होने की या परमेश्वर को समर्पण करने की तुम्हारी कोई भी बात झूठी ही लगेगी, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है और सत्य के किसी भी स्वरूप का अभ्यास करना आसान नहीं है और प्रत्येक स्वरूप का अभ्यास मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के भीतर ही किया जाता है। सत्य के किसी भी स्वरूप के अपने अभ्यास में, ईमानदार होने की तुम्हारी आकांक्षा को व्यर्थ करते हुए, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे समर्पण को बाधित करते हुए और तुम्हारे भाइयों और बहनों के लिए तुम्हारे धैर्य और सहनशीलता में अवरोध पैदा करते हुए, निश्चित रूप से तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव समस्या उत्पन्न करेगा। अगर तुम उसे नहीं पहचानोगे, उसकी चीरफाड़ नहीं करोगे, और उसका पता नहीं लगाओगे, बल्कि सत्य का अभ्यास करने के लिए अपनी कल्पनाशीलता पर भरोसा करोगे, तो तुम्हारा अभ्यास सच्चा नहीं होगा। इसलिए, सत्य के जिस भी स्वरूप का चाहे कोई अभ्यास कर रहा है या व्यक्ति जो भी कर रहा है, उसे सबसे पहले स्वयं को जानना चाहिए। स्वयं को जानने का अर्थ है तुम्हारे प्रत्येक वचन व कर्म को, तुम्हारी प्रत्येक हरकत और कार्य को जानना; यह तुम्हारे मन और विचारों, तुम्हारे इरादों और तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाशीलता को जानना है; यह यहाँ तक कि दुनिया में जीने के तुम्हारे फलसफे और तुम्हारे भीतर निहित शैतान के विभिन्न विषाक्त पदार्थों, साथ ही साथ स्कूल में तुमने जो ज्ञान व शिक्षा प्राप्त की, उसे जानना भी है। इन सब चीज़ों की चीरफाड़ करना ज़रूरी है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि तुम अनुभव करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए कोशिश करते हो या नहीं। यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए कोशिश करते हो, तो नकारात्मक पहलू तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, बल्कि तुम्हारे लिए अधिक वास्तविक चीज़ें ला सकता है, और तुम्हें यह जानने में और अधिक सक्षम सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक स्थिति को समझने में अधिक सक्षम बना सकता है, और यह देखने में भी कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है, और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षण अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से बेहतर हो। इस सबके द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले आया था, वह सब परमेश्वर द्वारा किया गया था और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षणों में प्रवेश तुम्हें प्रेम या विश्वास से रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और इसे जाने बिना ही तुम इसके मध्य स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है, और मनुष्य को अनावृत करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य के साथ निपटता है, दूसरी ओर मनुष्य को अनावृत करता है, और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित "रहस्यों" को खोदकर और उजागर करते हुए, और मनुष्य की अनेक अवस्थाएँ प्रकट करके वह उसे उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य के साथ व्यवहार करके, मनुष्य के शुद्धिकरण द्वारा, और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाली परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी कमियों को जान पाता है और देख पाता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निकृष्ट है, और उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, उसके परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो असहनीय हो जाती है—मिटा कर रख देने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के सार को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियों को और इस बात को जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

असफल होना और कई बार नीचे गिरना कोई बुरी बात नहीं है; न ही उजागर किया जाना कोई बुरी बात है। चाहे तुम्हारा निपटारा किया गया हो, तुम्हें काटा-छाँटा गया हो या उजागर किया गया हो, तुम्हें हर समय यह याद रखना चाहिए : उजागर होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी निंदा की जा रही है। उजागर किया जाना अच्छी बात है; यह स्वयं को जानने का सबसे अच्छा अवसर है। यह तुम्हारे जीवन अनुभव को गति दे सकता है। इसके बिना, तुम्हारे पास न तो अवसर होगा, न ही परिस्थिति, और न ही अपनी भ्रष्टता के सत्य की समझ तक पहुँचने में सक्षम होने के लिए कोई प्रासंगिक आधार होगा। यदि तुम्हें अपने अंदर की चीज़ों के बारे में पता चल जाये, तुम्हारे भीतर छिपी उन गहरी बातों के हर पहलू का भी पता चल जाये, जिन्हें पहचानना मुश्किल है और जिनका पता लगाना कठिन है, तो यह अच्छी बात है। स्वयं को सही मायने में जानने में सक्षम होना, तुम्हारे लिए अपने तरीकों में बदलाव कर एक नया व्यक्ति बनने का सबसे अच्छा मौका है; तुम्हारे लिए यह नया जीवन पाने का सबसे अच्छा अवसर है। एक बार जब तुम सच में खुद को जान लोगे, तो तुम यह देख पाओगे कि जब सत्य किसी का जीवन बन जाता है, तो यह निश्चय ही अनमोल होता है, तुममें सत्य की प्यास जगेगी और तुम वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यह कितनी बड़ी बात है! यदि तुम इस अवसर को थाम सको और ईमानदारी से मनन कर सको, तो कभी भी असफल होने या नीचे गिरने पर स्वयं के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हो, तब तुम नकारात्मकता और कमज़ोरी में भी फिर से खड़े हो सकोगे। एक बार जब तुम इस सीमा को लांघ लोगे, तो फिर तुम एक बड़ा कदम उठा सकोगे और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

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