5. परमेश्वर के वचनों को जानने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय, उन पर सच्चे मन से और एक प्रार्थनापूर्ण हृदय से चिंतन करना और पवित्र आत्मा के प्रबोधन और रोशनी की तलाश करना जरूरी है। केवल इसी प्रकार धीरे-धीरे सत्य समझा जा सकता है।

(2) परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, उसकी इच्छा और अपेक्षाओं को समझने की तलाश करना, साथ ही उन वचनों को कहने के द्वारा वह किन प्रभावों को हासिल करना चाहता है यह समझना भी आवश्यक है। परमेश्वर के वचनों का सही ज्ञान होने का यही अर्थ है।

(3) परमेश्वर के वचनों में सत्य के प्रत्येक पहलू की विशिष्टता और उनके अर्थ की संपूर्णता की तलाश करना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार परमेश्वर के वचनों का सत्य आसानी से समझा जा सकता है।

(4) एक व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में लाने और उनका अभ्यास और अनुभव करने के माध्यम से पवित्र आत्मा के प्रबोधन को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। केवल इसी प्रकार कोई सत्य के सार और उसके सही अर्थ को समझ सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के वचनों को पढ़ और समझकर परमेश्वर को जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : "मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?" वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर ही अपने वचनों और अपनी आंतरिक आवाज़ को व्यक्त कर रहा है। उन्हें दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसकी इच्छा, उसके विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर कोमल एवं करुणामय दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग उसके अपमान सहन न करने वाले स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। अब लोगों को परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है वो पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीज़ों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के सीधे संपर्क में आए बिना भी। जब परमेश्वर की सच्ची समझ रखने वाला कोई व्यक्ति मसीह के संपर्क में आता है, तो मसीह के साथ उसका अनुभव परमेश्वर के बारे में उसकी मौजूदा समझ के साथ मेल खा सकता है, किंतु जब केवल सैद्धांतिक समझ वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर के संपर्क में आता है, तो वह इस पारस्परिक संबंध को नहीं देख सकता। सत्य का यह पहलू सबसे गंभीर रहस्य है; इसकी थाह पाना कठिन है। देहधारण के रहस्य के संबंध में परमेश्वर के वचनों का सार निकालो, उन्हें विभिन्न कोणों से देखो, और फिर मिलकर प्रार्थना करो, विचार करो और सत्य के इस पहलू पर आगे और सहभागिता करो। इससे तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करने और इसे समझने में सक्षम हो जाओगे। चूँकि मनुष्यों के पास परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए उन्हें आगे बढ़ने के लिए इस तरह के अनुभव पर भरोसा करना चाहिए और परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक बार में थोड़ा-सा प्रवेश करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

इससे पहले कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को कार्यान्वित करे, उसे परमेश्वर के वचन को अवश्य जानना चाहिए; यानी उसे परमेश्वर की इच्छा अवश्य समझनी चाहिए। केवल इसी तरह से परमेश्वर के वचन को सही-सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्यान्वित किया जा सकता है। यह कुछ ऐसा है कि सच्चाई की तलाश करने वाले हर व्यक्ति के पास अवश्य होना चाहिए और यही वह प्रक्रिया भी है, जिससे परमेश्वर को जानने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को अवश्य गुज़रना चाहिए। परमेश्वर के वचन जानने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है और परमेश्वर के कार्य को जानने की प्रक्रिया है। और इसलिए, दर्शनों को जानना न केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानने का संकेत है बल्कि इसमें परमेश्वर के वचन और कार्य को जानना भी शामिल है। परमेश्वर के वचन से लोग परमेश्वर की इच्छा जान लेते हैं और परमेश्वर के कार्य से वो जान लेते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; उद्धार पाने के लिए जो मार्ग उसे अपनाना आवश्‍यक है साथ ही उस मार्ग के लक्ष्य और दिशा; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सत्य-वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिससे सृजित मनुष्य सामान्य मानवता को जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

जीवन का अनुसरण करने में, तुम्‍हें दो बातों पर ज़रूर ध्‍यान देना चाहिए : पहली, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर स्‍वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्‍वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्‍वर के वचनों के भीतर सत्य को नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? संसार की सारी पुस्तकें दुष्ट शैतान के सिद्धांतों से संकलित की गई हैं, नहीं क्या? उनमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है! परमेश्‍वर के वचनों में सत्य को समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है परमेश्‍वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, उसके वचनों के भीतर सत्य के सभी पहलुओं को समझना, जैसे स्‍वयं अपनी सच्ची समझ और परमेश्‍वर के वचनों के भीतर मानवता के अस्तित्‍व के अर्थ खोजना। समस्‍त सत्य परमेश्‍वर के वचनों के भीतर है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जबतक कि प्रवेश परमेश्‍वर के वचनों के ज़रिए न किया जाए। वह मुख्‍य परिणाम जो तुम्हें प्राप्त करना है, यह जानना है कि परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और ज्ञान से युक्त होना क्‍या होता है। परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ के साथ, तुम फिर सत्य को समझ सकते हो। यह सबसे बुनियादी बात है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

अगर तुम परमेश्वर के वचनों से परमेश्वर की इच्छा को और उसके कथनों के पीछे के अभिप्रायों को नहीं समझते हो, अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिसे उसके वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, अगर तुम इन बातों को नहीं समझते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह अपने हर वचन में इतना ईमानदार और निष्कपट क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर की इच्छा या उसके इरादों को नहीं समझते हो, तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो। अगर तुम यह समझ नहीं पाते हो, तो तुम सत्य को कैसे प्राप्त कर सकते हो? सत्य को प्राप्त करने का अर्थ है परमेश्वर द्वारा बोले जाने वाले हर वचन के माध्यम से परमेश्वर के अर्थ को समझना; इसका अर्थ है समझ लेने के बाद तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने में समर्थ हो ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को जी सको और वे तुम्हारी वास्तविकता बन जायेँ। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य वास्तविकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच : "मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।" यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तू उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, तो एक बार इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो जाने पर, यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इन्हें समझता है। तू चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाये, तेरी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है कि उनके भीतर से सत्य को खोजना; केवल तभी तुम सच में समझ पाओगे कि परमेश्वर क्या कहता है। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य के भीतर ऐसे विवरण होते हैं जो परमेश्वर के वचनों में निश्चित रूप से प्रकट किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किये जा सकते हैं। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसे समझा नहीं जा सकता है। जब तक लोग प्रयास करते रहेंगे, तब तक वे सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं; अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम इन्हें अनुभव कर सकते हो, शेष बचा विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाएगा जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, इस प्रकार वह तुम्हें इन ठोस अवस्थाओं की समझ देगा। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों को समझना, उन्हें पढ़ने के द्वारा उनकी विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तू उसके वचनों की व्याख्या शाब्दिक रूप से या अपनी स्वयं की सोच या कल्पना के चश्मे से करता है, तो परमेश्वर के वचनों की तेरी समझ वास्तविक नहीं है, भले ही तू कितनी भी वाक्पटुता से इनकी व्याख्या कर सकता हो। यह संभव है कि तू संदर्भ से बाहर भी उनका अर्थ निकाल ले और उनका ग़लत अर्थ निकाले, यह करना और भी अधिक तकलीफ़देह है। इस प्रकार, सत्य मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का ज्ञान हासिल करने के माध्यम से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करके प्राप्त किया जाता है। उसके वचनों के शाब्दिक अर्थ को समझना या उन्हें समझाने में सक्षम होना यह सत्य को प्राप्त करने के रूप में नहीं गिना जाता है। यदि तुझे केवल उसके वचनों की शाब्दिक व्याख्या करने की आवश्यकता होती, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का मतलब ही क्या होता? अगर ऐसा होता तो तुझे बस कुछ निश्चित स्तर की शिक्षा की आवश्यकता होती, और अशिक्षित काफी कठिन परिस्थितियों में होते। परमेश्वर का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है। परमेश्वर के वचनों की एक सच्ची समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पाने पर निर्भर करती है; सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी ही है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

ऐसा क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर के वचन लोगों के लिए एक प्रकाश-स्तंभ हैं? ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि परमेश्वर के वचन व्यर्थ नहीं बोले जाते; वे कोई सिद्धांत या कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं हैं और न ही वे कोई तर्क-वितर्क हैं। वे तुम्हारे द्वारा अपनाए जाने और अभ्यास में लाए जाने के लिए हैं। जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आती है, तुम्हें कुछ पता नहीं होता कि क्या करना है और तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, तो तुम परमेश्वर के वचनों में दी गयीं अपेक्षाओं के बारे में सोचते हो। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके तुम्हें आगे का मार्ग मिलता है और तुम उनका अर्थ समझ लेते हो। फिर, तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अभ्यास कर सकते हो। इस तरह अभ्यास करने से तुम्हें पुष्टि प्राप्त हो जाती है और तुम्हें पता चल जाता है कि अभ्यास के इस तरीके से तुम्हारी आत्मा को शांति और आनंद मिलता है; यह दूसरों के लिए भी शिक्षाप्रद है। परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने की प्रक्रिया में, तुम कुछ प्रबुद्धता, कुछ अनुभव और शिक्षा प्राप्त करते हो; तुम वस्तु-विशेष के प्रति जागरुक हो जाते हो। तुम्हें समझ में आ जाता है कि परमेश्वर का इन वचनों को कहने और लोगों को एक निश्चित तरीके से कार्य करने के लिए कहने का क्या अर्थ है। तुम अभ्यास के प्रासंगिक सिद्धांतों का पता लगा लेते हो और तुम्हें परमेश्वर द्वारा इन वचनों को कहने के मूल का और महत्ता का पता चल जाता है—यह सत्य को समझना है। एक बार जब तुम सत्य को समझ लेते हो, तो फिर तुम भ्रमित नहीं होते या तुम्हें उसमें शामिल होना मुश्किल नहीं लगता; तुम्हारे पास अभ्यास करने का एक मार्ग होता है। परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने का मार्ग होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम उनके अभ्यास के सिद्धांतों को समझते हो; और तुम परमेश्वर के वचनों के पीछे अभ्यास के सिद्धांतों को समझते हो; तुम समझते हो कि परमेश्वर किन स्थितियों का उल्लेख कर रहा है और तुम जानते हो कि तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए। परमेश्वर के वचन तुम्हें सामान्य लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे तुम्हें बताते हैं कि तुम्हें कैसे जीना चाहिए, किसी समस्या के आने पर तुम्हें क्या करना चाहिए, और उन कठिनाइयों से कैसे निपटना चाहिए। वे सत्य हैं। वे तुम्हारा मार्ग बनकर किसी समस्या को बुद्धि और सिद्धांतों से सुलझाने में मदद कर सकते हैं और तुम्हें अभ्यास का मार्ग दे सकते हैं। यदि किसी दायित्व को निभाने के लिए या किसी और मामले के लिए तुम्हारे पास कोई मार्ग है, चीज़ों को सँभालने के सिद्धांत हैं और तुम परमेश्वर की इच्छा जानते हो, तो यह दर्शाता है कि तुम सत्य और परमेश्वर के वचनों को समझते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के वचनों के नियमों की खोज की है? कुछ लोग यह कहते हैं : "परमेश्वर के प्रत्येक कथन में सभी प्रकार की सामग्री होती है और हर अंश और हर वाक्य का एक भिन्न अर्थ होता है, जिससे हमें उसे याद रखना मुश्किल और समझना कठिन हो जाता है। यहाँ तक कि किसी अनुच्छेद के सामान्य विचार का सारांश प्रस्तुत करना भी संभव नहीं है।" परमेश्वर का वचन खराब क्षमता वालों की पहुँच से बाहर है। वह कोई उपन्यास नहीं है, न ही वह कोई गद्य या साहित्य का कोई कार्य है। वह सत्य है; वह वो वचन है जो मनुष्य को जीवन देता है। वह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे अपने मन में विचार करके समझा जा सकता हो, न ही उसके नियमों का कुछ अतिरिक्त प्रयास करके सारांश प्रस्तुत किया जा सकता है। इसलिए चाहे लोगों को उसके नियमों के किसी भी पहलू की थोड़ी समझ या बोध हो, वह केवल एकतरफा समझ ही हो सकती है, केवल उथली, सागर में सिर्फ एक बूँद, और वह मूल रूप से परमेश्वर के मूल मंतव्य तक पहुँचने में असमर्थ है। परमेश्वर के वचनों का कोई भी लेख सत्य के कई पहलुओं से युक्त होगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के देहधारण के रहस्य के बारे में बताने वाले लेख में देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के साथ-साथ देहधारी परमेश्वर के महत्व को भी समाविष्ट किया जाएगा। और इसमें यह भी समाविष्ट किया जाएगा कि लोगों को ईश्वर पर कैसे विश्वास करना चाहिए, और शायद यह भी समाविष्ट किया जा सकता है कि लोगों को परमेश्वर को कैसे समझना और प्यार करना चाहिए; उसमें सत्य के कई पहलुओं का समावेश होगा। यदि, तुम्हारी कल्पना के अनुसार, देहधारण का महत्व केवल कुछ पहलुओं से युक्त होता और कुछ ही वाक्यों में सामान्यीकृत किया जा सकता, तो परमेश्वर का कार्य मनुष्य पर कौन-सा परिणाम प्राप्त करने में सक्षम हो पाता? लोगों को परमेश्वर के बारे में समझाने के लिए देहधारी परमेश्वर का महत्व समझाया जाता है। परमेश्वर को समझने के बाद स्वाभाविक रूप से लोगों का हृदय ऐसा हो जाता है जो ईश्वर का सम्मान करता है, और उसमें अब मनुष्य का अभ्यास शामिल होता है। तो परमेश्वर के वचनों का कोई पहलू और सत्य का भी कोई पहलू उतना आसान नहीं है, जितना तुम कल्पना करते हो। यदि तुम यह सोचते हुए कि किसी भी प्रश्न का उत्तर परमेश्वर के वचनों के एक अनुच्छेद से दिया जा सकता है, ईश्वर के वचन और दिव्य भाषा को सरल मानते हो, तो यह सत्य नहीं है। प्रत्येक लेख में कई कोण होते हैं, जिनसे परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं, और लोगों के पास उसके वचनों को संक्षेप में कहने या उनका सारांश प्रस्तुत करने का कोई तरीका नहीं होता। उसके वचनों को सारांशित करने के बाद तुम्हें लगता है कि एक अंश ने एक निश्चित प्रश्न का उत्तर दे दिया है, लेकिन यह अंश अन्य प्रश्नों से भी संबंधित है। सत्य के हर पहलू में कई चीजें समाविष्ट हैं। ऐसा क्यों कहा जाता है कि सत्य जीवन है, कि वह मनुष्य को आनंद प्रदान कर सकता है, कि उसे कई जन्मों या कई सौ वर्षों में भी उसकी पूर्णता में अनुभव नहीं किया जा सकता? मान लो, तुम्हें सत्य के कुछ पहलुओं या परमेश्वर के वचनों के कुछ अंशों का सारांश प्रस्तुत करना था, तो तुम्हारे द्वारा सारांशित अंश एक सूत्र, एक नियम और एक सिद्धांत बन गया है, और वह सत्य नहीं है। क्यों? क्योंकि तुमने लोगों को गुमराह किया और उन्हें सिद्धांतों में ले आए, उन्हें उस अंश को अपने सिद्धांतों के अनुसार सोचने, कल्पना करने, प्रश्नों पर विचार करने और पढ़ने के लिए प्रेरित किया। तब वे केवल एक ही प्रश्न को देखते हुए और किसी अन्य पहलू को न देखते हुए उसे यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ पढ़ेंगे। अंत में उन्हें उन जगहों पर लाया जाएगा जहाँ वे सत्य का अनुभव नहीं कर सकते हैं और परमेश्वर के वचन का अनुभव नहीं कर सकते हैं, ऐसी जगह जहाँ वे स्वयं को केवल सिद्धांतों से सज्जित कर सकते हैं और उन पर चर्चा कर सकते हैं, लेकिन उनमें परमेश्वर की समझ का अभाव होगा। वे सिर्फ सुखद लगने वाले और सही सिद्धांतों के बारे में ही बोल पाएँगे, लेकिन उनके भीतर कोई वास्तविकता नहीं होगी और उनके पास चलने के लिए कोई मार्ग नहीं होगा। इस प्रकार का मार्गदर्शन वास्तव में गंभीर नुकसान पहुँचाता है!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

प्रत्येक व्यक्ति सत्य का अनुभव करता है, लेकिन हर कोई विभिन्न परिस्थितियों में ऐसा करता है और हर व्यक्ति को कुछ अलग प्राप्त होता है। यदि उनके ज्ञान को एक साथ मिला दिया जाए, तब भी वे एक सत्य को व्यक्त करने में असमर्थ रहेंगे। सत्य इतना गहरा होता है! ऐसा क्यों कहा जाता है कि तुमने जो चीज़ें प्राप्त की हैं वे और तुम्हारा ज्ञान सत्य के प्रतीक नहीं हो सकते? तुम दूसरों के साथ अपने ज्ञान की संगति करते हो, और इसका पूरी तरह अनुभव करने से पहले उन्हें चिंतन करने में केवल दो या तीन दिन लगते हैं। लेकिन लोगों को पूरा जीवनकाल बिताने के बाद भी सत्य का पूरी तरह अनुभव नहीं हो पाता; प्रत्येक व्यक्ति ने जो कुछ अनुभव किया है, यदि उसे एक साथ मिला दिया जाए, तब भी सत्य का अनुभव पूरी तरह नहीं होगा। इसीलिए यह देखा जा सकता है कि सत्य असाधारण रूप से गहरा होता है। सत्य को पूरी तरह से शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य की भाषा में, सत्य मानवजाति का वास्तविक सार है। सत्य का पूरी तरह अनुभव करने में मनुष्य कभी सक्षम नहीं होगा। मनुष्य को सत्य के साथ जीना चाहिए। एक सत्य पूरी मानवजाति के अस्तित्व को कई हज़ार वर्षों तक बनाए रख सकता है।

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और उसमें निहित हर चीज़ का प्रतिनिधित्व करता है। यदि तुम कहते हो कि थोड़े-से अनुभवों के होने का मतलब सत्य का होना है, तो क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? तुम्हारे पास कुछ अनुभव हो सकता है, सत्य के किसी निश्चित पहलू या उसके किसी एक पक्ष से संबंधित प्रकाश हो सकता है, लेकिन तुम दूसरों को हमेशा के लिए इसकी आपूर्ति नहीं कर सकते, इसलिए यह जो प्रकाश तुमने प्राप्त किया है, सत्य नहीं है; यह केवल एक मुकाम है जिस तक लोग पहुँच सकते हैं। यह महज़ उचित अनुभव और उचित समझ है, कुछ वास्तविक अनुभव और सत्य का ज्ञान है, जो इंसान में होना चाहिए। यह रोशनी, प्रबोधन और अनुभवजन्य समझ सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकते; अगर सभी लोग इस सत्य का अनुभव कर भी लेते और अपनी समस्त अनुभवजन्य समझ को एक साथ जोड़ लेते, तो भी वे उस एक सत्य के बराबर नहीं हो सकते थे। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, "मैं मानव जगत के लिए इस बात को एक कहावत के साथ पूरा करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं जो मुझे प्रेम करता है।" यह सच्चा बयान है; यह जीवन का सच्चा सार है। सभी बातों में यह सबसे गहन है; यह परमेश्वर स्वयं की अभिव्यक्ति है। तुम इसे अनुभव करते रह सकते हो और यदि तुम इसे तीन सालों तक अनुभव करते हो तो तुम्हें इसकी एक सतही समझ प्राप्त होगी; अगर तुम इसे सात या आठ साल तक अनुभव करते हो तो तुम्हें उससे भी अधिक समझ मिलेगी, लेकिन जो भी समझ तुम हासिल करोगे वो कभी भी सत्य के उस एक बयान का स्थान नहीं ले पाएगी। अन्य व्यक्ति, इसका एक-दो साल तक अनुभव करने के बाद, शायद थोड़ी-सी समझ हासिल कर ले, और दस सालों तक अनुभव करने के बाद थोड़ी और गहरी समझ हासिल कर ले, और फिर पूरे जीवनकाल के लिए अनुभव कर ज़्यादा उच्चतर समझ हासिल कर ले—लेकिन यदि तुम दोनों अपने द्वारा हासिल समझ को मिला दो, तो भी—चाहे तुम दोनों के पास कितनी भी समझ, कितने ही अनुभव, कितनी भी अंतर्दृष्टि, कितना भी प्रकाश, या कितने ही उदाहरण हों—ये सब मिलकर सत्य के उस एक कथन का स्थान नहीं ले सकते। दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जीवन हमेशा मनुष्य का जीवन होगा, भले ही तुम्हारी समझ सत्य, परमेश्वर के इरादों, उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हो, लेकिन यह कभी भी सत्य का एक विकल्प नहीं बन पाएगी। यह कहने का अर्थ कि लोगों ने सत्य हासिल कर लिया है, यह है कि उनके पास कुछ वास्तविकता है, और उन्होंने सत्य की कुछ समझ हासिल कर ली है, परमेश्वर के वचनों में कुछ वास्तविक प्रवेश पा लिया है, उन्हें परमेश्वर के वचनों का कुछ वास्तविक अनुभव हो गया है, और परमेश्वर पर अपने विश्वास में वे सही मार्ग पर हैं। किसी व्यक्ति के जीवन भर के अनुभव के लिए परमेश्वर से केवल एक ही बयान पर्याप्त है; लोग कई जीवनकाल या कई हज़ार वर्षों तक का अनुभव करने के बाद भी पूरी तरह और अच्छी तरह से मात्र एक सत्य का अनुभव भी नहीं कर पाएंगे। यदि लोगों ने कुछ ही सतही वचनों को समझा है और फिर भी वे दावा करते हैं कि उन्होंने सत्य हासिल कर लिया है, तो क्या यह पूरी तरह बकवास नहीं होगी?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर का कार्य और वचन तुम्हारे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए हैं; उसका लक्ष्य मात्र अपने कार्य और वचन को तुम लोगों को समझाना या ज्ञात कराना नहीं है। इतना पर्याप्त नहीं है। तुम्हारे अंदर सोचने-समझने की योग्यता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन इंसानी भाषा में लिखे हैं, और वह बड़ी स्पष्टता से बोलता है। मिसाल के तौर पर, तुम इस बात को पूरी तरह से जानने में सक्षम हो कि परमेश्वर तुम्हें क्या बात समझाना और किस पर अमल करवाना चाहता है; यह ऐसी बात है जिसे सूझ-बूझ रखने वाला एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है। विशेषकर, वर्तमान चरण में परमेश्वर जो वचन कह रहा है, वे खासतौर पर स्पष्ट और पारदर्शी हैं, और परमेश्वर ऐसी अनेक बातों की ओर इशारा कर रहा है जिन पर लोगों ने विचार नहीं किया है इसके साथ-साथ हर तरह की इंसानी स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है। उसके वचन व्यापक हैं और पूरी तरह से स्पष्ट हैं। इसलिए अब, लोग बहुत-से मुद्दों को समझते हैं, लेकिन एक चीज़ अभी भी छूट रही है—लोगों का उसके वचनों को अमल में लाना। लोगों को सत्य के हर पहलू का विस्तार से अनुभव करना चाहिए, उसकी छान-बीन और खोज ज़्यादा विस्तार से करनी चाहिए, बजाय इसके कि जो कुछ भी उन्हें उपलब्ध कराया जाए, महज़ उसे आत्मसात करने का इंतज़ार करें; वरना वे परजीवी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों को जानते तो हैं, फिर भी उस पर अमल नहीं करते। इस तरह का व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता और अंतत: उसे हटा दिया जाएगा। 1990 के पतरस जैसा बनने के लिए तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहिए, अपने अनुभव में सच्चा प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ अपने सहयोग में ज़्यादा और कहीं अधिक विशाल प्रबोधन प्राप्त करना चाहिए, जो तुम्हारे अपने जीवन के लिए सदा अधिक सहायक होगा। अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, तुम लोगों द्वारा परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया ही उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है, या इसे और अधिक साफ तौर कहें तो, परमेश्वर में विश्वास रखना उसके वचनों को जानना, समझना, उनका अनुभव करना और उन्हें जीना है; परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की सच्चाई ऐसी ही है। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अनंत जीवन पाने की आशा करते हो लेकिन परमेश्वर के वचनों को इस प्रकार अमल में लाने का प्रयास नहीं करते मानो कि वह ऐसी कोई चीज़ है जो तुम्हारे भीतर है, तो तुम मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जा कर केवल भोज्य-पदार्थों को देखा और उनमें से किसी भी चीज़ का स्वाद चखे बिना स्वादिष्ट चीज़ों को रट लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी सामान्य मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों को जानते हो, लेकिन यह नहीं कह सकते कि तुम इन्हें समझते हो। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य पर अमल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पहले इसे समझा जाए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, निश्चय ही यह पूरे तौर पर सही तो नहीं है। सत्य का ज्ञान प्राप्त करने से पहले, तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। किसी उपदेश में कोई बात सुनकर यह मान लेना कि तुम समझ गए हो, सच्ची समझ नहीं होती—इसे महज़ सत्य को शाब्दिक रूप में समझना कहते हैं, यह उसमें छिपे सच्चे अर्थ को समझने के समान नहीं है। सत्य का सतही ज्ञान होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में इसे समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करके आता है। इसलिए, जब तुम सत्य का अनुभव कर लेते हो, तो तुम इसे समझ सकते हो, और तभी तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। संकेतार्थों को और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना की एकमात्र तरीका है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

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