102. क्या कोई व्यक्ति आध्यात्मिक मामलों को समझता है, यह पहचानने के सिद्धांत

(1) सबसे पहले, यह देखो कि क्या परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में किसी व्यक्ति की समझ शुद्ध है, और क्या वह अपनी भ्रष्ट स्थिति को संश्लेषित कर सकता है, और परमेश्वर के वचनों की तुलना में उन्हें माप सकता है।

(2) यह देखो कि क्या कोई व्यक्ति सत्य की तलाश कर सकता है और इसे कथनी और करनी में व्यवहार में ला सकता है, या क्या वह अभी भी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार कार्य करता है या नियमों से चिपके रहता है।

(3) देखो कि क्या वह प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति की पहचान कर सकता है; क्या वह प्रत्येक के साथ सिद्धांतों के अनुसार पेश आता है; क्या, नियमित रूप से धर्मोपदेशों और सहभागिता को सुनने में, वह सत्य को समझ सकता है और अभ्यास का मार्ग पा सकता है।

(4) देखो कि क्या किसी व्यक्ति का आत्म-ज्ञान के बारे में बात करना व्यावहारिक है; क्या उसने वास्तव में पश्चाताप किया है; और क्या चीजों के बारे में उसके विचार, जीवन के बारे में उसके दृष्टिकोण, और उसके मूल्य सच्चे परिवर्तन से गुजरे हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

तुम्हारा आध्यात्मिक बातों को समझना या न समझना इस बात से कोई सरोकार नहीं रखता कि तुम्हें सत्य को समझने में कितना वक़्त लगता है। इसका सम्बन्ध इस बात से है कि क्या तुम परमेश्वर के इन वचनों को समझ सकते हो। यदि इन्हें सुनकर, तुम्हें लगे कि तुम इन्हें समझते हो, लेकिन जब तुम किसी समस्या का सामना करते हो, तो पता चलता है कि तुम नहीं समझते, तो तुम आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते हो। यदि एक समय, किसी को लगता है कि उन्होंने परमेश्वर के इन वचनों को समझ लिया है पर वे पूरी तरह से इसे आत्मसात नहीं कर पाए हैं, पर कुछ समय के लिए इसका अनुभव करने के बाद, यह उनके लिए स्पष्ट हो जाता है, और वे सत्य के इस पहलू को समझ पाते हैं, तो उनके पास आध्यात्मिक समझ है। वे कितने शब्दों या वाक्यांशों को समझते हैं, उससे इसका कोई लेना-देना नहीं होता। यह लोगों की क्षमता, और साथ ही वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं, और उनकी तलाश पर निर्भर करता है। कुछ मसीह-विरोधी होते हैं जिनके पास अच्छी क्षमता होती है। जब तुम उन्हें उपदेश दे चुके होते हो, तो वे तुम्हारी बात को दुहरा सकते हैं और उसका निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं, ताकि बाक़ी लोगों को उसे सुनकर लगे कि उनकी बात तुम्हारे उपदेश से भी अधिक स्पष्ट थी। लेकिन जब इन मसीह-विरोधियों पर कोई समस्या आ पड़ती है, तो उनके कर्म उन सिद्धांतों से मेल नहीं खाते जिन्हें वे समझे थे, और वे अपनी समझ को कार्यान्वित नहीं कर पाते हैं। वे जो उपदेश देते हैं उनसे लगता है कि वे सत्य के इस पहलू को समझते हैं, और इसलिए उन्हें पता होना चाहिए कि उन्हें क्या करना होगा, और उनमें सिद्धांतों को समझने की योग्यता होनी चाहिए। पर जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे बात से भटक जाते हैं और किसी अन्य सिद्धांत को अपना लेते हैं—जिससे यह साबित हो जाता है कि वे सत्य के इस पहलू को नहीं समझते हैं, और वे जिसका उपदेश दे रहे हैं, वह उनके लिए कोई सिद्धांत, एक तरह की परिकल्पना मात्र है और वे सत्य को नहीं समझते। जब तुम उन्हें उस सिद्धांत पर उपदेश देते हुए सुनते हो, ऐसा लगता है कि वे इसे खूब समझते हैं, पर हकीक़त में, उन्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होती; वे सत्य को नहीं समझते हैं, न ही वे इसका अनुसरण करते हैं। अनुसरण करने के लिए कहा जाए, तो उनके पास कोई मार्ग ही नहीं है कि कैसे अनुसरण किया जाए–उन्हें समझ में ही नहीं आता। उदाहरण के लिए, जब कोई कठिनाई आती है, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं, और जब उनसे संगति करते हैं, तो वे कहते हैं, "मेरे साथ संगति मत करो, मैं सब समझता हूँ।" वास्तव में वे कुछ नहीं समझते; अगर उन्होंने समझा होता, तो सत्य का अभ्यास न करने पर भी कम से कम वे इतने नकारात्मक और बेतुके तो नहीं होते। उन्हें ये बेतुकी, हास्यास्पद बातें कहते सुनते ही, तुम जान जाओगे कि वे कुछ नहीं समझते। ऐसे भी लोग होते हैं जो अपनी धारणाओं के विपरीत कुछ आते ही परमेश्वर के बारे में शिकायत करने लगते हैं, परमेश्वर से बहस करने की कोशिश करते हैं, गलत व्याख्या करते हैं और धारणाएँ फैलाते हैं; जैसे ही तुम्हें पता चलता है कि वे क्या फैला रहे हैं, वे क्या कह रहे हैं, उनके दिल में क्या है, तुम जान जाते हो कि उन्हें सत्य की कोई समझ नहीं है। लोगों की आध्यात्मिक समझ चाहे कितनी भी हो, अगर वे खास तौर से दुष्ट मसीह-विरोधी नहीं हैं, या वे लोग जिनमें मानवता या विवेक और बोध की कमी है, तो यदि वे ऐसे सामान्य लोग हैं जो सत्य को थोड़ा-बहुत समझते हैं, तो उनमें परमेश्वर का थोड़ा-बहुत भय होगा, और जब उनके साथ कुछ घट जाता है, तो भले ही वे कमजोर और नकारात्मक हों, लेकिन वे संभवत: बकवास और भ्रम नहीं फैलाएँगे। अब, जब तुम यह जान जाते हो कि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक बातों को समझता है या नहीं, तो अधिकांश लोग सत्य को न समझने वालों के रूप में उजागर हो जाते हैं; आमतौर पर, उन्हें वचनों और वाक्यांशों का प्रचार करने में कोई समस्या नहीं होती—चूँकि मामला विशेष रूप से ऐसा है कि परमेश्वर में लोगों की आस्था जितने अधिक लंबे समय तक रही होती है, उतना ही अधिक वे प्रचार करने में बेहतर होते हैं, और उतना ही अधिक उन्हें लगता है कि उनके पास पूंजी है—और परिणामस्वरूप उजागर हो जाता है कि उनमें आध्यात्मिक बातों की बिल्कुल कोई समझ नहीं है।

आध्यात्मिक बातों को न समझने का क्या मतलब होता है? संक्षेप में, आध्यात्मिक बातों को न समझने का अर्थ होता है सत्य को न समझना। कुछ लोग सारी सही बातें कहना जानते हैं, और ऐसा लगता है कि उनमें परमेश्वर में अपने विश्वास में बहुत जोश और दृढ़ विश्वास है—तो ऐसा कैसे हो सकता है कि वे आध्यात्मिक बातों को न समझें? तुम देखते हो कि वे हमेशा इतने जोश के साथ बोलते हैं, और उनमें हमेशा इतनी ललक होती है। वे शायद ही कभी नकारात्मक होते हैं, और आसानी से कष्ट उठाने और कीमत चुकाने योग्य होते हैं। फिर भी वे सत्य नहीं समझते। भले ही वे कितने भी समय से विश्वासी रहे हों, जिन्होंने कभी सत्य नहीं समझा, वे आध्यात्मिक बातों को भी नहीं समझते। जो लोग आध्यात्मिक बातों को समझते हैं, उनके कार्यों में सिद्धांत होते हैं। चाहे यह बात उन्हें उनकी अंतरात्मा बताए या सत्य की उनकी समझ, उनके सामने आने वाली हर समस्या को संभालने के तरीके में एक सिद्धांत होता है; वे अनजान नहीं होते, नियमों से चिपके हुए आंख मूंदकर काम नहीं करते—यह एक स्पष्ट संकेत है। बात जब उन लोगों की आती है जो आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते, तो कुछ को अपने कार्यों के अनुभव से जानकारी मिलती है, कुछ को अपनी प्रतिभा से, कुछ को अपनी विशेषज्ञता से, कुछ को उस महारथ, सिद्धांत और धर्मशास्त्र से जो वे बरसों से सुनते आ रहे हैं, और कुछ को अपने विवेक, जुनून और सहज दयालुता से। इससे क्या यह सिद्ध होता है, कि लोग जिस क्षेत्र में भी आध्यात्मिक बातों को समझते हैं, वही उनके कार्य सिद्धांत अनुरूप होते हैं? इससे यह सिद्ध होता है कि लोग जिस किसी क्षेत्र में भी सत्य को समझते हैं, उसी क्षेत्र में उनके कार्य सिद्धांत अनुरूप होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे जो सत्य को समझते हैं, आध्यात्मिक बातों को समझते हैं' से उद्धृत

आध्यात्मिक मामलों को समझने और न समझने वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? जो लोग आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, वे सत्य के अर्थ, या परमेश्वर द्वारा उल्लिखित स्थितियों, पृष्ठभूमियों और संदर्भों के अर्थ के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते। वे उनका पता नहीं लगा सकते, न ही तुलना के लिए वे उनके सामने खड़े हो सकते हैं। जो लोग आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, वे इसके ठीक विपरीत होते हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं लोगों की अवज्ञा के बारे में सहभागिता करता हूँ, जो एक ऐसी चीज है जिसमें उनकी कठोरता, स्वार्थपरायणता, मूर्खता, परमेश्वर के प्रति उनकी शत्रुता और प्रतिरोध, और परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ शामिल होती हैं, और जब मैं उन सभी स्थितियों की बात करता हूँ जिनमें यह विषय शामिल होता है—चाहे वह उदाहरणों के माध्यम से हो या सत्य के किसी पहलू पर बोलकर, या किसी ऐसी स्थिति की ओर संकेत करके जो ठीक तुम्हारे हृदय की स्थिति होती है, या शायद संबंधित सिद्धांतों के भीतर के विषयों पर बोलकर—तो तुम समझ लेते हो, और कुछ छवियाँ तुम्हारे दिमाग और विचारों की सतह पर उभर आती हैं, और तुम कहते हो, "यह तो मेरी ही स्थिति के बारे में है, जो कि एक समय अवज्ञा वाली थी!" या जब बात परमेश्वर के बारे में गलतफहमियों की होती है, यदि तुम स्वयं द्वारा जाहिर की गई स्थितियों और अभिव्यक्तियों को देखो और यह महसूस करो कि लोगों का इस तरह के विचार, या इस तरह के अनुरोध और कल्पनाएँ रखना परमेश्वर के बारे में गलतफहमी रखना है, तो इसका मतलब यह है कि तुमने तुलना के लिए इन चीजों के सामने खुद को खड़ा कर लिया है। जब मैं परमेश्वर के प्रति शत्रुता और उसके खिलाफ प्रतिरोध की बात करता हूँ, तब अगर तुममें ऐसी भावनाएँ हों और तुम ऐसी स्थिति में रहो, या तुम्हारे अंदर ऐसा स्वभाव या सार हो, तो तुम इन चीजों को तुलना के लिए सामने रख सकते हो। ऐसी तुलना के लिए तुम कौन-सी चीजें प्रस्तुत कर सकते हो? तुम्हारे द्वारा अभिव्यक्त विचार और मत या कार्य और व्यवहार सार्वभौमिक रूप से जाँचे जा सकते हैं; इसका मतलब है कि परमेश्वर जो कहता है और उपदेशों में जिसका प्रचार किया जाता है, उसे समझने और यह जानने में तुम सक्षम हो कि तुम्हारे कौन-कौन से व्यवहार, प्रकाशन, अभिव्यक्तियाँ, स्थितियाँ और सार वैसे हैं, जैसे परमेश्वर द्वारा प्रकट किए गए हैं और जिनका उपदेशों में प्रचार किया जाता है। ये उस व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं, जो आध्यात्मिक मामलों को समझता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

जो लोग आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, वे लोग परमेश्वर के वचनों के संबंध में न तो यह जानते हैं कि वे वचन क्या कहते हैं, और न ही यह कि वे किसे संदर्भित करते हैं; ऐसे लोग यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर किन स्थितियों को प्रकट करता है, और न ही वे इन चीजों के सामने तुलना के लिए खुद को खड़ा कर पाते हैं। वे परमेश्वर के सारे वचनों को नियम, अक्षर, नारे और सिद्धांत मानते हैं, और किसी भी बिंदु पर वे "परमेश्वर के वचन सत्य हैं" वाक्यांश का सही अर्थ नहीं समझते। यह उन लोगों की अभिव्यक्ति है, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते। ... जो लोग आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, वे सत्य को समझने और उनके द्वारा स्वयं को मापने में सक्षम होते हैं; वे जानते हैं कि परमेश्वर के वचन क्या प्रकट करते हैं, उसके वचनों में सत्य क्या है, और उसकी अपेक्षाएँ क्या हैं। क्या इन चीजों को समझने में सक्षम होना प्रवेश प्राप्त कर लेने के समान है? (नहीं।) तो फिर, "समझने में सक्षम होना" किसे संदर्भित करता है? यह किस ओर लक्षित है? जो व्यक्ति इन चीजों के प्रकाश में खुद की जाँच करने में सक्षम है; जो परमेश्वर द्वारा प्रकट किए अनुसार मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव और विभिन्न स्थितियों को स्वीकार करने में सक्षम है; जो कुछ हद तक परमेश्वर की अपेक्षाएँ जानने में सक्षम है; और जो परमेश्वर के वचनों में कहे गए और उसकी इच्छा में निहित सिद्धांतों को जानने में सक्षम है—जिसे ये सभी चीजें स्पष्ट हैं और जिसे इन चीजों की समझ होती है, उसी व्यक्ति को आध्यात्मिक मामलों को समझने वाला कहा जाता है। जो लोग आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हुए उनके सामने तुलना के लिए खड़े हो सकते हैं; वे परमेश्वर के संदर्भ और उसकी अपेक्षाएँ समझ सकते हैं। यह दर्शाता है कि ऐसे लोगों में सत्य को ग्रहण करने की क्षमता और साथ ही उसे प्राप्त करने की योग्यता और सामर्थ्य होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

जो लोग आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, उनकी प्राथमिक अभिव्यक्ति नियमों का सख्ती से पालन करना है। वे अकसर किसी वाक्य या घटना को ले लेते हैं और उसे अनुसरण करने के नियम या तरीके के रूप में नियत कर देते हैं। क्या ये लोग फिर सत्य के साथ इसी तरह से पेश आते हैं? जो लोग आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, वे सत्य के प्रकटीकरण के एक पहलू को याद रखते हैं, जिस पर तुमने आज सहभागिता की है; वे उन वचनों और व्यवहारों को अभ्यास करने के नियमों के रूप में नियत कर देते हैं, और उनमें से प्रत्येक को बिना चूके याद रखते हैं। फिर, अगली बार, एक अलग स्थिति सामने आने पर, और बिना किसी के सहभागिता किए, वे उन पुराने तरीकों और नियमों को विवेकहीन ढंग से लागू कर देते हैं, और उनका अभ्यास करने लगते हैं। यह आध्यात्मिक मामलों को न समझने वाले लोगों की एक ठोस अभिव्यक्ति है। ऐसे लोग नियमों का इस तरह पालन करते हुए कैसा महसूस करते हैं? (थके हुए।) वे थके हुए महसूस नहीं करते; अगर करते, तो रुक जाते। उन्हें लगता है कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं; उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे नियमों के एक समुच्चय का पालन कर रहे हैं, और न ही उन्हें लगता है कि वे आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते। उन्हें यह तो बिलकुल भी नहीं लगता कि उन्होंने सत्य को नहीं समझा है, न ही उन्हें इस बात की कोई समझ होती है कि सत्य-सिद्धांत क्या होते हैं। इसके विपरीत, उन्हें लगता है कि उन्होंने सत्य के व्यावहारिक पक्ष को, और साथ ही सत्य के उस पक्ष के सिद्धांतों को भी, समझ लिया है; साथ ही, वे सोचते हैं कि उन्होंने परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया है, और यदि वे अपने नियमों के अनुसार कार्य कर सकें, तो वे सत्य के उस पहलू की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके होंगे, और वे लगातार यह विश्वास करते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और सत्य को अभ्यास में ला रहे हैं। क्या सत्य का ऐसा कट्टर अभ्यास वास्तव में उसकी तलाश की अभिव्यक्ति है? (नहीं।) यह उस प्रकार के व्यक्ति की अभिव्यक्ति है, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता, जो परंपरा से बँधा हुआ है और आलसी है; किसी समस्या का सामना करने पर इस तरह का व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता; ऐसे व्यक्ति न तो सत्य के बारे में सोचते हैं, न ही उसकी जाँच करते हैं, और न ही वे उसका विस्तार से अन्वेषण करते हैं। इसके अलावा, अगर वे सत्य की जाँच कर भी लें, तो भी वे उसे समझने में असमर्थ होंगे। वे उसे क्यों नहीं समझ पाते? मूलतः इसलिए, क्योंकि उन्हें आध्यात्मिक मामलों की कोई समझ नहीं होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

आध्यात्मिक मामलों को न समझने वाले लोग जिस तरह से सत्य की तलाश करते हैं, उसकी मुख्य अभिव्यक्ति क्या होती है? सत्य का उनका अभ्यास नियमों के अक्षरश: अनुपालन के रूप में प्रकट होता है; वे लोगों से सिद्धांत की बात करते हैं, और दूसरों के तरीकों को सख्ती से लागू करते हैं। तो, ऐसे लोगों का सार क्या होता है? नियमों के पालन को उनके द्वारा भ्रमवश सत्य का अनुसरण समझ बैठने का क्या कारण होता है? इस समस्या का क्या कारण है? इसका एक मूल कारण है; क्या तुम लोग उसे ढूँढ़ सकते हो? (ऐसे लोग अपनी प्रकृति से ही से घमंडी और आत्मतुष्ट होते हैं। वे सत्य की तलाश नहीं करते; बल्कि जिसे वे सही समझते हैं, उसे ही वे सत्य मानते हैं।) यह उन कुछ लोगों के मामले में सत्य है, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, लेकिन यह मूल कारण नहीं है। जब ये लोग, जिन्हें आध्यात्मिक मामलों की कोई समझ नहीं होती और जो नियमों का पालन करना पसंद करते हैं, सत्य और उपदेश सुनते हैं, तो वे बहुत लगन से ऐसा करते हैं, बहुत सजगतापूर्वक ध्यान देते हुए—विशेष रूप से उन चीजों को, जिनका संबंध उनके अभ्यास से होता है। उदाहरण के लिए, वे इस तरह के विचार बहुत ध्यान से सुनते हैं कि अपने कर्तव्य कैसे निभाएँ, या जो उन्हें करना चाहिए, उसे अच्छी तरह से कैसे करें। मुख्य समस्या यह है कि जो उपदेश वे सुनते हैं, उनकी विषयवस्तु की तुलना वे अपनी स्थितियों से नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, जैसे ही वे मानव-विद्रोह की चर्चा सुनते हैं, वे कहते हैं, "विद्रोह? मैं विद्रोही नहीं हूँ! चूँकि इसकी अनुमति नहीं है, इसलिए अगर कभी मैं इस तरह की स्थिति से गुजरा, तो मैं अपना मुँह बंद रखूँगा, चुप रहने की कोशिश करूँगा, स्थिति का जायजा लूँगा, और जो मेरे आसपास के लोग करते हैं, वही करूँगा।" कुछ सुनने के बाद वे उससे अभ्यास की अपनी ही तार्किक शैलियों का समुच्चय और अभ्यास के अपने ही तरीके निकाल लेते हैं, लेकिन गहराई में, सत्य और उपदेशों में उजागर और उल्लिखित विभिन्न स्थितियों के बारे में उनके विचार धुँधले रहते हैं। इसका क्या मतलब है कि उनके विचार धुँधले रहते हैं? इसका मतलब है कि उन्हें वह समझ में नहीं आता जो कहा जा रहा होता है, और वे मन ही मन सोचते हैं, "यह सब सहभागिता किसके बारे में हो रही है? यह सब थोड़ा और सरल क्यों नहीं बनाया जाता? आज एक तरह की सहभागिता होती है, और कल दूसरी तरह की!" उनके विचार में, किसी के स्वभाव में बदलाव लाना सरल होता है—तुम्हें जो बताया जाता है, बस वैसा ही करो। वे इन स्थितियों और इस भ्रष्ट स्वभाव से अपनी तुलना नहीं कर पाते। जब बात विभिन्न प्रकटनों, विचारों, मतों, इरादों और जीवन-प्रवेश की प्रक्रिया के दौरान विभिन्न परिवेशों में उभरतीं मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्तियों की होती है, तब भी उनके साथ अनिवार्यत: ऐसा ही होता है : वे रिक्त होते हैं और इन चीजों से अपनी तुलना नहीं कर पाते। जो लोग इन चीजों के सामने खुद को खड़ा नहीं कर पाते, वे सत्य सुनकर कैसा महसूस करते हैं? (उन्हें लगता है कि यह अन्य लोगों के बारे में है और इसका उनके साथ कोई संबंध नहीं है।) यह उनका मुख्य लक्षण होता है—जब बुरी चीजों का उल्लेख किया जाता है, तो वे मानते हैं कि वे सभी चीजें दूसरों पर लागू होती हैं, लेकिन जब उन नियमों का उल्लेख किया जाता है जिनका वे पालन कर सकते और समझ सकते हैं, तो वे समझते हैं कि ये बातें उनके लिए प्रासंगिक हैं। जब बात उन चीजों की आती है, जिनमें स्थितियाँ, स्वभाव में परिवर्तन और व्यक्ति का प्रकृति-सार और स्वभाव शामिल होता है, तो वे उनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं करते, न ही वे उन्हें समझ पाते हैं। आध्यात्मिक मामलों को न समझने वाले हर व्यक्ति में यह लक्षण आम होता है। अर्थात वे लोगों की विभिन्न स्थितियों और अभिव्यक्तियों, और उनके सार को प्रकट करने वाले परमेश्वर के कथनों के सामने तुलना के लिए खड़े नहीं हो सकते, और उनमें जरा भी विवेक नहीं होता; वे हमेशा सेबों की तुलना संतरों से करते रहते हैं। यह ऐसा होता है मानो, जब तुम उनसे पूछते हो कि क्या उन्होंने खाना खा लिया, तो वे कहते हैं कि उन्होंने पानी नहीं पिया; या, यदि तुम उनसे पूछते हो कि क्या उन्हें नींद आ रही है, तो वे कहते हैं कि उन्हें प्यास नहीं लगी है। ऐसी स्थिति—ऐसी हालत—अकसर होती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

जो लोग आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते हैं, चाहे उन्होंने कितने ही वर्ष परमेश्वर में विश्वास किया हो, या वे सत्य का अनुसरण करने में चाहे जैसे भी नज़र आते हों, वे कभी कोई प्रगति नहीं करते हैं। चाहे वे कितने ही वर्षों से विश्वासी रहे हों, जो लोग आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते हैं, वे नहीं जानते हैं कि स्वयं को जानना क्या होता है, और एक भ्रष्ट स्वभाव क्या होता है। जब वे किसी मुद्दे का सामना करते हैं, तो उन्हें पता नहीं होता है कि एक घमंडी स्वभाव की अभिव्यक्ति क्या होती है, या सत्य के प्रति समर्पण की अभिव्यक्ति क्या होती है। वे नहीं जानते कि नेक इंसानों की तरह की तरह आचरण कैसे करना है, या किस तरह का आचरण धोखेबाज़ी भरा होता है, वे नहीं जानते कि आज्ञाकारिता क्या होती है, और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह करना, उनका विरोध करना और उन्हें अस्वीकार करने का क्या अर्थ होता है। वे नहीं जानते कि एक अच्छी मानवीय इच्छाशक्ति क्या होती है, और सत्य के अनुसार अभ्यास करने और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का क्या मतलब होता है। उन्हें इन बारीकियों में अंतर का कुछ भी पता नहीं होता। वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय क्या वे वफ़ादार रहे हैं या लापरवाह रहे हैं, या उनमें कौन-से भ्रष्ट स्वभाव उजागर किए गए हैं, उनकी अभिप्रेरणाएँ क्या हैं, या क्या वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं, सही है? वे नहीं जानते कि उनके अभ्यास का परिप्रेक्ष्य सही है या नहीं, या किस तरह का आचरण परमेश्वर को प्रिय है, और किस तरह का आचरण उसके लिए घृणित होता है। उनका मानना है कि यदि वे ऐसा करते रहें, तो उन्हें गलत नहीं होना चाहिए, और उन्हें जो मन में आए बस वही करना चाहिए—यह बहुत सीधी-सी बात है और इसमें कोई विवरण शामिल नहीं होते। कुछ लोगों में आध्यात्मिक समझ तो होती है, लेकिन वे सत्य का अनुसरण नहीं करते, न ही उसका अभ्यास करते हैं; वे केवल कुछ परिश्रम और कुछ सेवा करना चाहते हैं। कुछ लोगों में ज़रा भी आध्यात्मिक समझ नहीं होती, और वे जीवन की आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते हैं। वे सिर्फ़ नियमों से लिपटे रहते हैं, और कुछ भी नहीं। वे बस परमेश्वर के वचनों को ही पढ़ते हैं, और एक साधारण आध्यात्मिक जीवन जीते हैं। अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय, वे भटकते नहीं, न ही कोई समस्या पैदा करते हैं। वे जान-बूझकर ऐसा कुछ भी नहीं करते जिससे रुकावटें आयें या गड़बड़ियाँ हों। वे वही करते हैं जो उनसे करने को कहा जाए, और वे सीधे-सादे सिद्धांतों से काम करते हैं। लेकिन विस्तार में जाएँ तो, जीवन में प्रवेश की स्थितियों और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों और नज़रियों की बात करें, तो वे पूरी तरह से इनकी अवहेलना कर जाते हैं। जब तुम अवधारणाओं के समाधान की बात करते हो, तो उन्हें लगता ही नहीं कि उनकी कोई अवधारणाएँ हैं, वे सोचते हैं कि उनकी तमाम अवधारणाएँ दूर हो गई हैं, और जिस बात पर तुम सहभागिता कर रहे हो, उसका उनसे कोई लेना-देना नहीं है। वे नहीं जानते कि तुम किन अवधारणाओं का ज़िक्र कर रहे हो, या तुम्हारी सहभागिता के सत्य की वास्तविकता क्या है। जब तुम खुद को जानने की बात करते हो, तो वे कहते हैं, "क्या इंसान विद्रोही और घमंडी नहीं है? जब कोई किसी समस्या का सामना करे, तो उसे विद्रोही या दिखावटी नहीं होना चाहिए, बल्कि सरल और अहंकार-रहित होना चाहिए—क्या यह पर्याप्त नहीं है?" जब तुम आज्ञाकारिता की बात करते हो, वे कहते हैं, "आज्ञाकारिता? तुम यही कहते रहते हो कि यह आज्ञाकारी होना है, और वह नहीं है—यह इतना जटिल कैसे हो सकता है?" जब तुम कहते हो लोगों को त्याग करना चाहिए और अपनी देह को अनुशासित करना चाहिए, या उन्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और जब वे स्वयं को किसी विशेष परिस्थिति में पाएँ, तो उन्हें अपनी अभिप्रेरणाएँ और महत्वाकांक्षाएँ किनारे कर देनी चाहिए, तो वे कहते हैं, "मेरी तो ऐसी कोई ज़्यादा अभिप्रेरणाएँ और महत्वाकांक्षाएँ हैं ही नहीं।" उनकी सोच इतनी एकांगी होती है। क्या ऐसे लोग आख़िरकार सत्य को हासिल कर सकते हैं? (नहीं।) सत्य के प्रति उनका क्या रवैया होता है? वे नहीं मानते कि उनमें ये भ्रष्टताएँ हैं। उन्हें लगता है कि वे ये बातें पहले सुन चुके हैं, ये बातें कमोबेश वही हैं: "क्या ये सारी बातें समर्पण के और जो कुछ तुमसे करने के लिए कहा जाए, वही करने के बारे में नहीं हैं?" पर क्या यह इतना सरल है? कुछ लोगों के लिए है। नकारात्मक लोगों को देखकर, कहते हैं, "बस, परमेश्वर से प्रेम करो! रोते क्यों हो? नकारात्मक होने की इसमें क्या बात है?" वे आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते हैं। जब लोग आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते हैं, तो इसका क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ यह होता है कि चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे, चाहे वह सत्य के किसी भी पहलू पर बात करे, उन्हें ये सब कोरी बातें लगती हैं। उन्हें इसकी समझ नहीं है कि दाँव पर क्या लगा हुआ है, या परमेश्वर यह सहभागिता क्यों कर रहा है। न तो सत्य के इस पहलू की उन्हें कोई समझ है, न ही लोगों के प्रवेश और परमेश्वर में विश्वास वाले जीवन से इसके सम्बन्ध की, न ही वास्तविक जीवन में लोग जिन कठिनाइयों का सामना करते हैं या जिन भ्रष्ट स्वभावों को ये उजागर करती हैं उनके साथ इसके सम्बन्ध की उन्हें कोई समझ है, और न ही उस सम्बन्ध की जो सत्य तथा मानवजाति के बीच, और सत्य तथा जमीर के बीच, होता है। इन विवरणों और परमेश्वर के वचनों का, लोगों के वास्तविक जीवन में जो उजागर और प्रकट किया जाता है उसके साथ क्या सम्बन्ध है, और लोगों को किसका अभ्यास करना चाहिए, वे इन बातों को नहीं समझते; वे जो सुनते हैं वो सिर्फ ऐसे शब्द होते हैं, जैसे कि "आज्ञाकारिता, वफ़ादारी, लापरवाह मत बनो, रुकावटें या गड़बड़ी पैदा न करो"—जिनमें से वे एक ही सार निकालते हैं : "मुझे उनमें से कुछ भी याद नहीं रखना है। मैं वही करूँगा जो परमेश्वर कहता है, मैं सेवा करके खुश हूँ।" वे नहीं जानते कि सेवा करने के साथ-साथ, इंसान में कई भ्रष्टताएँ हैं जैसे कि महत्वाकांक्षा, इच्छाएँ, पसंदें, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ। लोगों के अन्दर ऐसी कई चीज़ें होती हैं और जब परमेश्वर इन वचनों को कहता है, तो वह लोगों से इनका समाधान करने, और इनके स्थान पर सत्य को रखने को कहता है। इन सत्यों को कहने में परमेश्वर का उद्देश्य है तुम्हें इन्हें समझाना, और तुम्हारे द्वारा इनको स्वीकार कराना, जिसके बाद इन सत्यों का वास्तविक जीवन में समस्याओं को सुलझाने में, उन कठिनाइयों का समाधान करने में उपयोग किया जा सकता है जो तुम्हारे पास हैं, ताकि ये सत्य तुम्हारी वास्तविकता बन जाएँ और तुम इन्हें जी सको। तब फिर आगे से तुम जो उजागर करो वह घमंड, महत्वाकांक्षा, इच्छाएँ, अवधारणाएँ, कल्पनाएँ, (भौतिक) ज्ञान और दर्शन नहीं, बल्कि सत्य की वास्तविकता होगी। जिनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है, वे इसे नहीं समझते हैं। अनेक वर्षों तक उपदेशों को सुनकर, वे सोचते हैं, "यह कैसी बात है कि हर उपदेश एक ही जैसा होता है? तुम वर्षों से स्वयं को जानने के बारे में उपदेश देते रहे हो—क्या यह केवल अपनी नश्वर दुर्बलता और भ्रष्टता को पहचानना नहीं है?" दूसरे लोग कहते हैं कि आज के उपदेश पहले से अधिक गहरे और विस्तृत हैं, पर उनमें इसकी कोई समझ नहीं होती है। ये वो अभिव्यक्तियाँ हैं जो उन लोगों की होती हैं जिनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे जो सत्य को समझते हैं, आध्यात्मिक बातों को समझते हैं' से उद्धृत

दक्ष और सच्ची योग्यता वाले लोग, जो आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, सत्य के अन्वेषक होते हैं; यदि उनके साथ कुछ दस बार घटित होता है, तो शायद उनमें से आठ मामलों में वे कुछ प्रेरणा प्राप्त करने, कुछ सबक सीखने, कुछ प्रबोधन हासिल करने, और कुछ प्रगति कर पाने में समर्थ होंगे। जब चीज़ें दस बार किसी मूर्ख पर पड़ती हैं—किसी ऐसे पर, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता है—तो इससे एक बार भी उनके जीवन को लाभ नहीं होगा, एक बार भी यह उन्हें नहीं बदलेगा, और न ही एक बार भी यह उनके लिए अपनी प्रकृति को समझने का कारण बनेगा, और यही उनके लिए अंत है। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर पड़ते हैं, और हर बार जब वे गिर पड़ते हैं, तो उन्हें समर्थन और दिलासा देने के लिए किसी और की ज़रूरत होती है; बिना सहारे और दिलासे के वे उठ नहीं सकते। अगर, हर बार जब कुछ होता है, तो उन्हें गिरने का खतरा होता है, और अगर, हर बार उन्हें अपमानित होने का खतरा होता है, तो क्या उनके लिए यही अंत नहीं है? क्या ऐसे निकम्मे लोगों के बचाए जाने का कोई और आधार बचा है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिनके दिल में सत्य और धार्मिकता के लिए तड़प है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो धार्मिकता, भलाई और सत्य के लिए तरसता है, और विवेक से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता परिमार्जित हो सके, और उनका जीवन-स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या धार्मिकता और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुराई का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो बुरी चीज़ों को दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य के साथ और उत्पन्न होने वाली घटनाओं के साथ लयबद्ध नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और अपने दम पर चीजों को संभालने या हल करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी सिफ़ारिश करवाने के लिए कुछ भी नहीं होता, उस पर कार्य किए जा सकने लायक कुछ भी नहीं होता। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन मैला होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे धार्मिकता के लिए तरसते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट या पारदर्शी रूप से सत्य की बात करे, वे प्रतिक्रिया नहीं करते, मानो वे पहले से ही मृत हों। क्या उनके लिए खेल ख़त्म नहीं हो गया है? किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी साँस बाक़ी हो, कृत्रिम श्वसन द्वारा बचाया जा सकता है, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ नहीं कर पाएगा। यदि कभी किसी समस्या का सामना करने पर तुम उससे कतराते हो और उससे बचने की कोशिश करते हो, तो इसका मतलब है कि तुमने गवाही नहीं दी है; इस तरह, तुम्हें कभी नहीं बचाया जा सकता, और तुम्हारा काम तमाम हो चुका है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

यह निर्णय लेते समय कि किसी के पास आध्यात्मिक समझ है या नहीं, क्या केवल यही देखना मान्य है कि वे परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझते हैं या नहीं? (नहीं।) तो आध्यात्मिक समझ होने का वास्तविक अर्थ क्या है? सम्पूर्ण आध्यात्मिक समझ कैसे हासिल की जा सकती है? एक ओर व्यक्ति में परमेश्वर के वचनों की भूख होनी चाहिए, उसे उसके वचनों के लिए प्रयास करना चाहिए, उन पर चिंतन करना सीखना चाहिए, उनको प्रार्थना-पूर्वक पढ़ना चाहिए, उन पर सहभागिता करनी चाहिए, उनकी तलाश करनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ क्या है? लोगों को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना होगा। एक बार जब तुम उसका अभ्यास और अनुभव कर लेते हो, तो ये वचन तुम्हारी वास्तविकता बन जाते हैं। केवल तभी तुम सचमुच समझ पाओगे कि ये वचन किसे संदर्भित कर रहे हैं, और उनमें कौन-से सत्य समाहित हैं। केवल तभी तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक समझ हासिल कर सकते हो। लेकिन आध्यात्मिक समझ को हासिल करना लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य क्या है? लक्ष्य है सत्य का अभ्यास करना, और सत्य को समझना। यदि तुम्हारे पास सत्य के अभ्यास का एक मार्ग है, और तुम जानते हो कि इसका अभ्यास कैसे करना है, और यदि अभ्यास के बाद, तुम भीतर के सत्य को समझ सकते हो, और तुम अंदरूनी अभ्यास के संबंधों और सिद्धांतों को जान लेते हो, तो तुम कोई ऐसे हो जिसके पास आध्यात्मिक समझ है, और तब सत्य को समझने का परिणाम हासिल हो चुका होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे जो सत्य को समझते हैं, आध्यात्मिक बातों को समझते हैं' से उद्धृत

कुछ लोग ऐसे हैं, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, लेकिन जिनकी मानवता फिर भी काफी अच्छी होती है। वे कीमत चुकाते हैं और स्वेच्छा से खुद को खपाते हैं, और जो कुछ भी परमेश्वर कहता है, उसकी ओर आज्ञाकारिता भरे दिल से ध्यान देते हैं। लेकिन जब सत्य की बात आती है, तो वे ग्रहणशील होने की क्षमता नहीं रखते। कितु अगर वे परमेश्वर के कुछ वचनों को समझने में सक्षम होते हैं, और खुद को उनके सामने जाँच सकते हैं, और फिर वे प्रवेश और अभ्यास पा लेते हैं, तो ऐसे लोगों के लिए बचाए जाने की उम्मीद है। वे कुछ समय तक इस तरह के अनुभव से गुजरकर धीरे-धीरे आध्यात्मिक मामलों को समझने लग सकते हैं। जितनी अधिक लगन से वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, उतना ही अधिक पवित्र आत्मा उन्हें प्रबुद्ध करता है; वे परमेश्वर के वचनों को जितना भी समझ पाते हैं, उसकी तुलना अपनी स्वयं की स्थितियों के साथ कर सकते हैं, ताकि उसके निपटने और उसकी काट-छाँट, उसके परीक्षणों और शोधन, और उसके न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार कर सकें। इसके लिए वे कीमत चुकाएँगे, और अंत में वे स्वभाव में उसके अनुरूप परिवर्तन प्राप्त करने में सक्षम होंगे। ऐसे व्यक्ति को भी सत्य का अनुसरण करने वाले के रूप में गिना जाता है। क्या सत्य का अनुसरण करने वालों में गिने जाने वाले लोगों को बचाए जाने की उम्मीद होती है? तुम लोग क्या कहते हो? हाँ, होती है; इस प्रकार, ऐसे लोगों को "मृत्युदंड" नहीं दिया जा सकता। इसके विपरीत, यह कहना कठिन है कि उस तरह के लोगों का क्या अंजाम होगा, जो सत्य को समझ सकते हैं और उसके सामने तुलना के लिए खड़े भी सकते हैं, लेकिन उसमें कभी प्रवेश नहीं करते। इस समस्या की जड़ क्या है? यह सत्य के प्रति उनका दृष्टिकोण है, जो अवमानना और तिरस्कार का होता है। "तिरस्कार" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है सत्य को स्वीकार करने में सक्षम न होना; इसका अर्थ है सत्य से घृणा करना। इसका अर्थ है परमेश्वर के वचनों को सत्य न समझना, न ही उन्हें महत्वपूर्ण मानना। वे जो सुनते हैं, चाहे उसका कितना भी भाग वे समझें, वे उसका अभ्यास नहीं करते; और चाहे तुलना के लिए वे परमेश्वर के वचनों के सामने किसी भी हद तक खुद को खड़ा कर लें, और यह जान लें कि वे किस तरह के लोग हैं, फिर भी वे अभ्यास नहीं करते। "अभ्यास" शब्द का ही ऐसे लोगों पर कोई असर नहीं होता, और उनका उद्धार आसानी से नहीं आएगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश' से उद्धृत

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