127. दूसरों की प्रेमपूर्वक सहायता करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के आधार पर लोगों के विभिन्न प्रकारों के बीच भेद करना आवश्यक है। अच्छे लोगों के साथ, जिनका परमेश्वर में सच्चा विश्वास हो, प्रेमपूर्वक बातचीत करो; एक-दूसरे के साथ नेकी से पेश आओ और परस्पर सहायता करो।

(2) जो दूसरों की प्रेमपूर्वक मदद करता है, उसे किसी छुपे हुए इरादे से या बदले में कुछ पाने के लिए ऐसा नहीं करना चाहिए; इसके बजाय, उसे केवल सत्य का अभ्यास करने, अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने, और दूसरों को परमेश्वर के सामने लाने के लिए ऐसा करना चाहिए।

(3) जब लोग आपस में मदद करते हैं, तो उन्हें एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना चाहिए और एक-दूसरे की समस्याओं को, उचित और स्वीकार्य लगने वाले तरीकों से हल करने हेतु सत्य की तलाश करनी चाहिए।

(4) परमेश्वर के वचनों के आधार पर दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। किसी को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग दूसरों को रूढ़िबद्ध करने के लिए नहीं करना चाहिए, न ही दूसरों के अपराधों के आधार पर उनकी निंदा करनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

तुम लोगों को सत्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; तभी तुम जीवन में प्रवेश करोगे। अगर यह पता चले कि दूसरों के कार्य सत्य के विपरीत हैं, तो हमें अधिकतम प्रेम के साथ सत्य के लिए प्रयास करने में उनकी मदद करनी चाहिए। अगर दुसरे लोग सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हों, और उनके काम करने के तरीके में सिद्धांत हों, तो हमें उनसे सीखने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करना चाहिए—यही पारस्परिक प्रेम है। कलीसिया के अंदर तुम्हें इस तरह का परिवेश रखना चाहिए—हर कोई सत्य पर ध्यान केंद्रित करे और उसे पाने का प्रयास करे। लोग कितने भी बूढ़े अथवा युवा हों, चाहे वे पुराने विश्वासी हों या नए, या चाहे वे कितने भी क़ाबिल हों; जिन चीज़ों को तुम्हें देखना चाहिए, वे हैं कि कौन-से लोग सही तरह से बोलते हैं, कौन-से लोग सत्य के अनुरूप बोलते हैं, कौन-से लोग परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोच रहे हैं और कौन-से लोग उसके कार्य को अपने दिल में सबसे अधिक धारण करते हैं, किन लोगों में सकारात्मक चीज़ों के बारे में अच्छी समझ है, कौन-से लोग धार्मिकता की समझ साझा करते हैं, और कौन-से लोग कीमत चुकाने को तैयार हैं। ऐसे लोगों का उनके भाई-बहनों द्वारा समर्थन और सराहना की जानी चाहिए। ईमानदारी का यह परिवेश, जो सत्य का अनुकरण करने से आता है, कलीसिया के अंदर व्याप्त होना चाहिए; इस तरह से, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा का कार्य होगा, और परमेश्वर तुम्हें आशीष और मार्गदर्शन प्रदान करेगा। अगर कलीसिया के अंदर कहानियाँ सुनाने, एक-दूसरे के साथ उपद्रव करने, एक-दूसरे से द्वेष रखने, एक-दूसरे से ईर्ष्या करने और एक-दूसरे से बहस करने का परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम लोगों के अंदर काम नहीं करेगा। एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करना और गुप्त रूप से लड़ना, धोखा देना, चकमा देना और साज़िश करना—यह बुराई का परिवेश है! अगर कलीसिया के अंदर ऐसा परिवेश होगा, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से अपना कार्य नहीं करेगा। प्रभु यीशु ने इसके संबंध में एक बात कही थी। क्या तुम लोगों को याद है, वह क्या थी? ("फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" [मत्ती 18:19-20]।) यह सत्य है। परमेश्वर जैसा कहता है, वैसा करता है। अगर तुम उसकी इच्छा के विरुद्ध जाते हो और जैसा वह कहता है, वैसा नहीं करते, तो वह तुमसे दूर हो जाएगा। फलतः, तुम हमेशा दूसरों के दोष देखोगे और इस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरों की कौन-सी बात तुम्हें अप्रसन्न करती है, और निरंतर इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित करोगे कि दूसरे तुम्हें नापसंद करते हैं। यह तुम्हारे लिए समस्याएँ पैदा करेगा। अगर पवित्र आत्मा तुम में काम नहीं करती, अगर परमेश्वर तुम्हें आशीष या मार्गदर्शन नहीं देता, अगर तुम केवल अपनी स्वयं की शक्ति और गुणों व क्षमताओं पर ही निर्भर करते हो, तो तुम्हारा किया कुछ भी सही नहीं होगा, तुम्हारा किया कुछ भी परमेश्वर के अनुरूप नहीं होगा, और चाहे तुम कितनी भी मेहनत करो, वह ऊर्जा की बरबादी होगी। तुम अनुभव के जरिये धीरे-धीरे इसे सीख जाओगे। तुम जो कुछ भी करो, उस सबमें तुम्हें एकचित्त होना चाहिए। और तुम एकचित्त कैसे हो सकते हो? तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए; केवल तभी तुम लकड़ियों के गट्ठर की तरह मज़बूत बन पाओगे—सब एक-साथ, और सब एकचित्त।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

जब तुम दूसरों के साथ बातचीत करते हो तब सबसे पहले तुम्हें अपना दिल और अपनी सच्चाई उन्हें दिखानी होगी। यदि बातचीत या संपर्क करने में और दूसरों के साथ कार्य करने में, किसी के शब्द लापरवाह, आडंबरपूर्ण, मजाकिया, चापलूसी करने वाले, गैर-जिम्मेदाराना, और मनगढंत हैं, या उसकी बातें केवल सामने वाले से अपना काम निकालने के लिए हैं, तो उसके शब्द विश्वसनीय नहीं हैं, और वह थोड़ा भी ईमानदार नहीं है। दूसरे किसी भी व्यक्ति के साथ उनके पेश आने का यही तरीका है, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो। क्या ऐसे व्यक्ति का दिल सच्चा है? यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। मान लो किसी व्यक्ति में कमियां हैं, और वह सच्चाई और ईमानदारी से तुमसे कहता है : "सही में बताओ मैं क्यों इतना नकारात्मक हूँ। मैं बिल्कुल समझ नहीं पाता।" और मान लो तुम उसकी समस्या को वास्तव में जानते हो, लेकिन उसे बताते नहीं हो, बल्कि उससे कहते हो : "कोई बात नहीं। मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ।" ये शब्द सुनने वाले के लिए बहुत बड़ी सांत्वना हैं, लेकिन क्या तुम्हारा रवैया सच्चा है? नहीं, यह सच्चा नहीं है। तुम उस व्यक्ति के साथ अन्यमनस्क भाव से बात कर रहे हो, ताकि वह और अच्छा महसूस करे और उसे सांत्वना मिले, तुमने उसके साथ ईमानदारी से बात नहीं की। तुम सच्चाई से उसकी सहायता नहीं कर रहे जिससे कि वह अपनी नकारात्मकता को छोड़ सके। तुमने उस व्यक्ति को सांत्वना देने के प्रयास में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसके साथ तुम्हारा कोई मन-मुटाव न हो या संबंधों में कोई खटास पैदा न हो, तुमने उसके लिए न्यूनतम किया है। यह कोई ईमानदार व्यक्ति होना नहीं होता। अतः, इस तरह की परिस्थिति का सामना होने पर एक ईमानदार व्यक्ति को क्या करना चाहिए? उसे बताओ कि तुमने क्या देखा और क्या पहचाना है : "मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैंने क्या देखा और अनुभव किया है। यह तुम फैसला करो कि मैं जो कह रहा वह सही है या गलत। अगर गलत है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। अगर सही है तो मैं आशा करता हूँ कि तुम इसे स्वीकार करोगे। अगर मेरी बातों को सुनना तुम्हारे लिए कठिन है और तुम उससे आहत होते हो, तो मुझे उम्मीद है तुम परमेश्वर से स्वीकार कर पाओगे। मेरा इरादा और उद्देश्य तुम्हारी सहायता करना है। मुझे तुम्हारी समस्या स्पष्ट दिखती है : तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आहत हुई है। तुम्हारे अहम को कोई बढ़ावा नहीं देता, और तुम सोचते हो कि सभी लोग तुम्हें तुच्छ समझते हैं, तुम पर प्रहार किया जा रहा, कि तुम्हारे साथ इतना गलत कभी नहीं हुआ। तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और नकारात्मक हो जाते हो। तुम्हें क्या लगता—क्या वास्तव में यही बात है?" यह सुन कर वह महसूस करता है कि वास्तव में मामला यही है। यही बात वास्तव में तुम्हारे दिल में है, लेकिन तुम अगर ईमानदार नहीं हो, तो यह बात कहोगे नहीं। तुम कहोगे, "मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ," और जब दूसरा व्यक्ति यह सुनता है कि सभी लोग नकारात्मक हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह सामान्य बात है, और अंततः, वह अपनी नकारात्मकता नहीं छोड़ता है। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सच्चे भाव और हृदय से उसकी सहायता करते हो, तो तुम सत्य को समझने और अपनी नकारात्मकता पीछे छोड़ने में उसकी मदद कर सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

अगर किसी भाई या बहन के साथ तुम्हारे अच्छे संबंध हैं, और वे तुमसे पूछते हैं कि उनमें क्या गलत है, तो तुम्हें यह कैसे करना चाहिए? यह इस बात से संबंधित है कि तुम इस मामले में क्या दृष्टिकोण अपनाते हो। क्या तुम्हारा दृष्टिकोण सच्चाई का अभ्यास करने का है, या तुम जीने के लिए फलसफ़ों का उपयोग करते हो? यदि तुम कहते हो, "तुम हर क्षेत्र में अच्छे हो और तुम मुझसे बेहतर हो। तुम कठिनाइयों को सहन करने में सक्षम हो, और तुम्हारी क्षमता अच्छी है। तुम्हें नकारात्मक होने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम कितने अच्छे हो; इसमें छोटा महसूस करने की क्या बात है?"—अगर तुम स्पष्ट रूप से देखते हो कि उनमें कुछ गलत चीज़ें हैं, फिर भी तुम स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि वे क्या हैं ताकि तुम दोनों के बीच अच्छे संबंधों को नुकसान न पहुँचे—तो तुम जीने के लिए एक दर्शन का उपयोग कर रहे हो। जो व्यक्ति इस तरह के मामले में एक अलग दृष्टिकोण अपनाता है, वह कहता है, "मेरा आध्यात्मिक कद अभी छोटा है और मैं तुम्हारी समस्याओं को पूरी तरह से नहीं समझता हूँ। जब मैं समझ लूँगा, तो मैं तुम्हें बताऊँगा।" क्या यह दूसरों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं है? क्या वह वास्तव में कुछ भी अच्छी तरह से नहीं समझ सकता है? क्या उसके पास इस मुद्दे पर कोई भी विचार नहीं थे? उसके पास विचार तो हैं; बस बुरा न लग जाए इस डर से वह कुछ नहीं कह रहा है। वह तुमसे कुछ नहीं कहता है और तुम्हें इस मामले को समझने में असमर्थ छोड़ देता है, जिससे तुम्हें लगे कि तुम महान हो। शायद तुम एक दिन असफल हो जाओगे और गिर पड़ोगे, और वे तुम्हारी पीठ पीछे हँसते रहेंगे। जब ऐसा होगा, तो वे तुलना में तुमसे बेहतर दिखेंगे; इस तरह वे तुम्हारे साथ एक चाल चलते हैं। क्या ऐसा व्यक्ति बुरा नहीं है? इन दो दृष्टिकोणों में से, कौन-सा बेहतर है? ये दोनों ही घृणा के योग्य हैं; कोई भी चुनने के योग्य नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें सच बताना चाहिए। वे कहते हैं, "तुम एक बुरे और ख़राब व्यक्ति हो। मैं एक ही नज़र में तुम्हें बता सकता हूँ कि तुम्हें बचाया नहीं जाएगा।" यद्यपि वे ईमानदारी से बोलते हैं, और ऐसा कहने वाला व्यक्ति अपने दिल में सचमुच ही ऐसा सोचता है, पर उसके कहने में एक छिपे मकसद का संकेत होता है: "अगर मैं ऐसा कहता हूँ, तो तुम निश्चित रूप से अहंकार या अकड़ नहीं दिखाओगे।" यह दृष्टिकोण भी गलत है—यह दूसरे की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखता है, न ही इसके परिणामों पर विचार करता है। तुम इस तरह के व्यक्ति के स्वभाव के बारे में क्या सोचते हो? क्या वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं? नहीं—इस तरह से कार्य करने से दूसरे नकारात्मक हो सकते हैं या वे लड़खड़ा सकते हैं। यह उनके चलने के मार्ग को गंभीर रूप से अवरुद्ध कर देगा। इन सभी बातों पर विचार किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण भी अच्छा नहीं है; यह अपने अंदर एक स्वभाव लिए हुए है। यह सामान्य मानवता की तर्कसंगतता के भीतर से बोलना या व्यवहार करना नहीं है, न ही यह सत्य-सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना है।

तो फिर, सत्य-सिद्धांत के अनुसार, तुम्हें इस मामले के प्रति कैसा रवैया रखना चाहिए? सत्य के साथ कौन-सी कार्रवाई मेल खाती है? इसमें कितने प्रासंगिक सिद्धांत हैं? तुम्हें सिद्धांतों की दृढ़ समझ होनी चाहिए। सबसे पहले, दूसरों के लिए ठोकर का कारण न बनो। तुम्हें पहले दूसरे की कमज़ोरियों पर, और इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनके साथ किस तरह बात करने से वे ठोकर नहीं खाएँगे। कम-से-कम इस बात का ध्यान रखना तो जरूरी है। इसके बाद, तुम्हें चीज़ों के सकारात्मक पक्ष पर विचार करना चाहिए—दूसरे व्यक्ति की मदद करने के लिए तुम क्या कर सकते हो। उनकी मदद करने का लक्ष्य उन्हें परमेश्वर की इच्छा को समझने देना, उन्हें परमेश्वर के सामने लाना, और उन्हें ऐसी कठिन परिस्थितियों को पीछे छोड़ने और सत्य को हासिल करने देना है, जैसा कि खुद तुमने किया है। ऐसे दयालु दिल वाला व्यक्ति सबसे उत्तम प्रकार का व्यक्ति होता है; यही सत्य का अभ्यास है। पहला: उनकी ठोकर का कारण न बनो। दूसरा: उनकी मदद करने में सक्षम बनो। तीसरा: उन्हें सत्य हासिल करने दो। तुम्हें इन तीन सिद्धांतों को समझना होगा। लेकिन ये सही-सही कैसे कार्यान्वित किए जाते हैं? क्या तुम वास्तव में दूसरे की कठिनाई को समझते हो? क्या यह एक अलग समस्या नहीं है? तुम्हें यह भी सोचना चाहिए: "उसकी समस्या का मूल क्या है? क्या मैं उसकी मदद कर सकता हूँ? अगर मैं मदद नहीं कर सकता और मैं मनमाने ढंग से और लापरवाही से बोलता हूँ, तो मैं उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकता हूँ। इसके परे, यह व्यक्ति सत्य को कितनी अच्छी तरह से समझ सकता है, और उसकी क्षमता क्या है? क्या वह दुराग्रही है? क्या वह आध्यात्मिक मामलों को समझता है? क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है? क्या वह सत्य की तलाश करता है? अगर वह देखता है कि मैं उससे बेहतर हूँ, और मैं फिर भी उसके साथ संगति करता हूँ, तो क्या उसमें ईर्ष्या या नकारात्मकता पैदा होगी?" इन सभी सवालों पर विचार किया जाना चाहिए; यह इंसानियत की बात होती है। इसलिए, जब तुम इस मुद्दे का सामना करते हो, तो तुम्हें पहले इन बातों पर विचार करना चाहिए, फिर जाकर एक सकारात्मक, अग्रसक्रिय मन से उसके साथ संगति करो, और, जब यह करो तो यह प्रार्थना और यह तलाश करो कि उसकी मदद कैसे की जाए, तुम इन सिद्धांतों का पालन कैसे कर सकते हो, और कैसे तुम उसे अपनी कठिनाई को पीछे छोड़ने में सक्षम बना सकते हो और उसे लाभान्वित होने दे सकते हो। क्या ऐसा करना सरल बात है? इसके लिए ईमानदारी की ज़रूरत होती है। अगर कोई सोचे कि यह बात तो केवल न्यूनतम विचार के प्रयोग से बन जाएगी, और कहे, "परमेश्वर के वचनों को पढ़ो और परमेश्वर से प्रेम करो। तुम्हें उसके प्रेम का ऋण चुकाना होगा। इसमें क्या मुश्किल है? तुम किस बारे में नकारात्मक हो?", तो ऐसा व्यक्ति जो भी कर रहा है वह सिर्फ दिखावे की बात है, और दूसरों के साथ उसका व्यवहार ईमानदार नहीं है। इस तरह के लोग खोटे, सख्त दिल के, दूसरों के प्रति सहानुभूति से शून्य, और दूसरों के लिए प्रेम से रिक्त होते हैं। यदि तुम्हारे पास वास्तव में एक अंतरात्मा है, तो तुम्हें ध्यान से सोचना चाहिए, इस प्रकार चिंतन करना चाहिए: "जैसा कि उसने मुझसे पूछा है उसे देखते हुए, यह व्यक्ति काफ़ी कठिन परिस्थिति में होना चाहिए। वह आम तौर पर बहुत उत्साह से तलाश करता है और अपने कर्तव्य को निभाने में बहुत सकारात्मक होता है। यदि इस कठिनाई से वह वास्तव में ठोकर खा जाता है, या नकारात्मक हो जाता है और उसका कर्तव्य प्रभावित होता है, तो यह उसके लिए या परमेश्वर के घर के लिए लाभदायक नहीं होगा। मुझे इसकी मदद कैसे करनी चाहिए ताकि उसकी समस्या का समाधान हो जाए"? तुम इस पर विचार करते हो और तुम तब अपने दिल में आगे का मार्ग ढूँढ लेते हो और तुम जानते हो कि क्या करना है, और फिर तुम उसके साथ संगति करते हो। कभी-कभी, तुम्हारी पहली संगति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होगी, क्योंकि तुम खुद भी विचार कर रहे होगे, प्रार्थना कर रहे होगे और अभी तक मामले को अच्छी तरह से समझ नहीं पाए होगे। तुम्हें सही शब्द कहने के बारे में सोचने के लिए समय लेना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि तुम ये बातें किस तरह कह सकते हो ताकि दूसरे व्यक्ति को सीख मिले और उसके नकारात्मक होने की संभावना न रहे, और जिससे वह आगे का मार्ग खोज पाए। इन सभी चीज़ों पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता होती है, और यह ज़रूरी है कि तुम इन पर ध्यान से चिंतन-मनन करने का प्रयास करो। तो, इस प्रकार, तुम सावधानीपूर्वक विचार करते हो, तुम बारबार प्रार्थना करते हो, और तुम्हारे द्वारा कह जाने वाले शब्दों में शायद पहले उतना गठन न होगा, लेकिन, जैसे-जैसे तुम बोलने लगोगे, तुम्हारी बात का तात्पर्य अधिकाधिक विशिष्ट और स्पष्ट होता जाएगा—और जब तुम मुद्दे को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो दूसरा व्यक्ति भी वैसा ही करेगा। जब तुम समस्या का समाधान करते हो, तो तुम सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो, और दूसरे की मदद करते हुए, तुम खुद भी सत्य का एक पहलू हासिल करने और सीखने में सक्षम होते हो। यह वह विशेष व्यवहार है जो परमेश्वर इंसान के साथ तब करता है जब वह सत्य का अभ्यास करता है, और यह वह विशेष कृपादृष्टि है जो परमेश्वर इंसान के प्रति रखता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफ़हमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

अपने दैनिक जीवन में तुम लोग, किन स्थितियों में, और कितनी स्थितियों में, परमेश्वर का भय मानते हो, और किन चीजों में नहीं मानते हो? क्या तुम लोगों से नफरत करने में सक्षम हो? जब तुम किसी से नफरत करते हो, तो क्या तुम उस व्यक्ति पर टूट पड़ सकते हो या उससे बदला ले सकते हो? (हाँ)। तो ठीक है, तुम लोग काफी डरावने हो! तुम लोग परमेश्वर-भीरु नहीं हो। तुम्हारा इन सब चीजों को कर पाने का मतलब है कि तुम्हारा स्वभाव काफी दुष्ट है, एक काफी गंभीर हद तक! प्रेम और नफरत ऐसे गुण हैं जो एक सामान्य इंसान में होने चाहिए, लेकिन तुम्हें साफ तौर पर यह भेद पता होना चाहिए कि तुम किन चीजों से प्रेम करते हो और किनसे नफरत। अपने दिल में, तुम्हें परमेश्वर से, सत्य से, सकारात्मक चीजों और अपने भाई-बहनों से प्रेम करना चाहिए, जबकि दानव शैतान से, नकारात्मक चीजों से, मसीह-विरोधियों से और दुष्ट लोगों से नफरत करनी चाहिए। अगर तुम अपने भाई-बहनों के लिए दिल में नफरत रखोगे, तो तुम उनको दबाने और उनसे बदला लेने की ओर प्रवृत होगे; यह बहुत भयावह होगा। कुछ लोगों के पास सिर्फ़ नफरत और दुष्टता के विचार होते हैं। कुछ समय के बाद, अगर ऐसे लोग उस व्यक्ति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते जिनसे वे नफरत करते हैं, तो वे उनसे दूरी बनाना शुरू कर देंगे। हालांकि, वे इसका असर अपने कर्तव्यों पर नहीं पड़ने देते या अपने सामान्य पारस्परिक संबंधों को प्रभावित नहीं होने देते, क्योंकि उनके दिलों में परमेश्वर होता है और वे उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। वे परमेश्वर का अपमान नहीं करना चाहते और ऐसा करने से डरते हैं। हालांकि ऐसे लोगों का किसी इंसान के प्रति कुछ अलग नजरिया हो सकता है, लेकिन वे उन विचारों को अमल में नहीं लाते या एक भी अनुचित शब्द नहीं बोलते, परमेश्वर का अपमान भी नहीं करना चाहते। यह किस तरह का व्यवहार है? यह खुद के आचरण को नियंत्रित करने और स्थितियों को सिद्धांत और निष्पक्षता के साथ संभालने का एक उदाहरण है। हो सकता है कि तुम किसी के व्यक्तित्व के साथ तालमेल नहीं बिठा पाओ और तुम उसे नापसंद भी कर सकते हो, लेकिन जब तुम उसके साथ मिलकर काम करते हो, तो तुम निष्पक्ष रहते हो और अपना कर्तव्य निभाने में अपनी भड़ास नहीं निकालते, अपने कर्तव्य का त्याग नहीं करते या परमेश्वर के परिवार के हितों पर अपनी चिढ़ नहीं दिखाते। तुम सिद्धांत के अनुसार चीजें कर सकते हो; क्योंकि, तुम परमेश्वर के प्रति बुनियादी श्रद्धा रखते हो। अगर तुम्हारी श्रद्धा थोड़ी अधिक है, तो जब तुम देखते हो कि किसी व्यक्ति में कोई दोष या कमजोरी है—भले ही उसने तुम्हें नाराज किया हो या तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचाया हो—फिर भी तुम्हारे भीतर उसकी मदद करने की इच्छा होती है। ऐसा करना और भी बेहतर होगा; इसका अर्थ यह होगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसमें इंसानियत, सत्य की वास्तविकता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है। यदि तुम अपने वर्तमान क़द के साथ इसे प्राप्त नहीं कर सकते, लेकिन तुम सिद्धांत के अनुसार चीजों को कर सकते हो, आचरण कर सकते हो, और लोगों के प्रति व्यवहार कर सकते हो, तो यह भी परमेश्वर-भीरु होने के रूप में गिना जाता है; यह सबसे मूल बात है। यदि तुम इसे भी प्राप्त नहीं कर सकते, और अपने-आपको रोक नहीं सकते हो, तो तुम्हें बहुत ख़तरा है और तुम काफी भयावह हो। यदि तुम्हें कोई पद दिया जाए, तो तुम लोगों को दंडित कर सकते हो और उनके लिए जिंदगी को कठिन बना सकते हो; फिर तुम किसी भी क्षण मसीह-विरोधी में बदल सकते हो। मसीह-विरोधी बन जाने वाला व्यक्ति किस प्रकार का होता है? क्या वह ऐसा पुरुष या ऐसी स्त्री नहीं है जिसे हटा दिया जाएगा? कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा, और उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए, इसके लिए लोगों के पास व्यवहार के अपने सिद्धांत होने चाहिए; हालाँकि, उस व्यक्ति का परिणाम क्या होगा—वह परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाएगा या फ़िर उसे न्याय और ताड़ना का सामना करना होगा—यह सब देखना परमेश्वर का कार्य है। इसमें इंसान को टांग नहीं अड़ानी चाहिए; परमेश्वर तुम्हें अपनी ओर से पहल करने की अनुमति नहीं देगा। उस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना है यह देखना परमेश्वर का कार्य है। अगर परमेश्वर ने यह फैसला नहीं किया है कि इस तरह के लोगों का परिणाम कैसा होगा, उन्हें निकाला नहीं है और उन्हें दंडित नहीं किया है और ऐसे लोगों को बचाया जा रहा है, तब तुमको धैर्य रखकर, प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए; तुम्हें ऐसे लोगों के परिणाम निर्धारित करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उन पर नकेल कसने या दंडित करने के लिए मानवीय साधनों का उपयोग करना चाहिए। तुम या तो ऐसे लोगों के साथ निपट सकते हो और कांट-छांट कर सकते हो या फ़िर दिल खोलकर तुम इनके साथ सहभागिता करके इनकी मदद कर सकते हो। लेकिन अगर तुम इन लोगों को दंडित करने, उनका बहिष्कार करने और उन्हें दोषी ठहराने पर विचार करते हो, तो तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। क्या ऐसा करना सत्य के अनुरूप होगा? ऐसे ख्याल अत्यधिक आवेशपूर्ण होने के परिणामस्वरूप आएंगे; ऐसे विचार शैतान से आते हैं और मनुष्य के आक्रोश के साथ ही मानवीय ईर्ष्या और घृणा से उत्पन्न होते हैं। ऐसा आचरण सत्य के अनुरूप नहीं है। यह कुछ ऐसा है जिसके कारण तुम्हें दंड मिल सकता है, यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ' से उद्धृत

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