119. फरीसियों की पहचान करने के सिद्धांत

(1) फरीसी मूलतः पाखंडी होते हैं, बाहरी तौर पर विनम्र और धैर्यवान, लेकिन स्वभाव से कपटी और दुर्भावनापूर्ण। वे सत्य से घृणा और परमेश्वर का विरोध करते हैं।

(2) फरीसी विशेष रूप से अहंकारी और आत्म-तुष्ट होते हैं। दूसरों को मोहित करने के लिए वे अक्सर पत्रों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करते हैं और दूसरों से अपनी आराधना और आज्ञापालन करवाते हैं, परंतु वे सत्य को जरा-भी स्वीकार नहीं करते हैं।

(3) फरीसी सिर्फ इसलिए कष्ट उठाते हैं और कीमत अदा करते हैं ताकि वे आशीष प्राप्त कर सकें और उन्हें ताज पहनाया जा सके। कभी भी सत्य का अभ्यास किए बिना, वे सिर्फ नियमों और धार्मिक रस्मों के पालन पर जोर देते हैं।

(4) फरीसी केवल झूठी आध्यात्मिकता का अनुसरण करते हैं। दूसरों को छलते और लुभाते हुए, वे आत्म-ज्ञान के खोखले शब्द बोलते हैं, और वे कभी भी सच्चा पश्चाताप नहीं करते या बदलते नहीं हैं।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

"जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो, क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये आराधनालयों में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है" (मत्ती 6:5)।

"शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं; इसलिये वे तुमसे जो कुछ कहें वह करना और मानना, परन्तु उनके से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं। वे एक ऐसे भारी बोझ को जिसको उठाना कठिन है, बाँधकर उन्हें मनुष्यों के कन्धों पर रखते हैं; परन्तु स्वयं उसे अपनी उंगली से भी सरकाना नहीं चाहते। वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं : वे अपने ताबीजों को चौड़ा करते और अपने वस्त्रों की कोरें बढ़ाते हैं। भोज में मुख्य-मुख्य स्थान, और सभा में मुख्य-मुख्य आसन, बाजारों में नमस्कार, और मनुष्य में रब्बी कहलाना उन्हें भाता है" (मत्ती 23:2-7)।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। [हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो : इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।]

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

"हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय! जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बंध जाएगा। हे मूर्खो और अंधो, कौन बड़ा है; सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है? फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बंध जाएगा। हे अंधो, कौन बड़ा है; भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है? इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है। जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवाले की भी शपथ खाता है। जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्‍वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर और असंयम से भरे हुए हैं। हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो, और कहते हो, 'यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्‍ताओं की हत्या में उनके साझी न होते।' इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो कि तुम भविष्यद्वक्‍ताओं के हत्यारों की सन्तान हो। अत: तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा पूरी तरह भर दो। हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी" (मत्ती 23:13-36)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

"फरीसी" उपाधि की परिभाषा क्या है? वे ऐसे लोग होते हैं जो पाखंडी हैं, जो पूरी तरह से नकली हैंऔर अपने हर कार्य में नाटक करते हैं, अच्छे, दयालु और सकारात्मक होने का ढोंग करते हैं। क्या वे वास्तव में ऐसे हैं? चूँकि वे पाखंडी हैं, इसलिए उनमें जो कुछ भी व्यक्त और प्रकट होता है वह झूठ है; वह सब ढोंग है—यह उनका असली चेहरा नहीं है। उनका असली चेहरा उनके हृदयों के भीतर छिपा है; यह दिखायी नहीं देता है। यदि लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, और यदि वे सत्य को नहीं समझते हैं, तो उनके द्वारा प्राप्त सिद्धांत क्या बन जाते हैं? क्या वे वह सिद्धांत और शब्द नहीं बन जाते जिनके बारे में लोग अक्सर बोलते हैं? लोग छिपाने और अपने को इतने आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए इन तथा-कथित सही सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। वे जहाँ कहीं भी जाते हैं, जिन चीज़ों के बारे में बात करते हैं, वे जो कहते हैं, और उनका बाहरी व्यवहार, सब कुछ दूसरों को सही और अच्छा लगता है; वे सभी मानवीय धारणाओं और रुचि के अनुरूप हैं। दूसरों की नज़रों में, वे धर्मनिष्ठ और विनम्र, दोनों ही हैं, सहनशीलता और सहिष्णुता में सक्षम हैं, और वे दूसरों से प्रेम कर सकते हैं और परमेश्वर से प्यार कर सकते हैं। वास्तव में, भले ही यह सब नकली है; यह सब केवल ढोंग है और एक तरीका है जिससे वे अपने को प्रदर्शित करते हैं। बाहर से, वे परमेश्वर के प्रति वफादार प्रतीत होते हैं, लेकिन वे वास्तव में केवल दूसरों को दिखाने के लिए कर रहे होते हैं। जब कोई नहीं देख रहा होता है, तो वे ज़रा से भी वफ़ादार नहीं होते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह लापरवाही से किया गया होता है। सतही तौर पर, उन्होंने अपने परिवारों और अपनी आजीविकाओं को छोड़ दिया है, वे कड़ी मेहनत करते प्रतीत होते हैं और खुद को खपाते हैं; लेकिन वास्तव में, वे कलीसिया से गुप्त रूप से मुनाफा कमा रहे हैं और चढ़ावों को चुरा रहे हैं! जो कुछ भी वे बाहर प्रकट करते हैं—उनका सारा व्यवहार—नकली है। एक पाखंडी फरीसी होने का यही अर्थ है। "फरीसी"—ये लोग कहाँ से आते हैं? क्या वे अविश्वासियों के बीच से आते हैं? ये सभी विश्वासियों के बीच से आते हैं। ये विश्वासी इस तरह क्यों बदल जाते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर के वचनों ने उन्हें ऐसा बना दिया है? (नहीं।) कारण क्या है? इसका कारण उनके द्वारा चुना गया रास्ता है। उन्होंने परमेश्वर के वचनों को एक शस्त्र के रूप में लिया हैं जिससे वे स्वयं को शस्त्र-सज्जित करते हैं; वे खुद को इन वचनों के साथ शस्त्र-सज्जित करते हैं, उन्हें जीवित रहने के लिए और बिना कुछ दिए कुछ पाने के लिए पूँजी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वे मात्र सिद्धांतों का उपदेश देते हैं, मगर उन्होंने कभी भी उन वचनों का अभ्यास नहीं किया है। वे किस तरह के लोग हैं जो परमेश्वर के मार्ग का कभी भी अनुसरण नहीं करने के बावज़ूद वचनों और सिद्धान्तों का उपदेश देना जारी रखते हैं? ये पाखण्डी फरीसी हैं। वह थोड़ा-सा कथित अच्छा व्यवहार और खुद को व्यक्त करने के अच्छे तरीके, और जो थोड़ा उन्होंने त्यागा और व्यय किया है, वह पूरी तरह से मजबूरी में किया गया है; यह सब उनके द्वारा किया गया नाटक है। वे पूरी तरह से नकली हैं; वे सारे काम ढोंग हैं। इन लोगों के हृदयों में, परमेश्वर के प्रति जरा-सी भी श्रद्धा नहीं है, न ही वे परमेश्वर में कोई सच्ची आस्था रखते हैं। इससे भी अधिक, वे गैर-विश्वासियों में से हैं। यदि लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, तो वे इस तरह के रास्ते पर चलेंगे, और वे फरीसी बन जाएँगे। क्या यह डरावना नहीं है? फरीसी किस स्थान पर एकत्र होते हैं? वह एक बाजार है। परमेश्वर की दृष्टि में वह धर्म है; वह परमेश्वर की कलीसिया नहीं है, न ही वह कोई ऐसा स्थान है जिसमें उसकी आराधना की जाती है। इस प्रकार, यदि लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो फिर वे चाहे परमेश्वर के कथनों से संबंधित जितने भी शाब्दिक वचनों और सतही सिद्धांतों को आत्मसात कर लें, वह किसी काम का नहीं होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक' से उद्धृत

इस्राएल में "फरीसी" एक प्रकार की उपाधि हुआ करती थी। अब वह उसके बजाय एक ठप्पा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि फरीसी एक प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि बन गए हैं। इस प्रकार के व्यक्ति की क्या विशेषताएँ हैं? वे नारे लगाते हैं; वे ढोंग करने में, ठाट-बाट में, अपने असली आत्म को छिपाने में कुशल होते हैं, और वे महान कुलीनता, महान पवित्रता और ईमानदारी, महान निष्पक्षता और सम्मान का दिखावा करते हैं। नतीजतन, वे सत्य का ज़रा भी अभ्यास नहीं करते। वे कार्य कैसे करते हैं? वे धर्मग्रंथ पढ़ते हैं, उपदेश देते हैं, दूसरों को भलाई करने, बुराई न करने, परमेश्वर का विरोध न करने की शिक्षा देते हैं, और वे दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करते हैं, किंतु जब दूसरों की पीठ फिरती है, तो वे चढ़ावे की चीज़ें चुरा लेते हैं। प्रभु यीशु ने कहा था कि वे "मच्छर तो छान डालते हैं, परंतु ऊँट निगल जाते हैं।" इसका मतलब यह है कि उनका सारा व्यवहार सतह पर तो अच्छा लगता है—वे आडंबरपूर्ण तरीके से नारेबाजी करते हैं, बड़े-बड़े सिद्धांत बोलते हैं, और उनके शब्द सुखद लगते हैं, लेकिन उनके कर्म अव्यवस्थित गड़बड़झाला होते हैं, पूरी तरह से परमेश्वर के प्रतिरोधी। उनके व्यवहार और बाह्य रूप सब ढोंग, सब धोखाधड़ी हैं; उनके दिलों में न तो सत्य के लिए ज़रा-सा भी प्रेम है, न ही सकारात्मक चीज़ों के लिए। वे सत्य से क्षुब्ध हैं, उस सबसे क्षुब्ध हैं जो परमेश्वर से आता है, और सकारात्मक चीजों से क्षुब्ध हैं। वे किस चीज़ से प्यार करते हैं? क्या वे निष्पक्षता और धार्मिकता से प्यार करते हैं? (नहीं।) तुम कैसे कह सकते हो कि वे इन चीज़ों से प्यार नहीं करते? (प्रभु यीशु ने स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाया, जिसको उन्होंने न केवल अस्वीकार किया, बल्कि निंदा भी की।) अगर उन्होंने निंदा न की होती, तो क्या तुम यह कहने में सक्षम होते? प्रभु यीशु के कार्य करने के लिए आने से पहले, तुम किस आधार पर कह सकते थे कि उन्हें निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद नहीं है? तुम यह कह पाने में सक्षम नहीं रहे होगे, है ना? उनका सारा व्यवहार ढोंग है, और वे इस अच्छे व्यवहार का ढोंग दूसरों के विश्वास को ठगने के लिए करते हैं। क्या यह पाखंड और छल नहीं है? क्या ऐसे धोखेबाज सत्य से प्रेम कर सकते हैं? उनके इस अच्छे व्यवहार का छिपा हुआ उद्देश्य क्या है? उनके उद्देश्य का एक भाग दूसरों को ठगना है; दूसरा भाग दूसरों को धोखा देना, उन पर विजय पाना और उनसे अपनी आराधना करवाना, और अंत में, पुरस्कार पाना है। इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने के लिए उनकी तकनीकें कितनी चतुर होंगी? तो, क्या ऐसे लोगों को निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद है? बेशक नहीं। वे हैसियत से प्यार करते हैं, वे प्रसिद्धि और संपत्ति से प्यार करते हैं, और वे पुरस्कार प्राप्त करना चाहते हैं। वे लोगों के लिए परमेश्वर के शिक्षा-वचनों को बिल्कुल भी व्यवहार में नहिं लाते। बिलकुल नहीं। वे उनके ज़रा-से हिस्से को भी नहीं जीते; वे बस लोगों को धोखा देने और उन पर विजय पाने के लिए, अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा को मजबूत करने के लिए स्वांग रचते हैं और अपने को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करते हैं। एक बार जब ये चीजें हाथ में आ जाती हैं, तो वे इनका उपयोग पूँजी हासिल करने और आय के एक स्रोत के रूप में करते हैं। क्या यह घृणास्पद नहीं है? इसे उनके इन सभी व्यवहारों में देखा जा सकता है कि सत्य से प्रेम न करना ही उनका सार है, क्योंकि वे सत्य को कभी व्यवहार में नहीं लाते। इस बात का क्या संकेत है कि वे सत्य को व्यवहार में नहीं लाते? यह सबसे बड़ा संकेत था : प्रभु यीशु काम करने आया था और उसने जो कुछ कहा वह सही था, उसने जो कुछ कहा वह सत्य था। उन्होंने इन बातों के साथ कैसा व्यवहार किया? (उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।) क्या उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे मानते थे कि वे गलत हैं, या उन्होंने यह जानते हुए भी उन्हें अस्वीकार किया कि वे सही हैं? (उन्होंने यह जानते हुए भी उन्हें अस्वीकार किया कि वे सही हैं।) और इसका क्या कारण हो सकता है? वे सत्य से प्रेम नहीं करते, और वे सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं। प्रभु यीशु ने जो कहा, वह सब बिना किसी त्रुटि के था, सही था, और हालाँकि उन्हें प्रभु यीशु के वचनों में उसके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कोई गलती नहीं मिली, फिर भी उन्होंने उसकी निंदा की, और फिर उन्होंने साजिश रची : "उसे सूली पर चढ़ा दो। या तो वह रहेगा या हम।" इस तरह वे प्रभु यीशु के खिलाफ खड़े हो गए। भले ही वे यह नहीं मानते थे कि प्रभु यीशु प्रभु है, वह एक अच्छा व्यक्ति तो था जिसने न तो कानूनी व्यवस्थाओं को तोड़ा और न ही यहोवा[क] की व्यवस्थाओं को; फिर भी उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा क्यों की? उन्होंने प्रभु यीशु के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया? इससे यह देखा जा सकता है कि ये लोग कितने दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण हैं—वे परम दुष्ट हैं! फरीसी अपना जो दुष्ट चेहरा उजागर करते हैं, वह उनके दयालुता के छद्मावरण से ज्यादा अलग नहीं हो सकता। ऐसे कई लोग हैं जो यह नहीं पहचान सकते कि उनका कौन-सा चेहरा असली है और कौन-सा नकली, फिर भी प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने उन सभी को प्रकट किया। फरीसी खुद को कितनी अच्छी तरह से छिपाते हैं, वे बाहर से कितने दयालु लगते हैं—अगर तथ्यों का खुलासा न हुआ होता, तो कोई भी यह देख पाने में सक्षम न होता कि असल में वे क्या हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

फरीसियों के पाखंड की मुख्य अभिव्यक्ति क्या थी? उन्होंने केवल पवित्र ग्रंथ को डूबकर पढ़ा और सत्य को तलाश नहीं किया। उन्होंने जब परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो प्रार्थना या तलाश नहीं की; इसके बजाय, उन्होंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, परमेश्वर ने क्या कहा और क्या किया था उसे पढ़ा, और इस तरह उसके वचनों को एक प्रकार के मत, एक सिद्धांत में बदल दिया जिसे उन्होंने दूसरों को पढ़ाया। यही है परमेश्वर के वचनों को डूबकर पढ़ना। तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? ऐसी क्या चीज़ थी जिसे उन्होंने डूबकर पढ़ा? उनकी दृष्टि में, ये परमेश्वर के वचन नहीं थे, परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं थे, सत्य तो और भी कम थे, बल्कि वे विद्या का एक रूप थे। ऐसी विद्या को, उनकी दृष्टि में, आगे बढ़ाया जाना चाहिए था, इसका प्रसार किया जाना चाहिए था, और यही परमेश्वर और सुसमाचार के मार्ग का प्रसार भी था। इसी को उन्होंने "प्रवचन" कहा, और जिस धर्मोपदेश का उन्होंने प्रवचन दिया वह धर्मशास्त्र था।

... फरीसियों को जिस धर्मशास्त्र और मत में एक प्रकार के ज्ञान के रूप में महारत हासिल थी उसका उपयोग उन्होंने लोगों की निंदा करने और उन्हें सही या गलत आँकने के औज़ार के रूप में किया। इसका उपयोग उन्होंने प्रभु यीशु पर भी किया—और इस तरह प्रभु यीशु की निंदा की गई। उनके द्वारा लोगों का मूल्यांकन, और उनके साथ उनका व्यवहार कभी भी उनके सार पर या इस बात पर आधारित नहीं था कि उन्होंने जो कुछ कहा वह सही था या गलत, उनके वचनों का स्रोत या उत्पत्ति तो दूर की बात थी। उन्होंने केवल उन्ही कड़े शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर लोगों की निंदा की और उन्हें आँका, जिसमें उन्हें महारत हासिल थी। और इसीलिए, इन फरीसियों ने यह जानते हुए भी कि प्रभु यीशु ने जो कुछ किया वह पाप नहीं था, और कानून का उल्लंघन नहीं था, उसकी निंदा की, क्योंकि प्रभु यीशु ने जो कहा वह उनकी महारत वाले ज्ञान और विद्या तथा उनके द्वारा प्रतिपादित धर्मशास्त्र के मत के विपरीत लग रहा था। और फरीसी इन शब्दों और वाक्यांशों के ऊपर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते थे, वे इस ज्ञान से चिपट गए थे और इसे छोडना नहीं चाहते थे। अंत में एकमात्र संभावित परिणाम क्या रहा? उन्होंने इस बात को स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु मसीहा हैं जो आएंगे, या प्रभु यीशु ने जो कहा उसमें सत्य था, यह मानना तो दूर की बात थी कि प्रभु यीशु ने जो किया वह सत्य के अनुरूप था। उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा करने के लिए कुछ निराधार आरोप ढूँढ निकाले—लेकिन वास्तव में, क्या वे अपने हृदय में इस बात को जानते थे कि उन्होंने जिन पापों के लिए उसकी निंदा की, क्या वे जायज़ थे? वे जानते थे। फिर भी उन्होंने इस तरह उसकी निंदा क्यों की? (वे इस बात पर विश्वास नहीं करना चाहते थे कि उनके मन में जो उच्च और शक्तिशाली परमेश्वर है वह प्रभु यीशु हो सकता है, एक साधारण मनुष्य के पुत्र की इस छवि वाला।) वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। और इसे स्वीकार करने से इनकार की उनकी प्रकृति क्या थी? क्या इसमें परमेश्वर से तर्क करने की कोशिश नहीं की गई थी? उनका मतलब यह था, "क्या परमेश्वर ऐसा कर सकता है? यदि परमेश्वर देहधारण करता, तो उसने निश्चित रूप से किसी प्रतिश्ठित वंश में जन्म लिया होता। इसके अलावा, उसे शास्त्रियों और फरीसियों का संरक्षण स्वीकार करना चाहिए, इस ज्ञान को सीखना चाहिए, और पवित्र ग्रंथ को खूब पढ़ना चाहिए। इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद ही वह 'देहधारी' की उपाधि ग्रहण कर सकता है।" उनका विश्वास था कि, सबसे पहले, तुम इस प्रकार योग्य नहीं हो, इसलिए तुम परमेश्वर नहीं हो; दूसरे, इस ज्ञान के बिना तुम परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, तुम्हारा परमेश्वर होना तो दूर की बात रही; तीसरे, तुम मंदिर के बाहर काम नहीं कर सकते—तुम अब मंदिर में नहीं हो, तुम हमेशा पापियों के बीच रहते हो, इसलिए तुम जो काम करते हो वह परमेश्वर के कार्य क्षेत्र से परे है। उनकी निंदा का आधार कहाँ से आया? पवित्र ग्रंथ से, मनुष्य के मन से, और उस धर्मशास्त्रीय शिक्षा से जो उन्होंने प्राप्त की थी। क्योंकि वे धारणाओं, कल्पनाओं, और ज्ञान के घमंड में डूबे हुए थे, इसलिए वे इस ज्ञान को सही, सत्य और मूल आधार मान रहे थे, और यह कि परमेश्वर कभी भी इन चीज़ों के विरुद्ध नहीं जा सकता। क्या उन्होंने सत्य की तलाश की? नहीं की। उन्होंने केवल खुद की धारणाओं और कल्पनाओं, और ख़ुद के अनुभवों को खंगाला, और इनका उपयोग उन्होंने परमेश्वर को परिभाषित करने और यह निर्धारित करने के लिए किया कि वह सही है या गलत। इसका अंतिम परिणाम क्या निकला? उन्होंने परमेश्वर के कार्य की निंदा की और उसे क्रूस पर चढ़ा दिया।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग तीन)' से उद्धृत

यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के साथ अनुकूल होने की कोशिश नहीं की, बल्कि कर्मठतापूर्वक व्यवस्था का इस हद तक अक्षरशः पालन किया कि—यीशु पर पुराने विधान की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए—निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुकूलता के मार्ग की खोज नहीं की? उनके दिमाग़ में पवित्रशास्त्र का एक-एक वचन घर कर गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि सख्ती से पवित्रशास्त्र के वचनों से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। दरअसल वे बाइबल की रखवाली करने वाले कुत्ते थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने अपना भविष्य त्यागने और यीशु की निंदा करने के लिए उसकी मृत्यु के रूप में पापबलि देने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यीशु पवित्रशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक वचन के नौकर नहीं थे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए' से उद्धृत

बाइबल में फरीसियों द्वारा स्वयं यीशु और उसके द्वारा की गई चीज़ों का मूल्यांकन इस प्रकार था : "वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना उनके द्वारा दूसरे लोगों के शब्दों को दोहराना भर नहीं था, न ही वह कोई निराधार अनुमान था—वह तो उनके द्वारा प्रभु यीशु के बारे में उसके कार्यों को देख-सुनकर निकाला गया निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष प्रकट रूप में न्याय के नाम पर निकाला गया था और लोगों को ऐसा दिखता था, मानो वह तथ्यों पर आधारित हो, किंतु जिस हेकड़ी के साथ उन्होंने प्रभु यीशु की आलोचना की थी, उस पर काबू रखना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के प्रति उनकी घृणा की उन्मत्त ऊर्जा ने उनकी अपनी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने वाली उनकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को भी उजागर कर दिया था। उनके द्वारा प्रभु यीशु की आलोचना करते हुए कही गई ये बातें उनकी जंगली महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सत्य के प्रति उनकी शत्रुता की कुरूप और द्वेषपूर्ण प्रकृति से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, न ही उन्होंने उसके द्वारा कही या की गई चीज़ों के सार की खोज की। बल्कि उन्होंने उसके कार्य पर आँख मूँदकर, सनकभरे आवेश में और सोचे-समझे द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। वे यहाँ तक चले गए कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, जो कि परमेश्वर का आत्मा है, को भी जानबूझकर बदनाम कर दिया। "उसका चित ठिकाने नहीं है," "शैतान" और "दुष्टात्माओं का सरदार" कहने से उनका यही आशय था। अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने देह का वस्त्र पहने परमेश्वर के देहधारी आत्मा के कार्य को पागलपन कहा। उन्होंने न केवल शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की और प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा का सार पूरी तरह से शैतान और दुष्टात्माओं द्वारा किए गए परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा के समान था। वे केवल भ्रष्ट मनुष्यों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते थे, बल्कि इससे भी बढ़कर, वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मानवजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सह-अपराधी और अनुचर थे। उनकी ईशनिंदा और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना का सार हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा और उनके द्वारा परमेश्वर की कभी न खत्म होने वाली परीक्षा था। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और उसके प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये के सार ने, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था, उसके आधार पर परमेश्वर ने एक उचित न्याय का निर्धारण किया, और परमेश्वर ने उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप ठहराया। यह पाप इस लोक और परलोक, दोनों में अक्षम्य है, जैसा कि पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश से प्रमाणित होता है : "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

क्या तुम लोग कारण जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन-सत्य का अनुसरण नहीं किया। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग क्या कहते हो, ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इसके अलावा क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने मसीहा के बस नाम के साथ चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या यह सोच हास्यास्पद और बेतुकी नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा' से उद्धृत

आजकल अधिकांश लोग अभ्यास के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन वे यह सब सत्य का अनुसरण करने और जीवन के विकास को प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं। यहीं पर वे भटक जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नई रोशनी प्राप्त करने में सक्षम हैं, लेकिन उनके अभ्यास के तरीके नहीं बदलते हैं। वे परमेश्वर के आज के वचनों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए अपनी पुरानी धर्म-संबंधी धारणाओं को अपने साथ लाते हैं, इसलिए वे जो प्राप्त करते हैं वह अभी भी धर्म-संबंधी धारणाओं से रंगे सिद्धांत हैं; वे आज का प्रकाश प्राप्त कर ही नहीं रहे हैं। नतीजतन, उनके अभ्यास दागदार हैं; नए खोल में लिपटे वही पुराने अभ्यास हैं। वे कितने भी अच्छे ढंग से अभ्यास करें, वे फिर भी ढोंगी ही हैं। परमेश्वर हर दिन नई चीजें करने में लोगों की अगुवाआई करता है, माँग करता है कि प्रत्येक दिन वे नई अंतर्दृष्टि और समझ हासिल करें, और अपेक्षा करता है कि वे पुराने ढंग के और दोहराव करने वाले न हों। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन फिर भी तुम्हारे अभ्यास के तरीके बिलकुल नहीं बदले हैं, अगर तुम अभी भी ईर्ष्यालु हो और बाहरी मामलों में ही उलझे हुए हो, अभी भी तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के वास्ते उसके सामने लाने के लिए एक शांत हृदय नहीं है तो तुम कुछ भी नहीं प्राप्त करोगे। जब परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने की बात आती है, तब यदि तुम अलग ढंग से योजना नहीं बनाते, अपने अभ्यास के लिए नए तरीके नहीं अपनाते और किसी नई समझ को पाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अभ्यास के अपने तरीके को बदले बिना, पुराने से चिपके रहते हो और केवल सीमित मात्रा में नया प्रकाश प्राप्त करते हो, तो तुम्हारे जैसे लोग केवल नाम के लिए इस धारा में हैं; वास्तविकता में, वे मज़हबी फरीसी हैं जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

कुछ लोग केवल आपातकालीन स्थितियों के लिए, या खुद को त्याग कर दूसरों की मदद करने के लिए खुद को कुछ विशेष सत्यों से लैस करते हैं, न कि अपनी परेशानियों को हल करने के लिए; हम उन्हें "निस्वार्थ लोग" कहते हैं। वे दूसरों को सत्य की कठपुतलियाँ और खुद को इसके स्वामी के रूप में मानते हैं, वे दूसरों को सत्य को कस कर पकड़े रहना और निष्क्रिय न होना सिखाते हैं, जबकि वे खुद दर्शकों की तरह किनारे खड़े रहते हैं। ये किस प्रकार के लोग हैं? वे स्वयं को कुछ सत्यों से लैस कर लेते हैं पर केवल दूसरों को भाषण देने के लिए, जबकि स्वयं के विनाश को रोकने के लिए वे कुछ नहीं करते। यह कितना दयनीय है! यदि उनके शब्द दूसरों की मदद कर सकते हैं, तो वे उनकी सहायता क्यों नहीं कर सकते हैं? हमें उन्हें ढोंगी के रूप में अंकित करना चाहिए, जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है। वे दूसरों को सत्य के वचनों की आपूर्ति करते हैं और दूसरों से उनका अभ्यास करने का आग्रह करते हैं, लेकिन खुद उनका अभ्यास करने की कोई कोशिश नहीं करते। क्या वे घृणा के योग्य नहीं हैं? स्पष्ट रूप से, वे स्वयं तो सत्य के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, लेकिन दूसरों को ऐसा करने के लिए बाध्य करते हैं—यह कैसा क्रूर तरीका है! वे दूसरों की मदद करने के लिए वास्तविकता का उपयोग नहीं कर रहे हैं; वे दूसरों को पोषण प्रदान करने के लिए प्रेम का उपयोग नहीं कर रहे हैं। वे सिर्फ लोगों को धोखा दे रहे हैं और उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहता है, और प्रत्येक व्यक्ति सत्य के वचनों को अगले व्यक्ति को सौंपता रहता है, तो क्या इसका परिणाम यह नहीं होगा कि हर व्यक्ति सत्य के वचनों को सिर्फ बोलता रहेगा, लेकिन खुद उनका अभ्यास करने में असमर्थ रहेगा? ऐसे लोग कैसे बदल सकते हैं? वे अपनी ही समस्याओं को नहीं पहचानते; उनके लिए आगे कोई मार्ग कैसे हो सकता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उनके पास एक मार्ग होता है' से उद्धृत

कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में वे भले ही कहें कि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं, परंतु उनकी पीठ पीछे वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और बिल्कुल अलग ही व्यवहार करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसी नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है, वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, परंतु वह बाहर से इसका दिखावा नहीं करता। जैसे भी हालात बनें, वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध न तो बोलता है, न ही कार्य करता है। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, जब कोई बात होती है तो वह अपनी बुद्धि से कार्य करता है और अपने कर्मों में सिद्धांतों पर टिका रहता है। इस तरह का व्यक्ति सच्ची सेवा कर सकता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बस जुबान से परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं; वे अपने दिन चिंता में भौंहें चढ़ाए गुजारते हैं, अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी हरकत है! यदि तुम उनसे पूछते, "क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में बातें मत करो; बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम वास्तविक अभ्यास से दर्शाओ और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो लोग परमेश्वर से केवल मौखिक रूप से और बेमन से व्यवहार करते हैं वे सभी पाखंडी हैं! कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के प्रति आभार की बात करते और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःख भरे आँसुओं को पसंद करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन-सी भलाई हो सकती है? कुछ लोग विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय अनुग्रहशीलता का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितांत शक्तिहीन मेमने की तरह गुलामी करते हैं। क्या यह तौर–तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए, और एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में जिए। उसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए, और वो जहाँ भी जाए, उसे वहाँ गवाही देने में समर्थ होना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे अभ्यास दिखावे के लिए करते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटारे और खंडित किए जाने की अवधि से गुजरना चाहिए। जिन लोगों के हृदय की गहराई में परमेश्वर का विश्वास है, वे ऊपरी तौर पर दूसरों से अलग नहीं दिखते, किन्तु उनके कामकाज प्रशंसनीय होते हैं। ऐसे व्यक्ति ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंतत:, तुम नियमों और सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक शख्सियत होने के साथ ही पाखंडी भी होते हैं।

............

इंसान के दिखावटी काम क्या दर्शाते हैं? वे देह की इच्छाओं को दर्शाते हैं, यहाँ तक कि दिखावे के सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा को दर्शा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या उन्हें परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं, और वे आत्मिक हैं, किन्तु वास्तव में, वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो चीज तुम्हें अच्छी लगती है, परमेश्वर उसी से घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर नापसंद और अस्वीकार करता है। यदि तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर की इच्छा पूरी की जा सकती है? यदि तुम्हारे काम सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम एकदम नाकारा हो। ऐसे लोग किस तरह के होते हैं जो दिखावे के लिए तो अच्छे काम करते हैं लेकिन वास्तविकता से रहित होते हैं? ऐसे लोग सिर्फ पाखंडी फरीसी और धार्मिक शख्सियत होते हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोग और भी ज्यादा पाखंडी बन जाओगे। जितने ज्यादा पाखंडी बनोगे, उतना ही ज्यादा परमेश्वर का विरोध करोगे। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से हटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए—धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "यहोवा का" शब्द शामिल नहीं है।

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