116. विभिन्न दुष्ट लोगों की पहचान करने के सिद्धांत

(1) दुष्ट लोगों को सत्य से विशेष घृणा होती है। वे इसे कभी स्वीकार नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करते हैं, और काट-छाँट और निपटारे को तो वे और भी कम स्वीकार करते हैं।

(2) दुष्ट लोगों के साथ तर्क नहीं किया जा सकता। वे सही और गलत की उलट-फेर करने और तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने में कुशल होते हैं, वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें निशाना बनाते हैं, और अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वे कोई भी साधन आजमा सकते हैं।

(3) दुष्ट लोगों में जरा भी अंतरात्मा या भावना नहीं होती है, और चाहे वे कितने भी बुरे काम करें या किसी भी हद तक दूसरों को निर्बल बना दें, वे ठंडे खून वाले पशुओं की तरह पूरी तरह से बेखबर रहते हैं।

(4) कोई भी दुष्ट व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ता है, न ही सत्य पर सहभागिता करता है। वह केवल प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और व्यक्तिगत लाभ पर ध्यान केंद्रित करता है, और केवल अपनी ही प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और लाभ की खातिर बोलता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

बड़े लाल अजगर के देश में मैंने कार्य का एक ऐसा चरण पूरा कर लिया है, जिसकी थाह मनुष्य नहीं पा सकते, इसके कारण वे हवा में डोलने लगते हैं, जिसके बाद कई लोग हवा के वेग में चुपचाप बह जाते हैं। सचमुच, यह एक ऐसी "खलिहान" है जिसे मैं साफ़ करने वाला हूँ, यही मेरी लालसा है और यही मेरी योजना है। क्योंकि जब मैं कार्य कर रहा होता हूँ, तो कई दुष्ट लोग चोरी-छिपे आ घुसे हैं, लेकिन मुझे इन्हें खदेड़ कर निकालने की कोई जल्दी नहीं है। इसके बजाय, सही समय आने पर मैं उन्हें छिन्न-भिन्न कर दूँगा। केवल इसके बाद ही मैं जीवन का सोता बनूँगा, और उन लोगों को जो मुझे सच में प्रेम करते हैं, मुझसे अंजीर के पेड़ का फल और कुमुदिनी की सुगंध प्राप्त करने दूँगा। उस देश में जहाँ शैतान का डेरा है, जो गर्दो-गुबार का देश है, वहाँ अब शुद्ध सोना नहीं रहा, सिर्फ रेत ही रेत है, और इसलिए इन हालत को देखते हुए, मैं कार्य का ऐसा चरण पूरा करता हूँ। तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं जो प्राप्त करता हूँ वह रेत नहीं बल्कि शुद्ध, परिष्कृत सोना है। दुष्ट लोग मेरे घर में कैसे रह सकते हैं? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवी कैसे बनने दे सकता हूँ। मैं इन चीज़ों को खदेड़ने के लिए हर संभव तरीका अपनाता हूँ। मेरी इच्छा प्रकट होने से पहले कोई भी यह नहीं जानता कि मैं क्या करने वाला हूँ। इस अवसर का लाभ उठाते हुए, मैं उन दुष्टों को दूर खदेड़ देता हूँ, और वे मेरी उपस्थिति को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मैं दुष्टों के साथ यही करता हूँ, लेकिन फिर भी उनके लिए एक ऐसा दिन होगा जब वे मेरे लिए सेवा कर पाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सात गर्जनाएँ गूँजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएँगे' से उद्धृत

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

दुश्चरित्र व्यक्ति को दुष्ट, भ्रष्ट एवं विद्वेषपूर्ण वस्तुएँ पसंद होती हैं; उसे वे सभी वस्तुएँ पसंद होती हैं जो नकारात्मक वस्तुओं से संबंधित हैं। सकारात्मक वस्तुओं के उल्लेख मात्र से—उदाहरणस्वरुप, जब उन्हें कहा जाता है कि कोई चीज़ लोगों के भले के लिए है एवं यह परमेश्वर की ओर से है—उसे चिढ़ होती है एवं वह इससे उदासीन हो जाता है। ऐसा हो रहा है और उन्हें बचाने का कोई तरीका नहीं है। सत्य कितने ही अच्छे शब्दों में व्यक्त किया गया हो, दुश्चरित्र व्यक्ति की रुचि इसमें जागृत नहीं होती है—परंतु खाने, पीने, मज़े करने, वेश्यावृत्ति, जुआ, चोरी, डाका डालने के उल्लेख से ही उसकी रुचि जाग जाती है। यह एक विद्वेषपूर्ण एवं दुष्ट प्रवृत्ति है। उनके ह्रदय में कोई अच्छाई नहीं होती, इसीलिए वे सकारात्मक वस्तुओं से प्रेम करने में असमर्थ होते हैं। वे अपने ह्रदय में सकारात्मक वस्तुओं को किस प्रकार देखते हैं? घृणा के साथ। वे इन्हें तुच्छ समझते हैं एवं उनका मज़ाक उड़ाते हैं। ईमानदारी के उल्लेख मात्र से वे सोचते हैं, "ईमानदार व्यक्ति केवल कष्ट भुगतता है। मैं ईमानदार नहीं बनूँगा। तुम बेवकूफ हो जो ईमानदारी का पालन करते हो, देखो तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्तव्यों का पालन करना कितना मुश्किल है। तुमने कभी स्वयं को कोई दूसरा विकल्प देने के बारे में नहीं सोचा और ना ही अपनी सेहत की परवाह की। जब तुम पूरी तरह थक जाओगे तो तुम्हारी देखभाल कौन करेगा? मैं खुद को तनाव-ग्रस्त होने नहीं दे सकता।" कुछ कहते हैं, "हमें स्वयं के लिए कोई दूसरा विकल्प रखना चाहिए; हम इस तरह बिना कुछ सोचे-समझे इतना कमरतोड़ परिश्रम नहीं कर सकते। हमें कोई रास्ता निकालना होगा, जिसके बाद हम थोड़ी कोशिश करने का दिखावा कर सकते हैं।" अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों से मिलती हुई बात से उन्हें ख़ुशी मिलती है, पर पूर्ण आज्ञाकारिता, स्वयं को समर्पित करके कर्तव्यों का पालन करने से वे चिढ़ जाते हैं, उनमें घृणा की भावना आ जाती है और ये सारी बातें उनपर कोई असर नहीं डालतीं। क्या ये बुरे दिल वाले नहीं हैं? उनके दिल में दुष्टता के अलावा कुछ नहीं होता है। सत्य और सत्य के अभ्यास का उल्लेख होने पर, यदि उनके स्वयं के हित का अतिक्रमण हो, तो वे इसके प्रतिकूल हो जाते हैं, वे इसे सुनना ही नहीं चाहते : "दिन भर तुम सत्य, अभ्यास के सिद्धांतों, और ईमानदार होने के बारे में कहते रहते हो। क्या ईमानदारी से खाना मेज पर आ सकता है? क्या मैं ईमानदार होकर धन कमा सकता हूँ? मैं झूठ बोलकर मुनाफ़ा पा सकता हूँ।" यह कौन-सा तर्क है? यह "लुटेरे का तर्क" है। क्या ऐसा स्वभाव शातिर नहीं है? क्या ऐसे लोगों के दिल दयालु होते हैं? (नहीं)। ऐसे लोग सत्य को हासिल नहीं कर सकते। अतः उनके नाममात्र अर्पण, समर्पण एवं त्याग का एक उद्देश्य होता है। उन्होंने सब कुछ पहले से ही सोच लिया है : वे एक अंश अर्पण करेंगे और उन्हें बदले में दस गुना वापस प्राप्त होगा। उन्हें सिर्फ यही यथोचित लगता है। यह किस प्रकार का स्वभाव है? यह दुराचरण एवं क्रूरता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानकर ही तुम सत्‍य की खोज कर सकते हो' से उद्धृत

दुष्टों के स्वभाव का एक प्रमुख पहलू द्वेष होता है। किसी के सदाशयतापूर्ण उपदेशों या अनुस्मारकों के प्रति, या उन अवसरों पर भी, जब लोग उनकी कुछ कमियाँ इंगित करते हैं, दुष्टों का रवैया कृतज्ञता का, विनम्र स्वीकृति का नहीं होता, बल्कि शत्रुता और घृणा का होता है—यह प्रतिशोध को भी जन्म दे सकता है। कुछ लोग हैं, जो मसीह-विरोधी से यह कहते हुए निपटते हैं, "तुमने इस अवधि के दौरान अपने कर्तव्य का पालन करते हुए लगातार खुद का प्रदर्शन किया है, और तुमने अपना कर्तव्य-पालन पूरी तरह से गड़बड़ कर दिया है। क्या तुम परमेश्वर के सामने खड़े हो सकते हो? जब तुम अपना कर्तव्य पूरा कर रहे थे, तुमने मनमाना व्यवहार किया और सिद्धांत के अनुसार कार्य करने से इनकार कर दिया। तुमने सत्य की तलाश क्यों नहीं की? तुमने सिद्धांत के अनुसार कार्य क्यों नहीं किया? जब भाई-बहनों ने तुम्हारे साथ सहभागिता की, तो तुमने उनकी उपेक्षा क्यों की? तुम जैसा चाहे, वैसा क्यों करते रहे?" ये कई "क्यों", ये बेहद असाधारण शब्द, शब्द जो उनके सार को उजागर करते हैं, उन्हें बहुत परेशान करते हैं। इसलिए वे मन ही मन सोचते हैं, "क्यों? कोई 'क्यों' नहीं है—मैं जो करना चाहता हूँ, वह करता हूँ! मुझसे निपटने वाले तुम कौन हो?" हालाँकि वे ये बातें जोर से नहीं कहते, लेकिन उनके दिल में एक प्रतिशोधी और शत्रुतापूर्ण क्रोध पैदा होता है। और यह क्रोध किसे जन्म देता है? "तुम्हें मुझसे निपटने का अधिकार कहाँ से मिला? तुम किस आधार पर कहते हो कि मैंने मनमाना व्यवहार किया? क्या हुआ जो मैं मनमाना व्यवहार करता हूँ, तुम इस बारे में क्या कर सकते हो? मेरे पूरे जीवन में किसी ने मुझसे ऐसी बातें कहने की हिम्मत नहीं की! सिर्फ मुझे ये बातें दूसरों से कहने का अधिकार है—दूसरों को मुझसे ये बातें कहने का अधिकार नहीं है। वह आदमी अभी पैदा नहीं हुआ, जो मुझे सबक सिखा पाए, जो मुझे सबक सिखाने के योग्य हो! और फिर भी तुम भाषण झाड़ने की जुर्रत करने की कोशिश करते हो?" इस प्रकार शत्रुता पैदा होती है। और शत्रुता प्रकट होने के बाद, मसीह-विरोधियों के द्वेषपूर्ण स्वभाव को देखते हुए, क्या वे इसे यहीं समाप्त होने देकर संतुष्ट होंगे? बिलकुल नहीं। इसके बाद वे मन ही मन सोचना शुरू कर देंगे : "क्या मुझसे निपटने वाला यह व्यक्ति कलीसिया में कोई सामर्थ्य रखता है? अगर मैं इससे बदला लूँ, तो क्या कोई इसके साथ खड़ा होगा? अगर मैं इसे ठीक करने की कोशिश करूँ, तो क्या कलीसिया मुझे इसके लिए दंडित करेगी? मैं समझ गया—मैं उनसे सीधे बदला नहीं लूँगा, मैं पूरी तरह से बिना नजर में आए कुछ करूँगा, मैं पता लगाऊँगा कि उन्हें क्या कहा जाता है, उनका घर कहाँ है, उनके साथ कौन रहता है। मुझे उनसे बदला लेना ही होगा, मैं इसे यूँ ही नहीं छोड़ सकता। मैं इस तरह का दुर्व्यवहार कैसे सहन कर सकता हूँ? मैं परमेश्वर में विश्वास इसलिए नहीं करता कि मेरे साथ दुर्व्यवहार किया जाए, जिसका भी मन करे आकर मुझे कुछ भी कह दे—मैं धन्य होने, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने के लिए आया था। लोग प्रतिष्ठा के लिए जीते हैं, और उनमें अपनी गरिमा के लिए लड़ने का साहस होना चाहिए; अगर तुम मुझे धौंस देते हो, अगर तुम मुझे तुच्छ समझते हो, तो मैं सुनिश्चित करूँगा कि तुम्हें इसका परिणाम भुगतना पड़े। आओ, हम दोनों देखें कि कौन ज्यादा मजबूत है, कौन किसे हरा सकता है!" सत्य और ईमानदारी के कुछ सरल शब्द मसीह-विरोधी को क्रोधित कर देंगे, इतनी शत्रुता, इतना आक्रोश पैदा करेंगे, और उस व्यक्ति से बदला लेने के लिए उन्हें असाधारण सीमा तक जाने के लिए मजबूर कर देंगे। स्वाभाविक रूप से, वे बदला लेने के लिए केवल एक तरह के व्यक्ति को ही नहीं चुनते, बल्कि हर उस व्यक्ति से नफरत करने के लिए तैयार रहते हैं, जो उनके लिए खतरा होता है, जो उनकी असलियत देख सकता है, जो सत्य को समझता है और उनके सार को उजागर करने में सक्षम है, जो उनसे निपट सकता है और उनकी काट-छाँट कर सकता है, जिसमें तथ्य बताने की ईमानदारी होती है और जो उनकी असलियत उजागर करने में सक्षम होता है। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं, "जो कोई भी मुझसे निपटेगा, मैं उसे तकलीफ दूँगा। जो कोई मुझसे निपटेगा और मेरी काट-छाँट करेगा, जो मुझसे मेरे हिस्से के आशीष लूटेगा, और मुझे परमेश्वर के घर से निष्कासित करवाएगा, मैं उसे कभी नहीं छोड़ूँगा। मैं धर्मनिरपेक्ष दुनिया में ऐसा ही हूँ : कोई मुझे परेशान करने की हिम्मत नहीं करता, मुझे परेशान करने वाला अभी पैदा ही नहीं हुआ!" जब वे काट-छाँट का सामना करते हैं और उनसे निपटा जाता है, तो वे इस तरह की अपमानजनक बातें करते हैं। जब वे अपमानजनक बातें करते हैं, तो यह दूसरों को डराने या खुद को बचाने के लिए शेखी बघारना भर नहीं होता—वे वास्तव में ऐसा करने की योजना बनाते हैं। और इसलिए कुछ ऐसे भी अगुआ और कार्यकर्ता हैं, जो ऐसे लोगों से मिलने पर उनसे संपर्क करने या उन्हें ललकारने की हिम्मत नहीं करते; बल्कि वे हमेशा इन लोगों को अपने संरक्षण में रखते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ये लोग अपने ढंग में पक्के हो जाते हैं, और कलीसिया में व्यवधान और गड़बड़ी पैदा करते रहते हैं, और भाई-बहनों को नियंत्रित करने लगते हैं। आपदा इसी तरह आती है। बात यहाँ तक पहुँच सकती है कि कुछ मसीह-विरोधी भाई-बहनों द्वारा अपनी चालें उजागर हो जाने और अपनी शिकायत किए जाने पर, उनका पता लगाकर उनसे बदला लेते हुए उन्हें बड़े लाल अजगर को, सरकार को सौंप देते हैं। क्या यह द्वेष नहीं है? (हाँ।) इसलिए, मसीह-विरोधियों और कुकर्मियों को भाई-बहन मानना बिल्कुल और निश्चित रूप से गलत है। अगर तुममें भेद कर पाने की कमी है और तुम मसीह-विरोधियों और कुकर्मियों को अपने भाई-बहनों के रूप में सिंचित और पोषित करते हो, उन्हें बढ़ावा देते हो, महत्वपूर्ण पदों पर उनका उपयोग करते हो, यहाँ तक कि उन्हें महत्वपूर्ण कार्य सौंपते हो, मानो वे सत्य का अनुसरण करने वाले भाई-बहन हों, तो तुम अपनी अगुआई में बहुत बुरा काम कर रहे हो और मसीह-विरोधियों की बुराई में तुम्हारा हाथ है, और तुम्हें हटा दिया जाना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग आठ)' से उद्धृत

कुछ लोगों में बुराई इस हद होती है कि वे दूसरों से बेहद घृणा करते हैं, दूसरों के साथ उनका संबंध सिर्फ नफरत का ही होता है, यहाँ तक कि वे उन्हें सभा के कार्यों के लिए भी अलग नहीं रखते; वहाँ भी वे एक-दूसरे पर हमला करने का अवसर ढूँढ़ लेते हैं, एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं, और वे भाई-बहनों को बाधित करने का हर संभव प्रयास करते हैं—इस मामले में सिद्धांत यह निर्देश देता है कि ऐसे लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाए। क्या ऐसे लोग बुरे होते हैं? जैसा कि दूसरों के प्रति उनके चरम द्वेष से स्पष्ट है, किसी को भी उनका अपमान करने की अनुमति नहीं होती, कोई भी उन्हें आहत या घायल नहीं कर सकता, तुम उन्हें थोड़ा-सा भी नुकसान नहीं पहुँचा सकते, वरना वे तुमसे बदला लेंगे और इस बात को कभी भूलेंगे नहीं। उनकी मानवता में कोई धैर्य, सहनशीलता या स्वीकृति नहीं होती। उनका व्यवहार किस सिद्धांत पर आधारित होता है? "मैं दुनिया में सबका अपमान कर दूँगा, बजाय इसके कि कोई मेरा अपमान करे।" किसी को भी उनका अपमान करने की अनुमति नहीं होती। क्या यही दुष्टों का तर्क होता है? दुष्टों का तर्क ऐसा होता है : कोई उनका अपमान नहीं कर सकता। तुम उन्हें बिलकुल भी ठेस नहीं पहुँचा सकते, अन्यथा तुम उनके दुश्मन बन जाओगे और वे तुम्हें कभी नहीं छोड़ेंगे, कभी इस बात को नहीं भूलेंगे—ऐसे होते हैं दुष्ट लोग। ऐसी परिस्थितियों में, दुष्ट व्यक्तियों को उनके द्वारा कोई गंभीर गड़बड़ी पैदा किए जाने से पहले ही जितनी जल्दी और तत्परता से हो सके, हटा देना चाहिए। कलीसिया में उनके कार्य शुरू करने की प्रतीक्षा मत करो, उनके द्वारा भाई-बहनों के बीच व्यवधान उत्पन्न करने की प्रतीक्षा मत करो।

यह निश्चित होने के बाद कि फलाँ व्यक्ति दुष्ट है, क्या उसके साथ संगति करने का कोई फायदा है? उसे मौका देना व्यर्थ है; दुष्ट को अवसर देना सिद्धांत के विरुद्ध है। और यह सिद्धांत के विरुद्ध क्यों है? उनके सार को देखते हुए, वे कभी भी पश्चात्ताप नहीं करेंगे; 'पश्चात्ताप' शब्द उनके शब्दकोश में होता ही नहीं। तुम उनके साथ कैसे भी संगति कर लो, वे अपने झुकाव, विचार और रुचियाँ नहीं छोड़ेंगे—वे कुछ नहीं छोड़ सकते। जब वे किसी चीज से चिपक जाते हैं, तो कोई भी उन्हें उसे छोड़ देने के लिए राजी नहीं कर सकता। देर-सबेर वे हर उस व्यक्ति से बदला लेते हैं, जो उनकी घृणा का पात्र बन जाता है। क्या ऐसे लोग पश्चात्ताप कर सकते हैं? वे पश्चात्ताप करने में असमर्थ होते हैं, इसलिए क्या यह मूर्खता नहीं कि यह स्पष्ट रूप से देख लेने के बावजूद कि वे दुष्ट हैं, उन्हें और अवसर दिया जाए?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (14)' से उद्धृत

मसीह-विरोधी और दुष्ट कैसे एक-दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं? आमतौर पर वे हँसी-मज़ाक करते हैं; एक-दूसरे की खुशामद करते हैं, एक-दूसरे पर अहसान करते हैं। जहाँ भी मसीह-विरोधी होते हैं दुष्ट वहीं पहुँच जाते हैं; वे हमेशा एक साथ होते हैं, जैसे मक्खियाँ दुर्गंध तक पहुँच ही जाती हैं। जब वे एक-दूसरे के साथ होते हैं तो कोई गंभीर काम नहीं करते; वे बस इसी बारे में बकवाद करते हैं कि किसने किस को बुरा-भला कहा या किसने नेताओं को लताड़ा या अगर उन्हें ऐसे लोग दिख जाएँ जो उन्हें नापसंद हों, तो वे उन्हें खदेड़ने के जोड़-तोड़ में लगे रहेंगे। वे बस दूसरों को सताने के बारे में ही बात करते हैं। उनकी चर्चा का विषय यह भी होता है कि सर्वोच्च सत्ता के खिलाफ कैसे एकजुट हुआ जाए, कोई उनके बारे में किसी मुद्दे पर शिकायत करने की योजना बना रहा है, तो उसके बारे में पहले से ही कैसे पता लगाया जाए और पता चलने पर उसके बारे में क्या किया जाए। दुष्टों का यह झुंड ऐसे ही मामलों पर बातचीत करता है। जब वे साथ होते हैं तो कभी भी इस बात पर सहभागिता नहीं करते कि कौन से भाई और बहन कमज़ोर या निराश हो सकते हैं, कर्तव्य पालन में डगमगा सकते हैं या किन्हें किसी चीज़ के कारण धोखा दिया गया है और न वे कभी इस बात पर संगति करते हैं कि कैसे उन भाइयों और बहनों की मदद की जाए और सहारा दिया जाए, न ही वे कभी इस बारे में संगति करते हैं कि कलीसिया किन क्षेत्रों में और बेहतर कर सकता है या इन समस्याओं को हल करने के उपाय और तरीके क्या हो सकते हैं। वे ऐसे मामलों के बारे में बात नहीं करते। वे केवल इस बारे में गपशप करते हैं कि कौन उनसे नाराज़ है, कौन उनकी प्रतिष्ठा के लिए खतरा है, कौन किसी मुद्दे पर उनकी शिकायत करने जा रहा है और कौन सर्वोच्च सत्ता के संपर्क में है। किसी विषय पर चर्चा करने के बाद, मसीह-विरोधी कलीसियाओं में अपना खेल खेलते हैं और उनके हस्तक्षेप से कलीसियाओं में उथल-पुथल मच जाती है। सब घबरा जाते हैं और अंततः भाई-बहन एक-दूसरे पर शक करने लगते हैं और एक-दूसरे से ईर्ष्या करने लगते हैं, एक-दूसरे की धज्जियाँ उड़ाते हुए एक-दूसरे का पर्दाफ़ाश करने लगते हैं-इस तरह मसीह-विरोधियों के लक्ष्यों को पूरा करते हैं। मसीह-विरोधी इस तरह कलीसियाओं का नेतृत्व करते हैं। यदि दुष्ट उनके कहे अनुसार चलते हैं, तो मसीह-विरोधी उनकी रक्षा करते हैं। अगर दुष्ट उनके कहे अनुसार नहीं चलते, तो सबसे पहले उन दुष्टों से ही निपटा जाता है। जो दुष्ट मसीह-विरोधियों का अनुसरण करते हैं और जिन्हें भर्ती किया जा सकता है और साथ शामिल किया जा सकता है, तो मसीह-विरोधी अपने बुरे कार्यों को पूरा करने के लिए ऐसे दुष्टों को अपने साथी और मुखबिर बना लेंगे। वे उन दुष्टों को दूसरे भाइयों और बहनों के बीच यह पता लगाने के लिए छोड़ देंगे कि कौन उनकी पीठ पीछे उन्हें बुरा-भला कह रहा है, किन लोगों को उनसे शिकायत है, किसके पास परमेश्वर के वचनों का कुछ परिज्ञान है और वह उनके और कुछ चीज़ों के बारे में विवेक से काम लेना चाहता है, जिससे उनकी असलियत खुल सकती है, उनके अधीनस्थ कौन उनकी शिकायत करने की योजना बना रहा है और कौन प्राय: सर्वोच्च सत्ता के संपर्क में रहना चाहता है। वे इन बातों पर विशेष रूप से नज़र रखते हैं और जब वे सभी एक साथ होते हैं, तो वे प्रत्युपायों पर चर्चा करते हैं, विचार करते हैं कि वे रोज़ किसे निष्कासित कर सकते हैं और फिर उस पर मतदान करवाकर उसे आधिकारिक बनाते हैं। मसीह-विरोधी ऐसे काम करते हैं; इस तरह वे कलिसियाओं का नेतृत्व करते हैं। मसीह-विरोधी और दुष्टों की उपस्थिति वाले स्थानों पर कलीसियाओं का वातावरण गंदा होता है। इसे शैतान का प्रभार कहा जाता है। शैतान के प्रभारी होने पर क्या कुछ अच्छा हो सकता है? इससे बस परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर विपत्ति ही आ सकती है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों को भ्रमित करने, फुसलाने, धमकाने और नियंत्रित करने का काम करते हैं' से उद्धृत

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर दुष्ट हरकतें करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

जो प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हैं, वे हमेशा चाहते हैं कि दूसरे भी उन्हीं की तरह नकारात्मक और अकर्मण्य बनें। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने वालों के प्रति ईर्ष्या-भाव रखते हैं, और हमेशा ऐसे लोगों के साथ विश्वासघात करना चाहते हैं जो नासमझ हैं और जिनमें विवेक की कमी है। जिन बातों को ये उगलते हैं, वे तेरे पतन का, गर्त में गिरने का, तुझमें असामान्य परिस्थिति पैदा होने का और तुझमें अंधकार भरने का कारण बनती हैं; वे तुझे परमेश्वर से दूर रहने, देह में आनंद लेने और तेरा अपने आप में आसक्त होने का कारण बनती हैं। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो परमेश्वर के प्रति सदैव लापरवाह रवैया अपनाते हैं, उनमें आत्म-जागरूकता नहीं होती; ऐसे लोगों का स्वभाव लोगों को पाप करने और परमेश्वर की अवहेलना के लिये बहकाता है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और न ही दूसरों को इसका अभ्यास करने देते हैं। उन्हें पाप अच्छे लगते हैं और उनमें स्वयं के प्रति कोई नफ़रत नहीं होती है। वे स्वयं को नहीं जानते हैं, और दूसरों को भी स्वयं को जानने से रोकते हैं; वे दूसरों को सत्य की लालसा करने से रोकते हैं। जिनके साथ वे विश्वासघात करते हैं वे प्रकाश को नहीं देख सकते। वे अंधेरे में पड़ जाते हैं, स्वयं को नहीं जानते, और सत्य के बारे में अस्पष्ट रहते हैं, तथा परमेश्वर से उनकी दूरी बढ़ती चली जाती है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और दूसरों को भी सत्य का अभ्यास करने नहीं देते हैं, और उन सभी मूर्खों को अपने सामने लाते हैं। बजाय यह कहने के कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे अपने पूर्वजों में विश्वास करते हैं, या कि वे जिसमें विश्वास करते हैं वे उनके दिल में बसी प्रतिमाएँ हैं। उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे अप्रत्याशित रूप से शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह समय अलग किए जाने का है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब हटा दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूंगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं ये वे लोग हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं, और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों और अन्याय का सहारा लेते हैं, उनमें सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत द्वेषपूर्ण होता है। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता वे सभी दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। ये लोग शैतान के सर्वोत्कृष्‍ट प्रतिनिधि हैं; ये छुटकारे से परे हैं, और वास्तव में, हटा दिए जाने वाली वस्तुएँ हैं। परमेश्वर का परिवार उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ उजागर किया जाएगा और अंत में हटा दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जिनका सम्बंध शैतान से है, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते हैं, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिये गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति का अंत प्रकट किया जाए, जो लोग कलीसिया को परेशान करते हैं और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान ड़ालते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले एक ओर छोड़ दिया जाएगा, और उनसे बाद में निपटा जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक के बाद एक करके उजागर किया जाएगा, और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मनुष्य जाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाता है, तो उन लोगों को हटा दिया जाना चाहिए; यही वह समय होगा जब लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं। जो सत्य का अभ्यास करने की कोई योजना नहीं बना रहे, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे यथाशीघ्र कलीसिया को छोड़ दें ताकि और अधिक पापों को करने से बचें। जब समय आएगा तो पश्चाताप के लिए भी बहुत देर हो चुकी होगी। विशेष रूप से, जो गुटबंदी करते हैं और पाखंड पैदा करते हैं, और वे स्थानीय गुण्डे तो और भी जल्दी अवश्य छोड़ कर चले जाएँ। जिनकी प्रवृत्ति दुष्ट भेड़ियों की है ऐसे लोग बदलने में असमर्थ हैं। बेहतर होगा वे कलीसिया से तुरंत चले जायें और फिर कभी भाई-बहनों के सामान्य जीवन को परेशान न करें और परिणास्वरूप परमेश्वर के दंड से बचें। तुम लोगों में से जो लोग उनके साथ चले गये हैं, वे आत्म-मंथन के लिए इस अवसर का उपयोग करें। क्या तुम लोग ऐसे दुष्टों के साथ कलीसिया से बाहर जाओगे, या यहीं रहकर आज्ञाकारिता के साथ अनुसरण करोगे? तुम लोगों को इस बात पर सावधानी से विचार अवश्य करना चाहिए। मैं चुनने के लिए तुम लोगों को एक और अवसर देता हूँ; मुझे तुम लोगों के उत्तर की प्रतीक्षा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

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