100. क्या किसी के पास सत्य की वास्तविकता है, यह पहचानने के सिद्धांत

(1) यह देखो कि परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, क्या कोई आत्म-चिंतन में प्रवृत्त हो सकता है, क्या वह यह पता लगाने में सक्षम है कि जीवन में उसकी भ्रष्टता कैसे उजागर होती है, और क्या वह स्वयं को जान सकता और वास्तव में पश्चाताप कर सकता है;

(2) यह देखो कि क्या कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को निभाने में सच्चाई की तलाश कर सकता है, समस्याओं को हल करने के लिए इसका उपयोग कर सकता है, दूसरों के साथ न्यायपूर्ण आचरण कर सकता है, और अपने भाइयों और बहनों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार कर सकता है;

(3) यह देखो कि क्या कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना को, साथ ही साथ उन वचनों की काट-छाँट और उनके निपटारे को भी, स्वीकार कर सकता है, ताकि उसकी भ्रष्टता शुद्ध हो सके, और क्या वह अपने अनुभव से सच्ची गवाही व्यक्त कर सकता है;

(4) यह देखो कि क्या चीज़ों पर उसके दृष्टिकोण का, जीवन के प्रति उसके नज़रिए का, और उसके मूल्यों का कोई वास्तविक रूपांतर हुआ है; क्या वह चीज़ों को परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में देख सकता है; और क्या वह कथनी और करनी, दोनों में, ईमानदार है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है : उसका समस्त कार्य व्यावहारिक है, उसके द्वारा कहे जाने वाले सभी वचन व्यावहारिक हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले सभी सत्य व्यावहारिक हैं। हर वह चीज़, जो उसका वचन नहीं है, खोखली, अस्तित्वहीन और अनुचित है। आज पवित्र आत्मा परमेश्वर के वचनों में लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए उपलब्ध है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश करना है, तो उन्हें वास्तविकता को खोजना चाहिए, और वास्तविकता को जानना चाहिए, जिसके बाद उन्हें वास्तविकता का अनुभव करना चाहिए और वास्तविकता को जीना चाहिए। लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उतना ही अधिक वे यह पहचानने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के शब्द वास्तविक हैं या नहीं; लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उनमें धारणाएँ उतनी ही कम होती हैं; लोग वास्तविकता का जितना अधिक अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे वास्तविकता के परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों के बंधन से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों के उतना ही अधिक निकट होते हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, वे वो लोग होते हैं जिनमें वास्तविकता होती है, जो वास्तविकता को जानते हैं और जो वास्तविकता का अनुभव करके परमेश्वर के वास्तविक कर्मों को जान गए हैं। तुम परमेश्वर के साथ व्यावहारिक ढंग से जितना अधिक सहयोग करोगे और अपने शरीर को जितना अधिक अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे, और इस तरह तुम्हें परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का उतना ही अधिक ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रह पाओ, तो तुम्हें अभ्यास का वर्तमान मार्ग अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में अधिक सक्षम हो जाओगे। आज केंद्रबिंदु वास्तविकता है : लोगों में जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और परमेश्वर की इच्छा की उनकी समझ अधिक बड़ी होगी। वास्तविकता सभी शब्दों और वादों पर विजय पा सकती है, यह समस्त सिद्धांतों और विशेषज्ञताओं पर विजय पा सकती है, और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे उतना ही अधिक परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, और उसके वचनों के लिए भूखे एवं प्यासे होते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम्हारा जीवन-दर्शन, धार्मिक धारणाएँ एवं प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने से स्वाभाविक रूप से मिट जाएगा। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनके द्वारा अलौकिक चीज़ों की खोज किए जाने की संभावना है, और वे आसानी से छले जाएँगे। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य करने का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को मानते हुए स्थिरता के साथ उनकी व्याख्या करने के योग्य होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है; बातें इतनी भी सरल नहीं हैं जितनी तुम सोचते हो। तुम्हारे पास वास्तविकता है या नहीं, यह इस बात पर आधारित नहीं है कि तुम क्या कहते हो; अपितु यह इस पर आधारित है कि तुम किसे जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाते हैं, तभी कहा जा सकता है कि तुममें वास्तविकता है और तभी कहा जा सकता है कि तुमने वास्तविक समझ और असल आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है। तुम्हारे अंदर लम्बे समय तक परीक्षा को सहने की क्षमता होनी चाहिए, और तुम्हें उस समानता को जीने के योग्य होना अनिवार्य है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुम से करता है; यह मात्र दिखावा नहीं होना चाहिए; बल्कि यह तुम में स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होना चाहिए। तभी तुम में वस्तुतः वास्तविकता होगी और तुम जीवन प्राप्त करोगे। मैं सेवाकर्मियों के परीक्षण का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं: सेवाकर्मियों के विषय में कोई भी बड़े-बड़े सिद्धांत बता सकता है। इस विषय के बारे में सभी को अच्छा ज्ञान है; वे लोग इस विषय पर बोलते हैं और हर भाषण पिछले से बेहतर होता है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी बड़े परीक्षण से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसके पास देने के लिए अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य के जीवन जीने में अभी भी बहुत कमी है, यह पूरी तरह से उसकी समझ के विपरीत है। इसलिए इसका, मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद बनना अभी शेष है, और यह अभी मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसका आध्यात्मिक कद रेत पर निर्मित एक किले के समान है जो हिल रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है। मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से बहुत ही अल्प वास्तविकता प्रवाहित हो रही है और उसके जीवन में समस्त वास्तविकता ज़बरदस्ती लाई गई है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। हालाँकि लोग ये दावा करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम कभी परिवर्तित नहीं होता, लेकिन वे ऐसा परीक्षणों का सामना होने से पहले कहते हैं। एक दिन अचानक परीक्षणों से सामना हो जाने पर जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता से मेल नहीं खाएँगी और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को दरकिनार कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ होती हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य एक कठोर परीक्षण, एक बहुत बड़े परीक्षण से गुज़रता है। क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर जब मनुष्य का परीक्षण ले रहा होता है, तो वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा; और इसी प्रकार मनुष्य को उजागर किया जाता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम आज के परमेश्वर को जानते हो और साथ ही तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं। क्या तुम परमेश्वर के कार्यों को लेकर सन्देहों से सचमुच मुक्त हो? जब तुम पर कोई बड़ा परीक्षण आयेगा तो क्या तुम दृढ़ रह सकोगे? कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है "मैं गारंटी देता हूँ कि कोई समस्या नहीं आएगी?" कौन दृढ़तापूर्वक कहने की हिम्मत कर सकता है, "हो सकता है दूसरों को सन्देह हो, परन्तु मैं कभी भी सन्देह नहीं करूँगा?" यह ठीक वैसे ही है जैसे जब पतरस का परीक्षण हुआ : वह हमेशा सत्य के प्रकट किए जाने से पहले बड़ी-बड़ी बातें करता था। यह पतरस की ही एक अनोखी कमी नहीं थी; यह सबसे बड़ी कठिनाई है, जिसका सामना प्रत्येक मनुष्य वर्तमान में कर रहा है। यदि परमेश्वर के आज के कार्य के तुम्हारे ज्ञान को देखने के लिए मैं कुछ स्थानों पर जाऊँ, या कुछ भाइयों और बहनों से भेंट करूँ, तो तुम सब निश्चित रूप से अपने ज्ञान के विषय में बहुत कुछ कह पाओगे, और ऐसा प्रतीत होगा कि तुम्हारे अंदर कोई सन्देह नहीं है। यदि मैं तुम से पूछूँ : "क्या तुम वास्तव में तय कर सकते हो कि आज का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? बिना किसी सन्देह के?" तुम निश्चित रूप से उत्तर दोगे : "बिना किसी सन्देह के, यह कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा ही किया जा रहा है।" एक बार जब तुम इस प्रकार से उत्तर दे दोगे, तो तुम में थोड़ा-सा भी सन्देह नहीं होगा बल्कि तुम बहुत आनन्द का अनुभव कर रहे होगे, यह सोचकर कि तुम ने थोड़ी-सी वास्तविकता प्राप्त कर ली है। जो लोग बातों को इस रीति से समझते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनमें बहुत कम वास्तविकता होती है; जो व्यक्ति जितना अधिक सोचता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह परीक्षणों में उतना ही कम स्थिर रह पाता है। धिक्कार है उन पर जो अहंकारी और दंभी होते हैं, और धिक्कार है उन्हें जिन्हें स्वयं का कोई ज्ञान नहीं है; ऐसे लोग बातें करने में कुशल होते हैं, परन्तु अपनी बातों पर अमल करने में ऐसे लोग बहुत ही खराब होते हैं। छोटी-सी भी समस्या नज़र आते ही ये लोग सन्देह करना आरम्भ कर देते हैं और त्याग देने का विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। उनमें कोई वास्तविकता नहीं होती; उनके पास मात्र सिद्धान्त हैं, जो धर्म से ऊपर हैं और ये उन समस्त वास्तविकताओं से रहित हैं जिनकी परमेश्वर अभी अपेक्षा करता है। मुझे उनसे अधिक घृणा होती है जो मात्र सिद्धान्तों की बात करते हैं और जिनमें कोई वास्तविकता नहीं होती। जब वे कोई कार्य करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, परन्तु जैसे ही उनका सामना वास्तविकता से होता है, वे बिखर जाते हैं। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि इन लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हवा और लहरें कितनी भयंकर हैं, यदि तुम अपने मन में थोड़-सा भी सन्देह किए बिना खड़े रह सकते हो और तुम स्थिर रह सकते हो और उस समय भी इन्कार करने की स्थिति में नहीं रहते हो जब तुम ही अकेले बचते हो, तब यह माना जाएगा कि तुम्हारे पास सच्ची समझ है और वस्तुतः तुम्हारे पास वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है; अगर ऐसा हो तो क्या यह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन में प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि लोग केवल वास्तविकता की खोखली बातें ही कर पायेंगे, तो क्या वे अपने स्वभाव में रूपांतरण ला सकते हैं? राज्य के अच्छे सैनिक उन लोगों के समूह के रूप में प्रशिक्षित नहीं होते जो मात्र वास्तविकता की बातें करते हैं या डींगें मारते हैं; बल्कि वे हर समय परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, ताकि किसी भी असफलता को सामने पाकर वे झुके बिना लगातार परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकें और वे फिर से संसार में न जाएँ। इसी वास्तविकता के विषय में परमेश्वर बात करता है; और मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होंगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है और इसके कोई वास्तविक मायने नहीं हैं। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! वे सभी जो परमेश्वर के वचनों की गलत समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वास्तविकता रहित अज्ञानी लोग हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे सभी जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

इसे भविष्य में स्मरण रखना। खोखले ज्ञान के विषय में बात मत करना; मात्र अभ्यास के मार्ग, और वास्तविकता के विषय में बात करना। वास्तविक ज्ञान से वास्तविक अभ्यास में पारगमन और फिर अभ्यास करने से वास्तविकता के जीवनयापन में पारगमन। दूसरों को उपदेश मत दो और वास्तविक ज्ञान के विषय में बात मत करो। यदि तुम्हारी समझ कोई मार्ग है, तो इसके अनुसार जो कहना है मुक्त रूप से कहो; यदि यह मार्ग नहीं है, तब कृपा करके चुपचाप बैठ जाओ और बात करना बन्द कर दो! जो कुछ तुम कहते हो वह बेकार है। तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को जलाने के लिए समझदारी की बातें करते हो। क्या यही तुम्हारी अभिलाषा नहीं है? क्या यह जानबूझकर दूसरों के साथ खिलवाड़ करना नहीं है? क्या इसका कोई मूल्य है? अगर अनुभव करने के बाद तुम समझदारी की बातें करोगे तो तुम्हें डींगें मारने वाला नहीं कहा जायेगा, अन्यथा तुम मात्र एक ऐसे व्यक्ति होगे जो घमण्ड की बातें करता रहता है। तुम्हारे वास्तविक अनुभव में ऐसी अनेक बातें हैं जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते और तुम अपनी देह से विद्रोह नहीं कर सकते; तुम हमेशा वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, कभी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करते, परन्तु फिर भी तुम में सैद्धान्तिक ज्ञान की बात करने की हिम्मत है। तुम बेशर्म हो! तुम परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ की बात करने की हिमाकत करते हो—तुम कितने ढीठ हो! उपदेश देना और डींगें मारना तुम्हारी प्रवृति बन चुकी है, और तुम ऐसा करने के अभ्यस्त हो चुके हो। जब कभी भी तुम बात करना चाहते हो तो तुम सरलता से ऐसा कर लेते हो और जब अभ्यास करने की बात आती है तब तुम साज-सज्जा में डूब जाते हो। क्या यह दूसरों को मूर्ख बनाना नहीं है? तुम मनुष्यों को मूर्ख बना सकते हो, परन्तु परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। मनुष्यों को पता नहीं होता और न ही उनमें पहचानने की योग्यता होती है, परन्तु परमेश्वर ऐसे मसलों के विषय में गम्भीर है, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। हो सकता है तुम्हारे भाई और बहनें तुम्हारा समर्थन करें, तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा करें, तुम्हारी सराहना करें, परन्तु यदि तुम में वास्तविकता नहीं है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें नहीं छोड़ेगा। सम्भवतः व्यवहारिक परमेश्वर तुम्हारी गलतियों को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं देगा, और तुम इसे सह नहीं पाओगे। क्या तुम इस पर विश्वास करते हो? अभ्यास की वास्तविकता के विषय में अधिक बात करो; क्या तुम वह पहले ही भूल चुके हो? "उथले सिद्धान्तों की बात और निस्सार वार्तालाप कम करो; अभी से अभ्यास आरम्भ करना सर्वोत्तम है।" क्या तुम ये वचन भूल चुके हो? क्या तुम इसे बिल्कुल नहीं समझते? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

यह कैसे जाना जा सकता है कि किसी व्यक्ति के पास सत्य वास्तविकता है या नहीं? इसका पता उनके मुंह खोलते ही और कुछ बोलते ही चल जाता है। सत्य वास्तविकता से वंचित व्यक्ति पूरी तरह से धर्म-सिद्धांत की बात करता है, विषय चाहे कोई भी हो; उन्हें देखते ही समझा जा सकता है कि वे आमतौर से सत्य का अभ्यास नहीं करते। जैसे ही कोई सत्य वास्तविकता से संपन्न व्यक्ति तुम्हारे संपर्क में आता है, उनकी संगति तुम्हारी समस्याओं को पल भर में दूर कर सकती है। वे थोड़े-से शब्दों में ही तुम्हारी वर्षों से चली आ रही समस्याओं की सच्चाई को खोलकर रख देते हैं, ऐसी समस्याएँ जिन्हें कोई भी दूसरा धर्म-सिद्धांत के प्रवचन देकर स्पष्ट नहीं कर पाया है, और वे तुम्हें सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझने में सक्षम बनाते हैं। तुम अब समस्याओं से ग्रस्त नहीं रहते; तुम अब बंधनों में जकड़ा हुआ महसूस नहीं करते; तुम अब अंकुशों में नहीं रहे, बल्कि मुक्त और स्वतंत्र हो गए हो। तो ये लोग जो कहते हैं वह सत्य वास्तविकता है, ठीक है न? अगर तुम उनके शब्दों को नहीं समझते हो, चाहे वे जो भी कहें, और अगर वे जो कुछ कहते हैं उससे तुम्हारी समस्या जड़ से हल नहीं होती, तब जो कुछ वे कहते हैं वह सिर्फ अक्षर और धर्म-सिद्धांत हैं। अक्षर और धर्म-सिद्धांत लोगों का पोषण या मदद नहीं कर सकते, और वे लोगों की व्यवहारिक समस्याओं को नहीं सुलझा सकते।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

लोगों ने भले ही अनेक वर्षों तक अपनी आस्था बनाए रखी हो, लेकिन उन्हें यह बात कभी समझ में नहीं आती कि परमेश्वर में विश्वास करने के क्या लाभ हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि आस्था रखने से उन्हें कौन से वास्तविक लाभ प्राप्त हो सकते हैं, और वे अक्सर अविश्वासियों जैसे होते हैं, दुनिया की प्रवृत्तियों, या इसके विभिन्न प्रकार के प्रलोभनों और बहकावों, या देह से जुड़ी दौलत-शोहरत को हरा पाने में असमर्थ होते हैं। यहां तक कि उन्हें एकदम खालीपन का अहसास भी होता है, उनमें यह अहसास समय-समय पर उभरता रहता है और अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है। वे बार-बार सोचते हैं, "परमेश्वर में विश्वास का कोई अर्थ नहीं है, है ना? अगर मेरी आस्था इस स्तर तक विकसित हो चुकी है, तो क्या मुझे अपेक्षित स्तर के करीब नहीं होना चाहिए? मुझे लगता है कि ऐसा ही होता आया है, और कहा नहीं जा सकता कि मुझे बचाया जा सकेगा या नहीं।" यह क्या बताता है? (सत्य को नहीं समझना, और सत्य की वास्तविकता में प्रविष्ट नहीं होना।) बिलकुल ऐसा ही है; उन्होंने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है। यानी कि लोग परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए उन सत्यों में से किसी भी सत्य को नहीं समझते जिनकी समझ उन्हें होनी चाहिए। लोगों ने इस बात को समझा क्यों नहीं? इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर के वचनों को अपने दैनिक जीवन में उन सिद्धांतों और अभ्यास-पथ के रूप में नहीं अपनाया है जिन्हें अमल में लाया जाना चाहिए और अपनी वास्तविकता में बदला जाना चाहिए। वे जो कुछ भी करते हैं, जिस तरह रहते हैं, जिस तरह अपना जीवन-निर्वाह करते हैं, या जिस तरह लोगों, घटनाओं और चीज़ों से निपटते हैं, उनमें से कुछ भी परमेश्वर के वचनों पर आधारित नहीं है। तुमने परमेश्वर के किसी भी वचन को अभ्यास द्वारा महसूस नहीं किया और न ही सीखा है, और तुम्हारे पास न तो व्यक्तिगत अनुभव है, न ही तुम्हें यह मालूम है कि उसके वचनों का असली अर्थ क्या है। इसीलिए, परमेश्वर संसार को तथा लोगों के भ्रष्टाचार को बेनकाब करता है और हर तरह के व्यक्ति की विभिन्न दशाओं को उजागर करता है, हर प्रकार के व्यक्ति, घटना, या वस्तु जिनसे इस दुनिया में तुम्हारा सामना होता है, उनकी सटीक प्रकृति को उजागर करता है और फिर भी तुम उनके सार की थाह नहीं पा सकते। क्योंकि तुमने उनका अनुभव नहीं किया है या उनमें प्रवेश नहीं किया है, तुम कभी भी उनकी थाह नहीं पा सकोगे। तुमने नाम-मात्र के लिए, इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, और अभी भी तुम वही हो जो पहले थे; तुम थोड़ा भी नहीं बदले। यानी, तुम्हारे हृदय की गहराइयों, तुम्हारी प्रकृति और सार के संबंध में, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव में थोड़ा भी बदलाव नहीं आया है तो, शुरू से अंत तक, तुम इस संसार को, मानवजाति को, शैतान को, प्रवृत्तियों को, और दौलत-शोहरत को त्याग नहीं सकते, क्योंकि तुम उनके असली स्वरूप को समझ नहीं पाते। इसलिए तुम अक्सर एक खालीपन और बेचैनी महसूस करते हो, और यह भी कि तुममें आत्मविश्वास नहीं है; इसके अतिरिक्त, तुम परमेश्वर के प्रति सच्ची आस्था उत्पन्न करने में असमर्थ होते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज में केवल सत्य की तलाश से ही उसकी वास्तविकता में प्रवेश किया जा सकता है' से उद्धृत

जिन लोगों में सत्य-जीवन प्रदर्शित करने का अभाव होता है, वे क्या अभिव्यक्त करते हैं? स्वाभाविक है कि बिना सत्य के, वे अपनी शैतानी प्रकृति के नियंत्रण और बंधनों के अधीन होंगे; स्वाभाविक है कि वे ऐसे स्वभाव को प्रकट करेंगे जो अहंकारी और दंभी है, स्वार्थी और नीच, धृष्ट और दुराग्रही है और अकेले ही निर्णय और कार्य करने के लिए उत्तरदायी है। ऐसे लोग झूठ बोलेंगे और धोखा देंगे, धोखेबाज और धूर्त होंगे और दूसरों के प्रति संदेह करने और दूसरों पर आक्षेप लगाने और राय बनाने की भावना से प्रवृत्त होंगे; वे हमेशा दूसरों का आकलन अपने पूर्वाग्रहों और इरादों की दूरबीन से करेंगे। ऐसे लोग वचन और कर्मों दोनों में, हमेशा अपनी प्राथमिकताओं पर भरोसा करेंगे और जब उनका सामना रुकावटों और असफलताओं से होगा, वे नकारात्मक बन जाएँगे। कभी-कभी वे अत्यधिक अहंकारी होंगे और कभी-कभी वे ऐसी नकारात्मकता में धँस जाएँगे कि वे वास्तव में ज़मीन में एक बिल खोद देंगे। ये लोग हर बात की अति करते हैं और कभी सामान्य नहीं होते हैं। जब वे अपने ज़हर के दांत नहीं दिखा रहे होते हैं, वे भोले-भाले होने का स्वांग रचते हैं। इस समय तुम लोग इसी तरह की स्थिति में होः तुम यातना भुगतने और कीमत चुकाने को तैयार हो; तुम्हारे संकल्प और दृढ़ता पूर्ण है—लेकिन अभी भी तुम्हारे पास सत्य-वास्तविकता नहीं है। जिन लोगों के पास अपने जीवन को सेवा में लगाने के लिए सत्य-वास्तविकता है, वे कैसे स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं? मैं तुम लोगों को कुछ प्रमुख संकेत देता हूँ। जब लोगों के पास सत्य-वास्तविकता होती है, तो एक तरफ, वे कुछ सत्य को समझ गए होते हैं; दूसरी तरफ, वे स्वभाव में कुछ बदलाव प्रदर्शित करना शुरू कर देते हैं। स्वभाव में बदलाव की एक विशेषता होती है। अर्थात्, उन चीज़ों को मानने में सक्षम होना जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। चाहे कोई भी तुम्हें सुझाव दे—चाहे वे युवा हों या बूढ़े, चाहे तुम्हारी उनसे अच्छी तरह से पटती हो, चाहे तुम लोगों के बीच का संबंध अच्छा हो या बुरा—जब तक कि वे कुछ ऐसा कहते हैं जो सही है, सत्य के अनुरूप है, और परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए फायदेमंद है, तब तक तुम इसे सुन, ग्रहण और स्वीकार कर सकते हो, और किन्हीं भी अन्य कारकों से प्रभावित नहीं हो सकते हो। यह उस विशेषता का पहला पहलू है। सबसे पहले तुम सत्य को, और साथ ही उन चीज़ों को स्वीकार कर सकते हो जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। दूसरा यह है कि किसी समस्या का सामना होने पर सत्य की खोज करने में सक्षम होना। तुम न केवल सत्य को स्वीकार कर सकते हो; तुम्हें इसकी तलाश करने में भी समर्थ अवश्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि तू किसी नई समस्या का सामना करता है जिसे कोई भी नहीं समझ सकता है, तो तू सत्य की तलाश कर सकता है, यह देख सकता है कि बातों को सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप बनाने के लिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तुझे क्या करना और किस चीज़ का अभ्यास करना चाहिए। एक और विशेषता है परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होने की योग्यता पाना। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में कैसे मननशील होना चाहिए? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू कौन से कर्तव्य को कर रहा है और इस कर्तव्य में परमेश्वर की क्या अपेक्षाएँ हैं। तुझे इस सिद्धांत को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। अपना कर्तव्य परमेश्वर की अपेक्षानुसार पूरा करना चाहिए, और इसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए करना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा भी समझनी चाहिए, और तेरे कर्तव्य का वांछित परिणाम क्या है, एवं तुझे ज़िम्मेदारी और आस्थापूर्ण रूप से कार्य करना चाहिए। ये सभी परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के तरीके हैं। यदि तू यह नहीं जानता है कि जो तू कर रहा है, उसमें परमेश्वर की इच्छा पर कैसे मननशील हुआ जाए, तो उसे पूरा करने के लिए, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तुझे कुछ खोज अवश्य करनी चाहिए। अगर तुम सब इन तीन सिद्धांतों को अमल में ला सको, तुम उनके सहारे जिस तरह वास्तव में जी रहे हो, उसे माप सको, और अभ्यास के मार्ग को खोज सको, तो फिर तुम सैद्धांतिक तरीके से मामलों को संभाल रहे होगे। चाहे तुम्हारा सामना जिस किसी भी बात से हो, या चाहे तुमको जिस किसी भी समस्या से निपटना पड़ रहा हो, तुमको हमेशा तलाश करनी चाहिये कि तुमको किन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, उनमें से प्रत्येक में क्या विवरण शामिल हैं, उन्हें अमल में कैसे लाया जाये ताकि तुम सिद्धांतों का उल्लंघन न करो। एक बार जब तुम में इन बातों की स्पष्ट समझ होगी, तो तुम स्वाभाविक रूप से सत्य पर अमल कर पाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य को अभ्यास में ला कर ही तू भ्रष्ट स्वभाव के बंधनों को त्याग सकता है' से उद्धृत

जिन लोगों के पास सत्य है, वे वही हैं जो अपने वास्तविक अनुभवों में, कभी पीछे हटे बिना, अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, और जो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों के साथ सामान्य संबंध रख सकते हैं, जो अपने ऊपर कुछ बीतने पर पूर्णतः परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाते हैं, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा अभ्यास और तुम्हारे प्रकाशन परमेश्वर की गवाही हैं, वे मनुष्य का जीवनयापन करना और परमेश्वर की गवाही हैं, और यही वास्तव में परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेना है; जब तुमने इस बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम्हें यथोचित प्रभाव की प्राप्ति हो चुकी होगी। तुम्हारे पास वास्तविक जीवनयापन होता है और तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप अन्य लोगों द्वारा प्रशंसा से देखा जाता है। तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण है, किंतु तुम अत्यंत धर्मनिष्ठता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन संप्रेषित करते हो, तब तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित और प्रबुद्ध किए जाते हो। तुम अपने शब्दों के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा कह पाते हो, वास्तविकता संप्रेषित कर पाते हो, और तुम आत्मा से सेवा करने के बारे में बहुत-कुछ समझते हो। तुम अपनी वाणी में खरे हो, तुम शालीन और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं हो और मर्यादित हो, परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कर पाते हो और जब तुम पर कुछ बीतती है तब तुम अपनी गवाही पर दृढता से डटे रहते हो, और तुम चाहे जिससे निपट रहे हो, हमेशा शांत और संयमित रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने सच में परमेश्वर का प्रेम देखा है। कुछ लोग अब भी युवा हैं, परंतु वे मध्यम आयु के व्यक्ति के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व, सत्य से युक्त होते हैं, और दूसरों से प्रशंसित होते हैं—और ये वे लोग हैं जिनके पास गवाही है और वे परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब उन्होंने एक निश्चित बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तो उनमें परमेश्वर के प्रति एक अंतर्दृष्टि होगी, और उनका बाहरी स्वभाव भी स्थिर हो जाएगा। बहुत-से लोग सत्य को व्यवहार में नहीं लाते और अपनी गवाही पर डटे नहीं रहते। ऐसे लोगों में परमेश्वर का प्रेम, या परमेश्वर की गवाही नहीं होती, और यही वे लोग हैं जिनसे परमेश्वर सर्वाधिक घृणा करता है। वे सभाओं में परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, परंतु वे जिसे जीते हैं वह शैतान है, और यह परमेश्वर का अनादर करना, परमेश्वर की झूठी निंदा करना, और परमेश्वर की ईशनिंदा करना है। ऐसे लोगों में परमेश्वर के प्रेम का कोई चिन्ह नहीं होता, और उनमें पवित्र आत्मा का बिलकुल भी कोई कार्य नहीं होता। ऐसे लोगों के शब्द और कृत्य शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

पतरस के जीवन की ऐसी कोई भी चीज़ जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती थी उसे असहज महसूस करवाती थी। यदि वह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती, तो वह ग्लानि से भरा महसूस करता, और ऐसे उपयुक्त रास्ते की तलाश करता जिसके द्वारा वह परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए पूरा ज़ोर लगा पाता। अपने जीवन के छोटे से छोटे और महत्वहीन पहलुओं में भी, वह अब भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की स्वयं से अपेक्षा करता था। जब उसके पुराने स्वभाव की बात आती तब भी वह स्वयं से ज़रा भी कम अपेक्षा नहीं करता था, सत्य में अधिक गहराई तक आगे बढ़ने के लिए स्वयं से अपनी अपेक्षाओं में सदैव अत्यधिक कठोर होता था। पौलुस केवल सतही प्रतिष्ठा और रुतबे की खोज करता था। वह मनुष्य के सामने स्वयं का दिखावा करने की चेष्टा करता था, और जीवन प्रवेश में ज़रा भी अधिक गहरी प्रगति करने की तलाश नहीं करता था। वह जिसकी परवाह करता था, वह सिद्धांत था, वास्तविकता नहीं। कुछ लोग कहते हैं, "पौलुस ने परमेश्वर के लिए इतना अधिक कार्य किया था, तो उसे परमेश्वर द्वारा याद क्यों नहीं रखा गया? पतरस ने परमेश्वर के लिए बस थोड़ा-सा ही कार्य किया था, और कलीसिया के लिए कोई बड़ा योगदान नहीं दिया था, तो उसे पूर्ण क्यों बनाया गया?" पतरस एक निश्चित बिंदु तक, जिसकी परमेश्वर द्वारा अपेक्षा की जाती थी, परमेश्वर से प्रेम करता था; केवल इस जैसे लोगों की ही गवाही होती है। और पौलुस के विषय में क्या? पौलुस किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करता था? क्या तुम जानते हो? पौलुस का कार्य किसके लिए किया गया था? और पतरस का कार्य किसके लिए किया गया था? पतरस ने अधिक कार्य नहीं किया था, लेकिन क्या तुम जानते हो कि उसके हृदय के भीतर गहराई में क्या था? पौलुस का कार्य कलीसियाओं के पोषण, और कलीसियाओं की सहायता से संबंधित था। पतरस ने जो अनुभव किया वे उसके जीवन स्वभाव में हुए परिवर्तन थे; उसने परमेश्वर के प्रति प्रेम अनुभव किया था। अब जब तुम उनके सार में अंतर जानते हो, तब तुम देख सकते हो कि अंततः कौन परमेश्वर में सचमुच विश्वास करता था, और कौन परमेश्वर में सचमुच विश्वास नहीं करता था। उनमें से एक परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करता था, और दूसरा परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम नहीं करता था; एक अपने स्वभाव में परिवर्तनों से गुज़रा था, और दूसरा नहीं गुज़रा था; एक ने विनम्रतापूर्वक सेवा की थी, और आसानी से लोगों के ध्यान में नहीं आता था, और दूसरे की लोगों द्वारा आराधना की जाती थी, और वह महान छवि वाला था; एक पवित्रता की खोज करता था, और दूसरा नहीं करता था, और यद्यपि वह अशुद्ध नहीं था, किंतु वह शुद्ध प्रेम से युक्त नहीं था; एक सच्ची मानवता से युक्त था, और दूसरा नहीं था; एक परमेश्वर के सृजित प्राणी के बोध से युक्त था, और दूसरा नहीं था। ऐसी हैं पतरस और पौलुस के सार की भिन्नताएँ। पतरस जिस पथ पर चला वह सफलता का पथ था, जो सामान्य मानवता की पुनः प्राप्ति और परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पुनः प्राप्ति पाने का पथ भी था। पतरस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सफल हैं। पौलुस जिस पथ पर चला वह विफलता का पथ था, और वह उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो केवल ऊपरी तौर पर स्वयं को समर्पित करते और खपाते हैं, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम नहीं करते हैं। पौलुस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सत्य से युक्त नहीं हैं। परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज़ में परमेश्वर को संतुष्ट करने की चेष्टा की थी, और उस सब की आज्ञा मानने की चेष्टा की थी जो परमेश्वर से आया था। रत्ती भर शिकायत के बिना, वह ताड़ना और न्याय, साथ ही शुद्धिकरण, घोर पीड़ा और अपने जीवन की वंचनाओं को स्वीकार कर पाता था, जिनमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदल नहीं सका था। क्या यह परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम नहीं था? क्या यह परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पूर्ति नहीं थी? चाहे ताड़ना में हो, न्याय में हो, या घोर पीड़ा में हो, तुम मृत्यु पर्यंत आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सदैव सक्षम होते हो, और यह वह है जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना प्राप्त कर सकता है, तो वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी है, और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को इससे बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता हो। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हो, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ हो। इस तरह, तुमने न केवल परमेश्वर के सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा निंदित भी किया जाएगा, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से युक्त नहीं है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है। तुम केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने की परवाह करते हो, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करते हो। तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, और सृष्टिकर्ता का आज्ञापालन या उससे प्रेम नहीं करते हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से अवज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

यदि लोगों को परमेश्वर के स्वभाव की वास्तविक समझ होती है, और वे उसकी पवित्रता और धार्मिकता की हृदयस्पर्शी प्रार्थना दे सकते हैं, तो इसका मतलब है कि वे सच में उसे जानते और सत्य को धारण करते हैं, और केवल तभी वे प्रकाश में जीते हैं। केवल जब दुनिया और जीवन के बारे में एक व्यक्ति का दृष्टिकोण बदलता है, तभी उसमें आधारभूत रूपान्तरण होता है। जब किसी का कोई जीवन लक्ष्य होता है और वह सत्य के अनुसार आचरण करता है, जब वह पूरी तरह से खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पण कर देता है और उसके वचनों के अनुसार जीता है, जब वह अपनी आत्मा में गहराई से शान्त महसूस करता है और रोशन हो उठता है, जब उसका दिल अंधकार से मुक्त होता है, और जब वह पूरी तरह से स्वतंत्र और बाधा मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जी पाता है, केवल तभी वह एक सच्चा मानव जीवन व्यतीत करता है और सत्य धारण करने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुम्हारे पास हैं वह परमेश्वर के वचनों से आए हैं और स्वयं परमेश्वर से आए है। समस्त ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का शासक—परमेश्वर जो सबसे ऊँचा है—तुम्हें वास्तविक मानव जीवन जी रहे एक वास्तविक मनुष्य के रूप में अनुमोदित करता है। परमेश्वर के अनुमोदन से अधिक सार्थक और क्या हो सकता है? सत्य धारण करने का अर्थ यही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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