124. दूसरों के साथ बातचीत करने के सिद्धांत

(1) व्यक्ति को दूसरों के साथ बातचीत करने में सिद्धांतवादी होना चाहिए। उसे उन लोगों के साथ बातचीत करनी चाहिए जो सत्य से प्रेम करते हैं, सही रास्ते पर चलते हैं, और अच्छे काम में संलग्न होते हैं, और कभी भी भेड़ियों और गीदड़ों की संगति नहीं करनी चाहिए;

(2) लोगों को ईमानदार होना चाहिए, आपसी सम्मान, समझ, सहनशीलता और धैर्य में समर्थ होना चाहिए, और नेकी से एक दूसरे की मदद करने में सक्षम होना चाहिए। एक दूसरे से प्रेम करने का यही अर्थ होता है;

(3) दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना सीखो, न तो उन्हें बहुत ऊँचा आंकों और न ही नीचा। उनकी कमियों और उल्लंघनों को प्रेमपूर्ण सहायता के साथ संबोधित करो;

(4) तुम्हें प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति की पहचान करना सीखना चाहिए। उन लोगों के साथ अधिक संपर्क में आओ जो सत्य से प्रेम करते हैं, और धोखेबाज़ और बुरे लोगों से, जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, दूर रहो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सामान्य लोगों के स्वभाव में कोई कुटिलता या धोखेबाज़ी नहीं होती, लोगों का एक-दूसरे के साथ एक सामान्य संबंध होता है, वे अकेले नहीं खड़े होते, और उनका जीवन न तो साधारण होता है और न ही पतनोन्मुख। इसलिए भी, परमेश्वर सभी के बीच ऊँचा है, उसके वचन मनुष्यों के बीच व्याप्त हैं, लोग एक-दूसरे के साथ शांति से, परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हैं, पृथ्वी, शैतान के हस्तक्षेप के बिना, सद्भाव से भरी है, और मनुष्यों के बीच परमेश्वर की महिमा बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे लोग स्वर्गदूतों की तरह हैं: शुद्ध, जोशपूर्ण, परमेश्वर के बारे में कभी भी शिकायत नहीं करने वाले, और पृथ्वी पर पूरी तरह से परमेश्वर की महिमा के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित करने वाले।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 16' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के साथ उचित संबंध बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ़ मुड़ना चाहिए। इस बुनियाद पर, तुम दूसरे लोगों के साथ भी उचित संबंध रखोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा उचित संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ऊर्जा लगा दो, वह मानव के जीवनदर्शन से संबंधित ही होगा। तुम दूसरे लोगों के बीच एक मानव-दृष्टिकोण और मानव-दर्शन के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहे हो, ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे, लेकिन तुम लोगों के साथ उचित संबंध स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचनों का अनुसरण नहीं कर रहे। अगर तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, लेकिन परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर को देने और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो स्वाभाविक रूप से सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सही हो जाएँगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध उचित हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देता, तो उसकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं समझेगा और परमेश्वर के साथ उसके संबंध कभी उचित नहीं होंगे; इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव कभी नहीं बदलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

लोगों के बीच उचित संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी उचित नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो। तुम्हारे बीच ऐसे कितने लोग हैं? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध वास्तव में उचित हैं? वे किस बुनियाद पर बने हैं? तुम्हारे भीतर कितने जीवन-दर्शन हैं? क्या तुमने उन्हें त्याग दिया है? यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाता, तो तुम परमेश्वर के नहीं हो—तुम शैतान से आते हो, और अंत में शैतान के पास ही लौट जाओगे। तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होने के योग्य नहीं हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर के घर में लोग कैसे जीते हैं और क्या प्रकट करते हैं, इसके सिद्धांत और नींव के रूप में, सभी स्थितियों में, सत्य होना चाहिए। यदि तुम इस तरह के परिवेश में रहते हो, तो लोगों में समानता होती है, और परमेश्वर के साथ हर किसी का संबंध एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध होता है; इस तरह, लोगों के बीच अंत:क्रियाएँ बहुत सरल और आसान हो जाती हैं। तभी लोग अपने जीने के तरीके में वास्तव में मुक्त और स्वाधीन हो सकते हैं और वास्तव में खुश रह सकते हैं। तुम लोगों ने अब तक इसे हासिल किया है या नहीं? (नहीं।) ठीक है, तो तुम लोग किस तरह जीते हो? (शैतान के दर्शनों और एक भ्रष्ट स्वभाव से।) तुम लोग अभी तक उन जीवन-दर्शनों से मुक्त नहीं हुए हो, या शोहरत और ऐश्वर्य के लिए संघर्ष के, ईर्ष्या और कलह के जीवन-परिवेश से खुद को निकाल नहीं पाए हो; तुम लोगों को एक पूरी तरह से भ्रष्ट और शैतानी स्वभाव शासित और नियंत्रित करता है। इसलिए, तुम लोगों के जीने का तरीका बहुत थकाने वाला है, और तुम अक्सर ऐसा महसूस करते हो: "ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के घर में जीवन सांसारिक जीवन जैसा ही है? जीवन यहाँ भी थकाऊ है, और मुझे हमेशा अपने हर काम में सावधानी बरतनी पड़ती है, और मैं अपना काम करने से पहले हमेशा लोगों के हाव-भाव का अवलोकन करता हूँ।" यह स्थिति कैसे आई? ऐसा इसलिए हुआ, क्यों कि तुम्हारे व्यवहार के सिद्धांत, चीज़ों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण और उन्हें सँभालने के तुम्हारे तरीके, ये सभी गलत हैं; तुम सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते हो। सभी मामलों की शुरुआ तें और बुनियादें होती हैं—इसलिए, वह सबसे पहली, बुनियादी बात क्या है, जो तुम्हें हल करनी चाहिए? पहले तुम्हें अपने विचारों, अपने खयालों, अपने ज्ञान और अपने दृष्टिकोणों का विश्लेषण करना और उन्हें जानना चाहिए। इसके बाद क्या करना चाहिए? (उन परिप्रेक्ष्यों की तलाश करो, जिनके साथ तुम्हें अपने आसपास की चीजों को देखना चाहिए, तुम्हें उनसे कैसे निपटना चाहिए, और अपने कार्यों में तुम्हें कौन-से सिद्धांत लागू करने चाहिए।) इसमें अभ्यास शामिल है। वास्तविक जीवन में, मनुष्यों के बीच अंत:क्रिया का एक सबसे बुनियादी सिद्धांत होना चाहिए: हर किसी को अपना कर्तव्य निभाते हुए एक सृजित प्राणी के उचित स्थान पर खड़ा होना चाहिए; कोई भी किसी दूसरे से बेहतर या बदतर नहीं है। सभी लोगों को सत्य के सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए, अपने जीवन-दर्शनों से, शैतान के सिद्धांतों और काम करने के तरीकों से मुक्त हो जाना चाहिए, और दूसरों के साथ सत्य के सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए और उनसे यह माँग करनी चाहिए कि वे भी उन्हीं सिद्धांतों के अनुसार उनसे व्यवहार करें। फ़िलहाल, यही वह परिवेश है जिसे तुम लोगों के बीच बनाया जाना चाहिए; पूरी कलीसिया में, सभी भाइयों और बहनों के बीच, उस तरह का परिवेश निर्मित किया जाना चाहिए—जिस तरह का परिवेश परमेश्वर के परिवार में होना चाहिए और जो भाइयों और बहनों के बीच मौजूद होना चाहिए, ताकि न तो तुम्हें और न ही किसी और को प्रतिबंधित किया जाए। तुम दूसरों को प्रतिबंधित नहीं करो, और वे तुम्हें प्रतिबंधित न करें—यह अभ्यास का एक और सिद्धांत है, और यह सामान्य अंतर्वैयक्तिक संबंधों को निभाने का सबसे बुनियादी सिद्धांत है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करने में खासतौर से क्या-क्या शामिल है? उदाहरण के लिए, अगर दूसरों के साथ व्यवहार की बात करें, तो इसके पीछे क्या सिद्धांत हैं कि तुम हैसियत वालों के साथ और बिना हैसियत वालों के साथ किस तरह व्यवहार करोगे, और आम भाइयों और बहनों और विभिन्न स्तरों के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ? तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकते जैसाकि अविश्वासी लोग दूसरे लोगों के साथ करते हैं; तुम्हें निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए। तुम इसके नजदीक और उससे दूर नहीं हो सकते; न ही तुम कोई गुट या गिरोह बना सकते हो। तुम लोगों पर सिर्फ इसलिए धौंस नहीं जमा सकते क्योंकि तुम उन्हें पसंद नहीं करते, या उन लोगों की खुशामद नहीं कर सकते जो मजबूत स्थिति में हैं। सिद्धांतों का यही मतलब है। तुम्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में सिद्धांतवादी होना चाहिए; तुम्हें उन सबसे निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। अगर तुम अच्छे लगने वाले लोगों को लुभाकर अपनी तरफ कर लेते हो और मुश्किल लगने वाले लोगों को बाहर रखते हो, तो क्या तुममें सिद्धांतों की कमी नहीं है? यह दुनिया में जीने के लिए अविश्वासियों का दर्शन है, और लोगों के साथ उनके व्यवहार के अंदाज के पीछे यही सिद्धांत है। यह एक शैतानी स्वभाव भी है और शैतानी तर्कशास्त्र भी। तुम्हें परमेश्वर के परिवार के लोगों के साथ किस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना चाहिए? (हर एक भाई-बहन के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।) तुम उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार कैसे करोगे? हर किसी में छोटे-मोटे दोष और कमियां होती हैं, साथ ही उनमें कुछ विलक्षणताएं भी होती हैं; सभी लोगों में दंभ, कमज़ोरी और ऐसी बातें होती हैं जिनकी उनमें कमी होती है। तुम्हें प्यार से उनकी सहायता करनी चाहिए, सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए, तुम्हें बहुत कठोर नहीं बनना चाहिए या हर छोटी सी बात का बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसे लोगों के साथ, जिनकी उम्र कम है या जिन लोगों ने ज़्यादा समय से परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया है, या जिन लोगों ने हाल ही में अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया है या जिन लोगों के कुछ ख़ास अनुरोध हैं, अगर तुम उन्हें चोटी से पकड़ लेते हो और छोड़ते नहीं हो, तो इसे ही कठोर होना कहा जाता है। तुम उन झूठे अगुवाओं और मसीह विरोधियों द्वारा किये गये बुरे कर्मों को अनदेखा कर देते हो, और फिर भी अपने भाई-बहनों में छोटी-मोटी कमियां देखने पर उनकी मदद करने से इनकार कर देते हो, इसके बजाय उन बातों का बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश करते हो और पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हो, जिसके कारण और भी लोग उनका विरोध करने लगते हैं, उनका बहिष्कार करके निष्कासित कर देते हैं। यह किस तरह का व्यवहार है? यह सिर्फ़ अपनी निजी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना, और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम नहीं होना है; यह एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दर्शाता है! यह एक उल्लंघन है! जब लोग कोई काम करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें देख रहा होता है; तुम जो भी करते हो और जैसा भी सोचते हो, वह सब देखता है! अगर तुम सिद्धांतों को ग्रहण करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सत्य को समझना होगा। एक बात जब तुम सत्य को समझ जाते हो, तब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो; अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम निश्चित ही परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाओगे। सत्य यह बताता है कि तुम्हें लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, और एक बार जब तुम इस बात को समझ जाते हो, तो तुम यह जान जाओगे कि लोगों से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह परमेश्वर के वचनों में साफ़ तौर पर दिखाया और बताया गया है। परमेश्वर मनुष्यों के साथ जिस रवैये से व्यवहार करता है, वही रवैया लोगों को एक-दूसरे के साथ अपने व्यवहार में अपनाना चाहिए। परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोग अपरिपक्व अवस्था वाले या कम उम्र के होते हैं, या उन्होंने सिर्फ़ कुछ समय के लिए परमेश्वर में विश्वास किया होता है। कुछ लोगों की प्रकृति और सार बुरे या दुर्भावनापूर्ण नहीं होते हैं, बात बस इतनी है कि वे लोग कुछ हद तक अज्ञानी होते हैं या उनमें क्षमता की कमी होती है, या वे लोग समाज के द्वारा बहुत अधिक संदूषित किए गए हैं। उन लोगों ने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसी वजह से उनके लिए कुछ मूर्खतापूर्ण चीज़ें करने या कुछ नादानी वाले काम करने से खुद को रोक पाना मुश्किल है। हालांकि, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, ऐसी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं; वह सिर्फ़ लोगों के दिलों को देखता है। अगर वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कृतसंकल्प हैं, तो वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, और यही उनका उद्देश्य है, फिर परमेश्वर उन्हें देख रहा है, उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, परमेश्वर उन्हें वह समय और अवसर दे रहा है जो उन्हें प्रवेश करने की अनुमति देता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उन्हें एक झटके से गिरा देता है या सिर बाहर निकालते ही उन्हें मारने लगता है; परमेश्वर ने कभी भी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया है। इसे देखते हुए, अगर लोग एक दूसरे के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो क्या यह उनके भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाता है? यह निश्चित तौर पर उनका भ्रष्ट स्वभाव है। तुम्हें यह देखना होगा कि परमेश्वर अज्ञानी और मूर्ख लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, वह अपरिपक्व अवस्था वाले लोगों के साथ कैसे पेश आता है, वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के सामान्य प्रकटीकरण से कैसे पेश आता है, और वह दुर्भावनापूर्ण लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार करता है। परमेश्वर के पास अलग-अलग तरह के लोगों के साथ व्यवहार करने के कई तरीके हैं, और उसके पास विभिन्न लोगों की बहुत सी परिस्थितियों को प्रबंधित करने के भी कई तरीके हैं। तुम्हें इन चीज़ों के सत्य को समझना होगा। एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तब तुम उन्हें अनुभव करने का तरीका जान जाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। तुम्हारे आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रत्येक दिन रहते हो, तुम्हें आनंद उठाना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उस व्यक्ति के प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आप को उघाड़ना, और संगति करना, सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। क्रमशः तुम अपने आप को इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक क़रीब और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर सकते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी एक ऐसी मानसिकता होती है जिसके साथ तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा रखने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय उस स्थिति और रवैये के जिसमें कि तुम एक दूसरे के साथ लड़ते हो, एक दूसरे को कुचलते हो, एक दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक दूसरे के लिए छिपे तिरस्कार या घृणा को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी अगले की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बनाता है। यह न केवल तुम्हारे पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें ग़लत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी की इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम उन्हें नापसंद करते हो, और असहज और दुखी महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोच सकते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नखरों, इन क्षुद्र भावनाओं में बंधे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे की ताक़तें क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए स्वयं में गहराई से वापस लौटना होगा। तुम्हें अपने आप में लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, फिर भी तुम दूसरों की ताक़तों से अनजान होकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, उन लोगों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग कर दूसरों को चोट पहुँचाओ और उन्हें बदतर बनाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच एक ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम लोग ये कैसा लगता है, यह महसूस करना चाहोगे?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

यदि भाई-बहनों को एक-दूसरे में विश्वास करने में सक्षम होना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और जब साथ होने पर एक-दूसरे का भरण-पोषण करना है, तो प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य अपने स्वयं के वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करनी चाहिए। यदि तू अपने स्वयं के सच्चे अनुभवों के बारे में बात नहीं करता है, और केवल आडंबर-पूर्ण बातें ही करता है, और ऐसे वचन बोलता है जो सिद्धांत संबंधी और सतही हैं, तो तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, और तू ईमानदार होने में असमर्थ है। उदाहरण के लिए, कई सालों तक साथ रहते हुए पति-पत्नी, कभी-कभी झगड़ा करते हुए, एक दूसरे के आदी होने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर तुम दोनों में सामान्य मानवता है, तो तुम हमेशा उसके साथ दिल से बात करोगी और वह तुमसे दिल से बात करेगा। जीवन में जो भी समस्याएँ तुम्हारे सामने आती हैं, तुम्हारे कार्य में जो भी समस्याएँ घटित होती हैं, दिल की गहराई में तुम जो भी सोच रहे होते हो, जिस भी तरह से तुम चीजों के समाधान की योजना बनाते हो, अपने बच्चों के लिए जो भी तुम्हारे विचार और योजनाएँ हैं—तुम अपने जीवनसाथी को हर चीज बताओगी। इस प्रकार, क्या तुम दोनों एक-दूसरे के विेशेष रूप से नजदीक और अंतरंग महसूस नहीं करोगे? अगर वह तुम्हें अपने अंतरतम विचार नहीं बताता, और घर में वेतन लाने के अलावा कुछ नहीं करता, और यदि तुम उसे अपने विचार कभी नहीं बतातीं और कभी उस पर भरोसा नहीं करतीं, तो क्या तुम दोनों के बीच भावनात्मक दूरी नहीं है? निश्चित रूप से है, तुम एक-दूसरे के विचारों या इरादों को नहीं समझते। अंततः, तुम नहीं बता सकतीं कि तुम्हारा जीवनसाथी किस तरह का व्यक्ति है, न ही वह बता सकता है कि तुम किस तरह की व्यक्ति हो; तुम उसकी जरूरतें नहीं समझतीं, न ही वह तुम्हारी जरूरतें समझता है। अगर लोगों में कोई मौखिक या आध्यात्मिक संवाद नहीं है, तो उनके बीच अंतरंगता की कोई संभावना नहीं है, और वे एक-दूसरे का पोषण या एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते। तुम लोगों ने इसका पहले अनुभव किया है, है ना? यदि तुम्हारा मित्र तुम्हें हर चीज बताता है, जो भी वह सोच रहा है उसे जाहिर करता है, और अपनी हर पीड़ा या खुशी साझा करता है, तो क्या तुम उसके साथ विशेष अंतरंगता महसूस नहीं करतीं? उसके इन चीजों को तुम्हें बताने के लिए तैयार होने का कारण यह है कि तुमने भी अपने अंतरतम विचार उसे बताए है; तुम विशेष रूप से निकट हो, और यही कारण है कि तुम एक-दूसरे से निभाने और एक-दूसरे की मदद करने में सक्षम हो। कलीसिया में भाई-बहनों के बीच इस तरह के संवाद और विचार-विनिमय के बिना सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकता। यह ईमानदार होने की अपेक्षाओं में से एक है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

तुम्हें उन लोगों के करीब जाना चाहिए जो सच बोलते हैं, जो तुम्हें तब फटकारते और बेनक़ाब कर देते हैं जब तुम इसके लायक होते हो, चाहे तुम्हारी स्थिति कुछ भी हो, फिर भी वे चाहे तुम्हें जैसे भी उजागर करें और फटकारें, वे तुम्हें मदद कर सकते और तुम पर नज़र रखते हैं। तुम्हें ऐसे लोगों के करीब जाना चाहिए; वे नेक लोग हैं जो सच्चाई की तलाश करते हैं। धोखेबाज़ लोगों की संगत की तलाश न करो जो फिसड्डी होते हैं; ऐसे लोगों से दूर रहो। यही सही तरीका है। सच्चाई का अनुसरण करने वाले नेक लोग तुम्हारी स्थिति और तुम्हारे योगदान की परवाह नहीं करते हैं; यहाँ तक कि अगर तुम उन्हें प्रतिस्थापित करने की धमकी देते हो, तो वे उस जोखिम को लेने के लिए भी तैयार होते हैं, वे तब भी स्पष्ट रूप से बोल रहे होते हैं और सिद्धांत के अनुसार काम करते हैं, तुम्हारे साथ वे उन सिद्धांतों के अनुसार पेश आते हैं जिनके अनुसार परमेश्वर का घर लोगों के साथ व्यवहार करता है। जब तुम्हारी गतिविधियाँ सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं, तो ये लोग तुम्हें उजागर करते हैं, तुम्हें सलाह देते हैं, और तुम्हारी समस्याओं को खुले तौर पर और बिना किसी हिचकिचाहट के इंगित करते हैं। वे तुम्हारे अभिमान को चोट पहुँचाने से डरते नहीं हैं, और यहाँ तक कि वे भीड़ के सामने तो तुम्हें शर्मिंदा करेंगे और एक कोने में अलग जाकर तुम्हारा समर्थन भी करेंगे। तुम्हें ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? क्या तुम्हें उन पर अंकुश लगा देना चाहिए या उन्हें करीब रखना चाहिए? (उन्हें करीब रखना चाहिए)। यह सही है, लेकिन ऐसा करने के लिए अपनी मर्यादा से बाहर मत जाओ—यह थोड़ा ग़लत होगा। जब तुम ख़राब मूड में होते हो, तो कुछ समय के लिए उनसे दूर रहना ठीक है; तब तक प्रतीक्षा करो जब तक तुम समझ नहीं लेते कि तुम्हें जाकर उनके साथ इस तरह संगति करनी है: "तुम्हारा सुझाव सही था; मेरे दिल में स्थिति का अभिमान था और उसकी फ़िक्र थी। मैंने सोचा कि चूँकि मैं इन कई वर्षों से एक अगुवा रहा हूँ, तो तुम्हें उन लोगों के सामने मेरा लिहाज करना चाहिए था, लेकिन अब मैं देखता हूँ कि मेरे कार्य वास्तव में सिद्धांत के खिलाफ़ और सच्चाई से विहीन थे, और मुझे उन्हें नहीं करना चाहिए था। ऐसी स्थिति होने का क्या लाभ है? क्या यह कर्तव्य नहीं है? हम सभी बराबर हैं। मेरे पास तुम्हारी तुलना में थोड़ी अधिक ज़िम्मेदारी है, बस बात इतनी ही है। भविष्य में, वो कहना जो तुम्हें कहना चाहिए। हमारे बीच कोई दुर्भावना नहीं है। परमेश्वर के घर में, परमेश्वर के समक्ष, और सत्य के समक्ष, हम एकजुट हैं, और हमारे बीच कुछ नहीं आता है।" सत्य का अभ्यास और उससे प्रेम करने का दृष्टिकोण यही होता है। यदि तुम मसीह-विरोधियों के मार्ग को छोड़ना चाहते हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें सक्रिय रूप से उन नेक लोगों के करीब जाना चाहिए जो सच्चाई से प्रेम करते हैं। उन लोगों के करीब जाओ जो तुम्हें सलाह दे सकते हैं, जो तुम्हारे मुँह पर ही तुम्हारी आलोचना करते हैं, जो दिखावा नहीं करते, जो तुम्हारी भूल होने पर और जब तुम खुद को ऊँचा उठाते हो, जब तुम खुद की गवाही देते हो और दूसरों को धोखा देने की कोशिश करते हो, तो वे तुम्हें बता देते हैं। यही सही मार्ग है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (2)' से उद्धृत

भले ही तुम किसी भी समूह में रहो, अगर तुम ईर्ष्या, झगड़े, उपहास और अपमान पर विजय पाने में सक्षम हो जो लोगों के बीच होते हैं, और उन विभिन्न प्रकार के घाव और तौर-तरीक़ों पर भी, जो लोग एक दूसरे के साथ व्यवहार में लाते हैं, यदि तुम उन्हें पहचानने में सक्षम होते हो, और इन चीज़ों से नियंत्रित नहीं होते, तथा उनके प्रति एक सही रवैया रख सकते हो, क्रोध, बेतकल्लुफ़ी, या एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में लौटे बिना, तो अन्य लोगों के साथ तुम्हारे रिश्ते सामान्य हो जाएँगे और तुम, कुल मिलाकर, दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम होगे। यदि तुम एक औसत व्यक्ति के साथ ताल-मेल रखकर निभा सकते हो, और जब तुम अन्य लोगों के साथ होते हो तो किसी भी व्यक्ति, बात या चीज़ के द्वारा नियंत्रित या परेशान नहीं होते हो, तो तुम्हारी स्थिति सामान्य होगी, और तुम परमेश्वर के सामने जिओगे। जहाँ कहीं भी लोग हैं, वहाँ विवाद होंगे ही। जब विवाद हों तब यदि तुम सच्चाई से नहीं जीते हो, तो तुम उनमें खिंच लिए जाओगे। विवादों में क्या होता है? अनबन, ईर्ष्या, घृणा, अवमानना, प्रतिस्पर्धा, एक दूसरे पर निर्णय पारित करना, उच्च पदों के लिए एक दूसरे के साथ होड़ लगाना, उपहारों, क्षमताओं, आँकड़ों, सुन्दरता, क़ाबिलियत, स्थिति, प्रतिष्ठा, भूमिकाओं की तुलना करना, (यह देखना कि) किसके भाषण में अधिक वजन होता है, कौन अधिक काम का है, और कौन अधिक ताक़तवर है। तुम सारा दिन इन चीज़ों में दूसरों के साथ अपनी तुलना करने में बिता देते हो, इन विवादों में फँसे रहते हो, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने में, और परमेश्वर के सामने सामान्य शांति से रह पाने में, असमर्थ हो जाते हो। तुम्हारे दिल में, तुम अक्सर इन विवादों में, झगड़ों और तकरारों में फँसे रहोगे, जो केवल तुम्हें ही चोट नहीं पहुँचाएँगे, बल्कि दूसरों को भी, और इस तरह तुम कभी भी परमेश्वर के सामने नहीं आ पाओगे। जब कोई तुम्हारे लिए कोई कठोर बात करता है, तो तुम नकारात्मक हो जाओगे; अगर कोई तुमसे अधिक प्रतिभा वाला हो, तुम्हारी तुलना में अधिक क़ाबिलियत वाला और तुमसे अधिक तेज़ दिमाग वाला, तो तुम असहज महसूस करते हो, और तुम उनके साथ प्रतिस्पर्धा करना चाहते हो। जीने का एक कितना दयनीय, ​​थकाऊ, दर्दनाक तरीक़ा है हमेशा इन स्थितियों में फँसे रहना। और क्या यह आध्यात्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता है? यदि तुम इससे बाहर नहीं निकल पाते हो, तो तुम्हारे जीवन को अक्सर नुकसान उठाना पड़ेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

शैतान द्वारा लोगों को अत्यधिक भ्रष्ट कर दिया गया है, और उनके पास सच्चाई की कोई समझ नहीं है, इसलिए सभी तरह के लोगों के प्रति सहिष्णुता का अभ्यास करना आवश्यक है—और मेरी (परमेश्वर की) कई वर्षों की सहिष्णुता की मैंने क्या क़ीमत चुकाई है? मैं सब को सहन कर लेता हूँ; मैं सभी के प्रति सहिष्णु हूँ, और कभी कठोर नहीं होता; मैं लोगों के साथ वार्तालाप और संगति करता हूँ, हौले-से बातचीत का निर्देशन करता हूँ, उन्हें जागरूक बनाता हूँ, उन्हें चीज़ों के पीछे का कारण समझाता हूँ, और मैं इसी तरह सभी के प्रति व्यवहार करता हूँ। चाहे मैं जो भी कहूँ अगर फिर भी कोई बात नहीं बनती, तो मैं उन्हें जाने देता हूँ। अपने आप को इस तरह के ऊँचे सम्मान में मत रखो कि जब दूसरे तुम पर ध्यान न दें, तो तुम प्रभावित हो जाओ और ऐसा महसूस करो कि तुम्हें किसी बड़े अपमान का सामना करना पड़ा है। यह कोई मायने नहीं रखता। महत्व की बात यह है कि तुम जो कुछ भी करते हो, उसे परमेश्वर के सामने करो; तुम्हें अपना हिसाब परमेश्वर को देना चाहिए। तुम जो कुछ भी करते हो, वह दूसरों के लिए हितकारी होना चाहिए। तुम लोगों को यह कुछ भारी-भरकम माँग लग सकती है, लेकिन ऐसा इसलिए है कि लोगों में ऐसी मानवता और क़द की कमी होती है। इन सबसे बढ़कर, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि परमेश्वर के सामने रहकर तुम एक सामान्य स्थिति को कैसे बनाए रख सकते हो। जब बेतकल्लुफ़ी और गुस्सा फूट पड़ने वाले हों, तब तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर के सामने जल्दी जाओ और उसका नाम पुकारो। जब तुम उसका नाम पुकारोगे, तो तुम अपने क्रोध और आक्रोश को गायब और छिन्न-भिन्न हो जाते महसूस करोगे। वे कहाँ जाते हैं? क्यों तुम अचानक अपने मन के अजीब विचारों और सिद्धांतों को याद करने में असमर्थ हो जाते हो? क्या हो रहा है? परमेश्वर ने शैतान द्वारा की गई चीज़ों को, और इंसानों के दिमाग में औचित्य ठहराने की और खीझ भरी बातों को दूर किया, इस तरह तुम्हें शांति और आनंद देते हुए, तुम्हारे दिल को धीरे-धीरे सांत्वना देते हुए, और तुम खुद से कहते हो: "मैं अभी-अभी इतना आवेगी कैसे हो सकता था? मैं इतना बेवकूफ़ कैसे हो सकता था? इतना मूर्ख? उससे क्या फ़र्क पड़ रहा था? मैं बहुत क्रोधित हो गया था—यह तो अच्छा है कि मैंने परमेश्वर को पुकारा और उसने मेरी मदद की और मुझे शक्ति दी; परमेश्वर वास्तव में था, मेरे पीछे। उसने मेरी रक्षा की और मुझे उसके खिलाफ़ पाप करने से रोका। मैं सचमुच उसकी कृपा महसूस कर सकता हूँ।" परमेश्वर की सहिष्णुता, प्रेम और करुणा असीम हैं, और लोगों को अपने लिए वो सब माँगने और प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के सामने आना सीखना चाहिए। जब तक तुम्हारे पास आस्था और नेकी है, परमेश्वर तुम्हें ये चीज़ें देगा, और उन्हें हासिल करने में तुम्हारी मदद करेगा। एक इंसान ये चीज़ें नहीं कर सकता है, लेकिन परमेश्वर कर सकता है। इसलिए, कुछ भी करने से पहले, तुम्हें पहले सोचना चाहिए कि क्या यह वास्तव में आवश्यक है। यदि तुमने अभी तक इसके बारे में नहीं सोचा है, तो सुनिश्चित करो कि तुम शांत हो। इससे पहले कि तुम कुछ भी करो, इससे पहले कि तुम्हारा क्रोध फूट पड़े, तुम्हें खुद को शांत करना होगा, परमेश्वर का नाम पुकारना होगा, और इस पर विचार करना होगा कि तुम जो कर रहे हो क्या वह उसकी इच्छा के अनुरूप है; यदि तुम जो कर रहे हो, वह परमेश्वर के लिए असंतोषजनक है, तो वह तुम्हारी खीझ को थोड़ा-थोड़ा करके कम करने में तुम्हारी मदद करेगा और स्थिति को सुलझाएगा। क्या इससे तुम्हें लाभ होगा? यदि लोग एक साथ होने पर बहुत ज्यादा अड़ियल होते हैं, तो उनके लिए अपने रिश्ते की सबसे शुरुआती स्थिति में वापस आना मुश्किल होगा, इसलिए, जब तुम अपना गुस्सा निकालने वाले होते हो, जब बेतकल्लुफ़ी और खीझ फूट कर निकलने वाली होती हैं, और जब ये बेतकल्लुफ़ी और खीझ दूसरों को चोट पहुँचाने वाली होती हैं, तो बेहतर होगा कि तुम कुछ देर के लिए सोचो, और परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करना सुनिश्चित कर लो। चाहे कलीसिया के भाई-बहन हों, या तुम्हारे परिवार के सदस्य—तुम्हें उन सभी के साथ मिलजुल कर रहना होगा। यह न्यूनतम आवश्यकता होती है। जब कोई इन संबंधों को सुलझा लेगा, तो उसका क़द परिपक्व हो गया होगा, और वह वास्तव में काम लेने और ज़िम्मेदारी उठाने में सक्षम होगा, और वह परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने में सक्षम होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

वर्तमान में, कई लोगों का क़द अभी भी लड़कपन का है, और वे अपने आसपास के विवादों से खुद को दूर करने में असमर्थ होते हैं; वे अक्सर फँस जाते हैं, जैसे कि वे एक मांस पीसने की चक्की में पिसे जा रहे हों, और इसका घंघोलना उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर देता है और वे छिन्न-भिन्न होकर रह जाते हैं—और, अंततः, जब परमेश्वर का घर तुम्हें एक निश्चित काम करने और अपने कर्तव्य को निभाने का आदेश देता है, तुम इसे पूरा करने में असमर्थ होते हो। ऐसा नहीं है कि तुम करना नहीं चाहते हो, और न ही ऐसा है कि तुमने इसका संकल्प नहीं किया है, या अपना मन नहीं बनाया है, या तुममें दृढ़ विश्वास की कमी है, और ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं है कि तुममें क्षमता की कमी है। इसके बजाय, ऐसा इसलिए होता है कि तुम्हारा क़द बहुत छोटा होता है, और तुम अपने आस-पास के जटिल लोगों, मामलों और चीज़ों से निपटने में असमर्थ रहते हो, जिसके कारण तुम्हारे लिए कई रोड़े आ पड़ते हैं, और वे तुम्हें उस काम को लेने से, और उस आदेश को स्वीकार करने और अपने कर्तव्य को पूरा करने से, रोकते हैं। अंततः, यदि तुम धन या प्रणय के प्रलोभनों में नहीं फँसे हुए हो, तो तुम कुछ अन्य जटिल, पारस्परिक संबंधों में फँस जाओगे, और विवादों में उलझ जाओगे, या तुम कुछ चीजों को करने के तरीके के बारे में अनभिज्ञ रहोगे और एक ठहराव में लाए जाओगे, या तुम कुछ मामलों में उलझ जाओगे, नकारात्मकता में फँसोगे, और आगे बढ़ने में असमर्थ होगे। तुम्हारा निश्चय, दृढ़ संकल्प, विश्वास, और दृढ़ता, ये कहाँ चले गए होंगे? इस तरह के मामलों का सामना करते हुए, तुम्हारी आस्था, तुम्हारा निश्चय, और संकल्प ज़रा भी उल्लेखनीय नहीं होंगे, और पहले झटके पर ही लुढ़क जाएँगे। इसलिए, यदि तुम्हारे पास एक आशा और एक इच्छा है जो भली और सकारात्मक हो, और तुम परमेश्वर के सामने एक शपथ लेते हो, इस उम्मीद में कि परमेश्वर तुम्हारी इच्छा पूरी करने में तुम्हारी मदद करेगा, तो पूर्व-शर्त यह है कि तुम्हारे पास विवादों को और तुम्हारे आस-पास के लोगों, मामलों और चीज़ों को संभालने के लिए पर्याप्त क़द और सत्य होना चाहिए। चाहे तुम्हारे आस-पास कुछ भी हो रहा हो, और तुम्हारे लोगों, मामलों, और चीज़ों के, या जिस परिवेश में तुम हो उसके, संदर्भ की परवाह किए बिना, जब तुम वफ़ादारी से अपना कर्तव्य निभाने में, सच्चाई के साथ इन चीज़ों का सामना करने में, सत्य-सिद्धांत का पालन करने में, और इन चीज़ों से अभिभूत या परेशान होकर अपने घुटनों पर नहीं गिर पड़ने में सक्षम होते हो—तो तभी तुम आगे के मार्ग पर चलना जारी रखने में सक्षम होगे; केवल तभी तुम्हारा क़द, और सत्य में तुम्हारा प्रवेश, अगले स्तर तक उठ जाएँगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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