113. विभिन्न बुरी आत्माओं की पहचान करने के सिद्धांत

(1) वे सभी लोग जो राक्षसों के वश में हैं, या जिनमें अक्सर बुरी आत्माएँ काम करती हैं, खुद बुरी आत्माएँ हैं। सत्य से घृणा करने वाले और परमेश्वर का उग्र रूप से विरोध करने वाले सभी राक्षस, बुरी आत्माएँ हैं;

(2) वे सभी जो परमेश्वर के प्रथम पुत्र या स्वर्गदूत होने का ढोंग करते हैं; जो सच्चे परमेश्वर के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए गवाही देते हैं; और जो स्वार्थ-विकास के माध्यम से देवता बनना चाहते हैं, बुरी आत्माएँ हैं;

(3) जो कोई भी शुद्धता से परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकता है, बल्कि विशेष रूप से झूठा और बेतुका होता है, जो लगातार परमेश्वर के वचनों को गलत समझता है और भ्रान्तियों की बातें करता है, निश्चित रूप से बुरी आत्मा है;

(4) जो भी परमेश्वर के खिलाफ़ इनकार, हमला, और निन्दा करते हैं, जो सत्य के लिए, सकारात्मक चीज़ों के लिए, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए एक विशेष घृणा रखते हैं, निश्चित रूप से बुरी आत्माएँ हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

बड़े लाल अजगर की अभिव्यक्ति मेरे प्रति प्रतिरोध, मेरे वचनों के अर्थों की समझ और बोध की कमी, बार-बार मेरा उत्पीड़न और मेरे प्रबंधन को बाधित करने के लिए षड़यंत्र करने की कोशिश करना है। शैतान इस प्रकार से अभिव्यक्त होता है: सामर्थ्य के लिए मेरे साथ संघर्ष करना, मेरे चुने हुए लोगों पर कब्ज़ा करने की इच्छा करना और मेरे लोगों को धोखा देने के लिए नकारात्मक बातें करना। शैतान (जो लोग मेरे नाम को स्वीकार नहीं करते, जो विश्वास नहीं करते, वे सभी शैतान हैं) की अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार हैं: देह के सुखों की अभिलाषा करना, वासनाओं में लिप्त होना, शैतान के बंधन में रहना, कुछ लोगों द्वारा मेरा विरोध करना और कुछ के द्वारा मेरा समर्थन किया जाना (किन्तु यह साबित नहीं करना कि वे मेरे प्रिय पुत्र हैं)। महादूत की अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार है: गुस्ताखी से बोलना, धर्मभ्रष्ट होना, लोगों को व्याख्यान देने के लिए प्रायः मेरा स्वर अपनाना, केवल बाहरी तौर पर मेरी नकल करना, जो मैं खाता हूँ वह खाना और जो मैं उपयोग करता हूँ उसका उपयोग करना; संक्षेप में, मेरे साथ बराबरी करने की इच्छा करना, महत्वाकांक्षी होना, किन्तु मेरी काबिलियत का अभाव और मेरा जीवन नहीं होना, और निकम्मा होना। शैतान, दुष्ट और महादूत, सभी बड़े लाल अजगर के विशिष्ट प्रदर्शन हैं, इसलिए जो लोग मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित नहीं हैं, वे सभी बड़े लाल अजगर की संतान हैं: यह बिल्कुल ऐसा ही है! ये सभी मेरे दुश्मन हैं। (हालाँकि शैतान के व्यवधानों को बाहर रखा गया है। यदि तुम्हारी प्रकृति मेरी खूबी है, तो इसे कोई भी बदल नहीं सकता। क्योंकि तुम अभी भी देह में रहते हो, इसलिए कभी-कभी तुम्हें शैतान के प्रलोभनों का सामना करना पड़ेगा—यह अपरिहार्य है—किन्तु तुम्हें सदा सावधान रहना चाहिए।) इसलिए, मैं अपनी प्रथम संतानों के अतिरिक्त, बड़े लाल अजगर की सभी संतानों को त्याग दूँगा। उनकी प्रकृति कभी नहीं बदल सकती और यह शैतान का गुण है। वे लोग शैतान को अभिव्यक्त करते हैं और महादूत को जीते हैं। यह पूरी तरह सच है। जिस बड़े लाल अजगर की मैं बात करता हूँ वह बड़ा लाल अजगर नहीं है; बल्कि यह मेरी विरोधी दुष्ट आत्मा है, जिसके लिए "बड़ा लाल अजगर" एक समानार्थी है। इसलिए पवित्र आत्मा के अतिरिक्त सभी आत्माएँ दुष्ट आत्माएँ हैं और उन्हें बड़े लाल अजगर की संतान भी कहा जा सकता है। सभी को यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 96' से उद्धृत

यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न नकली व्यक्ति होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और इस भविष्यवाणी का परिणाम यीशु का आगमन था। चूँकि यह पहले ही घटित हो चुका है, इसलिए एक और मसीहा का पुनः आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है, और यदि यीशु को इस समय फिर आना पड़ा, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है, और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र-चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीक़ा बदलकर भिन्न तरीक़ा अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" लेकिन अंत में, उनका भेद खुल जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी, जो शैतान से संबंधित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और वह नहीं चाहता कि मनुष्य उसे हैसियत या सम्मानजनक उपाधि प्रदान करे : उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही मिलने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम स्वयं परमेश्वर का या पवित्रात्मा का कार्य करने में असमर्थ हो। परमेश्वर की बुद्धि, चमत्कार और अगाधता, और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह पवित्रात्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह पवित्रात्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते, या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते, या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थपरक होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य रहता है, तो यह भी यथार्थपरक होता और दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वे हर पल परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। यह पूर्णत: अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब भी ऐसे समय होते हैं जब उसे भोजन करना चाहिए और आराम करना चाहिए—मनुष्यों की तो बात ही छोड़ दो। जो लोग बुरी आत्माओं से ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब-कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम होते हैं, वे भावनाओं से रहित होते हैं, यातना सहने में सक्षम होते हैं और जरा-सी भी थकान महसूस नहीं करते, मानो वे देहातीत हो चुके हों। क्या यह नितांत अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्माओं का कार्य अलौकिक है और कोई मनुष्य ऐसी चीजें प्राप्त नहीं कर सकता। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है, वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं : वे कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, उनकी आस्था बहुत बड़ी है, और वे कमज़ोरी का मामूली-सा भी चिह्न प्रदर्शित नहीं करते! वास्तव में, ये सब दुष्ट आत्मा के कार्य की अभिव्यक्तियाँ है। क्योंकि सामान्य लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है, जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

क्या तुम अपनी आत्मा को महसूस कर पाते हो? क्या तुम अपनी आत्मा को स्पर्श कर पाते हो? क्या तुम समझ पाते हो कि तुम्हारी आत्मा क्या कर रही है? तुम नहीं समझ पाते, है ना? यदि तुम ऐसी बातों को महसूस कर पाते हो या समझ पाते हो, तो यह तुम्हारे भीतर कोई अन्य आत्मा है जो बलपूर्वक कुछ कर रही है-तुमसे चीज़ें करवा और बुलवा रही है। यह तुमसे बाहर की कोई चीज़ है, यह तुम्हारी अंतर्निहित चीज़ नहीं है। जिन लोगों के अंदर दुष्टतात्मा कार्यरत रही है, उन्हें इसकी गहरी समझ होती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की देह और आत्मा के एकत्व को कैसे समझें' से उद्धृत

कुछ लोग होते हैं जो जब तक कोई मुद्दा नहीं उठता, बहुत सामान्य होते हैं, जो बहुत सामान्य रूप से बात करते और चर्चा करते हैं, जो सामान्य लगते हैं और जो कुछ भी बुरा नहीं करते हैं। लेकिन जब सभाओं में परमेश्वर के वचनों को पढ़ा जा रहा होता है, जब सत्य की संगति की जा रही होती है, तो वे अचानक असामान्य व्यवहार करने लगते हैं। कुछ सुनना सहन नहीं कर पाते, कुछ ऊंघने लगते हैं और कुछ बीमार पड़ जाते हैं, यह कहते हुए कि उन्हें बुरा लग रहा है और वे अब और नहीं सुनना चाहते। वे बिल्कुल अनजान होते हैं-यहां क्या कुछ चल रहा है? उन पर एक दुष्ट आत्मा चढ़ी होती है। तो फिर किसी दुष्ट आत्मा के अधीन होकर वे लोग ये शब्द क्यों बोलते रहते हैं "मैं इसे नहीं सुनना चाहता"? कभी-कभी लोग समझ नहीं पाते हैं कि यहां क्या हो रहा है, लेकिन एक दुष्ट आत्मा के लिए यह बिल्कुल स्पष्ट होता है। मसीह-विरोधियों में यही आत्मा होती है। तुम उनसे पूछो कि वे सत्य के प्रति इतने शत्रुतापूर्ण क्यों हैं, तो वे कहेंगे कि वे नहीं हैं, और वे दृढ़तापूर्वक इसे मानने से इनकार करेंगे। लेकिन अपने दिल में वे जानते हैं कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। जब वे परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, तब दूसरों से मिलने-जुलने में वे सामान्य लगते हैं। तुम्हें पता नहीं चलेगा कि उनके अंदर क्या चल रहा है। जब वे कोशिश करके परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो तुरंत उनके मुँह से ये शब्द निकलते हैं, "मैं इसे नहीं सुनना चाहता"; उनकी प्रकृति उजागर हो जाती है और वे जो हैं, यही हैं। क्या परमेश्वर के वचनों ने उन्हें उकसाया है, प्रकट किया है या वहां चोट पहुँचाई है, जहां दर्द होता है? ऐसा कुछ भी नहीं। दरअसल हुआ यह है कि जब बाकी सभी लोग परमेश्वर के वचन पढ़ रहे होते हैं, वे कहते हैं कि वे उसे नहीं सुनना चाहते। क्या वे दुष्ट नहीं हैं? (हाँ।) दुष्ट होने का क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ होता है बिना किसी स्पष्ट कारण और बिना जाने क्यों किसी चीज़ के प्रति और सकारात्मक चीज़ों के प्रति बहुत शत्रुतापूर्ण होना। वे वास्तव में कहना चाहते हैं, “जैसे ही मुझे परमेश्वर के वचन सुनाई पड़ते हैं, ये बात मेरे मुँह में आ जाती है; जैसे ही मुझे परमेश्वर की गवाही सुनाई पड़ती है, मुझमें विरक्ति पैदा हो जाती है, मुझे नहीं पता क्यों। जब मैं किसी ऐसे व्यक्ति को देखता हूँ, जो सत्य का अनुसरण करता है या सत्य से प्रेम करता है, मैं उन्हें चुनौती देना चाहता हूँ, मैं हमेशा उन्हें डांटना चाहता हूँ या उनकी पीठ पीछे उन्हें नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम करना चाहता हूँ, मैं उन्हें मार देना चाहता हूँ।” ऐसा कहना उनकी दुष्टता दर्शाता है। दरअसल, शुरुआत से ही मसीह-विरोधियों में कभी भी सामान्य व्यक्ति की आत्मा नहीं रही और उनमें कभी भी सामान्य मानवता नहीं रही–वास्तव में यही सब चल रहा है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (5)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

बुरी आत्माओं के काम की सबसे स्पष्ट विशेषता यह है कि यह अलौकिक है। बुरी आत्माएँ जो शब्द बोलतीं हैं या जो लोगों से वे करने को कहतीं हैं वो बातें असामान्य, बेतुकी और सामान्य मानवता की मूल नैतिकता और आचारनीति से भी विश्वासघात करने वाली होती हैं, और उनके शब्द और कार्य ऐसे होते हैं कि वे लोगों को धोखा देने, परेशान करने और भ्रष्ट करने के अलावा कुछ नहीं करते। जब दुष्ट आत्माएँ लोगों को अपने वश में कर लेतीं हैं, तो वे बेचैन और असहज हो जाते हैं, कुछ तो असामान्य तक हो जाते हैं, जबकि अन्य लोग एक धुंध में पड़ जाते हैं, और कुछ खुद को अत्यधिक चिंतित और शांत बैठने में असमर्थ पाते हैं। किसी भी हाल में, जब दुष्ट आत्माएँ लोगों को अपने वश में कर लेतीं हैं, तो वे बदल जाते हैं, कुछ ऐसा बन जाते हैं जो न तो मानव है और न ही राक्षस, और अपनी सामान्य मानवता और तर्कशक्ति खो देते हैं। यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि दुष्ट आत्माओं का सार दुष्ट और बदसूरत है, जो कि बिल्कुल शैतान का सार है।

जिन लोगों में दुष्ट आत्माओं का काम है (जो राक्षसों के वश में हैं) उनकी मुख्य अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार हैं:

1. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं वे अक्सर लोगों को ऐसे-वैसे काम करने के लिए कहते हैं, या किसी को कुछ बताने को कहते हैं, या झूठी भविष्यवाणियाँ करने के लिए कहते हैं।

2. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती है वे अक्सर प्रार्थना में तथाकथित "भाषाएँ" बोलते हैं जो कोई नहीं समझता है, खुद बोलने वाला भी इसे नहीं समझता है। कुछ वक्ता स्वयं "भाषाओँ की व्याख्या" भी कर सकते हैं।

3. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य रही होती हैं वे हमेशा, अत्यधिक बारम्बार, प्रकाशन प्राप्त कर रहे होते हैं, एक क्षण में बुरी आत्माओं द्वारा एक दिशा में, तो दूसरे क्षण में दूसरी दिशा में संचालित होता है। वह हर वक्त एक व्याकुलता की स्थिति में रहता है।

4. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं, वे बड़ी तत्परता से कुछ करना चाहते हैं, उनमें इंतजार कर पाने का धीरज नहीं होता है, वे आधी रात में भी दौड़ पड़ते हैं और उनका व्यवहार विशेष रूप से असामान्य होता है।

5. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं वे निरंकुश रूप से घमंडी होते हैं, उनमें विवेक नहीं होता है, उनके सभी कथन दूसरों को नीचा दिखाने वाले होते हैं और आदेश देने वाले पद से आते हैं। वे लोगों को उलझाते हैं और दुष्टात्माओं की तरह उन्हें चीज़ें करने को बाध्य करते हैं।

6. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं वे नहीं जानते कि सत्य के बारे में सहभागिता कैसे करें, परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देना तो दूर की बात है, उनमें परमेश्वर के प्रति कोई सम्मान नहीं होता है और सदैव स्वेच्छाचारी और स्वयंभू बनने का प्रयास कर रहे होते हैं, कलीसिया की सामान्य व्यवस्था को भंग करने के लिए सभी प्रकार के उपद्रव करने में सक्षम होते हैं।

7. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में का कार्य कर रही होती हैं वे अकथनीय रूप से अपने आपको किसी और के रूप में जताते हैं, किसी की आत्मा होने या किसी के द्वारा भेजे गए होने का दावा करते हैं और कि लोगों को उसकी बात सुननी चाहिए।

8. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं उनमें आम तौर पर कोई सामान्य समझ नहीं होती है। वे कदापि कोई सत्य समझ नहीं सकते हैं; उनमें समझने की बिल्कुल कोई क्षमता नहीं होती, न ही वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किये गये होते हैं, और उनके विचार अस्तव्यस्त होते हैं। चीज़ों को समझते समय, ये लोग असाधारण रूप से बेढंगे होते हैं।

9. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं वे काम करते समय दूसरों को उपदेश देने पर विशेष ध्यान देते हैं। हर चीज़ जो वो कहते और करते हैं वो अन्य लोगों पर हमला करने, बाँधने, भ्रष्ट करने के लिए होता है, वे लोगों के संकल्प तोड़ने की हद तक जाते हैं और उन्हें नकरात्मक बनाते हैं जिसकी वजह से लोग अपने आपको फिर उठा नहीं पाते हैं; केवल तभी वे छोड़ेंगे। उनके सभी कार्यकलाप विघ्न और खलल उत्पन्न करने और सभी प्रकार के उपद्रव करने के बारे में हैं। वे सिर्फ शुद्ध रूप से शैतान हैं, जो दूसरों को हानि पहुंचाते, उनसे खिलवाड़ करते और उन्हें निगल जाते हैं, और ज्यों ही वे अपनी मनमानी कर लेते हैं, वे प्रसन्न महसूस करते हैं। यह दुष्ट आत्माओं के काम का प्राथमिक उद्देश्य है।

10. बुरी आत्माएँ जिन लोगों में कार्य कर रही होती हैं वे बिल्कुल असामान्य जीवन जीते हैं। उनकी आँखों में एक अशुभ चमक होती है, और उनके कहे शब्द बहुत ही भयानक होते हैं मानो कि एक दुष्टात्मा धरती पर उतर आई हो। इस प्रकार के व्यक्ति के जीवन में कोई ढंग नहीं होता, वो अप्रशिक्षित जंगली जानवरों के समान ढुलमुल होते हैं। वे दूसरों के लिए अत्यंत घिनौने और अप्रिय होते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसे दुष्टात्माओं ने बांध रखा है, ठीक ऐसा ही दिखता है।

ऊपर बताये गये दस प्रकार दुष्ट आत्माओं के काम की मुख्य अभिव्यक्तियाँ हैं। कोई भी व्यक्ति जो इन अभिव्यक्तियों में से किसी एक को भी प्रदर्शित करता है, उसमें निश्चित रूप से दुष्ट आत्माओं का काम होगा। साफ़ तौर पर कहें तो, जो लोग दुष्ट आत्माओं के काम की उपरोक्त अभिव्यक्तियों में से चाहे कोई भी प्रकार प्रदर्शित करते हों, उनके पास बुरी आत्माओं का काम है। वह व्यक्ति जिसमें बुरी आत्माएँ काम कर रही होती हैं अक्सर ऐसे लोगों से नफ़रत करता है और जान-बूझकर दूर रहता है जिनमें पवित्रात्मा काम कर रहा होता है और जो सत्य के बारे में संगति कर सकते हैं। अक्सर, कोई जितना अधिक बेहतर होता है, वो उस पर उतना ही हमला करना और उसकी निंदा करना चाहता है। कोई जितना अधिक मूर्ख होता है, वह उतना ही उसे मक्खन लगाता है, वो खासकर ऐसे लोगों के सम्पर्क में आना चाहता है। जब दुष्ट आत्माएँ काम करती हैं, वे हमेशा सच और झूठ में भ्रम पैदा करती हैं, सकारात्मक को नकारात्मक बताती हैं और नकारात्मक को सकारात्मक। यह सटीक रूप से दुष्टात्माओं का काम है। हालांकि दुष्टात्माओं का काम कई तरह से अभिव्यक्त होता है, मगर हम केवल सत्य का इस्तेमाल करके ही इसे आसानी से परख और पहचान सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि दुष्टात्माओं के काम के परिणाम हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य के परिणामों से बिल्कुल विपरीत और विरुद्ध होते हैं। जिन लोगों के पास पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव और सत्य की अपेक्षाकृत अच्छी समझ होती है वे दुष्टात्माओं के काम को आसानी से पहचान सकते हैं, जबकि जिन लोगों के पास ज़्यादा अनुभव नहीं होता उन्हें दुष्टात्माओं के काम को पहचानने में काफी मुश्किल होती है।

जो लोग राक्षसों के वश में हैं उनमें कोई सामान्य समझ नहीं होती है। उनकी बातें उन्माद भरी और विवेकहीन होती हैं और यह राक्षसी प्रवृत्ति के वश में होने की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। बेशक, इसे शैतानों का पुनर्जन्म और शैतानों के राजा का इंसानी रूप धरना नहीं कहा जाएगा। शैतानों के पुनर्जन्म देखने में सामान्य लग सकते हैं, मगर वे सत्य से बेहद नफ़रत करते हैं, वे सभी परिस्थितियों में सत्य और न्याय के विरुद्ध खड़े होकर परमेश्वर के कार्य का पागलों की तरह विरोध कर सकते हैं। यह भी दुष्टात्माओं के वश में होने का मामला है, लेकिन यह शैतानों के राजा का स्वाभाविक इंसानी रूप है, भले ही यह बाहर से दुष्टात्मा के वश में होने के मुकाबले अलग दिखे, मगर इनके प्राकृतिक सार में दुष्ट, शैतानी प्रकृति, और दुष्टात्माओं की मिलावट होती है। जो लोग पूरी तरह से राक्षसों के वश में हो चुके हैं उन्हें पहचानना काफ़ी आसान है। जब उनकी पहचान कम स्पष्ट होती है और वे कुछ हद तक सामान्य नज़र आते हैं, मगर उन्हें परखने के बाद ही पता चलता है कि वे असामान्य हैं; बेशक इन लोगों में दुष्टात्माओं का काम भी होता है। जिन लोगों की समझ असामान्य होती है, जिनका व्यवहार पूरी तरह से निरंकुश होता है, वे निस्संदेह राक्षस के वश में होते हैं। वास्तव में, जो लोग "दुष्टात्माओं के काम की दस अभिव्यक्तियों" में से किसी एक का भी प्रदर्शन करते हैं, वे राक्षसों के वश में हैं। जिन लोगों में दुष्टात्माओं का काम होता है (चाहे यह जिस तरह से भी अभिव्यक्त हो), अगर वो कुछ महीनों से लेकर एक या दो सालों तक जारी रहता है, तो इससे पता चलता है कि वे राक्षसों के वश में हैं। अगर किसी व्यक्ति में किसी भी समय कुछ दिनों तक या एक-दो महीनों तक दुष्टात्माओं का काम करता है, जिसके बाद यह गायब हो जाता है और फिर वह पहले जैसा सामान्य हो जाता है और अब इसका कोई लक्षण नहीं रहता है, तो उसे ऐसे लोगों में गिना जाएगा जिनमें पहले दुष्टात्माओं का काम था, मगर अब उसके साथ राक्षसों के वश में रहने वाले व्यक्ति जैसा बर्ताव नहीं किया जाना चाहिए। किसी चीज़ को दुष्टात्माओं के काम की अभिव्यक्ति के रूप में पहचाने जाने के लिए, उसका दस अभिव्यक्तियों के दायरे में आना ज़रूरी है; अगर कोई अभिव्यक्ति उन दस अभिव्यक्तियों में शामिल नहीं है, तो इसे अनिवार्य रूप से दुष्टात्मा का काम नहीं कहा जा सकता। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का कहना है कि नींद में चलना दुष्टात्माओं का काम है; अत्यधिक कामुक इच्छा का होना भी दुष्टात्माओं के काम का उदाहरण है। मगर हर बार ऐसा नहीं होता; ये चीज़ें निर्धारित नहीं हैं। आप केवल इन अभिव्यक्तियों के आधार पर यकीन से नहीं कह सकते कि यह दुष्टात्माओं का काम है; किसी भी चीज़ को दुष्टात्माओं का काम या राक्षस के वश में होना केवल तभी कहा जा सकता है जब उसकी अभिव्यक्ति खास तौर पर इस हद तक असामान्य हो कि उसमें कोई तर्क ही न रहे। अगर किसी व्यक्ति में कभी-कभार कुछ असामान्य अभिव्यक्ति होती है या वह ऐसा कुछ देखता है, ऐसा कुछ सुनता है या इस तरह के सपने देखता है, तो बेशक इसे दुष्टात्माओं का काम नहीं माना जा सकता है। इसलिए, ऊपर बताये गए दस काम ही दुष्टात्माओं के काम की मुख्य अभिव्यक्तियां हैं। इस तरह से इनकी पहचान करना अपेक्षाकृत भरोसेमंद भी है और सटीक भी। जो चीज़ें ज़्यादा स्पष्ट नहीं हैं उन पर संयम से काम लेना बेहद ज़रूरी है, अन्यथा लोगों को आसानी से नुकसान पहुँचाया जा सकता है और उनके साथ गलत हो सकता है।

सीधे तौर पर कहें, तो दुष्टात्माओं के काम को इन दस सिद्धांतों के आधार पर पहचाना जा सकता है:

1. जो लोग परमेश्वर या मसीह होने का नाटक करते हैं वे दुष्ट आत्माओं के वश में होते हैं।

2. जो लोग यह ढोंग करते हैं कि उनमें स्वर्गदूतों की आत्माएँ बसी हैं, वे दुष्ट आत्माओं के वश में होते हैं।

3. जो लोग एक और देहधारी परमेश्वर होने का नाटक करते हैं, वे सब दुष्ट आत्माओं के वश में होते हैं।

4. जो लोग परमेश्वर के वचनों को अपने शब्द बताते हैं या लोगों से अपने वचनों को परमेश्वर के वचन मान लेने के लिए कहते हैं, वे सभी दुष्ट आत्माओं के कब्ज़े में होते हैं।

5. जो लोग अपना अनुसरण और आज्ञापालन करवाने के लिए पवित्र आत्मा द्वारा अपना उपयोग किये जाने का नाटक करते हैं, वे दुष्ट आत्माओं के वश में होते हैं।

6. जो लोग अक्सर ज़ुबानों में बोलते हैं, भाषाओँ की व्याख्या करते हैं, और सभी प्रकार के अलौकिक दृश्यों को देख सकते हैं, या अक्सर दूसरों के पापों को इंगित करते हैं, वे दुष्ट आत्माओं के कब्ज़े में होते हैं।

7. जो लोग अक्सर आत्माओं की अलौकिक बातें सुनते हैं या आत्माओं की आवाज़ें सुनते हैं या अक्सर भूतों को देखते हैं, और जो लोग स्पष्ट रूप से कुछ हद तक दिमाग से सही नहीं होते हैं, वे दुष्ट आत्माओं के वश में हैं।

8. जो सामान्य मानवता की मानसिक क्षमताएँ गँवा देता है, जो अक्सर शैतानी बातें कहते हैं, अक्सर खुद से बात करते हैं, बकबक करते हैं या अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें निर्देश दिया है और पवित्र आत्मा ने उन्हें छुआ है, वे सब दुष्ट आत्माओं के वश में हैं।

9. जिन लोगों के साथ मनोविक्षिप्ति की घटनाएँ हो चुकी हैं, जो मूर्खतापूर्ण काम करते हैं, जो लोगों से सहजता से बात नहीं कर पाते हैं और कभी-कभी पागल-से और खोये-से रहते हैं, वे सब दुष्ट आत्माओं के वश में हैं। जो लोग समलैंगिकों के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं राक्षसों के कब्ज़े में रहने वाले लोग हैं, वे भी निष्कासित किये जाएँगे।

10. कुछ लोग आमतौर पर काफी सामान्य होते हैं, लेकिन कुछ महीनों या एक-दो वर्षों में, उत्तेजित हो सकते हैं और उनमें कोई मानसिक विकार पैदा हो सकता है। विकार के समय वे पूरी तरह से उन लोगों के समान होते हैं जो राक्षसों के वश में हैं। यद्यपि ये लोग कभी-कभी सामान्य होते हैं, फिर भी उन्हें दुष्ट आत्माओं के कब्ज़े में रहे लोगों की तरह वर्गीकृत किया जाता है। (यदि किसी व्यक्ति को कई साल पहले मानसिक विकार हो चुका हो, लेकिन बाद में कई साल तक ऐसा न हुआ हो, और वह परमेश्वर में विश्वास करने के सत्य को समझ गया हो और उसे स्वीकार कर लिया हो, और उसमें कुछ बदलाव हुए हों, तो उसको बुरी आत्माओं से वशीभूत के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाएगा।)

ऐसे लोगों को राक्षसों के वश में कहना सही होगा जिनमें कुछ महीनों से लेकर एक या दो सालों तक दुष्टात्माओं का काम चलता रहा—और ऐसे लोगों को अवश्य निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। अगर उनमें सिर्फ़ कुछ समय तक दुष्टात्माओं का काम चला और कुछ मौकों के बाद वह गायब हो गया, और फ़िर ऐसा कभी नहीं हुआ, तो फ़िर उन्हें ऐसे लोगों में वर्गीकृत नहीं किया जाना चाहिए जिनमें दुष्टात्माओं का काम चल रहा है, इससे उन्हें मानसिक तनाव से बचाया जा सकता है। जब तक लोग सत्य का अनुसरण करने और सत्य को समझने में सक्षम हैं, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें दुष्टात्माओं का काम है और न ही इस मामले को दोबारा उठाया जा सकता है, भले ही अतीत में कभी उनके पास कोई परेशानी या दुष्टात्माओं का काम रहा हो। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर ऐसे लोग अब सत्य को समझने में सक्षम हैं और पवित्र आत्मा ने उन्हें प्रबुद्ध और रोशन किया है, तो वे निस्संदेह ऐसे लोग हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है और वे परमेश्वर के कार्य और उद्धार के पात्र बन जाते हैं। ज़ाहिर है कि ऐसे लोगों में दुष्टात्माओं का काम नहीं होता; इसमें कोई शक नहीं। अगर किसी व्यक्ति ने सालों से परमेश्वर में विश्वास किया है, मगर उसे कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता या रोशनी नहीं मिली और वह आध्यात्मिक बातों को न समझ पाने वालों की तरह ही सत्य को समझने में अक्षम है, तो परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता है और शायद उनमें दुष्टात्माओं का काम हो सकता है। सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद, जिन लोगों में दुष्टात्माओं का काम होता है उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं होता और उनमें सच्ची आस्था भी नहीं होती है। यह एक अकाट्य तथ्य है। वहीं दूसरी ओर, जिन लोगों में पवित्र आत्मा का काम होता है उनकी दशा लगातार सामान्य होती रहती है और सत्य के बारे में उनकी समझ भी बढ़ती जाती है; इतना ही नहीं, उनके पास वास्तविकता में प्रवेश करने का मार्ग होता है और उनके जीवन के स्वभाव में निरंतर बदलाव आता है। ये भी अकाट्य तथ्य हैं। इस प्रकार, जिन लोगों के पास पवित्र आत्मा का काम होता है उनमें दुष्टात्माओं का काम बिल्कुल भी नहीं होता। अगर उनके पास वाकई दुष्टात्माओं का काम था, तो इसका मतलब है कि अब उनके पास पवित्र आत्मा का काम नहीं है; यह एक अकाट्य तथ्य है और इसी सिद्धांत के आधार पर हम उन लोगों को पहचान सकते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

ज़्यादातर लोग बुरी आत्माओं के काम की पहचान केवल तभी कर सकते हैं जब वह अलौकिक हो, लेकिन जब ऐसा नहीं होता है तब वे संघर्ष करते हैं। इसके लिए लोगों को खुद को सत्य से लैस करने की, और बुरी आत्माओं से पैदा हुई असंख्य भ्रांतियों की पहचान करने के लिए सत्य का उपयोग करने की, आवश्यकता होती है; तब बुरी आत्माओं के काम का असली चेहरा पहचानना आसान हो जाता है। वास्तव में, सभी भ्रांतियाँ और विधर्म बुरी आत्माओं से उत्पन्न होते हैं, और शैतान के सभी दानव राजा बुरी आत्माओं के ही अवतार हैं। लेकिन क्या उनके शब्द और कार्य अलौकिक होते हैं? बिल्कुल नहीं; बाह्य रूप से, कुछ लोग अत्यधिक तर्कसंगत भी दिखाई देते हैं—ठीक यही शैतान को इतना शातिर बनाता है। इस तरह, पहचान के लिए सबसे बुनियादी सिद्धांत, परमेश्वर के वचनों का और सभी सैद्धांतिक तर्कों को आँकने के लिए सत्य का उपयोग करना है। वह सब जो सत्य के अनुसार नहीं है, विधर्म और भ्रांति है, और यह सब बुरी आत्माओं से उत्पन्न होता है। वे सभी जो लोगों को ठगते हैं और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप करते हैं बुरी आत्माएँ हैं; सभी झूठे मसीह और मसीह-विरोधी लोग बुरी आत्माएँ हैं; और वे सभी जो सच्चे परमेश्वर की गवाही नहीं देते हैं, जो सच्चे परमेश्वर को आदरपूर्वक ऊँचा नहीं उठाते हैं, जो सच्चे परमेश्वर की आराधना नहीं करते हैं, जो सच्चे परमेश्वर का कहना नहीं मानते हैं, और बजाय इसके वे यह गवाही देते हैं कि वे ही परमेश्वर हैं या वे परमेश्वर बनना चाहते हैं—वे सब बुरी आत्माएँ हैं, चाहे वे कितने भी बड़े चिन्हों और चमत्कारों का प्रदर्शन करें। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को समझना चाहिए कि चिन्हों और चमत्कारों का प्रदर्शन करना सच्ची शक्ति नहीं है; केवल सत्य को व्यक्त कर पाना और लोगों को पूर्ण बनाने और सब कुछ संपन्न करने के लिए वचनों का उपयोग कर पाना ही सच्ची शक्ति है। और इसलिए, वे सब जो चिन्हों और चमत्कारों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और आत्माओं के अलौकिक कार्य का अनुसरण करते हैं, बेतुके होते हैं, और वे सत्य से युक्त नहीं होते हैं। वे सब लोग जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, और निरपवाद रूप से उन बुरी आत्माओं को स्वीकार करते हैं जो चिन्हों और चमत्कारों को करने में सक्षम होती हैं और जिनका कार्य अलौकिक होता है—वे सब लोग बुरी आत्माएँ हैं; वे सब जिनके हृदय हर तरह की भ्रांति और विधर्म से छलकते हैं—वे सब बुरी आत्माएँ हैं; वे सब लोग जो निरपवाद रूप से हर प्रकार के विधर्म और भ्रांति को गले लगाते हैं, फिर भी सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं—वे सब बुरी आत्माएँ हैं; वे सब जो परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ पाने में हमेशा असमर्थ होते हैं, जो हमेशा परमेश्वर के वचनों को विकृत करते और भ्रांतियों को गले लगाते हैं—वे सब निस्संदेह बुरी आत्माएँ हैं; और वे सब जो विशेष रूप से बेतुके और हास्यास्पद होते हैं, बुरी आत्माएँ हैं। यह परम सिद्धांत है। वास्तव में, सभी का एक अतीत होता है, सभी के अंदर एक आत्मा होती है, जो निर्देशित करती है कि वे क्या कहें और क्या करें—यह संदेह से परे है। शैतान की आत्मा प्राचीन सर्प में थी, और बड़े लाल अजगर में भी है; और बुरी आत्माएँ उन सभी दानव राजाओं के भीतर हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। जैसे ही उन्हें परमेश्वर के सत्य-वचन के विरुद्ध रोका जाता है, उनकी असलियत उजागर हो जाती है। कुछ लोगों की समझ विशेष रूप से बेतुकी होती है, वैसे ही जैसे चीज़ों के प्रति उनका दृष्टिकोण होता है। क्या तुम दावा कर सकते हो कि उनकी आत्मा के साथ कोई समस्या नहीं है? कुछ लोग विभिन्न विधर्मों और भ्रांतियों के प्रति विशेष रूप से पक्षपाती होते हैं, और सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं। क्या तुम दावा कर सकते हो कि उनकी आत्माओं के साथ कोई समस्या नहीं है? कुछ लोग अलौकिक चीज़ों पर ध्यान देते हैं और उनका अनुसरण करना पसंद करते हैं। वे निरपवाद रूप से दावा करते हैं कि बुरी आत्माओं का अलौकिक कार्य ही पवित्र आत्मा का कार्य है, और छले जाने के बाद भी वे वापस नहीं लौटते हैं। क्या तुम कह सकते हो कि उनकी आत्माओं के साथ कोई समस्या नहीं है? कुछ लोगों ने कई वर्षों से सच्चा मार्ग स्वीकार किया है, और कई धर्मोपदेश और संगतियाँ सुनी हैं, और वे कई पत्रों और सिद्धांतों का बयान करने में सक्षम हैं, फिर भी वे सत्य का सार सच्चे अर्थ में समझने में असमर्थ होते हैं, और उनके जीवन स्वभाव में ज़रा-सा भी बदलाव नहीं होता है। क्या तुम कह सकते हो कि उनकी आत्माओं के साथ कोई समस्या नहीं है? वास्तव में, ऐसे लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है, और उनमें सत्य को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने के किन्हीं भी साधनों का अभाव है। इसमें कोई संदेह नहीं है। तो फिर बुरी आत्माओं के विभिन्न कार्यों को कैसे पहचाना जा सकता है? सबसे अधिक महत्व की बात है लोगों के सार की पहचान करना, क्योंकि जब तुम उनके सार की पहचान कर सकते हो केवल तभी तुम बता सकते हो कि वे किस प्रकार की आत्मा का कार्य है। यदि लोग विशेष रूप से दुष्ट, कपटी और विषैले होते हैं, तो उनमें निर्विवाद रूप से मानवीय भावना की कमी होती है; यदि उनमें कोई आत्मा है, तो वह बुरी आत्मा है। यदि लोग लगातार सभी तरह की भ्रांतियों को स्वीकार करते और अपनाते हैं, तो निस्संदेह उनके अंदर कोई बेतुकी—और बुरी—आत्मा है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य से युक्त होते हैं उनकी समझ अपेक्षाकृत शुद्ध होती है, उनकी मानवता अपेक्षाकृत निष्कलंक और ईमानदार होती है, और इसलिए वे जिस ज्ञान की संगति करते हैं वह अपेक्षाकृत शुद्ध होता है, और लोगों के लिए लाभप्रद होता है। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के चुने हुए लोग होते हैं, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रिय होते हैं, और वे वो हैं जिनके साथ लोग जुड़ने के इच्छुक होते हैं, और जिनके साथ हृदय और मन से एक होने में समर्थ होते हैं। यदि लोग विशेष रूप से धोखेबाज़, कपटी और विषैले होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा के कार्य से बिल्कुल युक्त नहीं होते, क्योंकि जो दुष्ट हैं, परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है। परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और चुने गए लोग वे हैं जो सत्य से प्रेम और उसका अनुसरण करते हैं। यहाँ तक कि यदि वे सेवाकर्मी भी हों, तब भी वे निस्संदेह अपेक्षाकृत अच्छी मानवता के होते हैं; अपेक्षाकृत अच्छी मानवता के लोग ही अपने कर्तव्य के निर्वहन में निष्ठावान होते हैं, और दूसरों के साथ अपनी बातचीत में ईमानदार और विवेकपूर्ण होते हैं। कलीसियाओं में, जब केवल सत्य से प्रेम करने वाले लोग इकट्ठा होते हैं, तभी वहाँ पवित्र आत्मा का कार्य, और कलीसिया का सच्चा जीवन होता है। यदि लोगों की बातें और सहभागिता विशेष रूप से बेतुकी हों, अगर उनके पास शुद्ध समझ का अभाव हो चाहे वे कितने भी उपदेश और संगतियाँ सुनते हों, और अगर उनमें प्रगति का कोई चिन्ह दिखाई न देता हो, अगर उनकी मानवता विशेष रूप से अधम, विशेष रूप से बुरी हो, और वे बिल्कुल भी नहीं बदले हों, और वे दूसरों के द्वारा घृणित और तिरस्कृत होते हों, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा हटा दिया जाएगा। ऐसे लोगों के साथ रहने और बातचीत करने का कोई लाभ नहीं है; वे केवल तुम पर बुरा प्रभाव डालेंगे और तुम्हें परेशान करेंगे। यह कहा जा सकता है कि जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, उन सभी की मानवता अपेक्षाकृत धोखेबाज़, विषैली, स्वार्थी और अधम होती है; वे केवल धन्य होने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और उन्होंने कभी भी परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत होना और परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाना तथा परमेश्वर को संतुष्ट करना नहीं जाना है; उनमें अंतःकरण या विवेक का अभाव होता है। ऐसे लोगों द्वारा पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने की संभावना नहीं होती है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन सब लोगों में जो पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित होते हैं, अधिकांश लोग बुरी आत्माओं के काम की दखलंदाज़ी भुगतते हैं। वे लोग जो लंबे समय से पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं, अत्यधिक खतरनाक होते हैं, और उनके प्रति सावधान रहना चाहिए। यदि लोगों को पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाता है, तो सभी प्रकार की बुरी आत्माएँ उनमें प्रवेश करने के लिए इस मौक़े का फ़ायदा उठाती हैं,उस समय इन लोगों की स्थिति और भी अधिक भीषण हो जाती है, इस हद तक कि वे अपने पुराने तौर-तरीकों में लौट जाते हैं, और यहाँ तक कि वे अविश्वासियों से भिन्न नहीं रह जाते हैं। यह शैतान का स्वयं को प्रदर्शित करना है। स्पष्ट रूप से, भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों की पहचान करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। जब तुम लोगों की पहचान कर सकते हो, केवल तभी तुम आत्माओं की पहचान कर सकते हो। यदि तुम लोगों की पहचान नहीं कर सकते, तो तुम बुरी आत्माओं के विभिन्न कार्यों की पहचान निश्चित रूप से नहीं कर पाओगे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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