101. क्या किसी के पास योग्यता है, यह पहचानने के सिद्धांत

(1) यह देखो कि कोई परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ पा रहा है, और क्या वह स्वयं अपनी स्थिति और व्यावहारिक समस्याओं के संयोजन के माध्यम से सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर पा रहा है, और क्या वह इस प्रकार अभ्यास के सिद्धांतों को प्राप्त कर लेता है;

(2) देखो कि क्या किसी का आत्म-ज्ञान व्यावहारिक, सच्चा और विशिष्ट है। तुच्छ योग्यता वाले केवल खोखले सिद्धांत की बात करेंगे, और वे वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते;

(3) देखो कि काम करने में कोई कितना सक्षम है। अच्छी योग्यता वाले लोग सत्य के आधार पर अभ्यास के सटीक सिद्धांतों को समझ सकते हैं और सभी तरह की समस्याओं को हल कर सकते हैं;

(4) देखो कि विवेक करने में कोई व्यक्ति कितना सक्षम है, क्या वह सत्य के सिद्धांत के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की पहचान कर सकता है, और क्या वह हर तरह की घटना और सामाजिक गतिशीलता के मर्म को देख सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

हम लोगों की क्षमता का मूल्यांकन कैसे करेंगे? उनकी क्षमता को मापने का सबसे सटीक तरीका यह है कि वे किस हद तक सत्य को समझते हैं। कुछ लोग बहुत जल्दी किसी विशेषज्ञता को सीख सकते हैं, लेकिन जब वे सत्य को सुनते हैं, तो वे उलझे-से हो जाते हैं और वे ऊँघने लगते हैं, यह उन्हें चकित कर देता है, वे जो कुछ भी सुनते हैं वह अंदर नहीं जाता है, और न ही वे समझते हैं कि वे क्या सुन रहे हैं—तुच्छ क्षमता यही होती है। कुछ लोगों को यदि तुम बताओ कि वे तुच्छ क्षमता के हैं तो वे असहमत होते हैं। उन्हें लगता है कि उनके पास उच्च शिक्षा और जानकारी होने का मतलब है कि वे अच्छी क्षमता के हैं। क्या एक अच्छी शिक्षा उच्च क्षमता को प्रदर्शित करती है? ऐसा नहीं होता। लोगों की क्षमता को इस बात के आधार पर मापा जाता है कि परमेश्वर के वचनों और सच्चाई को वे किस हद तक समझ सकते हैं। यह इसे करने का सबसे अधिक मानक, सबसे सटीक तरीका है। किसी अन्य माध्यम से किसी की क्षमता को मापने की कोशिश करने से कोई फ़ायदा नहीं है। कुछ लोग वाक्-चतुर और हाज़िरजवाब होते हैं, और वे वास्तव में दूसरों के साथ मेल-मिलाप करने में अच्छे होते हैं—लेकिन जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं और उपदेशों को सुनते हैं, तो वे कुछ भी नहीं समझते। जब वे अपने स्वयं के अनुभवों और गवाही की बात करते हैं, तो वे खुद को केवल अनुभवहीन के रूप में प्रकट करते हैं, और सभी लोग महसूस कर सकते हैं कि उन्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है। ये लोग अच्छी क्षमता वाले नहीं हैं। तो क्या ऐसे लोग परमेश्‍वर के घर के लिए किसी बाहरी मामले को संभालने में सक्षम होंगे? परमेश्वर के घर के लिए चीज़ों को संभालना—दूसरे शब्दों में, अपने कर्तव्य को निभाना: अपने कर्तव्य को निभाने में सच्चाई, परमेश्वर का कार्य, आचरण के सिद्धांत और वे तरीके और तरक़ीबें शामिल होती हैं जिनके द्वारा सभी प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार किया जाता है, और ये सभी मुद्दे इस बात पर निर्भर करते हैं कि किसी के कर्तव्य का निष्पादन प्रभावी और यथोचित है या नहीं। क्या किसी के कर्तव्य को पूरा करने के इन मुद्दों में, सच्चाई शामिल होती है? यदि वे मुद्दे सच्चाई को शामिल करते हैं, पर तुम सच्चाई को समझ नहीं पाते हो और तुम अपनी तुच्छ चालों और योजनाओं पर भरोसा कर रहे हो, तो क्या तुम इस कर्तव्य को ठीक से निभा पाओगे? क्या तुम इसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कर पाओगे? नहीं। हो सकता है, कोई व्यक्ति कुछ चीज़ों पर सही जा रहा हो, लेकिन ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि वे जो कर रहे हैं उसमें सच्चाई शामिल नहीं होती, और विशुद्ध रूप से यह एक बाहरी चीज़ होती है। यदि उन्हें सिद्धांत के अनुसार जाने और कुछ करने के लिए कहा जाता है, और एक अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न होती है, तो वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए; उन्हें लगता है कि उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर इसे संभालने में सक्षम होना चाहिए, लेकिन ऐसा करने से गड़बड़ी और रुकावट उत्पन्न होती है; यह बात चीज़ों को अस्त-व्यस्त कर देती है। क्या यहाँ कुछ गड़बड़ नहीं है? और इसका कारण क्या होता है? ऐसा इसलिए होता है कि उनकी समझ शुद्ध नहीं है, वे सच्चाई को नहीं समझते हैं, और उन्हें सिद्धांतों का बोध नहीं हुआ है। जब वे किसी ऐसी चीज़ का सामना करते हैं जिसमें सच्चाई या सिद्धांत शामिल हों, तो वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना है; उनके अपने इंसानी ख़याल प्रकट हो जाते हैं, और अंततः वे उस कार्य को, और परमेश्वर के घर के हितों को, नुकसान पहुँचाते और बदनाम हो जाते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

और अच्छी क्षमता के लोगों में क्या प्रकट होता है? परमेश्वर में उन्होंने चाहे कितने भी समय से विश्वास किया हो, जब वे एक उपदेश सुनते हैं, तो वे जिस उपदेश को आज सुन रहे हैं और बाइबल में जो कहा गया था, उनके बीच के अंतर को बता सकते हैं—यह उपदेश अधिक गहरा, अधिक विस्तृत है, और बाद में, वे इसे अपने वास्तविक जीवन में लागू करना शुरू कर देते हैं। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ईमानदार होने के लिए कहता है। शुरू में, वे इस नियम से चिपके रहने के अलावा और कुछ नहीं करते, जो कुछ भी उनके दिल में हो वे वही बताते हैं। लेकिन धीरे—धीरे, जैसे-जैसे वे उपदेशों को सुनते हैं, वे अपने स्वयं के वास्तविक जीवन के अनुभवों से लगातार चीज़ों का सार निकाला करते हैं, वे सच्चाई के इस पहलू—ईमानदार होने को—और उसकी वास्तविकता को, स्पष्ट कर लेते हैं। वे परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को और धर्मोपदेशों में संदर्भित की गईं सच्चाइयों को उनके वास्तविक जीवन में लागू करने में सक्षम होते हैं, और वे उन्हें अपनी हकीक़त बना लेते हैं, और खुद को धीरे-धीरे अधिक गहराई में ले जाने के लिए इन वास्तविक अनुभवों का उपयोग करते हैं। अर्थात, वे परमेश्वर के वचनों और उनके द्वारा सुने गए उपदेशों में निहित सत्य को महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं, और यह सत्य कोई खोखला सिद्धांत नहीं, कोई व्याख्या या परिकल्पना नहीं होता, बल्कि इसका संबंध उन कठिनाइयों से, जिनका सामना वे उनके वास्तविक जीवन में करते हैं, और उन स्थितियों से होता है जिन्हें वे प्रकट करते हैं। वे इन स्थितियों की जाँच करने में सक्षम होते हैं, उनकी तुलना परमेश्वर द्वारा उजागर की गई बातों से करते हैं, और फिर वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करते हैं। अच्छी क्षमता यह होती है। अच्छी क्षमता की मुख्य अभिव्यक्ति क्या है? जब वे उपदेश सुनते हैं, तो वे यह समझने में सक्षम होते हैं कि क्या कहा जा रहा है, और समझ सकते हैं कि इन वचनों और उनकी अपनी वास्तविक स्थितियों के बीच क्या संबंध है, ये वचन उनमें क्या भूमिका निभाते हैं, और वे खुद को इन वचनों के सामने ठहराने में सक्षम होते हैं। इसके अलावा, अपने वास्तविक जीवन में, वे अभ्यास के सिद्धांतों को समझने में, और इन सिद्धांतों को हर उस कठिनाई या मुद्दे पर लागू करने में, सक्षम होते हैं जिनका वे सामना करते हैं। अंतर्दृष्टि से युक्त होने का यही अर्थ होता है। केवल ऐसे अंतर्दृष्टि वाले लोग ही वास्तव में अच्छी क्षमता के होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

यह मापते समय कि किसी व्यक्ति की क्षमता अच्छी है या ख़राब, उनके दैनिक जीवन में हर चीज़ के प्रति उनके दृष्टिकोण को देखो—या, जब चीज़ें उनके साथ घटित होती हैं, तो क्या वे परमेश्वर की इच्छा और रवैये को, उन सिद्धांतों को जिनका उन्हें पालन करना चाहिए, उस स्थिति को जो उन्हें अपनानी चाहिए, और उस रवैये को जो उनके पास होना चाहिए, समझने में सक्षम हैं। यदि तुम इन सभी चीज़ों को समझने में सक्षम हो, तो तुम्हारे पास क्षमता है। यदि तुम जो समझते हो उसका, परमेश्वर तुम्हारे वास्तविक जीवन में तुम्हारे लिए जिसकी भी व्यवस्था करता है उससे, कोई सरोकार नहीं होता है, तो तुम्हारे पास या तो कोई क्षमता नहीं है या तुम तुच्छ क्षमता के हो। पतरस और अय्यूब का असली क़द कैसे आया था, और उन्होंने आख़िर परमेश्वर के प्रति उनकी आस्था में वो सब कैसे हासिल किया और पा लिया जो उन्होंने किया था? उनके पास वो सब सुविधा नहीं थी जो आज तुम लोगों के पास है; तुम्हारे पास तुम्हें प्रावधान देने के लिए, तुम्हें सहारा देने, और सहायता देने के लिए, तुम लोगों के पास तुम्हारे लिए अंतिम जाँच करने हेतु हमेशा कोई न कोई होता है। उनके द्वारा समझी गईं अधिकांश सच्चाइयाँ, उन्होंने जो महसूस किया, उन्होंने जिसका अनुभव किया, जिन्हें वे धीरे—धीरे समझ सके थे और जिनसे होकर वे अपने दैनिक जीवन में गुज़रे थे, उन सभी से प्राप्त की गईं थीं। उच्च क्षमता वाला होना यही होता है। जब लोगों के पास इस तरह की क्षमता नहीं होती, और उनके पास सत्य और उद्धार के प्रति यह रवैया नहीं होता है, तो वे सत्य को हासिल करने में असमर्थ होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

पतरस के पास उत्कृष्ट क्षमता थी, परन्तु उसकी परिस्थितियाँ पौलुस से भिन्न थीं : उसके माता-पिता ने मुझे सताया था, वे ऐसे दुष्टात्मा थे जो शैतान के अधीन थे, और इसी कारण उन्होंने पतरस को परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं सिखाया। पतरस बुद्धिमान, प्रतिभासम्पन्न था, बचपन से ही उसके माता-पिता उससे बहुत स्नेह करते थे। फिर भी, वयस्क होने पर, वह उनका शत्रु बन गया, क्योंकि उसने मेरे बारे में ज्ञान तलाशना कभी बंद नहीं किया, परिणामस्वरूप वह अपने माता-पिता से विमुख हो गया। यह इसलिए हुआ क्योंकि, सबसे ज़्यादा उसे यह विश्वास था कि स्वर्ग और पृथ्वी और सभी वस्तुएं सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और सभी सकारात्मक बातें परमेश्वर से आती हैं, शैतान द्वारा संसाधित हुए बिना उसी से सीधे तौर पर जारी होती हैं। उसके माता-पिता की प्रतिकूलता ने उसे मेरे कृपालु प्रेम एवं दया का और भी ज्ञान दिया, इस प्रकार उसके भीतर मुझे खोजने की इच्छा और तीव्र हो गयी। उसने न केवल मेरे वचनों को खाने और पीने पर ध्यान दिया, बल्कि मेरी इच्छा को समझने पर भी ध्यान दिया, और वह अपने हृदय में हमेशा सतर्क रहा। परिणामस्वरूप वह अपनी आत्मा में हमेशा संवेदनशील बना रहा और इस प्रकार वह अपने हर काम में मेरे हृदय के अनुकूल रहा। उसने खुद को आगे बढ़ने हेतु प्रेरित करने के लिए अतीत के लोगों की असफलताओं पर निरंतर ध्यान बनाए रखा, क्योंकि वह असफलता के जाल में फंसने से बुरी तरह डरता था। इसी प्रकार, उसने उन लोगों की आस्था और प्रेम को आत्मसात करने पर भी ध्यान दिया जो युगों से परमेश्वर से प्रेम करते आ रहे थे। इस प्रकार से न केवल नकारात्मक पहलू में, बल्कि और भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, सकारात्मक पहलू में उसने अधिक तेज़ी से विकास किया, कुछ इस तरह कि मेरी उपस्थिति में उसका ज्ञान सभी से बढ़कर हो गया। तो, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है कि किस प्रकार से उसने अपना सब कुछ मेरे हाथों में दे दिया, यहाँ तक कि उसने खाने-पीने, कपड़े पहनने, सोने और रहने के निर्णय भी मुझे सौंप दिये, और इनके बजाय मुझे सभी बातों में संतुष्टि प्रदान करने के आधार पर उसने मेरे उपहारों का आनन्द लिया। मैंने उसके अनगिनत परीक्षण लिए, स्वभाविक रूप से उन्होंने उसे अधमरा कर दिया, परन्तु इन सैकड़ों परीक्षणों के मध्य, उसने कभी भी मुझमें अपनी आस्था नहीं खोई या मुझसे मायूस नहीं हुआ। जब मैंने उससे कहा कि मैंने उसे त्याग दिया है, तो भी वह निराश नहीं हुआ और पहले के अभ्यास के सिद्धांतों के अनुसार एवं व्यावहारिक ढंग से मुझे प्रेम करना जारी रखा। जब मैंने उससे कहा कि भले ही वह मुझ से प्रेम करता है, तो भी मैं उसकी प्रशंसा नहीं करूँगा, अंत में मैं उसे शैतान के हाथों में दे दूँगा। लेकिन ऐसे परीक्षण जो उसकी देह ने नहीं भोगे, मगर जो वचनों के परीक्षण थे, उन परीक्षणों के मध्य भी उसने मुझसे प्रार्थना की और कहा : "हे परमेश्वर! स्वर्ग, पृथ्वी और सभी वस्तुओं के मध्य, क्या ऐसा कोई मनुष्य है, कोई प्राणी है, या कोई ऐसी वस्तु है जो तुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में न हो? जब तू मुझे अपनी दया दिखाता है, तब मेरा हृदय तेरी दया से बहुत आनन्दित होता है। जब तू मेरा न्याय करता है, तो भले ही मैं उसके अयोग्य रहूँ, फिर भी मैं तेरे कर्मों के अथाहपन की और अधिक समझ प्राप्त करता हूँ, क्योंकि तू अधिकार और बुद्धि से परिपूर्ण है। हालाँकि मेरा शरीर कष्ट सहता है, लेकिन मेरी आत्मा में चैन है। मैं तेरी बुद्धि और कर्मों की प्रशंसा कैसे न करूँ? यदि मैं तुझे जानने के बाद मर भी जाऊँ, तो भी मैं उसके लिए सहर्ष और प्रसन्नता से तैयार रहूँगा। हे सर्वशक्तिमान! क्या तू सचमुच नहीं चाहता है कि मैं तुझे देखूँ? क्या मैं सच में तेरे न्याय को प्राप्त करने के अयोग्य हूँ? कहीं मुझ में ऐसा कुछ तो नहीं जो तू नहीं देखना चाहता?" इस प्रकार के परीक्षणों के मध्य, भले ही पतरस मेरी इच्छा को सटीकता से समझने में असफल रहता था, लेकिन यह स्पष्ट था कि वह मेरे द्वारा उपयोग किए जाने के कारण खुद को बहुत गर्वान्वित और सम्मानित महसूस करता था (भले ही उसने मेरा न्याय इसलिए पाया ताकि मनुष्य मेरा प्रताप और क्रोध देख सके), और वह इन परीक्षणों के कारण बिल्कुल भी निरुत्साहित नहीं हुआ। मेरे समक्ष उसकी निष्ठा के कारण, और उस पर मेरे आशीषों के कारण, वह हज़ारों सालों के लिए मनुष्यों के लिए एक उदाहरण और आदर्श बना हुआ है। क्या तुम लोगों को उसकी इसी बात का अनुकरण नहीं करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 6' से उद्धृत

और साधारण क्षमता के लोगों में क्या प्रकट होता है? एक बार धर्मोपदेश सुनने से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जब उनके साथ कोई चीज़ घटित हो जाती है, तो वे तब भी नहीं जानते कि उसे कैसे संभालना है या क्या करना है। वे सिर्फ़ खोखले सिद्धांत की बात कर सकते हैं और नियमों से चिपके रह सकते हैं। एक उपदेश को दो बार सुनने से उन पर कुछ प्रभाव पड़ता है, लेकिन जब कोई बात उनके साथ हो जाती है, तो फिर भी उन्हें पता नहीं होता है कि उन्हें क्या करना है, वे अभी भी नियमों से चिपके रहते हैं, और वे कुछ पत्रों की बात करते हैं और लोगों को प्रवचन देने और अपना काम करने के लिए सिद्धांत का उपयोग करते हैं। कई वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद, वे खुद को अधिक से अधिक सिद्धांतों से लैस कर लेते हैं। इससे पहले तो वे कुछ अनुभवों और ज्ञान के बारे में सिद्धांत पर आधारित रहकर केवल दो या तीन मिनट के लिए बोला करते थे, और फिर उनके पास कहने को कुछ नहीं होता था। जैसे-जैसे साल बढ़ते जाते हैं, वे बीस या तीस मिनट तक बोल सकते हैं—लेकिन वे फिर भी नहीं समझ पाते कि सत्य क्या है, या वास्तविकता क्या होती है। उन्हें लगता है कि वे जिस सिद्धांत को बताते हैं, वही सत्य है। वे दूसरों से वास्तविकता के बारे में, या अनुभवों, ज्ञान और सत्य-वास्तविकता से जुड़े मार्ग के बारे में कोई भी बात नहीं सुनते हैं; वे सोचते हैं कि सत्य और सिद्धांत एक ही होते हैं। यानी, वे चाहे कितने भी उपदेश सुन लें, उन्हें उन प्रवचनों से अपने स्वयं के स्वभाव में परिवर्तनों से या अपने प्रकृति-सार से जुड़ी सच्चाइयों के बारे में कोई अहसास नहीं होता है। उसके बाद, अपने वास्तविक जीवन में, नियमों और समारोह से चिपके रहने, तथा लगातार सभाओं में जाने, लोगों से सिद्धांत पर बातें करने और कुछ हद तक अपने कर्तव्य के पालन में मेहनत करने से परे, आम तौर पर वे स्वभाव में परिवर्तनों से, अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभावों को जानने से, और जीवन में प्रवेश करने से, जुड़ी हुई सच्चाइयों में न तो प्रवेश करते हैं, और न ही इनकी गहराई में जाते हैं। यह साधारण क्षमता के होने का एक उदाहरण है। साधारण क्षमता के लोग इससे आगे नहीं जा सकते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो बीस या तीस वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं, और वे अभी भी केवल सिद्धांत की बात करते हैं। औसत क्षमता का होना यही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

तुच्छ क्षमता वाले लोगों में क्या प्रकट होता है? वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद, उन्हें लगता है कि यह सब एक जैसा ही है, वही पुरानी बातें हैं। वे सिद्धांत को भी लेशमात्र सुन नहीं सकते हैं, सत्य की बात तो छोड़ ही दो। उपदेश सुनते समय चाहे वे कितनी भी कोशिश करें, या कितने ही वर्षों तक उपदेश सुनते रहें, वे फिर भी यही नहीं समझ पाते कि वे क्या सुन रहे हैं; वे यह नहीं जान सकते कि सच्चाई क्या है और खुद को जानने का मतलब क्या होता है। चाहे वे ताज़ा सामग्री, गहन सामग्री, या पवित्र आत्मा के नए वचनों और कार्य के बारे में सुन रहे हों, वे सामान्य-सी बात ही सुन (समझ) पाते हैं। वे याद भी उतना ही रख सकते हैं, उससे अधिक वे याद नहीं रख सकते। और चूँकि उनकी क्षमता ऐसी है कि वे इतनी सारी चीज़ों को समझने में असमर्थ होते हैं, तो फिर सत्य-वास्तविकता को हासिल करने में वे कितने सक्षम हो सकते हैं? इस कारण से, वे अक्सर उसे दोहराते हैं जो धार्मिक लोग कहा करते हैं: "जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था तब से मैं परमेश्वर में विश्वास करता रहा हूँ, मैं बहुत पहले बपतिस्मा और शोधन प्राप्त कर चुका हूँ।" यही बात वो लोग भी कहते हैं जिन्होंने कुछ ही वर्षों के लिए परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार किया है। क्या वे तुच्छ क्षमता के नहीं हैं? दूसरे लोग कहते हैं, "तुम कहते हो कि मैं स्वयं को नहीं जानता—यह तो तुम्हीं लोग हो जो स्वयं को नहीं जानते हो। मैं लंबे समय से पवित्र हूँ।" कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसे शब्द कहने वाले लोग सबसे तुच्छ क्षमता के होते हैं। तुम ऐसे लोगों को क्या उपदेश दे सकते हो? चाहे वे कितने भी उपदेश सुनें, उन्हें फिर भी समझ नहीं आता है कि सत्य क्या है, सत्य का अभ्यास क्या होता है—वे इन बातों को समझ नहीं सकते, ये बातें उनसे परे होती हैं। जब उनके साथ कोई बात घटित हो जाती हैं, तो वे उन थोड़े से नियमों से चिपके रहते हैं, वे प्रार्थना करते हैं, वे परमेश्वर की तलाश करते हैं, वे परमेश्वर पर निर्भर करते हैं, वे परमेश्वर को अस्वीकार नहीं करते हैं, वे अविश्वासियों के साथ घुलते-मिलते नहीं हैं, और वे स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दुनिया से अलग करते हैं—मूल रूप से, वे धार्मिक आस्था की इन औपचारिकताओं से आगे नहीं जाते हैं। चाहे वे परमेश्वर के वचनों और कार्य के बारे में कितना भी सुनें, और चाहे वे सत्य के बारे में कितने भी उपदेश सुनें, वे उन्हें अपना नहीं सकते। यदि तुम उनसे पूछो कि परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान मनुष्य से क्या अपेक्षित है, तो वे तुम्हें नहीं बता सकते हैं, और वे केवल कुछ सरल सिद्धांत की बात कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि उनकी क्षमता में बहुत कमी है; वे परमेश्वर के वचनों को समझ नहीं सकते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

जब उनके साथ कुछ होता है, तो वे किसी बाहरी घटना को दोष देते हैं, या इसे अपने स्वयं के व्यवहार से जोड़ लेते हैं, यह मानते हुए कि बस उनसे ग़लती हो गई है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। किसी भी बिंदु पर वे यह नहीं समझते कि उन्हें सच्चाई की तलाश करनी चाहिए और स्वयं को जानना चाहिए। चाहे उनके क्या दोष हैं इसे इंगित किया जाए, चाहे उनके भीतर की कोई भी बात उनसे उजागर की जाए, या उनके साथ संगति की जाए, वे अभी भी नहीं पहचान पाते हैं कि उन्होंने किस सत्य-सिद्धांत का उल्लंघन किया है और उन्हें किस सच्चाई का अभ्यास करना चाहिए—वे सत्य को समझने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। तुच्छ क्षमता यही होती है। चाहे तुम सच्चाई पर कितनी भी स्पष्ट संगति करो, फिर भी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि यही सच्चाई है, वे अभी भी सच्चाई को ढ़कने के लिए अपने स्वयं के कारणों और बहानों का इस्तेमाल करते हैं, वे सच्चाई से इन्कार करते हैं, और इस बात से भी इन्कार करते हैं कि उनके पास एक भ्रष्ट स्वभाव है। इसका मतलब है, चाहे वे कितनी भी गलतियाँ करें, वे कितनी ही भ्रष्टताओं को प्रकट करें, या इन भ्रष्ट स्वभावों के साथ जुड़ी हुईं कितनी भी स्थितियों को बनाएँ, वे अभी भी यह नहीं समझते हैं कि यह उनका भ्रष्ट स्वभाव है, उन्हें एहसास नहीं है कि उनका सार क्या है, और न ही उन्हें यह एहसास है कि उन्हें इस मुद्दे को कैसे समझना चाहिए, उन्हें सच्चाई की तलाश कैसे करनी चाहिए, और उन्हें सच्चाई का कौन-सा पहलू हासिल करना चाहिए। उन्हें नहीं पता कि उन्हें सच्चाई के किस पहलू को पाना है, और उनकी आत्मा में एक सुन्नता होती है, और उन्हें इन चीज़ों की थोड़ी-सी भी सुध नहीं होती है। तुच्छ क्षमता यही होती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

क्या तुम लोग कहोगे कि पौलुस में क्षमता थी? पौलुस की क्षमता किस श्रेणी की थी? (यह बहुत अच्छी थी।) तुम लोगों ने बहुत सारे उपदेश सुने हैं, लेकिन फिर भी तुम इसका भेद नहीं बता सकते हो। क्या पौलुस की क्षमता को अच्छा माना जा सकता है? (नहीं, यह ख़राब थी।) पौलुस की क्षमता ख़राब क्यों थी? (वह खुद को नहीं जानता था और परमेश्वर के वचनों की बहुत कम समझ रखता था)। यह इसलिए था क्योंकि वह सच्चाई को नहीं समझता था। उस समय, उसने भी प्रभु यीशु द्वारा दिए गए उपदेशों को सुना था, और उस अवधि के दौरान जब उसने काम किया, निश्चित रूप से, पवित्र आत्मा का कार्य (भी) था। तो कैसे, जब उसने वो सब काम किया, उन सभी धर्मपत्रों को लिखा, और वह उन सभी कलीसियाओं से होकर गुज़रा, तो वह फिर भी सत्य को ज़रा भी नहीं समझता था? उसने जो कुछ भी बोला वह सिद्धांत था। ऐसा व्यक्ति तुच्छ क्षमता का होता है। उससे भी अधिक, पौलुस ने प्रभु यीशु और उसके शिष्यों को सताया, जिसके बाद प्रभु यीशु ने उसके सामने खुद को प्रकट किया और उसको गिरा दिया। फिर भी इस तरह की एक महत्वपूर्ण घटना से गुज़रने के बाद, उसने इसे किस दृष्टिकोण से लिया और इसे कैसे समझा? उसने सोचा, "प्रभु यीशु ने मुझे गिराया है, मैंने पाप किया है, इसलिए मुझे इसकी भरपाई करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए, और एक बार जब मेरे गुणों ने मेरे अवगुणों को संतुलित कर लिया होगा, तो मुझे पुरस्कृत किया जाएगा।" क्या वह खुद को जानता था? वह नहीं जानता था। उसने यह नहीं कहा कि प्रभु यीशु के प्रति उसका विरोध उसके दुर्भावनापूर्ण स्वभाव के कारण था, एक मसीह-विरोधी जैसी उसकी प्रकृति के कारण; उसके पास खुद का ऐसा ज्ञान नहीं था। और इस घटना को उसने अपने धर्मपत्रों में कैसे लिपिबद्ध किया? उसका क्या नज़रिया था? उसका मानना था कि परमेश्वर उसके सामने एक महान प्रकाश के साथ प्रकट हुआ था, और यह कि परमेश्वर उसका बड़ा उपयोग करना शुरू करेगा। खुद का थोड़ा-सा भी ज्ञान न होने के कारण, उसका मानना था कि यह सबसे शक्तिशाली प्रमाण था कि उसे पुरस्कृत किया जाएगा और ताज पहनाया जाएगा, साथ ही यह सबसे बड़ी पूँजी थी जिसका उपयोग वह पुरस्कारों और ताज को हासिल करने के लिए कर सकता था। इसके अलावा, उसने महसूस किया कि उसके भीतर गहराई में कोई "कांटा" था: प्रभु यीशु के प्रति उसकी पिछली अवज्ञा। और उसने इसके प्रति कैसा रुख़ लिया? उसने महसूस किया कि यह उसके जीवन की सबसे बड़ी गलतियों में से एक थी, और इसने उसके स्वर्ग में जाने को और ताज पहनाये जाने को जोखिम में डाल दिया था। अपने दिल में, वह हमेशा इसके बारे में असहज महसूस करता था। "मैं कैसे इस गंभीर गलती की क्षतिपूर्ति कर सकता हूँ? मैं इसे कैसे रद्द कर सकता हूँ, जिससे यह, मुझे ताज पहनाए जाने की संभावनाओं को, प्रभावित न करे? मुझे प्रभु के कार्य को अधिक से अधिक करना चाहिए, अधिक क़ीमत चुकानी चाहिए, और अधिक धर्मपत्रों को लिखना चाहिए, और शैतान से जूझने और सुंदर गवाही देने में अधिक समय बिताना चाहिए।" उसने इसके प्रति इस तरह का रुख़ अपनाया। उसे ज़रा-सा भी अफ़सोस नहीं था, खुद का ज्ञान तो उसे और भी कम था; उसके पास इन दोनों में से कुछ भी नहीं था। पौलुस की क्षमता ऐसी थी। आंशिक रूप से उसकी मानवता और उसने जिसका अनुसरण किया उसके कारण, और आंशिक रूप से उसकी क्षमता के कारण, वह इन चीज़ों को समझ नहीं सका, और न ही उसने महसूस किया, "यह मनुष्य की प्रकृति है, मनुष्य की प्रकृति बहुत बुरी होती है, बहुत ही बुरी। मनुष्य की प्रकृति शैतान और मसीह-विरोधी की प्रकृति होती है, और मनुष्य को परमेश्वर से छुटकारा प्राप्त करना चाहिए; यह बात मनुष्य के लिए परमेश्वर के छुटकारे की आवश्यकता की जड़ होती है। तो मनुष्य को अपने छुटकारे को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने कैसे आना चाहिए?" उसने कभी ऐसी बातें नहीं कहीं। उसे अपने विद्रोह का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था, और वह केवल इतना ही सोचता था कि इसे कैसे रद्द किया जाए, कैसे इसे अपराध बनने से रोका जाए, कैसे अपने पापों को भुनाने के लिए पर्याप्त योग्यता अर्जित की जाए और अच्छी सेवा के द्वारा अपने कुकर्मों का प्रायश्चित किया जाए, और अंत में वह ताज और इनाम प्राप्त किया जाए जिसकी उसे आशा थी। उसने कभी भी अपने साथ हुई किसी भी चीज़ से सत्य को या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझा, ऐसा व्यक्ति सबसे तुच्छ क्षमता वाला होता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

सब लोग भिन्न होते हैं। उनका आपसी अंतर उनकी क्षमता और सत्य के प्रति उनके दृष्टिकोण में निहित होता है। जो लोग सच्चाई से प्रेम करते हैं और अच्छी क्षमता के होते हैं, वे जल्दी से सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हैं और जीवन पाने में सक्षम हो जाते हैं। साधारण क्षमता के लोग अड़ियल और सुन्न होते हैं; सत्य में उनका प्रवेश धीमा होता है, और उनके जीवन में प्रगति भी धीमी होती है। तुच्छ क्षमता वाले लोग केवल अज्ञानी, जिद्दी और अभिमानी नहीं होते; उनके पूरे चेहरे पर सुन्नता और मंदबुद्धि अंकित होती है, उनकी आत्माएँ सुन्न होती हैं, और वे सच्चाई को समझने में धीमे होते हैं। ऐसे लोग जीवन से रहित होते हैं, क्योंकि वे सच्चाई को नहीं समझते हैं, और सिद्धांत की बातें करने, नारे लगाने, और नियमों से चिपकने के अलावा कुछ भी नहीं करते हैं। यदि वे सत्य को नहीं समझते हैं, तो वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं—और जो लोग सत्य-वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते, क्या उनके भीतर जीवन होता है? (नहीं)। जब जीवन-विहीन लोगों के साथ चीज़ें घटित होती हैं, तो वे आँखें बंद करके काम करते हैं, वे कभी भी ध्येय तक नहीं पहुँचते हैं, वे खुद को दयनीय और असहाय दिखाते हैं, और वे हमेशा उलझन में रहते हैं। इन वर्षों में, मैंने लगातार लोगों को यह कहते सुना है कि जब उनके साथ कुछ होता है तो वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए। इतने सारे उपदेशों को सुनने के बाद भी उनके साथ ऐसा कैसे हो सकता है? और उन्हें देखने से पता चलता है कि वे वास्तव में उलझन में हैं; उनके पूरे चेहरे पर सुन्नता और मंदबुद्धि अंकित होती है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं सुन्न कैसे हूँ? दुनिया में जो चल रहा है, उसके प्रति मैं बहुत संवेदनशील हूँ: मुझे पता है कि सॉफ्टवेयर, मोबाइल फ़ोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का उपयोग कैसे किया जाता है, और तुम लोग यह नहीं जानते हो। तुम्हारी क्षमता इतनी तुच्छ कैसे हो सकती है?" लेकिन उनकी वो थोड़ी—सी चतुराई मात्र एक कौशल है—यह क्षमता के रूप में नहीं गिनी जाती है। जब वे एक उपदेश सुनते हैं या उनके साथ कुछ ऐसा होता है जो सत्य से संबंधित होता है, तो ये लोग उजागर हो जाते हैं: उनकी आत्माओं में, वे भयानक रूप से सुन्न होते हैं। वे कितने सुन्न होते हैं? वे वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं, लेकिन वे अभी भी यह नहीं बता सकते हैं कि क्या वे बचाए जाएँगे, और न ही वे इस बारे में स्पष्ट होते हैं कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं। यदि तुम उनसे पूछो कि वे अपनी क्षमता के बारे में क्या सोचते हैं, तो वे कहेंगे, अच्छी क्षमता के किसी व्यक्ति से कुछ नीचे, लेकिन साधारण क्षमता के लोगों की तुलना में बहुत बेहतर। उनकी क्षमता इतनी घटिया होती है। क्या यह कुछ मूर्खतापूर्ण नहीं है? चाहे यह कुछ भी हो, अगर किसी बात में सच्चाई या सिद्धांत शामिल हो, तो वे जो कुछ भी सुनते हैं, उसमें से कुछ भी नहीं समझते, और तुच्छ क्षमता यही होती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

बात चाहे सत्य के किसी एक पहलू को समझने की हो या किसी पेशे को सीखने की, अच्छी क्षमता वाले लोग अन्तर्निहित सिद्धांतों को समझने में, चीज़ों की जड़ तक पहुँचने में, और वास्तविकता और सार की पहचान करने में, सक्षम होते हैं, जिसकी वजह से वे हर चीज़ में, हर उस काम में जिसमें वे लगे हुए हैं, सही निर्णय लेते हैं, और सही मानकों और सिद्धांतों को निर्धारित करते हैं। अच्छी क्षमता यह होती है। अच्छी क्षमता वाले लोग परमेश्वर के घर के विभिन्न कार्यों पर अंतिम जाँच करने में सक्षम होते हैं। साधारण या तुच्छ क्षमता वाले लोग ऐसे काम करने में असमर्थ होते हैं। यह किसी भी तरह से परमेश्वर के घर के द्वारा कुछ लोगों का पक्ष लेना या कुछ लोगों को छोटा समझना नहीं है—बात केवल इतनी है कि बहुत से लोग अपनी (तुच्छ) क्षमता के कारण इस काम को करने में असमर्थ होते हैं। और अंतिम जाँच करने में उनके असमर्थ होने का मूल कारण यह होता है कि वे सत्य को नहीं समझते हैं। उनके द्वारा सत्य को न समझने का कारण यह होता है कि उनकी क्षमता बहुत साधारण, यहाँ तक कि तुच्छ, होती है; सत्य उनसे परे होता है, और जब वे सत्य को सुनते हैं तो वे इसे समझने में असमर्थ होते हैं। कुछ लोग सत्य को इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि वे ध्यान से नहीं सुनते हैं, या यह हो सकता है कि वे अभी युवा हैं और उन्होंने अभी तक परमेश्वर में अपने विश्वास की जड़ें नहीं बनाईं हैं, और यह उनके लिए कोई बड़ी दिलचस्पी की बात नहीं होती है। लेकिन ये मुख्य कारण नहीं होते हैं; मुख्य कारण तो यह होता है कि उनकी क्षमता कार्य के बराबर नहीं होती। तुच्छ क्षमता के लोगों के लिए, चाहे उनका कर्तव्य जो भी हो, या वे कितने ही समय से काम करते रहे हों, चाहे तुम किसी भी तरह से उन्हें सिखाने की कोशिश करो, या चाहे वे कितने ही उपदेश सुनें, वे अभी भी इसकी समझ प्राप्त नहीं कर सकते हैं, वे अपने काम को बढ़ा देते हैं, सब कुछ बिल्कुल गड़बड़ कर देते हैं, और कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

यह समझना कि उच्च और तुच्छ क्षमता क्या होती हैं, और अपनी स्वयं की क्षमता और अपने ही प्रकृति-सार के बारे में स्पष्ट होना, स्वयं को जानने के लिए फ़ायदेमंद होता है। जब लोग अपनी स्थिति को जानते हैं, तो वे कम ग़लतियाँ करेंगे। जब लोगों के पास खुद का मूल्यांकन होगा, तो वे घमंडी होना बंद कर देंगे, और उनका व्यवहार अधिक कर्तव्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण होगा। स्वयं को न जानने से बहुत परेशानी खड़ी हो सकती है। कुछ लोग हैं जो साधारण क्षमता के होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे उच्च क्षमता के हैं। वे मानते हैं कि उनके पास नेतृत्व करने की प्रतिभा है; अंदर से, वे एक अगुवा बनने, टीम की अगुवाई करने के लिए छटपटाते रहते हैं, लेकिन कोई भी उन्हें नहीं चुनता है। और क्या यह उन्हें उत्तेजित नहीं करता है? जब लोग ऐसी चीज़ों से उत्तेजित होते हैं और वे खुद को अस्थिर महसूस करते हैं, तो वे अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से नहीं निभाते हैं, और वे उन मूर्खतापूर्ण चीज़ों को कर सकते हैं जो शर्मजनक होती हैं, उन अर्थहीन चीज़ों को जो परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत होती हैं। इसलिए, और कुछ भी करने से पहले, उन्हें स्वयं को जानने के द्वारा अपने भ्रष्ट स्वभावों के इन मूलभूत खुलासों को संबोधित करना चाहिए। इनमें अभिमानी, असंवेदनशील होना शामिल है, जिसमें लोग हमेशा यह सोचते हैं कि उनकी क्षमता ऊँची है, कि वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर हैं, कि उन्हें दूसरों को प्रशिक्षित करना चाहिए, इत्यादि। एक बार जब इन मुद्दों को हल कर लिया जाता है, तो तुम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने में दृढ़ हो जाओगे, व्यवहार में अधिक उचित रहोगे, और बाहरी आक्रामकता, अभिमान, दंभ, और यह सोचना कि तुम विशेष हो, जैसे विचार और व्यवहार तुम्हें परेशान नहीं करेंगे, और तुम अधिक परिपक्व हो गए होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

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