114. इंसान को मोहित करने वाली बुरी आत्माओं की पहचान करने के सिद्धांत

(1) जो कोई भी मसीह या देवदूत होने का ढोंग करता है, और जो प्रायः ऐसी वृथा बात करता है जो कि परमेश्वर के वचनों से ज़रा भी मेल नहीं खाती, मनुष्य को मोहित करने वाली एक दुष्ट आत्मा है;

(2) वे सभी जो स्वयं को परमेश्वर की प्यारी संतान, उसके ज्येष्ठ पुत्र, स्वर्गदूत, या ऐसे भविष्यद्वक्ता बताते हैं जो कि बोलने और काम करने के लिए आए हैं, और जो सभी प्रकार की दिखावटी बातें करते हैं, मनुष्य को मोहित करने वाली दुष्ट आत्माएँ हैं;

(3) वे सभी जिनकी समझ विशेष रूप से बेतुकी होती है; जो लगातार विधर्म और भ्रान्ति फैलाते हैं, और तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते हैं; और जो मसीह और परमेश्वर के वचनों का खंडन करते हैं, मनुष्य को मोहित करने वाली दुष्ट आत्माएँ हैं;

(4) वे सभी जो अलौकिक पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जो अक्सर आवाजें सुनते हैं और दर्शन करते हैं, और जो पाप-कर्म का पता लगाते और संकेतों और चमत्कारों को कर दिखाते हैं, मनुष्य को मोहित करने वाली दुष्ट आत्माएँ हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जब शैतान ने हब्बा को प्रलोभन दिया तो उसने कहा, "तुम उस पेड़ का फल क्यों नहीं खाती हो?" हब्बा ने जवाब दिया, "परमेश्वर ने कहा है कि जो उस पेड़ का फल खाएगा वह अवश्य ही मृत्यु को प्राप्त होगा।" तब शैतान ने कहा, "कोई जरूरी नहीं कि उस पेड़ का फल खाना जानलेवा हो।" ऐसा कहते हुए शैतान का लुभाने का इरादा था; उसने यह नहीं कहा कि उस पेड़ का फल खाने से मनुष्य निश्चित रूप से नहीं मरेगा; उसने सिर्फ यह कहा कि कोई जरूरी नहीं कि ऐसा करना जानलेवा ही हो। इससे मनुष्य सोचने लगा, "अगर इसका जानलेवा होना जरूरी नहीं है तो इसे खाना ठीक ही है।" हब्बा फल खाने के प्रलोभन को रोक नहीं पाई। इस तरह शैतान ने मनुष्य को पाप करने का प्रलोभन देने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया, हालांकि उसने अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं ली, क्योंकि उसने किसी को फल खाने के लिए बाध्य नहीं किया था। अब सभी मनुष्यों के भीतर शैतान के जहर हैं, जो परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं और मनुष्य को बहकाते-लुभाते हैं। कभी-कभी जब लोग बोलते हैं तो वे शैतान के सुरों में बोलते हैं, और उनका इरादा प्रलोभन देने और लुभाने का होता है। सभी चिंतन और विचार जिनसे लोग भरे हुए हैं शैतान के जहर हैं, जिस ढंग से वे धारण करते हैं वह शैतान की एक चीज़ है, और कभी-कभी आँख झपकना या हाव-भाव परीक्षण और प्रलोभन का झोंका लाता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सर्वाधिक जोख़िम उन्हें है जिन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य गँवा दिया है' से उद्धृत

आज कुछ दुष्ट आत्माएँ हैं, जो मनुष्य को अलौकिक चीजों के माध्यम से धोखा देती हैं; जो उनके द्वारा नक़ल किए जाने के अलावा और कुछ नहीं है, जो ऐसे कार्य के द्वारा मनुष्य को धोखा देने के लिए की जाती है, जो वर्तमान में पवित्र आत्मा द्वारा नहीं किया जाता। कई लोग चमत्कार करते हैं, बीमारों को चंगा करते हैं और दुष्टात्माओं को निकालते हैं; वे बुरी आत्माओं के कार्य के अलावा और कुछ नहीं हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा वर्तमान में ऐसा कार्य नहीं करता, और जिन्होंने उस समय के बाद से पवित्र आत्मा के कार्य की नकल की है, वे निस्संदेह बुरी आत्माएँ हैं। उस समय इस्राएल में किया गया समस्त कार्य अलौकिक प्रकृति का था, लेकिन पवित्र आत्मा अब इस तरीके से कार्य नहीं करता, और अब ऐसा हर कार्य शैतान द्वारा की गई नकल और उसका भेस है और उसके द्वारा की जाने वाली गड़बड़ी है। लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि जो कुछ भी अलौकिक है, वह बुरी आत्माओं से आता है—यह परमेश्वर के कार्य के युग पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न नकली व्यक्ति होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और इस भविष्यवाणी का परिणाम यीशु का आगमन था। चूँकि यह पहले ही घटित हो चुका है, इसलिए एक और मसीहा का पुनः आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है, और यदि यीशु को इस समय फिर आना पड़ा, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है, और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र-चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीक़ा बदलकर भिन्न तरीक़ा अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" लेकिन अंत में, उनका भेद खुल जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी, जो शैतान से संबंधित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और वह नहीं चाहता कि मनुष्य उसे हैसियत या सम्मानजनक उपाधि प्रदान करे : उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही मिलने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम स्वयं परमेश्वर का या पवित्रात्मा का कार्य करने में असमर्थ हो। परमेश्वर की बुद्धि, चमत्कार और अगाधता, और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह पवित्रात्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह पवित्रात्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते, या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते, या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

जब लोगों में परमेश्वर के बारे में कुछ समझ होती है, तो वे स्वेच्छा से उसके लिए कष्ट सह सकते हैं और उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर सकते हैं। हालाँकि, उनके अंदर की कमजोरियाँ अभी भी शैतान के नियंत्रण में होती हैं, और अभी भी उनके लिए पीड़ा का कारण बन सकती हैं। दुष्ट आत्माएँ अभी भी लोगों में कार्य कर सकती हैं, हस्तक्षेप कर सकती हैं और उलझन की मनःस्थिति पैदा कर सकती हैं, उन्हें पागल कर सकती हैं, असहज महसूस करा सकती हैं और हर तरीके से परेशान कर सकती हैं। अभी भी मन या प्राण की कुछ ऐसी चीज़ें लोगों के भीतर होती हैं जो शैतान के द्वारा नियंत्रित की जा सकती हैं और वह चालाकी से इनसे काम निकाल सकता है। यही कारण है कि तुम बीमार पड़ जाते हो, परेशान हो जाते हो और आत्महत्या कर सकते हो, और कभी-कभी तुम यह भी महसूस कर सकते हो कि दुनिया वीरान है, या कि जीवन का कोई अर्थ नहीं है। दूसरे शब्दों में, ये मानवीय पीड़ाएं अभी भी शैतान के आदेश के अधीन है; यह मनुष्य की घातक कमज़ोरियों में से एक है। शैतान अभी भी उन चीज़ों का उपयोग करने में सक्षम है जिन्हें इसने भ्रष्ट किया और रौंदा है; ये वे हथियार हैं जिन्हें शैतान मानवता के विरुद्ध उपयोग कर सकता है। ... दुष्‍टात्‍माएँ अपना कार्य करने के लिए कोई भी मौका नहीं छोड़ती हैं; वे तुम्‍हारे भीतर से बोल सकती हैं या तुम्‍हारे कानों में खुसर-फुसर कर सकती हैं, तुम्‍हारे विचारों और मन को बेतरतीब बना सकती हैं। वे पवित्र आत्‍मा के स्पर्श को भी दबा सकती हैं ताकि तुम उसे महसूस न कर सको। उसके बाद, तुम्‍हारी सोच को भ्रमित तथा तुम्‍हारे दिमाग को अस्‍तव्‍यस्‍त करने के द्वारा वे तुममें दखल देने लगती हैं, जिस कारण तुम अशांत और परेशान हो जाते हो। दुष्‍टात्‍माओं का लोगों पर कार्य इस प्रकार का होता है। अगर लोग इसे समझ नहीं पाये, तो वे खुद को बड़े खतरे में पायेंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर द्वारा जगत की पीड़ा का अनुभव करने का अर्थ' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जो कोई भी लोगों को धोखा देने हेतु बोलने के लिए मसीह का रूप धारण करता है, वह एक झूठा मसीह है। सभी झूठे मसीह बुरी आत्माओं के कब्ज़े में हैं और वे धोखेबाज़ हैं। तुम ऐसे झूठे मसीह को कैसे पहचान सकते हो जो लोगों को धोखा देने के लिए लगातार बोलता रहता है? यदि तुम झूठे मसीह के केवल कुछ वचनों को देखोगे, तो तुम अपने सिर को खुजलाओगे और यह पता नहीं लगा पाओगे कि वास्तव में दुष्ट आत्मा के इरादे क्या है। यदि तुम इस दुष्ट आत्मा पर नज़र रखना जारी रखोगे और जो कुछ भी उसने कहा है, उस पर विचार करोगे, तो यह देखना बहुत आसान है कि यह वास्तव में किस प्रकार की चीज़ है, यह क्या कर रही है, यह वास्तव में क्या कह रही है, यह लोगों के साथ क्या करने की साज़िश रच रही है और लोगों को कौन सी राह बता रही है—तब, समझना आसान हो जाता है। हम देख सकते हैं कि बहुत सी बुरी आत्माओं के वचनों में यही अभिलक्षण आवश्यक रूप से मौज़ूद रहते हैं। वे केवल परमेश्वर के वचनों की नक़ल कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के वचनों के सार को निश्चित रूप से नहीं पा सकते हैं। परमेश्वर के वचनों का एक संदर्भ और एक उद्देश्य होता है। परमेश्वर के कथनों का अंतिम उद्देश्य और उनके प्रभाव बहुत स्पष्ट होते हैं और तुम देख सकते हो उसके वचनों में अधिकार और सामर्थ्य होती है, कि वे किसी के भी हृदय को छू सकते हैं और उसकी आत्मा को प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन दुष्ट आत्माओं और शैतान के वचनों का न तो कोई संदर्भ होता और ना ही कोई प्रभाव—वे एक रुके हुए पानी के एक पोखर की तरह होते हैं और उन्हें पढ़ने के बाद लोगों को दिलों में गंदा महसूस होता है। उन्हें उनसे कुछ भी हासिल नहीं होता है। इसलिए, सभी प्रकार की दुष्ट आत्माओं के पास सत्य का अभाव होता है और वे अन्दर से निश्चित रूप से गंदी और अंधकारमय होती हैं। उनके वचन लोगों के लिए प्रकाश नहीं ला सकते हैं और उन्हें ऐसा मार्ग नहीं दिखा सकते हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए। दुष्ट आत्माएँ अपने उद्देश्य को स्पष्ट रूप से नहीं कहती हैं ना ही कहती है कि वे क्या कार्यान्वित करने का प्रयास कर रही हैं; वहाँ सत्य के सार और मूल के बारे में कोई उल्लेख नहीं होता है। ज़रा सा भी नहीं। दुष्ट आत्माओं के वचनों में लोगों द्वारा समझने या प्राप्त करने लायक कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। इसलिए, दुष्ट आत्माओं के वचन केवल लोगों को भ्रमित कर सकते हैं और उनके अन्दर गंदगी और अंधकार ला सकते हैं। वे लोगों को कोई भी जीवनाधार प्रदान नहीं कर सकते हैं। इससे हम देख सकते हैं कि दुष्ट आत्माओं की अंतर्निहित प्रकृति और सार दुष्टता और अंधकार का होता है। उनमें प्राणशक्ति का अभाव होता है, उसकी जगह वे मौत की दुर्गंध छोड़ती हैं। वे वास्तव में नकारात्मक चीज़ें हैं जिन्हें शापित होना चाहिए। उनके भाषण में कोई सच्चाई नहीं होती है; यह पूरी तरह बकवास होता है और जो मतली, घृणा और उल्टी का कारण बनता है, मानो कि किसी ने अभी-अभी कोई मरी हुई मक्खियों खा ली हो। यदि लोग सत्य की खोज में हैं और उनमें परमेश्वर के वचनों को समझने की क्षमता है, तो वे दुष्ट आत्माओं के शब्दों को पढ़कर उन्हें पहचान पाएँगे। जो लोग आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते और परमेश्वर के वचनों को समझने की क्षमता नहीं रखते, तो वे निश्चित रूप से दुष्ट आत्माओं के शैतानी शब्दों से धोखा खा जाएंगे। जिन लोगों को पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध और प्रकाशित कर दिया है, जिनमें परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता है और जो थोड़े-बहुत सत्य समझते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से दुष्ट आत्माओं के शैतानी शब्दों को पहचान पाएंगे। वे दुष्ट आत्माओं द्वारा बोले गए किसी भी शब्द में यह देख पाएंगे कि दुष्ट आत्माएं सत्य से, परमेश्वर के स्वरूप से पूरी तरह रहित हैं या उनमें जरा-सा भी सामर्थ्य अथवा अधिकार नहीं है। परमेश्वर के वचनों की तुलना में, उन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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