130. विपरीत लिंग के साथ बातचीत के सिद्धांत

(1) मानव जाति की भ्रष्टता की गहराई का बुरा सार स्पष्टतः देखो। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय प्रलोभन में पड़ सकता है, इसलिए उसे विपरीत लिंग के साथ बातचीत करने में सतर्क रहना चाहिए।

(2) जहाँ तक संभव हो, विपरीत लिंग के किसी सदस्य के साथ अगल-बगल काम करने से बचो। यदि कभी बुरे विचार उठें, उन्हें दूर हटाने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो, और अपने दिमाग और ज़ोश को सत्य का अभ्यास करने और अपना कर्तव्य निभाने की ओर मोड़ो।

(3) विवेकशील लोग खतरा देखकर शरण ले लेते हैं। व्यक्ति को कामुक लोगों से अपनी दूरी बनाए रखनी चाहिए, और प्रलोभन का सामना करने पर बुरे विपरीत लिंग से और समस्याग्रस्त परिस्थितियों से भागकर, परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

(4) सभी मामलों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना सीखो। व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों का पठन बढ़ा देना चाहिए और इस बात पर चिंतन करना चाहिए कि क्या उसके पास बुरे इरादे हैं, और अपने बुरे स्वभाव का समाधान करने के लिए उसे सत्य की तलाश करनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

इस समय कलीसिया में कुछ ऐसे लोग हैं जो पैसों का गबन करते हैं, कुछ ऐसे हैं जो स्त्री-पुरुषों में एक स्पष्ट सीमारेखा कायम नहीं रखते, कुछ आलोचना, अवहेलना करते हैं और गुप्त रूप से परमेश्वर के कार्य को ध्वस्त करने का प्रयास करते हैं। फिर भी उनके साथ सब-कुछ सही कैसे है? जब वे लोग ऐसे काम करते हैं, तो उन्हें इसका भान होता है और उन्हें अपने दिल में शर्मिंदगी भी होती है और इसी वजह से वे लोग कभी-कभी ताड़ना और शुद्धिकरण का कष्ट उठाते हैं, लेकिन वे लोग बहुत निर्लज्ज होते हैं! जैसे जब लोग स्वच्छंद संभोग में लिप्त होते हैं, तो उन्हें उस समय पता होता है कि वे क्या कर रहे हैं, लेकिन उनकी कामुकता बहुत अधिक होती है और वे अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाते। भले ही पवित्र आत्मा उन्हें अनुशासित कर दे, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए पवित्र आत्मा अनुशासन को प्रभाव में नहीं लाएगा। अगर पवित्र आत्मा उन्हें तब अनुशासित न करे, उन्हें कोई शर्मिंदगी महसूस न हो और उनके देह को कुछ न हो, तो क्या बाद में उन्हें फटकारा जा सकता है? कृत्य को चुका है, अब क्या अनुशासन हो सकता है? इससे यही साबित होता है कि वे बहुत ही निर्लज्ज लोग हैं और उनमें मानवीयता का अभाव है, ये लोग अभिशाप और दंड के हकदार हैं! पवित्र आत्मा अनावश्यक रुप से काम नहीं करता। अगर तुम भलीभाँति सत्य जानते हो लेकिन उस पर अमल नहीं करते, अगर तुम कोई भी बुराई करने के काबिल हो, तो तुम सिर्फ यही कर सकते हो कि उस दिन का इंतज़ार करो जब दुष्ट के साथ तुम्हें भी दंडित किया जाएगा। यही तुम्हारे लिए सर्वोत्तम अंत है! मैंने बारंबार तुम्हें अंतरात्मा के बारे में प्रवचन दे दिया है, जो कि न्यूनतम पात्रता है। अगर लोगों में अंतरात्मा का अभाव है, तो वे पवित्र आत्मा का अनुशासन खो चुके हैं; वे जो चाहें कर सकते हैं और परमेश्वर उनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। जिनमें सचमुच अंतरात्मा और विवेक है, वे जब कोई गलत कार्य करेंगे तो वे उसके प्रति सजग होंगे। जब उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारेगी तो वे थोड़ा असहज महसूस करेंगे; उनमें अंतर्द्वंद्व चलेगा और अंतत: वे देह-सुख का त्याग कर देंगे। वे उस मुकाम तक नहीं जाएँगे जहाँ वे ऐसा कोई काम करें जो गंभीर रूप से परमेश्वर-विरोधी हो। पवित्र आत्मा उन्हें चाहे अनुशासित करे या न करे, ताड़ना दे या न दे, लोग जब कुछ गलत करेंगे, तो उन्हें कुछ महसूस होगा। इसलिए, लोग अब हर तरह के सत्यों को समझते हैं और अगर वे उनका अभ्यास नहीं करते, तो यह एक मानवीय मसला है। मैं ऐसे लोगों के बारे में बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं देता, न ही उनके लिए कोई उम्मीद करता हूँ। तुम जैसा चाहो कर सकते हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (1)' से उद्धृत

कुछ लोग विपरीत लिंग के साथ संपर्क के प्रति अपने दृष्टिकोण में बहुत लापरवाह होते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक कुछ नहीं होता, और दोनों में से कोई भी वासनापूर्ण विचारों में लिप्त नहीं होता या कोई अनुचित कामोन्माद प्रकट नहीं करता, तब तक यह कोई बड़ी बात नहीं है। क्या सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति को ऐसे विचार रखने चाहिए? क्या यह सामान्य मानवता का चिह्न है? जब तुम शादी करने की उम्र के हो जाते हो तथा विपरीत लिंग के संपर्क में आते हो, और प्रेम करना चाहते हो, तो इसे सामान्य रूप से करो, कोई इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेकिन कुछ लोग प्रेम नहीं करना चाहते—वे कुछ दिन, जो भी उन्हें देखने में अच्छा लगता है, उसके साथ छेड़-छाड़ करना चाहते हैं, और जैसे ही कोई उन्हें भाने लगता है, वे अपनी इच्छा के पात्र के प्रति दिखावा करना शुरू कर देते हैं। और वे दिखावा कैसे करते हैं? भौंह उठाकर, आँख मारकर, या बात करते समय अपने स्वर में बदलाव करके, या फिर वे एक खास तरीके से चलते हैं या अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए हास्यपूर्ण टिप्पणियाँ करना शुरू कर देते हैं; यह दिखावा करना है। जब कोई ऐसा व्यक्ति, जो सामान्य रूप से इस तरह का न हो, इन ओछे लक्षणों का प्रदर्शन करता है, तो तुम सुनिश्चित हो सकते हो कि उसके आसपास विपरीत लिंग के कुछ सदस्य हैं, जिन्होंने उसे आकर्षित कर लिया है। ये लोग कौन हैं? तुम कह सकते हो कि वे असंयमित हैं, या वे पुरुषों और महिलाओं के बीच स्पष्ट सीमाएँ नहीं रखते, लेकिन उन्होंने किसी निंदनीय व्यवहार का प्रदर्शन नहीं किया होता। कुछ लोग कह सकते हैं कि वे तो बस छिछोरे हैं। दूसरे शब्दों में, वे अशोभनीय आचरण करते हैं; ओछे लोग आत्मसम्मान की आवश्यकता नहीं समझते। कुछ लोग रोजमर्रा की जिदगी में इन लक्षणों का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन इससे उनके कर्तव्यों का निष्पादन प्रभावित नहीं होता, और न ही यह उनके काम के पूरा होने को प्रभावित करता है, तो क्या यह वास्तव में कोई समस्या है? कुछ लोग कहते हैं : "अगर यह सत्य की तुम्हारी तलाश में बाधा नहीं बनता, तो क्या इसके बारे में बात करने की कोई आवश्यकता है?" यह किससे संबंधित है? व्यक्ति की मानवता की लज्जा और गरिमा से। व्यक्ति की मानवता लज्जा और गरिमा से रहित नहीं हो सकती, और इनके बिना उसकी मानवता सामान्य मानवता नहीं हो सकती। कुछ लोग विश्वसनीय होते हैं और वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें वे गंभीर और जिम्मेदार होते हैं। वे कड़ी मेहनत करते हैं, और अच्छे चरित्र के होते हैं, लेकिन वे बस अपने जीवन के इस पहलू को गंभीरता से नहीं लेते। जब तुम विपरीत लिंग के किसी सदस्य के साथ छेड़खानी करते हो, तो वह रचनात्मक होता है या विनाशकारी? क्या होगा अगर तुम जिससे छेड़खानी करते हो, वह तुमसे प्यार करने लगे? तुम कह सकते हो "मैं ऐसा तो नहीं चाहता था"; ठीक है, अगर तुम ऐसा नहीं चाहते लेकिन फिर भी किसी के साथ छेड़खानी करते हो, तो क्या तुम उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे? तुम उसे नुकसान पहुँचा रहे हो और अनैतिक काम कर रहे हो! ऐसा करने वाले लोग बहुत हीन मानवता के होते हैं। इसके अलावा, अगर तुम इस संबंध को आगे बढ़ाने का इरादा नहीं रखते और इसके बारे में गंभीर नहीं हो, और फिर भी तुम विपरीत लिंग के व्यक्ति को देखकर अपनी भौंहें उठाते हो और उसे आँख मारते हो, और मस्ती और हास्य के साथ दिखावा करते हो, यह दिखाने के लिए कि तुम्हारा एक अलग अंदाज है और तुम एक सुंदर पुरुष हो, और अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करते हो—अगर तुम इस तरह दिखावा करते हो, तो तुम वास्तव में क्या कर रहे हो? (लोगों को फुसला रहे हैं)। तो अब इस तरह का फुसलाने वाला व्यवहार अच्छा है या खराब? (यह खराब है।) इसमें कोई गरिमा नहीं बचती।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (भाग दो)' से उद्धृत

कुछ लोग खूबसूरती से सज-धज कर रहते हैं, लेकिन बस ऊपर-ऊपर से : बहनें अपने आपको फूलों की तरह सँवारती हैं और भाई राजकुमारों या छबीले नौजवानों की तरह कपड़े पहनते हैं। वे केवल बाहरी चीज़ों की परवाह करते हैं, जैसे कि अपने खाने-पहनने की; लेकिन अंदर से वे कंगाल होते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज़रा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके क्या मायने हो सकते हैं? और कुछ तो ऐसे हैं जो भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं—वे वाकई पूर्वी एशिया के गुलाम लगते हैं! क्या तुम लोगों को सचमुच नहीं पता कि मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? आपस में सँवाद करो : तुम लोगों ने वास्तव में क्या पाया है? तुमने इतने सालों तक परमेश्वर में आस्था रखी है, फिर भी तुम लोगों ने इतना ही प्राप्त किया है—क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या तुम लज्जित महसूस नहीं करते? इतने सालों से तुम सत्य मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो, फिर भी तुम्हारा आध्यात्मिक कद नगण्य है! अपने मध्य तरुण महिलाओं को देखो, कपड़ों और मेकअप में तुम बहुत ही सुंदर दिखती हो, एक-दूसरे से अपनी तुलना करती हो—और तुलना क्या करती हो? अपनी मौज-मस्ती की? अपनी माँगों की? क्या तुम्हें यह लगता है कि मैं मॉडल भर्ती करने आया हूँ? तुम में ज़रा भी शर्म नहीं है! तुम लोगों का जीवन कहाँ है? जिन चीज़ों के पीछे तुम लोग भाग रही हो, क्या वे तुम्हारी फिज़ूल की इच्छाएँ नहीं हैं? तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सुंदर हो, भले ही तुम्हें लगता हो कि तुम बहुत सजी-सँवरी हो, लेकिन क्या तुम सच में गोबर के ढेर में जन्मा कुलबुलाता कीड़ा नहीं हो? आज खुशकिस्मती से तुम जिस स्वर्गिक आशीष का आनंद ले रही हो, वो तुम्हारे सुंदर चेहरे के कारण नहीं है, बल्कि परमेश्वर अपवाद स्वरूप तुम्हें ऊपर उठा रहा है। क्या यह तुम्हें अब भी स्पष्ट नहीं हुआ कि तुम कहाँ से आई हो? जीवन का उल्लेख होने पर, तुम अपना मुँह बंद कर लेती हो और कुछ नहीं बोलती, बुत की तरह गूँगी बन जाती हो, फिर भी तुम सजने-सँवरने की जुर्रत करती हो! फिर भी तुम्हारा झुकाव अपने चेहरे पर लाली और पावडर पोतने की तरफ रहता है! और अपने बीच छबीले नौजवानों को देखो, ये अनुशासनहीन पुरुष जो दिनभर मटरगश्ती करते फिरते हैं, बेलगाम रहते हैं और अपने चेहरे पर लापरवाही के हाव-भाव लिए रहते हैं। क्या किसी व्यक्ति को ऐसा बर्ताव करना चाहिए? तुम लोगों में से हर एक आदमी और औरत का ध्यान दिनभर कहाँ रहता है? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोग अपने भरण-पोषण के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़े देखो, देखो तुम्हारे हाथों ने क्या प्राप्त किया है, अपने पेट पर हाथ फेरो—इतने बरसों में तुमने अपनी आस्था में जो खून-पसीना बहाया है, उसकी कीमत के बदले तुमने क्या लाभ प्राप्त किया है? तुम अब भी पर्यटन-स्थल के बारे में सोचते हो, अपनी बदबूदार देह को सजाने-सँवारने की सोचते हो—निरर्थक काम! तुमसे सामान्यता का इंसान बनने के लिए कहा जाता है, फिर भी तुम असामान्य हो, यही नहीं तुम पथ-भ्रष्ट भी हो। ऐसा व्यक्ति मेरे सामने आने की धृष्टता कैसे कर सकता है? इस तरह की मानवीयता के साथ, तुम्हारा अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करना, देह पर इतराना और हमेशा देह की वासनाओं में जीना—क्या तुम मलिन हैवानों और दुष्ट आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे मलिन हैवानों को लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहने दूँगा! ऐसा मानकर मत चलो कि मुझे पता ही नहीं कि तुम दिल में क्या सोचते हो। तुम अपनी वासना और देह को भले ही कठोर नियंत्रण में रख लो, लेकिन तुम्हारे दिल में जो विचार हैं, उन्हें मैं कैसे न जानूँगा? तुम्हारी आँखों की सारी ख्वाहिशों को मैं कैसे न जानूँगा? क्या तुम युवतियाँ अपनी देह का प्रदर्शन करने के लिए अपने आपको इतना सुंदर नहीं बनाती हो? पुरुषों से तुम्हें क्या लाभ होगा? क्या वे तुम लोगों को अथाह पीड़ा से बचा सकते हैं? जहाँ तक तुम लोगों में छबीले नौजवानों की बात है, तुम सब अपने आपको सभ्य और विशिष्ट दिखाने के लिए सजते-सँवरते हो, लेकिन क्या यह तुम्हारी सुंदरता पर ध्यान ले जाने के लिए रचा गया फरेब नहीं है? तुम लोग यह किसलिए कर रहे हो? महिलाओं से तुम लोगों को क्या फायदा होगा? क्या वे तुम लोगों के पापों का मूल नहीं हैं? मैंने तुम स्त्री-पुरुषों से बहुत-सी बातें कही हैं, लेकिन तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही पालन किया है। तुम लोगों के कान बहरे हैं, तुम लोगों की आँखें कमज़ोर पड़ चुकी हैं, तुम्हारा दिल इस हद तक कठोर है कि तुम्हारे जिस्मों में वासना के अलावा कुछ नहीं है, और यह ऐसा है कि तुम इसके चँगुल में फँस गए हो और अब निकल नहीं सकते। गंदगी और मैल में छटपटाते तुम जैसे कीड़ों के इर्द-गिर्द कौन आना चाहता है? मत भूलो कि तुम्हारी औकात उनसे ज़्यादा कुछ नहीं है जिन्हें मैंने गोबर के ढेर से निकाला है, तुम्हें मूलत: सामान्य मानवीयता से संसाधित नहीं किया गया था। मैं तुम लोगों से उस सामान्य मानवीयता की अपेक्षा करता हूँ जो मूलत: तुम्हारे अंदर नहीं थी, इसकी नहीं कि तुम अपनी वासना की नुमाइश करो या अपनी दुर्गंध-युक्त देह को बेलगाम छोड़ दो, जिसे बरसों तक शैतान ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग सजते-सँवरते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम इसमें और गहरे फँस जाओगे? क्या तुम लोगों को पता नहीं कि तुम लोग मूलत: पाप के हो? क्या तुम लोग जानते नहीं कि तुम्हारी देह वासना से इतनी भरी हुई है कि यह तुम्हारे कपड़ों तक से रिसती है, तुम लोगों की असह्य रूप से बदसूरत और मलिन दुष्टों जैसी स्थितियों को प्रकट करती है? क्या बात ऐसी नहीं है कि तुम लोग इसे दूसरों से ज़्यादा बेहतर ढंग से जानते हो? क्या तुम्हारे दिलों को, तुम्हारी आँखों को, तुम्हारे होठों को मलिन दुष्टों ने बिगाड़ नहीं दिया है? क्या तुम्हारे ये अंग गंदे नहीं हैं? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम कोई क्रियाकलाप नहीं करते, तब तक तुम सर्वाधिक पवित्र हो? क्या तुम्हें लगता है कि सुदंर वस्त्रों में सजने-सँवरने से तुम्हारी नीच आत्माएँ छिप जाएँगी? ऐसा नहीं होगा! मेरी सलाह है कि अधिक यथार्थवादी बनो : कपटी और नकली मत बनो और अपनी नुमाइश मत करो। तुम लोग अपनी वासना को लेकर एक-दूसरे के सामने शान बघारते हो, लेकिन बदले में तुम लोगों को अनंत यातनाएँ और निर्मम ताड़ना ही मिलेगी! तुम लोगों को एक-दूसरे से आँखें लड़ाने और रोमाँस में लिप्त रहने की क्या आवश्यकता है? क्या यह तुम लोगों की सत्यनिष्ठा का पैमाना और ईमानदारी की हद है? मुझे तुम लोगों में से उनसे नफरत है जो बुरी औषधि और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; मुझे तुम लोगों में से उन नौजवान लड़के-लड़कियों से नफरत है जिन्हें अपने शरीर से लगाव है। बेहतर होगा अगर तुम लोग स्वयं पर नियंत्रण रखो, क्योंकि अब आवश्यक है कि तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीयता हो, और तुम्हें अपनी वासना की नुमाइश करने की अनुमति नहीं है—लेकिन फिर भी तुम लोग हाथ से कोई मौका जाने नहीं देते हो, क्योंकि तुम्हारी देह बहुत उछाल मार रही है और तुम्हारी वासना बहुत प्रचंड है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

मनुष्य निकम्मा और नाकारा है, क्योंकि उसने स्वयं को सँजोकर नहीं रखा है। यदि वह स्वयं से प्यार करके खुद को ही रौंदता है, तो क्या यह उसके निकम्मेपन को नहीं दिखाता? मानवजाति एक ऐसी अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को सौंप देती है। किन्तु फिर भी, लोग नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण में करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है? यद्यपि मैंने मानवजाति के बीच जीवन का अनुभव नहीं किया है, और मुझे वास्तव में मानव जीवन का अनुभव नहीं रहा है, फिर भी मुझे मनुष्य की हर हरकत, उसके हर क्रिया-कलाप, हर वचन और हर कर्म की एकदम स्पष्ट समझ है। मैं मानवजाति को उसे बेहद शर्मिंदा करने की हद तक उजागर कर सकता हूँ, इस सीमा तक कि वे अपनी चालाकियाँ दिखाने का और अपनी वासना को हवा देने की धृष्टता फिर न करे। इंसान घोंघे की तरह, जो अपने खोल में छिपा रहता है, अब कभी अपनी बदसूरत स्थिति को उजागर करने का धृष्टता नहीं करता। चूँकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती, इसलिए उसका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालनाहै, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; परमेश्वर इस चीज़ से सबसे ज्यादा घृणा करता है। क्योंकि लोगों के आपसी संबंध असामान्य हैं, लोगों का आपसी व्यवहार ही सामान्य नहीं है, तो परमेश्वर और इंसान के बीच सामान्य संबंध की तो बात ही दूर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 14' से उद्धृत

मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है और इसके अतिरिक्त, उसमें भावनाएँ हैं। इसलिए, परमेश्वर की सेवा के समय विपरीत लिंग के दो सदस्यों को अकेले एक साथ मिलकर काम करना पूरी तरह निषिद्ध है। जो भी ऐसा करते पाए जाते हैं, उन्हें बिना किसी अपवाद के निष्कासित कर दिया जाएगा।

कुछ भाई सिर्फ बहनों के साथ सहभागिता करने पर जोर देते हैं, और वह भी अकेले में। वे जब बहनों के साथ सहभागिता करते हैं, तो सचमुच उनके सामने एकदम खुल जाते हैं, और किसी अन्‍य के साथ उस तरह नहीं खुलते। ये अच्छे लोग नहीं होते! कुछ बहनें दूसरी बहनों के साथ सहभागिता नहीं करतीं, और उनके सामने कभी नहीं खुलतीं। वे सहभागिता के लिए सिर्फ भाइयों की ही तलाश में लगी रहती हैं। ये किस तरह के लोग हैं? क्‍या एक भी ऐसी बहन नहीं है जो तुम्‍हारा साथ दे सके? क्‍या तुम्‍हारे साथ सहभागिता करने के लिए एक भी बहन नहीं है? क्‍या वे सब तुमसे नफरत करती हैं—क्या उनमें से कोई भी तुम्‍हारे लिए ठीक नहीं है? क्‍या सिर्फ भाइयों के साथ ही तुम्‍हारी निभती है? मुझे लगता है कि तुम्‍हारे कुछ दूसरे ही इरादे हैं! कुछ लोग होते हैं जो पूरी तरह से विपरीत लिंग के लोगों के साथ ही चिपके रहते हैं। तुम्‍हें संकल्‍पपूर्वक इस पर विजय पानी चाहिए—इस आसक्ति से निष्‍ठुरतापूर्वक छुटकारा पाओ। लोगों के स्‍वभाव भ्रष्‍ट हैं। अगर उन पर प्रतिबंध नहीं लगाए जाते, तो वे भयानक रूप से व्‍यभिचारी हो जाते हैं। ऐसे विधानों का होना हमेशा ही जरूरी होता है जो लोगों को नियंत्रित रख सकें और उनको इन बातों की हमेशा याद दिलाते रहें। ऐसी चीजों के होने से लोगों के आचरण कहीं ज्यादा बेहतर रहते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'राज्य के युग में परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के बारे में वार्ता' से उद्धृत

जब कुछ लोग समूह में जाते हैं, तो वे हमेशा विपरीत लिंग के व्यक्ति को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। वे आँख मारते हैं और अपनी आँखों से इशारे करते हैं, जब वे बोलते हैं तो उनके चेहरे अत्यधिक अभिव्यंजक हो जाते हैं, और वे दिखावा करना पसंद करते हैं। इसके लिए एक अनुचित शब्द का प्रयोग करें तो, वे चोचलेबाज हो जाते हैं। वे बेहद मजाकिया, विनोदी, खूबसूरत, रूमानी, सुरुचिपूर्ण, वीर, सुंदर, सज्जन, परिष्कृत, जानकार आदि के रूप में दिखना पसंद करते हैं; वे दिखावा करना विशेष रूप से पसंद करते हैं। ऐसे लोग दिखावा करने की कोशिश क्यों करते हैं? वे विपरीत लिंग के व्यक्ति को आकर्षित करने के लिए ऐसा करते हैं। वे विपरीत लिंग के व्यक्ति का जितना अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं—उनसे जितनी अधिक प्रशंसा, सराहना और सम्मान वे प्राप्त करते हैं—उतना ही अधिक वे अपने प्रदर्शन के प्रति उत्साहित हो जाते हैं। कलीसियाई जीवन में, समय के साथ, ऐसे लोग विभिन्न लक्ष्यों का अनुसरण करने की प्रवृत्ति रखते हैं। वे विपरीत लिंग के विभिन्न सदस्यों में अपना काँटा डालने की कोशिश करते हैं, वे उन्हें अपनी नजरों से बहकाते हैं, और उनके शब्द अकसर उत्तेजक, यहाँ तक कि यौन उत्पीड़क भी होते हैं। क्या ऐसे अंतर्वैयक्तिक संबंध उचित हैं? (नहीं।) ये संबंध अनुचित हैं। ऐसे लोग सभाओं के दौरान भी अपना प्रदर्शन छोड़ने की जहमत नहीं उठाते। जब वे विपरीत लिंग के उन सदस्यों के सामने होते हैं, जिन्हें वे पसंद करते और चाहते हैं, तो उनके शब्द बहुत मजेदार, दिलचस्प और मोहक हो जाते हैं, क्योंकि वे अपनी आँखें और भौंहें हिलाते हुए उत्तेजना से बोलते हैं, यहाँ तक कि हाव-भाव दिखाते हैं और उनके आसपास मँडराते हैं। और उनका उद्देश्य क्या होता है? यह विपरीत लिंग के व्यक्ति को आकर्षित करने और उससे अनुचित संबंध बनाने के लिए होता है। इस तथ्य के बावजूद कि यह व्यवहार उनके कई भाई-बहनों को नाराज करता है, और भले ही उनके आस-पास के कई लोगों ने उन्हें चेतावनी दी हो कि यह एक समस्या है, उन्हें कुछ समझ नहीं आता, और वे हार मानने या रुकने से इनकार कर देते हैं। अगर कलीसियाई जीवन के बाहर दो लोगों के बीच इस तरह के संबंध हों और वे एक-दूसरे के साथ हँसी-ठट्ठा करते हों, अगर यह उनके कलीसियाई जीवन में दूसरों को प्रभावित नहीं करता, या अगर कम से कम दूसरे लोग इसके बारे में नहीं सुनते, जिससे उनका मूड या सभाओं की प्रभावोत्पादकता प्रभावित नहीं होती, तो हम फिलहाल इस तरह के व्यवहार को नजरअंदाज कर सकते हैं। लेकिन अगर यह कलीसियाई जीवन में लगातार होता है, और वास्तव में दूसरों को परेशान करता है, तो इस तरह के अनुचित संबंध पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, बल्कि उसमें शामिल लोगों को कलीसियाई जीवन से हटा तक दिया जाना चाहिए। क्या यह उचित होगा? (हाँ।) अगर यह केवल किसी युवा व्यक्ति के प्यार में पड़ने और सामान्य रूप से डेटिंग करने की बात हो, तो इस तरह का प्रेमालाप सभाओं के दौरान शांत रखा जाना चाहिए, ताकि वह दूसरों को प्रभावित न करे। यह एक ऐसा स्थान है, जहाँ लोग परमेश्वर की आराधना करते हैं, जहाँ वे उसके वचन पढ़ते और प्रार्थना करते हैं और आध्यात्मिक भक्ति करते हैं, और व्यक्तिगत भावनाएँ कलीसियाई जीवन में नहीं लाई जानी चाहिए। अगर कोई संबंध कलीसियाई जीवन में लाया जाता है और वह दूसरों के लिए व्यवधान बन जाता है, अगर उसका सभाओं में उपस्थित अन्य लोगों की मन:स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, अगर वह लोगों की परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और ज्ञान और समझ प्राप्त करने की उनकी क्षमता को प्रभावित करता है, अगर वह अधिक लोगों के अन्यमनस्क और परेशान होने का कारण बनता है, तो उस संबंध को अनुचित संबंध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यहाँ तक कि एक उचित रूमानी संबंध भी अनुचित हो सकता है, अगर उसके प्रतिभागी दूसरों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं, और यह विपरीत लिंग के व्यक्ति के साथ ऐसे संबंधों के मामले में और भी अधिक सच है जो एक उचित रूमानी संबंध की सीमा से बाहर होते हैं। इसलिए, जब कलीसियाई जीवन में इस तरह के अनुचित संबंध सामने आते होते हैं, तो उसमें शामिल सभी लोगों को चेतावनी दी जानी चाहिए और उन्हें आगे बढ़ने से रोका जाना चाहिए, बजाय इसके कि उनके कार्यों को चुपचाप स्वीकार कर लिया जाए या उन्हें माफ कर दिया जाए। ऐसे लोगों को सिद्धांतों के अनुसार प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, बल्कि परिष्कृत तक दिया जाना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (14)' से उद्धृत

कुछ लोगों को सुंदर होने का सौभाग्य प्राप्त होता है, और वे लगातार विपरीत लिंग द्वारा अपना पीछा किया जाता हुआ पाते हैं; जितना अधिक लोग उनका पीछा करते हैं, उतना ही अधिक उन्हें लगता है कि वे दिखावा कर सकते हैं। क्या यह खतरनाक नहीं है? इस स्थिति में तुम्हें क्या करना चाहिए? (इस फंदे को पहचानना और इससे बचना चाहिए।)। यह वास्तव में एक फंदा है, जिससे तुम्हें बचना चाहिए—अगर तुम इससे नहीं बचते, तो तुम बखूबी पाओगे कि उस व्यक्ति ने तुम्हें फँसा लिया है। इससे पहले कि तुम फँस जाओ, तुम्हारा इस फंदे से बचना जरूरी है; इसे आत्म-संयम कहा जाता है। आत्म-संयम रखने वाले लोगों में लज्जा और गरिमा की भावनाएँ होती है। जिनमें ये भावनाएँ नहीं होतीं, उन्हें कोई भी पकड़ कर बहका सकता है; वे अपना पीछा करने वाले हर व्यक्ति को प्रत्युत्तर देते हैं, जो उन्हें बहुत बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। इसके अलावा, वे जान-बूझकर दिखावा करेंगे, सजे-सँवरेंगे और ठाठदार लिबास पहनेंगे, और वे विशेष रूप से वो कपड़े पहनते हैं जिनसे वे और अधिक सुंदर, अधिक आकर्षक और मनोहर लग सकें, और वे उन्हें हर दिन पहनेंगे; यह खतरनाक है और यह दिखाता है कि वे जानबूझकर दूसरों को फुसलाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर तुम इन कपड़ों में बहुत विशिष्ट, बहुत मोहक लगते हो, तो तुम्हें उन्हें त्याग देना चाहिए और पहनने के लिए अलग कपड़े चुनने चाहिए। अगर तुम इस बारे में कृत-संकल्प हो, तो इसे प्राप्त करने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। किंतु अगर तुममें यह संकल्प नहीं है, बल्कि तुम एक साथी तलाशना चाहते हो, तो आगे बढ़ो और किसी को ढूँढ़ लो : दूसरे को लुभाए या बहकाए बिना एक-दूसरे के साथ सामान्य रूप से बातचीत करो। अगर तुम साथी की तलाश नहीं कर रहे हो, लेकिन दूसरों को फुसलाते और बहकाते हो, तो इसे केवल बेशर्मी कहा जा सकता है। तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि तुम क्या चुन रहे हो, तुम जो रास्ता अपना रहे हो वह सही है या नहीं, और क्या तुम्हें यही करना चाहिए। क्या तुम सभी इसका पालन कर सकते हो? (हममें यह संकल्प है)। अगर तुममें यह संकल्प है, तो तुम्हारे पास ऊर्जा है, प्रेरणा है, और तुम्हारे लिए इसका पालन करना आसान होगा। कुछ लोग प्रकृति से अनिवार्यत: सभ्य होते हैं, और इसके अलावा, परमेश्वर में आस्था पाने के बाद, वे सत्य की तलाश करने और सही मार्ग अपनाने के लिए उत्सुक होते हैं; उनमें स्वयं को लुभाए जाने की इच्छा नहीं होती, और अगर कोई उन्हें लुभाने का प्रयास करता है, तो वे उसका जवाब नहीं देते। कुछ लोगों में इसकी काफी संभावना होती है, जबकि अन्य लोग इस पर कोई ध्यान नहीं देते; कुछ लोगों में यह संकल्प दिखता है, लेकिन वे खुद नहीं बता सकते कि वे वास्तव में ऐसा करते हैं या नहीं। यह ऐसी चीज है, जिससे तुम्हें सही तरह से निपटना चाहिए और जिसकी फिर से जाँच करनी चाहिए, और यह समझना चाहिए कि यह सामान्य मानवता की गरिमा और लज्जा का एक अभिन्न अंग कैसे है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (भाग दो)' से उद्धृत

मनुष्य के स्वभाव का समाधान देहसुख त्यागने से प्रारम्भ होता है, साथ ही देहसुख त्यागने के लिए सिद्धांतों का होना भी आवश्यक है। क्या कोई उलझन भरे मन से देहसुख त्याग सकता है? जैसे ही कोई समस्या आती है, तुम देहसुख के आगे समर्पण कर देते हो। कुछ भाई सुंदर स्त्रियों को देख कर राह में रुक जाते हैं। अगर तुम भी ऐसा करते हो तो तुम्हें स्वयं के लिए एक मंत्र-वाक्य तय करना होगा। जब एक सुंदर स्त्री तुम्हारे पास आ जाए तो तुम्हें चले जाना चाहिए या फिर क्या करना चाहिए? तुम्हें क्या करना चाहिए यदि वह आगे बढ़कर तुम्हारा हाथ पकड़ लेती है? यदि तुम्हारा कोई सिद्धांत नहीं हैं, तो ऐसी स्थिति से सामना होने पर तुम लड़खड़ा जाओगे। यदि तुम धन एवं संपत्ति को देखकर लालच महसूस करते हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें इस प्रश्न पर ख़ासतौर से ध्यान देना चाहिए, और इसके समाधान के लिए अपने-आपको तैयार करना चाहिए, और तुम आहिस्ता-आहिस्ता अपने देहसुख को त्याग पाओगे। एक सिद्धांत है जो काफी महत्वपूर्ण है, और वह यह है कि जब कोई समस्या आए, तो तुम्हें उसे परमेश्वर के सामने लाना चाहिए और उस पर देर तक खोज करनी चाहिए। उसके अलावा, हर शाम तुम्हें अपनी स्थितियों की जाँच करनी चाहिए और अपने व्यवहार का सूक्ष्म निरीक्षण करना चाहिए : तुम्हारे कौन-से कृत्य सत्य के अनुरूप किए गए थे और किन कृत्यों से सिद्धान्तों का उल्लंघन हुआ था? यह एक और सिद्धांत है। ये दो बिन्दु बहुत महत्वपूर्ण हैं : एक तो यह कि जब कोई समस्या आए, तो उसकी जाँच करो, और दूसरा यह कि उसके बाद आत्म-मंथन करो। तीसरा सिद्धान्त यह है कि इस बारे में तुम्हें एकदम स्पष्ट होना चाहिए कि सत्य का अभ्यास करने का क्या अर्थ होता है और सैद्धान्तिक रीति से मामलों को संभालना क्या सूचित करता है। एक बार जब तुम इस पर बिलकुल स्पष्ट हो जाते हो, तो तुम मुद्दों को सही रीति से संभाल लोगे। इन तीन सिद्धान्तों को अपनाकर तुम स्वयं को नियंत्रित करने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हारी भ्रष्ट प्रकृति उजागर नहीं होगी या पुन: सिर नहीं उठाएगी। ये इंसानी प्रकृति को सुधारने के मूल सिद्धान्त भी हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास और अपनी प्रकृति का समाधान करना' से उद्धृत

तुम्हारा बचाया जाना इस बात पर निर्भर नहीं है कि तुम कितने वरिष्ठ हो या तुम कितने साल से काम कर रहे हो, और इस बात पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं है कि तुमने कितनी साख बना ली है। बल्कि इस बात पर निर्भर है कि क्या तुम्हारा लक्ष्य फलीभूत हुआ है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जिन्हें बचाया जाता है वे ऐसे "वृक्ष" होते हैं जिन पर फल लगते हैं, ऐसे वृक्ष नहीं जो हरी-भरी पत्तियों और फूलों से तो लदे होते हैं, लेकिन जिन पर फल नहीं आते। अगर तुम बरसों तक भी गलियों की खाक छानते रहे हो, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारी गवाही कहाँ है? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी श्रद्धा, खुद के लिए तुम्हारे प्रेम और तुम्हारी वासनायुक्त कामनाओं से कहीं कम है—क्या इस तरह का व्यक्ति पतित नहीं है? वे उद्धार के लिए नमूना और आदर्श कैसे हो सकते हैं? तुम्हारी प्रकृति सुधर नहीं सकती, तुम बहुत ही विद्रोही हो, तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता! क्या ऐसे लोगों को हटा नहीं दिया जाएगा? क्या मेरे काम के समाप्त हो जाने का समय तुम्हारा अंत आने का समय नहीं है? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत सारा कार्य किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं—इनमें से कितने सच में तुम लोगों के कानों में गए हैं? इनमें से कितनों का तुमने कभी पालन किया है? जब मेरा कार्य समाप्त होगा, तो यह वो समय होगा जब तुम मेरा विरोध करना बंद कर दोगे, तुम मेरे खिलाफ खड़ा होना बंद कर दोगे। जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना "काम" करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों से कम नहीं हो, सब-कुछ मेरे विरोध में कर रहे हो! तुम लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम्हें अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों की श्रद्धा कहाँ है? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न आज्ञाकारिता है, न श्रद्धा है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लम्पट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊंगा। मैं तुम मलिन राक्षसों से घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामोत्तेजना तुम लोगों को नरक में धकेल देगी। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? मलिन राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग घिनौने हो! तुम निकृष्ट हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, यह सत्य, यह मार्ग और यह जीवन तुम लोगों को आकर्षित नहीं करता; बल्कि, तुम लोग पाप की ओर, धन की ओर, रुतबे की ओर, शोहरत और लाभ की ओर आकर्षित होते हो; देह-सुख की ओर आकर्षित होते हो; सुंदर स्त्री-पुरुषों की ओर आकर्षित होते हो। मेरे राज्य में प्रवेश करने की तुम लोगों की क्या पात्रता है? तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी बड़ी है, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर से भी ऊँचा है, लोगों में तुम्हारी प्रतिष्ठा का तो कहना ही क्या—तुम लोग ऐसे आदर्श बन गए हो जिन्हें लोग पूजते हैं। क्या तुम प्रधान स्वर्गदूत नहीं बन गए हो? जब लोगों के परिणाम उजागर होते हैं, जो वो समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

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