51. अपनी विफलताओं और पतन से बरतने के सिद्धान्‍त

(1) व्‍यक्ति के लिए अपनी विफलताओं और पतन के उद्गमों का विश्‍लेषण करना और उन्‍हें समझना आवश्‍यक है। व्‍यक्ति को समझना चाहिए कि जिन लोगों में अहंकारी प्रकृति, असंगतियाँ, और पूर्वग्रह होते हैं, वे विफल होने और गिरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते;

(2) यह जानना आवश्‍यक है कि विफलताओं और गिरावटों में परमेश्‍वर की सदिच्‍छा निहित होती है। ये खुद को जानने के सबसे अच्‍छे अवसर होते हैं, और वे अक्‍सर व्‍यक्ति के आमूल-चूल परिवर्तन का कारण बनते हैं;

(3) सत्‍य की खोज करते हुए व्‍यक्ति को संकल्‍प-बद्ध होना चाहिए। विफलता और पतन से डरने की ज़रूरत नहीं है। अगर व्‍यक्ति सत्‍य को निरन्‍तर स्‍वीकार करने या उसके प्रति समर्पित होने में अक्षम हैं, तो उन्‍हें बचाया नहीं जा सकता;

(4) लोगों को अपनी विफलताओं को सार रूप में समझकर उनसे सीखें हासिल करना चाहिए, और किसी भी तरह के अपराधों का परिशोधन करने के लिए सत्‍य को जानने की कोशिश करनी चाहिए। जब तक लोग सच्‍चा पश्‍चाताप करते रहते हैं, तब तक परमेश्‍वर द्वारा उनका बचाया जाना निश्चित है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर तुम्हें सभी प्रकार के झंझावातों, विपत्तियों, कठिनाइयों और अनगिनत असफलताओं और झटकों का अनुभव कराता है, ताकि अंतत: इन सब चीज़ों का अनुभव करने के दौरान तुम्हें पता चल जाए कि परमेश्वर जो कुछ कहता है, वह सब सही है, और कि तुम्हारे विश्वास, धारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, दार्शनिक सिद्धांत, दर्शन, इस संसार में जो कुछ भी तुमने सीखा है और तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें सिखाया है, वह सब ग़लत है। वे तुम्हें जीवन में सही मार्ग पर नहीं ले जा सकते, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के सामने आने में तुम्हारी अगुआई नहीं कर सकते, और तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह विफलता का मार्ग है। परमेश्वर अंतत: तुम्हें इन्हीं बातों का एहसास कराएगा। तुम्हारे लिए यह एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसे तुम्हें उद्धार का अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त करना चाहिए। लेकिन यह परमेश्वर को दुःखी भी करता है : चूँकि लोग विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव के हैं, इसलिए उन्हें इस प्रक्रिया से गुज़रना और इन झटकों का अनुभव करना चाहिए। किंतु यदि कोई सत्य से सचमुच प्यार करता है, यदि वह सचमुच परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का इच्छुक है, यदि वह परमेश्वर के उद्धार की विभिन्न पद्धतियों—उदाहरण के लिए परीक्षण, अनुशासन, न्याय और ताड़ना—को स्वीकार करने के लिए तैयार है, यदि वह यह सब भुगतने के लिए दृढ़संकल्प है, यदि वह यह मूल्य चुकाने के लिए तैयार है, तो परमेश्वर वास्तव में नहीं चाहता कि वह इतने ज़्यादा कष्ट उठाए, न ही वह यह चाहता है कि वह इतने अधिक झटके और विफलताएँ झेले। किंतु लोग बहुत विद्रोही हैं। वे कुटिल मार्ग अपनाना चाहते हैं, वे ये विपत्तियाँ झेलने को तैयार हैं। मनुष्य इसी तरह की चीज़ है, और परमेश्वर के पास मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंपने और उसे विभिन्न स्थितियों में रखकर तैयार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह सभी प्रकार के अनुभव प्राप्त करे और इन स्थितियों से विभिन्न सबक सीखे, और सभी प्रकार की बुरी चीज़ों के सार को पहचाने। इसके उपरांत मनुष्य पीछे मुड़कर देखे और पाए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, वह स्वीकार करे कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, कि केवल परमेश्वर ही सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है, और केवल परमेश्वर ही मनुष्य से वास्तव में प्रेम करता है, और मनुष्य के लिए परमेश्वर से बेहतर या उससे अधिक उसकी परवाह करने वाला कोई नहीं है। लोग अंतत: किस सीमा तक तैयार किए जाते हैं? इस सीमा तक कि तुम कहो, "मैंने हर तरह की परिस्थिति का अनुभव किया है, और कोई भी स्थिति, व्यक्ति, विषय या वस्तु नहीं है जो मुझे सत्य को समझा सके, जो मुझे सत्य का आनंद दिला सके, जो मुझे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करा सके। मैं केवल आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकता हूँ, आज्ञाकारी बनकर मनुष्य के स्थान पर रह सकता हूँ, एक सृजित प्राणी की स्थिति और कर्तव्य का पालन कर सकता हूँ, आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ स्वीकार कर सकता हूँ, और बिना किसी शिकायत या पसंद के, और बिना अपनी माँगों या इच्छाओं के, सृष्टिकर्ता के समक्ष आ सकता हूँ।" जब लोग इस स्तर पर पहुँच जाते हैं, तब वे परमेश्वर के सामने सचमुच शीश झुकाते हैं, और परमेश्वर को उन्हें अनुभव करवाने के लिए किन्हीं और स्थितियों का निर्माण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो तुम लोग कौन-सा मार्ग अपनाना चाहते हो? कोई भी इंसान अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं में विपत्ति नहीं झेलना चाहता, और कोई भी झटके, विफलता, आपदा, हताशाओं और झंझावातों का अनुभव नहीं करना चाहता। किंतु कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। मनुष्य के भीतर की चीज़ें—उसकी प्रकृति का सार, उसका विद्रोहीपन, उसके विचार और दृष्टिकोण —अत्यधिक जटिल हैं; प्रतिदिन वे तुम्हारे भीतर घुल-मिल और गड्डमड्ड हो जाते हैं, और वे तुम्हें भीतर से मथ देते हैं। तुम सत्य-वास्तविकता में कम ही प्रवेश करते हो, तुम सत्य को कम ही समझते हो, और तुम्हारे भीतर अपने भ्रष्ट स्वभाव, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सार पर विजय पाने की शक्ति का अभाव होता है। इसलिए तुम्हारे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि दूसरा तरीका स्वीकार कर लो : लगातार विफलता और हताशा झेलो, लगातार नीचे गिरो, विपत्तियों के हाथों उछाले और पटके जाओ, कीचड़ में लोटो, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम कहो, "मैं थक गया हूँ, मैं उकता गया हूँ, मैं इस तरह जीना नहीं चाहता। मैं इन विफलताओं से गुजरना नहीं चाहता, मैं आज्ञाकारी बनकर सृष्टिकर्ता के सम्मुख आना चाहता हूँ। मैं परमेश्वर के वचन सुनूँगा, मैं वही करूँगा जो वह कहता है। जीवन में केवल यही सही मार्ग है।" जिस दिन तुम पूरी तरह से हार स्वीकार कर लोगे, केवल उसी दिन तुम परमेश्वर के सामने आओगे। क्या इससे तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ जान पाए? मनुष्य के प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है? परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, लेकिन वह इंसान का भला चाहता है। वह तुम्हारे लिए किसी भी परिवेश का निर्माण करे या वह तुमसे कुछ भी करने के लिए कहे, वह हमेशा सर्वोत्तम परिणाम देखना चाहता है। मान लो, तुम्हारे ऊपर कुछ बीतता है और तुम झटकों तथा विफलताओं का सामना करते हो। परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम्हें विफल होता देखे और फिर सोचे कि तुम समाप्त हो चुके हो, कि तुम्हें शैतान ने छीन लिया है, और उस बिंदु से तुम दोबारा कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकोगे, और तुम निराशा में डूब गए हो—परमेश्वर यह परिणाम नहीं देखना चाहता। परमेश्वर क्या देखना चाहता है? तुम इस मामले में भले ही विफल हो गए हो, पर तुम सत्य की तलाश करने, अपनी विफलता का कारण पता करने में समर्थ हो; तुम इस विफलता की सच्चाई स्वीकार करो और इससे कुछ ग्रहण करो, तुम सबक सीखो, तुम महसूस करो कि उस तरह कार्य करना ग़लत था, कि केवल परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना ही सही है। तुम्हें एहसास होता है, "मैं बुरा हूँ और मेरा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है। मुझमें विद्रोहीपन है, परमेश्वर जिन धार्मिक लोगों की बात करता है, मैं उनसे कुछ दूर हूँ, और मेरे अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है।" तुम्हें एक घटना का, मामले के वास्तविक तथ्य का एहसास होता है, और तुम चीज़ों को समझते हो और इस झटके तथा विफलता से उबरकर परिपक्व हो जाते हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। "परिपक्व होने" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ है और तुम उद्धार प्राप्त करने में समर्थ हो। इसका अर्थ है कि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ हो, कि तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर कदम रखने के क़रीब आ गए हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। परमेश्वर अच्छे इरादे से काम करता है, और उसके समस्त कार्यों में उसका प्रेम छिपा होता है, जिसे लोग अक्सर समझ नहीं पाते। मनुष्य संकीर्ण और क्षुद्र है, और उसका हृदय सुई के छेद के समान संकीर्ण है; जब परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता या उसे कोई अनुग्रह या आशीष नहीं देता, तो वह परमेश्वर को दोषी ठहराता है। फिर भी परमेश्वर मनुष्य के साथ झगड़ा नहीं करता; वह ऐसा परिवेश निर्मित करता है, जो मनुष्य को यह बताता है कि अनुग्रह और लाभ कैसे प्राप्त किए जाते हैं, मनुष्य के लिए अनुग्रह का क्या अर्थ है, और मनुष्य उससे क्या प्राप्त कर सकता है। मान लो, तुम्हें कोई अच्छी चीज़ खाना पसंद है, जिसे परमेश्वर कहता है कि अधिक मात्रा में खाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए बुरा है। तुम नहीं सुनते, उसी चीज़ को खाने पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर तुम्हें आराम से खाने देता है। नतीजतन, तुम बीमार हो जाते हो। इसे कई बार अनुभव करने के बाद, तुम्हें समझ में आता है कि परमेश्वर की बात ही सही है, वह जो कुछ कहता है, वह सब सच है, और तुम्हें उसके वचनों के अनुसार ही अभ्यास करना चाहिए। यही सही मार्ग है। और इसलिए ये झटके, विफलताएँ और दुःख, जिनसे लोग गुज़रते हैं, क्या बन जाते हैं? तुम परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को सराहते हो, और तुम यह भी मानते और विश्वास करते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं; परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बढ़ जाता है। कुछ और भी होता है : विफलता के इस दौर का अनुभव करने के माध्यम से तुम परमेश्वर के वचनों की सच्चाई और सटीकता का एहसास करने लगते हो, तुम देखते हो कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं, और तुम सत्य का अभ्यास करने का सिद्धांत समझने लगते हो। इसलिए, यह अच्छा है कि लोग विफलता का अनुभव करें—यह कुछ कष्टदायक अवश्य है, किंतु यह उन्हें तैयार करता है। यदि इस प्रकार तैयार होने के परिणामस्वरूप अंतत: तुम परमेश्वर के समक्ष लौट आते हो, उसके वचनों को स्वीकार करते हो, और उन्हें सत्य के रूप में लेते हो, तो इस तरह तैयार होने, झटके और विफलताएँ सहने का अनुभव व्यर्थ नहीं जाता। परमेश्वर यही देखना चाहता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पौलुस की प्रकृति और स्‍वभाव को कैसे पहचाना जाए' से उद्धृत

जब तुम थोड़ी सी बाधा या कठिनाई से पीड़ित होते हो, तो ये तुम लोगों के लिए अच्छा है; यदि तुम लोगों को एक मौज करने का समय दिया गया होता, तो तुम लोग बर्बाद हो जाते, और तब तुम्हारी रक्षा कैसे की जाती? आज तुम लोगों को इसलिए सुरक्षा दी जाती है क्योंकि तुम लोगों को दंडित किया जाता है, शाप दिया जाता है, तुम लोगों का न्याय किया जाता है। क्योंकि तुम लोगों ने काफी कष्ट उठाया है इसलिए तुम्हें संरक्षण दिया जाता है। नहीं तो, तुम लोग बहुत समय पहले ही दुराचार में गिर गए होते। यह जानबूझ कर तुम लोगों के लिए चीज़ों को मुश्किल बनाना नहीं है—मनुष्य की प्रकृति को बदलना मुश्किल है, और उनके स्वभाव को बदलना भी ऐसा ही है। आज, तुम लोगों के पास वो समझ भी नहीं है जो पौलुस के पास थी, और न ही तुम लोगों के पास उसका आत्म-बोध है। तुम लोगों की आत्माओं को जगाने के लिए तुम लोगों पर हमेशा दबाव डालना पड़ता है, और तुम लोगों को हमेशा ताड़ना देनी पड़ती है और तुम्हारा न्याय करना पड़ता है। ताड़ना और न्याय ही वह चीज़ हैं जो तुम लोगों के जीवन के लिए सर्वोत्तम हैं। और जब आवश्यक हो, तो तुम पर आ पड़ने वाले तथ्यों की ताड़ना भी होनी ही चाहिए; केवल तभी तुम लोग पूरी तरह से समर्पण करोगे। तुम लोगों की प्रकृतियाँ ऐसी हैं कि ताड़ना और शाप के बिना, तुम लोग अपने सिरों को झुकाने और समर्पण करने के अनिच्छुक होगे। तुम लोगों की आँखों के सामने तथ्यों के बिना, तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा। तुम लोग चरित्र से बहुत नीच और बेकार हो। ताड़ना और न्याय के बिना, तुम लोगों पर विजय प्राप्त करना कठिन होगा, और तुम लोगों की अधार्मिकता और अवज्ञा को जीतना मुश्किल होगा। तुम लोगों का पुराना स्वभाव बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए है। यदि तुम लोगों को सिंहासन पर बिठा दिया जाए, तो तुम लोगों को स्वर्ग की ऊँचाई और पृथ्वी की गहराई के बारे में कोई अंदाज़ न हो, तुम लोग किस ओर जा रहे हो इसके बारे में तो बिल्कुल भी अंदाज़ा न हो। यहाँ तक कि तुम लोगों को यह भी नहीं पता कि तुम सब कहाँ से आए हो, तो तुम लोग सृष्टि के प्रभु को कैसे जान सकते हो? आज की समयोचित ताड़ना और शाप के बिना तुम लोगों के अंतिम दिन बहुत पहले आ चुके होते। तुम लोगों के भाग्य के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं—क्या यह और भी निकटस्थ खतरे की बात नहीं है? इस समयोचित ताड़ना और न्याय के बिना, कौन जाने कि तुम लोग कितने घमंडी हो गए होते, और कौन जाने तुम लोग कितने पथभ्रष्ट हो जाते। इस ताड़ना और न्याय ने तुम लोगों को आज के दिन तक पहुँचाया है, और इन्होंने तुम लोगों के अस्तित्व को संरक्षित रखा है। जिन तरीकों से तुम लोगों के "पिता" को "शिक्षित" किया गया था, यदि उन्हीं तरीकों से तुम लोगों को भी "शिक्षित" किया जाता, तो कौन जाने तुम लोग किस क्षेत्र में प्रवेश करते! तुम लोगों के पास स्वयं को नियंत्रित करने और आत्म-चिंतन करने की बिलकुल कोई योग्यता नहीं है। तुम जैसे लोग, अगर कोई हस्तक्षेप या गड़बड़ी किए बगैर मात्र अनुसरण करें, आज्ञापालन करें, तो मेरे उद्देश्य पूरे हो जाएंगे। क्या तुम लोगों के लिए बेहतर नहीं होगा कि तुम आज की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करो? तुम लोगों के पास और क्या विकल्प हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (6)' से उद्धृत

असफल होना और कई बार नीचे गिरना कोई बुरी बात नहीं है; न ही उजागर किया जाना कोई बुरी बात है। चाहे तुम्हारा निपटारा किया गया हो, तुम्हें काटा-छाँटा गया हो या उजागर किया गया हो, तुम्हें हर समय यह याद रखना चाहिए : उजागर होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी निंदा की जा रही है। उजागर किया जाना अच्छी बात है; यह स्वयं को जानने का सबसे अच्छा अवसर है। यह तुम्हारे जीवन अनुभव को गति दे सकता है। इसके बिना, तुम्हारे पास न तो अवसर होगा, न ही परिस्थिति, और न ही अपनी भ्रष्टता के सत्य की समझ तक पहुँचने में सक्षम होने के लिए कोई प्रासंगिक आधार होगा। यदि तुम्हें अपने अंदर की चीज़ों के बारे में पता चल जाये, तुम्हारे भीतर छिपी उन गहरी बातों के हर पहलू का भी पता चल जाये, जिन्हें पहचानना मुश्किल है और जिनका पता लगाना कठिन है, तो यह अच्छी बात है। स्वयं को सही मायने में जानने में सक्षम होना, तुम्हारे लिए अपने तरीकों में बदलाव कर एक नया व्यक्ति बनने का सबसे अच्छा मौका है; तुम्हारे लिए यह नया जीवन पाने का सबसे अच्छा अवसर है। एक बार जब तुम सच में खुद को जान लोगे, तो तुम यह देख पाओगे कि जब सत्य किसी का जीवन बन जाता है, तो यह निश्चय ही अनमोल होता है, तुममें सत्य की प्यास जगेगी और तुम वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यह कितनी बड़ी बात है! यदि तुम इस अवसर को थाम सको और ईमानदारी से मनन कर सको, तो कभी भी असफल होने या नीचे गिरने पर स्वयं के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हो, तब तुम नकारात्मकता और कमज़ोरी में भी फिर से खड़े हो सकोगे। एक बार जब तुम इस सीमा को लांघ लोगे, तो फिर तुम एक बड़ा कदम उठा सकोगे और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

असफलता के, कमजोरी के और नकारात्मकता के समयों के तुम्हारे अनुभव परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परीक्षण कहे जा सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सब कुछ परमेश्वर से आता है, सभी चीजें और घटनाएँ उसके हाथों में हैं। तुम असफल होते हो या तुम कमजोर हो और ठोकर खा जाते हो, ये सब परमेश्वर पर निर्भर करता है और उसकी मुट्ठी में है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, यह तुम्हारा परीक्षण है, और यदि तुम इसे नहीं पहचान सकते हो, तो यह प्रलोभन बन जाएगा। दो प्रकार की अवस्थाएँ हैं, जिन्हें लोगों को पहचानना चाहिए : एक पवित्र आत्मा से आती है, और दूसरी संभवतः शैतान से आती है। एक अवस्था में, पवित्र आत्मा तुम्हें रोशन करता है और तुम्हें स्वयं को जानने, स्वयं का तिरस्कार करने और ख़ुद पर पछतावा करने और परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार रखने में समर्थ होने, उसे संतुष्ट करने पर अपना दिल लगाने देता है। दूसरी अवस्था ऐसी है जिसमें तुम स्वयं को जानते हो, लेकिन तुम नकारात्मक और कमजोर हो। यह कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण है, और यह भी कहा जा सकता है कि यह शैतान का प्रलोभन है। यदि तुम यह जानते हो कि यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार है और अनुभव करते हो कि अब तुम गहराई से उसके ऋणी हो, और यदि अब से तुम उसका कर्ज़ चुकाने का प्रयास करते हो और इस तरह के पतन में अब और नहीं पड़ते हो, यदि तुम उसके वचनों को खाने और पीने में अपना प्रयास लगाते हो, और यदि तुम स्वयं को हमेशा अभावग्रस्त महसूस करते हो, और लालसा का हृदय रखते हो, तो यह परमेश्वर द्वारा परीक्षण है। दुःख समाप्त हो जाने के बाद और तुम एक बार फिर से आगे बढ़ने लगते हो, परमेश्वर तब भी तुम्हारी अगुआई करेगा, तुम्हें रोशन करेगा और तुम्हारा पोषण करेगा। लेकिन यदि तुम इसे नहीं पहचानते हो और तुम नकारात्मक हो, स्वयं को निराशा में छोड़ देते हो, यदि तुम इस तरह से सोचते हो, तो तुम्हारे ऊपर शैतान का प्रलोभन आ चुका होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

यह कहा गया है कि "वह जो अंत तक अनुसरण करता है, उसे बचाया जाएगा", लेकिन क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? यह आसान नहीं है, और कुछ लोग अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ रहते हैं। शायद एक समय आए, जब वे परीक्षण, प्रलोभन या पीड़ा का सामना करें, और तब वे गिर सकते हैं और आगे बढ़ने में असमर्थ हो सकते हैं। प्रतिदिन होने वाली सभी चीज़ें, चाहे वे बड़ी हों या छोटी, जो तुम्हारे संकल्प को डगमगा सकती हैं, तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा कर सकती हैं, या कर्तव्य-पालन की तुम्हारी क्षमता और आगे की प्रगति को सीमित कर सकती हैं, परिश्रमयुक्त उपचार माँगती हैं; उनकी सावधानीपूर्वक जाँच होनी चाहिए और उनकी सच्चाई का पता लगाया जाना चाहिए। ये सभी वे चीजें हैं, जो अनुभव के क्षेत्र में घटित होती हैं। कुछ लोगों पर जब नकारात्मकता आ पड़ती है, तो वे अपने कर्तव्यों को त्याग देते हैं, और प्रत्येक नाकामयाबी के बाद वे घिसटकर वापस अपने पैरों पर उठ खड़े होने में असमर्थ होते हैं। ये सभी लोग मूर्ख हैं, जो सत्य से प्रेम नहीं करते, और वे जीवन भर के विश्वास के बाद भी उसे हासिल नहीं करेंगे। ऐसे मूर्ख अंत तक अनुसरण कैसे कर सकते थे? यदि तुम्हारे साथ एक ही बात दस बार होती है, लेकिन तुम उससे कुछ हासिल नहीं करते, तो तुम एक औसत दर्जे के, निकम्मे व्यक्ति हो। दक्ष और सच्ची योग्यता वाले लोग, जो आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, सत्य के अन्वेषक होते हैं; यदि उनके साथ कुछ दस बार घटित होता है, तो शायद उनमें से आठ मामलों में वे कुछ प्रेरणा प्राप्त करने, कुछ सबक सीखने, कुछ प्रबोधन हासिल करने, और कुछ प्रगति कर पाने में समर्थ होंगे। जब चीज़ें दस बार किसी मूर्ख पर पड़ती हैं—किसी ऐसे पर, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता है—तो इससे एक बार भी उनके जीवन को लाभ नहीं होगा, एक बार भी यह उन्हें नहीं बदलेगा, और न ही एक बार भी यह उनके लिए अपनी प्रकृति को समझने का कारण बनेगा, और यही उनके लिए अंत है। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर पड़ते हैं, और हर बार जब वे गिर पड़ते हैं, तो उन्हें समर्थन और दिलासा देने के लिए किसी और की ज़रूरत होती है; बिना सहारे और दिलासे के वे उठ नहीं सकते। अगर, हर बार जब कुछ होता है, तो उन्हें गिरने का खतरा होता है, और अगर, हर बार उन्हें अपमानित होने का खतरा होता है, तो क्या उनके लिए यही अंत नहीं है? क्या ऐसे निकम्मे लोगों के बचाए जाने का कोई और आधार बचा है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिनके दिल में सत्य और धार्मिकता के लिए तड़प है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो धार्मिकता, भलाई और सत्य के लिए तरसता है, और विवेक से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता परिमार्जित हो सके, और उनका जीवन-स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या धार्मिकता और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुराई का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो बुरी चीज़ों को दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य के साथ और उत्पन्न होने वाली घटनाओं के साथ लयबद्ध नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और अपने दम पर चीजों को संभालने या हल करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी सिफ़ारिश करवाने के लिए कुछ भी नहीं होता, उस पर कार्य किए जा सकने लायक कुछ भी नहीं होता। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन मैला होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे धार्मिकता के लिए तरसते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट या पारदर्शी रूप से सत्य की बात करे, वे प्रतिक्रिया नहीं करते, मानो वे पहले से ही मृत हों। क्या उनके लिए खेल ख़त्म नहीं हो गया है? किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी साँस बाक़ी हो, कृत्रिम श्वसन द्वारा बचाया जा सकता है, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ नहीं कर पाएगा। यदि कभी किसी समस्या का सामना करने पर तुम उससे कतराते हो और उससे बचने की कोशिश करते हो, तो इसका मतलब है कि तुमने गवाही नहीं दी है; इस तरह, तुम्हें कभी नहीं बचाया जा सकता, और तुम्हारा काम तमाम हो चुका है। जब कोई समस्या आ पड़ती है, तो तुम्हारा दिमाग ठंडा और रवैया सही होना चाहिए, और तुम्हें कोई विकल्प चुनना चाहिए। समस्या को हल करने के लिए तुम्हें सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। सामान्य स्थिति में, कुछ सत्यों को समझने का क्या उपयोग है? यह तुम्हारा पेट भरने के लिए नहीं होता, और यह तुम्हें केवल कहने को कुछ देने के लिए नहीं है, और न ही यह दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसका उपयोग तुम्हारी अपनी समस्याओं, अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए है—खुद की कठिनाइयों को सुलझाने के बाद ही तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल कर सकते हो। ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीज़ें हैं, पूर्ण किए जाने योग्य चीज़ें; वह सत्य की तलाश करने के लिए कृतसंकल्प था और दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला था; उसमें विवेक था, वह कष्ट सहने को तैयार था, और अपने दिल में वह सत्य से प्रेम करता था, और जो कुछ भी होता था, उसे वह यूँ ही गुज़र जाने नहीं देता था। ये सभी ठोस बातें हैं। यदि तुम्हारे पास इन ठोस बातों में से एक भी नहीं है, तो इसका मतलब परेशानी है। तुम अनुभव करने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं है, और तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम नहीं जानते कि प्रवेश कैसे करें। जब चीज़ें तुम पर आ पड़ती हैं, तो तुम भ्रमित हो जाते हो; तुम व्यथित महसूस करते हो, रोते हो, नकारात्मक हो जाते हो, भाग जाते हो, और चाहे तुम कुछ भी करो, तुम उन्हें सही ढंग से संभाल नहीं पाते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

इंसान को अपने भ्रष्ट स्वभाव का पता होना चाहिए। उसे अपनी प्रकृति का, उसने क्या किया है और उसने जो रास्ता अपनाया है उसका, या उसके अपराधों और गलतियों का, ज्ञान होना चाहिए—उसे उन्हें विश्लेषित करना चाहिए। इसके अलावा, इंसान को यह स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि क्यों वह इन चीज़ों को करने में सक्षम है, और ऐसी चीज़ों को करने की प्रकृति क्या होती है। उसे यह भी समझना चाहिए कि परमेश्वर इंसान के लिए क्या चाहता है। इंसान अपने द्वारा की गई ग़लतियों के लिए दोषी, ऋणी या आरोपित महसूस कर सकता है, लेकिन क्या यह सही है अगर वह हमेशा नकारात्मक स्थिति में फँसा रहे? क्या इस तरह का दृष्टिकोण या ऐसे विचारों का होना सही है? क्या यह सत्य के साथ मेल खाता है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? क्या तुम्हारी स्थिति वास्तव में इससे बाहर निकल आई है? क्या इसे वास्तव में सही किया गया है? या क्या वह पिछली बात अभी भी तुम्हारे मौजूदा अभ्यास या तुम्हारे द्वारा अपनाए गए मार्ग को प्रभावित करती है—क्या यह अपना पर्दा (इन पर) डालती है? यदि तुम अक्सर इसका प्रभाव महसूस करते हो, तो इससे पता चलता है कि यह मुद्दा तुम्हारे दिल में पूरी तरह से हल नहीं हुआ है, और यह कि तुम्हें इसके सार का पता नहीं चला है या तुमने इससे वह सबक नहीं लिया है जो तुम्हें लेना चाहिए। यह केवल परमेश्वर को न जानने का मुद्दा नहीं है—यह कुछ ऐसा है जो इंसान के स्वभाव या सार से उत्पन्न होता है। अब यह बात कौन-सी समस्या पर विचार करने पर ज़ोर देती है? यह समस्या है, आगे का रास्ता कैसे तय किया जाए—वो अध्याय तो खत्म हो चुका है। परमेश्वर इंसान की भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के साथ इस बात के अनुसार व्यवहार करता है कि क्या इंसान अंततः सत्य को स्वीकार करने और अपनी भ्रष्टता को हल करने में सक्षम है। इसके अलावा, लोग शैतान के वंशज होते हैं, और उनका प्रकृति-सार वही होता है, चाहे उन्होंने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ किया हो या नहीं। ऐसा हो सकता है कि तुमने कुछ किया, पर किसी अन्य व्यक्ति के पास ऐसा करने का मौका न रहा हो। और चूँकि तुमने वो किया, तुम्हें अपने दिल में स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर के प्रति तुम्हें कैसा रवैया अपनाना चाहिए, तुम्हें उसके समक्ष कौन से उत्तर प्रस्तुत करने चाहिए, और उसे क्या चाहिए। जब तुम इन चीज़ों को पूरी तरह से समझ लेते हो और पूरी स्पष्टता के साथ उनको मानते हो, उनका वैसे ही अनुकरण करते हो जैसा कि तुम्हें करना चाहिए, और उस बात से प्रभावित और विवश नहीं होते हो, बल्कि आगे का मार्ग उसी तरह लेते हो जैसा कि तुम्हें लेना चाहिए—तो इसे हमेशा के लिए पीछे छोड़ दो, फिर तुम अपना कर्तव्य उसी तरह निभाओ जैसा तुम्हें करना चाहिए। एक अर्थ में, अपना कर्तव्य निभाना अब पिछले अपराधों का प्रायश्चित करने का एक तरीका है। यह नकारात्मक लिहाज़ है, और हालांकि यह बहुत वांछनीय नहीं, यह वो न्यूनतम स्वीकार्य मानसिकता है जो तुम्हारे पास होनी चाहिए। एक अन्य लिहाज़ से, तुम्हें अग्रसक्रिय होना चाहिए, और कहना चाहिए: "अतीत में मैंने जो भी किया हो, अब मैं परमेश्वर की इच्छा और सत्य को समझता हूँ। मुझे अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए कि मैं वह सब अर्पित कर दूँ जिसे अर्पित करने में मैं सक्षम हूँ—परमेश्वर को अर्पित कर देने के लिए। मुझे अपनी ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह से पूरा करना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। एक सृजित प्राणी को यही करना चाहिए"। तुम्हें सकारात्मक लिहाज़ से प्रवेश करना चाहिए। चाहे तुम्हारे पास परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ हों, या तुम अपनी भ्रष्टता को उजागर करके उसके स्वभाव को नाराज़ करते हो, तुम्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए और सत्य की तलाश करनी चाहिए। अपना सबक सीखो, और अतीत की उस नकारात्मक चीज़ को तुम्हें प्रभावित न करने दो। इसे अपने पीछे छोड़ दो, एक ही बार में, और हमेशा के लिए।

"मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग कार्य करते समय अपनी इच्छा के अनुसार चलते हैं। वे सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और केवल यह स्वीकार करते हैं कि वे अभिमानी हैं, उन्होंने केवल इसलिए भूल की क्योंकि वे सत्य से अनभिज्ञ हैं। अपने दिलों में, वे शिकायत भी करते हैं, "कोई और ज़िम्मेदारी उठाने आगे नहीं आता है, बस मैं ही ऐसा करता हूँ, और अंत में, मैं ज़िम्मेदारी में फँस जाता हूँ। यह मेरी बेवकूफ़ी है। मैं अगली बार ऐसा नहीं करूँगा, मैं आगे नहीं आऊँगा। हमेशा आगे आने वाले ही मारे जाते हैं!" इस रवैये के बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या यह पश्चाताप का रवैया है? (नहीं)। यह कैसा रवैया है? अपनी गलती के चलते वे धूर्त और धोखेबाज़ बन जाते हैं—गलतियाँ इंसान को बहुत कुछ सिखाती हैं, इसे यूँ भी कहा जा सकता है। "मैं भाग्यशाली हूँ कि उसके कारण कोई आपदा नहीं आई। अगर मेरी वजह से कोई आपदा आई होती, तो मैं नरक में जाता और नष्ट कर दिया जाता। मुझे भविष्य में और अधिक सावधान रहना होगा।" वे सत्य की तलाश नहीं करते, बल्कि मामले को संभालने और उससे निपटने के लिए अपने ओछेपन और धूर्त योजनाओं का प्रयोग करते हैं। क्या वे इस तरह से सत्य को हासिल कर सकते हैं? वे ऐसा नहीं कर सकते—वे पश्चाताप करना नहीं जानते। पश्चाताप करते समय सबसे पहले यह जानना होता है कि तुमने क्या किया है और यह समझना होता है कि तुमने कहाँ भूल की है, समस्या का सार क्या है, और तुमने कैसा स्वभाव प्रकट किया है; इन बातों पर आत्म-चिंतन करो और उन्हें स्वीकार करो, फिर सत्य के अनुसार अभ्यास करो। यही पश्चाताप का रवैया है। दूसरी ओर, यदि समस्या पर विचार करने का तुम्हारा तरीका पहले की तुलना में अधिक धूर्ततापूर्ण होता है, और तुम्हारी तरकीबें और भी अधिक चालाकी भरी और गुप्त हैं, और तुम्हारे पास इससे निपटने के और भी तरीके हैं, तो समस्या सिर्फ़ धोखेबाज़ होने भर की नहीं है। तुम छलपूर्ण साधनों का उपयोग कर रहे हो और तुम्हारे पास ऐसे रहस्य हैं जिन्हें तुम प्रकट नहीं करोगे, और जो तुम कर रहे हो वह बुराई है। परमेश्वर तुम्हें अत्यधिक कठोर और दुष्ट समझता है, एक ऐसा व्यक्ति जो सतही रूप से तो यह मानता है कि उसने भूल की है और वह काट-छाँट और निपटने को स्वीकार करता है, फिर भी जिसमें पश्चाताप के रवैये का लेशमात्र भी नहीं होता है। ऐसा इसलिए है कि घटना के बाद या उसके दौरान, तुम सत्य के अनुसार कतई अभ्यास नहीं करते, और न ही तुम उसकी तलाश करते हो। तुम्हारा रवैया, समस्या को हल करने या उससे बच निकलने के लिए, शैतान के तरीकों, तरकीबों और फलसफे का उपयोग करने का होता है, इसे सफ़ाई से एक पुलिंदे में लपेट लेने का होता है, ताकि दूसरों को समस्या का कोई नामोनिशान न मिले, और न ही पुलिंदे से कोई सुराग़ मिले—और अंततः तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सयाने हो। ये वे चीज़ें हैं जो परमेश्वर को नज़र आती हैं, बजाय इसके कि तुम वास्तव में आत्म-चिंतन करो, पश्चाताप करो और उस मामले के सामने ही, जो आ पड़ा है, अपने पाप को स्वीकार कर लो, फिर सत्य की तलाश करो और सत्य के अनुसार अभ्यास करो। तुम्हारा रवैया सत्य की तलाश या उसका अभ्यास करने का नहीं है, न ही यह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करने का है, बल्कि समस्या को हल करने के लिए शैतान की तरकीबों और तरीकों का उपयोग करने का है। तुम दूसरों को अपने बारे में एक ग़लत धारणा देते हो और परमेश्वर द्वारा उजागर किए जाने का विरोध करते हो, और परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जिन परिस्थितियों का आयोजन किया है, उनके प्रति तुम टकरावपूर्ण और रक्षात्मक होते हो। इसका मतलब है, तुम्हारा दिल पहले से ज्यादा अवरुद्ध है। यदि तुम परमेश्वर के प्रति ज्यादा अवरुद्ध हो, तो क्या तुम तब भी शांति और आनंद के साथ प्रकाश में रह सकते हो? अब और नहीं—तुमने सत्य और परमेश्वर को नकार दिया है। क्या ऐसी स्थिति लोगों में व्याप्त है? "इस बार मेरे साथ निपटा गया था। अगली बार, मुझे अधिक सावधान, और अधिक सयाना बनना होगा। सयाना बनना जीवन की नींव होती है—और जो लोग सयाने नहीं होते हैं, वे बेवकूफ़ होते हैं।" यदि तुम इस तरह से खुद का मार्गदर्शन कर रहे हो और खुद को आगे बढ़ा रहे हो, तो क्या तुम कभी भी, कहीं भी पहुँच पाओगे? क्या तुम सत्य को हासिल कर पाओगे? यदि कोई समस्या तुम पर आ पड़ती है और तुम सत्य की तलाश कर सकते हो, तो तुम सत्य के एक पहलू को समझ सकते हो और सत्य के उस पहलू को प्राप्त कर सकते हो। सत्य को समझने से क्या हासिल हो सकता है? जब तुम सत्य के एक पहलू को समझते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के एक पहलू को समझ लेते हो, और तुम यह समझ लेते हो कि परमेश्वर ने तुम्हारे पास इस चीज़ को क्यों आने दिया, क्यों वह तुमसे ऐसी माँग करेगा, क्यों वह तुम्हें इस तरह से ताड़ना देने और अनुशासित करने के लिए परिस्थितियों का आयोजन करेगा, क्यों वह तुम्हें अनुशासित करने के लिए इस मामले का उपयोग करेगा, और क्यों तुम इस मामले में गिरे, असफल हुए, और उजागर किए गए हो। यदि तुम इन चीज़ों को समझ सकते हो, तो तुम सत्य की तलाश करने में सक्षम होंगे और जीवन-प्रवेश हासिल करोगे। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझ सकते और इन तथ्यों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि विरोध और प्रतिरोध पर, खुद की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अपनी ही तरकीबों का उपयोग करने पर, एक झूठे चेहरे के साथ अन्य सभी का और परमेश्वर का सामना करने पर, ज़ोर देते हो, तो तुम सत्य को हासिल करने में हमेशा असमर्थ रहोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

हमें संकल्प लेना चाहिए कि हमारी परिस्थितियाँ चाहे जितनी गंभीर हों, चाहे जिस प्रकार की कठिनाई हम पर टूटें, हम चाहे जितने कमज़ोर हों, या जितने नकारात्मक हों, हमें न तो स्वभावगत परिवर्तन में, और न ही परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों में अपना विश्वास खोना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य से एक वादा किया था, और यह वादा प्राप्त करने का संकल्प और लगन मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। परमेश्वर कायरों को पसंद नहीं करता है, परमेश्वर संकल्पवान लोगों को पसंद करता है। हो सकता है कि तुमने बहुत भ्रष्टता प्रकट की हो, तुम कई कुटिल राहों पर चले हो, या कई उल्लंघन किए हों, या पहले परमेश्वर की अवज्ञा की हो; वैकल्पिक रूप से, हो सकता है कुछ लोगों के दिलों में परमेश्वर के प्रति निंदा, या शिकायतें, या अवज्ञा हो—लेकिन परमेश्वर इन चीज़ों को नहीं देखता है, परमेश्वर केवल यह देखता है कि क्या वे किसी दिन बदलेंगे या नहीं। बाइबल में, अपव्ययी पुत्र की वापसी के बारे में एक कहानी है। प्रभु यीशु ने ऐसी एक नीतिकथा क्यों सुनाई? मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की इच्छा सच्ची और खरी है। वह लोगों को पश्चाताप करने के अवसर और बदलने के अवसर देता है। इस प्रक्रिया के दौरान, वह लोगों को समझता है और उसे उनकी कमज़ोरियों और उनकी भ्रष्टता के विस्तार का गहरा ज्ञान होता है। वह जानता है कि वे लड़खड़ाएँगे और गिरेंगे। यह वैसा ही है जब बच्चे चलना सीखते हैं : तुम्हारा शरीर चाहे जितना भी मज़बूत हो, ऐसे समय होंगे जब तुम लड़खड़ा जाते हो, और ऐसे भी समय होंगे जब तुम ठोकर खाकर गिर जाते हो। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को वैसे ही समझता है जैसे माँ अपने बच्चे को समझती है। वह प्रत्येक व्यक्ति की कठिनाइयाँ समझता है, वह प्रत्येक व्यक्ति की कमज़ोरियाँ समझता है, और वह प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताएँ भी समझता है; इतना ही नहीं, वह समझता है कि स्वभावगत परिवर्तन में प्रवेश करने की प्रक्रिया में लोग कैसी समस्याओं का सामना करेंगे, वे किस प्रकार की कमज़ोरियों का नुक़सान उठाएँगे, किस प्रकार की विफलताएँ आएँगी—ऐसा कुछ नहीं है जो परमेश्वर इससे बेहतर समझता हो। इस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के अंतर्तम हृदय को सूक्ष्मता से देखता है। तुम चाहे जितने कमज़ोर हो, जब तक तुम परमेश्वर का नाम त्यागते नहीं हो, जब तक तुम परमेश्वर को छोड़कर नहीं जाते हो, और जब तक तुम उसके मार्ग से भटकते नहीं हो, तब तक स्वभावगत परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर सदैव तुम्हारे पास होगा। हमारे पास स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर होने का अर्थ यह है कि हमारे पास बचे रहने की आशा है, और हमारे पास बचे रहने की आशा होने का अर्थ यह है कि हमारे पास परमेश्वर के उद्धार की आशा है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या होते हैं स्वभाव में परिवर्तन, और स्वभाव में परिवर्तनों का मार्ग' से उद्धृत

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