143. बीमारियों का सामना करने के सिद्धांत

(1) मानव जाति को शैतान द्वारा इतनी गहराई से भ्रष्ट कर दिया गया है कि बारंबार होने वाली बीमारी उसके लिए सामान्य बन गई है। बिना शिकायत के और परमेश्वर को दोष दिए बिना, व्यक्ति को भ्रष्टता को कैसे दूर किया जाए, इस बारे में उन बीमारियों से सबक लेना चाहिए।

(2) किसी को यूं ही बीमारी नहीं हो जाती है। बीमार पड़ने पर, व्यक्ति को परमेश्वर के सामने आना चाहिए और इस बात की जाँच करनी चाहिए कि क्या उसने कोई उल्लंघन किया है, और पश्चाताप में उसे कबूल करना चाहिए।

(3) बीमारी की उपस्थिति परमेश्वर का प्रेम है। व्यक्ति को सत्य की तलाश करनी चाहिए और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए, और बीमार होने पर भी, उसे अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना चाहिए और बिल्कुल अंत तक निष्ठावान बने रहना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करता है।

(4) बीमार होने पर, यह पीड़ित व्यक्ति का चुनाव होता है कि वह चिकित्सा-संबंधी सेवा ले, या केवल विश्वास के भरोसे रहे। जो सबसे ज्यादा अर्थपूर्ण होता है वह है, स्वयं को जानने में सक्षम होना और अपनी भ्रष्टता को शुद्ध करना, जिससे परमेश्वर की इच्छा के साथ अनुकूलता निश्चित होती है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्य जीवन-भर जन्म, मृत्यु, बीमारी और वृद्धावस्था के कारण जो सहता है उसका स्त्रोत क्या है? किस कारण लोगों को ये चीज़े झेलनी पड़ीं? जब मनुष्य को पहली बार सृजित किया गया था तब ये चीजें नहीं थीं। है ना? तो फिर, ये चीज़ें कहाँ से आईं? वे तब अस्तित्व में आयीं जब शैतान ने इंसान को प्रलोभन दिया और उनकी देह पतित हो गयी। मानवीय देह की पीड़ा, उसकी यंत्रणा और उसका खोखलापन साथ ही मानवीय दुनिया की दयनीय दशा, ये सब तभी आए जब शैतान ने मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। जब मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तब वह उसे यंत्रणा देने लगा। परिणामस्वरूप, मनुष्य अधिकाधिक अपभ्रष्ट हो गया। मनुष्य की बीमारियाँ अधिकाधिक गंभीर होती गईं, और उसका कष्ट अधिकाधिक घोर होता गया। मनुष्य, मानवीय दुनिया के खोखलेपन, त्रासदी और साथ ही वहाँ जीवित रहने में अपनी असमर्थता को ज़्यादा से ज़्यादा महसूस करने लगा, और दुनिया के लिए कम से कमतर आशा महसूस करने लगा। इस प्रकार, यह दुःख मनुष्य पर शैतान द्वारा लाया गया था।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर द्वारा जगत की पीड़ा का अनुभव करने का अर्थ' से उद्धृत

बीमारी से पीड़ित होना लोगों के लिए एक कठिनाई होती है, क्योंकि कुछ बीमारियाँ किसी भी समय उनके जीवन को खतरे में डाल सकती हैं। वास्तव में, यदि लोगों को परमेश्वर में सचमुच आस्था हो, तो पहली बात जो उन्हें जाननी चाहिए, वह यह है कि उनका जीवनकाल उसके हाथों में है। जब परमेश्वर लोगों को बीमारी देता है, तो यह उनको बीमारी जैसी लगती है, लेकिन, वास्तव में, उन्हें जो दिया गया है, वह बीमारी नहीं बल्कि अनुग्रह होता है। लोगों को पहले इस तथ्य को पहचानना चाहिए और इसके बारे में सुनिश्चित होना चाहिए, और इसे गंभीरता से लेना चाहिए। जब लोग बीमारी से पीड़ित होते हैं, तो वे अक्सर परमेश्वर के सामने आ सकते हैं, और विवेक और सावधानी के साथ, वह करना सुनिश्चित कर सकते हैं जो उन्हें करना चाहिए, और दूसरों की तुलना में अधिक सावधानी और परिश्रम के साथ अपना कर्तव्य निभा सकते हैं। जहाँ तक लोगों का सवाल है, यह एक सुरक्षा है, बंधन नहीं। यह चीजों को सँभालने का नकारात्मक तरीका है। इसके अलावा, हर व्यक्ति का जीवन परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित किया गया है। यदि कोई बीमारी सतही तौर पर प्राणांतक दिखाई देती है, लेकिन परमेश्वर के नज़रिये से तुम्हारा समय अभी नहीं आया है और तुम्हारा लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है, तो वह तुम्हें नहीं ले जाएगा। यदि तुम मरने वाले नहीं हो, तो चाहे तुम प्रार्थना न करो, या तुम अपनी देखभाल न करो, या अपनी स्थिति को गंभीरता से न लो, या इसे इलाज करवाने के लिए ज्यादा गंभीर मामले के रूप में न देखो, तुम मर नहीं सकते। यदि परमेश्वर ने तुम्हें कोई काम सौंपा है, और तुम्हारा लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है, तो वह तुम्हें मरने नहीं देगा, बल्कि अंतिम क्षण तक तुम्हें जीवित रखेगा। क्या तुम्हें इस पर विश्वास है? यदि नहीं, तो तुम निरंतर प्रार्थना करते हुए यह कहोगे, "परमेश्वर! मुझे अपना काम पूरा करना है। मैं अपने अंतिम दिनों को तुम्हारे प्रति संपूर्ण भक्ति में बिताना चाहता हूँ, ताकि मुझे कोई पछतावा न रह जाए!" तुम बार-बार इस तरह के बहाने बनाओगे और परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने के प्रयास में ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करोगे। हकीक़त में, चाहे तुम अधिक समय के लिए सौदेबाजी करने की कोशिश करो, या अपनी बीमारी को बिल्कुल गंभीरता से न लो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; परमेश्वर के नज़रिये से, जब तक तुम अपने कर्तव्य को पूरा कर सकते हो और अभी भी काम के हो, और जब तक वह अभी भी तुम्हारा उपयोग करना चाहता है और ऐसा करने के लिए दृढ़-संकल्प है—यदि तुम्हारा मरना तय नहीं है—तो तुम नहीं मर सकते, क्योंकि परमेश्वर ने दुनिया बनाने से पहले तुम्हारे जीवन-काल का निर्धारण कर दिया था। क्या तुम्हें इस पर विश्वास है? यदि तुम इसे केवल एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हो, तो तुम्हारी कार्रवाई एक कार्रवाई से अधिक कुछ नहीं होगी; यदि तुम अपने दिल की गहराई से स्वीकार करते हो कि ईश्वर ऐसा करेगा, तो तुम्हारे काम और अभ्यास करने के तरीकों में कई बदलाव होंगे। बेशक, कोई बीमार हो या न हो, जहाँ तक स्वास्थ्य को बनाए रखने का संबंध है, सभी लोगों को अपना जीवन कुछ सामान्य ज्ञान के साथ जीना चाहिए। यदि तुम बीमार पड़ते हो, तो तुम्हें अपनी बीमारी का इलाज करने का कुछ सामान्य ज्ञान भी होना चाहिए। यह कुछ ऐसा है, जो लोगों को खुद करना चाहिए। किंतु, किसी बीमारी का इस तरह से इलाज करने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए निर्धारित जीवन-काल को चुनौती दी जाए, और न ही तुम्हें यह गारंटी देने के लिए ऐसा करना चाहिए कि तुम उसके द्वारा निर्धारित जीवन-काल तक जीवित रहोगे ही। इसका क्या मतलब है? इसे इस तरह से पेश किया जा सकता है: एक निष्क्रिय तौर पर, यदि तुम अपनी बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते हो, तुम्हारा जो भी कर्तव्य है उसे फिर भी पूरा करते हो, और दूसरों की तुलना में थोड़ा अधिक विश्राम कर लेते हो, यदि तुमने अपने कर्तव्य में विलंब नहीं किया है, तो क्या तुम्हारी बीमारी बदतर हो जाएगी? ऐसा नहीं होगा, न ही इससे तुम्हारी मृत्यु होगी, जो इस पर निर्भर है कि परमेश्वर क्या करता है। दूसरे शब्दों में, यदि परमेश्वर की निगाह में, तुम्हारा पूर्वनिर्धारित जीवन-काल अभी तक पूरा नहीं हुआ है, तो भले ही तुम बीमार पड़ जाओ, वह तुम्हें मरने नहीं देगा। यदि तुम्हारी बीमारी प्राणांतक नहीं है, लेकिन तुम्हारा समय आ गया है, तो परमेश्वर जब चाहे तुम्हें ले जाएगा। क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर की मरज़ी की दया पर निर्भर नहीं है? यह उसके पूर्व-निर्धारण की दया पर है! तुम्हें इस बात को इसी तरह से देखना चाहिए। तुम अपना काम कर सकते हो और डॉक्टर के पास जा सकते हो, कुछ दवा ले सकते हो, अपने स्वास्थ्य की देखभाल कर सकते हो और व्यायाम कर सकते हैं, लेकिन तुम्हें गहराई से यह समझने की आवश्यकता है कि व्यक्ति का जीवन परमेश्वर के हाथों में है, और व्यक्ति का जीवन-काल परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है। परमेश्वर ने जो पूर्व निर्धारित किया है, कोई उसके परे नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे पास इतनी छोटी-सी समझ भी नहीं है, तो तुम्हें वास्तव में विश्वास नहीं है, और तुम वास्तव में परमेश्वर में आस्था नहीं रखते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

बीमारी के प्रारंभ का अनुभव कैसे किया जाना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसकी इच्छा को समझने की तलाश में उसके सामने आना चाहिए, और यह जाँचना चाहिए कि तुमसे क्या भूल हुई थी, या तुम्हारे भीतर वे कौनसे भ्रष्ट स्वभाव हैं जिन्हें तुम हल नहीं कर सकते हो। तुम पीड़ा के बिना अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल नहीं कर सकते। लोगों को पीड़ा से ग्रस्त करना ही होगा; इसके बाद ही वे स्वच्छंद होना बंद करेंगे और सदा परमेश्वर के सामने जिएँगे। जब दुख का सामना करना पड़ेगा, तो लोग हमेशा प्रार्थना करेंगे। उस समय भोजन, वस्त्र, या मौज-मस्ती का कोई विचार नहीं होगा; अपने दिल में, वे बस प्रार्थना करेंगे, और यह जाँचेंगे कि क्या उन्होंने इस दौरान कोई भी भूल की है। ज्यादातर समय, जब लोग किसी गंभीर बीमारी या असामान्य रोग से घिर जाते हैं, और इससे उन्हें बहुत पीड़ा होती है, तो ये चीजें अनायास ही नहीं होती; चाहे तुम बीमार हो या स्वस्थ, इन सब के पीछे परमेश्वर की इच्छा होती है। आम तौर पर जब पवित्र आत्मा काम करता है, तो तुम्हें लगता है कि सब कुछ ठीक है। जब तुम अच्छे स्वास्थ्य में होते हो, तो तुम परमेश्वर की तलाश करने में सक्षम होते हो, लेकिन कठिनाई की शुरुआत होते ही, तुम यह नहीं कर पाते, और न ही तुम यह जानते हो कि इसे कैसे करें। तुम केवल बीमारी के बीच रहते हो, केवल यह सोचते हुए कि तुम कैसे ठीक हो सकते हो ताकि तुम जल्दी से इससे बाहर निकल आओ। ऐसे समय में तुम उन लोगों से ईर्ष्या करते हो जिन्हें कोई बीमारी नहीं है, और तुम इस बीमारी से जल्द से जल्द बाहर निकलना चाहते हो—यह एक नकारात्मक और प्रतिरोधी मनोदशा है। कभी-कभी, लोग मन में सोचते हैं, "क्या यह बीमारी मेरी अपनी मूर्खता के कारण हुई थी, या इसके पीछे परमेश्वर की इच्छा है?" कुछ बीमारियाँ सामान्य होती हैं, जैसे जब तुम्हें सर्दी हो जाती है या तुम अत्यधिक आंतरिक गर्मी से पीड़ित होते हो, या तुम्हें फ्लू होता है। लेकिन किसी भी गंभीर बीमारी के होते ही—जब तुम बीमारी से बिस्तर पर पड़ जाते हो, और जब, जैसे अचानक ही, जीवन असहनीय हो जाता है—उस तरह का संवेदन या बीमारी कोई दुर्घटना नहीं होती है। बीमारी या दर्द की शुरुआत में, क्या तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और परमेश्वर की तलाश करते हो? और क्या पवित्र आत्मा तुम्हें बस प्रबुद्ध और रोशन ही करता है? यह उसके कार्य करने का एकमात्र तरीका नहीं है। परमेश्वर लोगों का परीक्षण कैसे करता है? क्या यह उन्हें पीड़ा में डालकर नहीं किया जाता? जहाँ भी परीक्षण होते हैं, वहाँ दर्द होता है—बिना परीक्षणों के लोग कैसे पीड़ित हो सकते हैं? और लोग बिना कष्ट के कैसे बदल सकते हैं? जब परीक्षणों के साथ दर्द होता है, तो यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। कभी-कभी परमेश्वर लोगों को पीड़ा देता है, अन्यथा वे स्वर्ग की ऊँचाइयों या पृथ्वी की गहराइयों से अनजान ही रहेंगे, और वे धृष्ट हो जाएँगे। कुछ मामलों में, केवल सत्य पर संगति करने पर भरोसा रखने से समस्या हल नहीं होगी। अन्य लोग तुम्हारी समस्या की ओर संकेत करते हैं, और तुम स्वयं भी इसके बारे में जानते हो, लेकिन तुम बदलने में असमर्थ रहते हो। चाहे तुम आत्म-संयम बरतने के लिए अपनी इच्छाशक्ति पर कितना ही भरोसा करो, शायद इस हद तक कि अपने ही चेहरे पर चाँटा जड़ दो और अपना सर पीट लो, पर कुछ भी समस्या को हल नहीं करता है, क्योंकि तुम्हारी प्रकृति अभी भी तुम में मौजूद है। यह एक जीती-जागती चीज होती है, यह मनुष्य के जीवंत विचारों की तरह होती है, और यह किसी भी समय प्रकट हो सकती है। यदि तुम इसे हल नहीं कर सकते, तो तुम क्या कर सकते हो? लोगों को कुछ बीमारियों द्वारा परिष्कृत किया जाना जरूरी है, और जब यह होता है, तो कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पीड़ा को सहन नहीं कर पाते और वे प्रार्थना और तलाश करना शुरू कर देते हैं। बीमार होने से पहले, तुम स्वच्छंद और ढीठ होते हो, लेकिन बीमारी तुम्हें अच्छी तरह से व्यवहार करना सिखाती है। क्या तुम अभी भी धृष्ट बने रह सकते हो? जब तुम्हारा हर शब्द कमजोर हो, क्या तब भी तुम लोगों को भाषण दे सकते हो, क्या तुम तब भी अहंकारी रह सकते हो? ऐसे समय में, तुम और कुछ भी नहीं माँगते हो, केवल दर्द को खत्म करना चाहते हो, और तुम यह सब नहीं सोचते कि क्या खाएँ, क्या पहनें, किसका आनंद लें। तुम लोगों में से अधिकांश को अभी तक ऐसी भावना का अनुभव नहीं हुआ है। जब तुम्हें यह अनुभव होगा, तब तुम समझोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज को सत्य की आँखों से देखो' से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, समस्त पदार्थों का मुखिया, अपने सिंहासन से अपनी राजसी शक्ति का निर्वहन करता है। वह समस्त ब्रह्माण्ड और सब वस्तुओं पर राज और सम्पूर्ण पृथ्वी पर हमारा मार्गदर्शन करता है। हम हर क्षण उसके समीप होंगे, और एकांत में उसके सम्मुख आयेंगे, एक पल भी नहीं खोयेंगे और हर समय कुछ न कुछ सीखेंगे। हमारे इर्द-गिर्द के वातावरण से लेकर लोग, विभिन्न मामले और वस्तुएँ, सबकुछ उसके सिंहासन की अनुमति से अस्तित्व में हैं। किसी भी वजह से अपने दिल में शिकायतें मत पनपने दो, अन्यथा परमेश्वर तुम्हें अनुग्रह प्रदान नहीं करेगा। बीमारी का होना परमेश्वर का प्रेम ही है और निश्चित ही उसमें उसके नेक इरादे निहित होते हैं। हालाँकि, हो सकता है कि तुम्हारे शरीर को कुछ पीड़ा सहनी पड़े, लेकिन कोई भी शैतानी विचार मन में मत लाओ। बीमारी के मध्य परमेश्वर की स्तुति करो और अपनी स्तुति के मध्य परमेश्वर में आनंदित हो। बीमारी की हालत में निराश न हो, खोजते रहो और हिम्मत न हारो, और परमेश्वर तुम्हें अपने प्रकाश से रोशन करेगा। अय्यूब का विश्वास कैसा था? सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वशक्तिशाली चिकित्सक है! बीमारी में रहने का मतलब बीमार होना है, परन्तु आत्मा में रहने का मतलब स्वस्थ होना है। जब तक तुम्हारी एक भी सांस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।

पुनरुत्थित मसीह का जीवन हमारे भीतर है। निस्संदेह, परमेश्वर की उपस्थिति में हममें विश्वास की कमी रहती है : परमेश्वर हममें सच्चा विश्वास जगाये। परमेश्वर के वचन निश्चित ही मधुर हैं! परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दुष्टों और शैतान को शर्मिन्दा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वे शेष सब बातों को दूर कर सर्वत्र शान्ति बहाल करते हैं। विश्वास एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है: जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से चिपके रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो आत्म बलिदान करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मज़बूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं। अगर मनुष्य कायरता और भय के विचार रखते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान ने उन्हें मूर्ख बनाया है क्योंकि उसे इस बात का डर है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर में प्रवेश कर जायेंगे। शैतान अपने विचारों को हम तक पहुँचाने में हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने प्रकाश से रोशन करे, अपने भीतर मौजूद शैतान के ज़हर से छुटकारा पाने के लिए हमें हर पल परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। हमें हमेशा अपनी आत्मा के भीतर यह अभ्यास करना चाहिए कि हम परमेश्वर के निकट आ सकें और हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर का प्रभुत्व होने देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6' से

कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें कुछ परिस्थितियों में डालता है, या तुमसे निपटने के लिए कुछ लोगों का उपयोग करता है, जिससे तुम्हें परेशान होना पड़े और तुम्हें सबक सिखाया जा सके; यही वह काम है जो आज परमेश्वर करता है, यह उस काम का एक पहलू है। एक और पहलू यह है कि परमेश्वर तुम्हारे शरीर पर पीड़ा लाता है। यह ऐसा ही है जैसाकि पौलुस हमेशा कहा करता था कि उसके शरीर में एक काँटा था। वह किस काँटे की बात कर रहा था? वह बीमारी थी। वह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी बीमारी क्या थी : यह उसके स्वभाव, उसकी प्रकृति पर आधारित था। इस काँटे के बिना, यदि वह बीमारी से घिरा हुआ न होता, तो किसी भी समय, किसी भी स्थान पर, वह अपना ही राज्य स्थापित करने की कोशिश कर सकता था, लेकिन जब वह बीमार पड़ गया, तो उसने ऐसा करने की ऊर्जा खो दी। और इसलिए, रोग अक्सर लोगों के लिए एक "सुरक्षात्मक छाता" होता है। यदि तुम बीमार नहीं होते, अगर तुम ठीक-ठाक रहते, तो शायद तुम कुछ बुराई, या कोई नुकसान, करने लगते। जब तुम धृष्ट और स्वच्छंद होते हो, तो तुम कुछ अनुचित कर सकते हो, और जब तुम किसी मुसीबत का कारण बनोगे, तो तुम इसका पछतावा करोगे, और जो कुछ होगा वह अब तुम पर निर्भर नहीं करेगा। इसलिए थोड़ी बीमारी एक अच्छी बात होती है, यह लोगों की रक्षा करती है। हो सकता है कि तुम अन्य लोगों की कठिनाइयों को हल करने में सक्षम हो जाओ और अपनी सोच के साथ जुड़ी समस्याओं को भी हल कर सको। यदि तुम्हारी बीमारी ठीक नहीं होती है, तो तुम इसके बारे में कुछ भी नहीं कर सकते हो। जब तुम बीमार पड़ते हो, तो यह वास्तव में तुम्हारे वश में नहीं होता है। जब तुम बीमार हो जाते हो और चाहे तुम जो भी करो, यह ठीक नहीं होती है, तो यह दर्द तुम्हारा बकाया ऋण है, इसलिए इससे दूर भागने की कोशिश मत करो। तुम्हें प्रार्थना, तलाश और समर्पण करना होगा और तुम्हें परमेश्वर के इरादों को जानने की कोशिश करनी होगी : "हे परमेश्वर! मुझे पता है कि मैं भ्रष्ट हूँ, कि मेरी प्रकृति बुरी है, कि मैं उन चीजों को करने के लिए उद्धत रहता हूँ, जो तुम्हारे खिलाफ विद्रोह हैं और तुम्हारा विरोध करती हैं, ऐसी चीज़ें जो तुम्हें पीड़ा और कष्ट देती हैं, इसलिए यह अच्छा है कि तुमने मुझे यह बीमारी दी है। मुझे इसके प्रति समर्पण करना चाहिए। लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे प्रबुद्ध करो, कि तुम मुझे तुम्हारी इच्छा को जानने की अनुमति दो, और मुझे समझाओ कि तुम मुझमें क्या बदलोगे और परिपूर्ण करोगे। मैं केवल यह माँगता हूँ कि तुम मेरा मार्गदर्शन करो, कि तुम मुझे मानव जीवन के मार्ग की दिशा को समझने की अनुमति दो, कि तुम मुझे इस सत्य को समझने दो।" तुम्हें तलाश और प्रार्थना करनी चाहिए। यह सोचकर भ्रमित न बनो, "यह कुछ भी नहीं है। मैंने निश्चित रूप से परमेश्वर को नाराज नहीं किया है।" इतने हल्के ढंग से निष्कर्ष पर मत कूद पड़ो। यदि परमेश्वर वास्तव में तुम्हारे दिल में है, तो तुम पर जो कुछ भी आ पड़ता है, तुम उसे जाने न दोगे। तुम प्रार्थना और तलाश करोगे, तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर की इच्छा को समझोगे, और जब परमेश्वर यह देखेगा कि तुम कितने आज्ञाकारी हो, तो वह धीरे-धीरे तुम्हारे दर्द को कम कर देगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज को सत्य की आँखों से देखो' से उद्धृत

चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी क्यों न हो, तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख अवश्य आना चाहिए—यही सही है। अपने कर्तव्य के निर्वाह में कोई विलंब किए बिना तुम्हें अपने बारे में चिंतन-मनन करना चाहिए। पर इतना चिंतन-मनन भी न करते रहो कि अपना कर्तव्य ही न निभा पाओ—वह गलत होगा। चाहे तुम्हारे सामने कोई भी परीक्षण क्यों न हो, तुम्हें इसे परमेश्वर द्वारा दिए गए एक बोझ के रूप में देखना चाहिए। कुछ लोगों को कोई बड़ी बीमारी और असहनीय कष्ट झेलने पड़ते हैं, और कुछ मृत्यु का भी सामना करते हैं। उन्हें इस तरह की स्थिति को कैसे देखना चाहिए? कई मामलों में परमेश्वर के परीक्षण एक बोझ होते हैं जो वह लोगों को देता है। परमेश्वर तुम्हें कितना भी भारी बोझ क्यों न दे, तुम्हें उस बोझ का भार उठाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर तुम्हें समझता है, और यह जानता है कि तुम वह बोझ उठा पाओगे। परमेश्वर तुम्हें जो बोझ देता है, वह तुम्हारी कद-काठी, या तुम्हारी सहनशक्ति की अधिकतम सीमा से अधिक नहीं होगा; इसलिए तुम निश्चित रूप से उसे वहन करने में सक्षम होगे। परमेश्वर चाहे तुम्हें किसी भी तरह का बोझ या किसी भी तरह का परीक्षण दे, एक बात याद रखो : प्रार्थना करते समय चाहे तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ पाओ या नहीं, चाहे तुम पवित्र आत्मा का प्रबोधन और प्रकाश प्राप्त कर पाओ या नहीं; और इस परीक्षण द्वारा परमेश्वर चाहे तुम्हें अनुशासित कर रहा हो या तुम्हें चेतावनी दे रहा हो, अगर तुम इसे नहीं समझ पाते हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर तुम अपना वह कर्तव्य निभाना नहीं छोड़ते, जो तुम्हें अवश्य निभाना चाहिए, और निष्ठापूर्वक उसका निर्वाह करते रहते हो, तो परमेश्वर तुमसे संतुष्ट रहेगा और तुम अपनी गवाही में मजबूती से खड़े रहोगे। यह देखकर कि वे किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं और मरने वाले हैं, कुछ लोग मन ही मन सोचते हैं, "मैंने मौत से बचने के लिए ही परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था—लेकिन ऐसा लगता है कि इतने वर्षों तक अपना कर्तव्य निभाने के बाद भी वह मुझे मरने देगा। मुझे अपना व्यवसाय देखना चाहिए और अपना कर्तव्य निभाना भूल जाना चाहिए।" यह क्या रवैया है? तुम इतने वर्षों से अपना कर्तव्य निभा रहे हो, तुमने ये तमाम उपदेश सुने हैं, और फिर भी तुमने सत्य को नहीं समझा। एक परीक्षण तुम्हें डगमगा देता है, तुम्हें घुटनों पर ले आता है, तुम्हें बेनकाब कर देता है। क्या इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर द्वारा देखभाल किए जाने के योग्य है? उनमें जरा-सी भी निष्ठा नहीं है। तो इतने वर्षों तक उन्होंने अपना जो कर्तव्य निभाया है, उसे क्या कहते हैं? इसे "सेवा करना" कहते हैं, और वे सिर्फ मेहनत करते रहे हैं। अगर परमेश्वर में अपनी आस्था और सत्य की खोज में तुम यह कहने में सक्षम हो, "परमेश्वर कोई भी बीमारी या अप्रिय घटना मेरे साथ होने दे—परमेश्वर चाहे कुछ भी करे—मुझे आज्ञापालन करना चाहिए, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जगह पर रहना चाहिए। अन्य सभी चीजों से पहले मुझे सत्य के इस पहलू—आज्ञापालन—को अभ्यास में लाना चाहिए, मैं इसे कार्यान्वित करता हूँ और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की वास्तविकता को जीता हूँ। साथ ही, परमेश्वर ने जो आदेश मुझे दिया है और जो कर्तव्य मुझे निभाना चाहिए, मुझे उनका परित्याग नहीं करना चाहिए। यहाँ तक कि अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी मुझे अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।" क्या यह गवाही देना नहीं हुआ? जब तुम्हारा इस तरह का संकल्प होता है और तुम्हारी इस तरह की अवस्था होती है, तो क्या तब भी तुम परमेश्वर की शिकायत कर सकते हो? नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकते। ऐसे समय तुम्हें मन ही मन सोचना चाहिए, "परमेश्वर ने मुझे यह साँस दी है, उसने इन तमाम वर्षों में मेरा पोषण किया है, उसने मुझसे बहुत-सा दर्द लिया है और मुझे बहुत-सा अनुग्रह और बहुत-से सत्य दिए हैं। मैंने ऐसे बहुत-से सत्यों और रहस्यों को समझा है, जिन्हें लोग कई पीढ़ियों से नहीं समझ पाए हैं। मैंने परमेश्वर से इतना कुछ पाया है, इसलिए मुझे भी परमेश्वर को कुछ लौटाना चाहिए! पहले मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था, मैं कुछ भी नहीं समझता था, और मैं जो कुछ भी करता था, उससे परमेश्वर को दुख पहुँचता था। हो सकता है, मुझे परमेश्वर को लौटाने का भविष्य में और अवसर न मिले। मेरे पास जितना भी समय बचा हो, मुझे अपनी बची हुई थोड़ी-सी शक्ति अर्पित करके परमेश्वर के लिए वह सब करना चाहिए जो मैं कर सकता हूँ, ताकि परमेश्वर यह देख सके कि उसने इतने वर्षों से मेरा जो पोषण किया है, वह व्यर्थ नहीं गया, बल्कि फलदायक रहा है। मुझे परमेश्वर को और दुखी या निराश करने के बजाय उसे सुख पहुँचाना चाहिए।" इस तरह सोचने के बारे में तुम्हारा क्या विचार है? यह सोचकर अपने आपको बचाने और कतराने की कोशिश न करो कि "यह बीमारी कब ठीक होगी? जब यह ठीक हो जाएगी, तो मैं अपना कर्तव्य निभाने का भरसक प्रयास करूँगा और निष्ठावान रहूँगा। मैं बीमार होते हुए निष्ठावान कैसे रह सकता हूँ? मैं एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे निभा सकता हूँ?" जब तक तुम्हारे पास एक भी साँस बची है, क्या तुम अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम नहीं हो? जब तक तुम्हारे पास एक भी साँस बची है, क्या तुम परमेश्वर को शर्मिंदा न करने में सक्षम हो? जब तक तुम्हारे पास एक भी साँस बची है, जब तक तुम्हारा मस्तिष्क स्वस्थ है, क्या तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत न करने में सक्षम हो? अभी "हाँ" कहना बड़ा आसान है, पर यह उस समय इतना आसान नहीं होगा जब यह सचमुच तुम्हारे साथ घटेगा। और इसलिए, तुम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए, अकसर सत्य पर कठिन परिश्रम करना चाहिए, और यह सोचने में ज्यादा समय बिताना चाहिए कि "मैं परमेश्वर की इच्छा पूरी कैसे कर सकता हूँ? मैं परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान कैसे कर सकता हूँ? मैं सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे निभा सकता हूँ?" सृजित प्राणी क्या होता है? क्या सृजित प्राणी का कर्तव्य सिर्फ परमेश्वर के वचनों को सुनना है? नहीं—उसका कर्तव्य परमेश्वर के वचनों को जीना है। परमेश्वर ने तुम्हें इतना सारा सत्य दिया है, इतना सारा मार्ग और इतना सारा जीवन दिया है, ताकि तुम इन चीजों को जी सको और उसकी गवाही दे सको। यही है, जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य के बारंबार चिन्‍तन से ही मार्ग मिलता है' से उद्धृत

जैसे ही कुछ लोगों को कोई मामूली बीमारी होती है, वे अपने दिमाग को झकझोर देते हैं और उस बीमारी का इलाज करने के लिए सभी तरीकों को आज़माते हैं, लेकिन, चाहे वे कुछ भी करें, उन्हें ठीक नहीं किया जा सकता। जितना अधिक वे बीमारी का इलाज करते हैं, उतनी ही वह गंभीर होती जाती है। वे यह जानने के लिए कि वास्तव में वे बीमार क्यों हुए, या अपनी बीमारी की जड़ खोजने के लिए परमेश्वर के सामने बिलकुल नहीं आते; वे अपने आप सोचते हैं कि इसे कैसे सँभालना है। नतीजतन, सभी तरीकों का इस्तेमाल करने के बावजूद, उनकी बीमारी तब तक बनी रहती है, जब तक वे उसे ठीक करने की कोशिश करना बंद नहीं कर देते, उनके ऐसा करते ही वह अचानक गायब हो जाती है और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता। कोई अन्य व्यक्ति एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो सकता है, जो मामूली नज़र आती हो, और वह कह सकता है, "यह तो कुछ भी नहीं है; मुझे इस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। मैं सिर्फ परमेश्वर में अपना भरोसा रखूँगा"—और फिर एक दिन, वह अचानक चल बसता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि से, पृथ्वी पर इस व्यक्ति का लक्ष्य पूरा हो चुका है, इसलिए परमेश्वर उसे ले जाता है। ऐसे लोग हैं, जो बीमार पड़े बिना ही मर जाते हैं, और किसी बड़ी बीमारी से ग्रस्त ऐसे लोग भी हैं, जो मरते नहीं हैं, और दस-बीस साल और जी लेने में भी सक्षम होते हैं। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर ने क्या पूर्व-निर्धारित किया है। यदि तुम इसे मानते हो, तो तुम्हें परमेश्वर पर सच्चा विश्वास है। यदि, समय के साथ, तुम्हारी बीमारी बिगड़ जाती है और उसे नियंत्रण में लाने के लिए तुम्हें कुछ दवा लेनी पड़ती है, तो अपनी दवा सामान्य रूप से लो और कुछ व्यायाम करो; आराम करो, और शांति से अपनी स्थिति का इलाज करो। इस रवैये के बारे में तुम क्या सोचते हो? यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाले लोगों द्वारा अपनाया जाने वाला रवैया है। तुम दवा या इंजेक्शन नहीं लेते, और व्यायाम नहीं करते या अपने स्वास्थ्य को बनाए नहीं रखते, लेकिन फिर भी बेहद चिंतित रहते हो, और निरंतर प्रार्थना करते हो। तुम कहते हो, "हे परमेश्वर, मुझे अपना कर्तव्य निभाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। मैंने अभी तक अपना लक्ष्य पूरा नहीं किया है। मेरी एक इच्छा है और मैंने संकल्प किया है, केवल तुम ही मुझे अंतिम समय तक जीवित रहने दे सकते हो, और केवल तुम ही मेरी इच्छा पूरी कर सकते हो। मैं नहीं मर सकता; यदि मैं मर गया, तो मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने में सक्षम नहीं हूँगा। मैं एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करना चाहता हूँ; मैं तुम्हें महिमा-मंडित करना और अंत तक तुम्हारी स्तुति करना चाहता हूँ। मैं तुम्हारी महिमा का दिन देखना चाहता हूँ।" सतह पर, तुम्हारे दवा या सुई लेने से इनकार करने से तुम्हें ऐसा लग सकता सकता है कि तुम बहुत मज़बूत हो और परमेश्वर में तुम्हारी भरपूर आस्था है, लेकिन तुम्हारा विश्वास दरअसल सरसों के बीज से भी छोटा है : तुम भयभीत हो, और परमेश्वर में तुम्हें कोई भरोसा नहीं है। क्या हुआ? यह कैसे हो गया कि तुम्हें परमेश्वर में सच्चा विश्वास नहीं है? मनुष्य उस दृष्टिकोण, उन सिद्धांतों और तरीकों को बिलकुल समझ नहीं पाता, जिनसे सृष्टिकर्ता, सृजित प्राणियों पर विचार करता है; लोग यह अनुमान लगाने के लिए अपने स्वयं के तुच्छ संदेहों, धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करते हैं कि परमेश्वर क्या करेगा। यदि परमेश्वर तुम्हें जीने देता है, तो तुम दुरुस्त रहोगे, चाहे तुम्हारी बीमारी कितनी भी गंभीर क्यों न हो; यदि वह तुम्हें जीने नहीं देने वाला, तो तुम्हें मरना चाहिए, और तुम्हें मरना ही होगा, भले ही तुम ज़रा भी बीमार न हो। यह जानना ही सच्चा ज्ञान और सच्चा विश्वास है। तो, क्या परमेश्वर बिना सोचे-समझे लोगों को बीमार कर देता है? यह बिना सोचे-समझे नहीं है; यह उनकी आस्था को परिष्कृत करने का एक तरीका है। यह दुख लोगों को सहना ही चाहिए। यदि वह तुम्हें बीमार करता है, तो उससे बचने की कोशिश न करो; यदि वह ऐसा नहीं करता, तो इसके लिए अनुरोध न करो। सब सृष्टिकर्ता के हाथों में है, और लोगों को यह सीखना चाहिए कि प्रकृति को उसकी राह पर चलने दें। प्रकृति क्या है? प्रकृति में कुछ भी बिना सोचे-समझे नहीं होता; यह सब परमेश्वर से आता है। यह सत्य है। एक ही बीमारी से पीड़ित लोगों में से कुछ मर जाते हैं और अन्य जीवित रहते हैं; यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्व निर्धारित कर दिया गया था। यदि तुम जीवित रह सकते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक वह लक्ष्य पूरा नहीं किया है, जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया था। तुम्हें उसे पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए और इस समय को सँजोना चाहिए; इसे बरबाद मत करो। बात इतनी ही है। यदि तुम बीमार हो, तो इससे बचने की कोशिश न करो, और यदि तुम बीमार नहीं हो, तो इसके लिए अनुरोध न करो। किसी भी मामले में, तुम केवल अनुरोध करके वह प्राप्त नहीं कर सकते, जो तुम चाहते हो, और न ही तुम किसी बात से इसलिए बच सकते हो कि तुम बचना चाहते हो। परमेश्वर ने जो करने का निश्चय किया है, उसे कोई नहीं बदल सकता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग बीमार पड़ते ही प्रार्थना करने लगते हैं, लेकिन प्रार्थना पूरी होने के बाद खुद को बेहतर न देखकर, वे बस बीमारी में जीते रहते हैं, लगातार शिकायत करते हुए, वे कहते हैं, "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, लेकिन उसने मुझे ठीक नहीं किया है। मैं दिन भर बीमार पड़ा रहता हूँ...।" और शिकायत करना खत्म करने के बाद, वे मर जाते हैं। यदि परमेश्वर तुम्हारे देह को हटा देता है और तुम्हें नरक में ढकेल देता है, तो तुम्हारा काम तमाम हो जाएगा—तुम्हारे पास तब उद्धार की कोई संभावना न रहेगी। यदि तुम मर जाते हो और नरक में जाते हो, तो तुम्हारी आत्मा जब्त हो जाएगी। यदि उद्धार का कार्य अपने अंतिम चरण में पहुँच जाता है, और तुम अभी भी नहीं बचाए गए हो, तो क्या तुम्हारे पास एक और मौका होगा? तुम्हारे पास और कोई मौका न होगा! यदि तुम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के दौरान नष्ट हो गए हो, तो तुम्हारा गंतव्य पहले ही निर्धारित हो चुका होगा। वृद्धावस्था की बीमारी से तुम नहीं मरोगे; तुम्हारी मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं होगी—तुम दंडित होने से मरोगे। और जो लोग दंडित होने से मर जाते हैं उनके पास अब उद्धार का कोई मौका नहीं होता है, और उन्हें कहीं भी दंडित किया जा सकता है! क्या पौलुस को इतने समय से पाताल लोक में सजा नहीं दी गई है? दो हजार साल हो गए हैं, और उसे अभी भी वहाँ सजा दी जा रही है! यदि तुम जान-बूझकर पाप करते हो तो तुम और भी अधिक परेशानी में हो—तुम्हारी सजा तो और भी अधिक गंभीर होगी!

कुछ लोग कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि पवित्र आत्मा का कार्य कुछ समय से मेरे लिए अनुपस्थित रहा है। मैं हमेशा बीमार पड़ता रहा हूँ और अस्वस्थ महसूस करता रहा हूँ, और मुझे हमेशा कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।" यह बात सही है। कभी पवित्र आत्मा एक तरह से काम करता है, और कभी दूसरी तरह से; कभी-कभी वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है, कुछ सत्यों को समझाने के लिए वह सहभागिता का उपयोग करता है, और कभी-कभी वह तुम्हें समझाने के लिए परिस्थितियों का उपयोग करता है, ऐसी परिस्थितियों का जिनमें तुम्हें परीक्षित, संतुलित और प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि तुम्हारा विकास हो सके। बहरहाल, कुछ बीमारियाँ मानव निर्मित होती हैं। वे इसलिए होती हैं कि तुम नहीं जानते कि तुम्हें खुद की देखभाल कैसे करनी है या अपने स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखना चाहिए, जिस मामले में तुम्हें अधिक चौकस होना चाहिए। लेकिन चाहे बीमारी मानव निर्मित हो या पवित्र आत्मा द्वारा दी गई हो, यह हमेशा तुम्हारे प्रति परमेश्वर का विशेष अनुग्रह ही होती है, ताकि तुम एक सबक सीख सको, और इसलिए, तुम्हें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और शिकायत नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक शिकायत तुम पर एक दाग है, एक पाप है, जिसे साफ नहीं किया जा सकता है! जब तुम एक बार शिकायत करते हो, तो तुम्हारी स्थिति को पलटने में कितना समय लगेगा? जब तुम कुछ नकारात्मक हो जाते हो, तो अपने आपको फिर से सही करने में एक महीने का समय भी लग सकता है; जब तुम शिकायत करते हो, और कुछ नकारात्मक बातें कहते हो, तो हो सकता है कि तुम एक साल के भीतर भी अपने आपको फिर से सही नहीं कर पाओ, और पवित्र आत्मा अपना कार्य रोक देगा। शिकायत करना एक गंभीर मामला होता है। पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करना तुम्हारे लिए और भी कठिन हो जाता है। पवित्र आत्मा का थोड़ा-सा काम भी हासिल करने के लिए, प्रार्थना में बहुत प्रयास करना पड़ता है, और अपनी मानसिकता को पूरी तरह पलट देना कोई आसान काम नहीं होता; इसे केवल सत्य की तलाश करके ही हल किया जा सकता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज को सत्य की आँखों से देखो' से उद्धृत

ऐसा कोई इंसान नहीं होता जिसका पूरा जीवन दुखों से मुक्त हो। किसी को पारिवारिक परेशानी, किसी को काम-धंधे की, किसी को शादी-विवाह की और किसी को शारीरिक-व्याधि की परेशानी। हर कोई कष्ट झेलता है। कुछ लोग कहते हैं, "लोगों को कष्ट क्यों उठाना पड़ता है? अगर हमारा पूरा जीवन सुख-शांति से बीतता, तो कितना अच्छा होता। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दुख ही न आएँ?" नहीं—सभी को दुख भोगने होंगे। दुख इंसान को जीवन की असंख्य संवेदनाओं का अनुभव कराते हैं, फिर चाहे ये संवेदनाएं सकारात्मक हों, नकारात्मक हों, सक्रिय हों या निष्क्रिय हों; दुख तुम्हारे अंदर तरह-तरह के एहसास और समझ पैदा करता है, जो तुम्हारे पूरे जीवन का अनुभव होते हैं। यदि तुम सत्य की खोज करके उसमें से परमेश्वर की इच्छा का पता लगा सको, तो तुम परमेश्वर द्वारा दिए गए लक्ष्यों के करीब पहुंच जाओगे। यह एक पहलू है और यह लोगों को अधिक अनुभवी बनाने के लिए भी है। दूसरा पहलू वह जिम्मेदारी है जो परमेश्वर मनुष्य को देता है। कौन-सी जिम्मेदारी? इस पीड़ा से गुजरने की जिम्मेदारी। तुम्हें यह पीड़ा सहनी ही है। यदि तुम इसे सह पाओ, तो यह गवाही है। अगर किसी को कोई रोग हो जाए तो वह इस बात से डरता है कि यदि लोगों को पता चल गया तो यह बड़े शर्म की बात होगी, जबकि इसमें शर्म वाली कोई बात नहीं है। एक सामान्य इंसान के नाते, अगर बीमारी के चलते, तुम परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित विभिन्न प्रकार के दुख झेलते हुए भी सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा पाते हो, परमेश्वर द्वारा सामान्य तौर पर तुम्हें दिए गए आदेशों को पूरा कर पाते हो, तो यह गवाही है और इससे शैतान शर्मिंदा और पराजित होता है। इसलिए हर सृजित प्राणी और हर व्यक्ति को किसी भी प्रकार के कष्ट को स्वीकार कर उसके प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। तुम्हें इसे इस तरह समझना चाहिए, यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है और यही परमेश्वर का इरादा है। परमेश्वर हर सृजित प्राणी के लिए इनकी व्यवस्था करता है। परमेश्वर द्वारा तुम्हें इन स्थितियों और हालात में डालने का अर्थ तुम्हें जिम्मेदारी, दायित्व और आदेश देने के बराबर ही है। इसलिए तुम्हें उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। क्या यह सत्य नहीं है? यदि यह परमेश्वर की ओर से आता है, यदि परमेश्वर तुमसे ऐसी अपेक्षा करता है, तो यही सत्य है। इसे सत्य क्यों कहा जाता है? क्योंकि यदि तुम इन वचनों को सत्य के तौर पर स्वीकार कर लेते हो, तो जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आएगी, तब ये वचन तुम्हारी अवधारणाओं और विद्रोह को दूर कर पाएँगे, तुम उनके कारण समस्या से आसानी से निकलकर गवाही दे पाओगे, वे तुम्हें परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं जाने देंगे या परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं करने देंगे। यदि तुम परमेश्वर द्वारा प्रस्तुत स्थितियों और हालात के प्रति समर्पित हो पाते हो, तो तुम सत्य समझते हो, और यदि तुम ऐसी गवाही दे पाओ, तो तुम शैतान को शर्मिंदा करते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

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