101. क्या किसी के पास योग्यता है, यह पहचानने के सिद्धांत

(1) यह देखो कि कोई परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ पा रहा है, और क्या वह स्वयं अपनी स्थिति और व्यावहारिक समस्याओं के संयोजन के माध्यम से सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर पा रहा है, और क्या वह इस प्रकार अभ्यास के सिद्धांतों को प्राप्त कर पाता है।

(2) देखो कि क्या किसी का आत्म-ज्ञान व्यावहारिक, सच्चा और विशिष्ट है। तुच्छ योग्यता वाले केवल खोखले धर्म-सिद्धांत की बात करेंगे, और वे वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते।

(3) देखो कि काम करने में कोई कितना सक्षम है। अच्छी योग्यता वाले लोग सत्य के आधार पर अभ्यास के सटीक सिद्धांतों को समझ सकते हैं और सभी तरह की समस्याओं को हल कर सकते हैं।

(4) देखो कि परख करने में कोई व्यक्ति कितना सक्षम है, क्या वह सत्य-सिद्धांत के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की पहचान कर सकता है, और क्या वह हर तरह की घटना और सामाजिक हलचलों के मर्म को समझ सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

हम लोगों की क्षमता का मूल्यांकन कैसे करेंगे? उनकी क्षमता को मापने का सबसे सटीक तरीका इस बात पर आधारित है कि वे किस हद तक सत्य को समझते हैं। कुछ लोग बहुत जल्दी कोई विशेषज्ञता हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब वे सत्य सुनते हैं, तो उलझ-से जाते हैं और ऊँघने लगते हैं, वे घबरा जाते हैं, वे जो कुछ भी सुनते हैं उसे समझ नहीं पाते, और न ही वे यह समझ पाते हैं कि वे क्या सुन रहे हैं—यही तुच्छ क्षमता होती है। कुछ लोगों को यदि तुम बताओ कि वे तुच्छ क्षमता के हैं तो वे असहमत होते हैं। उन्हें लगता है कि उनके पास उच्च शिक्षा और जानकारी होने का मतलब है कि वे अच्छी क्षमता के हैं। क्या एक अच्छी शिक्षा उच्च क्षमता को प्रदर्शित करती है? ऐसा नहीं होता। लोगों की क्षमता को इस आधार पर मापा जाता है कि वे परमेश्वर के वचनों और सत्य को किस हद तक समझते हैं। यह इसे जानने का सबसे अधिक मानक, सबसे सटीक तरीका है। किसी अन्य माध्यम से किसी की क्षमता को मापने की कोशिश करने से कोई फ़ायदा नहीं है। कुछ लोग वाक्-चतुर और हाज़िरजवाब होते हैं, और वे वास्तव में दूसरों के साथ मेल-मिलाप करने में अच्छे होते हैं—लेकिन जब वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और उपदेश सुनते हैं, तो वे कुछ भी नहीं समझ पाते। जब वे अपने अनुभवों और गवाही की बातें करते हैं, तो वे अनाड़ी साबित होते हैं, और सभी को समझ में आ जाता है कि उनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है। ये लोग अच्छी क्षमता वाले नहीं हैं। तो क्या ऐसे लोग परमेश्‍वर के घर के लिए किसी बाहरी मामले को संभालने के योग्य होंगे? परमेश्वर के घर के लिए चीज़ों को संभालना—दूसरे शब्दों में, अपने कर्तव्य को निभाना: अपने कर्तव्य को निभाने में सत्य, परमेश्वर का कार्य, आचरण के सिद्धांत और वे तरीके और तरकीबें शामिल होती हैं जिनके द्वारा सभी प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार किया जाता है, और ये सभी मुद्दे इस बात पर निर्भर करते हैं कि किसी के कर्तव्य का निष्पादन प्रभावी और यथोचित है या नहीं। क्या किसी के द्वारा अपने कर्तव्य को पूरा करने से जुड़े इन मुद्दों में सत्य शामिल होता है? यदि इन मुद्दों में सत्य शामिल है, पर तुम सत्य को समझ नहीं पाते हो और तुम अपनी तुच्छ चालों और योजनाओं पर भरोसा करते रहते हो, तो क्या तुम इस कर्तव्य को ठीक से निभा पाओगे? क्या तुम इसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कर पाओगे? नहीं। अगर कोई व्यक्ति कुछ मामलों में सही रास्ते पर भी हो, तो ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि वे जो कुछ कर रहे हैं उससे सत्य का कोई संबंध नहीं है, और विशुद्ध रूप से यह एक बाहरी चीज़ है। यदि उन्हें सिद्धांत के अनुसार चलने और कुछ करने के लिए कहा जाता है, और एक अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो वे यह नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए; उन्हें लगता है कि उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर इसे संभालने में सक्षम होना चाहिए, लेकिन ऐसा करने से गड़बड़ी और रुकावट उत्पन्न हो जाती है; जिससे सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। क्या यहाँ कुछ गलत नहीं है? और इसका कारण क्या होता है? ऐसा इसलिए होता है कि उनकी समझ शुद्ध नहीं है, वे सत्य को नहीं समझते हैं, और उन्हें सिद्धांतों का बोध नहीं हुआ है। जब वे किसी ऐसी चीज़ का सामना करते हैं जिसमें सत्य या सिद्धांत शामिल हों, तो वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना है; उनके अपने इंसानी ख़याल प्रकट हो जाते हैं, और अंततः वे उस कार्य को, और परमेश्वर के घर के हितों को, नुकसान पहुँचाते हैं और बदनाम हो जाते हैं। क्या मानवीय अनुभव और तरीके काम करते हैं? (नहीं।) तो उनके पास घमंड करने के लिए क्या है? ये लोग जो अज्ञानी हैं, आध्यात्मिक समझ से रहित हैं, और जिनके पास सत्य को समझने की क्षमता नहीं है, वे अभी भी इस तरह डींग मारेंगे : "यह सच नहीं है कि मैं इस मामले से संबंधित सत्य को नहीं समझता; मैं उसे गहराई से समझता हूँ। बात सिर्फ इतनी है कि मैंने कार्रवाई करने से पहले मामले पर ज्यादा विचार नहीं किया। अगर मैं और अधिक प्रयास करता और इस पर विस्तार से विचार करता, तो मैंने अच्छा काम किया होता। अतीत में मैं धर्मनिरपेक्ष दुनिया में ऐसे मामलों से निपटने के लिए इन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करता था। लेकिन परमेश्वर के घर ने मुझे इनका उपयोग करने से मना किया था, इसलिए मुझे पता नहीं था कि क्या करना है, और इसे इस तरह से कर दिया। इसलिए, मेरा कुछ गलतियाँ कर देना सामान्य बात है।" क्या ऐसे लोगों के पास खुद का ज्ञान होता है? (नहीं।) वे खुद को क्यों नहीं जानते? क्या इसका सत्य से कुछ लेना-देना है? क्या ज्ञान की यह कमी प्रभु यीशु का विरोध करने के बाद पौलुस की प्रतिक्रिया के समान नहीं है? ये लोग खुद को नहीं जानते, और मामले में सत्य की तलाश करने के बजाय मुद्दे को हल करने और छिपाने के तरीकों के बारे में सोचने की कोशिश करते हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने केवल एक गलती की है, मात्र व्यवहार संबंधी एक त्रुटि या गलती, और इसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है और यह सत्य की समझ की कमी के कारण नहीं है। यह कम क्षमता वाला होने का एक उदाहरण है। जब ऐसे लोगों के साथ कुछ होता है, तो वे किसी बाहरी घटना को दोष देते हैं, या वे इसे अपने स्वयं के व्यवहार से जोड़ लेते हैं, यह मानते हुए कि बस उनसे एक गलती हो गई है, और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। किसी भी बिंदु पर वे यह नहीं समझते कि उन्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए और स्वयं को जानना चाहिए। चाहे उनके किन्हीं भी दोषों को इंगित किया जाए, और चाहे उनके भीतर की कोई भी बात उजागर की जाए या उसके बारे में संगति की जाए, वे तब भी यह नहीं जान पाते कि उन्होंने किन सत्य-सिद्धांतों का उल्लंघन किया है या उन्हें किस सत्य का अभ्यास करना चाहिए; वे सत्य को समझने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। खराब क्षमता वाला होने का यही अर्थ है। चाहे तुम सत्य पर कितनी भी स्पष्ट संगति करो, फिर भी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि यही सत्य है, वे तब भी सत्य को ढ़कने के लिए अपने स्वयं के कारणों और बहानों का इस्तेमाल करते रहते हैं, वे सत्य से इनकार करते हैं, और इस बात से भी इनकार करते हैं कि उनमें एक भ्रष्ट स्वभाव है। इसका मतलब है, चाहे वे कितनी भी गलतियाँ करें, वे कितनी ही भ्रष्टताओं को प्रकट करें, या इन भ्रष्ट स्वभावों के साथ जुड़ी हुईं कितनी भी स्थितियों को बनाएँ, वे तब भी यह नहीं समझते हैं कि यह उनका भ्रष्ट स्वभाव है, उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि उनका सार क्या है, और न ही उन्हें यह एहसास होता है कि उन्हें इस मुद्दे को कैसे समझना चाहिए, उन्हें सत्य की तलाश कैसे करनी चाहिए, और उन्हें सत्य का कौन-सा पहलू हासिल करना चाहिए। उन्हें इसमें से कुछ भी पता नहीं होता, और उनकी आत्माओं में एक सुन्नता होती है, और उन्हें इन चीज़ों की थोड़ी-सी भी सुध नहीं होती है। तुच्छ क्षमता यही होती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

अच्छी क्षमता के लोगों में क्या प्रकट होता है? परमेश्वर में उन्होंने चाहे कितने भी समय से विश्वास किया हो, जब वे एक उपदेश सुनते हैं, तो वे जिस उपदेश को आज सुन रहे हैं और बाइबल में जो कहा गया था, उनके बीच के अंतर को बता सकते हैं—यह उपदेश अधिक गहरा, अधिक विस्तृत है, और बाद में, वे इसे अपने वास्तविक जीवन में लागू करना शुरू कर देते हैं। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ईमानदार होने के लिए कहता है। शुरू में, वे इस नियम से चिपके रहने के अलावा और कुछ नहीं करते, जो कुछ भी उनके दिल में हो वे वही कहते हैं। लेकिन धीरे—धीरे, जैसे-जैसे वे उपदेशों को सुनते हैं, वे अपने स्वयं के वास्तविक जीवन के अनुभवों से लगातार चीज़ों का निचोड़ निकालते रहते हैं, जब तक कि वे अंतत: अपने साथ हुई घटनाओं और अपने अनुभव के आधार पर सत्य के इस पहलू—ईमानदार होने—और इसकी वास्तविकता को स्पष्ट रूप से समझ न लें। वे परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों और धर्मोपदेशों में छुए गए सत्यों को अपने वास्तविक जीवन में लागू करने में सक्षम होते हैं, और वे इन्हें अपनी वास्तविकता बना लेते हैं, और धीरे-धीरे खुद को इन सत्यों की अधिक गहराई में ले जाने के लिए इन वास्तविक अनुभवों का उपयोग करते हैं। अर्थात, वे परमेश्वर के वचनों और अपने द्वारा सुने गए उपदेशों में निहित सत्य को महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं, और यह सत्य कोई खोखला धर्म-सिद्धांत, कोई व्याख्या या परिकल्पना नहीं होता, बल्कि इसका संबंध उन कठिनाइयों से होता है जिनका वे अपने वास्तविक जीवन में सामना करते हैं, और उन स्थितियों से होता है जिन्हें वे उजागर करती हैं। वे इन स्थितियों की जाँच करने और इनकी तुलना परमेश्वर द्वारा उजागर की गई बातों से करने में सक्षम होते हैं, और फिर वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करते हैं। अच्छी क्षमता यही होती है। अच्छी क्षमता की मुख्य अभिव्यक्ति क्या है? जब वे उपदेश सुनते हैं, तो वे यह समझने में सक्षम होते हैं कि क्या कहा जा रहा है, और वे यह समझ सकते हैं कि इन वचनों और उनकी अपनी वास्तविक स्थितियों के बीच क्या संबंध है, ये वचन उनमें क्या भूमिका निभाते हैं, और वे खुद को इन वचनों के सामने खड़ा करने में सक्षम होते हैं। इसके अलावा, अपने वास्तविक जीवन में, वे अभ्यास के सिद्धांतों को समझने में, और इन सिद्धांतों को हर उस कठिनाई या मुद्दे पर लागू करने में सक्षम होते हैं जिसका वे सामना करते हैं। अंतर्दृष्टि से युक्त होने का यही अर्थ होता है। केवल ऐसी अंतर्दृष्टि वाले लोग ही वास्तव में अच्छी क्षमता वाले लोग होते हैं।

जब औसत क्षमता वाला कोई व्यक्ति भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता है, तो वह अपनी वास्तविक स्थिति और अपनी समस्या के सार की पहचान के लिए सिद्धांत का उपयोग केवल सतही तौर पर करता है। वह समझता नहीं है, अंदर के सार को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है, और सार की जड़ को या उस पहलू को नहीं जानता जिसमें सत्य शामिल होता है। जब कुछ घटित होता है, तो काट-छाँट और निपटने से गुज़रना, विच्छेदन और विश्लेषण उस पर एक गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं और वह उस मुद्दे का कुछ ज्ञान हासिल कर लेता है। लेकिन एक अन्य स्थिति या परिवेश में, वह फिर से उलझन में पड़ जाता है, वह समझ नहीं पाता कि क्या करना है, और उसे सिद्धांत नहीं मिल पाता है। औसत क्षमता वाला होने का यही अर्थ है। जब हम अच्छी क्षमता वाले लोगों के बारे में बात करते हैं, तो किस मायने में उनकी क्षमता अच्छी होती है? जब कुछ घटित होता है, तो वे कुछ समय के लिए उलझन में पड़ सकते हैं, लेकिन धर्मोपदेशसुनकर, परमेश्वर के वचन खोजकर और परमेश्वर के वचन से अपनी तुलना करके, वे यह जान जाते हैं कि क्या करना है, और जब उनका सामना इस तरह के मामलों से होता है तब भी वे जानते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। क्यों? क्योंकि उन्हें सिद्धांत मिल गया है और वे सत्य के इस पहलू को समझते हैं। एक बार जब वे सत्य को समझ लेते हैं, तो वे उस व्यक्ति की स्थिति को जिससे यह संबंधित होता है, उस बात को जिसे वह व्यक्ति उजागर करता है, उसके भ्रष्ट स्वभाव को, साथ ही इसमें शामिल हर चीज़ को, उसके जीवन की परिस्थितियों इत्यादि को जान लेते हैं। इस तरह के काम करने के सिद्धांतों पर वे स्पष्ट होते हैं, और भविष्य में जब वे इसी तरह की चीज़ों का सामना करते हैं, तो वे जानते हैं कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे अभ्यास करना है। सत्य को सही मायने में समझना यही होता है। इसलिए, क्योंकि कुछ लोग सत्य को समझ सकते हैं, क्योंकि उनमें सत्य को समझने की क्षमता होती है, वे टीम के अगुआ या कलीसिया के अगुआ बनने में सक्षम होते हैं। बहरहाल, कुछ अन्य लोग केवल सिद्धांत के स्तर पर ही समझ सकते हैं, इसलिए वे टीम के अगुआ नहीं बन सकते, क्योंकि वे सिद्धांतों को ग्रहण करने या अंतिम जाँच करने में असमर्थ होते हैं। किसी व्यक्ति को टीम के अगुआ के रूप में सेवा करने के लिए कहना, उसे अंतिम जाँच करने के लिए कहना है। अंतिम जाँच करने के लिए किन बातों का उपयोग करना? सिद्धांतों, नारों, जानकारी या धारणाओं का नहीं। इसका अर्थ उन्हें अंतिम जाँच करने के लिए सत्य सिद्धांत का उपयोग करने के लिए कहना है। परमेश्वर के घर में कुछ भी करने का यह सबसे बुनियादी और सर्वोच्च सिद्धांत होता है। यदि तुम्हारी क्षमता औसत या खराब है, और तुम सत्य को नहीं समझ पाते हो, तो तुम अंतिम जाँच कैसे कर सकोगे? तुम इस जिम्मेदारी को कैसे निभा सकोगे? तुम इस काम, इस कर्तव्य के लिए योग्य नहीं हो। कुछ लोगों को टीम के अगुआ के रूप में चुन तो लिया जाता है, लेकिन वे सत्य नहीं समझते, इसलिए वे कार्य के लिए योग्य नहीं होते, वे प्रामाणिक टीम-अगुआ नहीं होते और अंतिम जाँच नहीं कर पाते। कुछ व्यक्ति टीम-अगुआ के रूप में चुने जाने पर, इस कर्तव्य का भार वहन कर सकते हैं, जबकि अन्य लोग नहीं कर पाते। क्या कारण है कि कुछ लोग नहीं कर पाते? कुछ लोग ऐसा इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि वे हीन मानवता के होते हैं; हालांकि, अधिकतर लोगों के लिए, इसका कारण उनकी कम क्षमता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में वे कर्तव्य के योग्य नहीं होते हैं। बात चाहे सत्य के किसी एक पहलू को समझने की हो या किसी पेशे को सीखने की, अच्छी क्षमता वाले लोग अंतर्निहित सिद्धांतों को समझने में, चीज़ों की जड़ तक पहुँचने में, और वास्तविकता और सार की पहचान करने में, सक्षम होते हैं, जिसकी वजह से वे हर चीज में, हर उस काम में जिसमें वे लगे हुए हैं, सही निर्णय लेते हैं, और सही मानकों और सिद्धांतों को निर्धारित करते हैं। अच्छी क्षमता यही होती है। अच्छी क्षमता वाले लोग परमेश्वर के घर के विभिन्न कार्यों पर अंतिम जाँच करने में सक्षम होते हैं। साधारण या तुच्छ क्षमता वाले लोग ऐसे काम करने में असमर्थ होते हैं। यह किसी भी तरह से परमेश्वर के घर के द्वारा कुछ लोगों का पक्ष लेना या कुछ लोगों को छोटा समझना नहीं है—बात केवल इतनी है कि बहुत से लोग अपनी क्षमता के कारण किसी काम को करने में असमर्थ होते हैं। और अंतिम जाँच करने में उनके असमर्थ होने का मूल कारण यह होता है कि वे सत्य को नहीं समझते हैं। उनके द्वारा सत्य को न समझने का कारण यह होता है कि उनकी क्षमता अति साधारण, यहाँ तक कि तुच्छ, होती है; सत्य उनसे परे होता है, और जब वे सत्य को सुनते हैं तो वे इसे समझने में असमर्थ होते हैं। कुछ लोग सत्य को इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि वे ध्यान से नहीं सुनते हैं, या यह हो सकता है कि वे अभी युवा हैं और उन्होंने अभी तक परमेश्वर में अपने विश्वास की जड़ें नहीं बनाईं हैं, और यह उनके लिए कोई बड़ी दिलचस्पी की बात नहीं होती है। लेकिन ये मुख्य कारण नहीं होते हैं; मुख्य कारण तो यह होता है कि उनकी क्षमता कार्य के बराबर नहीं होती। तुच्छ क्षमता के लोग, चाहे उनका कर्तव्य जो भी हो, या वे कितने ही समय से काम करते रहे हों, चाहे तुम किसी भी तरह से उन्हें सिखाने की कोशिश करो, या चाहे वे कितने ही उपदेश सुनें, वे तब भी इसकी समझ प्राप्त नहीं कर पाते, वे अपने काम को किसी तरह खींचते रहते हैं, हर काम में पूरी तरह गड़बड़ी करते रहते हैं, और कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

यह मापते समय कि किसी व्यक्ति की क्षमता अच्छी है या खराब, उनके दैनिक जीवन में हर चीज़ के प्रति उनके दृष्टिकोण को देखो—या, जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो क्या वे परमेश्वर की इच्छा और रवैये को, उन सिद्धांतों को जिनका उन्हें पालन करना चाहिए, उस रुख को जो उन्हें अपनाना चाहिए, और उस रवैये को जो उनके पास होना चाहिए, समझने में सक्षम हैं। यदि तुम इन सभी चीज़ों को समझने में सक्षम हो, तो तुम्हारे पास क्षमता है। यदि तुम जो समझते हो उसका परमेश्वर द्वारा तुम्हारे वास्तविक जीवन में तुम्हारे लिए की गईं सभी व्यवस्थाओं से कोई सरोकार नहीं है, तो तुम्हारे पास या तो कोई क्षमता नहीं है या तुम तुच्छ क्षमता के हो। पतरस और अय्यूब का असली क़द कैसे विकसित हुआ था, और उन्होंने आख़िर परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था में वह सब कैसे हासिल किया और पा लिया जो उन्होंने पाया था? उनके पास वह सब सुविधा नहीं थी जो आज तुम लोगों के पास है; तुम्हारे पास तुम्हें प्रावधान देने के लिए, तुम्हें सहारा देने, और सहायता देने के लिए, तुम्हारे लिए अंतिम जाँच करने के लिए हमेशा कोई न कोई होता है। उनके द्वारा समझे गए अधिकांश सत्य वे थे जिन्हें उन्होंने महसूस किया था, जिनका उन्होंने अनुभव किया, जिन्हें उन्होंने धीरे—धीरे समझा-बूझा था और जिन्हें उन्होंने अपने दैनिक जीवन में भोगा था। उच्च क्षमता वाला होना यही होता है। जब लोगों के पास इस तरह की क्षमता नहीं होती, और उनके पास सत्य और उद्धार के प्रति यह रवैया नहीं होता, तो वे सत्य को हासिल करने में असमर्थ होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

साधारण क्षमता के लोगों में क्या प्रकट होता है? एक बार धर्मोपदेश सुनने से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जब उनके साथ कुछ घटित हो जाता है, तो वे तब भी नहीं जानते कि उससे कैसे निपटना है या क्या करना है। वे सिर्फ़ खोखले धर्म-सिद्धांत की बात कर सकते हैं और नियमों से चिपके रह सकते हैं। एक उपदेश को दो बार सुनने से उन पर कुछ प्रभाव पड़ता है, लेकिन जब कोई घटना उनके साथ हो जाती है, तो फिर भी उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें क्या करना है, वे अभी भी नियमों से चिपके रहते हैं, और वे कुछ अक्षर बोलते हैं और लोगों को प्रवचन देने और अपना काम करने के लिए धर्म-सिद्धांत का उपयोग करते हैं। कई वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद, उन्होंने खुद को अधिक से अधिक सिद्धांतों से लैस कर लिया है। इससे पहले वे धर्म-सिद्धांत के आधार पर कुछ अनुभवों और ज्ञान के बारे में केवल दो या तीन मिनट के लिए ही बोल पाते थे, और फिर उनके पास कहने को कुछ नहीं बचता था। जैसे-जैसे साल बढ़ते जाते हैं, वे बीस या तीस मिनट तक बोल सकते हैं—लेकिन वे फिर भी नहीं समझ पाते कि सत्य क्या है, या वास्तविकता क्या होती है। उन्हें लगता है कि वे जिस धर्म-सिद्धांत के बारे में बोलते हैं, वही सत्य है। वे वास्तविकता के बारे में, या अनुभवों, ज्ञान और सत्य-वास्तविकता से जुड़े मार्ग के बारे में दूसरों की कोई बात नहीं सुनते हैं; वे सोचते हैं कि सत्य और धर्म-सिद्धांत एक ही होते हैं। यानी, वे चाहे कितने भी उपदेश सुन लें, उन्हें उन प्रवचनों से अपने स्वभाव में परिवर्तनों या अपने प्रकृति-सार से जुड़ी सच्चाइयों के बारे में कोई अहसास नहीं होता है। इसके बाद, अपने वास्तविक जीवन में, नियमों और रस्मों से चिपके रहने, तथा नियमित रूप से सभाओं में जाने, लोगों से धर्म-सिद्धांत पर बातें करने और कुछ हद तक अपने कर्तव्य के पालन में मेहनत करने के अलावा, वे आमतौर पर स्वभाव में परिवर्तनों, अपने भ्रष्ट स्वभावों को जानने, और जीवन में प्रवेश करने से जुड़ी सच्चाइयों में न तो प्रवेश करते हैं, और न ही इनकी गहराई में जाते हैं। यह साधारण क्षमता के होने का एक उदाहरण है। साधारण क्षमता के लोग इससे आगे नहीं जा सकते हैं। कुछ ऐसे लोग होते हैं जो बीस या तीस वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं, और वे अभी भी केवल धर्म-सिद्धांत की बात करते हैं। औसत क्षमता का होना यही होता है।

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तुच्छ क्षमता वाले लोगों में क्या प्रकट होता है? वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद, उन्हें लगता है कि यह सब एक जैसा ही है, वही पुरानी बातें हैं। वे धर्म-सिद्धांत को भी लेशमात्र नहीं सुन पाते, सत्य की बात तो छोड़ ही दो। उपदेश सुनते समय चाहे वे कितनी भी कोशिश करें, या कितने ही वर्षों तक उपदेश सुनते रहें, वे फिर भी यह नहीं समझ पाते कि वे क्या सुन रहे हैं; वे यह नहीं जान पाते कि सत्य क्या है और खुद को जानने का मतलब क्या होता है। चाहे वे ताज़ा सामग्री, गहन सामग्री, या पवित्र आत्मा के नए वचनों और कार्य के बारे में सुन रहे हों, वे सिर्फ आसान-सी बात ही सुनते हैं। वे याद भी उतना ही रख पाते हैं, उससे अधिक वे याद नहीं रख सकते। और चूँकि उनकी क्षमता ऐसी है कि वे इतनी सारी चीज़ों को समझने में असमर्थ होते हैं, तो फिर सत्य-वास्तविकता को हासिल करने में वे कैसे सक्षम हो सकते हैं? इस कारण से, वे अक्सर वह बात दोहराते हैं जो धर्मपरायण लोग कहा करते हैं: "जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था तभी से मैं परमेश्वर में विश्वास करता रहा हूँ, मैं बहुत पहले बपतिस्मा और शोधन प्राप्त कर चुका हूँ।" यही बात वे लोग भी अभी भी कहते हैं जिन्होंने कुछ ही वर्षों के लिए परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार किया है। क्या वे तुच्छ क्षमता के नहीं हैं? दूसरे लोग कहते हैं, "तुम कहते हो कि मैं स्वयं को नहीं जानता—यह तो तुम्हीं लोग हो जो स्वयं को नहीं जानते हो। मैं लंबे समय से पवित्र हूँ।" कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसे शब्द कहने वाले लोग सबसे तुच्छ क्षमता के लोग होते हैं। तुम ऐसे लोगों को क्या उपदेश दे सकते हो? चाहे वे कितने भी उपदेश सुनें, उन्हें फिर भी समझ नहीं आता है कि सत्य क्या है, सत्य का अभ्यास क्या होता है—वे इन बातों को समझ नहीं पाते, ये बातें उनके बस के बाहर की होती हैं। जब उनके साथ कोई बात घटित हो जाती है, तो वे उन थोड़े-से नियमों से चिपके रहते हैं, वे प्रार्थना करते हैं, वे परमेश्वर की ओर देखते हैं, वे परमेश्वर पर निर्भर करते हैं, वे परमेश्वर को अस्वीकार नहीं करते हैं, वे अविश्वासियों के साथ घुलते-मिलते नहीं हैं, और वे स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दुनिया से अलग रखते हैं—मूल रूप से, वे धार्मिक आस्था की इन औपचारिकताओं से आगे नहीं जाते हैं। चाहे वे परमेश्वर के वचनों और कार्य के बारे में कितना भी सुनें, और चाहे वे सत्य के बारे में कितने भी उपदेश सुनें, वे उन्हें आत्मसात नहीं कर पाते। यदि तुम उनसे पूछो कि परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान मनुष्य से क्या अपेक्षित है, तो वे तुम्हें नहीं बता सकते, और वे केवल किसी सरल धर्म-सिद्धांत की बात कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि उनकी क्षमता अत्यंत कम है; वे परमेश्वर के वचनों को समझ नहीं सकते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

चाहे कोई भी मुद्दा सामने आए, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, एक सामान्य मस्तिष्क वाला व्यक्ति पहले उस पर अपने मस्तिष्क में विचार करेगा और निर्णय लेगा। इस निर्णय में एक दृष्टिकोण और साथ ही एक विशिष्ट योजना होती है कि इस मामले में विशेष रूप से क्या करना है, और उसे कैसे लेना और सँभालना है। सामान्य लोगों के मस्तिष्क द्वारा ऐसी ही योजनाएँ बनाई जानी चाहिए; जो लोग ऐसी योजनाएँ बनाने में सक्षम हैं, उन्हें सामान्य बुद्धि वाला माना जा सकता है। अगर अपने सामने कोई मुद्दा आने पर—चाहे वह बड़ा हो या छोटा—उनके दिमाग में कुछ भी विशिष्ट नहीं होता, अगर उनकी बुद्धि एक विशिष्ट योजना बनाने में असमर्थ रहती है, और उनके पास बस सिद्धांत पर आधारित कुछ सरल नारे होते हैं, और वे इस मुद्दे से निपटने के लिए कोई दृष्टिकोण रखने या योजना बनाने के बजाय केवल नारों का उपयोग करते हैं, तो क्या ऐसे लोगों में सोचने या चिंतन करने की क्षमता है? (नहीं।) जिन लोगों में सोचने की क्षमता नहीं होती, वे खराब क्षमता के लोग होते हैं। ... और किसी में सामान्य मनुष्य की बुद्धि का अभाव है, यह कैसे प्रकट होता है? जब लोगों के सामने कोई मुद्दा आता है—चाहे उन्हें उसकी उम्मीद न रही हो या चाहे उन्हें उसका पहले से पता हो—वे उस पर विचार करने या कोई निर्णय लेने में असमर्थ होते हैं, और इसलिए स्वाभाविक रूप से उनके पास उस समस्या से निपटने की कोई योजना या उसे हल करने की काबिलियत नहीं होगी। यह स्पष्ट है। जैसे भी देखा जाए, यही लगता है कि इस तरह का व्यक्ति सही बात कहता है, सही नारे लगाता है, सही सिद्धांत का प्रचार करता है, और लोगों की आत्माओं को उन्नत करने में सक्षम होता है। ऐसा लगता है कि उनमें लोगों की अगुआई करने की क्षमता है, लेकिन जब उन्हें कुछ विशिष्ट कार्य करना होता है, तो उनमें समस्या सुलझाने के कौशल की कमी होती है—वे मूर्ख और लापरवाह होते हैं, और किसी भी समस्या के बारे में सोचने में असमर्थ होते हैं, और वे केवल नारे लगा सकते हैं और सिद्धांत का प्रचार कर सकते हैं। ऐसे लोग इस तरह के मामले के जारी रहने के परिणामों या स्थिति की गंभीरता का आकलन करने में असमर्थ होते हैं, और न ही वे ठीक से यह आँकने में सक्षम होते हैं कि कोई चीज क्यों होती है। वे चीजों को व्यवस्थित करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग खराब क्षमता के होते हैं। इसी तरह, अगर कोई कार्य-व्यवस्था प्राप्त करने के बाद अगुआ या कार्यकर्ता बस उसे तेजी से पढ़ लेते हैं और केवल उसके शब्दों पर बखेड़ा खड़ा करते हैं और उसकी व्याख्या करते हैं—और कार्य-व्यवस्थाओं पर संगति के लिए संबंधित लोगों को एक-साथ ले आने और उन्हें अपने से नीचे के लोगों को प्रेषित कर देने के बाद भी अगर वे इस बात से अनभिज्ञ रहते हैं कि कार्य-व्यवस्थाओं की विशिष्ट अपेक्षाओं, सिद्धांतों, ध्यान देने योग्य बिंदुओं, विशेष परिस्थितियों आदि के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन और व्यवस्थाएँ कैसे प्रदान करनी है, और वे इस बारे में कोई योजना या विचार नहीं रखते—तो उनमें समस्या हल करने का कोई कौशल नहीं है, और वे खराब क्षमता के हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (10)' से उद्धृत

क्या तुम लोग कहोगे कि पौलुस में क्षमता थी? पौलुस की क्षमता किस श्रेणी की थी? (यह बहुत अच्छी थी।) तुम लोगों ने बहुत सारे उपदेश सुने हैं, लेकिन फिर भी तुम इसका भेद नहीं बता सकते हो। क्या पौलुस की क्षमता को अच्छा माना जा सकता है? (नहीं, यह ख़राब थी।) पौलुस की क्षमता ख़राब क्यों थी? (वह खुद को नहीं जानता था और परमेश्वर के वचनों की बहुत कम समझ रखता था।) ऐसा इसलिए था क्योंकि वह सत्य को नहीं समझता था। उस समय, उसने भी प्रभु यीशु द्वारा दिए गए उपदेशों को सुना था, और उस अवधि के दौरान जब उसने काम किया, निश्चित रूप से वहाँ पवित्र आत्मा का कार्य भी था। तो कैसे, जब उसने वह सब काम किया, उन सभी धर्मपत्रों को लिखा, और वह उन सभी कलीसियाओं से होकर गुज़रा, तो वह फिर भी सत्य को ज़रा भी नहीं समझता था? उसने जो कुछ भी कहा वह धर्म-सिद्धांत था। ऐसा व्यक्ति तुच्छ क्षमता का होता है। और फिर, पौलुस ने प्रभु यीशु और उसके शिष्यों को सताया, जिसके बाद प्रभु यीशु ने उसके सामने खुद को प्रकट किया और उसको नीचे गिरा दिया। फिर भी इस तरह की एक महत्वपूर्ण घटना से गुज़रने के बाद, उसने इसे किस दृष्टिकोण से लिया और इसे कैसे समझा? उसने सोचा, "प्रभु यीशु ने मुझे नीचे गिरा दिया है, मैंने पाप किया है, इसलिए मुझे इसकी भरपाई करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए, और एक बार जब मेरे गुण मेरे अवगुणों को संतुलित कर लेंगे, तो मुझे पुरस्कृत किया जाएगा।" क्या वह खुद को जानता था? वह नहीं जानता था। उसने यह नहीं कहा कि प्रभु यीशु के प्रति उसका विरोध उसके दुर्भावनापूर्ण स्वभाव के कारण था, एक मसीह-विरोधी जैसी उसकी प्रकृति के कारण; उसके पास खुद का ऐसा ज्ञान नहीं था। और इस घटना को उसने अपने धर्मपत्रों में कैसे लिपिबद्ध किया? उसका क्या नज़रिया था? उसका मानना था कि परमेश्वर उसके सामने एक महान प्रकाश के साथ प्रकट हुआ था, और यह कि परमेश्वर उसका बड़ा उपयोग करना शुरू करेगा। खुद का थोड़ा-सा भी ज्ञान न होने के कारण, उसका मानना था कि यह सबसे शक्तिशाली प्रमाण था कि उसे पुरस्कृत किया जाएगा और उसे ताज पहनाया जाएगा, साथ ही यह सबसे बड़ी पूँजी थी जिसका उपयोग वह पुरस्कारों और ताज को हासिल करने के लिए कर सकता था। इसके अलावा, उसने महसूस किया कि उसके भीतर गहराई में कोई "कांटा" था: प्रभु यीशु के प्रति उसकी पिछली अवज्ञा। और उसने इसके प्रति कैसा रुख़ अपनाया? उसने महसूस किया कि यह उसके जीवन की सबसे बड़ी गलतियों में से एक थी, और इसने उसके स्वर्ग में जाने और ताज पहनाये जाने को जोखिम में डाल दिया था। अपने दिल में, वह हमेशा इसके बारे में असहज महसूस करता था। "मैं कैसे इस गंभीर गलती की क्षतिपूर्ति कर सकता हूँ? मैं इसे कैसे रद्द कर सकता हूँ, जिससे यह मुझे ताज पहनाए जाने की संभावनाओं को प्रभावित न करे? मुझे प्रभु के कार्य को अधिक से अधिक करना चाहिए, अधिक कीमत चुकानी चाहिए, और अधिक धर्मपत्रों को लिखना चाहिए, और भाग-दौड़ में, शैतान से जूझने और एक सुंदर गवाही देने में अधिक समय बिताना चाहिए।" उसने इसके प्रति इस तरह का रुख़ अपनाया था। उसे जरा-सा भी अफ़सोस नहीं था, खुद का ज्ञान तो उसे और भी कम था; उसके पास इन दोनों में से कुछ भी नहीं था। पौलुस की क्षमता ऐसी थी। आंशिक रूप से अपनी मानवता और उन चीज़ों के कारण जिनका उसने अनुसरण किया, और आंशिक रूप से अपनी क्षमता के कारण, वह इन चीज़ों को समझ नहीं सका, और न ही उसने यह महसूस किया कि, "यह मनुष्य की प्रकृति है, मनुष्य की प्रकृति बहुत बुरी होती है, बहुत ही दुष्ट। मनुष्य की प्रकृति शैतान और एक मसीह-विरोधी की प्रकृति होती है, और मनुष्य को परमेश्वर का छुटकारा ग्रहण करना चाहिए; यह बात मनुष्य के लिए परमेश्वर के छुटकारे की आवश्यकता की जड़ होती है। तो मनुष्य को अपने छुटकारे को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने कैसे आना चाहिए?" उसने कभी ऐसी बातें नहीं कहीं। उसे अपने विद्रोह का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था, और वह केवल इतना ही सोचता था कि इसे कैसे रद्द किया जाए, कैसे इसे अपराध बनने से रोका जाए, कैसे अपने पापों को धोने के लिए पर्याप्त योग्यता अर्जित की जाए और अच्छी सेवा के द्वारा अपने कुकर्मों का प्रायश्चित किया जाए, और अंत में वह ताज और इनाम प्राप्त किया जाए जिसकी उसे आशा थी। उसने कभी भी अपने साथ हुई किसी भी घटना से सत्य को या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझा, ऐसा व्यक्ति सबसे तुच्छ क्षमता वाला होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

पतरस के पास उत्कृष्ट क्षमता थी, परन्तु उसकी परिस्थितियाँ पौलुस से भिन्न थीं : उसके माता-पिता ने मुझे सताया था, वे ऐसे दुष्टात्मा थे जो शैतान के अधीन थे, और इसी कारण उन्होंने पतरस को परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं सिखाया। पतरस बुद्धिमान, प्रतिभासम्पन्न था, बचपन से ही उसके माता-पिता उससे बहुत स्नेह करते थे। फिर भी, वयस्क होने पर, वह उनका शत्रु बन गया, क्योंकि उसने मेरे बारे में ज्ञान तलाशना कभी बंद नहीं किया, परिणामस्वरूप वह अपने माता-पिता से विमुख हो गया। यह इसलिए हुआ क्योंकि, सबसे ज़्यादा उसे यह विश्वास था कि स्वर्ग और पृथ्वी और सभी वस्तुएं सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और सभी सकारात्मक बातें परमेश्वर से आती हैं, शैतान द्वारा संसाधित हुए बिना उसी से सीधे तौर पर जारी होती हैं। उसके माता-पिता की प्रतिकूलता ने उसे मेरे कृपालु प्रेम एवं दया का और भी ज्ञान दिया, इस प्रकार उसके भीतर मुझे खोजने की इच्छा और तीव्र हो गयी। उसने न केवल मेरे वचनों को खाने और पीने पर ध्यान दिया, बल्कि मेरी इच्छा को समझने पर भी ध्यान दिया, और वह अपने हृदय में हमेशा सतर्क रहा। परिणामस्वरूप वह अपनी आत्मा में हमेशा संवेदनशील बना रहा और इस प्रकार वह अपने हर काम में मेरे हृदय के अनुकूल रहा। उसने खुद को आगे बढ़ने हेतु प्रेरित करने के लिए अतीत के लोगों की असफलताओं पर निरंतर ध्यान बनाए रखा, क्योंकि वह असफलता के जाल में फंसने से बुरी तरह डरता था। इसी प्रकार, उसने उन लोगों की आस्था और प्रेम को आत्मसात करने पर भी ध्यान दिया जो युगों से परमेश्वर से प्रेम करते आ रहे थे। इस प्रकार से न केवल नकारात्मक पहलू में, बल्कि और भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, सकारात्मक पहलू में उसने अधिक तेज़ी से विकास किया, कुछ इस तरह कि मेरी उपस्थिति में उसका ज्ञान सभी से बढ़कर हो गया। तो, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है कि किस प्रकार से उसने अपना सब कुछ मेरे हाथों में दे दिया, यहाँ तक कि उसने खाने-पीने, कपड़े पहनने, सोने और रहने के निर्णय भी मुझे सौंप दिये, और इनके बजाय मुझे सभी बातों में संतुष्टि प्रदान करने के आधार पर उसने मेरे उपहारों का आनन्द लिया। मैंने उसके अनगिनत परीक्षण लिए, स्वभाविक रूप से उन्होंने उसे अधमरा कर दिया, परन्तु इन सैकड़ों परीक्षणों के मध्य, उसने कभी भी मुझमें अपनी आस्था नहीं खोई या मुझसे मायूस नहीं हुआ। जब मैंने उससे कहा कि मैंने उसे त्याग दिया है, तो भी वह निराश नहीं हुआ और पहले के अभ्यास के सिद्धांतों के अनुसार एवं व्यावहारिक ढंग से मुझे प्रेम करना जारी रखा। जब मैंने उससे कहा कि भले ही वह मुझ से प्रेम करता है, तो भी मैं उसकी प्रशंसा नहीं करूँगा, अंत में मैं उसे शैतान के हाथों में दे दूँगा। लेकिन ऐसे परीक्षण जो उसकी देह ने नहीं भोगे, मगर जो वचनों के परीक्षण थे, उन परीक्षणों के मध्य भी उसने मुझसे प्रार्थना की और कहा : "हे परमेश्वर! स्वर्ग, पृथ्वी और सभी वस्तुओं के मध्य, क्या ऐसा कोई मनुष्य है, कोई प्राणी है, या कोई ऐसी वस्तु है जो तुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में न हो? जब तू मुझे अपनी दया दिखाता है, तब मेरा हृदय तेरी दया से बहुत आनन्दित होता है। जब तू मेरा न्याय करता है, तो भले ही मैं उसके अयोग्य रहूँ, फिर भी मैं तेरे कर्मों के अथाहपन की और अधिक समझ प्राप्त करता हूँ, क्योंकि तू अधिकार और बुद्धि से परिपूर्ण है। हालाँकि मेरा शरीर कष्ट सहता है, लेकिन मेरी आत्मा में चैन है। मैं तेरी बुद्धि और कर्मों की प्रशंसा कैसे न करूँ? यदि मैं तुझे जानने के बाद मर भी जाऊँ, तो भी मैं उसके लिए सहर्ष और प्रसन्नता से तैयार रहूँगा। हे सर्वशक्तिमान! क्या तू सचमुच नहीं चाहता है कि मैं तुझे देखूँ? क्या मैं सच में तेरे न्याय को प्राप्त करने के अयोग्य हूँ? कहीं मुझ में ऐसा कुछ तो नहीं जो तू नहीं देखना चाहता?" इस प्रकार के परीक्षणों के मध्य, भले ही पतरस मेरी इच्छा को सटीकता से समझने में असफल रहता था, लेकिन यह स्पष्ट था कि वह मेरे द्वारा उपयोग किए जाने के कारण खुद को बहुत गर्वान्वित और सम्मानित महसूस करता था (भले ही उसने मेरा न्याय इसलिए पाया ताकि मनुष्य मेरा प्रताप और क्रोध देख सके), और वह इन परीक्षणों के कारण बिल्कुल भी निरुत्साहित नहीं हुआ। मेरे समक्ष उसकी निष्ठा के कारण, और उस पर मेरे आशीषों के कारण, वह हज़ारों सालों के लिए मनुष्यों के लिए एक उदाहरण और आदर्श बना हुआ है। क्या तुम लोगों को उसकी इसी बात का अनुकरण नहीं करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 6' से उद्धृत

सब लोग अलग होते हैं। उनका आपसी अंतर उनकी क्षमता और सत्य के प्रति उनके दृष्टिकोण में निहित होता है। जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं और अच्छी क्षमता के होते हैं, वे जल्दी से सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हैं और जीवन पाने में सक्षम हो जाते हैं। साधारण क्षमता के लोग अड़ियल और सुन्न होते हैं; सत्य में उनका प्रवेश धीमा होता है, और उनके जीवन में प्रगति भी धीमी होती है। तुच्छ क्षमता वाले लोग केवल अज्ञानी, जिद्दी और अहंकारी ही नहीं होते; उनके पूरे चेहरे पर सुन्नता और मंदबुद्धि अंकित होती है, उनकी आत्माएँ सुन्न होती हैं, और वे सत्य को समझने में धीमे होते हैं। ऐसे लोग जीवन से रहित होते हैं, क्योंकि वे सत्य को नहीं समझते हैं, और धर्म-सिद्धांत की बातें करने, नारे लगाने, और नियमों से चिपके रहने के अलावा कुछ भी नहीं करते हैं। यदि वे सत्य को नहीं समझते हैं, तो वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं—और जो लोग सत्य-वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते, क्या उनके भीतर जीवन होता है? (नहीं।) जब जीवन-विहीन लोगों के साथ कुछ घटित होता है, तो वे आँखें बंद करके व्यवहार करते हैं, वे कभी भी ध्येय तक नहीं पहुँचते हैं, वे दयनीय और असहाय दिखते हैं, और वे हमेशा उलझन में रहते हैं। इन वर्षों में, मैंने लगातार लोगों को यह कहते सुना है कि जब उनके साथ कुछ होता है तो वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए। इतने सारे उपदेशों को सुनने के बाद भी उनके साथ ऐसा कैसे हो सकता है? और उन्हें देखने से पता चलता है कि वे वास्तव में उलझन में हैं; उनके पूरे चेहरे पर सुन्नता और मंदबुद्धि अंकित होती है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं भला सुन्न कैसे हूँ? दुनिया में जो कुछ चल रहा है, उसके प्रति मैं बहुत संवेदनशील हूँ: मुझे पता है कि सॉफ्टवेयर, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का उपयोग कैसे किया जाता है, और तुम लोग यह नहीं जानते हो। तुम्हारी क्षमता इतनी तुच्छ कैसे हो सकती है?" लेकिन उनकी यह थोड़ी—सी होशियारी मात्र एक कौशल है—यह क्षमता के रूप में नहीं गिनी जाती। जब वे कोई उपदेश सुनते हैं या उनके साथ कुछ ऐसा होता है जो सत्य से संबंधित होता है, तो ये लोग उजागर हो जाते हैं: अपनी आत्माओं में, वे भयानक रूप से सुन्न होते हैं। वे कितने सुन्न होते हैं? वे वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं, लेकिन वे अभी भी यह नहीं बता सकते हैं कि क्या वे बचाए जाएँगे, और न ही वे इस बारे में स्पष्ट होते हैं कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं। यदि तुम उनसे पूछो कि वे अपनी क्षमता के बारे में क्या सोचते हैं, तो वे कहेंगे, अच्छी क्षमता के किसी व्यक्ति से कुछ नीचे, लेकिन साधारण क्षमता के लोगों की तुलना में बहुत बेहतर। उनकी क्षमता इतनी निम्न होती है। क्या यह कुछ-कुछ मूर्खतापूर्ण नहीं है? चाहे यह कुछ भी हो, अगर किसी बात में सत्य या सिद्धांत शामिल हो, तो वे जो कुछ भी सुनते हैं, उसमें से कुछ भी नहीं समझते, और तुच्छ क्षमता यही होती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

यह समझना कि उच्च और तुच्छ क्षमता क्या होती हैं, और अपनी स्वयं की क्षमता और अपने प्रकृति-सार के बारे में स्पष्ट होना, स्वयं को जानने के लिए फायदेमंद होता है। जब लोग अपनी स्थिति को जानते हैं, तो वे कम गलतियाँ करेंगे। जब लोगों के पास खुद का मूल्यांकन होगा, तो वे घमंडी होना बंद कर देंगे, और उनका व्यवहार अधिक नैतिक और कर्तव्यनिष्ठ होगा। स्वयं को न जानने से बहुत परेशानी खड़ी हो सकती है। कुछ लोग साधारण क्षमता के होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे उच्च क्षमता के हैं। वे मानते हैं कि उनके पास नेतृत्व करने की प्रतिभा है; वे अंदर-ही-अंदर, एक अगुवा बनने, टीम की अगुवाई करने के लिए छटपटाते रहते हैं, लेकिन कोई भी उन्हें नहीं चुनता है। और क्या यह उन्हें बौखलाता नहीं है? जब लोग ऐसी बातों से बौखलाते हैं और खुद को अस्थिर महसूस करते हैं, तो वे अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से नहीं निभाते हैं, और वे ऐसे मूर्खतापूर्ण काम कर सकते हैं जो लज्जाजनक होते हैं, ऐसे अर्थहीन काम जो परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत होते हैं। इसलिए, और कुछ भी करने से पहले, उन्हें स्वयं को जान कर अपने भ्रष्ट स्वभावों के इन मूलभूत खुलासों को संबोधित करना चाहिए। इनमें अहंकारी, विवेकहीन होना और यह सोचते रहना शामिल है कि उनकी क्षमता अच्छी है, कि वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर हैं, कि उन्हें दूसरों को प्रशिक्षित करना चाहिए, इत्यादि। एक बार जब इन मुद्दों को हल कर लिया जाएगा, तो तुम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने में अडिग रहोगे, अपने व्यवहार में और ज़्यादा सही रहोगे, और ऊपरी आक्रामकता, दंभ, अकड़ और यह सोचते रहना कि तुम विशिष्ट हो, ऐसे विचार और व्यवहार तुम्हें परेशान नहीं करेंगे, और तुम कहीं अधिक परिपक्व हो चुके होगे। कम से कम, तुम्हारे पास एक संत का सम्मानजनक और ईमानदार तरीका होगा, और यही एकमात्र तरीका है जिससे तुम परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

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