98. किसी के पास पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, इसे पहचानने के सिद्धांत

(1) देखो कि क्या कोई व्यक्ति न्याय और ताड़ना, काट-छाँट और निपटारे, और परमेश्वर के वचनों में परीक्षण और शोधन से गुजरने को स्वीकार कर सकता है; क्या वह सच्चे आत्म-ज्ञान के लिए सक्षम है; और क्या उसने वास्तव में पश्चाताप किया है।

(2) देखो कि क्या परमेश्वर के साथ किसी का संबंध सामान्य है; क्या उसे परमेश्वर में श्रद्धा है और क्या वह उसके प्रति समर्पण करता है; क्या वह वास्तव में उसके साथ वार्तालाप करता है।

(3) देखो कि क्या वह अपना कर्तव्य प्रभावी ढंग से निभाता है और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है; क्या वह सत्य का अभ्यास कर सकता है; क्या उसके दिल में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम है।

(4) देखो कि क्या किसी के द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने में नया प्रकाश है; क्या वह सत्य का एक व्यावहारिक ज्ञान व्यक्त कर सकता है; और क्या चीजों के बारे में उसके नजरियों में और उसके जीवन-स्वभाव में कोई परिवर्तन आया है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

पवित्र आत्मा का कार्य सक्रिय मार्गदर्शन और सकारात्मक प्रबोधन है। यह लोगों को निष्क्रिय नहीं बनने देता। यह उनको सांत्वना देता है, उन्हें विश्वास और संकल्प देता है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर पाते हैं; वो निष्क्रिय या बाध्य नहीं होते, बल्कि अपनी पहल पर काम करते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग प्रसन्न और सहर्ष प्रस्तुत होते हैं, आज्ञा मानने को तैयार होते हैं और स्वयं को विनम्र रखने में प्रसन्न होते हैं। यद्यपि वे भीतर से दुखी और दुर्बल होते हैं, उनमें सहयोग करने का संकल्प होता है; वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मानने में सक्षम होते हैं और मानवीय इच्छा से कलंकित नहीं होते हैं, मनुष्य की सोच से कलंकित नहीं होते हैं और निश्चित रूप से वे मनुष्य की आकांक्षाओं और प्रेरणाओं से कलंकित नहीं होते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो भीतर से वे विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन हैं, वे परमेश्वर के प्रेम और अपने भाइयों और बहनों के प्रेम को जीते हैं; वे ऐसी चीज़ों से आनंदित होते हैं, जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं और उन चीज़ों से घृणा करते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मानवता होती है और वे निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं और मानवता के अधीन होते हैं। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, उनकी स्थिति और भी बेहतर हो जाती है और उनकी मानवता और अधिक सामान्य हो जाती है और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएं सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रुकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें दुर्भाव नहीं होता। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और वास्तविक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के अनुसार कार्य करता है और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों में प्रबोधन और मार्गदर्शन को कार्यान्वित करता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है, तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता और उन्हें प्रबुद्ध करता है। वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी ज़रूरतें पूरी करता है और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें प्रबुद्ध करता है। पवित्र आत्मा का कार्य वास्तविक जीवन में लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने का है; अगर वे अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनका जीवन सामान्य आध्यात्मिक हो, तो वे पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन होते हैं। ऐसी स्थिति में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो उनमें विश्वास आता है; जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटितहोता है, तो वे निष्क्रिय नहीं होते; और घटित होती हुई चीज़ों से सबक़ लेने में समर्थ होते हैं, जो परमेश्वर चाहता है कि वो सीखें। वे निष्क्रिय या कमज़ोर नहीं होते और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

पवित्र आत्मा के कार्य से क्या प्रभाव प्राप्त होते हैं? तुम मूर्ख हो सकते हो और तुम विवेकहीन हो सकते हो, परंतु पवित्र आत्मा को बस तुम्हारे भीतर कार्य करना है और तुम्हारे भीतर विश्वास उत्पन्न हो जाएगा और तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर से जितना भी प्रेम करो कम ही होगा। चाहे सामने कितनी ही मुश्किलें हों, तुम सहयोग के लिए तैयार होगे। तुम्हारे साथ घटनाएँ होंगी और यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या शैतान की ओर से, परंतु तुम प्रतीक्षा कर पाओगे और न तो निष्क्रिय होगे और न ही बेपरवाह। यह पवित्र आत्मा का सामान्य कार्य है। जब पवित्र आत्मा तुम्हारे अंदर कार्य करता है, तब भी तुम वास्तविक कठिनाइयों का सामना करते हो : कभी-कभी तुम्हारे आँसू निकल आएंगे और कभी-कभी ऐसी बातें होंगी, जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते, परंतु यह सब पवित्र आत्मा के साधारण कार्य का एक चरण है। हालाँकि तुमने उन कठिनाइयों पर काबू नहीं पाया और उस समय तुम कमज़ोर थे और शिकायतों से भरे थे, फिर भी बाद में तुम पूरे विश्वास के साथ परमेश्वर से प्रेम कर पाये। तुम्हारी निष्क्रियता तुम्हें सामान्य अनुभव प्राप्त करने से नहीं रोक सकती और इसकी परवाह किए बिना कि लोग क्या कहते हैं और कैसे हमला करते हैं, तुम परमेश्वर से प्रेम कर पाते हो। प्रार्थना के दौरान तुम हमेशा महसूस करते हो कि अतीत में तुम परमेश्वर के बहुत ऋणी थे और जब भी तुम इस तरह की चीज़ों का फिर सामना करते हो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने और देह-सुख का त्याग करने का संकल्प लेते हो। यह सामर्थ्य दिखाता है कि तुम्हारे भीतर पवित्र आत्मा का कार्य है। यह पवित्र आत्मा के कार्य की सामान्य अवस्था है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य होती हैं, तो उनके आध्यात्मिक जीवन और दैहिक जीवन भी सामान्य होते हैं, उनका विवेक सामान्य और व्यवस्थित होता है। जब वो इस दशा में होते हैं, जो वे अपने भीतर अनुभव करते या जान पाते हैं, उसके विषय में कहा जा सकता है कि वह पवित्र आत्मा के स्पर्श से आया है (जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो अंतर्दृष्टि रखना या कुछ सरल ज्ञान रखना, या कुछ चीज़ों में विश्वासयोग्य बने रहना, या कुछ चीज़ों में परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य रखना—यह सब पवित्र आत्मा से आता है)। मनुष्य में पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य है; मनुष्य इसको महसूस करने के असमर्थ है और यह स्वयं मनुष्य द्वारा ही आता प्रतीत होता है—परंतु वास्तव में यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। दिन-प्रतिदिन के जीवन में पवित्र आत्मा प्रत्येक में बड़े और छोटे रूप में कार्य करता है और यह इस कार्य की सीमा है, जो बदलती रहती है। कुछ लोगों की काबिलियत अच्छी होती है और वे बातों को जल्दी समझ लेते हैं और उनमें पवित्र आत्मा का प्रबोधन विशेष रूप से अधिक होता है। इस बीच, कुछ लोगों की काबिलियतकम होती है और उन्हें बातों को समझने में अधिक समय लगता है, परंतु पवित्र आत्मा उन्हें भीतर से स्पर्श करता है और वे भी परमेश्वर के प्रति निष्ठा को प्राप्त कर पाते हैं—पवित्र आत्मा उन सबमें कार्य करता है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग परमेश्वर का विरोध नहीं करते या परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह नहीं करते, ऐसे कार्य नहीं करते, जो परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा डालें और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते, तो उनमें से प्रत्येक में परमेश्वर का आत्मा अधिक या कम सीमा तक काम करता है; वह उन्हें स्पर्श करता है, प्रबुद्ध करता है, उन्हें विश्वास प्रदान करता है, सामर्थ्य देता है और सक्रिय रूप से प्रवेश करने के लिए बढ़ाता है, आलसी नहीं बनने देता या देह के आनंद लेने का लालच नहीं करने देता, सत्य के अभ्यास को तैयार करता है और परमेश्वर के वचनों की चाहत रखने वाला बनाता है। यह सब ऐसा कार्य है, जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में, पवित्र आत्मा का कार्य कभी-कभार होता है, जबकि पवित्र आत्मा की उपस्थिति लगभग सतत रहती है। जब तक लोगों का विवेक और सोच सामान्य रहते हैं, और जब तक उनकी अवस्थाएँ सामान्य होती हैं, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से उनके साथ होता है। जब लोगों का विवेक और सोच सामान्य नहीं होते, तो उनकी मानवता सामान्य नहीं होती। यदि इस पल पवित्र आत्मा का कार्य तुममें है, तो पवित्र आत्मा भी निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा। किंतु यदि पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर निश्चित रूप से कार्य कर रहा है, क्योंकि पवित्र आत्मा विशेष समयों पर कार्य करता है। पवित्र आत्मा की उपस्थिति का होना केवल लोगों के सामान्य अस्तित्व को बनाए रख सकता है, किंतु पवित्र आत्मा केवल निश्चित समयों पर ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कोई अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो जब तुम कलीसिया को सिंचन और आपूर्ति प्रदान करते हो, तब पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध करेगा, जो दूसरों के लिए शिक्षाप्रद होंगे और जो तुम्हारे भाइयों-बहनों की कुछ व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर सकते है—ऐसे समय पर पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कभी-कभी जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी रहे होते हो, तो पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध कर देता है, जो तुम्हारे अनुभवों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक होते हैं, जो तुम्हें अपनी खुद की अवस्थाओं का अधिक ज्ञान प्राप्त करने देते हैं; यह भी पवित्र आत्मा का कार्य है। कभी-कभी, जैसे मैं बोलता हूँ, तुम लोग सुनते हो, और मेरे वचनों से अपनी अवस्थाओं को मापने में सक्षम होते हो, और कभी-कभी तुम द्रवित या प्रेरित हो जाते हो; यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थपरक होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य रहता है, तो यह भी यथार्थपरक होता और दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वे हर पल परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। यह पूर्णत: अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

वो सभी जो परमेश्वर कीआत्मा के द्वारा निर्देशित होते हैं और जिन्हें परमेश्वर की आत्मा ने छुआ है, वो परमेश्वर के कार्य के अधीन हैं, जो यह दर्शाता है कि परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के प्रेम ने उनके भीतर जड़ें जमा ली हैं। कुछ लोग कहते हैं: "मैं अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हारे जितना गंभीर नहीं हूँ, न ही मुझे परमेश्वर ने इतना स्पर्श किया है; कभी-कभी—जब मैं ध्यान और प्रार्थना करता हूँ—मुझे लगता है कि परमेश्वर सुंदर है और मेरे दिल को परमेश्वर ने छू लिया है।" मनुष्य के दिल से अधिक और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। जब तुम्हारा दिल परमेश्वर उन्मुख हो जगया हो, तो तुम्हारा पूरा अस्तित्व परमेश्वर उन्मुख हो चुका होगा और उस समय तुम्हारे दिल को परमेश्वर कीआत्मा ने छू लिया होगा। तुम लोगों में से अधिकांश को ऐसाअनुभवहुआ है—बात सिर्फ इतनी है कि तुम सभी के अनुभवों की गहराइयाँ समान नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं: "मैं प्रार्थना में बहुत से शब्द नहीं कहता, मैं सिर्फ दूसरों के समागम को सुनता हूँ और मेरे भीतर शक्ति उभर आती है।" इससे पता चलता है कि तुम्हें परमेश्वर ने अंदर से स्पर्श कर लिया है। जो लोग अंदर से परमेश्वर के द्वारा छू लिए गए हैं, वो जब अन्य लोगों का समागम सुनते हैं, तो प्रेरित हो जाते हैं; अगर किसी व्यक्ति का दिल प्रेरणादायक शब्दों को सुनकर भी पूरी तरह से अप्रभावित रह जाता है, तो यह साबित करता है कि उनके भीतर पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। उनके अंदर कोई तड़प नहीं है, जो साबित करता है कि उनमें कोई संकल्प नहीं है और इस प्रकार वो पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा छुआ गया है, तो जब भी वह परमेश्वर के वचनों को सुनता है, तो उसकी एक प्रतिक्रिया होगी; यदि उन्हें परमेश्वर ने स्पर्श नहीं किया है, तो वो परमेश्वर के वचनों से नहीं जुड़े हैं, उनका उससे कोई संबंध नहीं है और वह प्रबुद्ध होने में असमर्थ हैं। जिन लोगों ने परमेश्वर के वचनों को सुना है और जिनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं रही थी, वो लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने स्पर्श नहीं किया है—ये वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं। वो सभी जो नए प्रकाश को स्वीकार करने में सक्षम होते हैं, स्पर्श किए जाते हैं और वो पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते समय थकान का अनुभव करते हैं। यह दशा सामान्य नहीं है। वास्तव में सामान्य बात यह है कि परमेश्वर का वचन पढ़ते हुए तुम कभी थकते नहीं, सदैव उसकी भूख-प्यास बनी रहती है, तुम सदैव सोचते हो कि परमेश्वर का वचन भला है। और वह व्यक्ति जो सचमुच प्रवेश कर चुका है वह परमेश्वर के वचन को ऐसे ही खाता-पीता है। जब तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर का वचन सचमुच व्यावहारिक है और मनुष्य को इसमें प्रवेश करना ही चाहिए; जब तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का वचन मनुष्य के लिए बेहद सहायक और लाभदायक है, यह मनुष्य के जीवन के लिए रसद है, यह पवित्र आत्मा है जो तुम्हें ऐसी भावना देता है, और तुम्हें प्रेरित करता है। यह बात साबित करती है कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर रहा है और परमेश्वर तुमसे विमुख नहीं हुआ है। यह जानकर कि परमेश्वर सदैव बातचीत करता है, कुछ लोग उसके वचनों से थक जाते हैं, वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने या न पढ़ने का कोई परिणाम नहीं होता। यह सामान्य दशा नहीं है। उनका हृदय वास्तविकता में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करता, ऐसे लोगों में पूर्णता के लिए भूख-प्यास नहीं होती और न ही वे इसे महत्वपूर्ण मानते हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुममें परमेश्वर के वचन की प्यास नहीं है तो यह संकेत है कि तुम्हारी दशा सामान्य नहीं है। अतीत में, परमेश्वर तुमसे कहीं विमुख तो नहीं हो गया, इसका पता इस बात से चलता था कि तुम्हारे भीतर शांति है या नहीं और तुम आनंद का अनुभव कर रहे या नहीं। अब, यह इस बात से पता चलता है कि तुममें वचन की प्यास है या नहीं। क्या उसके वचन तुम्हारी वास्तविकता हैं, क्या तुम निष्ठावान हो और क्या तुम वह करने योग्य हो जो तुम परमेश्वर के लिये कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता के द्वारा जाँचा-परखा जाता है। परमेश्वर अपने वचनों को सभी मनुष्यों की ओर भेजता है। यदि तुम उसे पढ़ने के लिए तैयार हो तो वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, यदि नहीं तो वह तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करेगा। परमेश्वर उन्हें प्रबुद्ध करता है जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं और परमेश्वर को खोजते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ने वचन पढ़ने के बाद भी उन्हें प्रबुद्ध नहीं किया। परमेश्वर के वचनों को तुमने कैसे पढ़ा था? यदि तुमने उसके वचनों को इस ढंग से पढ़ा जैसे किसी घुड़सवार ने घोड़े पर बैठे-बैठे फूलों को देखा और वास्तविकता को कोई महत्व नहीं दिया, तो परमेश्वर कैसे तुम्हें प्रबुद्ध कर सकता है? कैसे वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को संजो कर नहीं रखता परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है? यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजो कर नहीं रखते, तब तुम्हारे पास न तो सत्य होगा और न ही वास्तविकता होगी। यदि तुम उसके वचन को सँजो कर रखते हो, तब तुम सत्य का अभ्यास कर पाओगे; और तब ही तुम वास्तविकता को पाओगे। ... परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है इसलिए उसके वचन को खाने-पीने के लिए तुम्हें अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम समझने लगोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रबुद्ध करता है, तब अक्सर मुनुष्य को उसका ज्ञान नहीं होता। वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और मार्गदर्शन देता है जब तुम उसके प्यासे होते हो, उसे खोजते हो। पवित्र आत्मा जिस सिद्धांत पर कार्य करता है वह परमेश्वर के वचन पर केंद्रित होता है जिसे तुम खाते और पीते हो। वे सब जो परमेश्वर के वचन को महत्व नहीं देते और उसके प्रति सदैव एक अलग तरह का दृष्टिकोण रखते हैं―अपनी संभ्रमित सोच में यह विश्वास करते हुए कि वे वचन को पढ़ें या न पढ़ें कुछ फर्क नहीं पड़ता―ऐसे लोग हैं जो वास्तविकता नहीं जानते। ऐसे व्यक्ति में न तो पवित्र आत्मा का कार्य और न ही उसके द्वारा दी गई प्रबुद्धता दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति बस साथ-साथ चलते हैं, वे बिना उचित योग्यताओं के मात्र दिखावा करने वाले लोग हैं, जैसे कि एक नीतिकथा में[क] नैनगुओ थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

जब लोगों की अवस्था सामान्य नहीं होती, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए जाते हैं, इसकी अधिक आशंका होती है कि वे अपने मन में शिकायत करें, उनकी प्रेरणाएं ग़लत होती हैं, वे आलसी होते हैं, वे देह में आसक्त रहते हैं और उनके हृदय सत्य के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं। यह सब कुछ शैतान की ओर से आता है। जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य नहीं होतीं, जब वे भीतर से अंधकारमय होते हैं और अपना सामान्य विवेक खो देते हैं, पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए होते हैं और अपने भीतर परमेश्वर को महसूस करने के योग्य नहीं होते, यही वह समय होता है जब शैतान उनके भीतर कार्य करता है। यदि लोगों के भीतर सदैव सामर्थ्य रहे और सदैव परमेश्वर से प्रेम करें, तो सामान्यतः जब उनके साथ चीज़ें घटित होती हैं, तो वे चीज़ें पवित्र आत्मा की ओर से आती हैं और वे जिससे मिलते हैं, वह मुलाकात परमेश्वर के प्रबंधनों का नतीजा होता है। कहने का अर्थ है कि जब तुम्हारी परिस्थितियाँ सामान्य होती हैं, जब तुम पवित्र आत्मा के महान कार्य में होते हो, तो शैतान के लिए तुम्हें डगमगाना असंभव हो जाता है। इस बुनियाद पर यह कहा जा सकता है कि सब कुछ पवित्र आत्मा की ओर से आता है और यद्यपि तुम्हारे मन में ग़लत विचार हो सकते हैं, तुम उनको त्यागने में सक्षम होते हो और उनका अनुसरण नहीं करते। यह सब पवित्र आत्मा के कार्य से आता है। किन परिस्थितियों में शैतान हस्तक्षेप करता है? जब तुम्हारी परिस्थितियां सामान्य न हों, जब तुम्हें परमेश्वर का स्पर्श न मिला हो और तुम परमेश्वर के कार्य से रहित हो, जब तुम भीतर से सूखे और बंजर हो, जब परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए तुम्हें कुछ समझ न आए और जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ और पियो पर प्रबुद्ध या रौशन न हो तो ऐसे समय पर शैतान के लिए तुम्हारे भीतर कार्य करना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए हो और तुम परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तो तुम्हारे साथ बहुत सी चीज़ें घटित होती हैं, जो शैतान के लालच से आती हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, शैतान भी उसी दौरान कार्य कर रहा होता है। पवित्र आत्मा मनुष्य के अंतर्मन को स्पर्श करता है, जबकि उसी समय शैतान मनुष्य में हस्तक्षेप करता है। हालाँकि ऐसी स्थिति में पवित्र आत्मा का कार्य अग्रणी स्थान ले लेता है, और जिन लोगों की स्थितियां सामान्य होती हैं, वे विजय प्राप्त करते हैं; यह शैतान के कार्य के ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य की विजय है। जबकि पवित्र आत्मा कार्य करता है, तब भी लोगों में एक भ्रष्ट स्वभाव मौजूद रहता है; हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य के दौरान, लोगों के लिए अपने विद्रोह, प्रेरणाओं और मिलावटों की खोज करना और पहचानना आसान हो जाता है। केवल तभी लोगों को पछतावा महसूस होता है और वे प्रायश्चित करने को तैयार होते हैं। इस तरह, उनके विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे परमेश्वर के कार्य के भीतर त्याग दिए जाते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है; जब वह लोगों में कार्य करता है, तब भी उन्हें कठिनाइयां होती हैं, वे तब भी रोते हैं, तब भी दुःख उठाते हैं, तब भी वे कमज़ोर होते हैं और तब भी बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जो उनके लिए अस्पष्ट हों, फिर भी ऐसी स्थिति में वे स्वयं को पीछे हटने से रोक सकते हैं और परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं और यद्यपि वे रोते हैं और व्याकुल रहते हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की प्रशंसा करने का सामर्थ्य होता है; पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है और उसमें थोड़ा-सा भी अलौकिक नहीं होता। अधिकांश लोग सोचते हैं कि जैसे ही पवित्र आत्मा कार्य करना आरंभ करता है, वैसे ही लोगों की दशा बदल जाती है और जो चीज़ें उनके लिए ज़रूरी होती हैं, वे हटा ली जाती हैं। ऐसे विश्वास भ्रामक होते हैं। जब पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर कार्य करता है, तो मनुष्य की निष्क्रिय बातें उसमें बनी रहती हैं और उसका आध्यात्मिक कद वही रहता है, लेकिन वह पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबोधन प्राप्त कर लेता है और इसलिए उसकी दशा और अधिक सक्रिय हो जाती है, उसके भीतर की स्थितियां सामान्य हो जाती हैं और वह शीघ्रता से बदल जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें एक निश्चित प्रकार की अनुभूति देता है, एक एहसास जिसके कारण तुम अपना आंतरिक आनंद खो देते हो और परमेश्वर की उपस्थिति को खो देते हो, कुछ इस तरह कि तुम अंधकार में डूब जाते हो। यह एक प्रकार का शुद्धिकरण है। जब कभी भी तुम कुछ करते हो तो गड़बड़ हो जाती है या तुम्हारे सामने कोई अवरोध आ जाता है। यह परमेश्वर का अनुशासन है। कभी, अगर तुम कुछ ऐसा करो जो अनाज्ञाकारी और परमेश्वर के प्रति विद्रोही हो, तो हो सकता है कि दूसरों को इसके बारे में पता न चले, लेकिन परमेश्वर जानता है। वह तुम्हें बचकर जाने नहीं देगा, और वह तुम्हें अनुशासित करेगा। पवित्र आत्मा का काम बहुत ही विस्तृत है। वह लोगों के हर वचन और कार्य को, उनकी हर क्रिया और हरकत को, और उनकी हर सोच और विचार को ध्यानपूर्वक देखता है, ताकि लोग इन चीज़ों के बारे में आंतरिक जागरूकता पा सकें। तुम एक बार कुछ करते हो और वह गड़बड़ हो जाता है, तुम फिर से कुछ करते हो और यह तब भी गड़बड़ हो जाता है, और धीरे-धीरे तुम पवित्र आत्मा के काम को समझ जाओगे। कई बार अनुशासित किए जाने के द्वारा, तुम्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए क्या किया जाए और उसकी इच्छा के अनुरूप क्या नहीं है। अंत में, तुम्हारे भीतर से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का सटीक उत्तर प्राप्त हो जाएगा। कभी-कभी तुम विद्रोही हो जाओगे और तुम्हें भीतर से परमेश्वर द्वारा डाँटा जाएगा। यह सब परमेश्वर के अनुशासन से आता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजो कर नहीं रखते हो, यदि तुम उनके काम को महत्वहीन समझते हो, तो वह तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा। तुम परमेश्वर के वचनों को जितनी अधिक गंभीरता से लेते हो, उतना ही अधिक वह तुम्हें रोशन करेगा। अभी, कलीसिया में कुछ लोग हैं जिनका विश्वास अव्यवस्थित और भ्रमित है, और वे बहुत सी अनुचित चीजें करते हैं और अनुशासन के बिना कार्य करते हैं, और इसलिए पवित्र आत्मा का काम उनमें स्पष्ट रूप से नहीं देखा जा सकता है। कुछ लोग पैसे कमाने के लिए अपने कर्तव्यों को पीछे छोड़ देते हैं, और अनुशासित हुए बिना व्यवसाय का संचालन करने चल पड़ते हैं; इस तरह का व्यक्ति और भी अधिक खतरे में है। वर्तमान में न केवल ऐसे लोगों में पवित्र आत्मा का काम नहीं है, बल्कि भविष्य में उन्हें पूर्ण बनाना भी मुश्किल होगा। ऐसे कई लोग हैं जिन पर पवित्र आत्मा का काम नहीं देखा जा सकता है, जिसमें परमेश्वर के अनुशासन को नहीं देखा जा सकता है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की इच्छा के बारे में स्पष्ट नहीं है और जो उसके कार्य को नहीं जानते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

कभी-कभी, जब तुम असामान्य परिस्थितियों में होते हो, तो परमेश्वर की उपस्थिति को गँवा देते हो और जब प्रार्थना करते हो तो परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते। ऐसे वक्त डर लगना सामान्य बात है। तुम्हें तुरंत खोज शुरू कर देनी चाहिए। अगर तुम नहीं करोगे, तो परमेश्वर तुमसे अलग हो जाएगा और तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित हो जाओगे—इतना ही नहीं, एक-दो दिन, यहाँ तक कि एक-दो महीनों के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की उपस्थिति से वंचित रहोगे। इन हालात में, तुम बेहद सुन्न हो जाते हो और एक बार फिर से इस हद तक शैतान के बंदी बन जाते हो कि तुम हर तरह के कुकर्म करने लगते हो। तुम धन का लालच करते हो, अपने भाई-बहनों को धोखा देते हो, फिल्में और वीडियो देखते हो, जुआ खेलते हो, यहाँ तक कि बिना किसी अनुशासन के सिगरेट और शराब पीते हो। तुम्हारा दिल परमेश्वर से बहुत दूर चला जाता है, तुम गुप्त रूप से अपने रास्ते पर चल देते हो और मनमर्ज़ी से परमेश्वर के कार्य पर अपना फैसला सुना देते हो। कुछ मामलों में लोग इस हद तक गिर जाते हैं कि यौन प्रकृति के पाप करते समय न तो उन्हें कोई शर्म आती है और न ही उन्हें घबराहट महसूस होती है। पवित्र आत्मा ने इस प्रकार के व्यक्ति का त्याग कर दिया है; दरअसल, काफी समय से ऐसे व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य नदारद रहा है। ऐसे व्यक्ति को लगातार भ्रष्टता में और अधिक डूबते हुए देखा जा सकता है, क्योंकि बुराई के हाथ निरंतर फैलते जाते हैं। अंत में, वह इस मार्ग के अस्तित्व को नकार देता है और जब वो पाप करता है तो शैतान द्वारा उसे बंदी बना लिया जाता है। अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अंदर केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति है, किंतु पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है, तो ऐसी स्थिति में होना पहले ही खतरनाक होता है। जब तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति को महसूस भी न कर सको, तब तुम मौत के कगार पर हो। अगर तुम प्रायश्चित न करो, तब तुम पूरी तरह से शैतान के पास लौट चुके होगे, और तुम उन व्यक्तियों में होगे, जिन्हें मिटा दिया गया है। इसलिए, जब तुम्हें पता चलता है कि तुम ऐसी स्थिति में हो, जहाँ केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति है (तुम पाप नहीं करते, तुम अपने आपको रोक लेते हो और तुम परमेश्वर के घोर प्रतिरोध में कुछ नहीं करते), लेकिन तुममें पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है (तुम प्रार्थना करते हुए प्रेरित महसूस नहीं करते, जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें स्पष्टत: न तो प्रबोधन हासिल होता है, न ही प्रकाशन, तुम परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बारे में उदासीन होते हो, तुम्हारे जीवन में कभी कोई विकास नहीं होता और तुम लंबे समय से महान प्रकाशन से वंचित रहे हो)—ऐसे समय तुम्हें अधिक सतर्क रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को लिप्त नहीं रखना चाहिए, तुम्हें अपने चरित्र की लगाम को और अधिक ढीला नहीं छोड़ना चाहिए। पवित्र आत्मा की उपस्थिति किसी भी समय गायब हो सकती है। इसीलिए ऐसी स्थिति बहुत ही खतरनाक होती है। अगर तुम अपने को इस तरह की स्थिति में पाओ, तो यथाशीघ्र तुम्हें चीज़ों को पलटने का प्रयास करना चाहिए। पहले, तुम्हें प्रायश्चित की प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर से कहना चाहिए कि वह एक बार और तुम पर करुणा करे। अधिक गंभीरता से प्रार्थना करो, और परमेश्वर के और अधिक वचनों को खाने-पीने के लिए अपने दिल को शांत करो। इस आधार के साथ, तुम्हें प्रार्थना में और अधिक समय लगाना चाहिए; गाने, प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने प्रयासों को दुगुना कर दो। जब तुम सबसे कमज़ोर होते हो, तो उस समय शैतान तुम्हारे दिल पर बड़ी आसानी से कब्ज़ा कर लेता है। जब ऐसा होता है, तो तुम्हारा दिल परमेश्वर से लेकर शैतान को लौटा दिया जाता है, जिसके बाद तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित हो जाते हो। ऐसे समय, पवित्र आत्मा के कार्य को पुन: प्राप्त करना और भी मुश्किल होता है। बेहतर है कि जब तक पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तभी पवित्र आत्मा के कार्य की खोज कर ली जाए, जिससे परमेश्वर तुम्हें अपना प्रबोधन और अधिक प्रदान करेगा है और तुम्हारा त्याग नहीं करेगा। प्रार्थना करना, भजन गाना, सेवा-कार्य करना और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना—ये सब इसलिए किया जाता है ताकि शैतान को अपना काम करने का अवसर न मिले, और पवित्र आत्मा तुममें अपना कार्य कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें' से उद्धृत

अंत के दिनों के परमेश्वर का सुसमाचार फैलाने के कार्य में केवल कुछ ही लोग सब-कुछ त्याग सकते हैं और अपने परिवार छोड़ सकते हैं, इस हद तक कि उन्हें लगता है कि वे दस साल या जीवन भर घर नहीं लौटेंगे, फिर भी इसके कारण वे कोई पीड़ा महसूस नहीं करते; यह वह बल है, जो पवित्र आत्मा लोगों को देता है। लेकिन इस स्तर तक किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक कद से नहीं पहुँचा जा सकता, क्योंकि लोगों के पास सत्य नहीं है, केवल परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की कुछ ईमानदारी है। अगर व्यक्ति में सत्य का अनुसरण करने का थोड़ा संकल्प हो, और पवित्र आत्मा उन्हें कुछ अनुग्रह भी दे, तो वे उस समय विशेष रूप से कृतार्थ महसूस करेंगे; वे एक प्रकार का बल प्राप्त करेंगे, और आगे आकर परमेश्वर के लिए स्वयं को खपा सकेंगे—यह परमेश्वर का अनुग्रह है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना कर्तव्य निभाते हुए सही रास्ते पर नहीं चलते; वे सत्य का अनुसरण करने का जरा-भी प्रयास नहीं करते, और इतना ही नहीं, सभी प्रकार के गलत काम करने में सक्षम भी होते हैं। ऐसे मामलों में, पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं करेगा। यह व्यक्ति के सही न होने का मामला होगा, यहाँ तक कि ऐसा कार्य भी, जो पवित्र आत्मा ने उन पर अतीत में किया होगा, जब्त कर लिया जाएगा, और अनजाने में ही वे पतन के मार्ग पर पहुँच जाएँगे। अगर तुम वह हो, जिसमें सत्य का अनुसरण करने का संकल्प है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें आनंद लेने के लिए अनुग्रह देगा, और तब तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर आगे बढ़ सकते हो; सत्य तुम्हें अधिक से अधिक स्पष्ट होता जाएगा, तुम्हारा संकल्प अधिक से अधिक दृढ़ होता जाएगा, और तुम पर पवित्र आत्मा का कार्य अधिक से अधिक आसान होता जाएगा। अगर कोई व्यक्ति सही मार्ग पर नहीं चलता, तो अंत में पवित्र आत्मा उसे हटा देगा। हटाए जाने के बाद उनका मूल संकल्प, उनका मूल उत्साह, और देह-सुख अलग रखने और स्वयं को खपाने की उनकी ताकत लुप्त हो जाएगी, और वे यह कहने को बेचैन होंगे, "मैंने उस समय परमेश्वर में अपना विश्वास क्यों रखा? अगर मैंने परमेश्वर में विश्वास न किया होता, तो क्या मुझे अब यह सब झेलना पड़ता?" जिस क्षण ये पछतावे, शिकायतें और नकारात्मक भावनाएँ सामने आती हैं, तब तक पवित्र आत्मा लंबे समय से काम करना बंद कर चुका होता है। भले ही इन व्यक्तियों को अभी भी सुसमाचार का प्रचार करने या कुछ अन्य कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता हो, लेकिन वे जो कर सकते हैं वह पवित्र आत्मा के काम का नहीं होगा, न ही वह पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध या निर्देशित होगा। यह सिर्फ उनमें मौजूद थोड़ी-बहुत बुद्धि और संस्कृति के आधार पर ही किया जाएगा। हालाँकि वे देह द्वारा प्राप्त की जा सकने वाली ये बाहरी चीजें करने में सक्षम होते हैं, किंतु यह पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को नहीं दर्शाता, न ही यह पवित्र आत्मा के इरादे को दर्शाता है। जैसे सेवाकर्ता के साथ होता है, भले ही पवित्र आत्मा उन पर काम न कर रहा हो, फिर भी व्यक्ति एक निश्चित अवधि के लिए सेवा प्रदान कर सकता है। आखिरकार, उनके पास मानवीय विचार हैं, मानव-मस्तिष्क के कार्य हैं, और इसलिए वे कुछ ऐसे काम करने में सक्षम हैं जो एक औसत व्यक्ति कर सकता है। बात बस इतनी है कि वे गलत रास्ते पर चले गए हैं; वे सत्य या उद्धार का अनुसरण नहीं कर रहे, या परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने की कोशिश नहीं कर रहे, और इसलिए वे पाते हैं कि उनका मार्ग बहुत पहले समाप्त हो गया है। आजकल बहुत-से लोग कह रहे हैं : "मैं जानता हूँ कि मैं प्रकृति से बुरा हूँ! मुझमें बहुत अधिक भावनाएँ हैं, और मैं बहुत विद्रोही हूँ।" किंतु वे चाहे कुछ भी कहें, वे अपनी ही प्रकृति को नहीं जानते, न ही सत्य के किसी पहलू को समझते हैं; चाहे वे अपने सिद्धांत को कितना भी अच्छा क्यों न बताएँ, मानो वे समझने वाली हर चीज समझते हों, किंतु वे उसे व्यवहार में नहीं ला सकते, जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उन पर पवित्र आत्मा का कार्य पहले ही लुप्त हो चुका है। इसलिए, तुम्हारी मानवता चाहे जैसी भी हो, या तुम चाहे जितने भी सिद्धांत समझते हो, या तुमने चाहे जितना भी कष्ट सहा हो, या तुमने चाहे जितना भी त्याग किया हो, अगर पवित्र आत्मा तुम पर काम नहीं कर रहा, तो सब-कुछ व्यर्थ हो जाएगा। पवित्र आत्मा के कार्य के अभाव में व्यक्ति मूर्ख हो जाता है; उसकी रत्ती भर ताकत किस लायक हो सकती है? उनका जरा-सा विश्वास कितना महत्वपूर्ण हो सकता है? उनका तिलमात्र ज्ञान किस काम का हो सकता है? उदाहरण के लिए जेल में रहने को लो : जबसे लोगों ने पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, तबसे उन्होंने इसका सामना किया है; हर जगह शरण के लिए भागते हुए उन्हें अक्सर सताया और शिकार बनाया जाता है। इन अनुभवों ने हर व्यक्ति के विचारों और हृदय में यह अमिट छाप उकेर दी है: "मैं यहूदा नहीं हो सकता, मैं कलीसिया से संबंधित मामलों के बारे में बिलकुल भी बात नहीं कर सकता।" क्या ज्यादातर लोगों ने खुद को इस तरह से तैयार नहीं किया है? लेकिन जब वे वास्तव में पकड़े जाते हैं, तो शायद वे जैसा चाहते हैं, वैसा करने में सक्षम न हो सकते हों। कोई व्यक्ति भ्रम के एक क्षण में यहूदा नहीं बन जाता। यह पहले कहा गया है कि अंत में तुम्हारा क्या हश्र होगा, यह सबसे पहले इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किया गया है या नहीं। अर्थात्, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करेगा कि पवित्र आत्मा तुममें काम कर रहा है या नहीं, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबोधन और मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है या नहीं, और कुछ अनुग्रह तुम्हारे साथ रहता है या नहीं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सर्वाधिक जोख़िम उन्हें है जिन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य गँवा दिया है' से उद्धृत

वर्तमान में, कुछ लोग परीक्षणों से गुज़रने पर नकारात्मक हो जाते हैं, और उनमें से कुछ तो शिकायत भी करते हैं। अन्य लोग अब आगे नहीं बढ़ रहे हैं, क्योंकि परमेश्वर ने बोलना समाप्त कर दिया है। लोगों ने परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। वे स्वतंत्र रूप से नहीं जी सकते, और वे अपना आध्यात्मिक जीवन नहीं बनाए रख सकते। कुछ लोग साथ-साथ अनुसरण करते हैं और ऊर्जा के साथ खोज करते हैं, और जब परमेश्वर बोलता है तब अभ्यास करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब परमेश्वर नहीं बोलता, तो वे और आगे नहीं बढ़ते। लोगों ने अभी भी परमेश्वर की इच्छा को अपने दिल में नहीं समझा है और उनमें परमेश्वर के लिए स्वत:स्फूर्त प्रेम नहीं है; अतीत में उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण इसलिए किया था, क्योंकि वे मजबूर थे। अब कुछ लोग हैं, जो परमेश्वर के कार्य से थक गए हैं। क्या ऐसे लोग खतरे में नहीं हैं? बहुत सारे लोग सिर्फ निभाने की स्थिति में रहते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं, पर वे ऐसा आधे-अधूरे मन से करते हैं, और उनमें अब वह सहज प्रवृत्ति नहीं है जो उनमें कभी थी। अधिकतर लोग शुद्धिकरण और पूर्ण बनाने के परमेश्वर के कार्य में रुचि नहीं रखते, और वास्तव में यह ऐसा है, मानो वे लगातार किसी अंत:प्रेरणा से रहित हों। जब वे पापों के वशीभूत हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस नहीं करते, न ही उनमें पश्चात्ताप अनुभव करने की जागरूकता होती है। वे सत्य की खोज नहीं करते और न ही कलीसिया को छोड़ते हैं, इसके बजाय वे केवल अस्थायी सुख ढूँढ़ते हैं। ये लोग मूर्ख हैं, एकदम मूढ़! समय आने पर वे बहिष्कृत कर दिए जाएँगे, और किसी एक को भी नहीं बचाया जाएगा! क्या तुम्हें लगता है कि यदि किसी को एक बार बचाया गया है, तो उसे हमेशा बचाया जाएगा? यह विश्वास शुद्ध धोखा है! जो लोग जीवन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, उन सभी को ताड़ना दी जाएगी। अधिकतर लोगों की जीवन में प्रवेश करने में, दर्शनों में, या सत्य का अभ्यास करने में बिलकुल भी रुचि नहीं है। वे प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, और वे अधिक गहराई से प्रवेश करने का प्रयास तो निश्चित रूप से नहीं करते। क्या वे स्वयं को बरबाद नहीं कर रहे? अभी कुछ लोग हैं, जिनकी स्थितियाँ लगातार बेहतर हो रही हैं। पवित्र आत्मा जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक आत्मविश्वास उनमें आता है, और जितना अधिक वे अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के कार्य के गहन रहस्य का अनुभव करते हैं। जितना गहरे वे प्रवेश करते हैं, उतना ही अधिक वे समझते हैं। वे अनुभव करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और वे अपने भीतर स्थिर और प्रबुद्ध महसूस करते हैं। उन्हें परमेश्वर के कार्य की समझ है। ये ही वे लोग हैं, जिनमें पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कुछ लोग कहते हैं : "यद्यपि परमेश्वर की ओर से कोई नए वचन नहीं हैं, फिर भी मुझे सत्य में और गहरे जाने का प्रयास करना चाहिए, मुझे अपने वास्तविक अनुभव में हर चीज के बारे में ईमानदार होना चाहिए और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए।" इस तरह के व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य होता है। यद्यपि परमेश्वर अपना चेहरा नहीं दिखाता और हर एक व्यक्ति से छिपा रहता है, और यद्यपि वह एक भी वचन नहीं बोलता और कई बार लोग कुछ आंतरिक शुद्धिकरण का अनुभव करते हैं, फिर भी परमेश्वर ने लोगों को पूरी तरह से नहीं छोड़ा है। यदि कोई व्यक्ति उस सत्य को बरकरार नहीं रख सकता, जिसका उसे पालन करना चाहिए, तो उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

लोग सचमुच खोजते हैं या नहीं यह इससे निर्धारित नहीं होता कि दूसरे उन्हें कैसे आंकते हैं या आसपास के लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं, बल्कि इससे निर्धारित होता है कि क्या पवित्र आत्मा उसके ऊपर कार्य करता है और क्या उन्होंने पवित्र आत्मा की उपस्थिति हासिल कर ली है। इसके अतिरिक्त यह इस बात पर निर्भर है कि क्या एक निश्चित अवधि तक पवित्र आत्मा के कार्य से गुज़रने के बाद उनके स्वभाव बदलते हैं और क्या उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान मिला है। यदि किसी व्यक्ति पर पवित्र आत्मा कार्य करेगा, तो धीरे-धीरे उस व्यक्ति का स्वभाव बदल जाएगा और परमेश्वर में विश्वास करने का उसका विचार धीरे-धीरे और शुद्ध होता जाएगा। जब तक लोगों में परिवर्तन होता है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे कितने समय परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य कर रहा है। यदि उनमें परिवर्तन नहीं हुआ है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं कर रहा है। ऐसे लोग कुछ सेवा करते भी हैं, तो भी ऐसा करने की प्रेरणा अच्छा भविष्य पाने की आकांक्षा ही होती है। कभी-कभी सेवा करना, उनके स्वभावों में परिवर्तन के अनुभव का स्थान नहीं ले सकती। आख़िरकार वे तब भी नष्ट किए जाएंगे, क्योंकि राज्य में सेवाकर्मियों की आवश्यकता नहीं होगी, न ही उनकी आवश्यकता होगी, जिनका स्वभाव उन लोगों की सेवा के योग्य होने के लिए नहीं बदला है, जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है और जो परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, "नीतिकथा में" यह वाक्यांश नहीं है।

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