124. दूसरों के साथ बातचीत करने के सिद्धांत

(1) व्यक्ति को दूसरों के साथ बातचीत करने में सिद्धांतवादी होना चाहिए। उसे उन लोगों के साथ बातचीत करनी चाहिए जो सत्य से प्रेम करते हैं, सही रास्ते पर चलते हैं, और अच्छे काम में संलग्न होते हैं, और कभी भी भेड़ियों और गीदड़ों के साथ नहीं रहना चाहिए।

(2) लोगों को ईमानदार होना चाहिए, आपसी सम्मान, समझ, सहनशीलता और धैर्य में समर्थ होना चाहिए, और नेकी से एक दूसरे की मदद करने में सक्षम होना चाहिए। एक दूसरे से प्रेम करने का यही अर्थ होता है।

(3) दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना सीखो, न तो उन्हें बहुत ऊँचा आंको और न ही नीचा। उनकी कमियों और अपराधों को प्रेमपूर्ण सहायता के साथ संबोधित करो।

(4) तुम्हें प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति की पहचान करना सीखना चाहिए। उन लोगों के साथ अधिक संपर्क में आओ जो सत्य से प्रेम करते हैं, और उन धोखेबाज और बुरे लोगों से दूर रहो जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोगों के बीच सामान्य संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे सामान्य नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी सामान्य नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो। तुम्हारे बीच ऐसे कितने लोग हैं? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध वास्तव में सामान्य हैं? वे किस बुनियाद पर बने हैं? तुम्हारे भीतर कितने जीवन-दर्शन हैं? क्या तुमने उन्हें त्याग दिया है? यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाता, तो तुम परमेश्वर के नहीं हो—तुम शैतान से आते हो, और अंत में शैतान के पास ही लौट जाओगे। तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होने के योग्य नहीं हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ़ मुड़ना चाहिए। इस बुनियाद पर, तुम दूसरे लोगों के साथ भी सामान्य संबंध रखोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ऊर्जा लगा दो, वह मानव के जीवनदर्शन से संबंधित ही होगा। तुम दूसरे लोगों के बीच एक मानव-दृष्टिकोण और मानव-दर्शन के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहे हो, ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे, लेकिन तुम लोगों के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचनों का अनुसरण नहीं कर रहे। अगर तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, लेकिन परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर को देने और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो स्वाभाविक रूप से सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हो जाएँगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन-सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देता, तो उसकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं समझेगा और परमेश्वर के साथ उसके संबंध कभी सामान्य नहीं होंगे; इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव कभी नहीं बदलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

अगर लोगों के बीच कोई संबंध सामान्य मानवता के दायरे में स्थापित होता है, और उसमें व्यक्तिगत हित, घृणा, लेनदेन या दैहिक जरूरतें शामिल नहीं होतीं, तो मूल रूप से, इस तरह की अंतर्वैयक्तिक अंत:क्रिया के माध्यम से स्थापित संबंध को सामान्य माना जा सकता है। जब लोग एक-दूसरे के साथ सामान्य रूप से और सिद्धांतों के अनुसार मिलजुलकर रहने और अंत:क्रिया करने में सक्षम होते हैं, सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं, और सिद्धांतों के अनुसार एक-दूसरे की सहायता, समर्थन और आपूर्ति कर सकते हैं, तो ये सभी चीजें लोगों के बीच सामान्य संबंधों की सीमा में आती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब चीजें उचित रूप से और नियमों के अनुसार की जाती हैं, लेनदेन के रूप में नहीं और उस तरह से नहीं जिसमें व्यक्तिगत हित, घृणा, या दैहिक इच्छाओं की माँग शामिल हो, तो वे उचित संबंधों के दायरे में होती हैं। यह एक व्यापक दायरा है, है ना? उचित अंतर्वैयक्तिक संबंधों के लिए मुख्य पूर्व-शर्त यह है कि वे सामान्य मानवता के दायरे में आते हों। इसका एक पहलू सामान्य मानवता की उपयुक्तता और विवेक के भीतर बातचीत और संवाद करना है, जबकि दूसरा सामान्य मानवता की उपयुक्तता और सिद्धांतों के अनुसार बातचीत करना, संबद्ध होना और कार्य करना है। उच्च स्तर पर इसका अर्थ सत्य-सिद्धांतों के अनुसार अंत:क्रिया करना और संबद्ध होना है। यह लोगों के बीच उचित अंतर्वैयक्तिक संबंधों की एक प्रचलित सामान्य परिभाषा है।

... जब तुम किसी से मिलते हो, उनका अभिवादन कर उनके साथ सामान्य रूप से बात कर पाते हो, किसी विशेष लहजे में नहीं बोलते, अपने शब्दों को तोड़ते-मरोड़ते नहीं, खुद को ऊँचा नहीं दिखाते, दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करते, या अपने बारे में बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते हो, और उचित, सौम्य तरीके से बोलने और संवाद करने में सक्षम होते हो—तो यह अंतर्वैयक्तिक संबंधों को सँभालने का सबसे उचित और बुनियादी तरीका है, जिसे लोग देख सकते हैं। जहाँ तक काम या मामलों को सँभालने का संबंध है, विवेक के मानकों के अनुरूप होना, सामान्य मानवता की भावना के अनुसार जुड़ना, अंत:क्रिया करना और काम करना सबसे बुनियादी बात है। बेशक, इसका सबसे अच्छा और गहन रूप परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप जुड़ना, अंत:क्रिया करना और काम करना है। ये सत्य-सिद्धांत क्या हैं? उनमें लोगों के नकारात्मक और कमजोर होने पर उनकी नकारात्मकता और कमजोरी को समझने में सक्षम होना, उनकी कठिनाइयों और दुखों की परवाह करने में सक्षम होना, और फिर उनसे पूछने, उनकी मदद करने और उनका समर्थन करने में सक्षम होना जिससे वे कमजोर न बने रहें, उन्हें परमेश्वर के सामने लाना, और उनकी मदद करने के लिए परमेश्वर के वचनों का उपयोग करना शामिल है। अभ्यास का यह रूप सिद्धांतों के अनुरूप है, है ना? यह सिद्धांतों के अनुरूप है, और निश्चित रूप से, यह उस प्रकार का संबंध भी है, जो सिद्धांतों के अनुरूप है। जहाँ तक उन लोगों का संबंध है, जो जानबूझकर व्यवधान और गड़बड़ी पैदा करते हैं, या जो जानबूझकर अपने कर्तव्यों को जैसे-तैसे करते हैं, उनसे सामना होने पर भी तुम्हें सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। तुम्हें इन बातों की ओर संकेत करने, उन लोगों के कार्यों की आलोचना करने, और उन्हें वैसा करने देने और उनकी गलतियों पर परदा डालने के बजाय उनकी मदद करने में सक्षम होने की आवश्यकता है, न कि वे जो करते हैं उसे अनदेखा करने, उन्हें प्रीतिकर बातें कहने, उनकी वाहवाही करने, उनकी प्रशंसा करने, या उनसे झूठी बातें कहने की। ये चीजें करना सिद्धांतों के अनुरूप कार्य नहीं करना होगा। ऐसे संबंध, जिनमें लोग सिद्धांतों के अनुरूप कार्य नहीं करते, उचित हैं या अनुचित? (अनुचित।) चीजों को सँभालने, समस्याओं से निपटने और लोगों के साथ अंत:क्रिया करने का ऐसा तरीका स्पष्ट रूप से सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, और स्पष्ट रूप से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप भी नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (14)' से उद्धृत

परमेश्वर के घर में लोग कैसे जीते हैं और क्या प्रकट करते हैं, इसके सिद्धांत और नींव के रूप में, सभी स्थितियों में, सत्य होना चाहिए। यदि तुम इस तरह के परिवेश में रहते हो, तो लोगों में समानता होती है, और परमेश्वर के साथ हर किसी का संबंध एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध होता है; इस तरह, लोगों के बीच अंत:क्रियाएँ बहुत सरल और आसान हो जाती हैं। तभी लोग अपने जीने के तरीके में वास्तव में मुक्त और स्वाधीन हो सकते हैं और वास्तव में खुश रह सकते हैं। तुम लोगों ने अब तक इसे हासिल किया है या नहीं? (नहीं।) ठीक है, तो तुम लोग किस तरह जीते हो? (शैतान के दर्शनों और एक भ्रष्ट स्वभाव से।) तुम लोग अभी तक उन जीवन-दर्शनों से मुक्त नहीं हुए हो, या शोहरत और ऐश्वर्य के लिए संघर्ष के, ईर्ष्या और कलह के जीवन-परिवेश से खुद को निकाल नहीं पाए हो; तुम लोगों को एक पूरी तरह से भ्रष्ट और शैतानी स्वभाव शासित और नियंत्रित करता है। इसलिए, तुम लोगों के जीने का तरीका बहुत थकाने वाला है, और तुम अक्सर ऐसा महसूस करते हो: "ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के घर में जीवन सांसारिक जीवन जैसा ही है? जीवन यहाँ भी थकाऊ है, और मुझे हमेशा अपने हर काम में सावधानी बरतनी पड़ती है, और मैं अपना काम करने से पहले हमेशा लोगों के हाव-भाव का अवलोकन करता हूँ।" यह स्थिति कैसे आई? ऐसा इसलिए हुआ, क्यों कि तुम्हारे व्यवहार के सिद्धांत, चीज़ों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण और उन्हें सँभालने के तुम्हारे तरीके, ये सभी गलत हैं; तुम सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते हो। सभी मामलों की शुरुआ तें और बुनियादें होती हैं—इसलिए, वह सबसे पहली, बुनियादी बात क्या है, जो तुम्हें हल करनी चाहिए? पहले तुम्हें अपने विचारों, अपने खयालों, अपने ज्ञान और अपने दृष्टिकोणों का विश्लेषण करना और उन्हें जानना चाहिए। इसके बाद क्या करना चाहिए? (उन परिप्रेक्ष्यों की तलाश करो, जिनके साथ तुम्हें अपने आसपास की चीजों को देखना चाहिए, तुम्हें उनसे कैसे निपटना चाहिए, और अपने कार्यों में तुम्हें कौन-से सिद्धांत लागू करने चाहिए।) इसमें अभ्यास शामिल है। वास्तविक जीवन में, मनुष्यों के बीच अंत:क्रिया का एक सबसे बुनियादी सिद्धांत होना चाहिए: हर किसी को अपना कर्तव्य निभाते हुए एक सृजित प्राणी के उचित स्थान पर खड़ा होना चाहिए; कोई भी किसी दूसरे से बेहतर या बदतर नहीं है। सभी लोगों को सत्य के सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए, अपने जीवन-दर्शनों से, शैतान के सिद्धांतों और काम करने के तरीकों से मुक्त हो जाना चाहिए, और दूसरों के साथ सत्य के सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए और उनसे यह माँग करनी चाहिए कि वे भी उन्हीं सिद्धांतों के अनुसार उनसे व्यवहार करें। फ़िलहाल, यही वह परिवेश है जिसे तुम लोगों के बीच बनाया जाना चाहिए; पूरी कलीसिया में, सभी भाइयों और बहनों के बीच, उस तरह का परिवेश निर्मित किया जाना चाहिए—जिस तरह का परिवेश परमेश्वर के परिवार में होना चाहिए और जो भाइयों और बहनों के बीच मौजूद होना चाहिए, ताकि न तो तुम्हें और न ही किसी और को प्रतिबंधित किया जाए। तुम दूसरों को प्रतिबंधित नहीं करो, और वे तुम्हें प्रतिबंधित न करें—यह अभ्यास का एक और सिद्धांत है, और यह सामान्य अंतर्वैयक्तिक संबंधों को निभाने का सबसे बुनियादी सिद्धांत है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। अपने आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रतिदिन रहते हो, तुम्हें रस लेना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उनके प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आपको खोलना और संगति करना सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। तुम धीरे-धीरे अपने आपको इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक आत्मीय और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक-दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर पाते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी ऐसी मानसिकता होती है जिसके कारण तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा बरतने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय एक ऐसी स्थिति और रवैये के जिसमें तुम एक-दूसरे के साथ लड़ते हो, एक-दूसरे को कुचलते हो, एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक-दूसरे के लिए लुके-छिपे तिरस्कार या अवमानना को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी दूसरे की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बना देता है। यह न केवल तुम पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें गलत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें किसी चीज़ को एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम्हें बुरा लगता है, और तुम असहज और अप्रसन्न महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोचते रहते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नख़रों, इन क्षुद्र भावनाओं में फंसे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, मकड़ी के जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे के गुण क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और आत्म-चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए अपने भीतर गहराई में जाना होगा। तुम्हें अपने आपमें लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, जबकि तुम दूसरों की क्षमताओं से अनजान रहकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर देखो, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, दूसरों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग करके दूसरों को चोट पहुँचाओ और नीचा दिखाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम यह महसूस करना चाहोगे कि यह कैसा लगता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मूलभूत सिद्धांत' से उद्धृत

यदि भाई-बहनों को एक-दूसरे में विश्वास करने में सक्षम होना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और एक-दूसरे का भरण-पोषण करना है, तो प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य अपने वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करनी चाहिए। यदि तू अपने सच्चे अनुभवों के बारे में बात नहीं करता है, और केवल तकिया कलाम ही बोलता रहता है, और ऐसे वचन बोलता है जो सिद्धांत संबंधी और सतही हैं, तो तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, और तू एक ईमानदार व्यक्ति होने में असमर्थ है। उदाहरण के लिए, कई सालों तक साथ रहते हुए पति-पत्नी, कभी-कभी झगड़ा करते हुए, एक दूसरे के आदी होने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर तुम दोनों में सामान्य मानवता है, तो तुम हमेशा उसके साथ दिल से बात करोगी और वह तुमसे दिल से बात करेगा। जीवन में जो भी समस्याएँ तुम्हारे सामने आती हैं, तुम्हारे कार्य में जो भी समस्याएँ घटित होती हैं, दिल की गहराई में तुम जो भी सोच रहे होते हो, जिस भी तरह से तुम चीजों के समाधान की योजना बनाते हो, अपने बच्चों के लिए जो भी तुम्हारे विचार और योजनाएँ हैं—तुम अपने जीवनसाथी को हर चीज बताओगी। इस प्रकार, क्या तुम दोनों एक-दूसरे के विेशेष रूप से नजदीक और अंतरंग महसूस नहीं करोगे? अगर वह तुम्हें अपने अंतरतम विचार नहीं बताता, और घर में वेतन लाने के अलावा कुछ नहीं करता, और यदि तुम उसे अपने विचार कभी नहीं बतातीं और कभी उस पर भरोसा नहीं करतीं, तो क्या तुम दोनों के बीच भावनात्मक दूरी नहीं है? निश्चित रूप से है, तुम एक-दूसरे के विचारों या इरादों को नहीं समझते। अंततः, तुम नहीं बता सकतीं कि तुम्हारा जीवनसाथी किस तरह का व्यक्ति है, न ही वह बता सकता है कि तुम किस तरह की व्यक्ति हो; तुम उसकी जरूरतें नहीं समझतीं, न ही वह तुम्हारी जरूरतें समझता है। अगर लोगों में कोई मौखिक या आध्यात्मिक संवाद नहीं है, तो उनके बीच अंतरंगता की कोई संभावना नहीं है, और वे एक-दूसरे का पोषण या एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते। तुम लोगों ने इसका पहले अनुभव किया है, है ना? यदि तुम्हारा मित्र तुम्हें हर चीज बताता है, जो भी वह सोच रहा है उसे जाहिर करता है, और अपनी हर पीड़ा या खुशी साझा करता है, तो क्या तुम उसके साथ विशेष अंतरंगता महसूस नहीं करतीं? उसके इन चीजों को तुम्हें बताने के लिए तैयार होने का कारण यह है कि तुमने भी अपने अंतरतम विचार उसे बताए है; तुम विशेष रूप से निकट हो, और यही कारण है कि तुम एक-दूसरे से निभाने और एक-दूसरे की मदद करने में सक्षम हो। कलीसिया में भाई-बहनों के बीच इस तरह के संवाद और विचार-विनिमय के बिना सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकता। यह ईमानदार होने की अपेक्षाओं में से एक है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

तुम्हें उन लोगों के करीब जाना चाहिए जो सच बोलते हैं, जो तुम्हें तब फटकारते और बेनक़ाब कर देते हैं जब तुम इसके लायक होते हो, चाहे तुम्हारी हैसियत कुछ भी हो, फिर भी वे चाहे तुम्हें जैसे भी उजागर करें और फटकारें, वे तुम्हारी मदद कर सकते और तुम पर नज़र रख सकते हैं। तुम्हें ऐसे लोगों के करीब जाना चाहिए; वे नेक लोग हैं जो सत्य की तलाश करते हैं। धोखेबाज़ लोगों की संगत की तलाश न करो जो फिसड्डी होते हैं; ऐसे लोगों से दूर रहो। यही सही तरीका है। सत्य का अनुसरण करने वाले नेक लोग तुम्हारी हैसियत और तुम्हारे योगदान की परवाह नहीं करते हैं; अगर तुम उन्हें हटाने की धमकी भी देते हो, तो वे उस जोखिम को लेने के लिए भी तैयार रहते हैं, वे तब भी स्पष्ट रूप से बोल रहे होते हैं और सिद्धांत के अनुसार काम करते हैं, तुम्हारे साथ वे उन सिद्धांतों के अनुसार पेश आते हैं जिनके अनुसार परमेश्वर का घर लोगों के साथ व्यवहार करता है। जब तुम्हारी गतिविधियाँ सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं, तो ये लोग तुम्हें उजागर करते हैं, तुम्हें सलाह देते हैं, और तुम्हारी समस्याओं को खुले तौर पर और बिना किसी हिचकिचाहट के इंगित करते हैं। वे तुम्हारे अभिमान को चोट पहुँचाने से डरते नहीं हैं, और यहाँ तक कि वे भीड़ के सामने तो तुम्हें शर्मिंदा करेंगे और एक कोने में अलग जाकर तुम्हारा समर्थन भी करेंगे। तुम्हें ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? क्या तुम्हें उन पर अंकुश लगा देना चाहिए या उन्हें करीब रखना चाहिए? (उन्हें करीब रखना चाहिए)। यह सही है, लेकिन ऐसा करने के लिए अपनी मर्यादा से बाहर मत जाओ—यह थोड़ा ग़लत होगा। जब तुम ख़राब मूड में होते हो, तो कुछ समय के लिए उनसे दूर रहना ठीक है; तब तक प्रतीक्षा करो जब तक तुम समझ नहीं लेते कि तुम्हें जाकर उनके साथ इस तरह संगति करनी है: "तुम्हारा सुझाव सही था; मेरे दिल में हैसियत का अभिमान और उसका सरोकार था। मैंने सोचा कि चूँकि मैं कई वर्षों से अगुवा रहा हूँ, तो तुम्हें उन लोगों के सामने मेरा लिहाज करना चाहिए था, लेकिन अब मैं देखता हूँ कि मेरे कार्य वास्तव में सिद्धांत के खिलाफ़ और सत्य से रहित थे, और मुझे उन्हें नहीं करना चाहिए था। ऐसी हैसियत होने का क्या लाभ है? क्या यह कर्तव्य नहीं है? हम सभी बराबर हैं। मेरे पास तुम्हारी तुलना में थोड़ी अधिक ज़िम्मेदारी है, बस बात इतनी ही है। भविष्य में, जो भी कहना चाहो तुम्हें कहना चाहिए। हमारे बीच कोई दुर्भावना नहीं है। परमेश्वर के घर में, परमेश्वर के समक्ष, और सत्य के समक्ष, हम एकजुट हैं, और हमारे बीच कुछ नहीं आता है।" सत्य का अभ्यास और उससे प्रेम करने का दृष्टिकोण यही होता है। यदि तुम मसीह-विरोधियों के मार्ग को छोड़ना चाहते हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें सक्रिय रूप से उन नेक लोगों के करीब जाना चाहिए जो सत्य से प्रेम करते हैं। उन लोगों के करीब जाओ जो तुम्हें सलाह दे सकते हैं, जो तुम्हारे मुँह पर ही तुम्हारी आलोचना करते हैं, जो दिखावा नहीं करते, जो तुम्हारी भूल होने पर और जब तुम खुद को ऊँचा उठाते हो, जब तुम खुद की गवाही देते हो और दूसरों को धोखा देने की कोशिश करते हो, तो वे तुम्हें बता देते हैं। यही सही मार्ग है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना उन्नयन करते हैं और अपने बारे में गवाही देते हैं' से उद्धृत

चाहे तुम किसी भी समूह में रहो, अगर तुम उस ईर्ष्या, झगड़े, उपहास और अपमान पर विजय पाने में सक्षम हो जो लोगों के बीच होते हैं, और उन विभिन्न प्रकार के प्रहारों और तौर-तरीकों पर भी, जो लोग एक-दूसरे के साथ व्यवहार में लाते हैं, यदि तुम उन्हें पहचानने में सक्षम होते हो, और इन चीज़ों से नियंत्रित नहीं होते हो, तथा उनके प्रति एक सही रवैया रख सकते हो, गर्ममिज़ाजी, बेतकल्लुफ़ी, या एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव का सहारा लिए बिना, तो अन्य लोगों के साथ तुम्हारे रिश्ते सामान्य हो जाएँगे और तुम, कुल मिलाकर, दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम होगे। यदि तुम एक औसत व्यक्ति के साथ हिल-मिलकर निभा सकते हो, और जब तुम अन्य लोगों के साथ होते हो तो किसी भी व्यक्ति, बात या चीज़ के द्वारा नियंत्रित या परेशान नहीं होते हो, तो तुम्हारी स्थिति सामान्य होगी, और तुम परमेश्वर के सामने जिओगे। जहाँ कहीं भी लोग हैं, वहाँ विवाद होंगे ही। जब विवाद हों तब यदि तुम सत्य के साथ नहीं जीते हो, तो तुम उनमें फंस जाओगे। विवादों में क्या होता है? अनबन, ईर्ष्या, घृणा, अवमानना, प्रतिस्पर्धा, एक-दूसरे पर निर्णय पारित करना, उच्च पदों के लिए एक-दूसरे के साथ होड़ लगाना, उपहारों, क्षमताओं, देह-आकृतियों, सुंदरता, योग्यता, पद-प्रतिष्ठा और भूमिकाओं की तुलना करना, यह देखना कि किसके बोलने में अधिक वज़न है, कौन अधिक उपयोगी है, और कौन अधिक ताकतवर है। तुम सारा दिन इन चीज़ों में दूसरों के साथ अपनी तुलना करने में बिता देते हो, इन विवादों में फँसे रहते हो, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने में, और परमेश्वर के सामने सामान्य शांति से रह पाने में, असमर्थ रहते हो। अपने दिल में, तुम अक्सर इन विवादों में, झगड़ों और तकरारों में फँसे रहोगे, जो केवल तुम्हें ही नुकसान नहीं पहुँचाएँगे, बल्कि दूसरों को भी, और इस तरह तुम कभी भी परमेश्वर के सामने नहीं आ पाओगे। जब कोई तुम्हारे लिए कोई कठोर बात करता है, तो तुम नकारात्मक हो जाओगे; अगर कोई तुमसे अधिक प्रतिभा वाला हो, तुम्हारी तुलना में अधिक क़ाबिलियत वाला और तुमसे अधिक तेज़ दिमाग वाला, तो तुम असहज महसूस करते हो, और तुम उनके साथ प्रतिस्पर्धा करना चाहते हो। हमेशा इन स्थितियों में फँसे रहना, जीने का कितना दयनीय, थकाऊ, दर्दनाक तरीक़ा है। और क्या यह आध्यात्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता है? यदि तुम इससे बाहर नहीं निकल पाते हो, तो तुम्हारे जीवन को अक्सर नुकसान उठाना पड़ेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मूलभूत सिद्धांत' से उद्धृत

शैतान द्वारा लोगों को अत्यधिक भ्रष्ट कर दिया गया है, और उनके पास सत्य की कोई समझ नहीं है, इसलिए सभी तरह के लोगों के प्रति सहिष्णुता का अभ्यास करना आवश्यक है—और अपनी कई वर्षों की सहिष्णुता की मैंने क्या कीमत चुकाई है? मैं सब कुछ सहन कर लेता हूँ; मैं सभी के प्रति सहिष्णु हूँ, और कभी कठोर नहीं होता; मैं लोगों के साथ वार्तालाप और संगति करता हूँ, विनम्रता से बातचीत का निर्देशन करता हूँ, उन्हें जागरूक बनाता हूँ, उन्हें चीज़ों के पीछे का कारण समझाता हूँ, और मैं इसी तरह सभी के प्रति व्यवहार करता हूँ। अगर मेरे कुछ भी कहने के बाद भी बात नहीं बनती, तो मैं उन्हें जाने देता हूँ। अपने आपको इतना ऊँचा मत समझो कि जब दूसरे तुम पर ध्यान न दें, तो तुम आहत हो जाओ और ऐसा महसूस करो कि तुम्हें किसी बड़े अपमान का सामना करना पड़ा है। यह कोई मायने नहीं रखता। महत्व की बात यह है कि तुम जो कुछ भी करते हो, उसे परमेश्वर के सामने करो; तुम्हें अपना हिसाब परमेश्वर को देना चाहिए। तुम जो कुछ भी करते हो, वह दूसरों के लिए हितकारी होना चाहिए। तुम लोगों को यह कोई भारी-भरकम माँग लग सकती है, लेकिन ऐसा इसलिए है कि लोगों में ऐसी मानवता और कद-काठी की कमी होती है। सबसे बढ़कर, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि परमेश्वर के सामने रहकर तुम एक सामान्य स्थिति को कैसे बनाए रख सकते हो। जब बेतकल्लुफ़ी और गर्ममिज़ाजी फूट पड़ने वाली हों, तब तुम्हें क्या करना चाहिए? झट से परमेश्वर के सामने जाओ और उसका नाम पुकारो। जब तुम उसका नाम पुकारोगे, तो तुम अपने क्रोध और नाराज़गी को गायब और छिन्न-भिन्न होते महसूस करोगे। वे कहाँ चले जाते हैं? क्यों तुम अचानक अपने मन के अजीब विचारों और सिद्धांतों को याद करने में असमर्थ हो जाते हो? क्या हो रहा होता है? परमेश्वर शैतान द्वारा की गई चीज़ों को, और इंसानों के दिमाग में इन चीज़ों को सही ठहराने की और गर्ममिज़ाजी भरी बातों को दूर कर देता है, तुम्हें शांति और आनंद देता है, तुम्हारे दिल को धीरे-धीरे सांत्वना देता है, और तुम खुद से कहते हो: "मैं अभी-अभी इतना आवेगी कैसे हो गया था? मैं इतना बेवकूफ़ कैसे हो सकता था? इतना मूर्ख? इससे क्या फर्क पड़ता था? मैं कितना क्रोधित हो गया था—अच्छा हुआ कि मैंने परमेश्वर को पुकारा और उसने मेरी मदद की और मुझे शक्ति दी; परमेश्वर वास्तव में मेरे पीछे खड़ा था। उसने मेरी रक्षा की और मुझे उसके खिलाफ़ पाप करने से रोका। मैं सचमुच उसकी कृपा महसूस कर सकता हूँ।" परमेश्वर की सहिष्णुता, प्रेम और करुणा असीम हैं, और लोगों को अपने लिए ये सब माँगने और प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के सामने आना सीखना चाहिए। जब तक तुम्हारे पास आस्था और ईमानदारी है, परमेश्वर तुम्हें ये चीज़ें देगा, और इन्हें हासिल करने में तुम्हारी मदद करेगा। एक इंसान ऐसी चीज़ें नहीं कर सकता है, लेकिन परमेश्वर कर सकता है। इसलिए, कुछ भी करने से पहले, तुम्हें यह सोचना चाहिए कि क्या यह वास्तव में आवश्यक है। यदि तुमने अभी तक इसके बारे में नहीं सोचा है, तो सुनिश्चित करो कि तुम्हारा मन शांत है। इससे पहले कि तुम कुछ भी करो, इससे पहले कि तुम्हारा क्रोध फूट पड़े, तुम्हें खुद को शांत करना होगा, परमेश्वर का नाम पुकारना होगा, और इस पर विचार करना होगा कि तुम जो कर रहे हो क्या वह उसकी इच्छा के अनुरूप है; यदि तुम जो कर रहे हो, वह परमेश्वर के लिए असंतोषजनक है, तो वह तुम्हारी गर्ममिज़ाजी को थोड़ा-थोड़ा करके कम करने में तुम्हारी मदद करेगा और स्थिति को सुलझाएगा। क्या इससे तुम्हें लाभ होगा? यदि लोग एक साथ होने पर बहुत ज्यादा अड़ियल हो जाते हैं, तो उनके लिए अपने रिश्ते की सबसे शुरुआती स्थिति में वापस आना मुश्किल होगा, इसलिए, जब तुम अपना गुस्सा निकालने वाले होते हो, जब बेतकल्लुफ़ी और गर्ममिज़ाजी फूट निकलने वाली होती हैं, और जब यह बेतकल्लुफ़ी और गर्ममिज़ाजी दूसरों को हानि पहुँचाने वाली होती हैं, तो बेहतर होगा कि तुम कुछ देर के लिए सोचो, और परमेश्वर से और अधिक प्रार्थना करने का ध्यान रखो। चाहे कलीसिया के भाई-बहन हों, या तुम्हारे परिवार के सदस्य—तुम्हें उन सभी के साथ मिलजुल कर रहना होगा। यह न्यूनतम आवश्यकता होती है। जब कोई इन संबंधों को सुलझा लेगा, तो उसका आध्यात्मिक कद परिपक्व हो चुका होगा, और वह वास्तव में कार्यों को वहन करने और जिम्मेदारी उठाने में सक्षम होगा, और वह परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने में सक्षम होगा।

वर्तमान में, कई लोगों का आध्यात्मिक क़द अभी भी लड़कपन का है, और वे अपने आसपास के विवादों से खुद को दूर करने में असमर्थ रहते हैं; वे अक्सर फँस जाते हैं, जैसे कि वे एक मांस पीसने की चक्की में पीसे जा रहे हों, और इसका घंघोलना उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर रहा हो और वे छिन्न-भिन्न होकर रह जाते हों—और, अंततः, जब परमेश्वर का घर तुम्हें एक निश्चित काम करने और अपने कर्तव्य को निभाने का आदेश देता है, तो तुम इसे पूरा करने में असमर्थ होते हो। ऐसा नहीं है कि तुम करना नहीं चाहते हो, और न ही ऐसा है कि तुमने इसका संकल्प नहीं किया है, या अपना मन नहीं बनाया है, या तुममें दृढ़ विश्वास की कमी है, और ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं है कि तुममें क्षमता की कमी है। इसके बजाय, ऐसा इसलिए होता है कि तुम्हारा क़द बहुत छोटा होता है, और तुम अपने आसपास के जटिल लोगों, मामलों और चीजों से निपटने में असमर्थ रहते हो, जिसके कारण तुम्हारे लिए कई तरह की अड़चनें पैदा होती रहती हैं, और तुम्हें उस काम को लेने से, और उस आदेश को स्वीकार करने और अपने कर्तव्य को पूरा करने से रोकती हैं। अंततः, यदि तुम धन या प्रणय संबंधों के प्रलोभनों में नहीं फँसे हुए हो, तो तुम कुछ अन्य जटिल, पारस्परिक संबंधों में फँस जाओगे, और विवादों में उलझ जाओगे, या तुम कुछ चीज़ों को करने के तरीके के बारे में अनभिज्ञ रहोगे और एक ठहराव में पहुँच जाओगे, या तुम कुछ मामलों में उलझ जाओगे, नकारात्मकता में घिर जाओगे, और आगे बढ़ने में असमर्थ रहोगे। तुम्हारा निश्चय, दृढ़ संकल्प, आस्था, और दृढ़ता, ये सब कहाँ चले गए होंगे? इस तरह के मामलों का सामना करते हुए, तुम्हारी आस्था, तुम्हारा निश्चय, और संकल्प जरा-भी उल्लेखनीय नहीं होंगे, और पहले झटके में ही लुढ़क जाएँगे। इसलिए, यदि तुम्हारे पास एक आशा और एक इच्छा है जो भली और सकारात्मक है, और तुम परमेश्वर के सामने एक शपथ लेते हो, इस उम्मीद में कि परमेश्वर तुम्हारी इच्छा पूरी करने में तुम्हारी मदद करेगा, तो इसके लिए यह ज़रूरी है कि तुम्हारे पास विवादों को और अपने आसपास के लोगों, मामलों और चीज़ों को संभालने के लिए पर्याप्त क़द और सत्य होना चाहिए। चाहे तुम्हारे आसपास कुछ भी हो रहा हो, और लोगों, मामलों, और चीज़ों या जिस परिवेश में तुम हो उसका कैसा भी मसला हो, अगर तुम वफ़ादारी से अपना कर्तव्य निभाने में, सत्य के साथ इन चीजों का सामना करने में, सत्य-सिद्धांत का पालन करने में सक्षम हो, और इन चीजों से अभिभूत या परेशान होकर घुटने नहीं टेक देते हो—तो तुम आगे के मार्ग पर चलना जारी रखने में सक्षम होगे; केवल तभी तुम्हारा क़द, और सत्य में तुम्हारा प्रवेश, अगले स्तर तक ऊपर उठ पाएँगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मूलभूत सिद्धांत' से उद्धृत

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