127. दूसरों की प्रेमपूर्वक सहायता करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के आधार पर लोगों के विभिन्न प्रकारों के बीच भेद करना आवश्यक है। अच्छे लोगों के साथ, जिनका परमेश्वर में सच्चा विश्वास हो, प्रेमपूर्वक बातचीत करो; एक-दूसरे के साथ नेकी से पेश आओ और परस्पर सहायता करो;

(2) जो दूसरों की प्रेमपूर्वक मदद करता है, उसे किसी छुपे हुए इरादे से या बदले में कुछ पाने के लिए, ऐसा नहीं करना चाहिए; इसके बजाय, उसे केवल सच्चाई का अभ्यास करने, अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने, और दूसरों को परमेश्वर के सामने लाने के लिए ऐसा करना चाहिए;

(3) जब लोग आपस में मदद करते हैं, तो उन्हें एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना चाहिए और एक-दूसरे की समस्याओं को जो उन्हें उचित और स्वीकार्य लगें ऐसे तरीकों से, हल करने हेतु सच्चाई की तलाश करनी चाहिए;

(4) परमेश्वर के वचनों के आधार पर दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। किसी को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग दूसरों को रूढ़िबद्ध करने के लिए नहीं करना चाहिए, न ही दूसरों के उल्लंघनों के आधार पर उनकी निंदा करनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा, और उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए, इसके लिए लोगों के पास व्यवहार के अपने सिद्धांत होने चाहिए; हालाँकि, उस व्यक्ति का परिणाम क्या होगा—वह परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाएगा या फ़िर उसे न्याय और ताड़ना का सामना करना होगा—यह सब देखना परमेश्वर का कार्य है। इसमें इंसान को टांग नहीं अड़ानी चाहिए; परमेश्वर तुम्हें अपनी ओर से पहल करने की अनुमति नहीं देगा। उस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना है यह देखना परमेश्वर का कार्य है। अगर परमेश्वर ने यह फ़ैसला नहीं किया है कि इस तरह के लोगों का परिणाम कैसा होगा, उन्हें निकाला नहीं है और उन्हें दंडित नहीं किया है और ऐसे लोगों को बचाया जा रहा है, तब तुमको धैर्य रखकर, प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए; तुम्हें ऐसे लोगों के परिणाम निर्धारित करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उन पर नकेल कसने या दंडित करने के लिए मानवीय साधनों का उपयोग करना चाहिए। तुम या तो ऐसे लोगों के साथ निपट सकते हो और कांट-छांट कर सकते हो या फ़िर दिल खोलकर तुम इनके साथ तहेदिल से सहभागिता करके इनकी मदद कर सकते हो। लेकिन अगर तुम इन लोगों को दंडित करने, उनका बहिष्कार करने और उन्हें दोषी ठहराने पर विचार करते हो, तो तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। क्या ऐसा करना सत्य के अनुरूप होगा? ऐसे ख्याल अत्यधिक आवेशपूर्ण होने के परिणामस्वरूप आएंगे; ऐसे विचार शैतान से आते हैं और मनुष्य के आक्रोश के साथ ही मानवीय ईर्ष्या और घृणा से उत्पन्न होते हैं। ऐसा आचरण सत्य के अनुरूप नहीं है। यह कुछ ऐसा है जिसके कारण तुम्हें दंड मिल सकता है, यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ' से उद्धृत

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग ईश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें उन अनेक स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य से पैदा होती हैं। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज़्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक योग्य चरवाहे को किन चीज़ों से लैस होना चाहिए' से उद्धृत

अगर किसी भाई या बहन के साथ तुम्हारे अच्छे संबंध हैं, और वे तुमसे पूछते हैं कि उनके साथ क्या ग़लत है, तो तुम्हें यह कैसे करना चाहिए? यह इस बात से संबंधित है कि तुम इस मामले के प्रति क्या दृष्टिकोण रखते हो। क्या तुम्हारा दृष्टिकोण सच्चाई का अभ्यास करने का है, या तुम जीने के लिए जीवन-दर्शन का उपयोग करते हो? यदि तुम कहते हो, "तुम हर क्षेत्र में अच्छे हो और तुम मुझसे बेहतर हो। तुम कठिनाइयों को सहन करने में सक्षम हो, और तुम्हारी क्षमता अच्छी है। तुम्हें नकारात्मक होने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम बहुत अच्छे हो; इसमें विनम्र होने की क्या बात है?"—अगर तुम स्पष्ट रूप से देखते हो कि उनके साथ कुछ बातें ग़लत हैं, फिर भी तुम स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि वे क्या हैं ताकि तुम दोनों के बीच रही शांति को नुकसान न पहुँचे—तो तुम जीने के लिए एक दर्शन का उपयोग कर रहे हो। जो इस तरह के मामले में एक अलग दृष्टिकोण अपनाता है, वह कहता है, "मेरा क़द अभी छोटा है और मैं तुम्हारी समस्याओं को पूरी तरह से नहीं समझता हूँ। जब मैं समझ लूँगा, तो मैं तुम्हें बताऊँगा।" क्या यह दूसरों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं है? क्या वह वास्तव में कुछ भी अच्छी तरह से नहीं समझ सकता है? क्या उसके पास इस मुद्दे पर कोई भी विचार नहीं थे? उसके पास विचार तो हैं; बस बुरा न लग जाए इस डर से वह कुछ नहीं कह रहा है। वह तुमसे कुछ नहीं कहता है और तुम्हें इस मामले को समझने में असमर्थ छोड़ देता है, जिससे तुम्हें लगे कि तुम महान हो। शायद तुम एक दिन असफल होगे और गिर जाओगे, और वे तुम्हारी पीठ पीछे हँसते रहेंगे। जब ऐसा होता है, तो वे अपेक्षाकृत बेहतर दिखेंगे; इस तरह से वे तुम पर चाल खेलते हैं। क्या ऐसा व्यक्ति बुरा नहीं है? इन दो दृष्टिकोणों में से, कौन-सा बेहतर है? वे दोनों घृणा के योग्य हैं; कोई भी पसंद के योग्य नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें सच बताना चाहिए। वे कहते हैं, "तुम एक बुरे और ख़राब व्यक्ति हो। मैं एक ही नज़र में तुम्हें बता सकता हूँ कि तुम्हें बचाया नहीं जाएगा।" यद्यपि वे ईमानदारी से बोलते हैं, और ऐसा कहने वाला व्यक्ति अपने दिल में सचमुच ही ऐसा सोचता है, उसके कहने में एक छिपे मकसद का संकेत होता है: "अगर मैं यह कह देता हूँ, तो तुम निश्चित रूप से अभिमानी या दंभी नहीं होगे।" यह दृष्टिकोण भी ग़लत है—यह दूसरे की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखता है, न ही इसके परिणामों पर विचार करता है। तुम इस तरह के व्यक्ति के स्वभाव के बारे में क्या सोचते हो? क्या वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं? नहीं—इस तरह से कार्य करने से दूसरे नकारात्मक हो सकते हैं या वे लड़खड़ा सकते हैं। यह उनके चलने के मार्ग को गंभीर रूप से अवरुद्ध कर देगा। इन सभी बातों पर विचार किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण भी अच्छा नहीं है; यह अपने अन्दर एक स्वभाव लिए हुए है। यह सामान्य मानवता की तर्कसंगतता के भीतर से बोलना या कार्य करना नहीं है, न ही यह सत्य-सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना है।

तो फिर, सत्य-सिद्धांत के अनुसार, तुम्हें इस मामले के प्रति कैसा रवैया रखना चाहिए? सत्य के साथ कौन-सी कार्रवाई मेल खाती है? इसमें कितने प्रासंगिक सिद्धांत हैं? तुम्हें सिद्धांतों की दृढ़ समझ होनी चाहिए। सबसे पहले, दूसरों के लिए ठोकर का कारण न बनो। तुम्हें पहले दूसरे की कमज़ोरियों पर, और इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनके साथ किस तरह बात करने से वे ठोकर नहीं खाएँगे। यह वो न्यूनतम है जिस पर विचार करना ही होगा। इसके बाद, तुम्हें चीज़ों के सकारात्मक पक्ष पर विचार करना चाहिए—दूसरे व्यक्ति की मदद करने के लिए तुम क्या कर सकते हो। उनकी मदद करने का लक्ष्य उन्हें परमेश्वर की इच्छा को समझने देना, उन्हें परमेश्वर के सामने लाना, और उन्हें ऐसी कठिन परिस्थितियों को पीछे छोड़ने और सच्चाई को हासिल करने देना है, जैसा कि तुमने किया है। ऐसे दिल वाला व्यक्ति सबसे उत्तम प्रकार का होता है; यही सत्य का अभ्यास है। पहला: उनकी ठोकर का कारण न बनो। दूसरा: उनकी मदद करने में सक्षम हो। तीसरा: उन्हें सच्चाई हासिल करने दो। तुम्हें इन तीन सिद्धांतों को समझना होगा। लेकिन, विशेष तौर पर, ये कैसे कार्यान्वित किए जाते हैं? क्या तुम वास्तव में दूसरे की कठिनाई को समझते हो? क्या यह एक अलग समस्या नहीं है? तुम्हें यह भी सोचना चाहिए: "उसकी समस्या का मूल क्या है? क्या मैं उसकी मदद कर सकता हूँ? अगर मैं मदद नहीं कर सकता और मैं मनमाने ढंग से और लापरवाही से बोलता हूँ, तो मैं उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकता हूँ। इसके परे, यह व्यक्ति सच्चाई को कितनी अच्छी तरह से समझ सकता है, और उसकी क्षमता क्या है? क्या वह दुराग्रही है? क्या वह आध्यात्मिक मामलों को समझता है? क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है? क्या वह सत्य की तलाश करता है? अगर वह देखता है कि मैं उससे बेहतर हूँ, और मैं फिर भी उसके साथ संगति करता हूँ, तो क्या उसमें ईर्ष्या या नकारात्मकता पैदा होगी?" इन सभी सवालों पर विचार किया जाना चाहिए; यह इंसानियत की बात होती है। इसलिए, जब तुम इस मुद्दे का सामना करते हो, तो तुम्हें पहले इन बातों पर विचार करना चाहिए, फिर जाकर एक सकारात्मक, अग्रसक्रिय मन से उसके साथ संगति करो, और, जब यह करो तो यह प्रार्थना और यह तलाश करो कि उसकी मदद कैसे की जाए, तुम इन सिद्धांतों का पालन कैसे कर सकते हो, और कैसे तुम उसे अपनी कठिनाई को पीछे छोड़ने में सक्षम बना सकते हो और उसे लाभान्वित होने दे सकते हो। क्या यह करना एक साधारण बात है? इसके लिए ईमानदारी की ज़रूरत होती है। अगर कोई सोचे कि यह बात तो केवल न्यूनतम विचार के नियोजन से बन जाएगी, और कहे, "परमेश्वर के वचनों को पढ़ो और परमेश्वर से प्रेम करो। तुम्हें उसके प्रेम का ऋण चुकाना होगा। इसमें क्या मुश्किल है? तुम किस बारे में नकारात्मक हो?", तो वह व्यक्ति जो भी कर रहा है वह सिर्फ दिखावे की हरक़त है, और दूसरों के साथ उसका व्यवहार असंवेदनशील है। इस तरह के लोग खोटे, दिल से दयाहीन, दूसरों के प्रति सहानुभूति से रहित, और दूसरों के लिए प्रेम से विहीन होते हैं। यदि तुम्हारे पास वास्तव में एक अंतरात्मा है, तो तुम्हें ध्यान से सोचना चाहिए, इस प्रकार चिंतन करना चाहिए: "जैसा कि उन्होंने मुझसे पूछा था उसे देखते हुए, यह व्यक्ति काफ़ी कठिन परिस्थिति में होना चाहिए। वह आम तौर पर बहुत उत्साह से तलाश करता है और अपने कर्तव्य को निभाने में बहुत सकारात्मक होता है। यदि इस कठिनाई से वह वास्तव में ठोकर खा जाता है, या नकारात्मक हो जाता है और उसका कर्तव्य प्रभावित होता है, तो यह उसके लिए या परमेश्वर के घर के लिए लाभदायक नहीं होगा। मुझे इसकी मदद कैसे करनी चाहिए ताकि उसकी समस्या का समाधान हो जाए"? तुम इस पर विचार करते हो और तुम तब अपने दिल में आगे का मार्ग ढूँढ लेते हो और तुम जानते हो कि क्या करना है, और फिर तुम उसके साथ संगति करते हो। कभी-कभी, तुम्हारी पहली संगति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होगी, क्योंकि तुम खुद भी विचार कर रहे हो, प्रार्थना कर रहे हो और अभी तक मामले को अच्छी तरह से समझ नहीं पाए हो। तुम्हें सही शब्दों को कहने के बारे में सोचने के लिए समय लेना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि तुम इन बातों को किस तरह कह सकते हो ताकि अगला व्यक्ति उन्नत हो और उसके नकारात्मक होने की संभावना न रहे, और जिससे वह आगे का मार्ग खोज पाए। इन सभी चीज़ों पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता होती है, और यह ज़रूरी है कि तुम उस पर ध्यान से चिंतन करने का प्रयास करो। तो, इस प्रकार, तुम सावधानीपूर्वक विचार करते हो, तुम बारबार प्रार्थना करते हो, और तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों में शायद पहले अधिक संरचना न होगी, लेकिन, जैसे-जैसे तुम बोलने लगते हो, तुम्हारी बात का तात्पर्य अधिकाधिक विशिष्ट और स्पष्ट होता जाएगा—और जब तुम मुद्दे को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो अगला भी वैसा ही करेगा। जब तुम समस्या का समाधान करते हो, तो तुम सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो, और तुम भी, लगातार दूसरे की मदद करते हुए, सच्चाई का एक पहलू हासिल करने और सीखने में सक्षम होगे। यह वह विशेष उपचार है जो परमेश्वर इंसान को तब देता है जब वह सत्य का अभ्यास करता हो, और यह वो विशेष उपकार है जिसमें इंसान को संभाला जाता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

अगर किसी में सच में मानवता हो—अर्थात एक ऐसा व्यक्ति जिसमें सत्य-वास्तविकता हो—तो ऐसे लोगों के कार्य सिद्धांत क्या होते हैं? सबसे पहले, वे परमेश्वर के चुने हुए अधिकांश लोगों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने में सक्षम होते हैं, फिर चाहे वे उन्हें जानते हों या नहीं। जब तुम पूरी तरह से निश्चित हो कि कोई व्यक्ति धूर्त है और सत्य को नापसंद करता है और कभी नहीं बदल सकता, केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति के साथ प्रेम की बजाय बुद्धिमत्ता से पेश आ सकते हो। यदि तुम पूरी तरह से सुनिश्चित नहीं हो कि वह सत्य को नापसंद करने वाला एक धूर्त व्यक्ति है और बिल्कुल ही निराशाजनक है, तो तुम्हें उसके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। प्रेम क्या है? प्रेम सत्य के आधार पर और परमेश्वर के वचनों के अनुरूप लोगों की मदद करने, उन्हें सींचने, उनके लिए प्रावधान करने और उनका सहयोग करने का अभ्यास है। इसके अतिरिक्त, यह सत्य के अनुरूप लोगों की समस्याओं और परेशानियों को सुलझाना है और इसमें उनकी काट-छाँट और उनसे निपटना और किसी भी ऐसे व्यक्ति को सख्ती से उजागर करना और उसकी जांच-विश्लेषण करना भी शामिल है, जिसने अपराध किए हों या धृष्टतापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया हो या परमेश्वर के कार्य में रुकावट डाली हो। जब तक यह लोगों की मदद करने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश को लेकर उनके मार्गदर्शन के लिए है, तब तक चाहे तुम उनके साथ नम्रता से बात करो या उनकी काट-छाँट करो और उनसे सख्ती से निपटो, यह सब प्रेम के दायरे में आता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन सत्य के आधार पर सहभागिता करते हो, जिस कारण लोग इसे पूरे दिल से स्वीकार करते हैं और यह देखते हैं कि तुममें दुर्भावना नहीं है और तुम सही और निष्पक्ष बने हुए हो, तो वे उससे आश्वस्त होंगे जो तुम कहते हो। हालाँकि, लोगों के साथ व्यवहार में तुम्हें सिद्धांतों के अनुसार चलना होगा। लोगों के अपराधों का पता चलने के बाद पहले उनकी काट-छाँट किए बिना और उनसे निपटे बिना तुम उन्हें यूँ ही प्रतिस्थापित, हटा या निष्कासित नहीं कर सकते; ऐसा करना अस्वीकार्य होगा। लोगों की काट-छाँट करते और उनसे निपटते समय तुम सख्त हो सकते हो, लेकिन लोगों से पेश आते समय तुम्हें उन्हें कुछ रियायत तो देनी ही होगी। तुम इतने सख्त नहीं हो सकते कि लोगों को छड़ी से पीट-पीट कर मार ही डालो; तुम्हें उन्हें पश्चाताप का अवसर देना होगा, उनसे निष्पक्ष तरीके से पेश आना होगा और उन्हें यह देखने देना होगा कि परमेश्वर लोगों को यथासंभव बचाता है। हालाँकि, यदि कुछ लोग परमेश्वर के घर में उन सुधर न सकने योग्य दुष्टात्माओं और शैतान को बनाए रखने के लिए बहाने के तौर पर इस अभिव्यक्ति का प्रयोग करते हैं, "परमेश्वर लोगों को यथासंभव बचाता है," तो यह शैतान की चाल है। वे इन शब्दों का प्रयोग शैतान को परमेश्वर के घर में रखने के उद्देश्य को पाने के लिए करना चाहते हैं, ताकि वह परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करता रहे। इसलिए प्रेमवश लोगों की मदद करने का सिद्धांत उन पर लागू करना चाहिए जिन्हें बचाया जा सकता है, सुधर न सकने वाले उन लोगों पर नहीं जिनसे इसके बजाय कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों और सिद्धांतों और साथ ही बुद्धिमत्ता से निपटा जा सकता है। यह सिद्धांत के साथ मामलों से निपटने का तरीका है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

एक-दूसरे को प्रेम करते हुए भी तुम्हें सिद्धांतों को थामकर रखना है। जब दूसरों की मदद और उनके साथ सहभागिता करना आवश्यक हो, तो तुम्हें उनके आध्यात्मिक कद और स्थितियों के अनुरूप उनकी उचित और प्रभावी रूप से मदद करनी चाहिए; जिस भी तरीके से वे इसे स्वीकार कर सकें, वैसे मदद करो। यदि किसी ने कुछ गलत किया है और तुम कैसे भी सहभागिता करो, अगर वे इसे स्वीकार नहीं करता तो तुम्हें कुछ समय के लिए उस व्यक्ति के साथ सहभागिता करने की कोशिश रोक देनी चाहिए। इसके बजाय, उनके लिए प्रार्थना करके शुरुआत करो और फिर सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करने हेतु उपयुक्त अवसर का इंतज़ार करो। यदि जो शब्द वे बोलते हैं, वे अनुपयुक्त हैं तो तुम उन्हें ठीक कर सकते हो, लेकिन इसके लिए तुम्हें उनकी परिस्थिति को आधार बनाना होगा; यदि वे तुम्हारी रचनात्मक आलोचना को स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम सीधे चीजों की ओर इंगित कर सकते हो ताकि वे अपनी समस्याओं के प्रति जागरूक हों। यदि उन्हें तुम्हारी आलोचना स्वीकार करने में समस्या होती है, तो तुम्हें उन्हें सीधे नहीं बताना चाहिए कि वे गलत हैं; इसके बजाय थोड़ी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए शुरुआत करो। संक्षेप में, लोगों की मदद करने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम उनकी मदद कैसे करते हो यह इस पर आधारित करो कि वे उसे स्वीकार कर सकते हैं या नहीं। यदि वे ऐसा करते हैं और एक अच्छा प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है तो तुम आगे बढ़ सकते हो; यदि वे तुम्हारी मदद स्वीकार नहीं कर सकते और कोई अच्छा प्रभाव हासिल नहीं किया जा सकता, तो तुम्हें जल्दबाज़ी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए और कुछ देर के लिए टाल देना चाहिए ताकि तुम्हारे बीच का संबंध न टूटे। मनुष्यों के अपनी भावनाओं से संचालित होने की पूरी संभावना होती है; यदि यह संपर्क टूट जाता है तो कार्य करना आसान नहीं होता। इस संपर्क की रक्षा करते हुए शुरुआत करो और फिर उपयुक्त मार्ग की तलाश में परमेश्वर से प्रार्थना करो। सत्य पर सहभागिता के माध्यम से अन्य व्यक्ति को प्रेरित करो कि वह थोड़ी-थोड़ी करके तुम्हारी मदद स्वीकार करे और धीरे-धीरे सुधार लाए।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

जो लोग अगुआ और कार्यकर्ता हैं, उन्हें अपने तरीकों पर ध्यान देते हुए अपने भाइयों और बहनों के आध्यात्मिक कद के अनुसार उनकी समस्याएँ सुलझानी चाहिए। केवल तभी वे अपने भाइयों और बहनों की मदद करने के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं; केवल तभी उनका कार्य असरदार हो सकता है। जब कोई भाई या बहन कुछ अनुपयुक्त कहता है जो कि वास्तव में कोई गंभीर बात नहीं है, न ही वह बात परमेश्वर का विरोध करने वाली या उसके बारे में राय बनाने वाली है, तो भी कुछ अगुआ और कार्यकर्ता उन पर यह कहते हुए लेबल लगा देते हैं कि : "तुम परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह कर रहे हो और उसका विरोध कर रहे हो। तुम फलां-फलां कर रहे हो।" क्या इससे उनके भाइयों और बहनों की मदद होती है? क्या यह उन्हें उत्पीड़ित करने, सज़ा देने और उन पर लेबल लगाने का तरीका नहीं है? यह अपने भाइयों और बहनों की सेवा करने का तरीका नहीं है। यदि, तुम्हारे भाइयों और बहनों में से, किसी में तुम्हें कुछ ऐसा पता चले जो सत्य के अनुरूप नहीं है, तो राय मत बनाओ और उपयुक्त परिस्थिति आने से पहले आँखें मूंदकर उनकी गलतियाँ मत बताओ। इसी मामले पर बात मत किए जाओ। उनके साथ तब तक सामान्य रूप से ही बातचीत करते रहो, जब तक सहभागिता के माध्यम से मामले को सुलझाने का क्षण न आ जाए। उदाहरण के लिए, मान लो तुम्हें पता चलता है कि किसी ने कुछ गलत कहा या किया है। तुम इस पर सोच-विचार करके, संबंधित सत्यों पर विचार करके और यह देखकर कि जो कुछ उन्होंने किया या कहा वह किस तरह से गलत था, शुरुआत कर सकते हो। सोचो कि इसने सत्य के किस पहलू का उल्लंघन किया है, शैतान के ज़हर के किस पहलू ने इसे नियंत्रित किया है। फिर तुलनात्मक रूप से देखते हुए स्वयं का परीक्षण करो और देखो कि क्या ऐसी समस्या तुममें है। यदि तुम समान भ्रष्टाचार स्वयं में पाओ तो पहले अपनी समस्या सुलझाओ। इस प्रकार, तुम्हारे पास अनुभव और गवाही होगी। जब तुम्हें यह अनुभव हो चुका हो और तुम स्वयं को सही में जान चुके हो और खुद में बदलाव आ जाने के बाद अपने भाई या बहन के पास जाओ और उनके साथ धीरे-धीरे सहभागिता करो। अपने वास्तविक अनुभव को अपनी सहभागिता में लाओ। इसे सुनने के बाद, तुम्हारे भाई-बहन भी आत्मचिंतन कर सकेंगे और अपना भ्रष्टाचार देख सकेंगे और उनकी समस्याएँ भी सुलझ जाएँगी। यह लोगों की मदद करने का अच्छा तरीका है। अधिकांश लोग छोटे आध्यात्मिक कद के होते हैं, वे सत्य को ज़्यादा नहीं समझते और विवेकशील नहीं होते, इसलिए जब तुम किसी और में कोई समस्या देखते हो, तो इस पर लगातार बोलते ही मत रहो। पहले खुद अपनी समस्याओं से निपटो और जब वे सुलझ जाएँ तो उस अवसर का इंतज़ार करो जब तुम अपनी गवाही और सहभागिता के बारे में बताने का तरीका प्रयोग में ला सको कि तुम सत्य के इस पहलू को कैसे समझ सके, उजागर हुए भ्रष्टाचार के पहलू को तुमने कैसे पहचाना और कैसे तुम शैतान के ज़हर के इस पहलू को जानने और उसमें भेद करने में समर्थ हुए। यह सुनने के बाद दूसरों को तुम्हारे अनुभवों से मदद मिल सकती है और वे अभ्यास का मार्ग खोज सकते हैं। इस प्रकार न केवल तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते या उनकी खोज को प्रभावित नहीं करते, बल्कि उनकी समस्याओं को भी सुलझाते हो। यह अच्छा है। यदि कोई वास्तव में विनाश के या परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा डालने वाले कार्य कर रहा है, अपने भाइयों-बहनों के जीवन प्रवेश को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है तो ऐसी स्थिति में तुम उनके साथ सहभागिता करने का तत्काल अवसर खोज सकते हो। हालाँकि, जब तुम सहभागिता करो तो तुम्हारे द्वारा प्रयुक्त तरीका सही होना चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार सभी लोगों में प्रकट होता है और खासकर नए आस्थावानों में, जिनका आध्यात्मिक कद छोटा होता है। हमें उनके साथ धैर्यपूर्ण तरीके से व्यवहार करना चाहिए और उनके साथ अपनी सहभागिता में अप्रत्यक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। तत्संबंधी भ्रष्टाचार के स्वयं अपने खुलासों की बात करो और तुमने उनका कैसे पता लगाया या उन्हें कैसे पहचाना ताकि उनमें भी ऐसी समझ पैदा हो सके। तुम जो कुछ भी करो, उनकी कमियों पर उन्हें उजागर करना, उनकी निंदा करना और उन पर लेबल लगाना ही मत करते रहो। अगर तुम ऐसा करते हो, तो उनके लिए स्वीकार करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, दूसरों की मदद के लिए सत्य पर सहभागिता करते हुए, तुम्हें उस तरीके पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे तुम ऐसा करते हो। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा होता है, तुम्हें उनके साथ ऐसे तरीकों से पेश आना चाहिए जो कम आध्यात्मिक कद वाले लोगों के लिए उचित हों। जब उनका आध्यात्मिक कद बढ़ जाए तो तुम उनके साथ थोड़ा और प्रत्यक्ष रूप से या थोड़ी और सख्ती से बात कर सकते हो। यह दृष्टिकोण उन्हें ठोकर खाने से बचाता है। संक्षेप में, लोगों की मदद और सेवा करने के लिए और खासकर नए आस्थावान भाइयों और बहनों की अगुआई करने के लिए, तुम्हें अपने तरीकों को लेकर सचेत रहना चाहिए और प्रेमपूर्ण तरीके से व्यवहार करना चाहिए। इस तरह जो तुम कहते हो, उसे स्वीकार करना तुम्हारे भाइयों और बहनों के लिए आसान होगा; यदि दूसरों के साथ तुम्हारी सहभागिता प्रेमविहीन है और तुम्हारी मानसिकता तिरस्कार और मज़ाक उड़ाने वाली है और तुम उन पर दोष मढ़ते हो, तो वे हतोत्साहित हो जाएंगे और आश्वस्त नहीं हो पाएँगे। बदले में वे तुमसे बहस करना चाहेंगे और यहाँ तक कि तुम्हारी समस्याओं को उजागर करेंगे। यह परेशान करने वाली बात है। इसलिए जब तुम्हें पता चल जाए कि तुम्हारे भाइयों और बहनों में भ्रष्टाचार का कौन सा पहलू है और तुम उनकी मदद करना चाहो तो पहले उनके लिए प्रार्थना करो। जब तुम प्रार्थना कर चुके हो तो स्वयं अपनी मानसिकता सुधारो, अपनी मन:स्थिति ठीक करो और फिर उनके साथ जाकर सहभागिता करो। यह चीज़ों को सुलझाने का अच्छा तरीका है। अगर तुम्हारी मन:स्थिति ठीक नहीं है, तो बहुत संभव है कि तुम उसका बिल्कुल उल्टा कर डालोगे जो तुम करना चाहते हो। अगर तुम खुद को एक ऐसा अगुआ या कार्यकर्ता मानते हो जिसके पास हमेशा अपनी ही स्थिति में रहते हुए अपने भाइयों और बहनों की निंदा करने या उन पर दोष लगाने का अधिकार है, तो तुम्हारे भाई-बहनों के लिए तुम्हारे वचनों को स्वीकार करना मुश्किल होगा और दूसरों की समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद करना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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