169. परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर से प्रेम करने के अभ्यास में, व्यक्ति को सबसे पहले असावधान या लापरवाह हुए बिना, अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना चाहिए। अपने जमीर के कारण, परमेश्वर के प्यार को लौटाने आओ।

(2) परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम बनो, और अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर कर दो। सभी मामलों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करो और परमेश्वर का भय मानो तथा बुराई से दूर रहो।

(3) एक ईमानदार व्यक्ति होने की कोशिश करने में सक्षम बनो, परमेश्वर के साथ वास्तव में वार्तालाप करो, धारणाओं, अलगाव, और ग़लतफ़हमी से छुटकारा पा लो, और सभी मामलों में परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दर्शाने में सक्षम बनो।

(4) परमेश्वर के आदेश को ज़िम्मेदारी और सावधानी से स्वीकार करने में सक्षम बनो। अपने कार्यों में सिद्धांतवादी बनो, और एक ऐसे व्यक्ति बनो जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करता हो।

(5) परमेश्वर के कार्य को जानो, उसके नेक इरादों को समझो, उसकी धार्मिकता और पवित्रता से प्रेम करो, और सभी मामलों में उसे उत्कर्ष पर पहुँचाने और उसकी गवाही देने में सक्षम हो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर का सार मनुष्य के विश्वास मात्र के लिए नहीं है; इससे भी बढ़कर यह मनुष्य के प्रेम के लिए है। परंतु परमेश्वर में विश्वास करने वालों में से बहुत-से लोग यह "रहस्य" खोज पाने में अक्षम हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करने का साहस नहीं करते, न ही वे उसे प्रेम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कभी खोजा ही नहीं कि परमेश्वर के विषय में प्रेम करने लायक कितना कुछ है; उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से प्रेम करता है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है। परमेश्वर की सुंदरता उसके कार्य में अभिव्यक्त होती है : लोग उसकी सुंदरता को तभी खोज सकते हैं जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं; केवल अपने वास्तविक अनुभवों में ही वे परमेश्वर की सुंदरता को महसूस कर सकते हैं; और वास्तविक जीवन में इसका अवलोकन किए बिना कोई परमेश्वर की सुंदरता को नहीं खोज सकता। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है, परंतु लोग उसके साथ वास्तव में जुड़े बिना इसे खोज पाने में अक्षम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुडने में असमर्थ होते, और यदि वे उसके साथ वास्तव में नहीं जुड़ पाते, तो वे उसके कार्य को अनुभव भी नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अत्यधिक झूठ और कल्पना से दूषित होता। स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति प्रेम उतना वास्तविक नहीं है जितना पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति प्रेम है, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाय उस पर आधारित होने के, जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा है और जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब लोग उसके वास्तविक कर्मों और उसकी सुंदरता को देख पाते हैं, और वे उसके व्यवहारिक और सामान्य स्वभाव का सब कुछ देख सकते हैं, जो पूरा का पूरा स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान की अपेक्षा हजारों गुना अधिक वास्तविक है। स्वर्ग के परमेश्वर से लोग चाहे जितना भी प्रेम करते हों, इस प्रेम के विषय में कुछ भी वास्तविक नहीं है, और यह पूरी तरह मानवीय विचारों से भरा हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम चाहे जितना भी कम क्यों न हो, यह प्रेम वास्तविक है; अगर यह बहुत थोड़ा-सा भी है, तो भी यह वास्तविक है। परमेश्वर वास्तविक कार्य के माध्यम से उसे जानने के लिए लोगों को उत्प्रेरित करता है, और इस ज्ञान के माध्यम से वह उनका प्रेम प्राप्त करता है। यह पतरस के समान है : यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु को इतना चाह पाना असंभव होता। इसी तरह, यीशु के प्रति उसकी वफादारी भी यीशु से उसके जुड़ाव पर ही आधारित थी। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करे, इसीलिए परमेश्वर मनुष्यों के बीच आया है और मनुष्य के साथ रहता है, और वह मनुष्य को जो भी दिखाता और अनुभव कराता है, वही परमेश्वर की वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर की सुंदरता का स्वाद चखना चाहिए और परमेश्वर की सुंदरता को देखना चाहिए; केवल तभी उनमें परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय जागृत हो सकता है, एक ऐसा हृदय जो लोगों को अपना सर्वस्व निष्ठापूर्वक परमेश्वर के लिए देने को प्रेरित करता है। परमेश्वर लोगों को वचनों और अभिव्यक्तियों के माध्यम से, या उनकी कल्पना के माध्यम से अपने से प्रेम नहीं कराता, और न ही वह अपने से प्रेम करने के लिए उन्हें बाध्य करता है। इसकी बजाय वह उन्हें उनकी इच्छा से अपने से प्रेम करने देता है, और वह अपने कार्य और कथनों में उन्हें अपनी सुंदरता को देखने देता है, जिसके बाद उनमें परमेश्वर के प्रति प्रेम जन्म लेता है। केवल इसी तरह लोग सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं तो इसलिए नहीं कि दूसरों ने उनसे ऐसा करने का आग्रह किया है, न ही यह कोई क्षणिक भावनात्मक आवेग होता है। वे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी सुंदरता देखी है, उन्होंने देखा है कि उसमें कितना कुछ है जो लोगों के प्रेम के योग्य है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का उद्धार, बुद्धि और आश्चर्यजनक कर्म देखे हैं—और परिणामस्वरूप, वे सचमुच परमेश्वर का गुणगान करते हैं, और सचमुच उसके लिए तड़पते हैं, और उनमें ऐसा जुनून उत्पन्न हो जाता है कि वे परमेश्वर को प्राप्त किए बिना जीवित नहीं रह सकते। जो सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे उसकी शानदार गवाही इसलिए दे पाते हैं क्योंकि उनकी गवाही परमेश्वर के सच्चे ज्ञान और उसके लिए सच्ची तड़प की नींव पर टिकी होती है। ऐसी गवाही किसी भावनात्मक आवेग के अनुसार नहीं, बल्कि परमेश्वर और उसके स्वभाव के उनके ज्ञान के अनुसार दी जाती है। चूँकि वे परमेश्वर को जानने लगे हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि उन्हें परमेश्वर की गवाही निश्चित रूप से देनी चाहिए, और उन सबको जो परमेश्वर के लिए तड़पते हैं, परमेश्वर को जानने, और परमेश्वर की सुंदरता एवं उसकी वास्तविकता से अवगत होने का अवसर मिलना चाहिए। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम की तरह उनकी गवाही भी स्वतः स्फूर्त होती है, वह वास्तविक होती है और उसका महत्व एवं मूल्य वास्तविक होता है। वह निष्क्रिय या खोखली और अर्थहीन नहीं होती। जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं केवल उन्हीं के जीवन में सर्वाधिक मूल्य और अर्थ होता है, और केवल वही लोग क्यों परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, इसका कारण यह है कि ये लोग परमेश्वर के प्रकाश में रह पाते हैं और परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जी पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अंधकार में नहीं जीते, बल्कि प्रकाश में जीते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर द्वारा धन्य किया गया जीवन जीते हैं। केवल वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं, केवल वे ही परमेश्वर के गवाह हैं, केवल वे ही परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हैं, और केवल वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कर पाते हैं। वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के अंतरंग हैं; वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, और वे परमेश्वर के साथ आशीषों का आनंद ले सकते हैं। केवल ऐसे लोग ही अनंत काल तक जीवित रहेंगे, और केवल वे ही हमेशा के लिए परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहेंगे। परमेश्वर लोगों द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है, और वह सभी लोगों द्वारा प्रेम किए जाने योग्य है, परंतु सभी लोग परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम नहीं हैं, और न ही सभी लोग परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं और परमेश्वर के सामर्थ्य में सहभागी हो सकते हैं। चूँकि परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग ही परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित कर पाते हैं, इसलिए वे स्वर्ग के नीचे कहीं भी घूम सकते हैं और कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता, और वे पृथ्वी पर शक्ति का प्रयोग और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन कर सकते हैं। ये लोग दुनिया भर से एक-साथ आए हैं। वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और उनकी त्वचा के रंग भिन्न-भिन्न हैं, परंतु उनके अस्तित्व का समान अर्थ है; उन सबके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय है, वे सब एक ही गवाही देते हैं, और उनका एक ही संकल्प और एक ही इच्छा है। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे समूचे संसार में कहीं भी स्वतंत्रता से घूम सकते हैं; और जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे संपूर्ण ब्रह्मांड में यात्रा कर सकते हैं। वे लोग परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए गए लोग हैं, और वे सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

आज, जब तुम लोग परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने की कोशिश करते हो, तो एक ओर तुम लोगों को कठिनाई और शोधन सहन करना चाहिए और दूसरी ओर, तुम लोगों को एक क़ीमत चुकानी चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और यह कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जो सबक सीखते हैं, वह यह है कि परमेश्वर से प्रेम कैसे करें। कहने का अर्थ यह है कि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर पर केवल विश्वास करते हो परंतु उससे प्रेम नहीं करते, और तुमने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी अपने हृदय के भीतर से आने वाले सच्चे भाव से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम व्यर्थ ही जी रहे हो, और तुम्हारा संपूर्ण जीवन सभी जीवों में सबसे अधम है। यदि अपने संपूर्ण जीवन में तुमने कभी परमेश्वर से प्रेम नहीं किया या उसे संतुष्ट नहीं किया, तो तुम्हारे जीने का क्या अर्थ है? और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या यह प्रयासों की बरबादी नहीं है? कहने का अर्थ है कि, यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। बाहरी तौर पर एक खास तरीके से कार्य करने की कोशिश करने के बजाय, उन्हें अपने हृदय की गहराइयों में असली अंतर्दृष्टि की खोज करनी चाहिए। यदि तुम गाने और नाचने के बारे में उत्साही हो, परंतु सत्य को व्यवहार में लाने में अक्षम हो, तो क्या तुम्हारे बारे में यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीज़ों में उसकी इच्छा को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करो, और यह देखने की कोशिश करो कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : जब ऐसा कुछ होता है, जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को एक तरफ़ रख दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज़ नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए, और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

जैसा कि "प्रेम" के लिए कहा जाता है, यह एक ऐसा भाव है जो पूर्ण रूप से विशुद्ध व निष्‍कलंक है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध या कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट, और कोई धूर्तता नहीं होती। प्रेम में कोई व्यापार नहीं होता और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, किसी चीज को छीनने या उसे प्राप्त करने की या कोई खास धनराशि प्राप्त करने की कोशिश नहीं करोगे। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी खुद को समर्पित करोगे, विपत्ति को सहोगे, और मेरे अनुकूल हो जाओगे, तुम अपना सर्वस्व मेरे लिए त्याग दोगे, तुम अपना परिवार, भविष्य, जवानी और विवाह तक छोड़ दोगे। वरना तुम लोगों का प्रेम, प्रेम न होकर केवल कपट और विश्वासघात होगा! तुम लोगों का प्रेम किस प्रकार का है? क्या यह सच्चा प्रेम है? या झूठा प्रेम है? तुम लोगों ने कितना त्याग किया है? तुमने कितना अर्पण किया है? मुझे तुम लोगों से कितना प्रेम प्राप्त हुआ है? क्या तुम लोग जानते हो? तुम लोगों का हृदय बुराई, विश्वासघात और कपट से भरा हुआ है, और इसके परिणामस्वरूप, तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धियाँ हैं? तुम लोग सोचते हो कि तुमने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम सोचते हो कि मेरे लिए तुम्हारा प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। किन्तु फिर तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा विद्रोही और कपटपूर्ण होते हैं? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मुझे एक तरफ़ कर देते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, परंतु फिर भी मुझ पर संदेह रखते हो? क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे स्वरूप के अनुकूल मेरे साथ व्यवहार नहीं करते और हर मोड़ पर मेरे लिए चीज़ों को मुश्किल बनाते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी तुम मेरा भय नहीं मानते। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या इस सबको प्रेम कहा जाता है? तुम लोगों ने बहुत त्याग किया है, यह सच है, परंतु तुमने उसका अभ्‍यास कभी नहीं किया जो मैं तुमसे चाहता हूँ। क्या इसे प्रेम कहा जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम का ज़रा-सा भी अंश नहीं है। इतने वर्षों के कार्य और मेरी ओर से कहे गए इतने वचनों के बाद, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह एक बार पीछे मुड़कर विचार करने योग्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'बहुत बुलाए जाते हैं, पर कुछ ही चुने जाते हैं' से उद्धृत

अब तुम सभी यह जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास सिर्फ़ आत्मा की मुक्ति और देह के कल्याण के लिए ही नहीं है, और न ही यह उसके जीवन को परमेश्वर को प्रेम करने के माध्यम से समृद्ध बनाने इत्यादि के लिए है। अपनी वर्तमान स्थिति में जैसा तुम्हारा प्रेम है, यदि तुम परमेश्वर को देह के कल्याण के लिए या क्षणिक आनंद के लिए प्रेम करते हो, तो भले ही, अंत में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम अपने शिखर पर पहुँच जाए और तुम इससे ज़्यादा और कुछ भी ना माँगो, तुम्हारे द्वारा खोजा जाने वाला यह प्रेम अशुद्ध प्रेम ही है, और यह परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला प्रेम नहीं है। वे लोग जो परमेश्वर के प्रति प्रेम का उपयोग अपने नीरस जीवन को समृद्ध बनाने और अपने हृदय के खालीपन को भरने के लिए करते हैं, ये वे हैं जिन्हें अपना जीवन आसानी से जीने का लालच है, ना कि वे जो सच में परमेश्वर को प्रेम करना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रेम जबरन होता है, यह मानसिक संतुष्टि की खोज में किया जाता है, और परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम कैसा है? तुम परमेश्वर को किस लिए प्रेम करते हो? इस समय तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकांश का प्रेम वैसा ही है जिसका पहले ज़िक्र किया गया था। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ यथास्थिति को बरकरार रख सकता है; अनन्त स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता, न ही मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ एक ऐसे फूल की तरह है जो खिलता है पर फल दिए बिना ही मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, एक बार जब तुमने परमेश्वर को इस तरीके से प्रेम कर लिया और यदि तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई नहीं है, तो तुम्हारा पतन हो जाएगा। यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ परमेश्वर को प्रेम करने के समय ही प्रेम कर सकते हो लेकिन उसके बाद तुम्हारे जीवन की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता, तो फिर तुम अंधकार के प्रभाव से बचकर नहीं निकल पाओगे, और शैतान के बंधन और चालबाज़ी से खुद को मुक्त नहीं कर पाओगे। ऐसा कोई भी मनुष्य परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सकता; आखिरकार, उसकी आत्मा, प्राण, और शरीर शैतान के ही रहेंगे। यह असंदिग्ध है। वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त नहीं हो पाएँगे, अपने मूल स्थान अर्थात वापस शैतान के पास लौट जाएँगे, और वे परमेश्वर के दंड के अगले चरण को स्वीकार करने के लिये, उस झील में जायेंगे जो आग और गंधकाश्म से जलती रहती है। परमेश्वर को वे प्राप्त होते हैं, जो शैतान को त्याग देते हैं और उसके अधिकार क्षेत्र से बच निकलते हैं। उन्हें राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिना जाता है। इस तरह से राज्य के लोग अस्तित्व में आते हैं। क्या तुम इस प्रकार के व्यक्ति बनना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर को प्राप्त होना चाहते हो? क्या तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र से बचना और वापस परमेश्वर के पास जाना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या तुम राज्य के लोगों में गिने जाते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए' से उद्धृत

मनुष्य सदा अंधकार के प्रभाव में रहा है, शैतान के प्रभाव की क़ैद में रखा गया है, बचकर निकल भी नहीं पाता, और शैतान के द्वारा संसाधित किए जाने के पश्चात्, उसका स्वभाव उत्तरोत्तर भ्रष्ट होता जाता है। कहा जा सकता है कि मनुष्य सदा ही अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के बीच रहा है और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ है। ऐसे में, यदि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे आत्मदंभ, आत्म-महत्व, अहंकार, मिथ्याभिमान इत्यादि, वह सब कुछ जो शैतान के स्वभाव का है, उतार फेंकना चाहिए। यदि नहीं, तो उसका प्रेम अशुद्ध प्रेम, शैतानी प्रेम, और ऐसा प्रेम है जो कदापि परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रत्यक्षतः पूर्ण बनाए, निपटे, तोड़े, काटे-छाँटे, अनुशासित, ताड़ित और शुद्ध किए बिना कोई परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में समर्थ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है' से उद्धृत

परमेश्वर पर विश्वास करने का मार्ग उससे प्रेम करने का मार्ग ही है। यदि तुम उस पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम करना ही चाहिए; हालाँकि उससे प्रेम करने का तात्पर्य केवल उसके प्रेम का प्रतिदान करना या उससे अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर प्रेम करना नहीं है—यह परमेश्वर के लिए शुद्ध प्रेम है। कभी-कभी लोग सिर्फ अपने विवेक के आधार पर परमेश्वर के प्रेम को महसूस करने में सक्षम नहीं होते। मैंने हमेशा क्यों कहा : "परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्माओं को प्रेरित करे"? मैंने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए लोगों के विवेक को प्रेरित करने की बात क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि लोगों का विवेक परमेश्वर की मनोहरता को महसूस नहीं कर सकता। यदि तुम इन वचनों से आश्वस्त नहीं हो, तो उसके प्रेम को महसूस करने के लिए अपने विवेक का उपयोग करो। उस पल तुम्हारे पास कुछ प्रेरणा हो सकती है, लेकिन वह जल्दी ही गायब हो जाएगी। यदि तुम परमेश्वर की मनोहरता को महसूस करने के लिए केवल अपने विवेक का उपयोग करते हो, तो प्रार्थना करते समय तो तुम प्रेरणा प्राप्त करोगे, लेकिन उसके बाद जल्दी ही वह चली जाएगी और गायब हो जाएगी। ऐसा क्यों होता है? यदि तुम केवल अपने विवेक का उपयोग करते हो, तो तुम परमेश्वर के लिए अपना प्रेम जगाने में असमर्थ होगे; जब तुम वास्तव में अपने हृदय में उसकी मनोहरता महसूस करते हो, तो तुम्हारी आत्मा उसके द्वारा प्रेरित होगी, और केवल उसी समय तुम्हारा विवेक अपनी मूल भूमिका निभाने में सक्षम होगा। अर्थात जब परमेश्वर मनुष्य की आत्मा को प्रेरित करता है और जब मनुष्य के पास ज्ञान होता है और वह हृदय में प्रोत्साहित होता है, अर्थात जब वह अनुभव प्राप्त कर लेता है, केवल तभी वह अपने विवेक से परमेश्वर को प्रभावी रूप से प्रेम करने में सक्षम होगा। अपने विवेक से परमेश्वर से प्रेम करना गलत नहीं है—यह परमेश्वर को प्रेम करने का सबसे निम्न स्तर है। "परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति बस इंसाफ करते हुए" प्रेम करना मनुष्य को सक्रिय ढंग से प्रवेश करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। जब लोग पवित्र आत्मा का कुछ कार्य प्राप्त करते हैं, यानी जब वे अपने व्यावहारिक अनुभव में परमेश्वर का प्रेम देखते और अनुभव करते हैं, जब उन्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान होता है और वे वास्तव में देखते हैं कि परमेश्वर मानव-जाति के प्रेम के कितना योग्य है और वह कितना प्यारा है, केवल तभी वे परमेश्वर को सच में प्रेम करने में सक्षम होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

यदि तुम वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना और उसके द्वारा प्राप्त किया जाना चाहते हो, तो उसका पहला चरण है, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ना। हर एक चीज़ में, जो तुम करते हो, आत्म-निरीक्षण करो और पूछो : "क्या मैं यह परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरे हृदय के आधार पर कर रहा हूँ? क्या इसके पीछे मेरे कोई निजी इरादे हैं? इसे करने में मेरा वास्तविक लक्ष्य क्या है?" यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को सौंपना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपने हृदय को वश में करना होगा, अपने सभी इरादे छोड़ देने होंगे, और पूरी तरह से परमेश्वर के लिए समर्पित होने की अवस्था हासिल करनी होगी। यह अपना हृदय परमेश्वर को देने के अभ्यास का मार्ग है। अपने हृदय को वश में करने का क्या अभिप्राय है? यह अपनी देह की अनावश्यक इच्छाओं को छोड़ देना है, रुतबे की सुविधाओं और लाभों का लालच न करना है। यह सब-कुछ परमेश्वर की संतुष्टि के लिए करना है, और अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर के लिए बनाना है, स्वयं के लिए नहीं। इतना काफी है।

परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम हृदय की गहराई से आता है; यह ऐसा प्रेम है, जिसका अस्तित्व केवल मानव के परमेश्वर के ज्ञान पर आधारित होता है। जब किसी का हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तब उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम होता है, लेकिन वह प्रेम आवश्यक रूप से शुद्ध और आवश्यक रूप से पूरा नहीं होता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यक्ति के हृदय के परमेश्वर की तरफ पूरी तरह से मुड़ जाने और उस व्यक्ति में परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके लिए वास्तविक श्रद्धा होने के बीच अब भी कुछ दूरी होती है। जिस तरीके से मनुष्य परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करता है और परमेश्वर के स्वभाव को जान पाता है, वह तरीका अपने हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ना है। जब मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है, तब वह जीवन के अनुभव में प्रवेश करना शुरू कर देता है। इस तरह से उसका स्वभाव बदलना शुरू हो जाता है, परमेश्वर के लिए उसका प्रेम धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इसलिए जीवन-अनुभव के सही मार्ग पर आने के लिए अपना हृदय परमेश्वर की तरफ मोड़ना ही एकमात्र पूर्व-शर्त है। जब लोग अपना हृदय परमेश्वर के सामने रख देते हैं, तो उनके पास केवल उसके लिए लालायित हृदय ही होता है, परंतु उससे प्रेम करने वाला हृदय नहीं होता, क्योंकि उनके पास उसकी समझ नहीं होती। हालाँकि इस परिस्थिति में उनके पास उसके लिए कुछ प्रेम होता है, लेकिन वह स्वाभाविक और सच्चा नहीं होता। इसका कारण यह है कि मनुष्य की देह से उत्पन्न होने वाली हर चीज़ भावना की पैदाइश होती है और वास्तविक समझ से नहीं आती। यह सिर्फ एक क्षणिक आवेग होता है और वह लंबे समय तक चलने वाली श्रद्धा नहीं बन सकता। जब लोगों में परमेश्वर की समझ नहीं होती, तो वे उससे केवल अपनी पसंद और व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर प्रेम कर सकते हैं; इस प्रकार के प्रेम को स्वाभाविक प्रेम नहीं कहा जा सकता, न ही इसे वास्तविक प्रेम कहा जा सकता है। व्यक्ति का हृदय वास्तविक रूप में परमेश्वर की ओर मुड़ सकता है, और वह हर चीज़ में परमेश्वर के हितों के बारे में सोचने में सक्षम हो सकता है, लेकिन अगर उसे परमेश्वर की कोई समझ नहीं है, तो वह वास्तविक रूप में स्वाभाविक प्रेम करने में सक्षम नहीं होगा। वह बस कलीसिया के लिए कुछ कार्य पूरे करने और अपने कर्तव्य का थोड़ा पालन करने में सक्षम होता है, लेकिन वह यह बिना आधार के करेगा। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव बदलना मुश्किल है; ऐसे लोग या तो सत्य का अनुसरण नहीं करते, या उसे समझते नहीं। यहाँ तक कि अगर कोई व्यक्ति अपने हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ भी लेता है, तो भी इसका यह मतलब यह नहीं कि उसका परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय पूरी तरह से शुद्ध है, क्योंकि जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर है, उनके हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम होना आवश्यक नहीं है। इसका संबंध परमेश्वर की समझ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने वालों और प्रयास न करने वालों के बीच के अंतर से है। एक बार जब व्यक्ति को उसके बारे में समझ हो जाती है, तो यह दर्शाता है कि उसका हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मुड़ गया है, इससे पता चलता है कि उसके हृदय में परमेश्वर के लिए उसका विशुद्ध प्रेम स्वाभाविक प्रेम है। केवल इस तरह के लोगों के हृदय में ही परमेश्वर होता है। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना सही मार्ग पर जाने, परमेश्वर को समझने और परमेश्वर के प्रति प्रेम प्राप्त करने की एक पूर्व-शर्त है। यह परमेश्वर से प्रेम करने का अपना कर्तव्य पूरा करने का चिह्नक (मार्कर) नहीं है, न ही यह उसके लिए वास्तविक प्रेम रखने का चिह्नक (मार्कर) है। व्यक्ति के लिए परमेश्वर के प्रति विशुद्ध प्रेम प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है अपना हृदय उसकी तरफ मोड़ना, जो कि वह पहली चीज़ भी है, जो व्यक्ति को उसकी रचना होने के नाते करनी चाहिए। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी वे लोग हैं जो जीवन की खोज करते हैं, अर्थात् वे लोग, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं; उन सभी में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता होती है और वे उसके द्वारा प्रेरित किए गए होते हैं। वे सब परमेश्वर का मार्गदर्शन पाने में सक्षम होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम अपने भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हो, तो तुम्हारे पास ऐसे वचन होंगे जो तुम कहना चाहते हो—ऐसे वचन, जो तुम्हें परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले लगते हैं—किंतु अगर तुम उन्हें न कहो तो तुम्हें भीतर से बेचैनी महसूस होगी, और उस क्षण तुम्हारे भीतर एक संघर्ष शुरू हो जाएगा : "मैं बोलूँ या नहीं?" यही संघर्ष है। इस प्रकार, हर उस चीज़ में, जिसका तुम सामना करते हो, एक संघर्ष है, और जब तुम्हारे भीतर एक संघर्ष चलता है, तो तुम्हारे वास्तविक सहयोग और पीड़ा के कारण, परमेश्वर तुम्हारे भीतर कार्य करता है। अंततः, अपने भीतर तुम मामले को एक ओर रखने में सक्षम होते हो और क्रोध स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है। परमेश्वर के साथ तुम्हारे सहयोग का ऐसा ही प्रभाव होता है। हर चीज़ जो लोग करते हैं, उसमें उन्हें अपने प्रयासों के लिए एक निश्चित क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते; वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते और केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है, जब परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो। हालाँकि ये बाहर से महत्त्वहीन लग सकती हैं, किंतु जब ये चीज़ें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम करते हो, तो तुम उसके लिए गवाही देने में अडिग रह पाओगे, और यदि तुम उसके प्रेम को अभ्यास में नहीं लाए हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, यह कि तुम सत्य से रहित हो, और जीवन से रहित हो, यह कि तुम भूसा हो! लोगों के साथ जो कुछ भी होता है, वह तब होता है जब परमेश्वर को आवश्यकता होती है कि लोग उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहें। भले ही इस क्षण में तुम्हारे साथ कुछ बड़ा घटित न हो रहा हो, और तुम बड़ी गवाही नहीं देते, किंतु तुम्हारे जीवन का प्रत्येक विवरण परमेश्वर के लिए गवाही का मामला है। यदि तुम अपने भाइयों और बहनों, अपने परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हो; यदि किसी दिन अविश्वासी आएँ और जो कुछ तुम करते हो उसकी तारीफ़ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत है, तो तुमने गवाही दे दी होगी। यद्यपि तुम्हारे पास कोई अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम्हारी क्षमता कमज़ोर है, फिर भी परमेश्वर द्वारा तुम्हारी पूर्णता के माध्यम से तुम उसे संतुष्ट करने और उसकी इच्छा के प्रति सचेत होने में समर्थ हो जाते हो और दूसरों को दर्शाते हो कि सबसे कमज़ोर क्षमता के लोगों में उसने कितना महान कार्य किया है। जब लोग परमेश्वर को जान जाते हैं और शैतान के सामने विजेता और परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादार बन जाते हैं, तब किसी में इस समूह के लोगों से अधिक आधार नहीं होता, और यही सबसे बड़ी गवाही है। यद्यपि तुम महान कार्य करने में अक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो। अन्य लोग अपनी धारणाओं को एक ओर नहीं रख सकते, लेकिन तुम रख सकते हो; अन्य लोग अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और उसके लिए ज़बर्दस्त गवाही देने के लिए अपनी वास्तविक कद-काठी और कार्यकलापों का उपयोग कर सकते हो। केवल इसी को परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करना माना जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

आज तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर किया है, उस सबके बारे में तुम कितना जानते हो? ये वे बातें हैं जो तुम्हें सीखनी चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो जो कुछ उसने मनुष्य में किया और जो कुछ उसने मनुष्य को देखने की अनुमति दी, वह इसलिए था कि मनुष्य उससे प्रेम करे और सही मायने में उसे जाने। मनुष्य यदि परमेश्वर के लिए कष्ट सहने योग्य है और यहाँ तक आ पाया है, तो यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है, दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण; इससे बढ़कर, यह न्याय और ताड़ना के कार्य के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य में कार्यान्वित किए हैं। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षण से रहित हो, और यदि परमेश्वर ने तुम्हें कष्ट नहीं दिया है, तो सच यह है कि तुम लोग परमेश्वर से सच में प्रेम नहीं करते। मनुष्य में परमेश्वर का काम जितना बड़ा होता है, और जितने अधिक मनुष्य के कष्ट होते हैं, उतना ही अधिक यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है और उतना ही अधिक उस मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर पाता है। तुम परमेश्वर से प्रेम करना कैसे सीखते हो? यातना और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षणों के बिना―और इसके अलावा यदि परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह, प्रेम और दया ही प्रदान की होती―तो क्या तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर पाते? एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाली परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी कमियों को जान पाता है और देख पाता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निकृष्ट है, और उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, उसके परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो असहनीय हो जाती है—मिटा कर रख देने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के सार को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियों को और इस बात को जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। इस प्रकार, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की यातना उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शुद्धिकरण से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से गुजरने और इस कदम पर निर्भर रहने के माध्यम से ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे। शुद्धिकरण वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं। कठिनाई के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच में शुद्धिकरण के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और कि तुम उन अनेक समस्याओं पर काबू पाने में असमर्थ हो, जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

आज अधिकांश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी संभावनाएं बहुत धूमिल होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट चरम तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तो हर प्रकार के कष्ट से तुम्हारा सामना होगा—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, तुम्हारा शोधन किया जाएगा, इसके अलावा तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहोगे और हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत बड़ी है, यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सारी वजहों से तुम्हें परिशुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से परिशुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम लोगों को यह स्पष्ट देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और उसकी कृपा पर बने रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और जोरदार गवाही है। जब शैतान तुम्हें लुभाता है तो तुम्हें यह कहना चाहिए: "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम की ताकत भी उतनी ही अधिक होगी; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़-निश्चय होगा, और तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर को प्रेम करने में बिताए गए जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अगर मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है तो वह शोक से रहित होगा। यद्यपि ऐसा समय भी होता है जब तुम्हारी देह निर्बल पड़ जाती है, और कई वास्तविक परेशानियाँ तुम्हें घेर लेती हैं, ऐसे समय में तुम सचमुच परमेश्वर पर निर्भर रहोगे, और अपनी आत्मा के भीतर तुम राहत महसूस करोगे, और एक निश्चितता का अनुभव करोगे, महसूस करोगे कि तुम्हारे पास कुछ है जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो। इस तरह, तुम कई वातावरणों पर विजय प्राप्त कर पाओगे, और इसलिए तुम अपनी यंत्रणा के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे; बल्कि तुम गीत गाना, नाचना, और प्रार्थना करना चाहोगे, तुम एकत्रित होना, संगति करना, परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहोगे, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सारे लोग, सारी वस्तुएँ और चीजें जो परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित की गई हैं वे सब उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो जिन चीजों पर भी तुम दृष्टि डालते हो वे सब तुम्हारे लिए दुःखद होंगी, कुछ भी तुम्हारी दृष्टि में सुखद नहीं होगा; अपनी आत्मा में तुम स्वाधीन नहीं बल्कि पतित होगे, तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर के बारे में शिकायत करेगा, और तुम सदैव महसूस करोगे कि तुम बहुत अधिक यातना सहते हो, और कि यह बहुत ही अन्यायपूर्ण है। यदि तुम प्रसन्नता के लिए प्रयास नहीं करते, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए और शैतान के द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए प्रयास करते हो, तो ऐसे प्रयास तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का बहुत सामर्थ्य देंगे। परमेश्वर द्वारा कही गई सारी बातें मनुष्य पूरी कर सकता है, और वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम है—वास्तविकता से सम्पन्न होने का अर्थ यही है। परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास, उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम का प्रयोग करना है; समय की परवाह किए बिना—तब भी जब दूसरे लोग सामर्थ्यहीन हैं—तुम्हारे भीतर अभी भी एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, जो बड़ी गहराई से परमेश्वर की लालसा करता है, और परमेश्वर को याद करता है। यह वास्तविक आध्यात्मिक कद है। तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना बड़ा है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना बड़ा है, इस पर कि क्या तुम परीक्षण किए जाने पर अडिग खड़े रह सकते हो, क्या तुम किसी खास परिस्थिति में होने पर कमजोर पड़ जाते हो, और क्या तुम स्थिर रह सकते हो जब तुम्हारे भाई और बहन तुम्हें ठुकरा देते हैं; इन बातों का परिणाम तुम्हें दिखाएगा कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कैसा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

कड़वे शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य बड़ी आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपनी इच्छा जगानी चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शुद्धिकरण करे, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और उसके साथ समागम की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतने ही अधिक नकारात्मक तुम बन जाओगे और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हारे लिए अपना कार्य करना आवश्यक होता है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से पूरा न करो, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने में परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम से अधिक किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है, या यह कि तुमने ख़राब किया है—तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम दंभी नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो : "हे परमेश्वर! मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मुझे सहन करें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा अंत:करण शुद्ध हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ, और यद्यपि मैं मूढ़ और मूर्ख हूँ, और मुझमें क्षमता की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू मनोहर है, और मैं वह सब-कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।" जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम उमड़ पड़ता है, और तुम अपने हृदय में बहुत अधिक राहत महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शुद्धिकरण को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने उस हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, जो उससे प्रेम करता है, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है, और मैं चाहता हूँ कि तू अपना और अधिक प्रेम मेरे भीतर निवेश कर।" यह शुद्धिकरण के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम का नींव के रूप में प्रयोग करो, तो शुद्धिकरण तुम्हें परमेश्वर के और निकट ला सकता है और तुम्हें परमेश्वर के साथ और अधिक घनिष्ठ बना सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपने हृदय को परमेश्वर पर चढ़ा दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शुद्धिकरण के दौरान तुम्हारे लिए परमेश्वर को नकारना या त्यागना असंभव होगा। इस तरह से परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पहले से अधिक घनिष्ठ और पहले से अधिक सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा समागम पहले से अधिक नियमित हो जाएगा। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे, तो तुम परमेश्वर के प्रकाश में और अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम पर आ पड़ेंगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर की गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। परमेश्वर की गवाही देकर तुम सच में उससे प्रेम करोगे, और ख़ुशी-ख़ुशी उसके लिए अपना जीवन बलिदान कर दोगे; तुम परमेश्वर के गवाह होगे, और परमेश्वर के प्रिय व्यक्ति होगे। वह प्रेम, जिसने शुद्धिकरण का अनुभव किया हो, मज़बूत होता है, कमज़ोर नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कब और कैसे तुम्हें अपने परीक्षणों का भागी बनाता है, तुम इस बात की चिंता नहीं करोगे कि तुम जीओगे या मरोगे, तुम ख़ुशी-ख़ुशी परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग दोगे, और परमेश्वर के लिए कोई भी बात ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लोगे—इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा, और तुम्हारा विश्वास वास्तविक होगा। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया और वह कई दर्दनाक अग्निपरीक्षाओं से होकर गुजरा। यह शुद्धिकरण परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव बन गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम एक तरह से परमेश्वर से प्रेम करने के अपने संकल्प के कारण रख पाया; परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह उस शुद्धिकरण और पीड़ा के कारण था, जिसमें से वह होकर गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक और ऐसी चीज़ बन गई, जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शुद्धिकरण की पीड़ा से नहीं गुजरते, तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है, और मूलत: परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। यद्यपि अपने हृदय में जो कुछ वे सोचते हैं, वह परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर ही होता है, और भले ही उनके विचार पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित और मानवीय विचारों से रहित प्रतीत होते हैं, परंतु जब उनके विचार परमेश्वर के सामने लाए जाते हैं, तो वह ऐसे विचारों को प्रशंसा या आशीष नहीं देता। यहाँ तक कि जब लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लेते हैं—जब वे उन सबको जान जाते हैं—तो इसे भी परमेश्वर से प्रेम करने का संकेत नहीं माना जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। शुद्धिकरण से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शुद्धिकरण के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ जान सकते हैं। उस समय, जब वे पुनः प्रयास करते हैं, तब वे उपयुक्त रूप से और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सत्यों को अभ्यास में ला सकते हैं; उस समय उनके मानवीय विचार कम हो जाते हैं, उनकी मानवीय भ्रष्टता घट जाती है, और उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं; केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक तैयारी से हासिल नहीं किया जा सकता, और न ही इसे केवल सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, और कि वे शुद्धिकरण के दौरान अधिक कड़वाहट से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के हृदय के अनुसार होगा। अपनी इस अपेक्षा में कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परमेश्वर यह माँग नहीं करता कि मनुष्य अपने जोश या मरज़ी का प्रयोग करके उससे प्रेम करे; केवल वफ़ादारी और उसकी सेवा के लिए सत्य के प्रयोग के माध्यम से ही मनुष्य उससे सच में प्रेम कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

जब पतरस को परमेश्वर द्वारा ताड़ना दी जा रही थी, तो उसने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मेरी देह अवज्ञाकारी है, और तू मुझे ताड़ना देकर मेरा न्याय कर रहा है। मैं तेरी ताड़ना और न्याय से खुश हूँ, अगर तू मुझे न भी चाहे, तो भी मैं तेरे न्याय में तेरा पवित्र और धार्मिक स्वभाव देखता हूँ। जब तू मेरा न्याय करता है, ताकि अन्य लोग तेरे न्याय में तेरा धार्मिक स्वभाव देख सकें, तो मैं संतुष्टि का एहसास करता हूँ। अगर यह तेरा धार्मिक स्वभाव प्रकट कर सके, सभी प्राणी तेरा धार्मिक स्वभाव देख सकें, और अगर यह तेरे लिए मेरे प्रेम को और शुद्ध बना सके ताकि मैं एक धार्मिक व्यक्ति की तरह बन सकूँ, तो तेरा न्याय अच्छा है, क्योंकि तेरी अनुग्रहकारी इच्छा ऐसी ही है। मैं जानता हूँ कि अभी भी मेरे भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो विद्रोही है, और मैं अभी भी तेरे सामने आने के योग्य नहीं हूँ। मैं चाहता हूँ कि तू मेरा और भी अधिक न्याय करे, चाहे क्रूर वातावरण के जरिए करे या घोर क्लेश के जरिए; तू मेरा न्याय कैसे भी करे, यह मेरे लिए बहुमूल्य है। तेरा प्यार बहुत गहरा है, और मैं बिना कोई शिकायत किए स्वयं को तेरे आयोजन पर छोड़ने को तैयार हूँ।" यह परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद का पतरस का ज्ञान है, यह परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम की गवाही भी है। ... पूर्ण बना दिए जाने पर, अपने जीवन के आखिरी पलों में, पतरस ने कहा "हे परमेश्वर! यदि मैं कुछ वर्ष और जीवित रहता, तो मैं तेरे और ज्यादा शुद्ध और गहरे प्रेम को हासिल करने की कामना करता।" जब उसे क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था, तो उसने मन ही मन प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! अब तेरा समय आ गया है, तूने मेरे लिए जो समय तय किया था वह आ गया है। मुझे तेरे लिए क्रूस पर चढ़ना चाहिए, मुझे तेरे लिए यह गवाही देनी चाहिए, मुझे उम्मीद है मेरा प्रेम तेरी अपेक्षाओं को संतुष्ट करेगा, और यह और ज्यादा शुद्ध बन सकेगा। आज, तेरे लिए मरने में सक्षम होने और क्रूस पर चढ़ने से मुझे तसल्ली मिल रही है और मैं आश्वस्त हो रहा हूँ, क्योंकि तेरे लिए क्रूस पर चढ़ने में सक्षम होने और तेरी इच्छाओं को संतुष्ट करने, स्वयं को तुझे सौंपने और अपने जीवन को तेरे लिए अर्पित करने में सक्षम होने से बढ़कर कोई और बात मुझे तृप्त नहीं कर सकती। हे परमेश्वर! तू कितना प्यारा है! यदि तू मुझे और जीवन बख्श देता, तो मैं तुझसे और भी अधिक प्रेम करना चाहता। मैं आजीवन तुझसे प्रेम करूँगा, मैं तुझसे और गहराई से प्रेम करना चाहता हूँ। तू मेरा न्याय करता है, मुझे ताड़ना देता है, और मेरी परीक्षा लेता है क्योंकि मैं धार्मिक नहीं हूँ, क्योंकि मैंने पाप किया है। और तेरा धार्मिक स्वभाव मेरे लिए और अधिक स्पष्ट होता जाता है। यह मेरे लिए एक आशीष है, क्योंकि मैं तुझे और भी अधिक गहराई से प्रेम कर सकता हूँ, अगर तू मुझसे प्रेम न भी करे तो भी मैं तुझसे इसी तरह से प्रेम करने को तैयार हूँ। मैं तेरे धार्मिक स्वभाव को देखने की इच्छा करता हूँ, क्योंकि यह मुझे अर्थपूर्ण जीवन जीने के और ज्यादा काबिल बनाता है। मुझे लगता है कि अब मेरा जीवन और भी अधिक सार्थक हो गया है, क्योंकि मैं तेरे लिए क्रूस पर चढ़ा हूँ, और तेरे लिए मरना सार्थक है। फिर भी मुझे अब तक संतुष्टि का एहसास नहीं हुआ है, क्योंकि मैं तेरे बारे में बहुत थोड़ा जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छाओं को संपूर्ण रूप से पूरा नहीं कर सकता, और मैंने बदले में तुझे बहुत ही कम लौटाया है। मैं अपने जीवन में तुझे अपना सब कुछ नहीं लौटा पाया हूँ; मैं इससे बहुत दूर हूँ। इस घड़ी पीछे मुड़कर देखते हुए, मैं तेरा बहुत ऋणी महसूस करता हूँ, और अपनी सारी गलतियों की भरपाई करने और सारे बकाया प्रेम को चुकाने के लिए मेरे पास यही एक घड़ी है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

मनुष्य को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। पतरस की छवि के अनुरूप अपना जीवन जीने के लिए, उसमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। मनुष्य को ज़्यादा ऊँची और गहन चीजों के लिए अवश्य प्रयास करना चाहिए। उसे परमेश्वर को अधिक गहराई एवं शुद्धता से प्रेम करने का, और एक ऐसा जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए जिसका कोई मोल हो और जो सार्थक हो। सिर्फ यही जीवन है; तभी मनुष्य पतरस जैसा बन पाएगा। तुम्हें सकारात्मक तरीके से प्रवेश के लिए सक्रिय होने पर ध्यान देना चाहिए, और अधिक गहन, विशिष्ट और व्यावहारिक सत्यों को नजरअंदाज करते हुए क्षणिक आराम के लिए पीछे नहीं हट जाना चाहिए। तुम्हारा प्रेम व्यावहारिक होना चाहिए, और तुम्हें जानवरों जैसे इस निकृष्ट और बेपरवाह जीवन को जीने के बजाय स्वतंत्र होने के रास्ते ढूँढ़ने चाहिए। तुम्हें एक ऐसा जीवन जीना चाहिए जो अर्थपूर्ण हो और जिसका कोई मोल हो; तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए या अपने जीवन को एक खिलौना नहीं समझना चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने की चाह रखने वाले व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है, और ऐसा कोई न्याय नहीं जिस पर वह अटल न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। सबसे बढ़कर, तुम्हारे अंदर ऐसी आकांक्षा और कर्मठता होनी चाहिए, न कि तुम्हें एक रीढ़विहीन और निर्बल प्राणी की तरह होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है, तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए, और अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। यह अहसास किए बिना, तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; क्या उसके बाद तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर मिलेगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और चेतना होनी चाहिए; तुम्हारा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुम्हें अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुम्हें इस योग्य होना होगा कि तुम बहुत ध्यान से यह विचार कर सको कि तुम्हें अपने जीवन के साथ कैसे पेश आना चाहिए, तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर के सम्मुख कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तुम्हें उससे कैसे प्रेम करना चाहिए कि वह ज्यादा पवित्र, ज्यादा सुंदर और बेहतर हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

लोग प्रायः परमेश्वर को ही अपना जीवन समझने की बात करते हैं, परंतु उनका अनुभव अभी उस बिंदु तक नहीं पहुंचा है। तुम बस कह भर रहे हो कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि वह प्रतिदिन तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, कि तुम प्रतिदिन उसके वचन खाते और पीते हो, और तुम प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हो, इसलिए वह तुम्हारा जीवन बन गया है। जो ऐसा कहते हैं, उनका ज्ञान बहुत उथला है। कई लोगों में कोई नींव ही नहीं होती; परमेश्वर के वचन उनमें बोए तो गए हैं, किंतु उन्हें अभी अंकुरित होना है, उन पर फल लगना तो और भी दूर की बात है। आज, तुमने किस सीमा तक अनुभव किया है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें यहाँ तक आने के लिए बाध्य करने के बाद ही, अब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ सकते। एक दिन, जब तुम्हारा अनुभव एक निश्चित बिंदु तक पहुँच गया होगा, तब यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़कर जाने के लिए कहे, तो तुम नहीं जा पाओगे। तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम अपने भीतर परमेश्वर के बिना हो ही नहीं सकते; तुम पति, पत्नी या बच्चों के बिना, परिवार के बिना, माता या पिता के बिना, देह के आनंदों के बिना हो सकते हो, परंतु तुम परमेश्वर के बिना नहीं हो सकते। परमेश्वर के बिना होना अपना जीवन खो देने जैसा होगा; तुम परमेश्वर के बिना नहीं जी पाओगे। जब तुम इस बिंदु तक अनुभव कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास का लक्ष्य पा लिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन गया होगा, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन गया होगा। तुम फिर कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे। जब तुम इस सीमा तक अनुभव कर लोगे, तब तुमने परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले लिया होगा, और जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा पर्याप्त निकट संबंध होगा, तब वह तुम्हारा जीवन, तुम्हारा प्रेम होगा, और उस समय तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, तू मेरा जीवन है, मैं अन्य हर चीज के बिना रह सकता हूँ—पर तेरे बिना मैं नहीं जी सकता।" यही लोगों की सच्ची कद-काठी है; यही वास्तविक जीवन है। कुछ लोग आज जितनी दूर आए हैं, वहाँ तक आने के लिए उन्हें बाध्य किया गया है : वे चाहें या न चाहें उन्हें चलते जाना है, और उन्हें हमेशा लगता है कि वे दो पाटों के बीच फँस गए हैं। तुम्हें ऐसा अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि यदि परमेश्वर को तुम्हारे हृदय से दूर ले जाया जाए, तो यह जीवन खो देने जैसा होगा; परमेश्वर अवश्य ही तुम्हारा जीवन होना चाहिए, और तुम्हें उसे छोड़ने में अवश्य ही असमर्थ होना चाहिए। इस तरह, तुमने वास्तव में परमेश्वर का अनुभव कर लिया होगा, और इस समय, जब तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तब तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करोगे, और यह एक विलक्षण, विशुद्ध प्रेम होगा। एक दिन, जब तुम्हारे अनुभव ऐसे होंगे कि तुम्हारा जीवन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच चुका होगा, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे, और परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तब तुम अंदर से परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, न ही तुम उसे चाहकर भी भूल पाओगे। परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन चुका होगा; तुम संसार को भूल सकते हो, तुम अपनी पत्नी, पति या बच्चों को भूल सकते हो, किंतु परमेश्वर को भूलने में तुम्हें कष्ट होगा—ऐसा करना असंभव होगा, यही तुम्हारा सच्चा जीवन और परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम है। जब परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तब किसी भी दूसरे के प्रति उनका प्रेम परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम के बराबर नहीं होता; परमेश्वर से उनका प्रेम सबसे पहले आता है। इस तरह तुम अन्य सब कुछ छोड़ पाते हो, और परमेश्वर से सारे व्यवहार और काट-छाँट स्वीकार करने के इच्छुक होते हो। जब तुमने परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम प्राप्त कर लिया जो अन्य सबसे बढ़कर हो, तब तुम वास्तविकता में और परमेश्वर के प्रेम में जिओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

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