119. फरीसियों की पहचान करने के सिद्धांत

(1) फरीसी सारतः पाखंडी होते हैं, बाहरी तौर पर विनम्र और धैर्यवान, लेकिन स्वभाव से कपटी और दुर्भावनापूर्ण होते हैं। वे सत्य से घृणा और परमेश्वर का विरोध करते हैं;

(2) फरीसी विशेष रूप से अभिमानी और आत्म-तुष्ट होते हैं। दूसरों को मोहित करने के लिए वे अक्सर पत्रों और सिद्धांतों का प्रचार करते हैं और दूसरों से अपनी उपासना और अपने आदेश का पालन करवाते हैं, परन्तु वे सत्य को ज़रा भी स्वीकार नहीं करते हैं;

(3) फरीसी कष्ट उठाते और एक क़ीमत अदा करते हैं, केवल इसलिए कि वे आशीर्वाद प्राप्त कर सकें और उन्हें ताज पहनाया जा सके। कभी भी सत्य का अभ्यास किए बिना, वे नियमों और धार्मिक अनुष्ठानों के पालन पर ध्यान केंद्रित करते हैं;

(4) फरीसी केवल झूठी आध्यात्मिकता का अनुसरण करते हैं। दूसरों को छलते और लुभाते हुए, वे आत्म-ज्ञान के खोखले शब्द बोलते हैं, और वे कभी भी पश्चाताप नहीं करते या बदलते नहीं हैं।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो, क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये आराधनालयों में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है" (मत्ती 6:5)।

"शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं ; इसलिये वे तुमसे जो कुछ कहें वह करना और मानना, परन्तु उनके से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं। वे एक ऐसे भारी बोझ को जिसको उठाना कठिन है, बाँधकर उन्हें मनुष्यों के कन्धों पर रखते हैं; परन्तु स्वयं उसे अपनी उंगली से भी सरकाना नहीं चाहते। वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं : वे अपने ताबीजों को चौड़ा करते और अपने वस्त्रों की कोरें बढ़ाते हैं। भोज में मुख्य-मुख्य स्थान, और सभा में मुख्य-मुख्य आसन, बाजारों में नमस्कार, और मनुष्य में रब्बी कहलाना उन्हें भाता है" (मत्ती 23:2-7)।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो : इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

"हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय! जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बंध जाएगा। हे मूर्खो और अंधो, कौन बड़ा है; सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है? फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बंध जाएगा। हे अंधो, कौन बड़ा है; भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है? इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है। जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवाले की भी शपथ खाता है। जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्‍वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर और असंयम से भरे हुए हैं। हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो, और कहते हो, ‘यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्‍ताओं की हत्या में उनके साझी न होते।’ इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो कि तुम भविष्यद्वक्‍ताओं के हत्यारों की सन्तान हो। अत: तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा पूरी तरह भर दो। हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी" (मत्ती 23:13-36)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"फरीसी" शब्द की परिभाषा क्या है? यह कोई ऐसा व्यक्ति है जो पाखंडी है, जो नकली है और अपने हर कार्य में नाटक करता है, अच्छा, दयालु और सकारात्मक होने का ढोंग करता है। क्या वे वास्तव में इस तरह के हैं? वे पाखंडी हैं, और इसलिए उनमें जो कुछ भी व्यक्त और प्रकट होता है वह झूठ है, वह सब ढोंग है—यह उनका असली चेहरा नहीं है। उनका असली चेहरा उनके हृदयों के भीतर छिपा है; यह दिखायी नहीं देता है। यदि लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, यदि वे सत्य को नहीं समझते हैं, तो उनके द्वारा प्राप्त सिद्धांत क्या बन जाते हैं? क्या वे सिद्धांत के वचन बन जाते हैं जो लोग अक्सर बोलते हैं? लोग ढोंग करने और अपने को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए इन तथा-कथित सही सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। वे जहाँ कहीं भी जाते हैं, जिन चीज़ों के बारे में बात करते हैं, वे जो कहते हैं, और उनका बाहरी व्यवहार दूसरों को सही और अच्छा लगता है। वे सभी व्यक्ति की अवधारणाओं और रुचि के अनुरूप हैं। दूसरों की नज़रों में, वे धर्मनिष्ठ और विनम्र होते हैं। वे सहनशीलता और सहिष्णुता में सक्षम होते हैं, और वे दूसरों से प्रेम कर सकते हैं और परमेश्वर से प्यार कर सकते हैं—लेकिन वास्तव में, यह सब नक़ली है; यह सब केवल ढोंग है और एक तरीका है जिससे वे अपने को भरते हैं। बाहर से, वे परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं, लेकिन वे वास्तव में केवल दूसरों को दिखाने के लिए कर रहे होते हैं। जब कोई नहीं देख रहा होता है, तो वे ज़रा से भी वफ़ादार नहीं होते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह लापरवाही से किया गया होता है। सतही तौर पर, उन्होंने अपने परिवार और अपनी आजीविका को छोड़ दिया है, वे कड़ी मेहनत करते हैं और खुद को व्यय करते हैं—लेकिन वास्तव में वे कलीसिया से गुप्त रूप से मुनाफा कमा रहे हैं और चढ़ावों को चुरा रहे हैं! जो कुछ भी वे बाहर प्रकट करते हैं, उनका सारा व्यवहार नक़ली है! एक पाखंडी फरीसी होने का यही अर्थ है। "फरीसी"—ये लोग कहाँ से आते हैं? क्या वे अविश्वासियों के बीच दिखाई देते हैं? ये सभी विश्वासियों के बीच दिखाई देते हैं। ये विश्वासी उनमें क्यों बदल जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर के वचनों ने उन्हें इस तरह का बना दिया है? वह कौन सा मुख्य कारण है कि वे उस तरह के लोगों में बदल जाते हैं? कारण है कि उन्होंने ग़लत रास्ता अपना लिया है। उन्होंने परमेश्वर के वचनों को एक उपकरण के रूप में लिया हैं जिससे वे स्वयं को शस्त्र-सज्जित करते हैं; वे खुद को इन वचनों के साथ शस्त्र-सज्जित करते हैं और उन्हें जीवित रहने के लिए, और बिना कुछ दिए कुछ पाने के लिए, पूँजी के रूप में मानते हैं। वे सिद्धांतों का उपदेश देने के अलावा कुछ नहीं करते हैं, मगर उन्होंने कभी भी उन वचनों का अभ्यास नहीं किया है। वे किस तरह के लोग हैं जो परमेश्वर के मार्ग का कभी भी अनुसरण नहीं करने के बावज़ूद वचनों और सिद्धान्तों का उपदेश देना जारी रखते हैं? ये पाखण्डी फरीसी हैं। उनका कथित अच्छा व्यवहार और अच्छा आचरण, वह थोड़ा सा जो उन्होंने त्यागा और व्यय किया है वह पूरी तरह से मज़बूरी में किया गया है, यह सब उनके द्वारा किया गया नाटक है। वे पूरी तरह से नक़ली हैं; यह सब ढोंग है। इन लोगों के हृदयों में परमेश्वर के प्रति जरा सी भी श्रद्धा नहीं है, और वे परमेश्वर में कोई सच्ची आस्था भी नहीं रखते हैं। इससे भी अधिक, वे अविश्वासियों में से हैं। यदि लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, तो वे इस तरह के रास्ते पर चलेंगे, और वे फरीसी बन जाएँगे। क्या यह डरावना नहीं है? फरीसी किस स्थान पर एकत्रित होते हैं? यह एक बाज़ार है। परमेश्वर की दृष्टि में वह धर्म है; यह परमेश्वर की कलीसिया नहीं है, न ही यह कोई ऐसा स्थान है जिसमें उसकी पूजा की जाती हो। इस प्रकार, यदि लोग सत्य का पालन न करें, तो फिर वे परमेश्वर के कथनों से संबंधित चाहे जितने शाब्दिक वचनों और सतही सिद्धांतों को आत्मसात कर लें, इसका कोई फायदा नहीं होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक' से उद्धृत

इस्राएल में "फरीसी" एक प्रकार की उपाधि हुआ करती थी। अब वह उसके बजाय एक ठप्पा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि फरीसी एक प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि बन गए हैं। इस प्रकार के व्यक्ति की क्या विशेषताएँ हैं? वे नारे लगाते हैं; वे ढोंग करने में, ठाट-बाट में, अपने असली आत्म को छिपाने में कुशल होते हैं, और वे महान कुलीनता, महान पवित्रता और ईमानदारी, महान निष्पक्षता और सम्मान का दिखावा करते हैं। नतीजतन, वे सत्य का ज़रा भी अभ्यास नहीं करते। वे कार्य कैसे करते हैं? वे धर्मग्रंथ पढ़ते हैं, उपदेश देते हैं, दूसरों को भलाई करने, बुराई न करने, परमेश्वर का विरोध न करने की शिक्षा देते हैं; वे प्रीतिकर बातें कहते हैं और दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करते हैं, किंतु जब दूसरों की पीठ फिरती है, तो वे चढ़ावे की चीज़ें चुरा लेते हैं। प्रभु यीशु ने कहा था कि वे "मच्छर तो छान डालते हैं, परंतु ऊँट निगल जाते हैं।" इसका मतलब यह है कि उनका सारा व्यवहार सतह पर तो अच्छा लगता है—वे आडंबरपूर्ण तरीके से नारेबाजी करते हैं, बड़े-बड़े सिद्धांत बोलते हैं, और उनके शब्द सुखद लगते हैं, लेकिन उनके कर्म अव्यवस्थित गड़बड़झाला होते हैं, पूरी तरह से परमेश्वर के प्रतिरोधी। उनके व्यवहार और बाह्य रूप सब ढोंग, सब धोखाधड़ी हैं; उनके दिलों में न तो सत्य के लिए ज़रा-सा भी प्रेम है, न ही सकारात्मक चीज़ों के लिए। वे सत्य से क्षुब्ध हैं, उस सबसे क्षुब्ध हैं जो परमेश्वर से आता है, और सकारात्मक चीजों से क्षुब्ध हैं। वे किस चीज़ से प्यार करते हैं? क्या वे निष्पक्षता और धार्मिकता से प्यार करते हैं? (नहीं।) तुम कैसे कह सकते हो कि वे इन चीज़ों से प्यार नहीं करते? (प्रभु यीशु काम करने और स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाने आया, फिर भी उन्होंने उसकी निंदा की।) अगर उन्होंने उसकी निंदा न की होती, तो क्या तुम यह कहने में सक्षम होते? प्रभु यीशु के कार्य करने के लिए आने से पहले, तुम किस आधार पर कह सकते थे कि उन्हें निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद नहीं है? तुम यह कह पाने में सक्षम नहीं रहे होगे, है ना? उनका सारा व्यवहार ढोंग है, और वे इस अच्छे व्यवहार का ढोंग दूसरों के विश्वास को ठगने के लिए करते हैं। क्या यह पाखंड और छल नहीं है? क्या ऐसे धोखेबाज सत्य से प्रेम कर सकते हैं? उनके इस अच्छे व्यवहार का छिपा हुआ उद्देश्य क्या है? उनके उद्देश्य का एक भाग दूसरों को ठगना है; दूसरा भाग दूसरों को धोखा देना, उन पर विजय पाना और उनसे अपनी आराधना करवाना, और अंत में, पुरस्कार पाना है। इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने के लिए उनकी तकनीकें कितनी चतुर होंगी? तो, क्या ऐसे लोगों को निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद है? बेशक नहीं। वे हैसियत से प्यार करते हैं, वे प्रसिद्धि और संपत्ति से प्यार करते हैं, और वे पुरस्कार प्राप्त करना चाहते हैं। क्या वे लोगों के मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में लाते हैं? बिलकुल नहीं। वे उनके ज़रा-से हिस्से को भी नहीं जीते; वे बस लोगों को धोखा देने और उन पर विजय पाने के लिए, अपनी हैसियत बचाने और प्रतिष्ठा मजबूत करने के लिए स्वांग रचते हैं और अपने को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करते हैं। एक बार जब ये चीजें हाथ में आ जाती हैं, तो वे इनका उपयोग पूँजी हासिल करने और आय के एक स्रोत के रूप में करते हैं। क्या यह घृणास्पद नहीं है? इसे उनके इन सभी व्यवहारों में देखा जा सकता है कि सत्य से प्रेम न करना ही उनका सार है, क्योंकि वे सत्य को कभी व्यवहार में नहीं लाते। इस बात का क्या संकेत है कि वे सत्य को व्यवहार में नहीं लाते? यह सबसे बड़ा संकेत था : प्रभु यीशु काम करने आया था और उसने जो कुछ कहा वह सही था, उसने जो कुछ कहा वह सत्य था। उन्होंने इन बातों के साथ कैसा व्यवहार किया? (उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।) क्या उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे मानते थे कि वे गलत हैं, या उन्होंने यह जानते हुए भी उन्हें अस्वीकार किया कि वे सही हैं? (उन्होंने यह जानते हुए भी उन्हें अस्वीकार किया कि वे सही हैं।) और इसका क्या कारण हो सकता है? वे सत्य से प्रेम नहीं करते, और वे सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं। प्रभु यीशु ने जो कहा, वह सब बिना किसी त्रुटि के था, सही था, और हालाँकि उन्हें प्रभु यीशु के वचनों में उसके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कोई गलती नहीं मिली, फिर भी उन्होंने कहा, "क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं?" उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों में दोष ढूँढ़ने की कोशिश की, ताकि उसके खिलाफ इस्तेमाल कर सकें, और कोई भी दोष न मिलने पर उन्होंने उसकी निंदा की, और फिर उन्होंने साजिश रची : "उसे सूली पर चढ़ा दो। या तो वह रहेगा या हम।" इस तरह वे प्रभु यीशु के खिलाफ खड़े हो गए। भले ही वे यह नहीं मानते थे कि प्रभु यीशु प्रभु है, वह एक अच्छा व्यक्ति तो था जिसने न तो सांसारिक व्यवस्था को तोड़ा और न ही मूसा की व्यवस्था को; फिर भी उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा क्यों की? उन्होंने प्रभु यीशु के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया? इससे यह देखा जा सकता है कि ये लोग कितने दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण हैं—वे परम दुष्ट हैं! फरीसी अपना जो दुष्ट चेहरा उजागर करते हैं, वह उनके दयालुता के छद्मावरण से ज्यादा अलग नहीं हो सकता। ऐसे कई लोग हैं जो यह नहीं पहचान सकते कि उनका कौन-सा चेहरा असली है और कौन-सा नकली, फिर भी प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने उन सभी को प्रकट किया। फरीसी खुद को कितनी अच्छी तरह से छिपाते हैं, वे बाहर से कितने दयालु लगते हैं—अगर तथ्यों का खुलासा न हुआ होता, तो कोई भी यह देख पाने में सक्षम न होता कि असल में वे क्या हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

फरीसियों के पाखंड की मुख्य अभिव्यक्ति क्या थी? उन्होंने केवल पवित्र ग्रंथ को डूबकर पढ़ा और सत्य को तलाश नहीं किया। उन्होंने जब परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो प्रार्थना या तलाश नहीं की; इसके बजाय, उन्होंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, परमेश्वर ने क्या कहा और क्या किया था उसे पढ़ा, और इस तरह उसके वचनों को एक प्रकार के मत, एक सिद्धांत में बदल दिया जिसे उन्होंने दूसरों को पढ़ाया। यही है परमेश्वर के वचनों को डूबकर पढ़ना। तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? ऐसी क्या चीज़ थी जिसे उन्होंने डूबकर पढ़ा? उनकी दृष्टि में, ये परमेश्वर के वचन नहीं थे, परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं थे, सत्य तो और भी कम थे, बल्कि वे विद्या का एक रूप थे। ऐसी विद्या को, उनकी दृष्टि में, आगे बढ़ाया जाना चाहिए था, इसका प्रसार किया जाना चाहिए था, और यही परमेश्वर और सुसमाचार के मार्ग का प्रसार भी था। इसी को उन्होंने "प्रवचन" कहा, और जिस धर्मोपदेश का उन्होंने प्रवचन दिया वह धर्मशास्त्र था।

... फरीसियों को जिस धर्मशास्त्र और मत में एक प्रकार के ज्ञान के रूप में महारत हासिल थी उसका उपयोग उन्होंने लोगों की निंदा करने और उन्हें सही या गलत आँकने के औज़ार के रूप में किया। इसका उपयोग उन्होंने प्रभु यीशु पर भी किया—और इस तरह प्रभु यीशु की निंदा की गई। उनके द्वारा लोगों का मूल्यांकन, और उनके साथ उनका व्यवहार कभी भी उनके सार पर या इस बात पर आधारित नहीं था कि उन्होंने जो कुछ कहा वह सही था या गलत, उनके वचनों का स्रोत या उत्पत्ति तो दूर की बात थी। उन्होंने केवल उन्ही कड़े शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर लोगों की निंदा की और उन्हें आँका, जिसमें उन्हें महारत हासिल थी। और इसीलिए, इन फरीसियों ने यह जानते हुए भी कि प्रभु यीशु ने जो कुछ किया वह पाप नहीं था, और कानून का उल्लंघन नहीं था, उसकी निंदा की, क्योंकि प्रभु यीशु ने जो कहा वह उनकी महारत वाले ज्ञान और विद्या तथा उनके द्वारा प्रतिपादित धर्मशास्त्र के मत के विपरीत लग रहा था। और फरीसी इन शब्दों और वाक्यांशों के ऊपर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते थे, वे इस ज्ञान से चिपट गए थे और इसे छोडना नहीं चाहते थे। अंत में एकमात्र संभावित परिणाम क्या रहा? उन्होंने इस बात को स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु मसीहा हैं जो आएंगे, या प्रभु यीशु ने जो कहा उसमें सत्य था, यह मानना तो दूर की बात थी कि प्रभु यीशु ने जो किया वह सत्य के अनुरूप था। उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा करने के लिए कुछ निराधार आरोप ढूँढ निकाले—लेकिन वास्तव में, क्या वे अपने हृदय में इस बात को जानते थे कि उन्होंने जिन पापों के लिए उसकी निंदा की, क्या वे जायज़ थे? वे जानते थे। फिर भी उन्होंने इस तरह उसकी निंदा क्यों की? (वे इस बात पर विश्वास नहीं करना चाहते थे कि उनके मन में जो उच्च और शक्तिशाली परमेश्वर है वह प्रभु यीशु हो सकता है, एक साधारण मनुष्य के पुत्र की इस छवि वाला।) वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। और इसे स्वीकार करने से इनकार की उनकी प्रकृति क्या थी? क्या इसमें परमेश्वर से तर्क करने की कोशिश नहीं की गई थी? उनका मतलब यह था, "क्या परमेश्वर ऐसा कर सकता है? यदि परमेश्वर देहधारण करता, तो उसने निश्चित रूप से किसी प्रतिश्ठित वंश में जन्म लिया होता। इसके अलावा, उसे शास्त्रियों और फरीसियों का संरक्षण स्वीकार करना चाहिए, इस ज्ञान को सीखना चाहिए, और पवित्र ग्रंथ को खूब पढ़ना चाहिए। इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद ही वह ‘देहधारी’ की उपाधि ग्रहण कर सकता है।" उनका विश्वास था कि, सबसे पहले, तुम इस प्रकार योग्य नहीं हो, इसलिए तुम परमेश्वर नहीं हो; दूसरे, इस ज्ञान के बिना तुम परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, तुम्हारा परमेश्वर होना तो दूर की बात रही; तीसरे, तुम मंदिर के बाहर काम नहीं कर सकते—तुम अब मंदिर में नहीं हो, तुम हमेशा पापियों के बीच रहते हो, इसलिए तुम जो काम करते हो वह परमेश्वर के कार्य क्षेत्र से परे है। उनकी निंदा का आधार कहाँ से आया? पवित्र ग्रंथ से, मनुष्य के मन से, और उस धर्मशास्त्रीय शिक्षा से जो उन्होंने प्राप्त की थी। क्योंकि वे धारणाओं, कल्पनाओं, और ज्ञान के घमंड में डूबे हुए थे, इसलिए वे इस ज्ञान को सही, सत्य और मूल आधार मान रहे थे, और यह कि परमेश्वर कभी भी इन चीज़ों के विरुद्ध नहीं जा सकता। क्या उन्होंने सत्य की तलाश की? नहीं की। उन्होंने केवल खुद की धारणाओं और कल्पनाओं, और ख़ुद के अनुभवों को खंगाला, और इनका उपयोग उन्होंने परमेश्वर को परिभाषित करने और यह निर्धारित करने के लिए किया कि वह सही है या गलत। इसका अंतिम परिणाम क्या निकला? उन्होंने परमेश्वर के कार्य की निंदा की और उसे क्रूस पर चढ़ा दिया।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (7)' से उद्धृत

क्या तुम लोग कारण जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन-सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग क्या कहते हो, ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इसके अलावा क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने मसीहा के नाम के साथ व्यर्थ ही चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और बेतुके नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा' से उद्धृत

यदि, अपने विश्वास में, लोग सत्य को पालन किए जाने वाले विनियमों के एक समुच्चय के रूप में मानते हैं, तो क्या उनका विश्वास धार्मिक अनुष्ठानों में बदलने के लिए उत्तरदायी नहीं है? और इस तरह के धार्मिक अनुष्ठानों और ईसाई धर्म के बीच क्या अंतर है? वे चीज़ों को जिस तरह से कहते हैं उसमें अधिक गहरे और अधिक प्रगतिशील हो सकते हैं, लेकिन यदि उनका विश्वास सिर्फ विनियमों का एक समुच्चय और एक प्रकार का अनुष्ठान बन जाता है, तो क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि यह ईसाई धर्म में बदल गया है? (हाँ, ऐसा होता है।) पुरानी और नई शिक्षाओं के बीच अंतर हैं, लेकिन यदि शिक्षाएँ एक तरह के सिद्धांत से ज्यादा कुछ नहीं हों और लोगों के लिए मात्र अनुष्ठान का, सिद्धान्त, का एक रूप बन गयी हों—और, इसी तरह से, यदि वे इससे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं या सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, तो क्या उनका विश्वास केवल ईसाई धर्म के समान नहीं है? सार रूप में, क्या यह ईसाई धर्म नहीं है? (हाँ, है।) इसलिए, तुम लोगों के व्यवहार में और अपने कर्तव्यों को करने में, किन चीज़ों में तुम्हारे दृष्टिकोण और स्थितियाँ ईसाई धर्म में विश्वासियों के समान या उसी तरह की हैं? (विनियमों का पालन करने में, और वचनों और सिद्धान्तों से सज्जित होने में।) (आध्यात्मिक होने के दिखावे और अच्छा व्यवहार दर्शाने वाला होने, और धर्मपरायण और विनम्र होने पर ध्यान केन्द्रित करने में।) तू बाहरी तौर पर अच्छे व्यवहार वाला होने की तलाश करता है, अपने आप को एक प्रकार के आध्यात्मिकता के आभास से भरने, आध्यात्मिक सिद्धान्त बोलने, ऐसी चीज़ों को कहने जो आध्यात्मिक रूप से सही हों, ऐसी चीज़ों को करने जो सापेक्ष रूप से मानव अवधारणाओं और कल्पनाओं में अनुमोदित हैं, और धार्मिक होने का ढोंग करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करता है। तू जो कुछ कहता और करता है उसमें तू ऊँचाई से वचनों और सिद्धांतों को बोलता है, लोगों को अच्छा करने, धार्मिक लोग बनने, और सत्य को समझने के लिए सिखाता है; तू आध्यात्मिक होने के बारे में हवा लगाता है, और तू एक सतही आध्यात्मिकता टपकाता है। हालाँकि अभ्यास में, तूने कभी भी सत्य की तलाश नहीं की है; जैसे ही तू किसी समस्या का सामना करता है, तो तू परमेश्वर को एक तरफ उछालते हुए, पूरी तरह से मानवीय इच्छा के अनुसार कार्य करता है। तूने कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया, तू कभी भी यह नहीं समझ पाया है कि सत्य में किस बारे में बोला गया है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, मनुष्य से उसे किन मानकों की अपेक्षा है—तूने इन मामलों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया है या अपने को उनके साथ चिंतित नहीं किया है। क्या लोगों के ऐसे बाहरी कृत्य और आंतरिक स्थितियाँ—अर्थात्, इस प्रकार का विश्वास—परमेश्वर के लिए भय मानने और बुराई से दूर रहने को शामिल करता है? यदि लोगों की आस्था और उनके सत्य के अनुसरण के बीच कोई संबंध नहीं है, तो क्या वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं या नहीं करते हैं? इस बात की परवाह किए बिना कि वे लोग जिनका सत्य का अनुसरण करने से कोई संबंध नहीं है कितने वर्षों तक विश्वास कर सकते हैं, क्या सच्ची, परमेश्वर का भय मानने वाली श्रद्धा प्राप्त कर सकते हैं अथवा नहीं और बुराई से दूर रह सकते हैं या नहीं? (वे ऐसा नहीं कर सकते हैं।) तो ऐसे लोगों का बाहरी व्यवहार क्या होता है? वे किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? (फरीसियों का मार्ग।) वे अपने आप को किस चीज़ से सज्जित करने में अपने दिनों को बिताते हैं? क्या ये चीज़ें वचन और सिद्धांत नहीं हैं? क्या वे अपने आप को फरीसियों की तरह अधिक बनाने, अधिक आध्यात्मिक, और ऐसे लोगों की तरह अधिक बनाने के लिए जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, अपने आप को वचनों और सिद्धांतों से सज्जित, सुशोभित करते हुए, अपने दिनों को नही बिताते हैं? बस इन सभी पद्धतियों की प्रकृति क्या है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करना है? क्या यह उस में वास्तविक विश्वास है? (नहीं, यह विश्वास नहीं है।) तो वे क्या कर रहे हैं? वे परमेश्वर को धोखा दे रहे है; वे बस एक प्रक्रिया के चरण को पूरा कर रहे हैं, और धार्मिक अनुष्ठानों में संलग्न हो रहे हैं। वे विश्वास के ध्वज को लहरा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को निभा रहे हैं, आशीष पाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग केवल आपातकालीन स्थितियों के लिए, या खुद को त्याग कर दूसरों की मदद करने के लिए खुद को कुछ विशेष सत्यों से लैस करते हैं, न कि अपनी परेशानियों को हल करने के लिए; हम उन्हें "निस्वार्थ लोग" कहते हैं। वे दूसरों को सत्य की कठपुतलियाँ और खुद को इसके स्वामी के रूप में मानते हैं, वे दूसरों को सत्य को कस कर पकड़े रहना और निष्क्रिय न होना सिखाते हैं, जबकि वे खुद दर्शकों की तरह किनारे खड़े रहते हैं। ये किस प्रकार के लोग हैं? वे स्वयं को कुछ सत्यों से लैस कर लेते हैं पर केवल दूसरों को भाषण देने के लिए, जबकि स्वयं के विनाश को रोकने के लिए वे कुछ नहीं करते। यह कितना दयनीय है! यदि उनके शब्द दूसरों की मदद कर सकते हैं, तो वे उनकी सहायता क्यों नहीं कर सकते हैं? हमें उन्हें ढोंगी के रूप में अंकित करना चाहिए, जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है। वे दूसरों को सत्य के वचनों की आपूर्ति करते हैं और दूसरों से उनका अभ्यास करने का आग्रह करते हैं, लेकिन खुद उनका अभ्यास करने की कोई कोशिश नहीं करते। क्या वे घृणा के योग्य नहीं हैं? स्पष्ट रूप से, वे स्वयं तो सत्य के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, लेकिन दूसरों को ऐसा करने के लिए बाध्य करते हैं—यह कैसा क्रूर तरीका है! वे दूसरों की मदद करने के लिए वास्तविकता का उपयोग नहीं कर रहे हैं; वे दूसरों को पोषण प्रदान करने के लिए प्रेम का उपयोग नहीं कर रहे हैं। वे सिर्फ लोगों को धोखा दे रहे हैं और उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहता है, और प्रत्येक व्यक्ति सत्य के वचनों को अगले व्यक्ति को सौंपता रहता है, तो क्या इसका परिणाम यह नहीं होगा कि हर व्यक्ति सत्य के वचनों को सिर्फ बोलता रहेगा, लेकिन खुद उनका अभ्यास करने में असमर्थ रहेगा? ऐसे लोग कैसे बदल सकते हैं? वे अपनी ही समस्याओं को नहीं पहचानते; उनके लिए आगे कोई मार्ग कैसे हो सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उनके पास एक मार्ग होता है' से उद्धृत

कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में वे भले ही कहें कि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं, परंतु उनकी पीठ पीछे वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और पूरी तरह अलग ही व्यवहार करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसी नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, परंतु वह बाहर से इसका दिखावा नहीं करता। अगर कभी इस तरह के हालात पैदा हों, तो वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध जाकर नहीं बोलता है या कार्य नहीं करता। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, जब कोई बात होती है तो वह अपनी बुद्धि से कार्य करता है और अपने सिद्धांतों पर टिका रहता है। इस तरह का व्यक्ति ही सच्ची सेवा कर सकता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ज़बानी जमा खर्च करते हैं; दिनभर चिंता में भौंहें चढ़ाए अपना समय गँवाते रहते हैं, अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी हरकत है! यदि तुम उनसे पूछो कि "क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा मत करो; बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम वास्तविक अभ्यास से दर्शाओ और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो लोग परमेश्वर से केवल मौखिक रूप से और बेमन से व्यवहार करते हैं वे सभी पाखंडी हैं, कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःखभरे आँसुओं को पसंद करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन-सी भलाई हो सकती है? कुछ लोग अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय अपनी अनुग्रहशीलता का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितान्त शक्तिहीन मेमने की तरह चापलूसी करते हैं। क्या यह तौर–तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए, और एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में जिये। उसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए, और वो जहाँ भी जाए, वहीँ गवाही दे; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे अभ्यास दिखावे के लिए करते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटारे और कष्टों से गुज़रना चाहिए। जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर का विश्वास है, वे ऊपरी तौर पर दूसरों से अलग नहीं दिखते, किन्तु उनके कामकाज प्रशंसनीय होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाला इंसान समझा जा सकता है। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंतत:, तुम नियमों और सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक पाखंडी होते हैं।

............

इंसान के दिखावटी काम क्या दर्शाते हैं? वे देह की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, यहाँ तक कि दिखावे के सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा को दर्शा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों में जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं, और वे आत्मिक हैं, किन्तु सच में वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो चीज़ तुम्हें अच्छी लगती है, परमेश्वर उसी से घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर नापसंद और अस्वीकार करता है। यदि तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया जा सकता है? यदि तुम्हारे काम सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम एकदम नाकारा हो। ऐसे लोग किस तरह के होते हैं जो दिखावे के लिए तो अच्छे काम करते हैं लेकिन वास्तविकता से रहित होते हैं? ऐसे लोग सिर्फ पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग होते हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोग और भी ज़्यादा पाखंडी बन जाओगे। जितने ज़्यादा पाखंडी बनोगे, उतने ही ज़्यादा परमेश्वर का विरोध करोगे। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से हटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

आजकल अधिकांश लोग अभ्यास के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन वे यह सब सत्य का अनुसरण करने और जीवन के विकास को प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं। यहीं पर वे भटक जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नई रोशनी प्राप्त करने में सक्षम हैं, लेकिन उनके अभ्यास के तरीके नहीं बदलते हैं। वे परमेश्वर के आज के वचनों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए अपनी पुरानी धर्म-संबंधी धारणाओं को अपने साथ लाते हैं, इसलिए वे जो प्राप्त करते हैं वह अभी भी धर्म-संबंधी धारणाओं से रंगे सिद्धांत हैं; वे आज का प्रकाश प्राप्त कर ही नहीं रहे हैं। नतीजतन, उनके अभ्यास दागदार हैं; नए खोल में लिपटे वही पुराने अभ्यास हैं। वे कितने भी अच्छे ढंग से अभ्यास करें, वे फिर भी ढोंगी ही हैं। परमेश्वर हर दिन नई चीजें करने में लोगों की अगुवाआई करता है, माँग करता है कि प्रत्येक दिन वे नई अंतर्दृष्टि और समझ हासिल करें, और अपेक्षा करता है कि वे पुराने ढंग के और दोहराव करने वाले न हों। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन फिर भी तुम्हारे अभ्यास के तरीके बिलकुल नहीं बदले हैं, अगर तुम अभी भी ईर्ष्यालु हो और बाहरी मामलों में ही उलझे हुए हो, अभी भी तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के वास्ते उसके सामने लाने के लिए एक शांत हृदय नहीं है तो तुम कुछ भी नहीं प्राप्त करोगे। जब परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने की बात आती है, तब यदि तुम अलग ढंग से योजना नहीं बनाते, अपने अभ्यास के लिए नए तरीके नहीं अपनाते और किसी नई समझ को पाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अभ्यास के अपने तरीके को बदले बिना, पुराने से चिपके रहते हो और केवल सीमित मात्रा में नया प्रकाश प्राप्त करते हो, तो तुम्हारे जैसे लोग केवल नाम के लिए इस धारा में हैं; वास्तविकता में, वे मज़हबी फरीसी हैं जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते, उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, वे उसके वचनों के प्यासे बनें, उसके वचनों को खाएँ-पिएँ और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बन सकें। यदि ये तुम्हारी सच्ची मंशाएँ हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उन्नत करेगा और तुम्हारे प्रति अनुग्रही होगा। कोई भी न तो इस पर संदेह कर सकता है और न ही इसे बदल सकता है। यदि तुम्हारी मंशा परमेश्वर के आज्ञापालन की नहीं है और तुम्हारे उद्देश्य दूसरे हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप भी परमेश्वर के विरोध में होगा। तुम भले ही मृदुभाषी और सौम्य हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति उचित दिखायी दे, और तुम भले ही आज्ञाकारी प्रतीत होते हो, किन्तु जब परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारी मंशाओं और विचारों की बात आती है, तो जो भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में होता है, वह बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं। वे सीधे-सीधे परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से एक-एक को प्रकट करेगा और सबको दिखाएगा कि पवित्र आत्मा उन सभी से, जो पाखण्डी हैं, निश्चित रूप से घृणा करेगा और उन्हें ठुकरा देगा। चिंता नहीं : परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से एक-एक से निपटेगा और उनका हिसाब करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

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