115. अविश्वासियों की पहचान करने के सिद्धांत

(1) जो कोई भी लगातार देहधारण, परमेश्वर के वचनों, और परमेश्वर के कार्य के प्रति संदेह का रवैया रखता है, और जिसका परमेश्वर में विश्वास केवल धारणाओं और कल्पनाओं पर निर्भर करता है, एक अविश्वासी है;

(2) जो कोई परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ता है, उपदेशों और सहभागिता को नहीं सुनता है, और अपने कर्तव्य को स्वेच्छा से नहीं करता है, बल्कि लगातार शिकायत करता है, और नकारात्मकता फैलाता है, एक अविश्वासी है;

(3) जो किसी मुद्दे का सामना करने पर न तो सत्य की तलाश करता है और न ही उसे स्वीकार करता है, बल्कि हमेशा मामलों और लोगों में घुसने की कोशिश करता है, और जो कठोरता से नियमों का पालन करता है, एक अविश्वासी है;

(4) जो कोई न्याय और ताड़ना को, काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार नहीं करता है, और न तो परमेश्वर के प्रति श्रद्धापूर्ण दिल रखता है और न ही उसके प्रति ज़रा भी समर्पण करता है, एक अविश्वासी है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में विश्वास रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसका आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो यह मायने नहीं रखता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसका आज्ञापालन किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और गैर-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

कुछ लोगों के विश्वास को परमेश्वर के हृदय ने कभी स्वीकार नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता। क्योंकि ये लोग, भले ही कितने ही वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण करते रहे हों, लेकिन इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं; वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धांतों और कार्य करने के तौर-तरीकों, और ज़िन्दा रहने के उनके नियमों एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचन को कभी अपना जीवन नहीं माना, कभी नहीं माना कि परमेश्वर का वचन सत्य है, कभी परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया, और परमेश्वर को कभी अपना परमेश्वर नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को एक किस्म का शगल मानते हैं, परमेश्वर को महज एक आध्यात्मिक सहारा समझते हैं, इसलिए वे नहीं मानते कि परमेश्वर का स्वभाव, या उसका सार इस लायक है कि उसे समझने की कोशिश की जाए। कहा जा सकता है कि वह सब जो सच्चे परमेश्वर से संबद्ध है उसका इन लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; उनकी कोई रुचि नहीं है, और न ही वे ध्यान देने की परवाह करते हैं। क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है : "परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है।" वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; ऐसा करना अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे मानते हैं कि कोई वास्तविक कदम उठाए बिना अथवा किसी भी वास्तविक कार्यकलाप में स्वयं को लगाए बिना, सिर्फ शब्दों में परमेश्वर को स्वीकार करके, वे बहुत चालाक बन रहे हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं : "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपना कर्तव्य निभा सकते हैं? क्या वे ये शब्द कह सकते हैं : 'मैं परमेश्वर के लिए जिऊँगा'?" लोग प्रायः जो देखते हैं वह लोगों का सतही प्रदर्शन होता है; वे लोगों का सार नहीं देखते। लेकिन परमेश्वर इन सतही प्रदर्शनों को नहीं देखता; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इसलिए, इन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति और परिभाषा ऐसी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

आजकल लोग अभी भी देह की चीज़ें छोड़ने में असमर्थ हैं; वे देह के सुख नहीं छोड़ सकते, न वे संसार, धन और अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ पाते हैं। अधिकांश लोग अपनी कोशिशें बेपरवाही से करते हैं। वास्तव में इन लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं; इससे भी बुरा यह है कि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं है और इसलिए वे वह सब नहीं समझ पाते, जो परमेश्वर करता है और वे उसके द्वारा कहे गए वचनों पर विश्वास करने में तो और भी असमर्थ हैं। ऐसे लोग अत्यधिक देह में रमे होते हैं, वे आकंठ भ्रष्ट होते हैं और उनमें पूरी तरह सत्य का अभाव होता है। और तो और, उन्हें विश्वास नहीं कि परमेश्वर देहधारी हो सकता है। जो कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता—अर्थात, जो कोई प्रत्यक्ष परमेश्वर या उसके कार्य और वचनों पर विश्वास नहीं करता और इसके बजाय स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—वह व्यक्ति है, जिसके हृदय में परमेश्वर नहीं है। ये लोग विद्रोही हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। इन लोगों में मानवता और तर्क का अभाव होता है, सत्य के बारे में तो कहना ही क्या। इसके अतिरिक्त, इन लोगों के लिए, प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर तो और भी विश्वास के योग्य नहीं है, फिर भी वे अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर को सर्वाधिक विश्वसनीय और खुशी देने वाला मानते हैं। वे जिसे खोजते हैं, वह वास्तविक सत्य नहीं है, न ही वह जीवन का वास्तविक सार है; परमेश्वर की इच्छा तो और भी नहीं। इसके उलट वे रोमांच खोजते हैं। जो भी वस्तुएं उन्हें अधिक से अधिक उनकी इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम बनाती हैं, बिना शक वे वो वस्तुएँ हैं जिनमें उनका विश्वास है और जिसका वे अनुसरण करते हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं ताकि निजी इच्छाएं पूरी कर पाएं, सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ऐसे लोग बुराई करने वाले नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

कुछ लोग सत्य में आनंदित नहीं होते, न्याय में तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग शक्ति के खोजी कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। हालंकि उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे आधा विश्वास करते हैं; और वे अपने दिलो-दिमाग को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं, वे मुख से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और वे मसीह की ओर दूसरी नजर भी नहीं डालते। उनके हृदय प्रसिद्धि, वैभव और महिमा पर ही टिक गए हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा मामूली व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाबना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ लोग परमेश्वर के द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वास करने से अधिक, वे बेहूदे जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते है और केवल बड़े समूहों और सम्प्रदायों को सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करता है; वे तो बस ऐसे गद्दार हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की प्रशंसा करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन व्यभिचारियों से प्रेम करते हो जो संसार की कीचड़ में लोट लगाते हैं। तुम मसीह की पीड़ा पर हँसते हो, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हो जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और अय्याशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, परन्तु उन धृष्ट मसीह-विरोधियों की बाँहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालाँकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अब भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत की ओर, उनके प्रभाव की ओर मुड़ता है। फिर भी तुम ऐसा रवैया बनाये रखते हो जहाँ तुम मसीह के कार्य को गले से उतारना कठिन पाते हो और उसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और चारा नहीं था। तुम्हारे हृदय में हमेशा बुलंद छवियों का स्थान रहा है; तुम न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हो। तुम सबके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह उत्कृष्ट तो बिल्कुल नहीं है।

बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य का सम्मान नहीं करते हैं वे सभी अविश्वासी और सत्य के प्रति गद्दार हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

सबसे ऊपर, परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर इस तथ्य को तुम्हें समझ लेना चाहिए: परमेश्वर में आस्था का अर्थ मात्र परमेश्वर के नाम में विश्वास होना नहीं है, यह तुम्हारी कल्पना के अज्ञात परमेश्वर में आस्था होना तो बिल्कुल नहीं है। इसके बजाय, तुम्हें विश्वास होना चाहिए कि परमेश्वर असली है, तुम्हें परमेश्वर के सार में, उसके स्वभाव और जो वह स्वयं है, इसमें विश्वास होना चाहिए; तुम्हें इस सच्चाई में विश्वास होना चाहिए कि इंसान की नियति पर परमेश्वर का ही शासन है और यह कि तुम्हारी नियति पर भी उसी का शासन है। तो आस्था किसे कहते हैं? क्या इसका एक पक्ष ऐसा नहीं है जिससे लोगों को इसमें सचमुच सहयोग करना चाहिए और इसे अभ्यास में लाना चाहिए? उदाहरण के तौर पर, कुछ लोग उन पर आई परेशानी से बेचैन हो जाते हैं, जिससे उनके अंदर मामूली सी आध्यात्मिक हलचल मच जाती है और वे सोचने लगते हैं, "मेरी इस परेशानी के लिए फलां-फलां व्यक्ति जिम्मेदार है। यदि वह मीनमेख न निकालता, तो इतनी शर्मिंदगी न उठानी पड़ती।" ऐसे लोग बहाने ढूँढते हैं और आखिरकार किसी न किसी पर दोष मढ़ देते हैं, इससे उन्हें बड़ी आसानी हो जाती है और उन्हें लगता है कि उनकी परेशानी दूर हो गई है, समस्या खत्म हो गई। समस्या को सुलझाने के इस तरीके पर तुम्हारा क्या ख्याल है? क्या कोई इस तरीके से अभ्यास करके सत्य पा सकता है? क्या यह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारितापूर्ण प्रवृत्ति को दिखाता है? ऐसे लोग किस दृष्टिकोण और किस तरीके से परमेश्वर में आस्था रखते हैं? क्या उन्होंने परमेश्वर के इन वचनों को अपने दैनिक जीवन में उतारा है "इंसान की नियति पर परमेश्वर का राज है, हर चीज़ और घटना उसी के हाथों में है"? जब वे किसी समस्या का विश्लेषण करने के लिए इंसानी दिमाग का इस्तेमाल करते हैं, जब वे किसी मामले को संबोधित करने के लिए इंसानी तरीकों का उपयोग करते हैं, तो क्या वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास कर रहे हैं, क्या वे इंसान की व्यवस्था पर, मामलों और चीज़ों पर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित हो रहे हैं? (नहीं।) पहली बात तो ये, वे लोग समर्पण नहीं करते; दूसरा, वे और भी भयंकर भूल करते हैं: वे लोग परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित स्थिति, लोग, मामले और चीज़ों को स्वीकार नहीं पाते; वे गहराई में नहीं जाते। वे लोग केवल इतना ही देखते हैं कि बाहर से स्थिति कैसी दिखती है, पहले वे अपने इंसानी दिमाग से उसका विश्लेषण करते हैं और उसे इंसानी तरीकों से सुलझाने का प्रयास करते हैं। क्या यह भयंकर भूल नहीं है? (बिल्कुल है।) ऐसा कैसे है? वे लोग इस बात में विश्वास नहीं करते कि हर चीज़ पर परमेश्वर का शासन है। उनका सोचना है, "हर चीज़ पर परमेश्वर का शासन है? क्या परमेश्वर इतनी सारी चीज़ों पर शासन कर सकता है? यह सिद्धांतों को आँख बंद करके लागू करना है। मेरे साथ जो हुआ वह अलग बात है, वह एक अपवाद है!" यह अपवाद है, वह अपवाद है। उनकी नज़र में हर चीज़ अपवाद है; किसी भी चीज़ पर परमेश्वर का शासन नहीं है, हर चीज़ इंसान से पैदा हुई है। क्या यह परमेश्वर में आस्था है? क्या इससे परमेश्वर में आस्था का सार परिलक्षित होता है? वे लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर हर चीज़ पर शासन कर सकता है या परमेश्वर सभी चीज़ों, घटनाओं और स्थितियों की व्यवस्था कर सकता है। वे लोग परमेश्वर से इन चीज़ों को स्वीकार नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि ये सभी स्थितियाँ बस यूँ ही घट जाती हैं, कि ये परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित नहीं की जातीं बल्कि इन्हें इंसान ही करता है। तो उनकी आस्था का सार क्या है? वे लोग गैर-विश्वासी हैं! अविश्वासियों का दृष्टिकोण परमेश्वर की किसी भी बात को कभी भी स्वीकार नहीं करना होता है, बल्कि किसी भी समस्या से निपटने के लिए इंसानी नज़रिए से सोचना, दिमाग लगाना और खूब माथा-पच्ची करना होता है। एक अविश्वासी यही करता है। जब कभी भविष्य में तुम इस तरह के व्यक्ति से टकराओ, तो तुम्हें उसके बारे में थोड़ी-बहुत समझ विकसित कर लेनी चाहिए। अविश्वासी लोग किसी भी मुद्दे का सामना करते समय, खूब माथा-पच्ची करते हैं; जो मामला उनके सामने होता है, वे निरंतर उसका अध्ययन करते हैं और मानवीय तरीकों से हल करने का प्रयास करते हैं, उन्हें बहस करने में मज़ा आता है और वे शैतान के सिद्धांतों या व्यवस्था के अनुसार चलते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मानते, इस बात को तो बिल्कुल भी नहीं मानते कि परमेश्वर हर चीज़ पर शासन करता है या परमेश्वर ही हर कार्य करता है। उन्होंने कभी भी परमेश्वर द्वारा तैयार की गयी स्थिति को या जो कुछ उनके आस-पास घटा है, उसे स्वीकार नहीं किया है। वे आमतौर पर अपने इस विश्वास पर जोर देते हैं कि मनुष्यजाति का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वे उसके शासन और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हैं। लेकिन जैसे ही उनका सामना किसी समस्या से होता है, फिर वे इस बात को नहीं मानते, वे चीज़ों को उस ढंग से नहीं समझते और उस तरह से आज्ञापालन नहीं करते। एक अविश्वासी ऐसा ही होता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य की खोज करके और परमेश्‍वर पर निर्भर रहकर ही भ्रष्‍ट स्‍वभावों से मुक्त हुआ जा सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास के वर्णन का सबसे सरल तरीका है इस भरोसे का होना कि एक परमेश्वर है, और इस आधार पर, उसका अनुसरण करना, उसका आज्ञा-पालन करना, उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना, उसके वचनों को सुनना, उसके वचनों के अनुसार जीवन जीना, हर चीज़ को उसके वचनों के अनुसार करना, एक सच्चा सृजित प्राणी बनना, और उसका भय मानना और बुराई से दूर रहना; केवल यही परमेश्वर में सच्चा विश्वास होता है। परमेश्वर के अनुसरण का यही अर्थ होता है। तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन, अपने हृदय में, तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते, और तुम उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं करते हो। यदि परमेश्वर जो करता है उसके बारे में तुम हमेशा अवधारणाएँ रखते हो, और तुम हमेशा वह जो करे उसे ग़लत समझते हो, और इसके बारे में शिकायत करते हो; यदि तुम हमेशा असंतुष्ट रहते हो, और वह जो भी करे उसे तुम हमेशा अपनी ही अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके मापते और उनसे पेश आते हो; अगर तुम्हारे पास हमेशा अपनी ही समझ होती है—तो यह परेशानी का कारण होगा। तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो, और तुम्हारे पास वास्तव में उसका अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करना ऐसा नहीं होता है।

यथार्थ में, परमेश्वर में विश्वास क्या होता है? क्या धर्म में विश्वास परमेश्वर में विश्वास के बराबर होता है? जब लोग धर्म को मानते हैं, तो वे शैतान का अनुसरण करते हैं। केवल जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और केवल वे जो मसीह का अनुसरण करते हैं, वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या जो कभी भी परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार नहीं करता, एक ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो परमेश्वर में विश्वास करता हो? यह किसी काम का नहीं होता, चाहे वो कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता रहा हो। कोई व्यक्ति जो हमेशा अपने विश्वास में धार्मिक अनुष्ठान में संलग्न रहता है, लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करता है, वह परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है, और परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता है। परमेश्वर किस आधार पर तुम्हें स्वीकार करता है? वह तुम्हें इस बात के आधार पर स्वीकार करता है कि क्या तुम सभी मामलों में उसकी अपेक्षाओं के अनुसार काम करते हो। उसकी स्वीकृति उसके वचनों के अनुसार दी जाती है, न कि इस आधार पर कि तुम्हारे बाह्य व्यवहार में कितने बदलाव हुए हैं, या तुम उसके लिए भाग-दौड़ करने में कितना समय लगाते हो, बल्कि इस आधार पर कि तुम किस राह पर चलते हो, और क्या तुम सत्य की तलाश करते हो। ऐसे कई लोग हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और जो परमेश्वर के लिए प्रशंसा के शब्द बोलते हैं—लेकिन, वे दिल से परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों से प्रेम नहीं करते, और न ही उन्हें सत्य में दिलचस्पी होती है। अपने दिलों में वे हमेशा यह मानते हैं कि केवल अगर वे शैतान के दर्शन और बाहरी दुनिया के विभिन्न सिद्धांतों द्वारा जीते हैं, तभी वे सामान्य होंगे, और खुद को बचाने में सक्षम होंगे, और यह कि केवल इस तरह से रहने से ही, इस दुनिया में उनके जीवन का कोई मोल होगा। क्या यह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास करता है और उसका अनुसरण करता है? प्रसिद्ध, महान विभूतियों की सभी बातें सुनने में विशेष रूप से दार्शनिक लगती हैं और लोगों को धोखा देने में विशेष रूप से सक्षम होती हैं। यदि तुम उन्हें सत्य मानते हो और सूत्रवाक्यों की तरह उनका पालन करते हो, लेकिन, जब सवाल आता है परमेश्वर के वचनों का, परमेश्वर के सबसे सामान्य वचनों का, जो यह चाहते हैं कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति बनो, कि तुम अपने स्वयं के आवंटित स्थान पर निष्ठापूर्वक संलग्न रहो और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाओ, और तुम स्थिर बने रहो—तब तुम उनका अभ्यास करने में असमर्थ रहते हो, और तुम उन्हें सच्चाई के रूप में नहीं मानते हो, तो तुम परमेश्वर के कोई अनुयायी नहीं हो। तुम यह कह सकते हो कि तुमने उसके वचनों का अभ्यास किया है, लेकिन क्या होगा यदि परमेश्वर तुम पर सच के लिए दबाव डाले और पूछे : "तुमने किसका अभ्यास किया है? उन वचनों को किसने कहा था जिनका तुम अभ्यास करते हो? उन सिद्धांतों का आधार क्या है जिनका तुम पालन करते हो?" यदि वह आधार परमेश्वर के वचन नहीं, तो ये शैतान के शब्द हैं; जिन्हें तुम जी रहे हो, वे शैतान के शब्द हैं, तुम फिर भी यह कहते हो कि तुम सत्य का अभ्यास करते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, क्या यह उसके खिलाफ़ निंदा नहीं है? परमेश्वर कहता है कि लोगों को ईमानदार होना चाहिए, फिर भी ऐसे लोग हैं जो इस बात पर विचार नहीं करते कि ईमानदार होने में क्या शामिल है, कैसे उन्हें ईमानदारी का अभ्यास करना है, या उन चीज़ों में से जिन्हें वे जी रहे हैं और प्रकट करते हैं, कौन-सी ईमानदार नहीं हैं, और कौन-सी हैं। वे परमेश्वर के वचनों में सत्य के सार पर विचार नहीं करते हैं, लेकिन अविश्वासियों की एक पुस्तक ढूँढ लेते हैं और, इसे पढ़कर, वे कहते हैं, "ये अच्छे शब्द हैं—परमेश्वर के वचनों से भी बेहतर। ‘निष्कपट लोग हमेशा जीतते हैं’—क्या ये ठीक वैसा नहीं जैसा कि परमेश्वर ने कहा है? यह भी सच ही है!" इस तरह, वे इन वचनों का पालन करते हैं। जब वे इन वचनों का पालन करते हैं तो वे कैसे जीते हैं? क्या वे सच्चाई की वास्तविकता को जीने में सक्षम होते हैं? क्या ऐसे कई लोग हैं? वे थोड़ा ज्ञान प्राप्त करते हैं, कुछ किताबें पढ़ लेते हैं, और थोड़ी अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं, और वे कोई प्रसिद्ध उक्ति या लोकप्रिय कहावत सुनते हैं और इन्हें सत्य मान लेते हैं। वे इन वचनों के अनुसार कार्य करते हैं, और उन्हें अपने कर्तव्यों और परमेश्वर में विश्वास के अपने जीवन पर लागू करते हैं, और यहाँ तक ​​कि वे सोचते हैं कि यह परमेश्वर को संतुष्ट करता है। क्या यह हाथ की सफ़ाई नहीं है? क्या यह प्रवंचना नहीं है? यह ईश-निन्दा है! लोगों में इसकी बहुतायत है। वे मधुर लगने वाले, सही प्रतीत होने वाले लोक-सिद्धांतों का पालन करते हैं, मानो वे ही सत्य हों। वे परमेश्वर के वचनों को एक तरफ़ रख देते हैं और उनकी ओर कोई ध्यान नहीं देते हैं, और, चाहे वे उन्हें जितनी भी बार पढ़ लें, वे उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं या उन्हें सच्चाई नहीं मानते। क्या ऐसा करने वाला वो है जो परमेश्वर पर विश्वास करता है? क्या वह परमेश्वर का अनुसरण करता है? ऐसा व्यक्ति धर्म को मानता है; ऐसे लोग शैतान का अनुसरण करते हैं! वे दिल से सोचते हैं कि शैतान द्वारा कहे गए शब्दों में दर्शन होता है, कि इन शब्दों में गहरा अर्थ होता है, कि वे आधिकारिक शब्द हैं, बुद्धिमत्तापूर्ण कथन हैं, और, चाहे वे लोग और कुछ भी त्याग दें, वे इन शब्दों की कभी उपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसा करना तो, उनके लिए, जैसे कि अपने जीवन को गंवाना, या उनके दिलों को खोद निकालना होगा। यह किस तरह का व्यक्ति है? यह वो व्यक्ति है जो शैतान का अनुसरण करता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

जो लोग सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनके पास एक ज़मीर होता है, वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, कि परमेश्वर जो भी करता है वो सही होता है, और इंसान के लिए हितकारी होता है। यदि वे कोई भूल कर भी बैठते हैं और सत्य का उल्लंघन कर देते हैं, तो वे अपने हृदय की गहराई में एक धिक्कार, ऋणग्रस्तता और संताप का अनुभव करते हैं। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, हम उनके पास एक ज़मीर होने की बात ही न करें, और पहले परमेश्वर के अस्तित्व और उसके वचनों के प्रति उनके रवैये की बात करें। तो शुरू करने के लिए, परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में उनकी क्या राय है? "तुम लोग कहते हो कि परमेश्वर है—पर वह है कहाँ? मुझे तो वह नज़र नहीं आता। मैं नहीं जानता कि कोई परमेश्वर है या नहीं। जो उसमें विश्वास करते हैं वे कहते हैं कि वो है, जो उसमें विश्वास नहीं करते वे कहते हैं कि वो नहीं है।" उनका विचार ऐसा होता है। लेकिन, कुछ और चिंतन के बाद, वे सोचते हैं, "ये सभी लोग उसमें विश्वास करते हैं और उसकी गवाही देते हैं, इसलिए हो सकता है कि परमेश्वर हो। मैं यही आशा करता हूँ; यदि परमेश्वर है, तो मैंने झटपट फ़ायदा उठाने का काम कर आशिषों को पा लिया होगा। मेरा दाँव सही बैठा होगा।" वे तो बस बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, एक तरह का जुआ खेल रहे हैं, अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं। वे नहीं सोचते कि इसकी उन्हें कोई क़ीमत चुकानी पड़ेगी। परमेश्वर के होने या न होने के बारे में उनका रवैया और दृष्टिकोण ऐसा है। वे यह भेद नहीं कर सकते कि परमेश्वर है या नहीं, न ही उनके लिए यह स्पष्ट है कि वो, सटीक रूप से, कहाँ है या इतने सारे लोगों की गवाही सच है या झूठ है। उनके मन में, इन सभी बातों के बारे में प्रश्न हैं; वे निश्चय नहीं कर पाते, इसलिए वे संशयी हैं। और इतने संशय और अनिश्चितता के साथ, जब परमेश्वर बोलता है और सत्य को प्रकट करता है तो उसके वचनों के प्रति उनका रवैया क्या होता है? क्या वे लोग परमेश्वर के वचनों को सत्य मानते हैं? कभी-कभी, हो सकता है कि वे उत्सुकतावश सुनें, उन (वचनों) पर कुछ चिंतन करें, और उसके बाद, सोचें, "क्या ये वचन सच्चे हैं? कहा जाता है कि इनमें शक्ति और अधिकार हैं—पर मैं क्यों उन्हें सुन या महसूस नहीं करता हूँ? ऐसा कहा जाता है, कि ये वचन लोगों को बदल सकते हैं—तो उनसे मैं क्यों नहीं बदला हूँ? मुझे अभी भी खाना और सोना पसंद है, मैं पहले जैसा ही गुस्सैल हूँ, और मेरी क्षमता किसी भी क्षेत्र में बढ़ी नहीं है। मैं अब भी भयभीत होता हूँ जब बड़ा लाल अज़गर अपनी यातना देता है। मैं महामानव नहीं बना हूँ! लोग कहते हैं कि परमेश्वर के वचन सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता हैं। सकारात्मक चीज़ क्या होती है? क्या यह लोगों से भले और ईमानदार बन जाने के लिए कहना है? जो लोग ईमानदार होते हैं, वे मूर्ख हैं। लोगों को परमेश्वर से डरने और बुराई को त्याग देने के लिए कहा जाता है। इसका अर्थ है कि जब तुम बुरे काम करते हो, तो तुम्हें खुद पर लगाम लगानी होगी, तुम्हें अपने पर रोक लगानी होगी, और बुरे काम नहीं करने होंगे—कितने लोग ऐसा कर सकते हैं? इंसान की फ़ितरत है बुरे काम करना और खुदगर्ज़ होना। हर कोई अपने लिए, और बाकी सब शैतान का है। इस दुनिया में अपना स्वार्थ छोड़कर दूसरों की सोचने वाला कोई नहीं है। तुम्हारा भाग्य तुम्हारे अपने हाथों में है; सुख के लिए प्रयास करना तुम पर ही निर्भर करता है। यदि हर कोई परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने लगे, परमेश्वर का भय माने और बुराई से बचकर रहे, तो क्या संसार के लोग त्यागी साधु और साध्वी नहीं बन जाएँगे? फिर संसार में जीने का मज़ा ही क्या होगा?" क्या उनके दिलों की गहराई में सत्य के प्रति उनका नज़रिया यह नहीं है? "यदि लोग अपने लिए संघर्ष और लड़ाई न करें, यदि वे दौलत और नाम के लिए न जिएँ, तो जीवन का क्या अर्थ होगा?" यह नज़रिया होता है इस तरह के लोगों का—अविश्वासियों का। सत्य के प्रति अविश्वासियों का यही नज़रिया होता है। अपने दिलों में वे नहीं जानते कि सत्य क्या होता है; (उनके लिए) परमेश्वर के वचन सत्य के समान नहीं होते, न ही सत्य जीवन के तुल्य होता है। तो वे, अपने दिलों की गहराई में, सत्य को क्या मानते हैं? कुछ ऐसा जो उन्हें अलौकिक बना दे, जो उन्हें कौशल दे, उन्हें विशेष बनाए, कुछ ऐसा जो उनके लिए भौतिक लाभ का हो, जो उनके जीवन को अधिक ख़ुशहाल बना दे, जो उनके लिए सर्वोत्तम लाभ का हो—वो सत्य है। वे सोचते हैं: परमेश्वर के ये वचन तो बहुत सामान्य हैं, ये तो तुच्छ बातें हैं, उल्लेख के योग्य नहीं। यह चाहना कि लोग ईमानदार बनें, वे परमेश्वर का भय मानें और बुराई से बचें, कि वे अपने भ्रष्ट स्वभावों से स्वयं को मुक्त कर लें—बहुत ही कठिन है। लोग एक शून्यता में नहीं रहते; उनकी अनगिनत इच्छाएँ और भावनाएँ होती हैं। कोई भी इन वचनों को जी नहीं सकता। अविश्वासी लोग नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं; वे नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन जीवन हैं, और वे इसे तो और भी नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन इंसान का नसीब बदल सकते हैं, या परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को बदल सकते हैं और उन्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागने के योग्य बनाते हैं। परमेश्वर के वचनों के प्रति उनका यही रवैया होता है। इसलिए, उनके दिलों की गहराई में, उन्होंने इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया है कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, न ही वे कभी भी उन्हें सत्य के रूप में मानते हैं। कुल मिलाकर, वे परमेश्वर के वचनों को अपना जीवन, अपने अस्तित्व का दिशानिर्देश तथा उद्देश्य और अपना आचरण नहीं मानते। क्या वे जो नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास कर सकते हैं? क्या वे वाक़ई परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं? (नहीं।) क्या वे जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, यह मान सकते हैं कि इस संसार में सत्य भी है? क्या वे जो सत्य के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, यह मान सकते हैं कि मानवजाति को बचाया जा सकता है? (नहीं।) यदि वे इनमें से किसी पर भी विश्वास नहीं करते, क्या वे परमेश्वर के देहधारण की सच्चाई में विश्वास कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर की प्रबंधन योजना में विश्वास कर सकते हैं? (नहीं।) वे अविश्वासी हैं, पूरी तरह अविश्वासी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने के लिए कम से कम, एक जमीर का होना आवश्यक है' से उद्धृत

यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं रहते हैं, तो वे अपने हृदय में उसके लिए कोई श्रद्धा नहीं रख पाएंगे, और इसलिए वे बुराई से दूर रहने में असमर्थ होंगे। ये बातें जुड़ी हुई हैं। यदि तेरा हृदय अक्सर परमेश्वर के सामने रहता है, तो तू नियंत्रण में रखा जाएगा, और कई चीज़ों में परमेश्वर का भय मानेगा। तू बहुत दूर नहीं जाएगा, या ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो स्वच्छन्द हो। तू वह नहीं करेगा जो परमेश्वर के लिए घृणित हो, और उन वचनों को नहीं बोलेगा जिनका कोई अर्थ नहीं है। यदि तू परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करता है, और परमेश्वर के अनुशासन को स्वीकार करता है, तो तू बहुत से बुरे कार्यों को करने से बचेगा। वैसे, क्या तूने बुराई को दूर न किया होता? यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में, तू अक्सर घबराहट की स्थिति में रहता है, यह नहीं जानता है कि क्या परमेश्वर तेरे हृदय में है, यह नहीं जानता है कि तू अपने हृदय में क्या करना चाहता है, और यदि तू परमेश्वर के सामने शांत होने में असमर्थ है, और जब तेरे साथ कुछ घटित होता है तो परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करता है या सत्य की तलाश नहीं करता है, यदि तू अक्सर अपनी मर्ज़ी के अनुसार कार्य करता है, अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार जीता है और अपने अहंकारी स्वभाव को प्रकट करता है, और यदि तू परमेश्वर की जाँच या परमेश्वर के अनुशासन को स्वीकार नहीं करता है, और तुम परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते हो, तो इस तरह के लोगों के दिल हमेशा शैतान के सामने रहेंगे और शैतान और उनके भ्रष्ट स्वभाव द्वारा नियंत्रित होंगे। इसलिए ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी श्रद्धा से रहित होते हैं। वे बुराई से दूर रहने में बिल्कुल असमर्थ हैं, और भले ही वे दुष्ट चीजें नहीं करते हैं, लेकिन वे जो कुछ भी सोचते हैं वह अभी भी दुष्टता है, और यह सत्य से असंबद्ध है और सत्य के विरुद्ध जाता है। तो क्या बुनियादी तौर पर ऐसे लोगों का परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है? यद्यपि, वे परमेश्वर द्वारा शासित होते हैं, उन्होंने कभी भी परमेश्वर के समक्ष विवरण पेश नहीं किया है, उन्होंने कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं किया है, उन्होंने कभी भी परमेश्वर को वो सृजनकर्ता नहीं माना है जो उन पर शासन करता है, उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया कि परमेश्वर उनका परमेश्वर और उनका प्रभु है, और उन्होंने अपने हृदय में कभी भी परमेश्वर की आराधना करने का विचार नहीं किया है। ऐसे लोगों की समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर से भय मानने का क्या अर्थ है, और वे सोचते हैं कि बुराई करना उनका अधिकार है, वे कहते हैं: "मैं वही करूँगा जो मैं चाहता हूँ। मैं अपने स्वयं के मामलों को खुद सँभाल लूँगा, यह किसी अन्य पर निर्भर नहीं करता है।" वे सोचते हैं कि बुराई करना उनका अधिकार है, और वे परमेश्वर में विश्वास को एक प्रकार के मंत्र के रूप में, एक अनुष्ठान के रूप में मानते हैं। क्या यह उन्हें अविश्वासी नहीं बनाता है? वे अविश्वासी हैं! और परमेश्वर इन लोगों को अपने हृदय में क्या नाम देता है? दिन भर वे लोग मन में बुरी बातें ही सोचते हैं। ये परमेश्वर के घर से पतित कर दिए गए लोग हैं और ऐसे लोगों को परमेश्वर अपने घर का सदस्य नहीं मानता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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