117. झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की पहचान करने के सिद्धांत

(1) वे सभी जो केवल प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और लाभ के लिए काम करते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, और जिनके पास सत्य-वास्तविकता नहीं है, झूठे अगुआ और कार्यकर्ता हैं।

(2) वे सभी जो अहंकारी और आत्म-तुष्ट हैं, जो सत्य को जरा-भी स्वीकार नहीं करते हैं, और जो सिद्धांतों के बिना काम करते हैं, वे सोच-समझकर मनमानी करने में सक्षम झूठे अगुआ और कार्यकर्ता होते हैं।

(3) जो केवल पत्रों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करते हैं, जो समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग नहीं कर सकते, और जो व्यावहारिक काम नहीं कर सकते, झूठे अगुआ और कार्यकर्ता हैं।

(4) वे सभी जो स्वयं को नहीं जानते, जिन्होंने वास्तव में पश्चाताप नहीं किया है, और जो अनुभव से व्यावहारिक गवाही नहीं दे सकते हैं, झूठे अगुआ और कार्यकर्ता हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में एक मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

यह कैसे तय किया जा सकता है कि अगुआ अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं या नहीं, वे नकली अगुआ हैं या नहीं? सबसे बुनियादी बात यह देखना है कि वे व्यावहारिक कार्य करने में सक्षम हैं या नहीं, कि उनमें यह क्षमता है या नहीं। दूसरे, देखो कि क्या वे वास्तव में यह व्यावहारिक कार्य करते हैं। उनके मुख से निकले शब्दों पर ध्यान न दो, वे सत्य को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, चाहे वे बाहरी कार्य कर रहे हों या कुछ और, उनके पास कुछ हद तक क्षमता, बुद्धि, प्रतिभा या कौशल है या नहीं—इन सब बातों को नजरअंदाज कर दो, और केवल यह देखो कि वे व्यावहारिक कार्य करते हैं या नहीं; अगर नहीं करते, तो चाहे वे कितने भी सक्षम क्यों न हों, वे नकली अगुआ हैं। कुछ लोग कहते हैं, "किसे पड़ी है कि वे व्यावहारिक कार्य करते हैं या नहीं? उनमें बड़ी क्षमता है और वे कुशल हैं; जब वे काम शुरू करते हैं, तो वे अधिकतर लोगों से बेहतर होते हैं। इसके अलावा, भले ही वे वास्तविक कार्य न करते हों और बहुत समय बेकार घूमने में लगा देते हों, लेकिन उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है, न उन्होंने कोई बुराई की है, न ही कोई व्यवधान या गड़बड़ी की है। उन्होंने भाई-बहनों या कलीसिया को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है या उन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं डाला है। तो तुम कैसे कह सकते हो कि वे नकली अगुआ हैं?" इसे कैसे समझाएँ? अभी, भूल जाओ कि तुम कितने प्रतिभाशाली हो, तुम्हारी क्षमता कितनी अधिक है, या तुम कितने सुशिक्षित हो; महत्वपूर्ण यह है कि तुम व्यावहारिक कार्य करते हो या नहीं, और तुम एक अगुआ की जिम्मेदारियाँ पूरी करते हो या नहीं। अगुआ के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान क्या तुमने अपनी जिम्मेदारी के दायरे में आने वाले प्रत्येक विशिष्ट कार्य में भाग लिया, कार्य के दौरान उत्पन्न हुई कितनी समस्याएँ तुमने प्रभावी ढंग से हल कीं, तुम्हारे कार्य, तुम्हारी अगुआई, तुम्हारे मार्गदर्शन से कितने लोग सत्य-सिद्धांतों को समझ पाए, परमेश्वर के घर का कार्य कितना विकसित किया गया और आगे बढ़ाया गया? ये चीजें हैं, जो मायने रखती हैं। भूल जाओ कि तुम कितने मंत्र दोहरा सकते हैं, कितने शब्दों और सिद्धांतों में तुमने महारत हासिल की है, भूल जाओ कि तुम प्रतिदिन कितने घंटे मेहनत करते हो, तुम कितने थके हुए हो, और भूल जाओ कि सड़क पर तुमने कितना समय बिताया है, तुम कितनी कलीसियाओं में गए हो, तुमने कितने जोखिम उठाए हैं, कितनी बार तुम भोजन नहीं कर पाए हो—यह सब भूल जाओ, और केवल उन सब कार्यों की पूर्ति पर ध्यान दो, जिनके लिए तुम जिम्मेदार हो। परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित दायरे के भीतर तुम जितने कार्यों के लिए तुम जिम्मेदार हो, उसमें से कितना कार्यान्वित किया गया है, चाहे वह मानव-संसाधन हो, प्रशासनिक हो या पेशेवर कार्य से संबंधित हो; उसे कितनी अच्छी तरह से कार्यान्वित किया गया है, कितनी अच्छी तरह से उसमें आगे का कार्य किया गया है, सिद्धांत से संबंधित कितनी चूकें, विचलन, मुद्दे और गलतियाँ ठीक करने और सुधारने में तुमने मदद की है, कितनी समस्याएँ हल करने में तुमने सहायता की है, क्या तुमने उन्हें सिद्धांत और परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के अनुसार हल किया है, इत्यादि—ये सभी वे मानदंड हैं, जिनके द्वारा यह आकलन किया जाता है कि कोई अगुआ अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर रहा है या नहीं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (9)' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता होने के नाते, अगर तुम लोग परमेश्वर के चुने लोगों का नेतृत्व वास्तविकता में करना चाहते हो और परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी है कि लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ तुम में होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। तुम्हें अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अभ्यास करना चाहिए जितना तुम समझते हो और केवल उस पर ही बात करनी चाहिए जो तुम जानते हो। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर तुम बढ़ा चढ़ा कर बोलोगे, तो लोग तुमसे घृणा करेंगे और तुम बाद में अपमानित महसूस करोगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब तुम दूसरों को सत्य प्रदान करते हो, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि तुम उनसे निपटो या उन्हें फटकारो। अगर खुद तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तुम बस दूसरों से निपटते और फटकारते हो, तो वे तुमसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर तुम सत्य प्रदान नहीं कर सकते हो और केवल यह जानते हो कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो तुम्हारा भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग तुमसे जीवन या व्यावहारिक चीजों का पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे, वे तुमसे नफ़रत करने लगेंगे, तुमसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे तुम से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना, उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना और अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर ले जाने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? तुम्हारा कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम आँख बंद करके दूसरों से निपटते हो और उन्हें उपदेश देते हो, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि तुम वास्तव में क्या हो, और वे तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हो? यह कार्य करना कैसे हुआ? अगर तुम इसी तरह से कार्य करते हो तो तुम सभी लोगों को खो दोगे। तुम आखिर किस काम को पूरा करने की आशा करते हो? कुछ अगुवे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य का संचार करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। इसके बजाय, वे बस आँख मूंदकर दूसरों को निपटारा करते हैं और अपनी शक्ति का दिखावा करते है जिससे दूसरे उनसे डरने लगें और उनका कहा मानें—ऐसे लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव नहीं बदले हैं, वे कलीसिया का काम करने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य वास्तविकता है' से उद्धृत

मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के लाभों की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

यदि अगुआ के रूप में कार्य करने वाले व्यक्तियों में परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता और सत्य को समझने की क्षमता हो, तो न केवल वे स्वयं परमेश्वर के वचनों को समझ सकते हैं और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं, बल्कि वे उन लोगों को भी परमेश्वर के वचनों को समझने और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के संबंध में सलाह देने, उनका मार्गदर्शन करने और उनकी सहायता करने में सक्षम होते हैं, जिनकी वे अगुआई करते हैं। किंतु नकली अगुआओं में इस तरह की क्षमता की कमी होती है। वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, और वे नहीं जानते कि परमेश्वर के वचन किन स्थितियों का उल्लेख कर रहे हैं, किन स्थितियों को वे उन स्थितियों के रूप में उजागर करते हैं, जिनमें लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, या जिनमें परमेश्वर के प्रति विरोध पैदा होता है और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायतें होती हैं, या मनुष्य की प्रेरणाएँ, इत्यादि। वे परमेश्वर के वचनों से चीजों को मापने में असमर्थ होते हैं, और उसके वचनों के सतही स्तर पर केवल कुछ शब्द, नियम और सूत्रवाक्य समझते हैं। दूसरों के साथ सहभागिता करते हुए, वे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद कर लेते हैं और फिर उनका सतही अर्थ समझाते हैं। नकली अगुआओं की समझ, ज्ञान और परमेश्वर के वचनों की स्वीकृति केवल इसी तक सीमित होती है। उनमें परमेश्वर के वचनों को समझने की क्षमता का अभाव होता है। वे केवल शब्द-योजना और अर्थ की वही गहराई समझते हैं, जो इन वचनों के शाब्दिक स्तर पर सार्वभौमिक रूप से स्पष्ट है—और परिणामस्वरूप यह सोचते हैं कि उन्होंने उसके वचनों को समझ-बूझ लिया है। इसलिए वे परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ का उपयोग दूसरों को धिक्कारने और दैनिक जीवन में उनकी "मदद" करने के लिए भी करते हैं, और यह मानते हैं कि वे अपना काम कर रहे हैं, वे लोगों का परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने में मार्गदर्शन कर रहे हैं। नकली अगुआ अक्सर दूसरों के साथ परमेश्वर के वचनों के संबंध में सहभागिता करते हैं और विभिन्न तरीकों से उन्हें परमेश्वर के वचन प्रदान करते हैं, और उनसे कहते हैं कि जब कोई समस्या आए तो परमेश्वर के वचनों के इस अंश को खाएँ और पिएँ, और जब कोई दूसरी समस्या आए तो परमेश्वर के वचनों के उस अंश को खाएँ और पिएँ। जब लोगों में परमेश्वर के बारे में गलतफहमी पैदा होती है, तो वे कहते हैं, "देखो, परमेश्वर के वचन इस बारे में पूरी तरह से स्पष्ट और बोधगम्य हैं। तुम अभी भी परमेश्वर को गलत कैसे समझ सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन यह नहीं कहते कि हम इस-इस का पालन करें, और क्या वे यह नहीं कहते कि हम उस-उस का पालन करें?" इस तरह वे लोगों को परमेश्वर के वचनों को समझना और उनमें प्रवेश करना सिखाते हैं। उनके मार्गदर्शन में बहुत-से लोग परमेश्वर के वचनों का पाठ करने और कोई समस्या आने पर परमेश्वर के कुछ वचनों को याद करने में सक्षम हो जाते हैं। लेकिन वे चाहे कितना भी पढ़ लें और पाठ कर लें, वे इस बात से अनजान ही रहते हैं कि परमेश्वर के वचन किसका जिक्र कर रहे हैं। जब वे वास्तव में विपत्ति से घिरते हैं, या उन्हें कुछ संदेह होते हैं, तो परमेश्वर के वे वचन, जिन्हें वे जानते हैं और याद करते हैं, उनकी कठिनाइयाँ हल नहीं कर पाते। यह एक समस्या का चित्रण करता है : परमेश्वर के जिन वचनों को वे समझते हैं, वे मात्र सिद्धांत हैं, एक निश्चित प्रकार के नियमों के अलावा कुछ नहीं; वे वास्तविकता नहीं हैं, और वे सत्य नहीं हैं। इस प्रकार, नकली अगुआओं द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के संबंध में किया जाने वाला लोगों का मार्गदर्शन उन्हें उसके वचनों का शाब्दिक अर्थ सिखाने तक सीमित होता है; वह उन्हें उसके वचनों से प्रबुद्धता प्राप्त कराने में असमर्थ होता है और वे यह नहीं जान पाते कि उनके भीतर कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं। हर बार लोगों के साथ कुछ भी घटित होने पर उनमें प्रकट होने वाला स्वभाव और सार, परमेश्वर के वचनों का उपयोग करके उन्हें कैसे हल किया जा सकता है, और हर बार लोगों के साथ ऐसी चीजें घटित होने पर उनकी क्या अवस्थाएँ होती हैं, और ऐसी अवस्थाओं को कैसे दूर किया जा सकता है, और परमेश्वर के वचनों का इस बारे में क्या कहना है, उसके वचन क्या अपेक्षा करते हैं, सिद्धांत क्या हैं, और उनमें सत्य क्या है—वे इनमें से कुछ नहीं समझते। वे लोगों को बस यह उपदेश देते हैं : "परमेश्वर के वचनों को और अधिक खाओ और पिओ। परमेश्वर के वचनों में सत्य है, और अगर तुम उसके वचनों को अधिक सुनोगे, तो धीरे-धीरे तुम सत्य को समझ जाओगे। परमेश्वर के वचनों के प्रमुख भाग वे हैं, जिन्हें तुम नहीं समझते, इसलिए तुम्हें ज्यादा प्रार्थना करनी चाहिए, ज्यादा खोज करनी चाहिए, ज्यादा सुनना चाहिए और ज्यादा चिंतन करना चाहिए।" नकली अगुआ लगातार इस तरह के उपदेश देते रहते हैं। हर बार जब भी कोई निश्चित प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है, वे यही बात कहते हैं, और बाद में, लोग फिर भी समस्या के सार को नहीं पहचान पाते और फिर भी यह नहीं जान पाते कि परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कैसे करें; वे केवल उसके वचनों के शाब्दिक नियमों और अर्थ का पालन करते हैं, लेकिन जब परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने के सत्य-सिद्धांतों और सत्य द्वारा अपेक्षित वास्तविकता की बात आती है, तो वे समझ नहीं पाते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (1)' से उद्धृत

नकली अगुआओं के काम की मुख्य विशेषता यह है कि अपने नारे लगाने के बाद, अपने आदेश जारी करने के बाद वे बस मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं। वे परियोजना के आगे के विकास के बारे में कोई सवाल नहीं पूछते; वे यह नहीं पूछते कि कोई समस्या, असामान्यता या कठिनाई तो उत्पन्न नहीं हुई। वे उसे सौंपते ही समाप्त मान लेते हैं। वास्तव में, परियोजना की प्रगति पर नजर रखना ऐसी चीज है, जिसे अगुआ कर सकते हैं। अगर तुम इन मामलों में एकदम नौसिखिया भी हो—अगर तुम्हें इसके बारे में कोई भी जानकारी न हो—तो भी तुम यह काम कर सकते हो; स्थिति की जाँच करने और सुझाव देने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को खोजो, जो जानकार हो, जो विचाराधीन कार्य को समझता हो। उनके सुझावों से तुम उपयुक्त सिद्धांतों की पहचान कर सकते हो, और इस तरह तुम काम पर नजर रखने में सक्षम हो सकते हो। चाहे तुम्हें विचाराधीन कार्य के प्रकार के बारे में कोई जानकारी या उसकी कोई समझ हो या नहीं, खुद को उसकी प्रगति से अवगत रखने के लिए तुम्हें कम से कम उसकी देखरेख अवश्य करनी चाहिए, उस पर नजर रखनी चाहिए, उसके बारे में पूछताछ करनी चाहिए और प्रश्न पूछने चाहिए। तुम्हें ऐसे मामलों पर पकड़ बनाए रखनी चाहिए; यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, यह एक ऐसी भूमिका है, जो तुम्हें निभानी चाहिए। काम पर नजर न रखना—उससे पल्ला झाड़ लेना—नकली अगुआओं के कार्य हैं। कार्य की विशिष्ट मदों पर नजर रखने के लिए विशिष्ट कार्रवाई न करना—कार्य की इन विशिष्ट मदों की विशिष्ट प्रगति की कोई समझ या उन पर कोई पकड़ न होना—भी नकली अगुआ की अभिव्यक्ति है।

चूँकि नकली अगुआ कार्य की प्रगति की स्थिति को नहीं समझते, इसलिए इसमें अकसर बार-बार देरी होती रहती है। किसी खास काम में, चूँकि लोगों के पास सिद्धांतों की कोई समझ नहीं होती, और इसके अलावा, इसकी देखरेख के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं होता, इसलिए उस काम को अंजाम देने वाले लोग नकारात्मकता, निष्क्रियता और प्रतीक्षा की स्थिति में रहते हैं, जो कार्य की प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। यदि अगुआ ने शुरू में ही अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर दी होतीं—यदि उसने कार्यभार सँभाल लिया होता, काम आगे बढ़ाया होता, काम में तेजी दिखाई होती, और मार्गदर्शन देने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ा होता जो संबंधित किस्म के काम को समझता है, तो बार-बार की देरी से नुकसान होने के बजाय काम और अधिक तेजी से प्रगति करता। तो अगुआओं के लिए काम की वास्तविक स्थिति को समझना और उस पर पकड़ रखना अति महत्वपूर्ण है। निस्संदेह अगुआओं के लिए यह समझना और जानना अत्यधिक आवश्यक है कि कार्य कैसे प्रगति कर रहा है—क्योंकि प्रगति कार्य की दक्षता और उस कार्य से अपेक्षित परिणामों से संबंध रखती है। अगर किसी अगुआ में इस बात की समझ की भी कमी है कि काम कैसे आगे बढ़ रहा है, तो यह कहा जा सकता है कि ज्यादातर समय काम धीरे-धीरे और सुस्त रफ्तार से विकसित होगा। अपने कर्तव्य का पालन करने में संलग्न अधिकतर लोग किसी ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति के बिना धीरे-धीरे और सुस्ती से काम करेंगे, जिसमें दायित्व का बोध और उस तरह के कार्य की कुछ योग्यता हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो उन्हें प्रेरित-प्रोत्साहित कर सके, पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन उपलब्ध करा सके। यह ऐसे मामले में भी होता है, जब कोई आलोचना, अनुशासन, काट-छाँट या निपटान न हो। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि अगुआ और कार्यकर्ता अपने कार्य की प्रगति की ताजा जानकारी और समझ रखें, क्योंकि अगुआओं के मार्गदर्शन, प्रेरणा और पूछने-जानने की कार्रवाई के बिना लोग आलसी हो जाते हैं, कार्य की प्रगति की नवीनतम जानकारी रखने वाले अगुआओं के बिना लोगों के धीमे पड़ने, सुस्त होने, असावधान हो जाने की संभावना होती है—अगर काम के प्रति उनका यही दृष्टिकोण रहता है, तो प्रगति और प्रभावशीलता गंभीर रूप से प्रभावित होगी। इन परिस्थितियों को देखते हुए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को चुस्ती से काम की हर मद पर नजर रखनी चाहिए और कर्मचारियों और काम से संबंधित स्थिति के बारे में अवगत रहना चाहिए। नकली अगुआ निस्संदेह इस काम में लापरवाह और उदासीन होते हैं; वे जिम्मेदारी लेने में असमर्थ होते हैं। और इसलिए, काम की वर्तमान स्थिति के संबंध में हो या उसकी प्रगति के संबंध में, नकली अगुआ हमेशा "सरपट भागते घोड़े की पीठ पर बैठे हुए रास्ते के फूलों की प्रशंसा करते हैं"; वे लापरवाह और उदासीन होते हैं, और साथ ही जैसे-तैसे काम निपटाने वाले भी; वे आडंबरपूर्ण और खोखले शब्द बोलते हैं, धर्म सिद्धांत का उपदेश देते हैं, और सिर्फ दिखावे के लिए काम करते हैं। आम तौर पर, नकली अगुआओं का काम करने का यही तरीका होता है। अगर मसीह-विरोधियों से उनकी तुलना करें तो, हालाँकि वे खुले तौर पर कुछ भी बुरा नहीं करते और जानबूझकर नुकसानदेह नहीं होते, लेकिन क्या काम के प्रति उनका रवैया दुष्टता को भी पीछे नहीं छोड़ देता? यद्यपि उनका कार्य अपनी प्रकृति में बुरा नहीं कहा जा सकता, फिर भी यह कहना उचित है कि प्रभावशीलता के दृष्टिकोण से उसकी प्रकृति लापरवाह और कामचलाऊ है, दायित्व का कोई बोध न होने की है; उनमें अपने काम के प्रति कोई निष्ठा नहीं होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (4)' से उद्धृत

जिस कार्य के लिए नकली अगुआ जिम्मेदार होते हैं, उसके दायरे में, कुछ लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और उन्नत तथा विकसित किए जाने के लिए उपयुक्त होते हैं, अकसर दबा दिए जाते हैं। इनमें से कुछ लोग सुसमाचार फैलाते हैं, और कुछ खाना बनाने के लिए रखे जाते हैं। वास्तव में, वे काम करने में सक्षम होते हैं, भले ही वे इसका प्रदर्शन न करें—फिर भी नकली अगुआ इससे आँखें मूँदे रहता है, और उन लोगों के साथ न तो जुड़ता है और न ही उनके बारे में पूछताछ करता है। इस बीच, थोड़ी विशेष प्रतिभा वाले लोगों, चापलूसों को, जो सबके सामने आना पसंद करते हैं, चिकनी-चुपड़ी बात करने वाले होते हैं, और जो पद और हैसियत पाने की इच्छा रखते हैं, पदोन्नत करके नीचे से ऊपर लाया जाता है, यहाँ तक कि जिन्होंने ग्राम प्रमुखों और सचिवों के रूप में समाज की सेवा की थी, और जो कॉर्पोरेट एक्जीक्यूटिव थे, और जिन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट का अध्ययन किया था, उन सभी को महत्वपूर्ण पद दे दिए जाते हैं। चाहे ये लोग सच्चे विश्वासी हों या नहीं, या वे सत्य का अनुसरण करते हों या नहीं—जहाँ कहीं भी नकली अगुआ काम के लिए जिम्मेदार होते हैं, इन्हें पदोन्नत किया जाता है और प्रमुख पद दिए जाते हैं। क्या यह वैसा ही नहीं है, जैसा समाज में होता है? नकली अगुआओं के कार्यकाल में वे मेहनती कार्यकर्ता, जो वास्तव में कष्ट सह सकते हैं, जिनमें धार्मिकता की भावना होती है, जो सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं, और जिन्हें वास्तव में पदोन्नत और विकसित किया जाना चाहिए, पर नहीं किया जाता—उनके पास प्रशिक्षित किए जाने का शायद ही कोई मौका होता है, जबकि खराब क्षमता और दुष्ट मानवता वाले लोग, जो कार्य करने के लिए उत्सुक होते हैं, दिखावा करना पसंद करते हैं और जिनमें कोई वास्तविक प्रतिभा नहीं होती, परमेश्वर के घर में महत्वपूर्ण कार्यों और निरीक्षक के पदों पर कब्जा कर लेते हैं। इससे परमेश्वर के घर के अधिकांश कार्यों में देरी होती है और वह परमेश्वर के घर की अपेक्षानुसार सुचारु रूप से और उस दक्षता के साथ प्रगति करने में असमर्थ रहता है और सिद्धांतों के अनुसार नहीं किया जाता, और इससे परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के कार्यान्वयन में विफलता मिलती है। यह नकली अगुआओं द्वारा लोगों के अनुचित नियोजन का परिणाम और प्रभाव है।

नकली अगुआ खराब क्षमता वाले, आँख और दिल के अंधे होते हैं, और वे सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझते, जो अपने आप में एक बहुत गंभीर समस्या है। लेकिन उनकी एक और भी अधिक गंभीर समस्या होती है, जो यह है कि जब वे सिद्धांत के कुछ अक्षर और शब्द समझ लेते हैं और उनमें महारत हासिल कर लेते हैं और कुछ नारे लगा सकते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे सत्य-वास्तविकता को समझते हैं। वे जो भी कार्य करते हैं और जिसे भी नियोजित करने के लिए चुनते हैं, उसमें वे खोज और विचार-विमर्श तथा दूसरों के साथ सहभागिता नहीं करते, कार्य-व्यवस्थाओं और परमेश्वर के घर के सिद्धांतों को विस्तार से जाँचने की तो बात ही छोड़ो। वे पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और यह मानते हैं कि वे जो सोचते हैं, वही किया जाना चाहिए और वे जो कुछ मानते हैं, वही सही है, कि वह सब सिद्धांतों के अनुरूप है। वे गलत ढंग से यह भी मानते हैं कि कई वर्षों तक कार्य करने के बाद उनके पास परमेश्वर के घर में एक अगुआ के रूप में सेवा करने का पर्याप्त अनुभव है, कि वे जानते हैं कि परमेश्वर के घर का कार्य कैसे संचालित और विकसित होता है, और यह सब उनके हृदय में है। वे परमेश्वर के घर के काम को मापते हैं और उसे अपने अनुभव, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार करते हैं, जिससे उनके कार्यकाल के दौरान परमेश्वर के घर का काम गड़बड़, अराजक और अव्यवस्थित हो जाता है। अगर, किसी समूह के भीतर कुछ सक्षम लोग हैं, ऐसे लोग जो कष्ट सह सकते हैं, कीमत चुका सकते हैं और अपने कर्तव्य निष्ठा के साथ निभा सकते हैं, तो वे जो काम करते हैं वह अच्छी तरह से किया जाता रहेगा, लेकिन इसका नकली अगुआ से कोई लेना-देना नहीं है। और जहाँ ऐसे लोग नहीं होते, वहाँ किए जा रहे कार्य में नकली अगुआ जरा भी काम का नहीं हो सकता। एक तो इसलिए, कि नकली अगुआ काम के लिए सही लोगों को नहीं चुनेगा, जो यह सुनिश्चित करें कि काम आगे बढ़े, प्रगति करे और सुधरे; और दूसरा इसलिए, कि जहाँ काम में एक कड़ी कमजोर है, वहाँ वे सकारात्मक और सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते, न ही उसे ब्योरेवार सिखाते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो, काम के किसी बैच में, उस काम को करने वाले कई लोग नए विश्वासी हैं जिनका आधार पुख्ता नहीं है, जो सत्य को अच्छी तरह से नहीं समझते, कार्य से बहुत परिचित नहीं हैं, और कार्य के सिद्धांतों को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। अंधा होने के कारण नकली अगुआ इन समस्याओं को नहीं देख सकता। उनका मानना है कि अगर कोई काम कर रहा है, तो यह मायने नहीं रखता कि वह अच्छी तरह से किया जा रहा है या खराब ढंग से। वे नहीं जानते कि काम में सभी कमजोर कड़ियों की जाँच की जानी चाहिए, उन्हें अकसर देखा जाना चाहिए, अकसर सहायता की जानी चाहिए, यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत निरीक्षण और भागीदारी, कार्य के संबंध में उनके व्यक्तिगत परामर्श और उनकी निरंतर सहायता की भी आवश्यकता हो सकती है, जब तक कि वे लोग सत्य को समझ न लें और सही रास्ते पर न चल पड़ें। केवल उपयुक्त निरीक्षकों के होने से ही उनकी चिंता समाप्त हो सकती है। लेकिन नकली अगुआ इस तरह से काम नहीं करते। वे यह नहीं समझते कि यह उनका काम है, इसलिए अपने काम के दायरे में वे सारे काम और सभी लोगों को एकसमान मानते हैं। वे उन जगहों पर ज्यादा नहीं जाते, जहाँ काम में कमजोर कड़ियाँ होती हैं या जहाँ कोई उपयुक्त व्यक्ति प्रभारी नहीं होता, न ही वे किए जाने वाले विशिष्ट कार्यों में सलाह देते हैं और न उनमें व्यक्तिगत रूप से भाग ही लेते हैं; और जहाँ कोई उपयुक्त और कार्य करने में सक्षम व्यक्ति निरीक्षण कर रहा होता है, वहाँ वे जाकर काम की जाँच नहीं करते या उसमें मार्गदर्शन प्रदान नहीं करते, न ही वे काम के विवरण में व्यक्तिगत रूप से भाग लेते हैं, और वे वहाँ निरीक्षक की खूबियों का अनुकरण करने की कोशिश तो निश्चित रूप से नहीं करते। संक्षेप में, नकली अगुआ कार्य की बारीकियाँ पूरी नहीं करते। उनका मानना है कि चाहे कोई भी काम हो, अगर कर्मचारी जगह पर हैं और निरीक्षक चुन लिया गया है, तो सब-कुछ बढ़िया है। उनका मानना है कि उनके लिए वहाँ करने को और कुछ नहीं है और इससे उनका कुछ लेना-देना नहीं रह गया है, उन्हें बस इतना करना है कि समय-समय पर एक सभा आयोजित कर ली जाए और कोई समस्या उत्पन्न होने पर फोन कर लिया जाए। इस तरह से काम करके भी नकली अगुआ सोचते हैं कि वे अच्छा काम कर रहे हैं और यह सोचकर खुद से काफी खुश रहते हैं, "किसी भी कार्यक्रम में कोई समस्या नहीं है। कर्मचारी बड़े करीने से व्यवस्थित किए गए हैं, और निरीक्षक अपनी जगह पर हैं। मैं इस काम में इतना अच्छा, इतना प्रतिभाशाली कैसे हूँ?" क्या यह बेशर्मी नहीं है? वे आँख और दिल के इतने अंधे होते हैं कि उन्हें करने को कोई काम नहीं दिखता और उन्हें कोई समस्या नहीं मिल पाती। कुछ जगहों पर काम रुक गया है, फिर भी वे यह सोचकर संतुष्ट हैं कि उस जगह के सभी भाई-बहन युवा और नया खून हैं, कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वाह जोश-खरोश के साथ करेंगे और वे निश्चित रूप से काम अच्छी तरह से करने में सक्षम होंगे, जबकि वास्तव में वे युवा लोग कुछ भी नहीं समझते और कुछ नहीं कर सकते। ऐसे लोग भी हैं, जो किसी कार्य के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं, लेकिन वे जो कुछ भी करते हैं, वह वैसा नहीं होता जैसा उसे होना चाहिए। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें से कुछ भी सैद्धांतिक नहीं होता, और उसमें सुधार और सतत पुनरीक्षण की आवश्यकता होती है। काम में ऐसी व्यापक खामियाँ होती हैं; और ऐसी बहुत-सी बातें होती हैं जिन्हें ये कर्मचारी नहीं समझते; और ऐसे बहुत-से सिद्धांत हैं जिनके बारे में उनके साथ सहभागिता करने की आवश्यकता है, बहुत सारे मामले हैं जिनमें उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता है, बहुत सारी समस्याएँ हैं जिन्हें हल करने की आवश्यकता है ... और नकली अगुआ कुछ नहीं देख सकता, न ही उसे कोई समस्या मिलती है, फिर भी वह खुद को बिलकुल ठीक समझता है। तो फिर, पूरे दिन उनके विचार कहाँ लगे रहते हैं? वे सोच रहे होते हैं कि कैसे, एक पदाधिकारी के नाते, वे हैसियत का आनंद ले सकते हैं। नकली अगुआ हृदयहीन होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

छद्म-आध्यात्मिक प्रकार के नकली अगुआओं का मानना है कि काम करने का अर्थ है शब्दों और सिद्धांतों का उपदेश देना, मंत्रों को दोहराना, बेमन से काम करना, परमेश्वर के वचनों से वाक्यांशों का उपदेश देना; वे नहीं जानते कि वास्तव में कैसे काम करना है, या अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कर्तव्य वास्तव में क्या हैं, न ही यह कि परमेश्वर का घर किसी व्यक्ति को अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में क्यों चुनता है, यह कौन-सी समस्या हल करने के लिए है। इस प्रकार, चाहे तुम कैसे भी इस बारे में सहभागिता करो कि उन्हें अपने काम में कैसे जुटना चाहिए, कैसे उसे पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखना चाहिए, कैसे उसके भीतर की समस्याओं की पहचान करनी चाहिए, इत्यादि, वे उसमें से कुछ भी आत्मसात नहीं करते, न ही वे अपनी सुनी हुई किसी भी चीज को समझते हैं। परमेश्वर का घर अगुआओं और कार्यकर्ताओं से जो कहता है, वे उस पर अमल करने में असमर्थ रहते हैं, और वे उसे कभी हासिल नहीं करेंगे। वे काम से संबंधित सभी प्रकार की समस्याओं—कर्मचारियों से जुड़े मुद्दे, सिद्धांत के प्रश्न, प्रौद्योगिकी से जुड़े या पेशागत मुद्दे—की पहचान करने में विफल रहते हैं। और इसलिए, ऐसे छद्म-आध्यात्मिक लोगों की अगुआई में कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों और अन्य कार्य-समस्याओं की धारा निरंतर बहती रहती है; प्रौद्योगिकी से जुड़े या पेशागत मुद्दे भी आते रहते हैं, जमा होते रहते हैं, और जितना अधिक वे जमा होते हैं, उतनी ही अधिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इन नकली अगुआओं की जिम्मेदारियों के दायरे में कर्मचारियों और काम से जुड़े मामले और भी अधिक अराजक हो जाते हैं, और कार्य-निष्पादन और दक्षता में अधिकाधिक गिरावट आती है। जहाँ तक लोगों का प्रबंधन करने की बात है, तो जो कुछ हद तक कुशल और सहज वक्ता होते हैं, उन्हें कार्यभार सँभालने दिया जाता है—वे अपना रास्ता तलाश लेते हैं और काम व लोगों को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं। दुष्टों पर अंकुश नहीं लगाया जाता, उन्हें रोका या परिष्कृत नहीं किया जाता, और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करने वाले कुछ लोग इतने परेशान हो जाते हैं कि वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं, वे अपना कर्तव्य निभाने या परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के इच्छुक नहीं रहते। वे अपने कर्तव्य में विश्वास खो देते हैं, परमेश्वर में विश्वास खो देते हैं, और सत्य के अनुसरण में विश्वास खो देते हैं। जिन लोगों के पास कुछ कौशल होते हैं, जो तकनीकी रूप से प्रवीण होते हैं, उनका उपयोग ठीक से नहीं किया जाता। कौन अच्छा व्यक्ति है और कौन बुरा, किसमें क्षमता है और किसमें नहीं, किसे विकसित किया जाना चाहिए और किसे नहीं, इनके बीच की रेखाएँ धुँधली पड़ जाती हैं—पूरी अराजकता व्याप्त रहती है। किंतु छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआ इसके प्रति पूरी तरह से आँखें मूँदे रहते हैं; वे इसे नहीं देख पाते। जब कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों की बात आती है, तो किसे परिष्कृत करना है, किसे निष्कासित करना है, किस पर लगाम लगानी है और किसे पदोन्नत करना है, इसके संबंध में जिन सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए, उसके बारे में परमेश्वर का घर चाहे कुछ भी सहभागिता करे और जोर दे, छद्म आध्यात्मिक अगुआ जो कुछ भी सुनते हैं, उसे समझते-बूझते नहीं। वे निर्विवाद रूप से अपने छद्म-आध्यात्मिक दृष्टिकोणों से चिपके रहते हैं। ये नकली अगुआ सोचते हैं कि उनकी व्याख्याओं और संरक्षण के कारण प्रत्येक व्यक्ति के पास निभाने के लिए एक भूमिका है; कहीं कोई अव्यवस्था नहीं है, हर कोई अच्छा काम कर रहा है, उन सभी में आस्था है, और वे सभी अपना कर्तव्य निभाने को तैयार हैं। उनका मानना है कि कोई भी जेल जाने या खतरा उठाने से नहीं डरता, क्योंकि सभी में सहन करने का धीरज है, और कोई भी यहूदा बनने का इच्छुक नहीं है। इन अगुआओं को लगता है कि सब-कुछ बढ़िया चल रहा है। चाहे कितनी भी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो जाएँ या कितने भी बुरे लोग दिखाई दें, चाहे समस्या कितनी भी स्पष्ट क्यों न हो, वे उसे नहीं देखते। अगर वे देखते भी हैं, तो वे नहीं जानते कि यह एक समस्या है, और अगर वे जानते भी हैं कि यह एक समस्या है, तो वे नहीं जानते कि इसे कैसे हल किया जाए। इसी तरह, छद्म-आध्यात्मिक अगुआ उन असंख्य समस्याओं से और भी अधिक आँखें मूँदे रहते हैं, जो उस काम के दौरान सामने आती हैं जो सिद्धांतों के विपरीत होता है। वे कहते हैं, "मैंने उन्हें कार्य-सिद्धांत बता दिए हैं जो मुझे बताने चाहिए थे, मैंने उन्हें बार-बार समझाया है, यहाँ तक कि लोगों से उन्हें लिख लेने के लिए भी कहा है।" लेकिन क्या उन्होंने यह सब सही व्यक्ति को बताया है, क्या उनकी बताई बातें सही, सिद्धांतों के अनुरूप, परमेश्वर के वचनों के अनुरूप और व्यावहारिक हैं—यह वे नहीं जानते। जहाँ तक उनके द्वारा प्रदत्त सिद्धांत के निवाले की बात है, तो किस तरह के लोग उसे पचाकर संतुष्ट हो सकते हैं? वे, जो मूर्ख और अज्ञानी हैं, अशिक्षित हैं, मंदबुद्धि हैं, अहमक हैं, बेवकूफ हैं। ये लोग उलझ जाते हैं, वे मानते हैं कि ये सब परमेश्वर के वचन हैं, और इसमें से कुछ भी गलत नहीं हो सकता। केवल ऐसे लोग ही इस सिद्धांत से संतुष्ट हो सकते हैं। छद्म-आध्यात्मिक अगुआ काम के दौरान उत्पन्न होने वाली समस्याओं की पहचान करने में असमर्थ होते हैं; वे उनसे आँखें मूँदे रहते हैं। और बेशक, वे प्रौद्योगिकी या विशेषज्ञता से जुड़ी चीजों से और भी अधिक आँखें मूँदे रहते हैं—ये चीजें उनके वश के और भी बाहर हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआओं की मुख्य विशेषता क्या है? वे उपदेश देने में माहिर होते हैं। लेकिन जिसका वे उपदेश देते हैं, वह सच्चा मार्ग नहीं है, और यह वह मार्ग नहीं है जिसका उपदेश परमेश्वर देता है। यह सत्य का मार्ग नहीं है, बल्कि यह केवल शाब्दिक सिद्धांत है। वे शाब्दिक सिद्धांत का उपदेश देने में अच्छे हैं, परमेश्वर के वचनों के मात्र शब्दों और पाठों पर कड़ी मेहनत करने में अच्छे हैं, चाहे उनका पाठ करना हो या उन पर विचार करना। संक्षेप में, जब सिद्धांत का उपदेश देने की बात आती है, तो वे विशेष रूप से मेहनती और दृढ़ निश्चयी होते हैं। बाहर से, वे जो कुछ भी करते हैं, वह सत्य के लिए प्रासंगिक प्रतीत होता है; वे बाधा पहुँचाते या हस्तक्षेप करते, अनुचित व्यवहार करते, या गलत बात कहते या गलत काम करते प्रतीत नहीं होते। और फिर भी, वे कोई व्यावहारिक कार्य करने या थोड़ी-सी भी जिम्मेदारी पूरी करने में असमर्थ होते हैं, जिसके कारण अंततः वे काम में किसी समस्या की पहचान करने में असमर्थ हो जाते हैं। वे अंधे आदमी की तरह काम करते हैं; वे अंधे होते हैं, वे समस्या को देख नहीं सकते, उसकी पहचान नहीं कर सकते, और इसलिए क्या वे तुरंत समस्या की सूचना देने और खोज में जुटने में सक्षम हैं? बिलकुल नहीं। क्या छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआओं की समस्या एक गंभीर समस्या है? क्या ऐसे लोग घृणित हैं, क्या वे घिनौने हैं? (वे घिनौने हैं।) वे मानते हैं कि उनके पास व्यवसाय की कुछ तरकीबें हैं क्योंकि वे सिद्धांत का कुछ उपदेश देने और परमेश्वर के कई वचनों का पाठ करने में सक्षम हैं, क्योंकि वे लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं के सभी पहलुओं का अच्छी तरह से और सटीक रूप से सारांश प्रस्तुत करने में सक्षम हैं—लेकिन वे व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकते। जिन शब्दों और सिद्धांतों से वे खुद को लैस करते हैं, जिन्हें वे समझते और जानते हैं, वे उन्हें एक अगुआ या कार्यकर्ता के कर्तव्यों का पालन करने में मदद नहीं कर सकते, काम में आने वाली समस्याओं को खोजने और उनका समाधान करने में उनकी मदद तो वे बिलकुल नहीं कर सकते। क्या इस तरह का अगुआ या कार्यकर्ता इस पद के लिए योग्य है? स्पष्ट रूप से नहीं। क्या तुम लोगों को किसी छद्म-आध्यात्मिक नकली अगुआ का चुनाव करना चाहिए, जो योग्य न हो? (नहीं।) तो क्या तुम लोगों ने कभी ऐसे अगुआओं को चुना है? (हाँ।) मुझे उम्मीद है कि तुम लोगों ने ऐसे बहुत लोगों को चुना है। जिसने भी कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, परमेश्वर के बहुत-से वचन पढ़े हैं, बहुत सारे उपदेश सुने हैं, जिसके पास कार्य करने और उपदेश देने का प्रचुर अनुभव है, जो घंटों उपदेश दे सकता है—तुम्हें लगता है कि इस तरह के व्यक्ति को काम करने में सक्षम होना ही चाहिए। और नतीजा? उन्हें चुनने के बाद तुम्हें एक गंभीर समस्या का पता चलता है : उनसे मिला नहीं जा सकता, उनका दरवाजा हमेशा बंद रहता है, वे भाई-बहनों से दूर हो गए हैं। लेकिन अन्य लोग मन में सोचते हैं, "वह इतने वर्षों से विश्वासी रहा है, वह सत्य को समझता है और उसके पास एक आधार है। उसके पास आध्यात्मिक कद होना चाहिए और उसे समस्याएँ हल करने में सक्षम होना चाहिए—तो वह हमेशा खुद को बंद क्यों रखता है? इससे पता चलता है कि उस पर बहुत बड़ा बोझ है! अगुआ के रूप में चुने जाने के बाद से वह मौन हो गया है, वह अलग तरह से बोलता है, और अब वह हम में से बाकी लोगों की तरह नहीं है। यही कारण है कि वह ज्यादातर नजरों से ओझल रहता है।" क्या तुम लोग यही मानते हो? क्या तुम लोग इस तरह के नकली अगुआ को दोबारा चुनोगे? (नहीं।) क्यों नहीं? तुम लोग क्या कहोगे कि किसी अंधे व्यक्ति को अपने मार्गदर्शक के रूप में चुनने के क्या परिणाम होते हैं? क्या कोई अंधा आदमी तुम्हें अच्छे रास्ते पर ले जा सकता है? जब वह अंधा है, तो वह तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे कर सकता है? वह जहाँ भी जाता है और जो भी काम करता है, उसमें उसे मार्गदर्शन के लिए किसी और की जरूरत होती है; उसके पास स्वयं कोई दिशा या लक्ष्य नहीं होता, और जो सिद्धांत वह समझता है, उसका केवल दूसरों के सुनने के लिए उपदेश दे देता है—उसका कोई वास्तविक प्रभाव या मूल्य नहीं होता। अगर तुम शब्दों और सिद्धांतों का उपदेश दे सकने के लिए उसका सम्मान करते हो, तो तुम किस तरह के व्यक्ति हो? तुम अंधे हो, मूर्ख हो, मंदबुद्धि हो। तुम एक अंधे व्यक्ति से मिलकर खुश होते हो और उससे राह दिखाने के लिए कहते हो। तो क्या तुम भी अंधे नहीं हो? तुम्हारे पास आँखें किसलिए हैं? अविश्वासियों के बीच एक कहावत है : अंधा अंधे की अगुआई करता है। छद्म-आध्यात्मिक व्यक्तियों को अगुआओं के रूप में चुनना अंधे द्वारा अंधों की अगुआई करना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

नकली अगुआ लोगों को भ्रमित और गुमराह करने के लिए अकसर सतह पर सही लगने वाली बातें कहते हैं, जिससे उन लोगों के जीवन-प्रवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके कुछ ऐसे परिणाम भी होते हैं, जो कभी नहीं होने चाहिए। नकली अगुआओं की तथाकथित आध्यात्मिक उक्तियों और अभिव्यक्तियों को पाखंड और भ्रम कहा जा सकता है। सतही तौर पर ऐसा नहीं लगता कि उनमें कुछ गलत है, लेकिन असल में वे लोगों के जीवन-प्रवेश और उस मार्ग में, जिस पर वे चलते हैं, बाधाएँ, व्यवधान और भ्रम पैदा करने का काम करते हैं। यहाँ तक कि उनके कारण कुछ लोगों में परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ भी पैदा हो जाती हैं और परमेश्वर के वचनों के प्रति संदेह और प्रतिरोध उनके मन में घर कर लेते हैं। ये वे प्रभाव हैं, जो नकली अगुआओं के वचन लोगों पर डालते हैं। नकली अगुआ दूसरों का मार्गदर्शन करने के लिए ऐसे पाखंडों और भ्रमों का उपयोग करते हैं, ताकि जिस समय वे लोग परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होते हैं, उस समय ये लगातार उसके बारे में धारणाओं, प्रतिवादों और संदेहों को जन्म दे रहे होते हैं। इसलिए नकली अगुआओं के भ्रम और प्रभाव के तहत एक नया धर्म अस्तित्व में आ जाता है। इस तरह का नया धर्म 2,000 साल पहले के ईसाई धर्म की तरह है, जो परमेश्वर के मार्ग का पालन किए बिना, केवल मानवीय शब्दों और शिक्षाओं का समर्थन करता है, जैसे कि पौलुस या किसी अन्य शिष्य की शिक्षाएँ। नकली अगुआओं का हर काम गुमराह करने वाला होता है, और वे सत्य का अनुसरण करने के सामान्य और उचित मार्ग पर चलने वालों के रास्ते में बाधक बन जाते हैं। वे लोगों को सत्य का अनुसरण करने के सही रास्ते से ज़बरदस्ती हटा देते हैं और छद्म आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाते हैं; वे उन्हें धार्मिक प्रणाली से विश्वास करने के रास्ते पर ले आते हैं। जब नकली अगुआ लोगों को भ्रमित करते, उनकी अगुआई और मार्गदर्शन करते हैं, तो वे लगातार ऐसे सिद्धांत, उक्तियाँ, कार्य या दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता, हालाँकि वे पूरी तरह से सही दिखाई देते हैं। ये चीज़ें सत्य के पूरी तरह से विपरीत और उससे पूरी तरह से असंबंधित होती हैं। लेकिन नकली अगुआओं के मार्गदर्शन में हर कोई इन चीज़ों को सत्य मानता है और वे सभी गलत ढंग से यह विश्वास करते हैं कि वे वास्तव में सत्य हैं। वे सोचते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अच्छा बोलता है और उसके दिल में विश्वास है और वह अपने मुँह से आस्था को स्वीकार करता है, तो उस व्यक्ति ने सत्य प्राप्त कर लिया है। इन विचारों और मतों के भुलावे में आकर लोग न केवल सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने, या परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने या उन्हें अभ्यास में लाने, या उसके वचनों के भीतर रहने में असमर्थ हो जाते हैं, बल्कि परमेश्वर के वचनों से लगातार दूर भी हो जाते हैं। वे सब-कुछ परमेश्वर के वचनों के अनुसार करते प्रतीत होते हैं, लेकिन परमेश्वर के ये तथाकथित वचन परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसकी इच्छा से कोई संबंध नहीं रखते। सत्य-सिद्धांतों से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। फिर उनका किस चीज से लेना-देना होता है? नकली अगुआओं की शिक्षाओं, नकली अगुआओं के इरादों, और उन नकली अगुआओं की अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और समझ से। उनकी अगुआई का तरीका अधिक लोगों को धार्मिक कर्मकांडों और कठोर नियमों में, केवल सैद्धांतिक शब्दों में, ज्ञान और दर्शन की ओर ले जाता है। यद्यपि, मसीह-विरोधियों के विपरीत, नकली अगुआ दूसरों को अपने या शैतान के सामने नहीं लाते, किंतु फिर भी, लोगों का दिल इन पाखंडों और भ्रमों द्वारा नियंत्रित हो जाता है। जब इन पाखंडों और भ्रमों से ग्रस्त लोग, गलत ढंग से यह मान लेते हैं कि उन्होंने पहले ही जीवन प्राप्त कर लिया है, तो वे कट्टरपंथी हो जाते हैं, वे सत्य, परमेश्वर के वचनों और उसकी माँगों के परम शत्रु हो जाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (2)' से उद्धृत

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