171. परमेश्वर के प्रेम को जानने के सिद्धांत

(1) मसीह जिन सच्चाइयों को व्यक्त करता है, वे सभी मनुष्य के उद्धार के लिए होती हैं। मसीह का सार प्रेम है; यह सत्य, मार्ग और जीवन है।

(2) परमेश्वर के प्रेम को केवल अनुग्रह, दया और सहिष्णुता के रूप में परिभाषित कर, किसी को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से उसे सीमांकित नहीं करना चाहिए; सख्त न्याय, ताड़ना और अनुशासन मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम की अतिरिक्त अभिव्यक्तियाँ हैं।

(3) जब कोई परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना तथा उसके परीक्षण और शोधन से गुज़रता है, तो वह शैतान के प्रभाव से दूर हो जाता है, और उसका भ्रष्ट स्वभाव बदल जाता है। यह परमेश्वर का सच्चा प्रेम है।

(4) जब किसी को परमेश्वर के प्रेम की सच्ची समझ होती है, तो वह परमेश्वर के लिए खुद को स्वेच्छा से खपाने में, परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने में, और परमेश्वर के प्रेम को लौटाने में, सक्षम हो जाता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है—परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि आतीत में परमेश्वर ने मनुष्य को शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, बल्कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाने का कार्य किया था। देह का सार वह है जो शैतान का है—परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम कर सको, ताकि तुम देह के सार को जान सको; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है कि तुम जागृत हो जाओ, तुम अपने भीतर की कमियों को जान सको और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध—ये सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और अपना धार्मिक स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है—यह सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए है। परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने वास्तव में गहन उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है; क्या यह और भी उद्धार नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि कैसे जिया जाए, यहाँ तक कि तुम इससे बिलकुल भी अवगत नहीं हो, और चूँकि तुम इस दुराचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं दुराचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में लौट सकते हो! यदि तुम इस धारा में रहने और इस न्याय और अमित उद्धार का आनंद लेने, और मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जाने वाले इन सब आशीषों का और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम्हें कुछ कष्ट और शुद्धिकरण सहना पड़ सकता है, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा लोग शुद्ध, और निर्ममतापूर्वक उजागर किए जाते हैं—जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पापों का दंड देना, उनके देह को दंड देना है—फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह को नष्ट करने की सीमा तक नकारने के इरादे से नहीं है। वचन के समस्त गंभीर प्रकटीकरण तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से हैं। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यामिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और निस्संदेह तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम सहते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (4)' से उद्धृत

मसीह का सार-तत्व क्या है? मनुष्यों के लिए, मसीह का सार प्रेम है; जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, उनके लिए यह असीम प्रेम है। अगर उसमें कोई प्यार न होता या दया नहीं होती, तो लोग अभी भी उसका अनुसरण नहीं कर रहे होते। कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर अभी भी धार्मिक है।" वह सचमुच धार्मिक है, लेकिन उसके स्वभाव के लिहाज से, उसकी धार्मिकता मुख्य रूप से मानव जाति के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति घृणा के रूप में, दानवों और शैतान को शाप देने और अपने स्वभाव के प्रति किसी अपराध को लेकर उसकी सहिष्णुता के रूप में अभिव्यक्त होती है। तो क्या उसकी धार्मिकता में प्रेम भी है? क्या मनुष्य का न्याय और उसकी भ्रष्टता का शुद्धिकरण परमेश्वर का प्रेम है? परमेश्वर ने असीम धैर्य के साथ घोर अपमान सहा है, क्या यह प्रेम नहीं है? मैं तुम्हारे साथ साफ़-साफ़ बात कर रहा हूँ: परमेश्वर देहधारण के दरम्यान मानवजाति के लिए जो काम करता है, उसमें उसका सबसे स्पष्ट और प्रमुख सार प्रेम है; यह असीम सहिष्णुता है। अगर यह प्रेम न होता और वैसा होता जैसी तुम लोग कल्पना करते हो—यदि परमेश्वर किसी को मार गिराना चाहता है, तो वह ऐसा करता है, और यदि वह किसी से घृणा करता है, तो वह उस व्यक्ति को दंड देता है, शाप देता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है; तो वह कितना सख्त होता! यदि वह लोगों पर क्रोधित होता है, तो लोग डर से कांप जाएँगे और उसके सामने टिक नहीं पाएँगे। यह केवल एक तरी है जिससे परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त होता है। अंततः, अभी भी उसका लक्ष्य उद्धार करना है। उसका प्यार उसके स्वभाव के सभी प्रकटनों में बना रहता है। थोड़ा सोचो, देह में काम करते समय परमेश्वर लोगों के सामने जो सबसे अधिक प्रकट करता है, वह प्रेम है। धैर्य क्या है? भीतर के प्रेम से छलकने वाली दया ही धैर्य है, और तब भी इसका उद्देश्य लोगों को बचाना है। परमेश्वर लोगों पर दया करने में सक्षम है क्योंकि उसके पास प्रेम है। ठीक उसी तरह जैसे अगर किसी विवाहित जोड़े के बीच सच्चा प्रेम है तो वे एक-दूसरे की कमियों को अनदेखा कर देते हैं। अगर तुम्हारा जीवन साथी तुम्हें क्रोधित कर देता है तो तुम उसके साथ धैर्य से काम लेते। सब कुछ प्रेम की नींव पर ही स्थापित होता है। यदि पति और पत्नी एक दूसरे से नफरत करते, तो उनका ये रवैया नहीं होता, या वे खुद को ऐसे अभिव्यक्त न करते, न ही इस प्रकार का परिणाम होता। यदि परमेश्वर में केवल नफ़रत होती और रोष होता, और वह बिना किसी प्रेम के केवल न्याय करता और ताड़ना ही देता, तो स्थिति वह नहीं होती जो तुम अभी देखते हो और विपत्ति तुम लोगों पर आ पड़ती। क्या वह तुम्हें सच्चाई प्रदान करता? अगर न्याय और ताड़ना दिए जाने के बाद लोगों को शाप दिया जाता, तो वे पूरी तरह से खत्म हो जाते। अगर वे तुरंत नहीं भी मरते, तो ऐसे लोग ज़रूर होते जो बीमार पड़ जाते या जिन पर अपंगता, पागलपन या अंधेपन की मार पड़ती, ऐसे लोग भी होते जिन्हें पैरों तले कुचले जाने के लिए बुरी आत्माओं और दुष्ट राक्षसों को सौंप दिया जाता और वे लोग वैसे नहीं होते जैसेकि वे आज हैं। इस प्रकार, तुम लोगों ने परमेश्वर के अत्यधिक प्रेम का आनंद लिया है; उसने तुम्हारे प्रति बहुत सहिष्णुता, करुणा, और प्रेमपूर्ण दया दिखाई है। लेकिन फिर भी लोग इस पर आपत्ति जताते हैं, और अपने मन में सोचते हैं, "परमेश्वर को इंसान से ऐसे ही पेश आना चाहिए; उसके पास धार्मिकता और क्रोध दोनों है और हमने इनका काफी अनुभव किया है।" क्या सच में? अगर तुमने सच में अनुभव किया होता तो तुम खत्म हो जाते। तो फिर आज तक इंसान कैसे जीवित रहता? परमेश्वर की नफरत, क्रोध और धार्मिकता, ये सभी, लोगों के इस समूह को उद्धार देने की बुनियाद द्वारा अभिव्यक्त किए जाते हैं। इस स्वभाव में प्रेम और दया के साथ-साथ असीम धैर्य भी शामिल है। इस नफरत में कोई और विकल्प न होने का भाव निहित है, और इसमें परमेश्वर की असीम चिंता और मानवजाति के लिए प्रत्याशा शामिल है! परमेश्वर की नफरत मानवजाति की भ्रष्टता पर लक्षित है; यह लोगों के विद्रोह और पापों पर लक्षित है, यह एक पक्ष से जुड़ा है और यह प्रेम की बुनियाद पर बना है। जहाँ प्रेम होगा वहीं नफरत भी होगी। इंसानों के प्रति परमेश्वर की नफरत शैतान के प्रति उसकी नफरत से अलग है, क्योंकि परमेश्वर लोगों को बचाता है और वह शैतान को नहीं बचाता है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव हमेशा से ही विद्यमान है; उसके पास शुरू से ही क्रोध, धार्मिकता और न्याय रहा है। वे अचानक उस क्षण अस्तित्व में नहीं आए जिस क्षण परमेश्वर ने उन्हें मानव जाति की ओर निर्देशित किया। मनुष्यों द्वारा देखे जाने से पहले से यह परमेश्वर का स्वभाव था; बात सिर्फ इतनी है कि लोगों ने उसकी धार्मिकता को महसूस करने के बाद ही यह जाना कि उसकी धार्मिकता की प्रकृति ऐसी थी। वास्तव में, चाहे परमेश्वर धार्मिक हो, प्रतापी हो, या क्रोधी हो, इंसान के उद्धार के लिए वह जो भी कार्य करता है, वह प्रेम के परिणामस्वरूप होता है। कुछ लोग कहते हैं, "तो वास्तव में इसमें कितना प्यार है?" बात यह नहीं कि प्यार कितना है; मुख्य यह है कि यह सौ प्रतिशत प्रेम है। इससे अगर थोड़ा भी कम होता तो मनुष्यों को बचाया नहीं जाता। परमेश्वर अपना सारा प्रेम लोगों को समर्पित करता है।

परमेश्वर देह क्यों बना? यह पहले ही कहा जा चुका है कि वह मानव जाति को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास करता है; इस प्रकार, उसका देहधारण उसके प्रेम की संपूर्णता से संपन्न है, जो तुम लोगों को परमेश्वर के प्रति मनुष्य की अवज्ञा की चरम सीमा दिखाता है, और दिखाता है कि स्थिति लाइलाज है। उसके पास देह बनने और खुद को मानव जाति के लिए अर्पित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। परमेश्वर अपना पूरा प्रेम अर्पित करता है। अगर वह इंसान से प्रेम नहीं करता, तो वह देह नहीं बनता; बल्कि, वह स्वर्ग से वज्रपात करता, सीधे अपने प्रताप और क्रोध को भेजता जिससे इंसान भूमि पर गिर पड़ता। परमेश्वर को कोई जरूरत नहीं होती कि वह देह बने; उसे न तो इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती और न ही इतना अधिक अपमान सहना पड़ता। यह एक स्पष्ट उदाहरण है। वह इंसान को बचाने के लिए दर्द, अपमान, परित्याग और उत्पीड़न का शिकार होना चुनेगा; ऐसे शत्रुतापूर्ण माहौल के बावजूद, वह उन्हें उद्धार देगा। क्या इससे बड़ा कोई प्रेम हो सकता है? यदि परमेश्वर के पास धार्मिकता के अलावा और कुछ भी नहीं होता, और अगर वह मानव जाति के प्रति निरंतर घृणा से भरा होता, तो वह अपना काम करने के लिए देह नहीं बनता; वह तब तक इंतजार कर सकता था, जब तक कि मनुष्यों का भ्रष्टाचार अपने चरम पर नहीं पहुँच जाता और फिर उन सभी को भस्म कर देता, और इस तरह उनका काम तमाम कर देता। चूँकि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है—क्योंकि उसमें मानव जाति के लिए अत्यधिक प्रेम है—इसीलिए वह इन असाधारण रूप से भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए देह बन गया। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरने के बाद, और उनकी प्रकृति से अवगत होने के बाद, कई लोग कहते हैं, "मेरे लिए सब कुछ खत्म हो गया है; मुझे कभी नहीं बचाया जा सकता।" जब तुम खुद को उद्धार पाने में असमर्थ मान लेते हो, सिर्फ तभी तुम यह जान पाते हो कि परमेश्वर के पास वास्तव में मनुष्य के लिए अत्यधिक धैर्य और प्रेम है! परमेश्वर के प्रेम के बिना लोग क्या कर सकते थे? मानव प्रकृति इतनी भ्रष्ट है, फिर भी परमेश्वर अभी भी तुम लोगों से बात करता है; जो भी सवाल तुम लोग पूछते हो उसका तुरंत जवाब देता है, चिंता करते हुए कि शायद तुम न समझो और वह भयभीत रहता है कि कहीं तुम भटक न जाओ या चरम सीमा तक न चले जाओ। ऐसा मामला होने पर भी, क्या तुम लोग मानव जाति के लिए परमेश्वर के प्रेम के परिमाण को अभी भी नहीं समझते हो?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्‍यता के लिए परमेश्‍वर का सच्‍चा प्रेम' से उद्धृत

परमेश्वर ने स्वयं को इस स्तर तक विनम्र किया है कि वह अपना कार्य इन अशुद्ध और भ्रष्ट लोगों में करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाता है। परमेश्वर न केवल लोगों के बीच जीने और खाने-पीने, लोगों की चरवाही करने, और लोग जो चाहते हैं, उन्हें वह प्रदान करने के लिए देह में आया है, बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह उद्धार और विजय का अपना प्रबल कार्य इन असहनीय रूप से भ्रष्ट लोगों पर करता है। वह इन सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए बड़े लाल अजगर के केंद्र में आया, जिससे सभी लोग परिवर्तित हो सकें और नए बनाए जा सकें। वह अत्यधिक कष्ट, जो परमेश्वर सहन करता है, मात्र वह कष्ट नहीं है जो देहधारी परमेश्वर सहन करता है, अपितु सबसे बढ़कर वह परम निरादर है, जो परमेश्वर का आत्मा सहन करता है—वह स्वयं को इतना अधिक विनम्र बनाता है और इतना अधिक छिपाए रखता है कि वह एक साधारण व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर ने इसलिए देहधारण किया और देह का रूप लिया, ताकि लोग देखें कि उसका जीवन एक सामान्य मानव का जीवन है, और उसकी आवश्यकताएँ एक सामान्य मानव की आवश्यकताएँ हैं। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर ने स्वयं को बेहद विनम्र बनाया है। परमेश्वर का आत्मा देह में साकार होता है। उसका आत्मा बहुत उच्च और महान है, फिर भी वह अपने आत्मा का कार्य करने के लिए एक सामान्य मानव, एक तुच्छ मनुष्य का रूप ले लेता है। तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता, अंतर्दृष्टि, समझ, मानवता और जीवन दर्शाते हैं कि तुम सब वास्तव में परमेश्वर के इस प्रकार के कार्य को स्वीकार करने के अयोग्य हो। तुम लोग वास्तव में इस योग्य नहीं हो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए यह कष्ट सहन करे। परमेश्वर अत्यधिक महान है। वह इतना सर्वोच्च है और लोग इतने निम्न हैं, फिर भी वह उन पर कार्य करता है। उसने लोगों का भरण-पोषण करने, उनसे बात करने के लिए न केवल देहधारण किया, अपितु वह उनके साथ रहता भी है। परमेश्वर इतना विनम्र, इतना प्यारा है। यदि परमेश्वर के प्रेम का उल्लेख किए जाते ही, उसके अनुग्रह का उल्लेख किए जाते ही तुम उसकी अत्यधिक प्रशंसा करते हुए आँसू बहाने लगते हो, यदि तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो वह संसार का नहीं था, और संसार का सुख भोगने के लिए वह देह नहीं बना था। जिस स्थान पर कार्य करना सबसे अच्छी तरह से उसके स्वभाव को प्रकट करता और जो सबसे अर्थपूर्ण होता, वह वही स्थान है, जहाँ वह पैदा हुआ। चाहे वह स्थल पवित्र हो या गंदा, और चाहे वह कहीं भी काम करे, वह पवित्र है। दुनिया में हर चीज़ उसके द्वारा बनाई गई थी, हालाँकि शैतान ने सब-कुछ भ्रष्ट कर दिया है। फिर भी, सभी चीजें अभी भी उसकी हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदे देश में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य के लिए ऐसा करता है, अर्थात् वह इस दूषित भूमि के लोगों को बचाने के लिए ऐसा कार्य करने में बहुत अपमान सहता है। यह पूरी मानवजाति की खातिर, गवाही के लिए किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को परमेश्वर की धार्मिकता दिखाता है, और वह परमेश्वर की सर्वोच्चता प्रदर्शित करने में अधिक सक्षम है। उसकी महानता और शुचिता उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार के माध्यम से व्यक्त होती है, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक मलिन भूमि में पैदा होना यह बिलकुल साबित नहीं करता कि वह दीन-हीन है; यह तो केवल सारी सृष्टि को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार दिखाता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धर्मी है। यद्यपि वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था, और यद्यपि वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे यीशु अनुग्रह के युग में पापियों के साथ रहता था, फिर भी क्या उसका हर कार्य संपूर्ण मानवजाति के अस्तित्व की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसलिए नहीं है कि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले वह कई वर्षों तक पापियों के साथ रहा। वह छुटकारे के लिए था। आज वह गंदे, नीच लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के लिए है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह एक नाँद में पैदा होने के बाद कई सालों तक पापियों के साथ रहता और कष्ट उठाता? और यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह दूसरी बार देह में लौटकर आता, इस देश में पैदा होता जहाँ दुष्ट आत्माएँ इकट्ठी होती हैं, और इन लोगों के साथ रहता जिन्हें शैतान ने गहराई से भ्रष्ट कर रखा है? क्या परमेश्वर वफ़ादार नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा भाग मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा भाग तुम लोगों की नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है। वह गंदगी से प्रदूषित नहीं है, हालाँकि वह एक गंदे देश में आया है; इस सबका मतलब केवल यह हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निस्वार्थ है और जो पीड़ा और अपमान वह सहता है, वह अत्यधिक है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

मानवजाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुज़ारी हैं। गहन ऊँचाई से लेकर अनंत गहराई तक, जीते-जागते नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुज़ारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच अपनी फटेहाली की शिकायत नहीं की है, अपनी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का अंग कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने का अन्याय झेला है, मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से "नरक" और "अधोलोक" में, शेर की माँद में, प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है? वह परमेश्वर की ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत कैसे कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों की शिकायत नहीं की है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किए गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। उसने कभी मनुष्य की अनुचित माँगों का प्रतिकार नहीं किया है, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक माँगें नहीं की हैं, और कभी भी उसने मनुष्य से गैरवाजिब तकाजे नहीं किए हैं; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है : शिक्षा देना, प्रबुद्ध करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिष्कार करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना और उजागर करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और नियति को हटा दिया है, फिर भी परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य को इस दुःख और अँधेरी ताकतों के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए नहीं रहा है, जो इतनी काली हैं जितनी कि रात? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को, जो ममतामयी माँ के हृदय जैसा है, कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्सुक हृदय को कौन समझ सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (9)' से उद्धृत

मनुष्य और परमेश्वर मूल रूप से भिन्न हैं और दो अलग-अलग दुनियाओं में रहते हैं। मनुष्य परमेश्वर की भाषा को समझने में सक्षम नहीं हैं, परमेश्वर के विचारों को जानना तो दूर की बात है। केवल परमेश्वर ही मनुष्यों को समझता है, जबकि मनुष्यों के लिए परमेश्वर को समझना असंभव है। इसलिए, परमेश्वर को देहधारण करके मनुष्य के समान (बाहर से वैसा ही दिखने वाला) बनना पड़ता है। मानवजाति को बचाने और लोगों को परमेश्वर के काम को समझने और जानने के योग्य बनाने में परमेश्वर को घोर अपमान और पीड़ा सहन करनी पड़ती है। परमेश्वर क्यों लोगों को हमेशा बचाता रहता है और कभी हार नहीं मानता? क्या यह उनके लिए उसके प्रेम के कारण नहीं है? वह मानवजाति को शैतान द्वारा भ्रष्ट होते देखता है तो वह इसे सहन नहीं कर पाता है और इसे ऐसे ही छोड़कर हार नहीं मान सकता। इसलिए उसने एक प्रबंधन योजना बनाई है। अगर, जैसेकि लोग कल्पना करते हैं, परमेश्वर क्रोधित होते ही मानवजाति को नष्ट कर दे, तो उसे मनुष्य को बचाने के लिए ऐसी घोर पीड़ा सहने की जरूरत ही नहीं होगी। उसके ठीक देहधारण करके इतनी सारी पीड़ा झेलने के कारण ही, थोड़ा-थोड़ा करके उसका प्रेम मनुष्य के सामने प्रकट हुआ है, और सभी लोगों को इसका पता चला है। अगर परमेश्वर इस तरह से काम न कर रहा होता, तो लोग केवल यही जानते कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है और वह मानवजाति से प्रेम करता है। अगर ऐसी बात होती, तो वह केवल एक धर्म सिद्धांत होता और लोग परमेश्वर के सच्चे प्रेम को कभी भी देख नहीं पाते और उसका अनुभव नहीं कर पाते। केवल परमेश्वर द्वारा देहधारण करके किए गए कार्य के कारण ही लोगों को उसके बारे में एक सच्ची समझ प्राप्त हो सकती है। यह समझ कोई अस्पष्ट या खोखली समझ नहीं है और न ही यह कोई धर्म सिद्धांत है, जिसे कोई व्यक्ति सिर्फ रट सकता है; बल्कि यह एक सच्ची समझ है, क्योंकि परमेश्वर द्वारा लोगों को दिया जाने वाला प्रेम उन्हें बहुत लाभ पहुंचाता है। यह काम केवल उसके द्वारा देहधारण करके ही किया जा सकता है, पवित्र आत्मा उसकी जगह यह काम नहीं कर सकता। यीशु ने लोगों को कितना महान प्यार दिया? उसे भ्रष्ट मानवजाति के लिए पापबलि के रूप में क्रूस पर चढ़ा दिया गया; वह मानवजाति के लिए उद्धार का काम पूरा करने, आया था, जब तक कि उसे क्रूस पर नहीं चढ़ा दिया गया। यह एक असीम प्रेम था, और परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अत्यधिक महत्व रखता है। कुछ लोग अभी भी परमेश्वर के देहधारण के बारे में धारणाएँ रखते हैं। वे क्या धारणाएँ रखते हैं? देहधारी परमेश्वर के बिना, लोगों का परमेश्वर में विश्वास एक खाली ढाँचे के सिवाय कुछ नहीं होगा और अंतत: वे नष्ट हो जाएँगे। मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम मुख्य रूप से उसके द्वारा देह में किए जाने वाले कार्य में, व्यक्तिगत रूप से लोगों को बचाने में, बिना लेशमात्र दूरी के, बिना किसी दिखावे के, पूरी तरह से वास्तविक बनकर उनके साथ आमने-सामने बोलने और रहने में प्रकट होता है। वह लोगों को इस हद तक बचाता है कि वह देहधारण करने और इस दुनिया में लोगों के साथ वर्षों पीड़ा में गुजारने में सक्षम हुआ, केवल मानवजाति के लिए अपने प्रेम और दया के कारण। मनुष्यों के लिए परमेश्वर का प्रेम बेशर्त है और वह कोई माँग नहीं करता। बदले में उसे उनसे क्या मिलता है? लोग परमेश्वर के प्रति उदासीन हैं। कौन परमेश्वर को परमेश्वर मानने में सक्षम है? लोग परमेश्वर को जरा भी आराम नहीं देते, आज तक भी परमेश्वर को लोगों से सच्चा प्रेम नहीं मिला है। परमेश्वर केवल निस्वार्थ भाव से देता और प्रदान करता रहता है, लेकिन लोग फिर भी संतुष्ट नहीं होते और उससे लगातार अनुग्रह माँगते रहते हैं। लोगों से निपटना बहुत मुश्किल और कष्टप्रद है! लेकिन देर-सबेर वह दिन आ ही जाएगा, जब परमेश्वर का कार्य परिणाम प्राप्त करेगा और अधिकांश लोग अपने दिलों से सच्चा धन्यवाद भेजेंगे। जिन लोगों ने कई सालों से अनुभव किया है, वे इस पहलू को समझने में सक्षम हैं। हालाँकि लोग सुन्न हैं, पर आखिरकार वे यंत्र-मानव नहीं हैं; वे निर्जीव वस्तुएँ नहीं हैं। जिन लोगों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं है, वे इन बातों को नहीं देख सकते; वे केवल यह कहते हुए इसे मानते हैं कि ये सत्य सही हैं, लेकिन उनके पास बहुत गहरी समझ नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम जानते हो?' से उद्धृत

मनुष्य के प्रति परमेश्वर का प्रेम वैसा नहीं है, जैसा लोग कल्पना करते हैं, वह केवल सुनने में अच्छे लगने वाले वचन या आशीर्वचन बोलना नहीं है। परमेश्वर के वर्तमान कार्य में कुछ ऐसे वचन हैं, जो वास्तव में लोगों की इच्छाओं के विपरीत हैं, ऐसे वचन जो उनके दिलों को छेद भी देते हैं और उन्हें पीड़ा पहुँचाते हैं। न्याय के कुछ वचन लोगों को वर्गीकृत करते, उन्हें शाप देते प्रतीत होते हैं, लेकिन इसका एक वास्तविक संदर्भ है। ये वचन पूरी तरह से तथ्यों के अनुरूप हैं, और उनमें कुछ भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है: परमेश्वर लोगों के भ्रष्ट सार के आधार पर बोलता है, जिसे जानने के लिए लोगों को कुछ समय तक अनुभव करना आवश्यक है। परमेश्वर के यह सब कहने का उद्देश्य लोगों को बदलना और उन्हें बचाना है; परमेश्वर के केवल इस तरह से बोलने से ही इष्टतम परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। तुम्हें यह देखना चाहिए कि परमेश्वर की श्रमसाध्य देखभाल और विचार पूरी तरह से लोगों को बचाने के लिए अभिकल्पित किए गए हैं और वे सभी परमेश्वर के प्रेम को साकार करते हैं। चाहे तुम परमेश्वर के कार्य में बुद्धि, उसके कदम और पद्धतियाँ, उस कार्य की अवधि या उसकी सटीक व्यवस्थाएँ और योजनाएँ देखो या न देखो, इन सब में उसका प्रेम निहित है। उदाहरण के लिए, सभी लोगों में अपने बेटे-बेटियों के लिए प्रेम होता है, और अपने बच्चों को सही रास्ते पर चलाने के लिए वे सभी बहुत प्रयास करते हैं। जब उन्हें अपने बच्चों की कमज़ोरियों का पता चलता है, तो माता-पिता चिंता करते हैं कि यदि वे नरमी से बोलते हैं, तो उनके बच्चे नहीं सुनेंगे, और बदल नहीं पाएँगे, और उन्हें यह भी चिंता होती है कि यदि वे बहुत कड़ाई से बोलते हैं, तो वे अपने बच्चों के आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाएँगे, और उनके बच्चे इसे सहन नहीं कर पाएँगे। यह सब प्रेमवश किया जाता है, और वे इसमें बहुत प्रयास लगाते हैं। बेटे-बेटियों ने अपने माता-पिता के प्रेम का अनुभव किया होगा। प्रेम में केवल नम्रता और विचारशीलता ही शामिल नहीं होती, उसमें कड़ी ताड़ना कहीं ज्यादा शामिल होती है। यह, और भी अधिक, प्रेम के कारण और प्रेम की पूर्व शर्त के तहत है कि परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति के लिए उद्धार लाने का भरसक प्रयास करता है। वह लोगों के साथ लापरवाही से नहीं निपटता है; वह सटीक योजनाएँ बनाता है और कदम दर कदम उन पर आगे बढ़ता है। कब, कहाँ, वाणी के किस लहजे के साथ, बोलने की किस विधि के साथ, और वह कितना प्रयास लगाता है इस संबंध में..., इत्यादि, ऐसा कहा जा सकता है कि यह सब उसके प्रेम को प्रकट करता है, और यह सब पूरी तरह से समझाता है कि मनुष्यजाति के लिए उसका प्रेम असीम और अगाध है। जब उनकी परीक्षा ली जाती है, तो बहुत-से लोग परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह के वचन बोलते हैं, या शिकायत करते हैं, लेकिन परमेश्वर इसका बुरा नहीं मानता—न ही, इसके परिणामस्वरूप, वह उनमें से किसी को भी दंड देता है। वह मनुष्य से प्रेम करता है, इसलिए वह उन सभी के प्रति सहनशील है। यदि उसमें प्रेम न होता, और केवल घृणा होती, तो वह बहुत पहले ही सभी मनुष्यों को दंडित कर चुका होता। लेकिन चूँकि परमेश्वर में प्रेम है, इसलिए वह उनकी इन बातों का बुरा नहीं मानता, और उन्हें सहन करता है, और वह लोगों की कठिनाइयाँ समझता है, और वह जो कुछ भी करता है, वह प्रेम द्वारा निर्देशित होता है। केवल परमेश्वर ही लोगों को समझता है—यहाँ तक कि तुम भी खुद को नहीं समझते। क्या यह सही नहीं है? ध्यान से सोचो : कई लोग बहुत-सी चीजों के बारे में शिकायत करते हैं, वे विवेकहीन हैं, वे परमेश्वर के आशीषों के बीच रहते हैं लेकिन इसे जानते तक नहीं। कोई नहीं जानता कि परमेश्वर को स्वर्ग से धरती पर आने के लिए कितना कष्ट सहना पड़ा है। परमेश्वर एक इंसान बन गया, वह जो इतना अभिजात और महान है—इतना अपमान सहने वाला, इतना तुच्छ, विनम्र इंसान बनने के लिए उसने कितना बड़ा दर्द सहा है! ... परमेश्वर आज इस कार्य को करने में इसलिए सक्षम है, क्योंकि उसकी प्रबंधन योजना इस चरण में पहुँच गई है; वह मानवजाति को न बचाता अगर वह उससे प्रेम न करता, और वह केवल इसीलिए इस प्रकार कार्य करता है, क्योंकि वह प्रेम की पूर्व शर्त के तहत प्रेम द्वारा प्रेरित होता है। भ्रष्ट मानवजाति को बचाने के लिए देह बनने में परमेश्वर का अत्यधिक अपमान सहना इस बात का पूर्ण प्रमाण है कि उसका प्रेम कितना महान है।

परमेश्वर के वचनों में प्रेरणा, आराम, प्रोत्साहन, सहनशीलता, धैर्य, न्याय, ताड़ना, शाप, सार्वजनिक प्रकाशन, गौरवशाली वादे और बहुत-कुछ छिपा है। उसका हर साधन प्रेम द्वारा निर्देशित है; यही उसके कार्य का सार है। तुम सभी लोगों को आज कुछ समझ है, हालाँकि वह विशेष रूप से गहरी नहीं है। लेकिन कम से कम कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें तुम समझ सकते हो। बाद में, जब तुम तीन या पाँच वर्षों तक अनुभव कर लोगे, तो तुम महसूस करोगे कि यह प्रेम कितना गहरा और महान है, यह मनुष्य की भाषा द्वारा कितना वर्णनातीत है। यदि लोगों में परमेश्वर के लिए प्रेम नहीं होगा, तो वे उसके प्रेम का प्रतिफल कैसे दे सकेंगे? भले ही तुमने अपना जीवन दे दिया हो, फिर भी तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने में सक्षम नहीं होगे। यदि तुम लोग कुछ और वर्षों तक अनुभव करोगे, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि प्रेम क्या होता है, और फिर तुम मुड़कर अपने स्वभाव पर, और आज तुम लोगों में जो कुछ प्रकट होता है, उस पर नजर डालोगे, तो तुम लोग अत्यंत खेद का अनुभव करोगे, और परमेश्वर के सामने अपने घुटनों पर गिर जाओगे। आज ज्यादातर लोग परमेश्वर का इतनी निकटता से, इतने उत्साह से अनुसरण क्यों करते हैं? क्योंकि वे परमेश्वर के प्रेम को जानते हैं, और वे देखते हैं कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य का उद्धार है। इस बारे में सोचो : क्या परमेश्वर का कार्य समय के चयन में अविश्वसनीय रूप से सटीक नहीं है? उसका कार्य बिना किसी देरी के एक चरण के बाद दूसरे चरण में आगे बढ़ता है—और वह कोई देरी बरदाश्त क्यों नहीं करता? मनुष्य की खातिर। वह एक भी आत्मा का त्याग नहीं करना चाहता, और वह एक भी आत्मा को और खोना नहीं चाहता; मनुष्य, इस बीच, अपने ही भाग्य की परवाह नहीं करता। तो इस दुनिया में तुमसे सबसे ज्यादा प्रेम कौन करता है? तुम स्वयं से प्रेम नहीं करते, तुम अपने ही जीवन को सँजोना या सँभालना नहीं जानते—परमेश्वर को मनुष्य से सर्वाधिक प्रेम है। लोग इसके प्रति बेसुध हो सकते हैं, और वे सोच सकते हैं कि वे खुद से प्रेम करते हैं—लेकिन वे स्वयं से किस तरह का प्रेम करते हैं? केवल परमेश्वर का प्रेम ही सच्चा प्रेम है। आगे चलकर तुम धीरे-धीरे यह समझने लगोगे कि सच्चा प्रेम क्या होता है। यदि परमेश्वर कार्य करने और मनुष्य का आमने-सामने मार्गदर्शन करने, मनुष्य के साथ दिन-रात गुजारने, और मनुष्य के साथ रहने के लिए देहधारण न करता, तो लोगों के लिए परमेश्वर के प्रेम को वास्तव में जानना आसान बात न होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम जानते हो?' से उद्धृत

अपनी पारंपरिक धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर का प्रेम मनुष्य की निर्बलता के लिए उसका अनुग्रह, दया और सहानुभूति है। यद्यपि ये बातें भी परमेश्वर का प्रेम हैं, परंतु वे अत्यधिक एक-तरफ़ा हैं, और वे प्राथमिक माध्यम नहीं हैं जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाता है। कुछ लोग बीमारी के कारण परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं और यह बीमारी तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुग्रह है; इसके बिना तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते तो तुम यहाँ तक नहीं पहुँच पाते—और इस प्रकार यह अनुग्रह भी परमेश्वर का प्रेम है। यीशु में विश्वास करने के समय लोगों ने ऐसा बहुत कुछ किया जो परमेश्वर को नापसंद था क्योंकि उन्होंने सत्य को नहीं समझा, फिर भी परमेश्वर में दया और प्रेम है, और वह मनुष्य को यहाँ तक ले आया है, और यद्यपि मनुष्य कुछ नहीं समझता, फिर भी परमेश्वर मनुष्य को अनुमति देता है कि वह उसका अनुसरण करे, और इससे बढ़कर वह मनुष्य को वर्तमान समय तक ले आया है। क्या यह परमेश्वर का प्रेम नहीं है? जो परमेश्वर के स्वभाव में प्रकट है वह परमेश्वर का प्रेम है—यह बिलकुल सही है! जब कलीसिया का निर्माण अपने चरम पर पहुँच गया तो परमेश्वर ने सेवाकर्ताओं के कार्य का चरण किया और मनुष्य को अथाह कुण्ड में डाल दिया। सेवाकर्ताओं के समय के सभी वचन शाप थे: तुम्हारी देह के शाप, तुम्हारे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के शाप, और तुमसे जुड़ी उन चीजों के शाप जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं करतीं। उस कदम पर परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य भव्य रूप में प्रकट हुआ, जिसके ठीक बाद परमेश्वर ने ताड़ना के कार्य का कदम उठाया, और उसके बाद मृत्यु का परीक्षण आया। ऐसे कार्य में, मनुष्य ने परमेश्वर के क्रोध, भव्यता, न्याय, और ताड़ना को देखा, परंतु साथ ही उसने परमेश्वर के अनुग्रह, उसके प्रेम और दया को भी देखा; जो कुछ भी परमेश्वर ने किया, और वह सब जो उसके स्वभाव के रूप में प्रकट हुआ, वह मनुष्य के प्रति उसका प्रेम था, और जो कुछ परमेश्वर ने किया वह मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। उसने ऐसा मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए किया, और उसने मनुष्य के आध्यात्मिक कद के अनुसार उसकी जरूरतें पूरी कीं। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता तो मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आने में असमर्थ होता, और परमेश्वर के सच्चेचेहरे को देखने का उसके पास कोई तरीका नहीं होता। जब से मनुष्य ने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना आरंभ किया, तब से आज तक परमेश्वर ने मनुष्य के आध्यात्मिक कद के अनुसार धीरे-धीरे उसकी जरूरतें पूरी की हैं, जिससे मनुष्य आंतरिक रूप से धीरे-धीरे उसको जान गया है। वर्तमान समय तक पहुँचने पर ही मनुष्य अनुभव करता है कि परमेश्वर का न्याय कितना अद्भुत है। सृष्टि के समय से लेकर आज तक, सेवाकर्ताओं के कार्य का कदम, शाप के कार्य की पहली घटना थी। मनुष्य को अथाह कुण्ड में भेजकर शापित किया गया था। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता, तो आज मनुष्य के पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं होता; यह केवल शाप के द्वारा ही था कि मनुष्य आधिकारिक रूप से परमेश्वर के स्वभाव को देख पाया। सेवाकर्ताओं के परीक्षण के माध्यम से मनुष्य को उजागर किया गया। उसने देखा कि उसकी वफ़ादारी स्वीकार्य नहीं थी, उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था, वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ था, और हर समय परमेश्वर को संतुष्ट करने के उसके दावे शब्दों से बढ़कर कुछ नहीं थे। यद्यपि सेवाकर्ताओं के कार्य के कदम में परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, फिर भी अब पीछे मुड़कर देखें तो परमेश्वर के कार्य का वह कदम अद्भुत था: यह मनुष्य के लिए एक बड़ा निर्णायक मोड़ और उसके जीवन स्वभाव में बड़ा बदलाव लेकर आया। सेवाकर्ताओं के समय से पहले मनुष्य जीवन के अनुसरण, परमेश्वर में विश्वास करने के अर्थ, या परमेश्वर के कार्य की बुद्धि के बारे में कुछ नहीं समझता था, और न ही उसने यह समझा कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य को परख सकता है। सेवाकर्ताओं के समय से लेकर आज तक, मनुष्य देखता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अद्भुत है—यह मनुष्य के लिए अथाह है। अपने दिमाग में वह यह कल्पना करने में असमर्थ है कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, और वह यह भी देखता है कि उसका आध्यात्मिक कद कितना छोटा है और वह बहुत हद तक अवज्ञाकारी है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, तो वह एक प्रभाव को प्राप्त करने के लिए था, और उसने मनुष्य को मार नहीं डाला। यद्यपि उसने मनुष्य को शापित किया, उसने ऐसा वचनों के द्वारा किया, और उसके शाप वास्तव में मनुष्य पर नहीं पड़े, क्योंकि जिसे परमेश्वर ने शापित किया वह मनुष्य की अवज्ञा थी, इसलिए उसके शापों के वचन भी मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए थे। चाहे परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे या उसे शाप दे, ये दोनों ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं : दोनों का उपयोग मनुष्य के भीतर की विकृतियों के परिष्कार के लिए किया जाता है। इस माध्यम से मनुष्य का शोधन किया जाता है, और मनुष्य में जिस चीज़ की कमी होती है उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य के द्वारा पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे यह कठोर शब्द हों, न्याय हो या ताड़ना हो—मनुष्य को पूर्ण बनाता है और बिलकुल उचित होता है। युगों-युगों में कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम लोगों के भीतर कार्य करता है ताकि तुम उसकी बुद्धि को सराहो। यद्यपि तुम लोगों ने अपने भीतर कुछ कष्ट सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय स्थिर और शांत महसूस करते हैं; यह तुम्हारे लिए आशीष है कि तुम परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद ले सकते हो। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम भविष्य में क्या प्राप्त कर सकते हो, आज अपने भीतर परमेश्वर के जिस कार्य को तुम देखते हो, वह प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और उसके शोधन का अनुभव नहीं करता, तो उसके कार्यकलाप और उसका उत्साह सदैव सतही रहेंगे, और उसका स्वभाव सदैव अपरिवर्तित रहेगा। क्या इसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया माना जा सकता है? यद्यपि आज भी मनुष्य के भीतर बहुत कुछ है जो काफी अहंकारी और दंभी है, फिर भी मनुष्य का स्वभाव पहले की तुलना में बहुत ज्यादा स्थिर है। तुम्हारे प्रति परमेश्वर का व्यवहार तुम्हें बचाने के लिए है, और हो सकता है कि यद्यपि तुम इस समय कुछ पीड़ा महसूस करो, फिर भी एक ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारे स्वभाव में बदलाव आएगा। उस समय, तुम पीछे मुड़कर देखने पर पाओगे कि परमेश्वर का कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण है और उस समय तुम परमेश्वर की इच्छा को सही मायने में समझ पाओगे। आज कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, परंतु यह वास्तविकता नहीं है, वास्तव में वे झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि वर्तमान में उन्हें अभी यह समझना शेष है कि क्या परमेश्वर की इच्छा मनुष्य को बचाने की है या मनुष्य को शाप देने की है। शायद तुम इसे अभी स्पष्ट नहीं देख सकते, परंतु एक दिन आएगा जब तुम देखोगे कि वह दिन आ गया है जब परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है, और परमेश्वर से प्रेम करना कितना अर्थपूर्ण है, जिससे तुम मानवीय जीवन को जान सकोगे, और तुम्हारी देह परमेश्वर-प्रेम की दुनिया में रहेगी, तुम्हारी आत्मा स्वतंत्र कर दी जाएगी, तुम्हारा जीवन आनंदमय हो जाएगा, और तुम सदैव परमेश्वर के समीप रहोगे और उस पर भरोसा करोगे। उस समय, तुम सही मायने में जान जाओगे कि परमेश्वर का कार्य आज कितना मूल्यवान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर का प्रेम ऐसा नहीं है जिसकी कल्पना मनुष्य अपने मन में कर सके। लोग इस प्रेम की कल्पना नहीं कर सकते, उन्हें अपनी शिक्षा और ज्ञान से इस शब्द की व्याख्या नहीं करनी चाहिए, इसे समझने और अनुभव करने के लिए किसी अन्य विधि का उपयोग करना चाहिए। अंतत: तुम लोगों को समझ में आ जाता है कि परमेश्वर का प्रेम सांसारिक लोगों द्वारा बताए गए प्रेम से अलग है, कि परमेश्वर का सच्चा प्रेम अन्य सभी चीज़ों से अलग है, मनुष्यों द्वारा समझे जाने वाले प्रेम से अलग है। तो परमेश्वर का यह प्रेम आखिर है क्या? सबसे पहले तो, तुम इसमें इंसानी अवधारणाओं और कल्पनाओं को बीच में मत लाओ। माँ के प्रेम को ही लो : अपने बच्चों के लिए एक माँ का प्रेम बिना शर्त होता है, उसमें सुरक्षा और स्नेह होता है। अभी की स्थिति में, मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम में क्या तुम लोग माँ के प्रेम जैसी संवेदना और आशय की अनुभूति करते हो? (हां।) फिर तो कुछ गड़बड़ है-यह गलत है। तुम्हें परमेश्वर के प्रेम में और अपने माता-पिता, पति, पत्नी, बच्चों, रिश्तेदारों के प्रति प्रेम में, दोस्तों के प्रति चिंता में अंतर करना चाहिए और परमेश्वर के प्रेम को नए सिरे से जानना चाहिए? परमेश्वर का प्रेम आखिर है क्या? परमेश्वर के प्रेम में कोई भावना नहीं होती और उस पर रक्त-संबंधों का कोई प्रभाव नहीं होता। यह शुद्ध और सरल प्रेम होता है। तो लोगों को परमेश्वर के प्रेम को कैसे समझना चाहिए? हम परमेश्वर के प्रेम पर चर्चा क्यों कर रहे हैं? परमेश्वर का प्रेम परमेश्वर के कार्य में निहित है, ताकि लोग इसे मानें, स्वीकार करें एवं इसका अनुभव करें और अंततः महसूस करें कि यह परमेश्वर का प्रेम है और जानें कि ये खोखले शब्द नहीं हैं, न ही यह परमेश्वर के व्यवहार का कोई रूप है, बल्कि सत्य है। जब तुम इसे सत्य के रूप में स्वीकार कर लेते हो, तो तुम इससे परमेश्वर के सार के इस पहलू को पहचान सकते हो। यदि तुम इसे व्यवहार का कोई रूप मानते हो, तो इसे पहचानने में तुम्हें कठिनाई होगी। "व्यवहार" से क्या अभिप्राय है? उदाहरण के तौर पर माताओं को ही लो : वे अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए अपना यौवन, अपना खून-पसीना और आँसू सब दाँव पर लगा देती हैं, यह सोचे बिना कि उनके बच्चों ने सही किया है या गलत या वे किस रास्ते पर जा रहे हैं, वे उन्हें अपना सब-कुछ दे देती हैं। एक माँ निःस्वार्थ भाव से, कभी भी बच्चे को सही रास्ते पर चलना नहीं सिखाती, मदद या मार्गदर्शन नहीं देती, बस उसकी देखभाल करती है, उसे प्रेम करती है और उसकी रक्षा करती है और वो ये सब इस हद तक करती है कि बच्चा बता नहीं पाता कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसा होता है एक मां का प्यार या किसी भी तरह के गहरे लगाव, भावनाओं और इंसानी रिश्तों से पैदा होने वाला प्यार। लेकिन परमेश्वर का प्रेम इससे बिल्कुल विपरीत होता है : यदि परमेश्वर तुम से प्रेम करता है, तो वह अक्सर तुम्हें ताड़ना देकर और तुम्हें अनुशासित करके अपना प्रेम व्यक्त करता है, तुम्हारी काट-छाँट और निपटारा करके इसे व्यक्त करता है। इससे तुम्हारे लिए चीजें असहज हो सकती हैं, तुम्हारा समय ताड़ना और अनुशासन में गुज़र सकता है, लेकिन एक बार जब तुम इसका अनुभव कर लेते हो, तो तुम्हें पता चलता है कि तुमने बहुत कुछ सीखा है, लोगों से मिलते-जुलते समय तुम उन्हें पहचान सकते हो, तुम समझदार बन जाते हो, तुम यह भी जान लेते हो कि तुमने थोड़ा-बहुत सत्य समझ लिया है। यदि परमेश्वर का प्रेम एक माँ या पिता के प्रेम जैसा होता, जैसा कि तुम्हें लगता है, अगर वह देखभाल में बहुत ही सच्चा होता, और निरंतर अनुग्रहशील होता, तो क्या तुम ये चीजें हासिल कर पाते? नहीं कर पाते। इसलिए, लोगों को परमेश्वर के कार्य में प्रकट परमेश्वर के प्रेम को सत्य के दृष्टिकोण से देखना चाहिए और उसमें सत्य की खोज करनी चाहिए। यदि वे सत्य की खोज नहीं करते हैं, तो कोई भ्रष्ट प्रवृति का व्यक्ति, अचानक यह कैसे समझ सकता है कि परमेश्वर का प्रेम क्या है, मनुष्य में उसके कार्य का उद्देश्य क्या है और उसके विचारशील इरादे कहाँ हैं? लोग इन बातों को कभी नहीं समझेंगे। यह परमेश्वर के काम के एक हिस्से से संबंधित है, परमेश्वर के सार का एक पहलू है जिसे लोगों द्वारा गलत समझ लिए जाने की प्रबल संभावना है और जिसे समझना और सराहना बेहद कठिन है; इसी से लोग गहराई से, सहानुभूतिपूर्वक और व्यावहारिक रूप से जुड़ सकते हैं। आमतौर पर, प्यार का मतलब होता है लोगों को वह देना जो उन्हें पसंद है, उन्हें कुछ कड़वा न देना जब वे कुछ मीठा चाहते हैं या किसी बीमारी का इलाज करने के लिए उन्हें कुछ कड़वा देना; संक्षेप में, इसमें मनुष्य का स्वार्थ, भावनाएं और गहरा लगाव शामिल है; इसमें उद्देश्य और प्रेरणा का एक पहलू शामिल है। लेकिन परमेश्वर चाहे तुममें कुछ भी करे, भले ही तुम उसे गलत समझो, मन ही मन उससे शिकायत करो, परमेश्वर बिना थके तुममें धैर्य के साथ कार्य करता रहेगा। परमेश्वर का इस प्रकार कार्य करने का अंतिम उद्देश्य क्या है? वह इस तरीके से तुम्हें जगाना चाहता है या कभी कोई ऐसा दिन आए जब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझो-लेकिन जब परमेश्वर उस परिणाम को देखता है, तो उसने वास्तव में कुछ भी प्राप्त नहीं किया है। और मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि तुम्हारा सब कुछ परमेश्वर से आता है। परमेश्वर को कुछ हासिल करने की जरूरत नहीं है। वह केवल यह चाहता है कि तुम ठीक से अनुसरण करो और जब वह अपना कार्य कर रहा हो तो तुम उसके अनुसार प्रवेश करो और अंतत: सत्य-वास्तविकता को जी पाओ, इंसान की तरह जी पाओ और फिर कभी शैतान तुम्हें धोखा न दे सके, गुमराह न कर सके और प्रलोभन न दे सके, तुम शैतान से मुँह मोड़कर, परमेश्वर का आज्ञापालन करो और उसका भय मानो, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त करे और उसका विशाल कार्य संपन्न हो जाए। यह परमेश्वर का प्रेम और कार्य है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हो, यदि तुम उसका प्रेम सच में अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविकता की गहराई में जाना चाहिए, तुम्हें वास्तविक जीवन की गहराई में जाना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर जो भी करता है वह सब प्रेम और उद्धार है, कि वह सब कुछ इसलिए करता है ताकि जो भी अशुद्ध है लोग उसे पीछे छोड़ पाएँ, और मनुष्य के भीतर परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर पाने वाली चीजों को शुद्ध कर पाएँ। परमेश्वर मनुष्य को पोषण प्रदान करने के लिए वचनों का उपयोग करता है; वह लोगों के अनुभव के लिए वास्तविक जीवन की परिस्थितियाँ सँजोता है, और यदि लोग परमेश्वर के अनेक वचनों को खाते और पीते हैं, और फिर जब वे उन्हें वास्तव में अभ्यास में लाते हैं, तब वे परमेश्वर के अनेक वचनों का उपयोग करके अपने जीवन की सभी कठिनाइयाँ हल कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की गहराई में जाने के लिए तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन होने चाहिए; यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हो और परमेश्वर के कार्य से वंचित हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी खाओगे और पीओगे नहीं, तो जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा तब तुम भौंचक्के रह जाओगे। तुम बस इतना जानते हो कि तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, लेकिन तुम भेद कर पाने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास अभ्यास का मार्ग नहीं है; तुम मंदबुद्धि और भ्रमित हो, और कभी-कभी तुम यह तक मान लेते हो कि देह को संतुष्ट करके तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हो—यह सब परमेश्वर के वचनों को न खाने और पीने का ही परिणाम है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि तुम परमेश्वर के वचनों की मदद के बिना हो, और वास्तविकता के भीतर बस टटोलते भर हो, तो तुम अभ्यास का मार्ग खोजने में मूलतः असमर्थ हो। ऐसे लोग समझते ही नहीं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, परमेश्वर से प्रेम करने का अर्थ तो वे और भी नहीं समझते। यदि परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन का उपयोग करके तुम प्रायः प्रार्थना, खोजबीन और तलाश करते हो, और इसके माध्यम से तुम उसका पता लगाते हो जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना है, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के लिए अवसरों को ढूँढ़ पाते हो, परमेश्वर के साथ सचमुच सहयोग करते हो, और मंदबुद्धि तथा भ्रमित नहीं हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास एक मार्ग होगा और तुम परमेश्वर को सच में संतुष्ट कर पाओगे। जब तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर लिया होगा, तब तुम्हारे भीतर परमेश्वर का मार्गदर्शन होगा और तुम परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से धन्य किए जाओगे, जो तुम्हें आनंद की अनुभूति देगा : तुम विशेष रूप से सम्मानित महसूस करोगे कि तुमने परमेश्वर को संतुष्ट किया है, तुम अपने भीतर विशेष रूप से प्रसन्नचित्त महसूस करोगे, और तुम्हारा हृदय शुद्ध और शांत होगा। तुम्हारी अंतरात्मा को सुकून मिलेगा और वह दोषारोपणों से मुक्त होगी, और जब तुम अपने भाइयों और बहनों को देखोगे तो मन में प्रसन्नता महसूस करोगे। परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने का यही अर्थ है, और केवल यही परमेश्वर का सचमुच आनंद लेना है। लोगों द्वारा परमेश्वर के प्रेम का आनंद अनुभव के माध्यम से प्राप्त किया जाता है : कष्ट का अनुभव करके, और सत्य को अभ्यास में लाने का अनुभव करके, वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं। यदि तुम केवल कहते हो कि परमेश्वर तुमसे वास्तव में प्रेम करता है, कि परमेश्वर ने लोगों की ख़ातिर सचमुच भारी मूल्य चुकाया है, कि उसने धैर्यपूर्वक और कृपापूर्वक इतने सारे वचन कहे हैं और वह हमेशा लोगों को बचाता है, तो तुम्हारे द्वारा इन शब्दों को कहा जाना परमेश्वर के आनंद का बस एक पक्ष है। तथापि इससे भी अधिक बड़ा आनंद—वास्तविक आनंद—तब है जब लोग अपने वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाते हैं, जिसके बाद वे अपने हृदय में शांत और शुद्ध महसूस करते हैं। वे अपने भीतर बहुत ही द्रवित महसूस करते हैं, और यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर सर्वाधिक प्रेम करने योग्य है। तुम महसूस करोगे कि जो कीमत तुमने चुकाई है, वह सर्वथा उपयुक्त है। अपने प्रयासों में भारी कीमत चुकाने के बाद तुम अपने भीतर विशेष रूप से प्रसन्नचित्त महसूस करोगे : तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले रहे हो और तुम यह समझ जाओगे कि परमेश्वर ने लोगों में उद्धार का कार्य किया है, कि उसके द्वारा लोगों के शुद्धिकरण का अभीष्ट उन्हें शुद्ध करना है, और परमेश्वर यह परखने के लिए कि लोग उसे सचमुच प्रेम करते हैं या नहीं, उनकी परीक्षा लेता है। यदि तुम हमेशा सत्य को इस तरह अभ्यास में लाते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के बहुत-से कार्य का स्पष्ट ज्ञान विकसित कर लोगे, और उस समय तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन तुम्हारे सामने शीशे की तरह साफ हैं। यदि तुम कई सत्य स्पष्ट रूप से समझ सकते हो, तो तुम महसूस करोगे कि सभी विषयों को अभ्यास में लाना आसान है, कि तुम किसी भी विषय पर विजय पा सकते हो और किसी भी प्रलोभन पर विजय पा सकते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है, जो तुम्हें अत्यधिक मुक्त कर देगा और स्वतंत्र कर देगा। इस क्षण तुम परमेश्वर के प्रेम का आनंद ले रहे होगे और परमेश्वर का सच्चा प्रेम तुम तक पहुँच गया होगा। परमेश्वर उन्हें धन्य करता है जिनके पास दर्शन होते हैं, जिनके पास सत्य होता है, जिनके पास ज्ञान होता है, और जो उससे सचमुच प्रेम करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हैं, तो उन्हें वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाना होगा, उन्हें पीड़ा सहने और जिससे वे प्यार करते हैं उसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए त्याग देने के लिए तैयार रहना होगा, और आँखों में आँसू होने के बावजूद उन्हें परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना होगा। इस तरह, परमेश्वर तुम्हें निश्चित रूप से धन्य करेगा, और यदि तुम ऐसे कष्ट सहोगे, तो इसके बाद पवित्र आत्मा का कार्य शुरू होगा। वास्तविक जीवन के माध्यम से, और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के माध्यम से लोग परमेश्वर की सुंदरता को देख पाने में सक्षम होते हैं, और यदि उन्होंने परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चखा है, तभी वे सचमुच उससे प्रेम कर सकते हैं।

तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक सत्य तुम्हारे पास होता है; तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे पास होता है; और तुम जितना अधिक सत्य को अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हो। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें उत्तरोत्तर देखने में सक्षम बनाएगा, ठीक वैसे ही जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाई हैं, बल्कि, इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को उत्तराधिकार में अपना प्रेम देने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : "क्या स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते और चलते-फिरते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें तो लोगों का प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें उसे वास्तविक जीवन में खोजना और ढूँढ़ना चाहिए और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। ऐसे भी अवसर हो सकते हैं जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट न कर पाओ। वह इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें अधिक प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों की सृष्टि कर सकता है, कि वह देहधारी हुआ ही इसलिए है कि लोग वास्तव में उसे देख सकें और वास्तव में उसके साथ जुड़ सकें; तुम देखोगे कि वह मनुष्यों के बीच चलने में सक्षम है, और उसका पवित्र आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकता है, और उन्हें अपनी सुंदरता देखने और अपना अनुशासन, अपनी ताड़ना और अपने आशीष अनुभव करने दे सकता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम डाँट-फटकार झेल पाओगे और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें छोड़ देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा छोड़े जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हारे मन में ये भावनाएँ आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मानवजाति के प्रति उसके रवैये को समझने में वास्तव में समर्थ होते हो, जब तुम प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को वास्तव में समझ सकते हो, तब तुम सृजनकर्ता द्वारा सृजित हर एक मनुष्य पर व्यय की गई उसकी लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तब तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे। वे कौन-से दो शब्द हैं? कुछ लोग कहते हैं "निस्स्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "परोपकारी।" इन दोनों में से "परोपकारी" शब्द परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। इस शब्द का उपयोग लोग किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए करते हैं, जो उदारमना या व्यापक सोच वाला हो। मैं इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, बिना सिद्धांतों की परवाह किए दान देने को संदर्भित करता है। यह एक अत्यधिक भावुकतापूर्ण झुकाव है, जो मूर्ख और भ्रमित लोगों के लिए आम है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से ईशनिंदा का संकेतार्थ होता है। मेरे पास यहाँ दो शब्द हैं, जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं। वे दो शब्द कौन-से हैं? पहला शब्द है "विशाल।" क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा शब्द है "अनंत।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है, जिसका मैं परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए उपयोग करता हूँ। शब्दशः लेने पर, "विशाल" शब्द किसी चीज़ की मात्रा और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो, वह ऐसी होती है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मौजूद है—वह कोई अमूर्त चीज़ नहीं है, बल्कि ऐसी चीज़ है, जो लोगों को अपेक्षाकृत सटीक और व्यावहारिक रूप में विचार दे सकती है। चाहे तुम इसे द्विआयामी दृष्टिकोण से देखो या त्रिआयामी दृष्टिकोण से; तुम्हें इसकी मौजूदगी की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में मौजूद है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "विशाल" शब्द का उपयोग करना उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित करने का प्रयास लग सकता है, किंतु यह इस बात का एहसास भी देता है कि उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित किया जा सकता, क्योंकि उसका प्रेम खोखला नहीं है, और न ही वह कोई किंवदंती है। बल्कि वह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा शासित सभी प्राणियों द्वारा साझा किया जाता है, ऐसी चीज़, जिसका सभी प्राणियों द्वारा विभिन्न मात्राओं में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से आनंद लिया जाता है। यद्यपि लोग उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी यह प्रेम सभी के जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रकट होकर उनके लिए पोषण और जीवन लाता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम का मान करते और उसकी गवाही देते हैं, जिसका वे हर क्षण आनंद लेते हैं। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य ऐसी चीज़ है, जिसकी थाह पाना मनुष्यों के लिए कठिन है, और ऐसे ही सभी चीज़ों के लिए, और विशेष रूप से मानवजाति के लिए, परमेश्वर के विचार हैं। अर्थात्, परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए बहाए गए लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता। उस मानवजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और वज़न को कोई नहीं बूझ सकता, कोई नहीं समझ सकता, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया है। परमेश्वर के प्रेम को विशाल बताना उसके अस्तित्व के विस्तार और सच्चाई को समझने-बूझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है, ताकि लोग "सृजनकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग "सृष्टि" नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। "अनंत" शब्द आम तौर पर किस चीज़ का वर्णन करता है? यह सामान्यतः महासागर या ब्रहांड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे "अनंत ब्रहांड", या "अनंत महासागर"। ब्रहांड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है; वह ऐसी चीज़ है, जो मनुष्य की कल्पना को पकड़ लेती है, जिसके प्रति वे बहुत प्रशंसा महसूस करते हैं। उसका रहस्य और गहराई दृष्टि के भीतर हैं, किंतु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तो तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और चीज़ों को धारण करने की उसकी महान क्षमता महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "अनंत" शब्द का उपयोग किया है, ताकि लोगों को यह महसूस करने में मदद मिल सके कि उसके प्रेम की अगाध सुंदरता महसूस करना कितना बहुमूल्य है, और कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनंत और व्यापक है। मैंने इस शब्द का प्रयोग लोगों को परमेश्वर के प्रेम की पवित्रता, और उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी गरिमा और अनुल्लंघनीयता महसूस करने में सहायता करने के लिए किया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "विनाश" का इस्तेमाल मानवजाति की अवज्ञा उजागर करने के लिए किया गया है।

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