99. पत्रों और सिद्धांतों को पहचानने के सिद्धांत

(1) पत्र और सिद्धांत पूरी तरह से मनुष्य द्वारा परमेश्वर के वचनों का विश्लेषण और उनकी व्याख्या का एक उत्पाद होते हैं। वे खोखले और अव्यावहारिक होते हैं, और उनकी संपूर्णता में, वे मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं में गिने जाते हैं;

(2) पत्र और सिद्धांत मनुष्य के मन और विचारों से उत्पन्न होते हैं। वे पवित्र आत्मा के प्रबोधन के समतुल्य बिलकुल नहीं होते, न ही वे लोगों को द्रवित और लाभान्वित करने में सक्षम होते हैं;

(3) पत्र और सिद्धांत नियमों और बाह्यताओं से अधिक कुछ नहीं होते हैं। वे अभ्यास के मार्ग और उसके सिद्धांतों से रहित होते हैं, और, मानव को मुक्ति की ओर ले जाने के बजाय, वे उसे बेड़ियों में डाल देते हैं;

(4) जो लोग बार-बार पत्रों और सिद्धांतों का प्रचार करते हैं, वे स्वयं को बिल्कुल नहीं जानते हैं। वे सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, सिद्धांतों के अनुसार कार्य तो वे और भी कम कर सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर का कार्य और वचन तुम्हारे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए हैं; उसका लक्ष्य मात्र अपने कार्य और वचन को तुम लोगों को समझाना या ज्ञात कराना नहीं है। इतना पर्याप्त नहीं है। तुम्हारे अंदर सोचने-समझने की योग्यता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन इंसानी भाषा में लिखे हैं, और वह बड़ी स्पष्टता से बोलता है। मिसाल के तौर पर, तुम इस बात को पूरी तरह से जानने में सक्षम हो कि परमेश्वर तुम्हें क्या बात समझाना और किस पर अमल करवाना चाहता है; यह ऐसी बात है जिसे सूझ-बूझ रखने वाला एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है। विशेषकर, वर्तमान चरण में परमेश्वर जो वचन कह रहा है, वे खासतौर पर स्पष्ट और पारदर्शी हैं, और परमेश्वर ऐसी अनेक बातों की ओर इशारा कर रहा है जिन पर लोगों ने विचार नहीं किया है इसके साथ-साथ हर तरह की इंसानी स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है। उसके वचन व्यापक हैं और पूरी तरह से स्पष्ट हैं। इसलिए अब, लोग बहुत-से मुद्दों को समझते हैं, लेकिन एक चीज़ अभी भी छूट रही है—लोगों का उसके वचनों को अमल में लाना। लोगों को सत्य के हर पहलू का विस्तार से अनुभव करना चाहिए, उसकी छान-बीन और खोज ज़्यादा विस्तार से करनी चाहिए, बजाय इसके कि जो कुछ भी उन्हें उपलब्ध कराया जाए, महज़ उसे आत्मसात करने का इंतज़ार करें; वरना वे परजीवी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों को जानते तो हैं, फिर भी उस पर अमल नहीं करते। इस तरह का व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता और अंतत: उसे हटा दिया जाएगा। 1990 के पतरस जैसा बनने के लिए तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहिए, अपने अनुभव में सच्चा प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ अपने सहयोग में ज़्यादा और कहीं अधिक विशाल प्रबोधन प्राप्त करना चाहिए, जो तुम्हारे अपने जीवन के लिए सदा अधिक सहायक होगा। अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

स्वयं अनुभव प्राप्त कर लेने के पश्चात्, तुम उस ज्ञान के बारे में बात कर पाते हो जो तुम्हारे पास उन चीज़ों के बारे में होना चाहिए जो तुमने अनुभव की हैं। इसके साथ, तुम ऐसे लोगों के बीच अंतर कर सकते हो जिनका ज्ञान वास्तविक और व्यावहारिक है और ऐसे लोग जिनका ज्ञान सिद्धांत पर आधारित है और बेकार है। इसलिए, वह ज्ञान जिसकी तुम चर्चा करते हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्‍हारे पास उसका व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सच्चाई होगी, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। तुम अपने अनुभव के माध्यम से, विवेक और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपने ज्ञान को गहरा कर सकते हो, तुम्हें कैसा आचरण करना चाहिए, इस बारे में अपनी बुद्धि और सामान्य बोध बढ़ा सकते हो। जिन लोगों में सत्य नहीं होता, उनके द्वारा व्यक्त ज्ञान मात्र सिद्धांत होता है, फिर भले ही वह ज्ञान कितना ही ऊँचा क्यों न हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो, परन्तु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तो वह अंतर नहीं कर पाता। क्योंकि आध्यात्मिक मामलों में ऐसे लोगों को कोई अनुभव नहीं होता। ऐसे लोग आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं होते और आध्यात्मिक मामलों को बिल्कुल नहीं समझते। चाहे तुम किसी भी तरह का ज्ञान व्यक्त करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल सिद्धांत की ही बात करते हैं—जिनमें सत्य या वास्तविकता नहीं होती—वे जिस बारे में बात करते हैं, उसे उनका अस्तित्व भी कहा जा सकता है, क्योंकि उनका सिद्धांत गहरे चिंतन से ही आया है और यह उनके गहरे मनन का परिणाम है। परन्तु यह केवल सिद्धांत ही है, यह कल्पना से अधिक कुछ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

अगर कोई व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और सिद्धांतों को दस हजार बार कह सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, "मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।" अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें इसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अनुभव से प्राप्त ज्ञान को साफ़-साफ़ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको; केवल शब्दों और सिद्धांतों का उच्चारण करना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य हो, तभी तुम जान सकते हो; सत्य के बिना तुम नहीं जान सकते। तुम किसी मुद्दे को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को नहीं समझ सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। ये सभी चीज़ें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

सिर्फ धर्म-सिद्धांत को समझने का कोई लाभ नहीं है; यह जीवन परिवर्तन नहीं ला सकता। परमेश्वर के वचनों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ समझ लेना सत्य को समझने के समतुल्य नहीं है; ये परमेश्वर के वचनों में समझाई गई वे जरूरी चीजें हैं जो सत्य है। उसके कथनों की हर पंक्ति में सत्य है, भले ही यह जरूरी नहीं है कि लोग इसे समझ पाएँ। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर कहता है, "तुम्हें ईमानदार लोग होना चाहिए," तो इस वक्तव्य में सत्य है। उसके इस तरह के वक्तव्यों में तो और भी ज्यादा सत्य है, जैसेकि, "तुम्हें ऐसे लोग बनना चाहिए जो परमेश्वर के सम्मुख समर्पित हों, जो परमेश्वर से प्रेम करते हों, और जो परमेश्वर की आराधना करते हों। तुम्हें मनुष्यों के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।" परमेश्वर के वचनों की हर पंक्ति में बहुत-सा सत्य है, और सत्य के इन वक्तव्यों में से हरेक का सार समझाने के लिए बहुत प्रयास की जरूरत होती है; इस बिंदु पर पहुँचने के बाद ही किसी के बारे में यह कहा जा सकता है कि उसने सत्य को समझ लिया है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को सिर्फ उनके शाब्दिक अर्थ के अनुसार ही समझते और समझाते हो तो तुमने सत्य को नहीं समझा है; तुम सिर्फ धर्म-सिद्धांत का ढोंग कर रहे हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, हालाँकि वे सतही तौर पर परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते नज़र आते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचनों पर मात्र शाब्दिक चर्चा कर रहे होते हैं, उनकी बातों में सार्थक कुछ नहीं होता। उनके उपदेश किसी भाषा की पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं,मद-दर-मद, पहलू-दर-पहलू क्रम-बद्ध किये हुए, और जब वे बोल लेते हैं, तो यह कहकर हर कोई उनका स्तुति गान करता है: "इस व्यक्ति में वास्तविकता है। उसने इतने अच्छे ढंग से और इतने विस्तार से समझाया।" जब उनका उपदेश देना समाप्त हो जाता है, तो ये लोग दूसरे लोगों से इन सारी चीज़ों को इकट्ठा करके सभी को भेज देने के लिये कहते हैं। उनके कृत्य दूसरों का कपट बन जाते हैं और वे लोग जिन बातों का प्रचार करते हैं, वे सब भ्राँतियाँ होती हैं। देखने में ऐसा लगता है, जैसे ये लोग मात्र परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और यह सत्य के अनुरूप दिखता है। लेकिन अगर अधिक गौर से समझेंगे तो तुम देखोगे कि यह शब्दों और सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है। यह सब इंसानी कल्पनाओं और धारणाओं के साथ झूठी विवेक-बुद्धि है, साथ ही कुछ हिस्सा ऐसा है जो परमेश्वर को सीमांकित करता है। क्या इस तरह का उपदेश परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं है? यह एक ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का विरोध करती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

तुम सब सत्य का सार निकालने में भटक गए हो; जब तुम ये सभी सार निकाल लेते हो, तो इससे केवल नियम ही प्राप्त होते हैं। तुम्हारा "सत्य का सार प्रस्तुत करना" लोगों को जीवन प्राप्त करने या अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने देने के लिए नहीं है। इसके बजाय, इसके कारण लोग सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान और सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त करते हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो कि वे परमेश्वर के कार्य के पीछे के प्रयोजन को समझते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों में निपुणता हासिल की है। वे सत्य के मर्म को नहीं समझते हैं, और यह धर्मशास्त्र का अध्ययन करने या बाइबल पढ़ने से भिन्न नहीं है। तुम हमेशा इन पुस्तकों या उन सामग्रियों को संकलित करते रहते हो, और इसलिए सिद्धांत के इस पहलू या ज्ञान के उस पहलू को धारण करने वाले बन जाते हो। तुम सिद्धांतों के प्रथम श्रेणी के वक्ता हो—लेकिन जब तुम बोल लेते हो तो क्या होता है? तब लोग अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं होती है और स्वयं की भी समझ नहीं होती है। अंत में, उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया होगा वे बस सूत्र और नियम ही होंगे। तुम उन चीजों के बारे में बात कर सकते हो लेकिन और कुछ नहीं। यदि परमेश्वर ने कुछ नया किया, तो क्या तुम लोगों को ज्ञात सभी सिद्धांत उस काम से मेल खाने वाले हो सकते हैं जो परमेश्वर करता है? तुम्हारी ये बातें केवल नियम हैं और तुम लोगों से केवल धर्मशास्त्र का अध्ययन करवा रहे हो: तुम उन्हें परमेश्वर के वचन या सत्य का अनुभव करने की अनुमति नहीं दे रहे हो। इसलिए वे पुस्तकें जिन्हें तुम संकलित करते हो, वे लोगों को केवल धर्मशास्त्र और ज्ञान में, नए सूत्रों, नियमों और प्रथाओं में ही ला सकती हैं। वे लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकती हैं, या लोगों को सत्य को समझने या परमेश्वर की इच्छा को समझने में मदद नहीं कर सकती हैं। तुम सोच रहे हो कि प्रश्न पर प्रश्न पूछने से, जिनके तब तुम उत्तर देते हो, और जिनके लिए तुम एक रूपरेखा या सारांश लिखते हो, इस तरह के व्यवहार से तुम्हारे भाई-बहन आसानी से समझ जाएंगे। याद रखने में आसान होने के अलावा, एक नज़र में ये इन प्रश्नों के बारे में स्पष्ट हैं, और तुमको लगता है कि इस तरह से कार्य करना बहुत अच्छा है। लेकिन वे जो समझ रहे हैं वह वास्तविक मर्म नहीं है; यह वास्तविकता से भिन्न है और सिर्फ शब्द और सिद्धांत हैं। तो यह बेहतर होगा कि तुम इन चीजों को बिल्कुल भी नहीं करो। तुम लोगों को ज्ञान को समझने और ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने की ओर ले जाने के लिए ये कार्य करते हो। तुम अन्य लोगों को सिद्धान्तों में, धर्म में लाते हो, और उनसे परमेश्वर का अनुसरण और धार्मिक सिद्धांतों के भीतर परमेश्वर में विश्वास करवाते हो। क्या तब तुम बस पौलुस के समान नहीं हो? तुम सबको लगता है कि सत्य के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और उसी तरह परमेश्वर के वचनों के कई अंशों को कंठस्थ करना भी महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग परमेश्वर के वचन को कैसे समझते हैं, यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। तुम सबको लगता है कि लोगों के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वे परमेश्वर के कई वचनों को कंठस्थ करें, कई सिद्धांतों को बोलने में सक्षम हों और परमेश्वर के वचनों के भीतर कई सूत्रों को खोजने में सफल हों। इसलिए, तुम सब हमेशा इन चीजों को व्यवस्थित करना चाहते हो ताकि हर कोई एक से भजन पत्र से गा रहा हो और एक सी बात कह रहा हो, हर कोई वही सिद्धांत बोलता हो, ताकि हर किसी के पास एक सा ज्ञान हो और हर कोई एक से नियम रखता हो—यही तुम सब लोगों का उद्देश्य है। तुम लोग ऐसा करते हो मानो कि लोगों को बेहतर समझाते हो, जबकि इसके विपरीत तुम सबको कोई अंदाज़ा नहीं है कि ऐसा करके तुम लोगों को उन नियमों के बीच ला रहे हो जो परमेश्वर के वचनों के सत्य के बाहर हैं। लोगों को सत्य की वास्तविक समझ प्राप्त करवाने के लिए, तुमको वास्तविकता के साथ जुड़ना चाहिए, कार्य के साथ जुड़ना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार व्यावहारिक समस्याओं को हल करना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग सत्य को समझ सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। केवल इस तरह का परिणाम हासिल करना ही लोगों को परमेश्वर के सामने लाना है। अगर तुम सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांतों, मतों और नियमों के बारे में बात करते हो, यदि तुम्हारे प्रयास केवल लिखित शब्दों पर केन्द्रित होते हैं, तो तुम लोगों को सत्य की समझ तक नहीं पहुँचा पाओगे, तुम लोगों से वही बातें कहने और नियमों का पालन करने के लिए निर्देशित करोगे। तुम विशेष रूप से लोगों को अपने आपको बेहतर समझने में सक्षम नहीं बना पाओगे, तुम उन्हें पश्चाताप और परिवर्तन की ओर नहीं ले जा पाओगे। यदि आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर पाना लोगों के लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने का विकल्प बन पाता, तो कलीसियाओं की अगुवायी करने के लिए तुम लोगों की आवश्यकता न होती।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कलीसिया के भीतर की असली समस्याओं को नहीं देख पाते। किसी सभा को संबोधित करते हुए उन्हें लगता है कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे सिर्फ खानापूरी करते हैं और कुछ अक्षर और धर्म-सिद्धांत उगल देते हैं। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो कुछ कह रहे हैं वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं, फिर भी वे बोलते चले जाते हैं। आखिर में, उन्हें खुद भी महसूस होता है कि उनके शब्द कितने नीरस हैं, और जब उनके भाई और बहनें इन्हें सुनते हैं तो वे भी सोचते हैं कि ये लोग कितने जड़बुद्धि हैं। क्या ऐसा ही नहीं होता है? अगर उन्हें यह सब बोलने के लिए खुद को मजबूर करना पड़ता है, तो एक तरफ तो पवित्र आत्मा उनके भीतर कार्य नही कर रहा है, और दूसरी तरफ़, उनके शब्दों से लोगों को कोई फायदा नहीं होता है। अगर तुमने सत्य का अनुभव नहीं किया है, लेकिन फिर भी तुम इसके बारे में बोलना चाहते हो, तो तुम चाहे जो भी कहते रहो, तुम सत्य तक नहीं पहुँच पाओगे; और तुम जो भी आगे कहोगे वे सिर्फ अक्षर और धर्म-सिद्धांत होंगे। तुम शायद यह सोचोगे कि वे काफी प्रबुद्ध बातें हैं, पर वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं; वे सत्य वास्तविकता नहीं हैं; और सुनने वाले कितनी ही कोशिश क्यों न करें, वे उनसे कुछ भी वास्तविक प्राप्त नहीं कर पाएंगे। हो सकता है कि सुनते समय वे ऐसा महसूस करें कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह सही है, लेकिन बाद में वे इसे पूरी तरह से भूल जाएंगे। अगर तुम अपनी वास्तविक अवस्थाओं के बारे में बात नहीं कर रहे हो, तो तुम लोगों के दिलों को नहीं छू पाओगे; वे इसे भूल जाएंगे, भले ही वे इसे याद रखना चाहें, और तुम उनकी कोई मदद नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हारा ऐसी किसी स्थिति से सामना होता है, जहाँ तुम बोलना चाहते हो लेकिन तुम्हें लगता है कि तुम चीजों के बारे में इस तरह से बात नहीं कर सकते कि सत्य तक पहुँच पाओ, और तुम्हारे पास सिर्फ कुछ धर्म-सिद्धांत से जुड़ी जानकारी है, जबकि तुम मूलभूत चीजों के बारे में कुछ भी नहीं जानते, और अगर दूसरों ने मूलभूत प्रकृति के प्रश्न उठा लिए तो तुम उनके उत्तर नहीं दे पाओगे, तो बेहतर यही है कि तुम कुछ भी न कहो। ऐसे अवसर भी होते हैं जब तुम एक सभा में किसी विषय पर चर्चा कर रहे होते हो, और ऐसा महसूस करते हो कि तुम इसके बारे में काफी जानकारी रखते हो, और कुछ वास्तविक चीजों के बारे में संगति कर सकते हो। लेकिन अगर तुम इसके बारे में सतही स्तर पर चर्चा करते हो और गहरे स्तर पर कुछ कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होता, तो सभी लोग यह समझ जाते हैं, क्योंकि हो सकता है कि दूसरों ने कुछ चीजों का अनुभव न किया हो, और तुम्हें भी ऐसा कोई अनुभव न हो। ऐसी स्थिति में, तुम्हें अपने-आपको बोलते रहने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए, बल्कि इस विषय पर हर किसी को संगति करने के लिए कहना चाहिए। यदि तुम्हें लगता है कि यह सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत है, तो इसके बारे में कुछ बोलना व्यर्थ है, और यह दूसरों को सन्मार्ग पर लाने का काम नहीं करेगा; इस स्थिति में, तुम चाहे कोई बात भी कहो, पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं करेगा, और जब तुम किसी भी तरह जबर्दस्ती अपने-आपको दूसरों पर थोपते हो तो तुम बेतुकी और विकृत बातें कर सकते हो, और लोगों को भटका सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

जो लोग सत्य को नहीं समझते या उससे प्रेम नहीं करते हैं, अक्सर सत्य को एक व्याख्या, एक सिद्धांत के रूप में लेते हैं—और उनका क्या अंजाम होता है? जब वे किसी समस्या का सामना करते हैं, तो वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी, वे इसे इसके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते, और न ही वे सत्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं, न ही सत्य की तलाश सकते हैं; जब लोग उनके साथ संगति करते हैं, तो वे अपने "ज्ञान के प्रसिद्ध शब्दों" के साथ जवाब देते हैं: "बस करो—मैं सब कुछ समझता हूँ। तुमने चलना भी शुरू नहीं किया था तब से मैं उपदेश दे रहा हूँ!" ये उनके प्रसिद्ध शब्द होते हैं। यदि वे सब कुछ समझते हैं, तो जब वे किसी समस्या का सामना करते हैं तो वे इसे क्यों नहीं संभाल पाते? यदि तुम इसे समझते हो, तो क्यों तुम इसे व्यवहार में लाने में असमर्थ हो? समस्या की ठोकर से तुम लुढ़क क्यों जाते हो, क्यों तुम इस पर अटक जाते हो? तुम इसे समझते हो या नहीं? यदि तुम समझते हो, तो तुम आज्ञापालन क्यों नहीं कर पाते हो? यदि तुम समझते हो, तो तुम इसे स्वीकार क्यों नहीं कर पाते? सच्चाई को समझने के बाद लोगों को सबसे पहले क्या करना चाहिए? उन्हें आज्ञापालन करना चाहिए, और कुछ नहीं। कुछ लोग कहते हैं, "मैं सब कुछ समझता हूँ। किसी को मेरे साथ संगति नहीं करनी है—मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है।" वे दूसरों की मदद से परहेज कर सकते हैं, लेकिन यह अफ़सोस की बात है कि जब वे कमज़ोर होते हैं, तो वे जिस सिद्धांत को समझते हैं वह पूरी तरह बेकार होता है, और वे अपना कर्तव्य करना भी बंद कर देते हैं। कुछ तो अब परमेश्वर पर विश्वास करना ही नहीं चाहते हैं। उन्होंने इतने वर्ष धर्मशास्त्रीय सिद्धांत का प्रचार करने में बिताए, लेकिन ज़रा-सी बात पर वे अपने विश्वास को छोड़ देते हैं और पीछे हट जाते हैं। क्या इसमें कोई आध्यात्मिक क़द है? (नहीं)। और कोई आध्यात्मिक क़द न होने का मतलब है जीवन का न होना। यदि तुम्हारे पास जीवन होता, तो उस मामूली मुद्दे का सामना करने पर, तुम क्यों इसे संभाल नहीं पाते? क्या तुम बातें बनाने में माहिर नहीं हो? तो अपने आप को विश्वास दिलाने में लग जाओ; अगर तुम खुद को ही विश्वास नहीं दिला सकते, तो आख़िर तुम क्या समझते हो? क्या यह सत्य है? सत्य लोगों की वास्तविक समस्याओं को हल कर सकता है और लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को भी हल कर सकता है। क्यों वे "सच्चाइयाँ" जिन्हें तुम समझते हो, तुम्हारी अपनी ही कठिनाइयों को हल नहीं कर सकतीं? तो आख़िर वो क्या है जिसे तुम समझते हो? वो सिद्धांत है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (7)' से उद्धृत

क्या अब तुम लोगों के पास शब्दों और सिद्धांतों का उपदेश देने की समस्या को दूर करने का मार्ग है? उस समस्या को दूर करने के लिए, तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए; तुम जितना अधिक अभ्यास करोगे—सत्य और अभ्यास के लिए जितना अधिक प्रयास करोगे, तुम्हारे अंदर शब्द और सिद्धांत उतने ही कम होंगे। वास्तविकता कैसे सामने आती है? ऐसा सत्य के अभ्यास की प्रक्रिया के दौरान होता है, जब लोग तरह-तरह के अनुभवों से गुजरते हैं और तरह-तरह की अवस्थाओं को जन्म देते हैं। यह बदलाव की एक प्रक्रिया होती है कि लोग अपनी विभिन्न अवस्थाओं को कैसे लेते हैं, उनके विचार और दृष्टिकोण क्या होते हैं, और इनके समाधान के लिए वे सत्य को कैसे खोजते हैं। यह प्रक्रिया वास्तविकता है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अभ्यास और अनुभव की प्रक्रिया से नहीं गुजरते हो, बल्कि उन्हें सिर्फ शाब्दिक और सैद्धांतिक स्तर पर जानते और समझते हो, तब तुम्हारे पास एक सिद्धांत के अलावा कुछ नहीं होता, क्योंकि तुम्हारी शाब्दिक समझ और तुम्हारे प्रत्यक्ष अनुभव के बीच एक विसंगति होती है। सिद्धांत कैसे उपजता है? जब कोई अभ्यास न करके सिर्फ समझता है, विश्लेषण करता है, और परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या करता है, और इतना ही नहीं, बल्कि उनका उपदेश देता है, तो सिद्धांत पैदा होता है। क्या सिद्धांत वास्तविकता बन सकता है? अगर तुम लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम कभी भी इसे समझ नहीं सकते। सिर्फ शाब्दिक व्याख्या हमेशा एक सिद्धांत रहेगी। लेकिन अगर तुम अभ्यास करते हो, अनुभव करते हो, महसूस करते हो, और सीखते हो, तो इस तरह पैदा हुआ ज्ञान, विचार, अवधारणाएँ और अनुभव व्यावहारिक होंगे। सच्चाई या वास्तविकता अभ्यास से ही प्राप्त होती है; अभ्यास के बिना वास्तविकता हमेशा अनुपस्थित रहती है। क्या किसी ने कभी कहा है, "मैं सत्य का अभ्यास नहीं करता, पर मैं फिर भी व्यावहारिक धर्मोपदेश दे सकता हूँ"? तुम जो उपदेश देते हो, वह उस समय दूसरों को सही और व्यावहारिक प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन बाद में उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग ही नहीं होगा। इसलिए वह सब जो तुम समझते हो, सिर्फ सिद्धांत ही है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हो और तुम्हारे पास कोई व्यावहारिक अनुभव या सत्य की कोई समझ नहीं है, तो जब कोई दूसरा ऐसी अवस्था में होगा जिसके बारे में तुमने पहले कभी सोचा ही नहीं है, तो तुम्हें पता ही नहीं होगा कि इसका समाधान कैसे करें। जब कोई कभी-कभार ही सत्य का अभ्यास करता है, तो वे कभी भी इसे सही अर्थों में नहीं समझ सकते। वे सत्य के अभ्यास को बढ़ाने के बाद ही इसे सचमुच समझ सकते हैं, और तभी वे सत्य के अभ्यास के सिद्धांतों को आत्मसात कर सकते हैं। अगर तुम्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, तो तुम स्वाभाविक रूप से सिर्फ सिद्धांत की सीख दे सकते हो। तुम दूसरों को सिर्फ नियमों का पालन करना सिखा सकते हो, जैसेकि तुम खुद करते हो। अभ्यास और अनुभव की वास्तविकता के बिना तुम कभी भी वास्तविकता की सीख नहीं दे पाओगे। सत्य का अभ्यास करना अध्ययन करने के समान नहीं है। अध्ययन करने के लिए निरंतर लिखित शब्दों का ही सहारा लेना पड़ता है; उसके लिए केवल नोट्स लेना, याद रखना, विश्लेषण करना और शब्दों की छानबीन करना ही काफी होता है। जबकि सत्य का अभ्यास ठीक इसके विपरीत होता है; परिणाम प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को व्यावहारिक अनुभव पर निर्भर रहना होता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ उतनी बहुत ऊँची भी नहीं हैं। यदि वे थोड़ा भी प्रयास करें, तो "उत्तीर्ण श्रेणी" प्राप्त कर लेंगे। वास्तव में, सत्य को समझना, जानना, और बूझना सत्य का अभ्यास करने से अधिक जटिल है। सत्य को जानना और बूझना सत्य का अभ्यास करने के बाद आता है; यह वही सोपान और तरीका है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। तुम पालन कैसे नहीं कर सकते? क्या तुम अपने तरीके से चीजें करके पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो? पवित्र आत्मा तुम्हारी इच्छा से कार्य करता है या परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम्हारी कमियों के आधार पर कार्य करता है? यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो बेकार है। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और वास्तविक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना अधिक ज्ञान बोल पाता है जितनी समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम; जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करवाता है। ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों को अनमोल खजाने की तरह मत बरत; वे दुखदाई हैं और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों की बात कर पाते हैं—लेकिन इनमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग दूसरों को सही राह पर ले जाने में अक्षम होते हैं और उन्हें केवल गुमराह ही करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे लोगों के वर्तमान कष्टों का निवारण तो करना ही चाहिए, उन्हें प्रवेश करने देना चाहिए; केवल यही समर्पण माना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्द मत बोला कर, और दूसरों को अपने आज्ञापालन में बाँधने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह केवल उनके भ्रम को ही बढ़ा सकता है। इस तरह करते रहने से बहुत वाद उत्पन्न होगा, जो लोगों को तुझसे घृणा करवाएगा। ऐसी है मनुष्य की कमी, और यह सचमुच अत्यंत लज्जाजनक है। इसलिए वास्तविक रूप में विद्यमान समस्याओं की अधिक बात कर। अन्य लोगों के अनुभवों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह मत बरत और उन्हें ऊँचा थामकर रख ताकि दूसरे प्रशंसा कर पाएँ; तुझे अपना विशिष्ट मुक्ति का मार्ग खोजना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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