113. विभिन्न दुष्ट आत्माओं की पहचान करने के सिद्धांत

(1) वे सभी लोग जो दानवों के वश में हैं, या जिनमें अक्सर दुष्ट आत्माएँ काम करती हैं, खुद भी दुष्ट आत्माएँ हैं। सत्य से घृणा करने वाले और परमेश्वर का उग्र रूप से विरोध करने वाले सभी दानव दुष्ट आत्माएँ हैं।

(2) वे सभी जो परमेश्वर के ज्येष्ठ पुत्र या स्वर्गदूत होने का ढोंग करते हैं; जो सच्चे परमेश्वर के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए गवाही देते हैं; और जो स्व-विकास के माध्यम से देवता बनना चाहते हैं, दुष्ट आत्माएँ हैं।

(3) जो कोई भी शुद्धता से परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकता है, बल्कि विशेष रूप से झूठा और बेतुका होता है, जो लगातार परमेश्वर के वचनों की गलत व्याख्या करता है और भ्रांतियों की बातें करता है, वह निश्चित रूप से दुष्ट आत्मा है।

(4) जो कोई भी परमेश्वर को नकारते हैं, उस पर हमला और उसकी ईशनिंदा करते हैं, जो सत्य के लिए, सकारात्मक चीजों के लिए, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए एक विशेष घृणा रखते हैं, निश्चित रूप से दुष्ट आत्माएँ हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

बड़े लाल अजगर की अभिव्यक्ति मेरे प्रति प्रतिरोध, मेरे वचनों के अर्थों की समझ और बोध की कमी, बार-बार मेरा उत्पीड़न और मेरे प्रबंधन को बाधित करने के लिए षड़यंत्र करने की कोशिश करना है। शैतान इस प्रकार से अभिव्यक्त होता है: सामर्थ्य के लिए मेरे साथ संघर्ष करना, मेरे चुने हुए लोगों पर कब्ज़ा करने की इच्छा करना और मेरे लोगों को धोखा देने के लिए नकारात्मक बातें करना। शैतान (जो लोग मेरे नाम को स्वीकार नहीं करते, जो विश्वास नहीं करते, वे सभी शैतान हैं) की अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार हैं: देह के सुखों की अभिलाषा करना, वासनाओं में लिप्त होना, शैतान के बंधन में रहना, कुछ लोगों द्वारा मेरा विरोध करना और कुछ के द्वारा मेरा समर्थन किया जाना (किन्तु यह साबित नहीं करना कि वे मेरे प्रिय पुत्र हैं)। महादूत की अभिव्यक्तियाँ इस प्रकार है: गुस्ताखी से बोलना, धर्मभ्रष्ट होना, लोगों को व्याख्यान देने के लिए प्रायः मेरा स्वर अपनाना, केवल बाहरी तौर पर मेरी नकल करना, जो मैं खाता हूँ वह खाना और जो मैं उपयोग करता हूँ उसका उपयोग करना; संक्षेप में, मेरे साथ बराबरी करने की इच्छा करना, महत्वाकांक्षी होना, किन्तु मेरी काबिलियत का अभाव और मेरा जीवन नहीं होना, और निकम्मा होना। शैतान, दुष्ट और महादूत, सभी बड़े लाल अजगर के विशिष्ट प्रदर्शन हैं, इसलिए जो लोग मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित नहीं हैं, वे सभी बड़े लाल अजगर की संतान हैं: यह बिल्कुल ऐसा ही है! ये सभी मेरे दुश्मन हैं। (हालाँकि शैतान के व्यवधानों को बाहर रखा गया है। यदि तुम्हारी प्रकृति मेरी खूबी है, तो इसे कोई भी बदल नहीं सकता। क्योंकि तुम अभी भी देह में रहते हो, इसलिए कभी-कभी तुम्हें शैतान के प्रलोभनों का सामना करना पड़ेगा—यह अपरिहार्य है—किन्तु तुम्हें सदा सावधान रहना चाहिए।) इसलिए, मैं अपनी प्रथम संतानों के अतिरिक्त, बड़े लाल अजगर की सभी संतानों को त्याग दूँगा। उनकी प्रकृति कभी नहीं बदल सकती और यह शैतान का गुण है। वे लोग शैतान को अभिव्यक्त करते हैं और महादूत को जीते हैं। यह पूरी तरह सच है। जिस बड़े लाल अजगर की मैं बात करता हूँ वह बड़ा लाल अजगर नहीं है; बल्कि यह मेरी विरोधी दुष्ट आत्मा है, जिसके लिए "बड़ा लाल अजगर" एक समानार्थी है। इसलिए पवित्र आत्मा के अतिरिक्त सभी आत्माएँ दुष्ट आत्माएँ हैं और उन्हें बड़े लाल अजगर की संतान भी कहा जा सकता है। सभी को यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 96' से उद्धृत

यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न नकली व्यक्ति होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और इस भविष्यवाणी का परिणाम यीशु का आगमन था। चूँकि यह पहले ही घटित हो चुका है, इसलिए एक और मसीहा का पुनः आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है, और यदि यीशु को इस समय फिर आना पड़ा, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है, और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र-चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीक़ा बदलकर भिन्न तरीक़ा अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" लेकिन अंत में, उनका भेद खुल जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी, जो शैतान से संबंधित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और वह नहीं चाहता कि मनुष्य उसे हैसियत या सम्मानजनक उपाधि प्रदान करे : उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही मिलने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम स्वयं परमेश्वर का या पवित्रात्मा का कार्य करने में असमर्थ हो। परमेश्वर की बुद्धि, चमत्कार और अगाधता, और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह पवित्रात्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह पवित्रात्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते, या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते, या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थपरक होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य रहता है, तो यह भी यथार्थपरक होता और दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वे हर पल परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। यह पूर्णत: अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब भी ऐसे समय होते हैं जब उसे भोजन करना चाहिए और आराम करना चाहिए—मनुष्यों की तो बात ही छोड़ दो। जो लोग बुरी आत्माओं से ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब-कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम होते हैं, वे भावनाओं से रहित होते हैं, यातना सहने में सक्षम होते हैं और जरा-सी भी थकान महसूस नहीं करते, मानो वे देहातीत हो चुके हों। क्या यह नितांत अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्माओं का कार्य अलौकिक है और कोई मनुष्य ऐसी चीजें प्राप्त नहीं कर सकता। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है, वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं : वे कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, उनकी आस्था बहुत बड़ी है, और वे कमज़ोरी का मामूली-सा भी चिह्न प्रदर्शित नहीं करते! वास्तव में, ये सब दुष्ट आत्मा के कार्य की अभिव्यक्तियाँ है। क्योंकि सामान्य लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है, जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (4)' से उद्धृत

कुछ लोग होते हैं जो जब तक कोई मुद्दा नहीं उठता, बहुत सामान्य होते हैं, जो बहुत सामान्य रूप से बात करते और चर्चा करते हैं, जो सामान्य लगते हैं और जो कुछ भी बुरा नहीं करते हैं। लेकिन जब सभाओं में परमेश्वर के वचनों को पढ़ा जा रहा होता है, जब सत्य की संगति की जा रही होती है, तो वे अचानक असामान्य व्यवहार करने लगते हैं। कुछ सुनना सहन नहीं कर पाते, कुछ ऊंघने लगते हैं और कुछ बीमार पड़ जाते हैं, यह कहते हुए कि उन्हें बुरा लग रहा है और वे अब और नहीं सुनना चाहते। तब वे बिल्कुल अनजान होते हैं-यहां क्या कुछ चल रहा है? उन पर एक दुष्ट आत्मा चढ़ी होती है। तो फिर किसी दुष्ट आत्मा के अधीन होकर वे लोग ये शब्द क्यों बोलते रहते हैं "मैं इसे नहीं सुनना चाहता"? कभी-कभी लोग समझ नहीं पाते हैं कि यहां क्या हो रहा है, लेकिन एक दुष्ट आत्मा के लिए यह बिल्कुल स्पष्ट होता है। मसीह-विरोधियों में यही आत्मा होती है। तुम उनसे पूछो कि वे सत्य के प्रति इतने शत्रुतापूर्ण क्यों हैं, तो वे कहेंगे कि वे नहीं हैं, और वे दृढ़तापूर्वक इसे मानने से इनकार करेंगे। लेकिन अपने दिल में वे जानते हैं कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। जब वे परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, तब दूसरों से मिलने-जुलने में वे सामान्य लगते हैं। तुम्हें पता नहीं चलेगा कि उनके अंदर क्या चल रहा है। जब वे कोशिश करके परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो तुरंत उनके मुँह से ये शब्द निकलते हैं, "मैं इसे नहीं सुनना चाहता"; उनकी प्रकृति उजागर हो जाती है और वे जो हैं, यही हैं। क्या परमेश्वर के वचनों ने उन्हें उकसाया है, प्रकट किया है या वहां चोट पहुँचाई है, जहां दर्द होता है? ऐसा कुछ भी नहीं। दरअसल हुआ यह है कि जब बाकी सभी लोग परमेश्वर के वचन पढ़ रहे होते हैं, वे कहते हैं कि वे उसे नहीं सुनना चाहते। क्या वे दुष्ट नहीं हैं? दुष्ट होने का क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ होता है बिना किसी स्पष्ट कारण और बिना जाने क्यों किसी चीज़ के प्रति और सकारात्मक चीज़ों के प्रति बहुत शत्रुतापूर्ण होना। वे कहते हैं, "जैसे ही मुझे परमेश्वर के वचन सुनाई पड़ते हैं, मैं उन्हें सुनना नहीं चाहता; जैसे ही मुझे परमेश्वर की गवाही सुनाई पड़ती है, मुझमें विरक्ति पैदा हो जाती है, मुझे नहीं पता क्यों। जब मैं किसी ऐसे व्यक्ति को देखता हूँ, जो सत्य का अनुसरण करता है या सत्य से प्रेम करता है, मैं उन्हें चुनौती देना चाहता हूँ, मैं हमेशा उन्हें डांटना चाहता हूँ या उनकी पीठ पीछे उन्हें नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम करना चाहता हूँ, मैं उन्हें मार देना चाहता हूँ।" ऐसा कहना उनकी दुष्टता दर्शाता है। दरअसल, शुरुआत से ही मसीह-विरोधियों में कभी भी सामान्य व्यक्ति की आत्मा नहीं रही और उनमें कभी भी सामान्य मानवता नहीं रही–वास्तव में यही सब चल रहा है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग एक)' से उद्धृत

क्या तुम लोगों ने कभी मसीह--विरोधियों का ऐसा मजमा देखा है? जब तुम उनके बीच होते हो, तो तुम क्या महसूस करते हो? बाहर से वे बहुत शिष्ट प्रतीत होते हैं—लेकिन जब तुम उनके साथ सत्य और परमेश्वर की इच्छा के बारे में सहभागिता करते हो, तो वे जो रवैया प्रदर्शित करते हैं, वह उनकी बाहरी शिष्टता के बिलकुल विपरीत होता है, अर्थात वे अत्यधिक विमुख और पूरी तरह से उदासीन होते हैं। जब तुम उनके साथ सत्य के बारे में सहभागिता करते हो, तो वे तुम्हें बाहरी व्यक्ति समझते हैं, और जब तुम कलीसिया के काम के बारे में सहभागिता करते हो, तो उन्हें और भी ज्यादा ऐसा लगता है; जब तुम इस बारे में सहभागिता करते हो कि क्या कलीसिया के कार्य के विशिष्ट अंश पूरे किए गए हैं, और उन्हें कितनी अच्छी तरह से किया गया है, तो उनके सो जाने और दानवता उजागर करने की संभावना होती है, वे अपना सिर खुजाते हैं और अपने कान साफ करते हैं, वे जम्हाई लेते हैं, उनकी आँखों में पानी भर आता है, वे छींक भी सकते हैं। क्या यह एक दुष्टात्मा द्वारा कब्जा करना नहीं है? तुम्हारे सत्य के बारे में सहभागिता करते ही उनकी दानवता क्यों उभर आती है? क्या उनमें से प्रत्येक के हृदय में काफी प्रेम नहीं है? जब तुम सत्य के बारे में सहभागिता करना शुरू करते हो, तो उनकी दिलचस्पी खत्म क्यों हो जाती है? क्या इससे वे उजागर नहीं हो जाते? क्या उनमें बाहरी कार्य करने के लिए अत्यधिक उत्साह और प्रतिबद्धता नहीं होती? और अगर वे प्रतिबद्ध हैं, तो क्या उनमें वास्तविकता नहीं हैं? अगर उनमें वास्तविकता है, तो उन्हें लोगों को सत्य के बारे में सहभागिता करते सुनकर खुश होना चाहिए, उनमें इसकी लालसा होनी चाहिए। तो दुष्टात्माओं के कब्जे की स्थिति क्यों उत्पन्न होती है? यह साबित करता है कि उनकी सामान्य शिष्टता पूरी तरह से झूठी है—सत्य ने उन्हें उजागर कर दिया है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे परमेश्वर के घर को अपना निजी क्षेत्र मानते हैं' से उद्धृत

भाई और बहन अपने भीतर विवेक विकसित करें और व्यावहारिक सबक सीखें, इसके लिए परमेश्वर ने उनके बीच किसी ऐसे व्यक्ति के रहने की व्यवस्था की, जो दानव के कब्जे में रहा हो। शुरुआत में इस व्यक्ति का बोलने और काम करने का तरीका सामान्य था, उसका विवेक भी सामान्य था; वह बिलकुल भी समस्यात्मक दिखाई नहीं देता था। लेकिन संपर्क की एक अवधि के बाद, भाइयों और बहनों को पता चला कि जो कुछ भी वह कहता है, वह असंगत लगता है—उसकी बातें बेमतलब थीं। बाद में कुछ "अलौकिक" चीज़ें हुईं : वह हमेशा भाई-बहनों को बताता कि उसने फलां-फलां चीज़ें देखी हैं, या कि परमेश्वर ने उसके सामने फलां-फलां बात का खुलासा किया है। उदाहरण के लिए, एक दिन परमेश्वर ने उसे बताया कि उसे भाप से पकी रोटियाँ बनानी हैं—उसे बनानी ही होंगी—और उसके अगले दिन ऐसा हुआ कि उसे बाहर जाना पड़ा, इसलिए वह रोटियाँ अपने साथ ले गया और उसे कोई और खाना बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। अगले दिन परमेश्वर ने उसे सपने में बताया कि उसे दक्षिण की ओर जाना चाहिए; छह मील दूर कोई उसका इंतज़ार कर रहा है। वह देखने गया, और ठीक वहाँ यीशु का एक विश्वासी था, जो खो गया था; उसने इस विश्वासी के सामने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की गवाही दी और उसने उसे स्वीकार कर लिया। वह हमेशा प्रकाशन प्राप्त करता रहता था, उसे हमेशा एक वाणी सुनाई देती थी, हमेशा अलौकिक चीज़ें हो रही थीं। हर दिन जब यह बात आती कि क्या खाना है, कहाँ जाना है, क्या करना है, किसके साथ बातचीत करनी है, तो वह सामान्य मानव-जीवन के नियमों का पालन न करता, न ही वह आधार या सिद्धांत के रूप में परमेश्वर के वचनों की तलाश करता, और न ही सहभागिता करने के लिए वह लोगों को खोजता। इसके बजाय, वह हमेशा किसी आवाज़ या प्रकाशन या सपने का इंतजार करता। क्या यह व्यक्ति सामान्य था? (नहीं।) कुछ लोग उसकी असलियत जान पाए और उन्होंने कहा : "यह आदमी भले ही सड़क पर नंगा और मैला-कुचैला न दौड़ता हो, लेकिन ये एक बुरी आत्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं।" धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से, भाई-बहनों को उसकी असलियत का पता लगना शुरू हो गया, और फिर वह दिन आया, जब उसकी समस्या फूट पड़ी और वह पागलों की तरह बातें करता हुआ नंगा और मैला-कुचैला सड़कों पर दौड़ने लगा। दानव प्रकट हो गया था; चीज़ें आखिरकार प्रकाश में आ गईं। तो क्या इस दौरान भाई-बहन उसकी असलियत देख पाये? क्या उन्हें यह अंतर्दृष्टि मिली कि बुरी आत्मा क्या होती है, बुरी आत्मा का क्या काम है, और लोगों में बुरी आत्माओं के काम की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? (हाँ।) कुछ लोगों ने निश्चित रूप से अंतर्दृष्टि और विवेक प्राप्त किया। शायद कुछ लोग उसके झाँसे में आ गए, और वे केवल तभी उसकी असलियत देख पाए, जब उसका आवेग फूटा। लेकिन चाहे वे झाँसे में आ गए हों या उसकी असलियत देख पाने में सफल रहे हों, अगर परमेश्वर ने इस परिवेश की व्यवस्था न की होती, तो क्या लोगों को यह स्पष्ट हो पाता कि बुरी आत्मा का क्या काम है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर द्वारा इस परिवेश की व्यवस्था और ये चीज़ें किए जाने का क्या महत्व और उद्देश्य था? यह इसलिए था कि लोग इस प्रकार के व्यक्ति को पहचान पाएँ, व्यावहारिक विवेक विकसित कर पाएँ और एक सबक सीख पाएँ। अगर लोगों को सिर्फ यह बताया जाता कि बुरी आत्मा का क्या काम है, वैसे ही जैसे कोई शिक्षक बिना किसी वास्तविक प्रशिक्षण या अभ्यास के कोई सबक सिखाता है, तो लोग केवल सिद्धांत और शब्द प्राप्त करते। तुम केवल तभी यह स्पष्ट रूप से बता सकते हो कि बुरी आत्मा का काम क्या है और उसकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं, जब तुमने व्यक्तिगत रूप से इसे देखा हो—अपनी आँखों से देखा हो, अपने कानों से सुना हो। और फिर जब ऐसे लोग दोबारा तुम्हारे सामने आते हैं, तो तुम उन्हें पहचानने और अस्वीकार करने में सक्षम होगे; तुम ऐसे मामलों पर ठीक से ध्यान देने और उन्हें सँभाल पाने में सक्षम होगे।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते और वे मसीह के सार को नकारते हैं (भाग एक)' से उद्धृत

ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे अप्रत्याशित रूप से शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह समय अलग किए जाने का है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब हटा दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूंगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

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