112. बड़े लाल अजगर और शैतान की पहचान करने के सिद्धांत

(1) शैतान मानव जाति की भ्रष्टता का प्रधान वास्तुकार है; बड़ा लाल अजगर शैतान का मूर्त रूप है, और यह बुराई की सभी शक्तियों का मुख्य स्रोत है;

(2) बड़ा लाल अजगर झूठ का, साथ ही साथ सभी तरह के विधर्म और भ्रान्ति का, लाभ उठाता है, ताकि लोगों को मोहित, नियंत्रित और निर्बल किया जा सके, जिससे वे परमेश्वर का विरोध और उसके प्रति विश्वासघात करें;

(3) महान लाल अजगर द्वारा रचित विभिन्न अफवाहों और प्रतिक्रियात्मक सिद्धांतों की पहचान करने में सक्षम होना, और इसके राक्षसी सार के मर्म को देखना आवश्यक है—वह जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसके प्रति घृणा को आश्रय देता है;

(4) सारी मानवजाति को शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और एक शैतानी स्वभाव से भर दिया गया, है। इसे विश्लेषित करने और पहचानने के लिए किसी व्यक्ति को सत्य का इस्तेमाल करना चाहिए और अपने शैतानी स्वभाव को दूर करना चाहिए; केवल ऐसा करके ही कोई शैतान का त्याग करता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

बड़े लाल अजगर की अभिव्यक्ति मेरे प्रति प्रतिरोध, मेरे वचनों के अर्थों की समझ और बोध की कमी, बार-बार मेरा उत्पीड़न और मेरे प्रबंधन को बाधित करने के लिए षड़यंत्र करने की कोशिश करना है। शैतान इस प्रकार से अभिव्यक्त होता है: सामर्थ्य के लिए मेरे साथ संघर्ष करना, मेरे चुने हुए लोगों पर कब्ज़ा करने की इच्छा करना और मेरे लोगों को धोखा देने के लिए नकारात्मक बातें करना। शैतान (जो लोग मेरे नाम को स्वीकार नहीं करते, जो विश्वास नहीं करते, वे सभी शैतान हैं) की अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार हैं: देह के सुखों की अभिलाषा करना, वासनाओं में लिप्त होना, शैतान के बंधन में रहना, कुछ लोगों द्वारा मेरा विरोध करना और कुछ के द्वारा मेरा समर्थन किया जाना (किन्तु यह साबित नहीं करना कि वे मेरे प्रिय पुत्र हैं)। महादूत की अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार है: गुस्ताखी से बोलना, धर्मभ्रष्ट होना, लोगों को व्याख्यान देने के लिए प्रायः मेरा स्वर अपनाना, केवल बाहरी तौर पर मेरी नकल करना, जो मैं खाता हूँ वह खाना और जो मैं उपयोग करता हूँ उसका उपयोग करना; संक्षेप में, मेरे साथ बराबरी करने की इच्छा करना, महत्वाकांक्षी होना, किन्तु मेरी काबिलियत का अभाव और मेरा जीवन नहीं होना, और निकम्मा होना। शैतान, दुष्ट और महादूत, सभी बड़े लाल अजगर के विशिष्ट प्रदर्शन हैं, इसलिए जो लोग मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित नहीं हैं, वे सभी बड़े लाल अजगर की संतान हैं: यह बिल्कुल ऐसा ही है! ये सभी मेरे दुश्मन हैं। (हालाँकि शैतान के व्यवधानों को बाहर रखा गया है। यदि तुम्हारी प्रकृति मेरी खूबी है, तो इसे कोई भी बदल नहीं सकता। क्योंकि तुम अभी भी देह में रहते हो, इसलिए कभी-कभी तुम्हें शैतान के प्रलोभनों का सामना करना पड़ेगा—यह अपरिहार्य है—किन्तु तुम्हें सदा सावधान रहना चाहिए।) इसलिए, मैं अपनी प्रथम संतानों के अतिरिक्त, बड़े लाल अजगर की सभी संतानों को त्याग दूँगा। उनकी प्रकृति कभी नहीं बदल सकती और यह शैतान का गुण है। वे लोग शैतान को अभिव्यक्त करते हैं और महादूत को जीते हैं। यह पूरी तरह सच है। जिस बड़े लाल अजगर की मैं बात करता हूँ वह बड़ा लाल अजगर नहीं है; बल्कि यह मेरी विरोधी दुष्ट आत्मा है, जिसके लिए "बड़ा लाल अजगर" एक समानार्थी है। इसलिए पवित्र आत्मा के अतिरिक्त सभी आत्माएँ दुष्ट आत्माएँ हैं और उन्हें बड़े लाल अजगर की संतान भी कहा जा सकता है। सभी को यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 96' से उद्धृत

कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य की सोच और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले[1] बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ प्रकाश कभी दिखाई नहीं दे सकता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते हैं...। कभी किसी ने धार्मिकता और न्याय के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, सूखे और पीले-भूरे रंग के। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय-से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन "अधोलोक" में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को धीरे-धीरे अधोलोक में धकेल रहे हैं, जिससे वह अधोलोक की और अधिक गहराई में पहुँच रहा है और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता गया है, आज तो परमेश्वर उसके लिए पूर्णत: अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे बचने के लिए जल्दी से निकल जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि उसने उसे कभी जाना ही न हो या उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर अपना अदम्य रोष उस पर प्रकट न करते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में कोई भी उसके अस्तित्व को खोज नहीं पाया है। परमेश्वर स्वयं द्वारा लाया गया कार्य पूरा करते हुए मानव-जगत की दुर्दशा का कष्ट चुपचाप सहन करता रहता है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति की ज़रूरतों की खातिर कष्ट सहना जारी रखता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानवजाति की ज़रूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में वह चुपचाप उसकी सेवा में खड़ा रहा है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को शैतानों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य की सोच और धारणाओं को विद्रोह के एक अलग युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह उन पुस्तकों और क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा खुशामदी करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा ख़राब हो गई हैं। शैतानों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके दृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य एक कुरूप और दुष्ट आत्मा तथा शैतानों के राजा के चेहरे के अधीन हो गया। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई, और शैतानों के राजा की द्रोहपूर्ण दुर्भावना दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती गई, जब तक कि वह पूरी तरह से बरबाद नहीं हो गया। उसके पास ज़रा-भी स्वतंत्रता नहीं रह गयी और उसके पास शैतानों के राजा के चंगुल से छूटने का कोई उपाय नहीं था। उसके पास वहीं के वहीं उसकी उपस्थिति में बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसकी अधीनता में घुटने टेक देने के सिवा कोई चारा नहीं था। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय और आत्मा अभी शैशवावस्था में ही थे, शैतानों के राजा ने उनमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को समझो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है।" यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, "आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने कठोर श्रम पर भरोसा करें," और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। बेख़बर मनुष्य, इसके सामने लाया गया, और इसने बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लिया। कभी भी इसे शर्म का बोध नहीं हुआ। इतना ही नहीं, इसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लिया और उन्हें अपने घर में खींच लिया, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलकर चढ़ गया और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और घिनौनी बातें कहता है : "दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण होने वाले रूपांतरणों से चलती है; बारिश तब होती है, जब पानी भाप बनकर ठंडे तापमानों से मिलता है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरता है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिक विक्षोभ के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का किया कौन-सा काम है?" ऐसे लोग भी हैं, जो कुछ ऐसे बयान भी देते हैं, जिन्हें स्वर नहीं दिया जाना चाहिए, जैसे कि : "मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाजों के अनुक्रमण से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।" पृष्ठभूमि में, शैतान लोगों को उसे दीवार पर लटकाकर या मेज पर रखकर श्रद्धांजलि अर्पित करने और भेंट चढ़ाने के लिए बाध्य करता है। जब वह चिल्लाता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा शैतानों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! यह आदमी को उससे गहरी घृणा करने के लिए बाध्य कर देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर और वह कट्टर दुश्मन हैं, और दोनों सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। वह व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है[2] और परमेश्वर को दूर भगाने की योजना बनाता है। ऐसा है यह शैतानों का राजा! इसके अस्तित्व को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? यह तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक परमेश्वर के काम को ख़राब नहीं कर देता और उसे पूरा खंडहर[3] नहीं बना देता, मानो वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली न मर जाए या जाल न टूट जाए। वह जानबूझकर खुद को परमेश्वर के ख़िलाफ़ खड़ा कर लेता है और उसके करीब आता जाता है। इसका घिनौना चेहरा बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब हो गया है, जो अब आहत और क्षत-विक्षत[4] है और एक खेदजनक स्थिति में है, फिर भी वह परमेश्वर से नफ़रत करने से बाज़ नहीं आएगा, मानो परमेश्वर को एक कौर में निगलकर ही वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पा सकेगा। परमेश्वर के इस शत्रु को हम कैसे बरदाश्त कर सकते हैं! केवल इसके उन्मूलन और पूर्ण विनाश से ही हमारे जीवन की इच्छा फलित होगी। इसे उच्छृंखल रूप से कैसे दौड़ते फिरने दिया जा सकता है? यह मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग सूर्य को नहीं जानता, और वह अचेत और भावनाशून्य हो गया है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक खो दिया है। शैतान को नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों नहीं हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर दें, ताकि भविष्य की सारी चिंताएँ दूर कर सकें और परमेश्वर के कार्य को जल्दी से अभूतपूर्व भव्यता तक पहुँचने दें? बदमाशों का यह गिरोह मनुष्यों की दुनिया में आ गया है और यहाँ उथल-पुथल मचा दी है। वे सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान की कगार पर ले आए हैं और गुप्त रूप से उन्हें वहाँ से धकेलकर टुकड़े-टुकड़े करने की योजना बना रहे हैं, ताकि फिर वे उनके शवों को निगल सकें। वे व्यर्थ ही परमेश्वर की योजना को खंडित करने और उसके साथ जुआ खेलकर पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने[5] की आशा करते हैं। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है! अंतत: शैतानों के राजा के लिए सलीब तैयार कर दिया गया है, जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर सलीब का नहीं है। वह पहले ही शैतान के लिए उसे किनारे रख चुका है। परमेश्वर अब से बहुत पहले ही विजयी होकर उभर चुका है और अब मानवजाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता, लेकिन वह समस्त मानवजाति के लिए उद्धार लाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके विरोध में काम करता रहा है। "प्राचीन सांस्कृतिक विरासत", मूल्यवान "प्राचीन संस्कृति के ज्ञान", "ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं" और "कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों" की इस सारी चर्चा ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नज़र नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के "वानरों" द्वारा प्रचारित सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि वह उसे पूरे का पूरा निगल[6] भी जाना चाहता है। सामंतवाद की नैतिक और आचार-विचार विषयक शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो ख़ुशी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हत्यारी साँस हवा में व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का "विनाश" करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं। शैतान की इस सारी भूमि पर, जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियाँ फैली हुई हैं, और ऊपर हवा जलते हुए कागज और धूप की वमनकारी गंध से तर है, इतनी घनी कि दम घुटता है। यह उस कीचड़ की बदबू की तरह है, जो जहरीले सर्प के कुलबुलाते समय ऊपर उठती है, जिससे व्यक्ति उलटी किए बिना नहीं रह सकता। इसके अलावा, वहाँ अस्पष्ट रूप से दुष्ट दानवों के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनी जा सकती है, जो दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, जिसे सुनकर आदमी काँपे बिना नहीं रह सकता। इस देश में हर जगह इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ रखी हैं, जिन्होंने इस देश को कामुक आनंद की दुनिया में बदल दिया है, और शैतानों का राजा दुष्टतापूर्वक हँसता रहता है, मानो उसका नीचतापूर्ण षड्यंत्र सफल हो गया हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर रहता है, और उसे यह भी पता नहीं कि शैतान ने उसे पहले ही इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह बेसुध हो गया है और उसने हार में अपना सिर लटका दिया है। शैतान चाहता है कि एक ही झपट्टे में परमेश्वर से संबंधित सब-कुछ साफ़ कर दे, और एक बार फिर उसे अपवित्र कर उसका हनन कर दे; वह उसके कार्य को टुकड़े-टुकड़े करने और उसे बाधित करने का इरादा रखता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जा दे सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अपने काम में परमेश्वर का "हस्तक्षेप" बरदाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? शैतान कैसे परमेश्वर को अपने काम को अव्यवस्थित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभकता यह शैतान कैसे परमेश्वर को पृथ्वी पर अपने शाही दरबार पर नियंत्रण करने दे सकता है? कैसे वह स्वेच्छा से परमेश्वर के श्रेष्ठतर सामर्थ्य के आगे झुक सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत उजागर की जा चुकी है, इसलिए किसी को पता नहीं है कि वह हँसे या रोए, और यह बताना वास्तव में कठिन है। क्या यही इसका सार नहीं है? अपनी कुरूप आत्मा के बावजूद वह यह मानता है कि वह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। यह सहअपराधियों का गिरोह![7] वे भोग में लिप्त होने के लिए मनुष्यों के देश में उतरते हैं और हंगामा करते हैं, और चीज़ों में इतनी हलचल पैदा कर देते हैं कि दुनिया एक चंचल और अस्थिर जगह बन जाती है और मनुष्य का दिल घबराहट और बेचैनी से भर जाता है, और उन्होंने मनुष्य के साथ इतना खिलवाड़ किया है कि उसका रूप उस क्षेत्र के एक अमानवीय जानवर जैसा अत्यंत कुरूप हो गया है, जिससे मूल पवित्र मनुष्य का आखिरी निशान भी खो गया है। इतना ही नहीं, वे धरती पर संप्रभु सत्ता ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को इतना बाधित करते हैं कि वह मुश्किल से बहुत धीरे आगे बढ़ पाता है, और वे मनुष्य को इतना कसकर बंद कर देते हैं, जैसे कि तांबे और इस्पात की दीवारें हों। इतने सारे गंभीर पाप करने और इतनी आपदाओं का कारण बनने के बाद भी क्या वे ताड़ना के अलावा किसी अन्य चीज़ की उम्मीद कर रहे हैं? राक्षस और बुरी आत्माएँ काफी समय से पृथ्वी पर अंधाधुंध विचरण कर रही हैं, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा और कष्टसाध्य प्रयास दोनों को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य बन गए हैं। सचमुच, यह एक घातक पाप है! ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर चिंतित महसूस न करे? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस न करे? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाई है और उसका घोर विरोध किया है : कितने विद्रोही हैं वे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य के जीवन-प्रकृति बन गए हैं। "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे : "चूँकि तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है, ऐसी कौन-सी मुख्य प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनके अनुसार तुम लोग जीते हो?" शायद वह कहे, "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'अधिकारी उपहार देने वालों को नहीं मार गिराते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या ये शब्द उस व्यक्ति की प्रकृति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? पद पाने के लिए अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करना उसकी प्रकृति बन गयी है, और अधिकारी होना ही उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में, और उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें बिलकुल भी कोई सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और प्रवीण लोगों के सफलता पाने के अपने ही मार्ग और रहस्य होते हैं, तो क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? वे दुनिया में कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं और उन के पीछे उनकी जो चालें और षड्यंत्र हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति आखिर कितनी कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन का फ़लसफ़ा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, फ़लसफ़ा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने अपने दृष्टिकोण, अवधारणाएँ और विचार मनुष्य के मन में भर दिए हैं, तो क्या इस प्रक्रिया में मनुष्य भ्रष्ट नहीं होता? (हाँ।) अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित कर लेता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर जी रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोणों और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है, जो इस ज्ञान के भीतर छिपे हैं। यहीं पर शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का अनिवार्य अंश घटित होता है; यह शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि दोनों है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है, चाहे यह कहानियों की व्याख्या करना हो, ज्ञान का मात्र एक अंश देना हो, या उन्हें अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करने देना हो या अपनी महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने देना हो। शैतान तुम्हें किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी ग़लत नहीं है, कि यह तो पूरी तरह स्वाभाविक है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत करना, ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देना और महत्वाकांक्षाओं का होना कर्मों की प्रेरणा को रखना है, और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें, या सफलतापूर्वक करियर बना सकें—तो क्या इस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं है? उस प्रकार से न केवल कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है बल्कि संभवतः इतिहास पर अपनी छाप छोड़ सकता है—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी बात है, और उनके लिए यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। हालाँकि, क्या शैतान अपनी भयावह मंशाओं के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और बस इतना ही होता है? कदापि नहीं। वास्तव में, मनुष्य के आदर्श चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, चाहे मनुष्य की इच्छाएँ कितनी ही वास्तविक क्यों न हों या वे कितनी ही उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह जटिल रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बिठाने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? वे हैं "प्रसिद्धि" और "लाभ"। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का तरीका चुनता है, ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का अतिवादी मार्ग नहीं है, जिसके जरिए वह लोगों से अनजाने में जीवन जीने के उसके रास्‍ते को, जीने के उसके नियमों को स्वीकार करवाता है, और जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करवाता है, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में महत्‍वाकांक्षाएं पालने लगते हैं। चाहे जीवन में ये महत्‍वाकांक्षाएं कितनी ही ऊँची प्रतीत क्यों न होती हों, वे "प्रसिद्धि" और "लाभ" से अविभाज्‍य रूप से जुडी होती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, वास्तव में सभी लोग, वे जीवन में जिस किसी चीज़ का अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाए, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए इन चीजों का लाभ उठा सकते हैं। वे सोचते हैं कि प्रसिद्धि एवं लाभ एक प्रकार की पूंजी है, जिसका उपयोग करके वे मौजमस्‍ती और देहसुख का आनंद लेने का जीवन हासिल कर सकते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ, जो मनुष्‍य को इतना प्‍यारा है, के लिए लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियतियों को ले जा कर शैतान के हाथों में सौंप देते हैं। लोग वास्तव में इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और इस सब कुछ को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं। क्या लोगों के पास तब भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे इस प्रकार से शैतान की शरण ले लेते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं? कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सर्वथा शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सर्वथा दलदल में धंस गए हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ हैं। एक बार जब कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में पड़ जाता है, तो वह आगे से उसकी खोज नहीं करता है जो उजला है, जो धार्मिक है या उन चीज़ों को नहीं खोजता है जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रसिद्धि एवं लाभ की जो मोहक शक्ति लोगों के ऊपर है वह बहुत बड़ी है, वे लोगों के लिए उनके पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि पूरे अनंतकाल तक अनवरत अनुसरण करने की चीज़ें बन जाती हैं। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से अधिक और कुछ नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, ताकि समय से पीछे न रह जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं हेतु बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त धन कमा सकें। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो कोई व्‍यक्ति इतने वर्षों तक इन कठिनाइयों एवं कष्टों को क्‍यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि एवं लाभ आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे पुकार रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाइयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर यह ज्ञान क्या है? क्या यह जीवन जीने के नियम नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिन्हें उनके ज्ञान सीखने के दौरान शैतान के द्वारा उन्हें सिखाया गया है? क्या यह जीवन के "ऊँचे आदर्श" नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के विचारों, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीरोचित लोगों की बहादुरी के जोश को लें, या नायकों और सामरिक उपन्यासों में तलवारबाज़ों के शौर्य एवं उदारता को लें—क्‍या इन रास्‍तों से शैतान इन आदर्शों को नहीं बैठाता है? (हाँ, ऐसा है।) ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी के लोगों को इन विचारों को स्वीकार करने, इन विचारों के लिए जीने और इनका अनवरत अनुसरण के लिए तैयार किया जाता है। यही वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसके जरिए शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

विज्ञान सिर्फ इतना करता है कि लोगों को भौतिक जगत में चीज़ों को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा शांत करता है, पर यह मनुष्य को उन नियमों को देखने में सक्षम नहीं बनाता, जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान में उत्तर पाता प्रतीत होता है, किंतु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि, जो मनुष्य के मन को केवल भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से उत्तर मिले हैं, इसलिए जो कोई भी मामला उठता है, वे उस मामले को साबित या स्वीकृत करने के लिए आधार के रूप में अपने वैज्ञानिक विचारों का ही इस्तेमाल करते हैं। मनुष्य का मन विज्ञान से आविष्ट हो जाता है और उससे इस हद तक बहक जाता है कि वह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने और यह मानने को तैयार नहीं होता कि सभी चीज़ें परमेश्वर से आती हैं, और उत्तर पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? लोग जितना अधिक विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतने ही अधिक बेतुके हो जाते हैं और यह मानने लगते हैं कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और वे यह विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहाँ तक कि कई सालों तक परमेश्वर का अनुसरण करने वाले कुछ लोग भी सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज करने चले जाते हैं या किसी मुद्दे के जवाब के लिए जानकारी खोजने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति मुद्दों को सत्य के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में वे समस्याओं का समाधान करने के लिए वैज्ञानिक विचारों या ज्ञान या वैज्ञानिक समाधानों पर भरोसा करना चाहते हैं; वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते, और वे परमेश्वर की खोज नहीं करते। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं।) कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो परमेश्वर की खोज भी उसी तरह से करना चाहते हैं, जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म-विशेषज्ञ हैं, जो उस स्थान पर गए हैं, जहाँ महान जल-प्रलय के बाद जहाज़ रुका था, और इस प्रकार उन्होंने जहाज़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है। किंतु जहाज के प्रकटन में वे परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखते। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं; यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। अगर तुम भौतिक चीजों पर शोध करोगे, चाहे वह सूक्ष्म जीवविज्ञान हो, खगोलशास्त्र हो या भूगोल हो, तो तुम कभी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे, जो यह निर्धारित करता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने के लिए प्रेरित नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे अधिक संशयात्मक नहीं बनाता? (हाँ।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करना चाहता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाहीन करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग नहीं करना चाहता, और उनके हृदयों पर पकड़ बनाने के लिए अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग नहीं करता, ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें? (हाँ।) इसीलिए मैं कहता हूँ कि विज्ञान उन तरीकों में से एक है, जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

शैतान ने, लोगों पर पारम्परिक संस्कृति या मिथ्याधर्मी प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में गहरा प्रभाव डालते हुए, कई लोक कथाओं या कहानियों को गढ़ा और बनाया है जो इतिहास की पुस्तकों में मिलती हैं। उदाहरण के लिए, चीन में, "आठ अमर हस्तियों का समुद्र पार करना," "पश्चिम की ओर यात्रा," जेड सम्राट, "नेज़्हा की अजगर राजा पर विजय," और "ईश्वरों का अधिष्ठापन।" क्या ये मनुष्य के मनों में गहराई से जड़ नहीं पकड़ चुकी हैं? भले ही तुम में से कुछ लोग पूरी कहानी विस्तार से न जानें, फिर भी तुम मोटे तौर पर कहानियों को तो जानते ही हो, और मोटे तौर की यही जानकारी है जो तुम्हारे हृदय और मन में बैठ जाती है, ताकि तुम इसे भुला न सको। ये ही वे विभिन्न विचार या किंवदंतियाँ हैं जिन्हें शैतान ने बहुत समय पहले मनुष्य के लिए तैयार किया था जिन्हें विभिन्न समयों पर को फैलाया गया है। ये चीज़ें प्रत्यक्ष रूप से लोगों की आत्माओं को हानि पहुँचाती हैं और नष्ट करती हैं और लोगों को एक के बाद एक मायाजाल में डालती हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब एक बार तुम ऐसी पारम्परिक संस्कृति, कथाओं या अंधविश्वासी चीज़ों को स्वीकार कर लेते हो, जब एक बार ये तुम्हारे मन में बैठ जाती हैं, और जब एक बार वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो यह तुम्हारे सम्मोहित हो जाने जैसा है—तुम इन सांस्कृतिक जालों में, इन विचारों एवं पारम्परिक कथाओं में उलझ जाते हो और प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन, जीवन को देखने के तुम्हारे नज़रिये, चीज़ों के बारे में तुम्हारे फैसले को प्रभावित करती हैं। इससे भी बढ़कर, वे जीवन के सच्चे मार्ग के तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं : यह वास्तव में एक दुष्टतापूर्ण मायाजाल है। तुम जितनी भी कोशिश कर लो, परन्तु उन्हें झटक कर दूर नहीं कर सकते; तुम उन पर चोट तो करते हो किन्तु उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते हो; तुम उन पर प्रहार तो करते हो किन्तु उन पर प्रहार करके उन्हें दूर नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, जब लोगों की जानकारी के बिना उन पर इस प्रकार का मायाजाल डाल दिया जाता है, तो वे अनजाने में, अपने हृदय में शैतान की छवि को बढ़ावा देते हुए, शैतान की आराधना करना आरम्भ कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपने आदर्श के रूप में, अपने लिए एक आराधना करने और आदर करने की वस्तु के रूप में स्थापित कर लेते हैं, यहाँ तक कि वे उसे परमेश्वर मानने की हद तक भी चले जाते हैं। अनजाने में ही, ये चीज़ें लोगों के हृदय में हैं, उनके वचनों एवं कर्मों को नियन्त्रित कर रही हैं। इसके अलावा, तुम पहले तो इन कहानियों और किंवदंतियों को झूठा मानते हो, और फिर तुम अनजाने में इनके अस्तित्व को मान लेते हो, उन्हें वास्तविक व्यक्ति, वास्तविक, विद्यमान वस्तु बना देते हो। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीज़ों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। तुम अवचेतन रूप से दुष्टात्माओं, शैतान एवं मूर्तियों को भी अपने घर में और अपने हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक मायाजाल है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

शैतान सामाजिक प्रवृत्तियों द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करता है। "सामाजिक प्रवृत्तियों" में अनेक बातें शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं : "क्या इसका अर्थ नवीतनम फैशन, सौन्दर्य प्रसाधन, बालों की शैली और स्वादिष्ट भोजन है?" क्या ये चीज़ें सामाजिक प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं? ये सामाजिक प्रवृतियों का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ उनके बारे में बात नहीं करेंगे। हम बस ऐसे विचारों के बारे में बात करना चाहते हैं जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों में उत्पन्न करती हैं, जिस तरह से वे संसार में लोगों से आचरण करवाती हैं, और लोगों में जीवन के लक्ष्यों एवं जीवन को देखने का जो नज़रिया उत्पन्न करती हैं उन पर बात करना चाहते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की अवस्था को नियन्त्रित और प्रभावित कर सकती हैं। ये सभी प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उठती हैं, और उन सभी का दुष्ट प्रभाव होता है जो निरन्तर मनुष्य को पतित करता रहता है, जिसके कारण लोग लगातार विवेक, मानवता और तर्कशीलता को गँवा देते हैं, और जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और अधिक कमजोर कर देता है, इस हद तक कि हम यह भी कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों में कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनमें कोई विवेक है, और तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। तो ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? ये वो प्रवृत्तियाँ हैं जिन्हें तुम खुली आँखों से नहीं देख सकते। जब कोई नयी प्रवृत्ति दुनिया पर छा जाती है, तो कदाचित् सिर्फ कुछ ही लोग अग्रणी स्थान पर होते हैं, जो प्रवृत्ति स्थापित करने वालों के तौर पर काम करते हैं। वे कुछ नया काम करते हुए शुरुआत करते हैं, फिर कुछ नए विचार या कुछ नए दृष्टिकोण स्वीकार करते हैं। लेकिन, अनभिज्ञता की दशा में, अधिकांश लोग इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी लगातार संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित होंगे, जब तक वे सब अनजाने में एवं अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते हैं, इसमें डूब नहीं जाते हैं और इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं कर लिए जाते हैं। एक के बाद एक, ऐसी प्रवृत्तियाँ लोगों से, जो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के नहीं हैं; जो नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है, और जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं कर सकते हैं, इन्हें और साथ ही जीवन के दृष्टिकोण एवं मूल्यों को जो शैतान से आते हैं खुशी से स्वीकार करवाती हैं। शैतान उन्हें जीवन के प्रति नज़रिया रखने के बारे में जो बताता है वे उसे और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार कर लेता है जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है, और उसने पास न तो सामर्थ्य है, न ही योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है। ...

... शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है ताकि एक-एक कदम करके लोगों को दुष्टात्माओं के घोंसले में आने के लिए लुभा सके, ताकि सामाजिक प्रवृत्तियों में फँसे लोग अनजाने में ही धन, भौतिक इच्छाओं, दुष्टता एवं हिंसा का समर्थन करें। जब एक बार ये चीज़ें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य दुष्टात्मा, शैतान बन जाता है! क्यों? मनुष्य के हृदय में कौन से मनोवैज्ञानिक झुकाव हैं? मनुष्य किस बात का सम्मान करता है? मनुष्य दुष्टता और हिंसा में आनंद लेना शुरू कर देता है, वो खूबसूरती या अच्छाई के प्रति प्रेमभाव नहीं दिखाता, शांति के प्रति तो बिलकुल भी नहीं। लोग सामान्य मानवता के साधारण जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए ऊँची हैसियत एवं अपार धन समृद्धि का आनन्द उठाने की, देह के सुखविलासों में मौज करने की इच्छा करते हैं, और उन्हें रोकने के लिए प्रतिबंधों और बन्धनों के बिना, अपनी स्वयं की देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं; दूसरे शब्दों में जो कुछ भी वे चाहते हैं, करते हैं। तो जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो क्या वह ज्ञान जो तुमने सीखा है वह खुद को छुड़ाने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास की तुम्हारी समझ क्या इस भयानक दुर्दशा से बचने में तुम्हारी सहायता कर सकती है? क्या पारम्परिक नैतिकता एवं अनुष्ठान जिन्हें मनुष्य जानता है, संयम बरतने में लोगों की सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, तीन उत्कृष्ट चरित्र (थ्री करेक्टर क्लासिक) को लो। क्या यह इन प्रवृत्तियों के दलदल में से अपने पाँवों को बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकता है? (नहीं, नहीं कर सकता है।) इस तरह, मनुष्य और भी अधिक दुष्ट, अभिमानी, दूसरों को नीचा दिखाने वाला, स्वार्थी एवं दुर्भावनापूर्ण बन जाता है। लोगों के बीच अब और कोई स्नेह नहीं रह जाता है, परिवार के सदस्यों के बीच अब और कोई प्रेम नहीं रह जाता है, रिश्तेदारों एवं मित्रों के बीच में अब और कोई तालमेल नहीं रह जाता है; हिंसा मानवीय रिश्तों की विशेषता बन जाती है। हर एक व्यक्ति अपने साथी मनुष्यों के बीच रहने के लिए हिंसक तरीकों का उपयोग करना चाहता है; वे हिंसा का उपयोग करके अपनी दैनिक रोटी झपट लेते हैं; वे हिंसा का उपयोग करके अपने पद को प्राप्त कर लेते हैं और अपने लाभों को प्राप्त करते हैं और वे अपनी मनमर्ज़ी करने के लिए हिंसा एवं बुरे तरीकों का उपयोग करते हैं। क्या ऐसी मानवता भयावह नहीं है? (हाँ।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

छः प्राथमिक चालें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

पहला है नियन्त्रण और जोर जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियन्त्रित करने के लिए शैतान हर सभंव कार्य करेगा। "जोर जबरदस्ती" का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है अपनी बात मानने पर विवश करने के लिए धमकी और ज़ोर-ज़बरदस्ती के पैतरों का इस्तेमाल करना, यदि तुम बात नहीं मानते हो तो उसके परिणामों के बारे में विचार करने पर मजबूर करना। तुम भयभीत होते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते हो, इसलिए तब तुम उसके प्रति समर्पण कर देते हो।

दूसरा है धोखाधड़ी और छल कपट। "धोखाधड़ी और छल कपट" में क्‍या अपरिहार्य होता है? शैतान कुछ कहानियों एवं झूठी बातों को बनाता है, तुम्हें छल कपट से उन पर विश्वास करवाता है। वह तुम्हें कभी नहीं बताता है कि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, न ही वह प्रत्यक्ष रूप से यह कहता है कि तुम्हें परमेश्वर के द्वारा सृजित नहीं गया था। वह "परमेश्वर" शब्द का उपयोग बिलकुल नहीं करता है, बल्कि इसके बजाए एक विकल्प के रूप में किसी और चीज़ का उपयोग करता है, तुम्हें धोखा देने के लिए इस चीज़ का उपयोग करता है ताकि तुममें परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में मूल रूप से कोई विचार न हो। निश्चित रूप से इस "छल कपट" में बस ये एक नहीं बल्कि कई पहलू शामिल हैं।

तीसरा है ज़बरदस्ती दिमाग में भरना। किस चीज़ को लोगों में ज़बरदस्ती भरा जाता है? क्या ज़बरदस्ती दिमाग में भरना मनुष्य की स्वयं की पसंद से होता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? (नहीं।) तुम इससे सहमत न भी हो तो तुम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। तुम्हारी अनभिज्ञता में, शैतान तुम्हारे दिमाग में ज़बरदस्ती चीज़ें भरता है, शैतान अपनी सोच, जीवन के अपने नियमों और अपने सार को तुम्हारे भीतर डालता है।

चौथा है धमकाना और भुलावा देना। अर्थात्, शैतान विभिन्न चालों को काम में लाता है ताकि तुम्हें उसे स्वीकार करने उसका अनुसरण करने, उसकी सेवा में कार्य करने को मजबूर कर सके। अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वो कुछ भी करेगा। वह कभी-कभी तुम पर छोटे-छोटे अनुग्रह करता है, और इस पूरे समय तुम्हें पाप करने के लिए लुभाता है। यदि तुम उसका अनुसरण नहीं करते हो, तो वह तुम्हें कष्ट भुगतवाएगा और तुम्हें दण्ड देगा और तुम पर आक्रमण करने और तुम्हें जाल में फँसाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करेगा।

पाँचवा है धोखा और असमर्थता। "धोखा और असमर्थता" वह है जब शैतान कुछ मधुर सुनाई देने वाले शब्दों एवं विचारों को बनाता है जो लोगों की अवधारणाओं से मेल खाते हैं ताकि ऐसा लगे मानो कि वह लोगों के दैहिक स्थिति या उनके जीवन एवं भविष्य के प्रति विचारशील हो रहा है, जबकि वास्तव में उसका एकमात्र लक्ष्य तुम्हें बेवकूफ़ बनाना है। तब वह तुम्हें असमर्थ कर देता है ताकि तुम यह न जान पाओ कि क्या सही है और क्या ग़लत है, ताकि तुम अनजाने में ही छले जाओ और फलस्वरूप उसके नियन्त्रण के अधीन आ जाओ।

छठा है शरीर और मन का विनाश। शैतान मनुष्यों के किस हिस्से को नष्ट करता है? (मनुष्य के मन को, और पूरे अस्तित्व को।) शैतान तुम्हारे मन को नष्ट करता है, तुम्हें विरोध करने में शक्तिहीन बना देता है, इसका अर्थ है कि धीरे-धीरे, तुम्हारे न चाहने के बावजूद तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। वह हर दिन इन चीज़ों को तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रभावित करने और तैयार करने के लिए प्रतिदिन इन विचारों एवं संस्कृतियों का उपयोग करता है, धीरे-धीरे तुम्हारी इच्छा शक्ति को खोखला कर देता है, जिसके कारण अंतत: तुम एक अच्छा इंसान नहीं बने रहना चाहते हो, तुम उस चीज़ के पक्ष में अब और डटे नहीं रहना चाहते हो जिसे तुम "धार्मिकता" कहते हो। अनजाने में, तुम्हारे पास प्रवाह के विरुद्ध तैरने की इच्छा शक्ति नहीं जाती है, बल्कि इसके बजाए तुम प्रवाह के साथ बहने लगते हो। "विनाश" का अर्थ है शैतान का लोगों को इतना अधिक कष्ट देना कि वे अपनी छायामात्र बन जाते हैं, वे अब मनुष्य नहीं रह जाते हैं। इसी वक्त शैतान प्रहार करता है, उन्हें पकड़कर निगल लेता है।

इन में से प्रत्येक चाल जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है, मनुष्य को विरोध करने में निर्बल कर देता है; उनमें से कोई भी मनुष्य के लिए घातक हो सकता है। दूसरे शब्दों में, शैतान जो कुछ भी करता है और वह जिस भी चाल को काम में लाता है, वह तुम्हें पतित करने का कारण बन सकता है, तुम्हें शैतान के नियन्त्रण के अधीन ला सकता है और तुम्हें दुष्टता और पाप के दलदल में धँसा सकता है। ये वे चालें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

हज़ारों सालों से यह भूमि मलिन रही है। यह गंदी और दुःखों से भरी हुई है, चालें चलते और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[8] क्रूर और दुष्ट बनकर इस भुतहा शहर को कुचलते हुए और लाशों से पाटते हुए प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं; सड़ांध ज़मीन पर छाकर हवा में व्याप्त हो गई है, और इस पर ज़बर्दस्त पहरेदारी[9] है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? शैतान मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आंखें बाहर निकालकर उसके होंठ मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीक नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; इस बीच रक्षक कुत्ते चमकती हुई आंखों से घूरते हैं, वे इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हैं कि कहीं परमेश्वर अचानक उन्हें पकड़कर समाप्त न कर दे, उन्हें सुख-शांति के स्थान से वंचित न कर दे। ऐसे भुतहा शहर के लोग परमेश्वर को कैसे देख सके होंगे? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और मनोहरता का आनंद लिया है? उन्हें मानव-जगत के मामलों की क्या कद्र है? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्कट इच्छा को समझ सकता है? फिर, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा रहता है : इस तरह के अंधकारपूर्ण समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, पलक झपकते ही लोगों को मार डालने वाला शैतानों का सरदार, ऐसे मनोहर, दयालु और पवित्र परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है? वह परमेश्वर के आगमन की सराहना और जयजयकार कैसे कर सकता है? ये अनुचर! ये दया के बदले घृणा देते हैं, ये लंबे समय से परमेश्वर का तिरस्कार करते रहे हैं, ये परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, ये बेहद बर्बर हैं, इनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, ये लूटते और डाका डालते हैं, इनका विवेक मर चुका है, ये विवेक के विरुद्ध कार्य करते हैं, और ये लालच देकर निर्दोषों को अचेत देते हैं। प्राचीन पूर्वज? प्रिय अगुवा? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज़को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने की चालें हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कियाहै? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? पीढ़ी-दर-पीढ़ी, माता-पिता से लेकर बच्चों तक, गुलाम बनाए गए मनुष्य ने परमेश्वर को बड़ी बेरुखी से गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष न भड़काए? दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, हज़ारों साल का पाप दिल पर अंकित है—इससे कैसे न घृणा पैदा होगी? परमेश्वर का बदला लो, उसके शत्रु को पूरी तरह से समाप्त कर दो, उसे अब और बेकाबू न दौड़ने दो, और अब उसे मनचाहे तरीके से परेशानी मत बढ़ाने दो! यही समय है : मनुष्य अपनी सभी शक्तियाँ लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए सभी प्रयास किए हैं, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे से नकाब उतार सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अपने दर्द से उबरने और इस दुष्ट प्राचीन शैतान से मुँह मोड़ने दे। परमेश्वर के कार्य में ऐसी अभेद्य बाधा क्यों खड़ी की जाए? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चली जाएँ? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहां है? गर्मजोशी कहां है? परमेश्वर के लोगों को छलने के लिए धोखेभरी योजनाओं का उपयोग क्यों किया जाए? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों किया जाए? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए, जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को इस हद तक खदेड़ा जाए कि उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह भी न रहे? मनुष्यों की गर्मजोशी कहां है? लोगों की स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में ऐसी तड़प क्यों पैदा की जाए? परमेवर को बार-बार पुकारने पर मजबूर क्यों किया जाए? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने पर मजबूर क्यों किया जाए? इस अंधकारपूर्ण समाज में इसके घटिया रक्षक कुत्ते परमेश्वर को उसकी बनायी दुनिया में स्वतंत्रता से आने-जाने क्यों नहीं देते? दुख-दर्द में रहने वाला इंसान यह सब क्यों नहीं समझता? तुम लोगों के लिए परमेश्वर ने बहुत यातना सही है, और अत्यंत पीड़ा के साथ अपना प्यारा पुत्र, अपना देह और रक्त तुम लोगों को सौंपा है—तो फिर तुम लोग अभी भी उससे नज़रें क्यों फेर लेते हो? हर किसी के सामने तुम लोग परमेश्वर के आगमन को अस्वीकार कर देते हो, और परमेश्वर की दोस्ती को नकार देते हो। तुम लोग इतने निर्लज्ज क्यों हो? क्या तुम लोग ऐसे अंधकारपूर्ण समाज में अन्याय सहन करना चाहते हो? तुम अपने आपको हज़ारों साल की शत्रुता से भरने के बजाय शैतानों के सरदार के "मल" से भर लेते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)' से उद्धृत

यद्यपि शैतान दयालु, न्यासंगत और सदाचारी प्रतीत होता है, फिर भी शैतान का सार निर्दयी और बुरा है

शैतान लोगों को धोखा देकर अपनी प्रतिष्ठा बनाता है और अकसर खुद को धार्मिकता के अगुआ और आदर्श के रूप में स्थापित करता है। धार्मिकता की रक्षा की आड़ में वह लोगों को हानि पहुँचाता है, उनकी आत्माओं को निगल जाता है, और मनुष्य को स्तब्ध करने, धोखा देने और भड़काने के लिए हर प्रकार के साधनों का उपयोग करता है। उसका लक्ष्य मनुष्य से अपने बुरे आचरण का अनुमोदन और अनुसरण करवाना और उसे परमेश्वर के अधिकार और संप्रभुता का विरोध करने में अपने साथ मिलाना है। किंतु जब कोई उसकी चालों, षड्यंत्रों और नीच हरकतों को समझ जाता है और नहीं चाहता कि शैतान द्वारा उसे लगातार कुचला और मूर्ख बनाया जाए या वह निरंतर शैतान की गुलामी करे या उसके साथ दंडित और नष्ट किया जाए, तो शैतान अपने पिछले संतनुमा लक्षण बदल लेता है और अपना झूठा नकाब फाड़कर अपना असली चेहरा प्रकट कर देता है, जो दुष्ट, शातिर, भद्दा और वहशी है। वह उन सभी का विनाश करने से ज्यादा कुछ पसंद नहीं करता, जो उसका अनुसरण करने से इनकार करते हैं और उसकी बुरी शक्तियों का विरोध करते हैं। इस बिंदु पर शैतान अब और भरोसेमंद और सज्जन व्यक्ति का रूप धारण किए नहीं रह सकता; इसके बजाय, भेड़ की खाल में भेड़िए की तरह के उसके असली बुरे और शैतानी लक्षण प्रकट हो जाते हैं। एक बार जब शैतान के षड्यंत्र प्रकट हो जाते हैं और उसके असली लक्षणों का खुलासा हो जाता है, तो वह क्रोध से आगबबूला हो जाता है और अपनी बर्बरता जाहिर कर देता है। इसके बाद तो लोगों को नुकसान पहुँचाने और निगल जाने की उसकी इच्छा और भी तीव्र हो जाती है। क्योंकि वह मनुष्य के वस्तुस्थिति के प्रति जाग्रत हो जाने से क्रोधित हो जाता है, और उसकी स्वतंत्रता और प्रकाश की लालसा और अपनी कैद तोड़कर आज़ाद होने की आकांक्षा के कारण उसके अंदर मनुष्य के प्रति बदले की एक प्रबल भावना पैदा हो जाती है। उसके क्रोध का प्रयोजन अपनी बुराई का बचाव करना और उसे बनाए रखना है, और यह उसकी जंगली प्रकृति का असली प्रकाशन भी है।

हर मामले में शैतान का व्यवहार उसकी बुरी प्रकृति को उजागर करता है। शैतान द्वारा मनुष्य पर किए गए सभी बुरे कार्यों—अपना अनुसरण करने के लिए मनुष्य को बहकाने के उसके आरंभिक प्रयासों से लेकर उसके द्वारा मनुष्य के शोषण तक, जिसके अंतर्गत वह मनुष्य को अपने बुरे कार्यों में खींचता है, और उसके असली लक्षणों का खुलासा हो जाने और मनुष्य द्वारा उसे पहचानने और छोड़ देने के बाद मनुष्य के प्रति उसकी बदले की भावना तक—इनमें से कोई भी कार्य शैतान के बुरे सार को उजागर करने से नहीं चूकता, न ही इस तथ्य को प्रमाणित करने से कि शैतान का सकारात्मक चीज़ों से कोई नाता नहीं है और शैतान समस्त बुरी चीज़ों का स्रोत है। उसका हर एक कार्य उसकी बुराई का बचाव करता है, उसके बुरे कार्यों की निरंतरता बनाए रखता है, न्यायोचित और सकारात्मक चीज़ों के विरुद्ध जाता है, और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व के नियमों और विधियों को बरबाद कर देता है। शैतान के ये कार्य परमेश्वर के विरोधी हैं, और वे परमेश्वर के कोप द्वारा नष्ट कर दिए जाएँगे। हालाँकि शैतान के पास उसका अपना कोप है, किंतु उसका कोप उसकी बुरी प्रकृति को प्रकट करने का एक माध्यम भर है। शैतान के भड़कने और उग्र होने का कारण यह है : उसके अकथनीय षड्यंत्र उजागर कर दिए गए हैं; उसके कुचक्र आसानी से छिपाए नहीं छिपते; परमेश्वर का स्थान लेने और परमेश्वर के समान कार्य करने की उसकी वहशी महत्वाकांक्षा और इच्छा नष्ट और अवरुद्ध कर दी गई है; और समूची मानवजाति को नियंत्रित करने का उसका उद्देश्य अब शून्य हो गया है और उसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता। यह परमेश्वर द्वारा बार-बार बुलाया जाने वाला उसका कोप है, जिसने शैतान के षड्यंत्र सफल होने से रोक दिए हैं और उसकी दुष्टता के फैलाव और निरंकुशता का समय से पहले ही अंत कर दिया है। इसीलिए शैतान परमेश्वर के कोप से घृणा भी करता है और उससे डरता भी है। जब भी परमेश्वर का कोप उतरता है, तो वह न केवल शैतान के असली बुरे रूप को बेनकाब करता है, बल्कि शैतान की बुरी इच्छाओं को उजागर भी करता है, और इस प्रक्रिया में मनुष्य के प्रति शैतान के कोप के कारणों का पर्दाफाश हो जाता है। शैतान के कोप का विस्फोट उसकी दुष्ट प्रकृति का असली प्रकाशन और उसके षड्यंत्रों का खुलासा है। निस्संदेह, शैतान जब भी क्रोधित होता है, तो यह बुरी चीज़ों के विनाश और सकारात्मक चीज़ों की सुरक्षा और निरंतरता की घोषणा करता है; यह इस तथ्य की घोषणा करता है कि परमेश्वर के कोप को ठेस नहीं पहुँचाई जा सकती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करना है, जो उसकी आराधना करे और उसके प्रति समर्पित हो। हालाँकि ये लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, परंतु वे अब शैतान को अपने पिता के रूप में नहीं देखते; वे शैतान के घिनौने चेहरे को पहचानते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए उसके सामने आते हैं। वे जान गए हैं कि क्या बुरा है और वह उससे कितना विषम है जो पवित्र है, और वे परमेश्वर की महानता और शैतान की दुष्टता को भी पहचान गए हैं। इस प्रकार के मनुष्य अब शैतान के लिए कार्य नहीं करेंगे, या शैतान की आराधना नहीं करेंगे, या शैतान को प्रतिष्ठापित नहीं करेंगे। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है, जो सचमुच परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। यही परमेश्वर द्वारा मानवजाति के प्रबंधन की महत्ता है। इस समय परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य के दौरान मानवजाति शैतान की भ्रष्टता और परमेश्वर के उद्धार दोनों की वस्तु है, और मनुष्य वह उत्पाद है, जिसके लिए परमेश्वर और शैतान दोनों लड़ रहे हैं। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य कर रहा है, इसलिए वह धीरे-धीरे मनुष्य को शैतान के हाथों से बचा रहा है, और इसलिए मनुष्य पहले से ज्यादा परमेश्वर के निकट आता जा रहा है ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले" का प्रयोग यहाँ व्यंग्य के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक दृष्टिकोण में कठोर हैं।

2. "व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है" इंगित करता है कि शैतान उन्मत्त होकर आपे से बाहर हो जाता है।

3. "पूरा खंडहर" बताता है कि कैसे उस शैतान का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।

4. "आहत और क्षत-विक्षत" शैतानों के राजा के बदसूरत चेहरे के बारे में बताता है।

5. "पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने" का अर्थ है अंत में जीतने की उम्मीद में अपना सारा धन एक ही दाँव पर लगा देना। यह शैतान की भयावह और कुटिल योजनाओं के लिए एक रूपक है। इस अभिव्यक्ति का प्रयोग उपहास में किया जाता है।

6. "निगल" जाना शैतानों के राजा के शातिर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से मोह लेता है।

7. "सहअपराधियों का गिरोह" का वही अर्थ है, जो "गुंडों के गिरोह" का है।

8. "निराधार आरोप लगाते हुए" उन तरीकों को संदर्भित करता है, जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

9. "ज़बर्दस्त पहरेदारी" दर्शाता है कि वे तरीके, जिनके द्वारा शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, बहुत ही शातिर होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने-डुलने की भी जगह नहीं मिलती।

क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।

पिछला: 111. विधर्म और भ्रान्ति की पहचान करने के सिद्धांत

अगला: 113. विभिन्न बुरी आत्माओं की पहचान करने के सिद्धांत

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।

संबंधित सामग्री

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

Iपूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने,हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

Iसमझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग,सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के लिए...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें