111. विधर्म और भांति की पहचान करने के सिद्धांत

(1) वह सब जो न तो परमेश्वर से और न ही उसके वचनों से आता है, और जो पूरी तरह से परमेश्वर के वचन सत्य के विपरीत चलता है, विधर्म और भांति है।

(2) वे सारे विचार और सिद्धांत जो कि परमेश्वर को, परमेश्वर के वचन सत्य को अस्वीकार करते हैं, और परमेश्वर के वचन सत्य के विरोध में चलते हैं, भ्रामक विधर्म और भांति हैं।

(3) वह सब जो शैतान, दुष्टों के राजा, और विभिन्न दुष्ट आत्माओं से आता है, और मानवजाति को मोहित और भ्रष्ट कर सकता है, वह विधर्म और भांति है।

(4) भ्रष्ट मानवजाति को विरासत में मिली संस्कृति में, साथ ही साथ उसके मानसिक और शैक्षणिक सिद्धांतों में जो कुछ भी परमेश्वर के वचन सत्य के विपरीत चलता है, वह विधर्म और भांति है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मानवजाति द्वारा सामाजिक विज्ञानों के आविष्कार के बाद से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। तब से विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं रही हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति सबसे नीचे हो गई है। हृदय में परमेश्वर के बिना मनुष्य की आंतरिक दुनिया अंधकारमय, आशारहित और खोखली है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सच्चाई का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम रह गए हैं कि परमेश्वर ने सब-कुछ बनाया है, और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है, उदासीन हो जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ... कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गई है, और कई ऐसे लोग भी हैं, जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रहकर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना शासक और समाजशास्त्री मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए अपना कितना भी दिमाग क्यों न ख़पा लें, कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता, क्योंकि कोई मनुष्य का जीवन नहीं बन सकता, और कोई सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता, जिससे वह व्यथित है। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम : ये मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी मनुष्य पाप करता और समाज के अन्याय का रोना रोता है। ये चीज़ें मनुष्य की अन्वेषण की लालसा और इच्छा को दबा नहीं सकतीं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण केवल और अधिक कष्ट की ओर ही ले जा सकते हैं और मनुष्य को एक निरंतर भय की स्थिति में रख सकते हैं, और वह यह नहीं जान सकता कि मानवजाति के भविष्य या आगे आने वाले मार्ग का सामना किस प्रकार किया जाए। यहाँ तक कि मनुष्य विज्ञान और ज्ञान से भी डरने लगता है, और खालीपन के एहसास से और भी भय खाने लगता है। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वंतत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज करने की इच्छा से बचकर भागने में सर्वथा अक्षम हो, और खालीपन के व्याकुल करने वाले बोध से बचकर भागने में तो और भी ज्यादा अक्षम हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए सामान्य हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता। मनुष्य आखिरकार मनुष्य है, और परमेश्वर का स्थान और जीवन किसी मनुष्य द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। मानवजाति को केवल एक निष्पक्ष समाज की ही आवश्यकता नहीं है, जिसमें हर व्यक्ति को नियमित रूप से अच्छा भोजन मिलता हो और जिसमें सभी समान और स्वतंत्र हों, बल्कि मानवजाति को आवश्यकता है परमेश्वर के उद्धार और अपने लिए जीवन की आपूर्ति की। केवल जब मनुष्य परमेश्वर का उद्धार और जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है, तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की लालसा और आध्यात्मिक रिक्तता का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर के उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो वह देश या राष्ट्र पतन के मार्ग पर, अंधकार की ओर चला जाएगा, और परमेश्वर द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को शैतानों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य की सोच और धारणाओं को विद्रोह के एक अलग युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह उन पुस्तकों और क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा खुशामदी करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा ख़राब हो गई हैं। शैतानों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके दृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य एक कुरूप और दुष्ट आत्मा तथा शैतानों के राजा के चेहरे के अधीन हो गया। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई, और शैतानों के राजा की द्रोहपूर्ण दुर्भावना दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती गई, जब तक कि वह पूरी तरह से बरबाद नहीं हो गया। उसके पास ज़रा-भी स्वतंत्रता नहीं रह गयी और उसके पास शैतानों के राजा के चंगुल से छूटने का कोई उपाय नहीं था। उसके पास वहीं के वहीं उसकी उपस्थिति में बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसकी अधीनता में घुटने टेक देने के सिवा कोई चारा नहीं था। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय और आत्मा अभी शैशवावस्था में ही थे, शैतानों के राजा ने उनमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को समझो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है।" यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, "आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने कठोर श्रम पर भरोसा करें," और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। बेख़बर मनुष्य, इसके सामने लाया गया, और इसने बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लिया। कभी भी इसे शर्म का बोध नहीं हुआ। इतना ही नहीं, इसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लिया और उन्हें अपने घर में खींच लिया, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलकर चढ़ गया और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और घिनौनी बातें कहता है : "दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण होने वाले रूपांतरणों से चलती है; बारिश तब होती है, जब पानी भाप बनकर ठंडे तापमानों से मिलता है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरता है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिक विक्षोभ के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का किया कौन-सा काम है?" ऐसे लोग भी हैं, जो कुछ ऐसे बयान भी देते हैं, जिन्हें स्वर नहीं दिया जाना चाहिए, जैसे कि : "मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाजों के अनुक्रमण से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।" पृष्ठभूमि में, शैतान लोगों को उसे दीवार पर लटकाकर या मेज पर रखकर श्रद्धांजलि अर्पित करने और भेंट चढ़ाने के लिए बाध्य करता है। जब वह चिल्लाता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा शैतानों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! ...

ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके विरोध में काम करता रहा है। "प्राचीन सांस्कृतिक विरासत", मूल्यवान "प्राचीन संस्कृति के ज्ञान", "ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं" और "कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों" की इस सारी चर्चा ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नज़र नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के "वानरों" द्वारा प्रचारित सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि वह उसे पूरे का पूरा निगल[1] भी जाना चाहता है। सामंतवाद की नैतिक और आचार-विचार विषयक शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो ख़ुशी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हत्यारी साँस हवा में व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का "विनाश" करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

जो लोग शैतान के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और सिद्धांत मुख्यत: शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं।" पृथ्वी के उन पिशाच राजाओं, महान लोगों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए वचन मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, कन्फ़्यूशियस, जिसके बारे में चीनी लोगों द्वारा "ऋषि" के रूप में शेखी बघारी जाती है, के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों की अक्सर उद्धृत की गई विशेष कहावते हैं; ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति की रूपरेखाएँ हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में डाल दिया गया है, सब शैतान से आते हैं; उनमें से एक छोटा सा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और वे सभी नकारात्मक चीज़ें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों से जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य के जीवन-प्रकृति बन गए हैं। "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे : "चूँकि तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है, ऐसी कौन-सी मुख्य प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनके अनुसार तुम लोग जीते हो?" शायद वह कहे, "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'अधिकारी उपहार देने वालों को नहीं मार गिराते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या ये शब्द उस व्यक्ति की प्रकृति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? पद पाने के लिए अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करना उसकी प्रकृति बन गयी है, और अधिकारी होना ही उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में, और उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें बिलकुल भी कोई सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और प्रवीण लोगों के सफलता पाने के अपने ही मार्ग और रहस्य होते हैं, तो क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? वे दुनिया में कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं और उन के पीछे उनकी जो चालें और षड्यंत्र हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति आखिर कितनी कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

क्या ज्ञान ऐसी चीज़ है, जिसे हर कोई सकारात्मक चीज़ मानता है? लोग कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि "ज्ञान" शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक के बजाय सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी ज्ञान का ही एक भाग है, है न? (हाँ।) तो फिर ज्ञान क्यों उन चीज़ों में सूचीबद्ध है, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है? तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या ज्ञान में सत्य का लेश मात्र भी होता है? (नहीं।) तो ज्ञान का सार क्या है? मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाने वाले समस्त ज्ञान का आधार क्या है? क्या यह विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या मनुष्य द्वारा खोज और संकलन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान नास्तिकता पर आधारित नहीं है? क्या ऐसे किसी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना करने के साथ जुड़ा है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा है? (नहीं।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है? मैंने अभी-अभी कहा कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना करने या सत्य के साथ नहीं जुड़ा है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं : "हो सकता है, ज्ञान का सत्य से कोई लेना-देना न हो, किंतु फिर भी, यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।" तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या तुम्हें ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि व्यक्ति की खुशी उसके अपने दो हाथों द्वारा सृजित होनी चाहिए? क्या ज्ञान ने तुम्हें यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है? (हाँ।) यह कैसी बात है? (यह शैतानी बात है।) बिलकुल सही! यह शैतानी बात है! ज्ञान चर्चा का एक जटिल विषय है। तुम बस यह कह सकते हो कि ज्ञान का क्षेत्र ज्ञान से अधिक कुछ नहीं है। ज्ञान का यह क्षेत्र ऐसा है, जिसे परमेश्वर की उपासना न करने और परमेश्वर द्वारा सब चीज़ों का निर्माण किए जाने की बात न समझने के आधार पर सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो वे यह नहीं देखते कि सभी चीज़ों पर परमेश्वर का प्रभुत्व है; वे नहीं देखते कि परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभारी है या सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है। इसके बजाय, वे जो कुछ भी करते हैं, वह है ज्ञान के क्षेत्र का अंतहीन अनुसंधान और खोज, और वे ज्ञान के आधार पर उत्तर खोजते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे और इसके बजाय केवल अनुसंधान करेंगे, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे? वह सब ज्ञान तुम्हें केवल जीविकोपार्जन, एक नौकरी, आमदनी दे सकता है, ताकि तुम भूखे न रहो; किंतु वह तुम्हें कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं करने देगा, और वह कभी भी तुम्हें बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना अधिक तुम ज्ञान का अध्ययन करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, परमेश्वर को अपने अध्ययन के अधीन करने, परमेश्वर को प्रलोभित करने और परमेश्वर का विरोध करने की इच्छा करोगे। तो अब हम क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखा रहा है? यह सब शैतान का फ़लसफ़ा है। क्या शैतान द्वारा भ्रष्ट मनुष्यों के बीच फैलाए गए फ़लसफ़ों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई संबंध है? उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के विपरीत हैं। लोग प्रायः कहते हैं, "जीवन गति है" और "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, अगर मनुष्य एक बार का भोजन छोड़ता है, तो वह भूख से बेज़ार महसूस करता है"; ये क्या कहावतें हैं? ये भुलावे हैं और इन्हें सुनने से घृणा की भावना पैदा होती है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन का फ़लसफ़ा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, अपना फ़लसफ़ा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने अपने दृष्टिकोण, धारणाएँ और विचार मनुष्य के मन में भर दिए हैं, तो क्या इस प्रक्रिया में मनुष्य भ्रष्ट नहीं होता? (हाँ।) अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित कर लेता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर जी रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोणों और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है, जो इस ज्ञान के भीतर छिपे हैं। यहीं पर शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का अनिवार्य अंश घटित होता है; यह शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि दोनों है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

"पैसा दुनिया को नचाता है" यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है और यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है। तुम कह सकते हो कि यह एक रुझान है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है। बिलकुल शुरू से ही, लोगों ने इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो उन्होंने इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोग इस कहावत को समान रूप से नहीं समझते, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे इस कहावत के संबंध में किसी के पास कितना भी अनुभव हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? तुम लोगों में से प्रत्येक को शामिल करते हुए, दुनिया के लोगों के स्वभाव के माध्यम से कोई चीज़ प्रकट होती हैं। इस तरह प्रकट होने वाली इस चीज़ की व्याख्या कैसे की जाती है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच गहन है! तो शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस रुझान का उपयोग किए जाने के बाद, यह उनमें कैसे अभिव्यक्त होता है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे की खोज में लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? इतना ही नहीं, क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या यह लोगों का नुकसान नहीं है? (हाँ, है।) क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक की प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में फँस जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसकी खोज करने में तुम असमर्थ हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किंतु तुम सत्य को पाने के लिए क़ीमत चुकाने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, तुम बिलकुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करने में अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे तुम्हें इस बात का एहसास क्यों न हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर का प्रेम कितना गहरा और कितना महान है, तुम फिर भी हठपूर्वक अपने रास्ते पर ही चलते रहने का आग्रह करोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। अर्थात्, यह कहावत पहले से ही तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करती है, और बजाय इस सबको त्यागने के, तुम अपने भाग्य को इस कहावत से नियंत्रित करवाओगे। क्या यह तथ्य कि लोग ऐसा करते हैं, कि वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित और प्रभावित होते हैं, यह नहीं दर्शाता कि शैतान का मनुष्यों को भ्रष्ट करना कारगर है? क्या यह शैतान के फ़लसफ़े और भ्रष्ट स्वभाव का तुम्हारे हृदय में जड़ जमाना नहीं है? अगर तुम ऐसा करते हो, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हाँ।) क्या तुम देखते हो कि कैसे इस तरह से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया है? क्या तुम इसे महसूस कर सकते हो? (नहीं।) तुमने इसे न तो देखा है, न महसूस किया है। क्या तुम यहाँ शैतान की दुष्टता को देखते हो? शैतान हर समय और हर जगह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असंभव बना देता है और वह इसके सामने मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को तुमसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है, जहाँ तुम अज्ञानता में होते हो, और जब तुम्हें इस बात का पता नहीं चलता कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को स्वीकार कर लेते हैं और इन पर कोई आपत्ति नहीं करते। वे इन चीज़ों को सँजोते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को अपने साथ जोड़-तोड़ करने देते हैं और उन्हें अपने साथ खिलवाड़ करने देते हैं; और इस तरह शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा होता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के बारे में, जब लोग एक साथ मिलकर संगति करते हैं, और प्रार्थना करके परमेश्वर के वचनों के मूल पाठ को पढ़ते हैं, तो अपने स्वयं के ज्ञान की बात करते समय वे अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपने प्रबोधनों तथा रोशनी को शामिल कर सकते हैं—हालाँकि, तुम्हें मनमाने ढंग से परमेश्वर के वचनों की व्याख्या नहीं करनी चाहिए, जैसे कि वे तुम्हारे ही हाथों की उपज हों। परमेश्वर के वचनों को तुम्हारे समझाने की आवश्यकता नहीं होती है, और न ही तुम स्पष्ट रूप से या समझ में आने लायक उनकी व्याख्या कर सकते हो। यह पर्याप्त है कि तुम्हारे पास कुछ मामूली प्रबोधन, रोशनी या अनुभव हो, लेकिन सत्य की व्याख्या करने का, लोग परमेश्वर की इच्छा को समझ सकें इस हेतु अपने स्पष्टीकरण का उपयोग करने का, प्रयास कैसा होगा? यह असंभव होगा। ऐसा करना ग़लत काम है। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों में पढ़ते हैं कि परमेश्वर उन लोगों से प्रेम करता है जो ईमानदार हैं। परमेश्वर ने इंसान से कहा, "परन्तु तुम्हारी बात 'हाँ' की 'हाँ,' या 'नहीं' की 'नहीं' हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है" (मत्ती 5:37)। आज भी, परमेश्वर के वचन लोगों को ईमानदार होने के लिए कहते हैं। इसलिए परमेश्वर के वचनों और उसकी अपेक्षा के प्रति सही रवैया क्या है? परमेश्वर के वचनों में खोजो : परमेश्वर ने कहा, "परन्तु तुम्हारी बात 'हाँ' की 'हाँ,' या 'नहीं' की 'नहीं' हो।" परमेश्वर की नज़रों में जो लोग ईमानदार होते हैं, वे ठीक कैसा व्यवहार करते हैं? वे कैसे बोलते हैं, वे कैसे कार्य करते हैं, वे अपने कर्तव्य के प्रति क्या दृष्टिकोण रखते हैं, और वे दूसरों के साथ कैसे सही ढंग से काम करते हैं? लोगों को इन सिद्धांतों और अभ्यास के मार्गों के लिए परमेश्वर के वचनों में खोज करनी चाहिए, ताकि वे ऐसे ईमानदार लोग बन सकें जिनकी उसे आवश्यकता है। यह सही रवैया है, वो रवैया जो सत्य की तलाश करने वालों के पास होना चाहिए। तो वे लोग कैसा व्यवहार करते हैं जो सत्य की तलाश नहीं करते, जो सत्य से प्रेम नहीं करते, और जो परमेश्वर और उसके वचनों का कोई भय नहीं मानते हैं? वे परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, और सीधे कहते हैं, "परमेश्वर की अपेक्षा है कि लोग ईमानदार हों। प्रभु यीशु ने यही कहा है। आज का परमेश्वर एक बार फिर लोगों को ईमानदार होने के लिए कह रहा है। यह मुझे पहले से ही पता है। क्या ईमानदार लोग निष्कपट लोग नहीं होते? क्या यह ऐसा नहीं है जैसा लोग कहा करते हैं, कि निष्कपट लोग सदा विजयी होते हैं, कि अच्छे लोगों का जीवन शांतिपूर्ण होता है, और जो लोग निष्कपट होते हैं उनका शोषण करना पाप है? देखो, परमेश्वर निष्कपट लोगों द्वारा सहे गए अन्याय का निवारण कर रहा है।" क्या ये शब्द सत्य हैं? क्या ये सत्य-सिद्धांत हैं जिन्हें उन्होंने ढूँढ निकाला है? (नहीं।) तो ये शब्द क्या हैं? क्या उन्हें विधर्म और भ्रांतियाँ कहा जा सकता है? (उन्हें ऐसा कहा जा सकता है।) जो लोग आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते या सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, वे हमेशा परमेश्वर के वचनों को उसके साथ जोड़ते हैं, जिसे मानवजाति के बीच कर्णप्रिय और उचित माना जाता है। क्या यह परमेश्वर के वचनों का दर्जा घटाना नहीं है? क्या यह सत्य को मानवजाति के लिए एक तरह के नारे में, काम करने के तरीके के लिए एक तर्क में, परिवर्तित करना नहीं है? वे इस बात को अनदेखा करते हैं कि परमेश्वर ईमानदार होने के बारे में क्या कहता है—वे जो ईमानदार हैं कैसा व्यवहार करते हैं, ईमानदार कैसे बनें, इसके नियम क्या हैं—और वे निरर्थक रूप से यह दावा करते हैं कि परमेश्वर चाहता है कि लोग निष्कपट बनें और वे सब जो निष्कपट, निठल्ले और मूर्ख हैं, ईमानदार लोग होते हैं। क्या यह परमेश्वर के वचनों की एक ग़लत व्याख्या नहीं है? वे लोग परमेश्वर के वचनों की गलत व्याख्या करते हैं, फिर भी खुद को बहुत चालाक समझते हैं, और यह मानते हैं कि परमेश्वर के वचन इसके अलावा और कुछ नहीं हैं : "सत्य इतना गहन नहीं होता, क्या यह सिर्फ निष्कपट होना नहीं है? और क्या एक निष्कपट व्यक्ति होना सरल नहीं है? चोरी मत करो, गाली मत दो, लड़ाई मत करो। 'मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनो'। सभी बातों में दूसरों के प्रति सहिष्णु रहो, अच्छे बनो, और अच्छे लोगों का जीवन शांतिपूर्ण होगा।" वे बहुत कुछ कहते हैं, लेकिन उनमें से कुछ भी सत्य के अनुरूप नहीं होता, यह विधर्म और भ्रान्ति के अलावा और कुछ नहीं होता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर के वचनों के साथ इसका कुछ संबंध है, यह उनके साथ जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, लेकिन जब कोई इसकी गहराई में जाता है और अधिक निकटता से देखता है, तो यह धोखे के अलावा और कुछ नहीं होता है, यह लोगों के विचारों को भ्रमित करने के अलावा और कुछ नहीं करता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा करते हैं, सिद्धांतों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग पाँच)' से उद्धृत

परमेश्वर और मनुष्य के वचनों के बीच, और सत्य और सिद्धांत के बीच, सारभूत अंतर क्या होता है? परमेश्वर के वचनों के कारण लोग समझदारी और अंतःकरण में, सिद्धांत के साथ कार्य करने में, विकास हासिल करते हैं, और वे जो जीते हैं उसमें सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता से ज़्यादा-से-ज्यादा लैस होते हैं। दूसरी ओर, इंसान के शब्द लोगों की रुचि और नज़रियों के साथ पूरी तरह से सही बैठते हुए प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन चूँकि वे सत्य नहीं होते, वे ख़तरों, प्रलोभनों, विधर्म और भ्रांतियों से छलकते हैं, और इसलिए यदि लोग इन शब्दों के अनुसार काम करते हैं, तो वे जो जीवन जीते हैं वह परमेश्वर से, और परमेश्वर के मानकों से, और भी दूर भटक जाएगा। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि लोगों के जीने का तरीका और भी अधिक बुरा और शैतान जैसा हो जाएगा। जब लोग पूरी तरह से इंसान के विधर्म और भ्रांतियों के द्वारा जीते और कार्य करते हैं, जब वे इन तर्कों को पूरी तरह से गले लगा लेते हैं, तो वे शैतान की तरह जीते हैं। और क्या शैतान की तरह जीने का मतलब यह नहीं होता कि वे शैतान ही हैं? (हाँ।) इसलिए तुम "सफलतापूर्वक" एक जीवित शैतान बन गए हो। कुछ लोग कहते हैं, "मैं इसे नहीं मानता। मैं तो बस एक ऐसा निष्कपट व्यक्ति बनना चाहता हूँ, जो दूसरों के द्वारा पसंद किया जाता हो। मैं तो एक ऐसा व्यक्ति बनना चाहता हूँ जिसे ज़्यादातर लोग अच्छा मानते हों, और फिर मैं देखूँगा कि परमेश्वर मुझसे खुश होता है या नहीं।" यदि परमेश्वर जो कहता है उसे तुम नहीं मानते हो, तो जाओ और निगाहें डालो, और—देखो कि क्या परमेश्वर के वचन सत्य हैं, या मनुष्य की अवधारणाएँ सत्य हैं। यह परमेश्वर के वचनों और मनुष्य के शब्दों के बीच का सारभूत अंतर है। यह सत्य और विधर्म तथा भ्रांतियों के बीच का सारभूत अंतर है। चाहे विधर्म और भ्रांतियाँ लोगों की पसंदों के साथ कितनी भी मिलती हों, वे कभी उनका जीवन नहीं बन सकती हैं; इस बीच, चाहे परमेश्वर के वचन कितने भी सरल प्रतीत होते हों, कितने भी देशी, लोगों की अवधारणाओं के साथ चाहे कितने भी बेमेल, उनका सार सत्य होता है, और अगर लोग जो करते हैं और जीते हैं, वो परमेश्वर के वचन-सिद्धांतों के अनुसार हो, तो अंततः, एक दिन, वे परमेश्वर के सच्चे योग्य प्राणी बन जाएँगे, और वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम होंगे। इस बीच, जो लोग इसे हासिल नहीं करते हैं, वे जो जीते हैं और उनका अंतिम मार्ग, उन्हें केवल परमेश्वर द्वारा घृणित और अस्वीकृत होने की ओर ले जा सकते हैं : यह एक तथ्य है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा करते हैं, सिद्धांतों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग पाँच)' से उद्धृत

परमेश्वर, सत्य की अपनी अभिव्यक्ति में, अपने स्वभाव और सार को व्यक्त करता है; सत्य की उसकी अभिव्यक्ति मानवों के विभिन्न सकारात्मक चीजों के सार और उन वक्तव्यों पर आधारित नहीं है, जिसे मनुष्य जानते हैं। परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन हैं; परमेश्वर के वचन सत्य हैं। वे नींव और नियम हैं, जिनके अनुसार मानव जाति का अस्तित्व होना चाहिए और मानवता के साथ उत्पन्न होने वाली उन तथाकथित मान्यताओं की परमेश्वर द्वारा निंदा की जाती है। उन्हें परमेश्वर की स्वीकृति नहीं मिलती और वे उसके कथनों के मूल या आधार तो बिलकुल नहीं हैं। परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से अपने स्वभाव और अपने सार को व्यक्त करता है। परमेश्वर की अभिव्यक्ति द्वारा लाए गए सभी वचन सत्य हैं, क्योंकि उसमें (परमेश्वर में) परमेश्वर का सार है, और वह सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। भ्रष्ट मानव चाहे परमेश्वर के वचनों को कैसे भी प्रस्तुत या परिभाषित करे, यह तथ्य कभी नहीं बदलता कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, न ही इससे बदलता है कि वह उन्हें कैसे देखता या समझता है। परमेश्वर ने चाहे कितने भी शब्द क्यों न बोले हों, और यह भ्रष्ट, पापी मानव जाति चाहे उनकी कितनी भी निंदा क्यों न करे, उन्हें कितना भी अस्वीकार क्यों न करे, एक तथ्य है जिसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता : इन परिस्थितियों में भी तथाकथित संस्कृति और परंपराएं, जिन्हें मानव जाति महत्व देती है, वे सकारात्मक बातें नहीं बन सकती हैं, सत्य नहीं बन सकती हैं। यह अटल है। मानव जाति की पारंपरिक संस्कृति और अस्तित्व का तरीका परिवर्तनों या समय के अंतराल के कारण सत्य नहीं बन जाएगा, और न ही परमेश्वर के वचन मानव जाति की निंदा या विस्मृति के कारण मनुष्य के शब्द बन जाएंगे। यह सार कभी नहीं बदलेगा; सत्य हमेशा सत्य होता है। यहाँ कौन-सा तथ्य मौजूद है? मानव जाति द्वारा संक्षेप में बताई गई वे सभी बातें जो शैतान से उत्पन्न होती हैं—वे सभी मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, यहाँ तक कि मनुष्य के जोश से भी हैं, और सकारात्मक चीजों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी ओर, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के सार और हैसियत की अभिव्यक्ति हैं। वह इन वचनों को किस कारण से व्यक्त करता है? मैं क्यों कहता हूँ कि वे सत्य हैं? इसका कारण यह है कि परमेश्वर सभी चीजों के सभी नियमों, सिद्धांतों, जड़ों, सारों, वास्तविकताओं और रहस्यों पर शासन करता है, वे उसकी मुट्ठी में हैं, और एकमात्र परमेश्वर ही उनकी उत्पत्ति जानता है और जानता है कि वास्तव में उनकी जड़ें क्या हैं। इसलिए, परमेश्वर के वचनों में सभी चीजों की जो उल्लिखित परिभाषाएं हैं, बस वही सबसे सही हैं, और परमेश्वर के वचनों में मानव जाति से अपेक्षाएँ मानव जाति के लिए एकमात्र मानक हैं—एकमात्र मापदंड जिसके अनुसार मानव जाति को अस्तित्व में रहना चाहिए। तथापि, जिन नियमों के अनुसार मानव जाति जीती है, एक प्रकार से उनकी व्युत्पत्ति, समस्त वस्तुओं पर परमेश्वर के शासन के तथ्य के उल्लंघन से हुई है, और एक अन्य दृष्टिकोण से उनकी व्युत्पत्ति, समस्त वस्तुओं पर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य के उल्लंघन से हुई है। वे मनुष्य की कल्पनाओं और धारणाओं से आते हैं और शैतान से भी आते हैं। शैतान किस प्रकार की भूमिका निभाता है? सबसे पहले, शैतान सत्य का भेष धारण करता है; दूसरे, यह परमेश्वर द्वारा सभी चीजों का निर्माण के सभी सिद्धांतों और नियमों को नष्ट कर देता है, उन्हें अस्तव्यस्त करता है, और कुचल डालता है। इस प्रकार, शैतान से निर्गत चीजें, उसके सार से सटीक रूप से मेल खाती हैं और शैतान के गलत इरादों, प्रलोभनों और कपट के साथ-साथ शैतान की कभी समाप्त न होने वाली महत्वाकांक्षा से आती हैं। भ्रष्ट मानव जाति चाहे उन्हें समझ पाये या न समझ पाये, भ्रष्ट मानव जाति चाहे उन्हें जिस हद तक भी स्वीकार करे, और चाहे वह युग जितना भी बड़ा हो जिसके दौरान भ्रष्ट मानव जाति उनकी सराहना और पूजा करती है, और इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग इसका प्रचार करते हैं, पर ये बातें कभी भी सत्य नहीं बन सकतीं। वे कभी सत्य नहीं बनेंगी, और हमेशा नकारात्मक बातें ही बनी रहेंगी, क्योंकि उनका सार, स्रोत और जड़ शैतान है, वह शैतान जो परमेश्वर का शत्रु है और जिसकी सत्य से शत्रुता है। जब अंतर दिखाने हेतु उनकी तुलना करने के लिए कोई सत्य नहीं होता, तो वे यह दिखावा कर सकती हैं कि वे अच्छी हैं और वे सकारात्मक हैं, लेकिन जब उनका विश्लेषण करने और उन्हें उजागर करने के लिए सत्य का उपयोग किया जाता है, तो वे आलोचनीयता से रहित नहीं होती हैं। वे टिक नहीं सकतीं, और वे ऐसी चीजें हैं जो जल्दी ही निंदित, उजागर होकर और किनारे कर दी जाती हैं। परमेश्वर जो सत्य व्यक्त करता है वह परमेश्वर द्वारा सृजित मानव जाति की सामान्य मानवता की आवश्यकताओं के बिलकुल अनुरूप होता है, जबकि जो शैतान मनुष्य को देता है वह उन आवश्यकताओं का पूरी तरह उल्लंघन करती है। यह एक सामान्य व्यक्ति को असामान्य, अति करने वाला, संकुचित विचार वाला, घमंडी, मूर्ख, दुष्ट, कठोर, शातिर और सब से ऊपर, अत्यधिक अहंकारी बनाता है। एक निश्चित बिंदु पर, वह व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है, तब उसे यह भी पता नहीं रहता कि वह कौन है। ऐसे लोग सामान्य व्यक्ति होने से इंकार करते हैं और असामान्य मनुष्यों की तरह कार्य करते हैं; वे साधारण मनुष्य होने से इंकार करते हैं और इसके बजाय श्रेष्ठ मानव बनने पर जोर देते हैं—और इस प्रकार लोगों की मानवता विकृत होती है और इस प्रकार उनकी प्रवृत्ति विकृत हो जाती है। सत्य लोगों को सामान्य मानवता के सिद्धांतों और नियमों के अनुसार स्वाभाविक प्रवृत्ति और परमेश्वर द्वारा निर्देशित सभी सिद्धांतों के अनुरूप जीने में सक्षम बनाता है, जबकि शैतान की ये तथाकथित कहावतें और नियम लोगों के अपनी सहज प्रवृत्ति का उल्लंघन करने और उन कानूनों से बचने का प्रयास करने के कारण बनते हैं जो परमेश्वर द्वारा निर्देशित और निर्धारित किए गए हैं, और यहां तक कि इसके कारण वे सामान्य मानवता के मार्ग तक छोड़ देते है, उचित सीमा से बाहर की उन चीजों को करते हैं, जिन्हें सामान्य मानवता युक्त लोगों को नहीं करना चाहिए और जिनके बारे से उन्हें सोचना भी नहीं चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग एक)' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "निगल" जाना शैतानों के राजा के शातिर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से मोह लेता है।

क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।

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वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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