117. झूठे नेताओं और कर्मियों की पहचान करने के सिद्धांत

(1) वे सभी जो केवल प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और लाभ के लिए काम करते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, और जो सत्य की वास्तविकता के अधिकारी नहीं होते, झूठे नेता और कर्मी हैं;

(2) वे सभी जो अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, जो सत्य को ज़रा भी स्वीकार नहीं करते हैं, और जो सिद्धांतों के बिना काम करते हैं, वे दृढ़ इच्छाशक्ति से मनमानी करने में सक्षम, झूठे नेता और कर्मी होते हैं;

(3) जो केवल पत्रों और सिद्धांतों का प्रचार करते हैं, जो समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग नहीं कर सकते, और जो व्यावहारिक काम नहीं कर सकते हैं, झूठे नेता और कार्यकर्ता हैं;

(4) वे सभी जो स्वयं को नहीं जानते, जिन्होंने वास्तव में पश्चाताप नहीं किया है, और जो अनुभव से व्यावहारिक गवाही नहीं दे सकते हैं, झूठे नेता और कार्यकर्ता हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में एक मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता होने के नाते, अगर तुम लोग परमेश्वर के चुने लोगों का नेतृत्व वास्तविकता में करना चाहते हो और परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी है कि लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ तुम में होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। तुम्हें अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अभ्यास करना चाहिए जितना तुम समझते हो और केवल उस पर ही बात करनी चाहिए जो तुम जानते हो। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर तुम बढ़ा चढ़ा कर बोलोगे, तो लोग तुमसे घृणा करेंगे और तुम बाद में अपमानित महसूस करोगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब तुम दूसरों को सत्य प्रदान करते हो, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि तुम उनसे निपटो या उन्हें फटकारो। अगर खुद तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तुम बस दूसरों से निपटते और फटकारते हो, तो वे तुमसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर तुम सत्य प्रदान नहीं कर सकते हो और केवल यह जानते हो कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो तुम्हारा भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग तुमसे जीवन या व्यावहारिक चीजों का पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे, वे तुमसे नफ़रत करने लगेंगे, तुमसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे तुम से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना, उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना और अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर ले जाने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? तुम्हारा कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम आँख बंद करके दूसरों से निपटते हो और उन्हें उपदेश देते हो, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि तुम वास्तव में क्या हो, और वे तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हो? यह कार्य करना कैसे हुआ? अगर तुम इसी तरह से कार्य करते हो तो तुम सभी लोगों को खो दोगे। तुम आखिर किस काम को पूरा करने की आशा करते हो? कुछ अगुवे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य का संचार करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। इसके बजाय, वे बस आँख मूंदकर दूसरों को निपटारा करते हैं और अपनी शक्ति का दिखावा करते है जिससे दूसरे उनसे डरने लगें और उनका कहा मानें—ऐसे लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव नहीं बदले हैं, वे कलीसिया का काम करने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, हालाँकि वे सतही तौर पर परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते नज़र आते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचनों पर मात्र शाब्दिक चर्चा कर रहे होते हैं, उनकी बातों में सार्थक कुछ नहीं होता। उनके उपदेश किसी भाषा की पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं,मद-दर-मद, पहलू-दर-पहलू क्रम-बद्ध किये हुए, और जब वे बोल लेते हैं, तो यह कहकर हर कोई उनका स्तुति गान करता है: "इस व्यक्ति में वास्तविकता है। उसने इतने अच्छे ढंग से और इतने विस्तार से समझाया।" जब उनका उपदेश देना समाप्त हो जाता है, तो ये लोग दूसरे लोगों से इन सारी चीज़ों को इकट्ठा करके सभी को भेज देने के लिये कहते हैं। उनके कृत्य दूसरों का कपट बन जाते हैं और वे लोग जिन बातों का प्रचार करते हैं, वे सब भ्राँतियाँ होती हैं। देखने में ऐसा लगता है, जैसे ये लोग मात्र परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और यह सत्य के अनुरूप दिखता है। लेकिन अगर अधिक गौर से समझेंगे तो तुम देखोगे कि यह शब्दों और सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है। यह सब इंसानी कल्पनाओं और धारणाओं के साथ झूठी विवेक-बुद्धि है, साथ ही कुछ हिस्सा ऐसा है जो परमेश्वर को सीमांकित करता है। क्या इस तरह का उपदेश परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं है? यह एक ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का विरोध करती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग केवल आपातकालीन स्थितियों के लिए, या खुद को त्याग कर दूसरों की मदद करने के लिए खुद को कुछ विशेष सत्यों से लैस करते हैं, न कि अपनी परेशानियों को हल करने के लिए; हम उन्हें "निस्वार्थ लोग" कहते हैं। वे दूसरों को सत्य की कठपुतलियाँ और खुद को इसके स्वामी के रूप में मानते हैं, वे दूसरों को सत्य को कस कर पकड़े रहना और निष्क्रिय न होना सिखाते हैं, जबकि वे खुद दर्शकों की तरह किनारे खड़े रहते हैं। ये किस प्रकार के लोग हैं? वे स्वयं को कुछ सत्यों से लैस कर लेते हैं पर केवल दूसरों को भाषण देने के लिए, जबकि स्वयं के विनाश को रोकने के लिए वे कुछ नहीं करते। यह कितना दयनीय है! यदि उनके शब्द दूसरों की मदद कर सकते हैं, तो वे उनकी सहायता क्यों नहीं कर सकते हैं? हमें उन्हें ढोंगी के रूप में अंकित करना चाहिए, जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है। वे दूसरों को सत्य के वचनों की आपूर्ति करते हैं और दूसरों से उनका अभ्यास करने का आग्रह करते हैं, लेकिन खुद उनका अभ्यास करने की कोई कोशिश नहीं करते। क्या वे घृणा के योग्य नहीं हैं? स्पष्ट रूप से, वे स्वयं तो सत्य के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, लेकिन दूसरों को ऐसा करने के लिए बाध्य करते हैं—यह कैसा क्रूर तरीका है! वे दूसरों की मदद करने के लिए वास्तविकता का उपयोग नहीं कर रहे हैं; वे दूसरों को पोषण प्रदान करने के लिए प्रेम का उपयोग नहीं कर रहे हैं। वे सिर्फ लोगों को धोखा दे रहे हैं और उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहता है, और प्रत्येक व्यक्ति सत्य के वचनों को अगले व्यक्ति को सौंपता रहता है, तो क्या इसका परिणाम यह नहीं होगा कि हर व्यक्ति सत्य के वचनों को सिर्फ बोलता रहेगा, लेकिन खुद उनका अभ्यास करने में असमर्थ रहेगा? ऐसे लोग कैसे बदल सकते हैं? वे अपनी ही समस्याओं को नहीं पहचानते; उनके लिए आगे कोई मार्ग कैसे हो सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उनके पास एक मार्ग होता है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

"झूठा अगुआ" कौन है? कुछ लोग कहते हैं कि झूठे अगुआओं के पास पवित्र आत्मा का काम नहीं होता। यह सही है, मगर क्या तुम बता सकते हो कि किसी व्यक्ति के पास पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं? कभी-कभी तुम नहीं बता सकते। कुछ लोगों के पास कुछ समय के लिए पवित्र आत्मा का कार्य हो सकता है और फिर कुछ समय के लिए उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। इस पहलू से देखने पर यह काफ़ी अस्पष्ट नज़र आता है और पूरी तरह से साफ़ नहीं होता, इसलिए हमें इस बात से अपना सुराग लेना चाहिए कि लोग वास्तव में क्या देख सकते हैं। वास्तव में एक झूठा अगुआ कौन है? सबसे सरल तरीके से बताया जाये, तो एक झूठा अगुआ वह व्यक्ति है जो सत्य का अनुसरण बिल्कुल भी नहीं करता और व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकता। यह निश्चित है कि ऐसे लोग सिर्फ़ शब्दों और सिद्धांतों का प्रचार कर सकते हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यह निर्विवाद है। फिर, इस बात का मूल कारण कि क्यों कोई व्यक्ति व्यावहारिक काम नहीं कर सकता और एक झूठा अगुआ बन जाता है, यही है कि वह सत्य का अनुसरण बिल्कुल भी नहीं कर सकता। कुछ लोग कह सकते हैं, "यह व्यक्ति अब व्यावहारिक काम नहीं कर सकता, लेकिन क्या एक-दो साल का प्रशिक्षण उसे व्यावहारिक कार्य करने में सक्षम बना सकता है?" दस सालों के प्रशिक्षण से भी कोई मदद नहीं मिलेगी, क्योंकि वह सत्य का अनुसरण बिल्कुल भी नहीं करता। जब कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण बिल्कुल भी नहीं करता, तो इसका क्या मतलब होता है? इसका मतलब है कि वह सत्य से बिल्कुल भी प्रेम नहीं करता है, सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता है और सत्य का अभ्यास बिल्कुल भी नहीं करता है। ये तीनों बातें एक साथ यह मूल कारण बनती हैं कि वह सत्य का अनुसरण नहीं करता है। जब कोई व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता और यहां तक कि सत्य से नफ़रत करता है, जब तक कि वह ऐसा नहीं कहता, तुम किसी भी तरह से नहीं जान सकते, तो फिर यह कैसे साबित होता है कि वह व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता है? तुम यह कैसे पता लगा सकते हो कि वह व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता है? इसका मतलब है कि वह सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता है। वह परमेश्वर के वचनों को पढ़ता है लेकिन सत्य को स्वीकार नहीं करता, वह सत्य के बारे में दूसरों की सहभागिता को सुनता है लेकिन उसे स्वीकार नहीं करता, और जब दूसरे लोग उसके साथ कांट-छांट या निपटारा करते हैं, तो वह इसे स्वीकार नहीं करता है। इससे साबित होता है कि वह निश्चित रूप से ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से बिल्कुल भी प्रेम नहीं करता है और वह सत्य से नफ़रत करता है। देखने में ऐसा लग सकता है कि वह ज़्यादा बुरे काम नहीं करता है, लेकिन ऐसे लोग कभी भी सत्य का अभ्यास नहीं करते; वे ईमानदार होने के सत्य पर कभी भी अमल नहीं करते, वे परमेश्वर का आज्ञापालन करने के सत्य पर कभी भी अमल नहीं करते और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्यों को पूरा करने के सत्य का अभ्यास कभी भी नहीं करते। यहां तक कि जब वे कलीसिया में कोई छोटा-मोटा काम करने के लिए अपने घर और करियर को छोड़ते हैं, तो वे सिर्फ़ आशीष पाने के लिए ऐसा करते हैं। ठीक पौलुस की तरह, वे जो कुछ भी करते हैं उसमें सौदेबाजी की प्रकृति की मलिनता होती है और यह सत्य पर अमल करना नहीं है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कोई व्यक्ति झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों की सेवा को कैसे पहचान सकता है? इसकी जांच कुछ मानदंडों के आधार पर की जा सकती है। पहला मानदंड यह है कि अगर परमेश्वर की सेवा करने वालों के पास उनके अपने भ्रष्ट सार की समझ नहीं है या उनके स्वभाव में आये बदलाव के लिए उनके पास कोई अनुभव आधारित गवाही नहीं है, तो इससे यह पुष्टि होती है कि वे झूठे अगुआ, झूठे प्रेरित या झूठे कार्यकर्ता हैं। दूसरा मानदंड यह है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग कभी भी इस बारे में बात नहीं करते कि वे कैसे परमेश्वर को समझते हैं, वे कैसे उसके प्रति समर्पित होते हैं या वे कैसे उसके कार्य का अनुभव करते हैं, तो यह इस बात का पता लगाने का पर्याप्त साक्ष्य है कि इन लोगों के पास पक्के तौर पर परमेश्वर की सच्ची समझ नहीं है और यह कि वे निश्चित रूप से उसके प्रति समर्पित नहीं होते हैं या उसके लिए गवाही नहीं देते हैं। इससे यह पुष्टि होती है कि वे झूठे अगुआ, झूठे प्रेरित या झूठे कार्यकर्ता हैं। तीसरा मानदंड यह है कि अगर परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग कभी भी अपने व्यावहारिक अनुभवों के बारे में बात नहीं करते हैं, वे यह नहीं बताते हैं उन्हें परमेश्वर के वचनों में प्रवेश कैसे मिला, वे कैसे उसके न्याय और ताड़ना के आगे समर्पित होते हैं, वे कैसे गवाही देते हैं या विभिन्न परीक्षणों से गुजरने के दौरान उन्होंने परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया, तो ऐसे लोगों के पास पक्के तौर पर इस पहलू से जुड़ा कोई अनुभव नहीं होगा। अगर उनके पास इस पहलू से संबंधित अनुभव नहीं है और वे इस पहलू से संबंधित किसी भी अनुभव के बारे में गवाही नहीं दे सकते हैं, तो वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने को लेकर परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई कैसे कर सकते हैं? यही कारण है कि ऐसे लोग झूठे अगुआ, झूठे प्रेरित या झूठे कार्यकर्ता हैं। अगर परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग कभी भी इस बारे में बात नहीं करते कि वे उससे कितना प्रेम करते हैं, कैसे वे उसकी इच्छा पर ध्यान देते हैं या कैसे अन्य लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसकी इच्छा पर ध्यान देते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं। इसका कारण यह है कि उनके पास इस पहलू से जुड़े अनुभवों की गवाही नहीं है; वे दूसरे लोगों के अनुभवों की अधिक गहरी गवाहियों के बारे में बात नहीं करते, ताकि परमेश्वर से सच्चा प्रेम करने और उसके प्रति समर्पित होने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों का मार्गदर्शन किया जा सके। उनके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं होता और वे सिर्फ़ अपना उत्कर्ष करते हैं और दिखावा करते हैं। इसलिए, ऐसे लोग मसीह विरोधी के मार्ग पर चल रहे हैं। अगर परमेश्वर की सेवा करने वाला कोई व्यक्ति उसके वचनों, उसकी इच्छा या इंसान से उसकी अपेक्षाओं और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के तरीके के बारे में बात नहीं करता है, तो क्या वह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर की सेवा कर रहा है? ऐसे लोग सिर्फ़ अपनी सेवा करते हैं; वे सिर्फ़ अपने रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए सेवा कर रहे हैं। यही कारण है कि ऐसे लोग पक्के तौर पर झूठे अगुआ, झूठे प्रेरित या झूठे कार्यकर्ता हैं; इतना ही नहीं, वे तो मसीह विरोधी हैं। ये ऐसे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हों। इन पहलुओं को देखकर, हम यह पहचान सकते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने वाला कोई व्यक्ति वास्तव में झूठा अगुआ या मसीह विरोधी है या नहीं और क्या वह पतरस या पौलुस के मार्ग पर चल रहा है। पौलुस ने प्रभु यीशु के बारे में बहुत कम गवाही दी थी। उसने शायद ही कभी यह गवाही थी कि प्रभु यीशु कौन था और उसके पास क्या था, उसने कैसे उपदेश दिया, उसके किन स्वभावों को अभिव्यक्त किया या कैसे वह लोगों से प्रेम करता था। पौलुस ने ऐसी चीज़ों के बारे में बहुत कम बातें की, इसलिए वह वास्तव में प्रभु यीशु से प्रेम नहीं करता था। हालांकि, पतरस ने परमेश्वर की गवाही से जुड़ी कई बातें बोली। क्योंकि उसने खास तौर पर प्रभु यीशु के माध्यम से परमेश्वर की समझ हासिल करने पर ध्यान केंद्रित किया, उसने जाना कि प्रभु यीशु कितना स्नेही था, उसने मानवजाति के लिए उसके प्रेम, इंसान के लिए उसकी दया, स्नेही उदारता, सहनशीलता और धैर्य को जाना। यही कारण है कि पतरस ने बार-बार परमेश्वर के लिए गवाही दी और इसी वजह से पतरस एक ऐसा इंसान था जो प्रभु से सच्चा प्रेम करता था। पौलुस प्रभु से सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति नहीं था। अगर तुम इस तरीके से लोगों की पहचान करना चाहते हो, तो तुम्हें तीन बातें याद रखनी चाहिए। पहली, देखो कि क्या वह व्यक्ति इस बारे में बात करता है कि उसने अपने भ्रष्ट सार की समझ कैसे हासिल की; यह जीवन का सबसे सच्चा, अपरिहार्य और बुनियादी अनुभव है। दूसरी, देखो कि वह अपने अनुभव और परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ के बारे में कैसे सहभागिता करता है और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने को लेकर उसके पास क्या अनुभव है। तीसरी बात, देखो कि वह परमेश्वर की गवाही कैसे देता है। तुम्हें यह देखना चाहिए कि क्या वे सचमुच परमेश्वर के कार्य, उसके प्रेम और उसके अपमान न सहने वाले धार्मिक स्वभाव की गवाही देते हैं; पता लगाओ कि क्या वे वास्तव में लोगों को परमेश्वर के सामने ला रहे हैं, क्या उनका कार्य लोगों को परमेश्वर की और उसके स्वभाव की समझ हासिल करने में मदद करता है, और वह व्यक्ति जो काम करता है क्या उससे परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने और उसके न्याय एवं ताड़ना को अनुभव करने में लोगों को मदद मिल सकती है। अगर उस व्यक्ति के कार्य और बातों से लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रखने या परमेश्वर को समझने और उसके प्रति समर्पित होने में मदद नहीं मिल सकती है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उसके कार्य में पवित्र आत्मा का कार्य शामिल नहीं है, उसने सच्चा प्रवेश हासिल नहीं किया है और उसके पास वास्तविकता नहीं है। इसलिए यह व्यक्ति इन वास्तविकताओं के बारे में बात करने में असमर्थ है। इसी तरीके से तुम्हें यह पहचान करनी चाहिए कि परमेश्वर की सेवा करने वाला कोई व्यक्ति वास्तव में एक झूठा अगुआ या मसीह विरोधी है या नहीं। लोगों की पहचान करने का यह तरीका निश्चित रूप से सटीक है। अगर तुम इस तरीके से पहचान करते हो, तो इस बात की कोई संभावना नहीं है कि तुम कोई गलती कर सकते हो।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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