परिचय

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है, "अपनी नियति के लिए, तुम लोगों को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहिए। कहने का अर्थ है, चूँकि तुम लोग यह मानते हो कि तुम परमेश्वर के घर के एक सदस्य हो, तो तुम्हें परमेश्वर के मन को शांति प्रदान करनी चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सिद्धांतवादी और सत्य के अनुरूप होना चाहिए। यदि यह तुम्हारी क्षमता के परे है, तो परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा और तुम्हें अस्वीकृत कर देगा, और हर इंसान तुम्हें ठुकरा देगा। अगर एक बार तुम ऐसी दुर्दशा में पड़ गए, तो तुम्हारी गिनती परमेश्वर के घर में नहीं की जा सकती। परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं किए जाने का यही अर्थ है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। परमेश्वर के वचनों का यह खंड एक महत्वपूर्ण सत्य को स्पष्ट करता है: परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, यदि तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारा अनुमोदन करे, तो तुम्हें अवश्य "परमेश्वर के मन को शांति प्रदान करनी चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सिद्धांतवादी और सत्य के अनुरूप होना चाहिए।" केवल यही, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, बचाए और सिद्ध किए जाने का मानक है।

यह पुस्तक सत्य का अभ्यास करने के एक सौ सत्तर सिद्धांतों को सूचीबद्ध करती है, और परमेश्वर पर विश्वास करते समय सत्य को व्यवहार में लाने के विभिन्न पहलुओं का स्पर्श करती है। ये परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के लिए बहुत लाभदायक हैं। यदि तुम, अपने जीवन के अनुभव में, इन 170 सिद्धांतों का उपयोग करना सीख सकते हो, तो सच्चाई का अभ्यास करना तुम्हारे लिए आसान होगा। इनमें से अधिकांश सिद्धांतों को केवल चार में सारांशित किया जा सकता है—पूरी तरह से तो नहीं, लेकिन जब तक तुम इस तरीके से सत्य का अभ्यास कर सकते हो, तब तक तुम उस स्थिति तक पहुँच सकते हो जहाँ तुम सिद्धांत के अनुसार कार्य कर रहे होगे। जैसे-जैसे लोगों का अनुभव गहरा होता जाता है, वे ऐसे सिद्धांतों को बटोर सकते हैं जो और भी ठोस, सटीक और परिपूर्ण होते हैं; यही सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने का मार्ग है।

अगला: 1. परमेश्वर में विश्वास करने के सिद्धांत

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