109. परमेश्वर और मनुष्यों के अनुसरण के बीच भेद करने के सिद्धांत

(1) पुष्टि करो कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है, और सभी मामलों में सत्य की तलाश करो। केवल इसी तरह कोई मनुष्य के बजाय परमेश्वर का अनुसरण कर सकता है।

(2) परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच के अंतर को समझो, और मनुष्य के सार को भाँपने में सक्षम बनो। केवल इसी तरह कोई व्यक्ति अन्य मनुष्यों से आशा रखने की समस्या को जड़ से समाप्त कर सकता है।

(3) यह परमेश्वर की व्यवस्था और उसका प्रशासनिक आदेश है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले मनुष्य को सिंचन और मार्गदर्शन के प्रति समर्पित होना चाहिए। यह किसी मनुष्य से आशा रखने या उसका अनुसरण करने जैसा नहीं है।

(4) देहधारण की सच्चाई को समझो, मसीह के दिव्य सार को जानो और देह में परमेश्वर के कार्यों को देखो। केवल इसी तरह कोई व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है और उसकी आराधना कर सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आसपास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि जो तुम संवाद और अनुसरण करते हो, वह आज परमेश्वर के वचनों के आसपास केंद्रित नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से परे हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वो सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वो आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँभी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी काम करें या उनकी पीड़ा जितनी भी ज़्यादा हो या वो कितनी ही भागदौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों की परमेश्वर द्वारा सराहना नहीं की जाती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

"जो लोग अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, वे उद्धार प्राप्त करेंगे," इन वचनों में "अनुसरण" का अर्थ क्लेश के बीच डटे रहना है। आज बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करना आसान है, किंतु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला होगा, तब तुम "अनुसरण करने" का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इस बात से कि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हो, यह प्रमाणित नहीं होता कि तुम उन लोगों में से एक हो, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। जो लोग परीक्षणों को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के बीच विजयी होने में अक्षम हैं, वे अंततः डटे रहने में अक्षम होंगे, और इसलिए वे बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे अपने कार्य की परीक्षा का सामना करने में समर्थ हैं, जबकि जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर के किसी भी परीक्षण का सामना करने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें निर्वासित कर दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को खोजता है या नहीं, इसका निर्धारण उसके कार्य की परीक्षा द्वारा किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर के परीक्षणों द्वारा, और इसका स्वयं मनुष्य द्वारा लिए गए निर्णय से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर सनक के आधार पर किसी मनुष्य को अस्वीकार नहीं करता; वह जो कुछ भी करता है, वह मनुष्य को पूर्ण रूप से आश्वस्त कर सकता है। वह ऐसा कुछ नहीं करता, जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य जो मनुष्य को आश्वस्त न कर सके। मनुष्य का विश्वास सही है या नहीं, यह तथ्यों द्वारा साबित होता है, और इसे मनुष्य द्वारा तय नहीं किया जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर के अनुसरण में क्या शामिल होता है? दर्शनों के बिना, तुम किस मार्ग पर चलोगे? आज के कार्य में, यदि तुम्हारे पास दर्शन नहीं हैं तो तुम किसी भी हाल में पूरे नहीं किए जा सकोगे। तुम किस पर विश्वास करते हो? तुम उसमें आस्था क्यों रखते हो? तुम उसके पीछे क्यों चलते हो? क्या तुम्हें अपना विश्वास कोई खेल लगता है? क्या तुम अपने जीवन के साथ किसी खेल की तरह बर्ताव कर रहे हो? आज का परमेश्वर सबसे महान दर्शन है। उसके बारे में तुम्हें कितना पता है? तुमने उसे कितना देखा है? आज के परमेश्वर को देखने के बाद क्या परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नींव मजबूत है? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम इस उलझन भरे रास्ते पर चलते रहोगे, तुम्हें उद्धार प्राप्त होगा? क्या तुम्हें लगता है कि तुम कीचड़ से भरे पानी में मछली पकड़ सकते हो? क्या यह इतना सरल है? परमेश्वर ने आज जो वचन कहे हैं, उनसे संबंधित कितनी धारणाएं तुमने दरकिनार की हैं? क्या तुम्हारे पास आज के परमेश्वर का कोई दर्शन है? आज के परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है? तुम हमेशा मानते हो कि उसके पीछे चलकर तुम उसे[क] प्राप्त कर सकते हो, उसे देखकर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो, और कोई भी तुम्हें हटा नहीं सकेगा। ऐसा न मान लो कि परमेश्वर के पीछे चलना इतनी आसान बात है। मुख्य बात यह है कि तुम्हें उसे जानना चाहिए, तुम्हें उसका कार्य पता होना चाहिए, और तुम में उसके वास्ते कठिनाई का सामना करने की इच्छा होनी चाहिए, उसके लिए अपने जीवन का त्याग करने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने की इच्छा होनी चाहिए। तुम्हारे पास यह दर्शन होना चाहिए। अगर तुम्हारे ख़्याल हमेशा अनुग्रह पाने की ओर झुके रहते हैं, तो यह नहीं चलेगा। यह मानकर न चलो कि परमेश्वर यहाँ केवल लोगों के आनंद और केवल उन पर अनुग्रह बरसाने के लिए है। अगर तुम ऐसा सोचते हो तुम गलत होगे! अगर कोई उसका अनुसरण करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाल सकता, संसार की प्रत्येक संपत्ति को त्याग नहीं कर सकता, तो वह अंत तक कदापि अनुसरण नहीं कर पाएगा! तुम्हारे दर्शन तुम्हारी नींव होने चाहिए। अगर किसी दिन तुम पर दुर्भाग्य आ पड़े, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम तब भी उसका अनुसरण कर पाओगे? तुम अंत तक अनुसरण कर पाओगे या नहीं, इस बात को हल्के में न कहो। बेहतर होगा कि तुम पहले अपनी आँखों को अच्छे से खोलो और देखो कि अभी समय क्या है। भले ही तुम लोग वर्तमान में मंदिर के खंभों की तरह हो, परंतु एक समय आएगा जब ऐसे खंभे कीड़ों द्वारा कुतर दिये जाएंगे जिससे मंदिर ढह जाएगा, क्योंकि फिलहाल तुम लोगों में अनेक दर्शनों की बहुत कमी है। तुम लोग केवल अपने छोटे-से संसार पर ध्यान देते हो, तुम लोगों को नहीं पता कि खोजने का सबसे विश्वसनीय, सबसे उपयुक्त तरीका क्या है। तुम लोग आज के कार्य के दर्शन पर ध्यान नहीं देते, न ही तुम लोग इन बातों को अपने दिल में रखते हो। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि एक दिन परमेश्वर तुम लोगों को एक बहुत अपरिचित जगह में रखेगा? क्या तुम लोग सोच सकते हो जब मैं तुम लोगों से सब कुछ छीन लूँगा, तो तुम लोगों का क्या होगा? क्या उस दिन तुम लोगों की ऊर्जा वैसी ही होगी जैसी आज है? क्या तुम लोगों की आस्था फिर से प्रकट होगी? परमेश्वर के अनुसरण में, तुम लोगों का सबसे बड़ा दर्शन "परमेश्वर" होना चाहिए : यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसके अलावा, यह न मान बैठो कि पवित्र होने के इरादे से सांसारिक मनुष्यों से मेलजोल छोड़कर तुम लोग परमेश्वर का परिवार बन ही जाओगे। इन दिनों में, परमेश्वर स्वयं ही सृष्टि के बीच कार्य कर रहा है; वही लोगों के बीच अपना कार्य करने के लिए आया है—वह अभियान चलाने नहीं आया। तुम लोगों के बीच में, मुट्ठीभर भी ऐसे नहीं हैं जो जानते हों कि आज का कार्य स्वर्ग के परमेश्वर का कार्य है, जिसने देहधारण किया है। यह तुम लोगों को प्रतिभा से भरपूर उत्कृष्ट व्यक्ति बनाने के लिए नहीं है; यह मानवीय जीवन के मायने को जानने में, मनुष्यों की मंज़िल जानने के लिए, और परमेश्वर और उसकी समग्रता को जानने में तुम लोगों की मदद के लिए है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सृष्टिकर्ता के हाथ में सृजन की वस्तु हो। तुम्हें क्या समझना चाहिए, तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण कैसे करना चाहिए—क्या ये वे सत्य नहीं हैं जिन्हें तुम्हें समझना चाहिए? क्या ये वे दर्शन नहीं हैं जिन्हें तुम्हें देखना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए—भ्रम में अनुसरण मत करो!' से उद्धृत

यथार्थ में, परमेश्वर में विश्वास क्या होता है? क्या धर्म में विश्वास परमेश्वर में विश्वास के बराबर होता है? जब लोग धर्म को मानते हैं, तो वे शैतान का अनुसरण करते हैं। केवल जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और केवल वे जो मसीह का अनुसरण करते हैं, वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या जो कभी भी परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार नहीं करता, एक ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो परमेश्वर में विश्वास करता हो? यह किसी काम का नहीं होता, चाहे वो कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता रहा हो। कोई व्यक्ति जो हमेशा अपने विश्वास में धार्मिक अनुष्ठान में संलग्न रहता है, लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करता है, वह परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है, और परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता है। परमेश्वर किस आधार पर तुम्हें स्वीकार करता है? वह तुम्हें इस बात के आधार पर स्वीकार करता है कि क्या तुम सभी मामलों में उसकी अपेक्षाओं के अनुसार काम करते हो। उसकी स्वीकृति उसके वचनों के अनुसार दी जाती है, न कि इस आधार पर कि तुम्हारे बाह्य व्यवहार में कितने बदलाव हुए हैं, या तुम उसके लिए भाग-दौड़ करने में कितना समय लगाते हो, बल्कि इस आधार पर कि तुम किस राह पर चलते हो, और क्या तुम सत्य की तलाश करते हो। ऐसे कई लोग हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और जो परमेश्वर के लिए प्रशंसा के शब्द बोलते हैं—लेकिन, वे दिल से परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों से प्रेम नहीं करते, और न ही उन्हें सत्य में दिलचस्पी होती है। अपने दिलों में वे हमेशा यह मानते हैं कि केवल अगर वे शैतान के दर्शन और बाहरी दुनिया के विभिन्न सिद्धांतों द्वारा जीते हैं, तभी वे सामान्य होंगे, और खुद को बचाने में सक्षम होंगे, और यह कि केवल इस तरह से रहने से ही, इस दुनिया में उनके जीवन का कोई मोल होगा। क्या यह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास करता है और उसका अनुसरण करता है? प्रसिद्ध, महान विभूतियों की सभी बातें सुनने में विशेष रूप से दार्शनिक लगती हैं और लोगों को धोखा देने में विशेष रूप से सक्षम होती हैं। यदि तुम उन्हें सत्य मानते हो और सूत्रवाक्यों की तरह उनका पालन करते हो, लेकिन, जब सवाल आता है परमेश्वर के वचनों का, परमेश्वर के सबसे सामान्य वचनों का, जो यह चाहते हैं कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति बनो, कि तुम अपने स्वयं के आवंटित स्थान पर निष्ठापूर्वक संलग्न रहो और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाओ, और तुम स्थिर बने रहो—तब तुम उनका अभ्यास करने में असमर्थ रहते हो, और तुम उन्हें सच्चाई के रूप में नहीं मानते हो, तो तुम परमेश्वर के कोई अनुयायी नहीं हो। तुम यह कह सकते हो कि तुमने उसके वचनों का अभ्यास किया है, लेकिन क्या होगा यदि परमेश्वर तुम पर सच के लिए दबाव डाले और पूछे : "तुमने किसका अभ्यास किया है? उन वचनों को किसने कहा था जिनका तुम अभ्यास करते हो? उन सिद्धांतों का आधार क्या है जिनका तुम पालन करते हो?" यदि वह आधार परमेश्वर के वचन नहीं, तो ये शैतान के शब्द हैं; जिन्हें तुम जी रहे हो, वे शैतान के शब्द हैं, तुम फिर भी यह कहते हो कि तुम सत्य का अभ्यास करते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, क्या यह उसके खिलाफ़ निंदा नहीं है? परमेश्वर कहता है कि लोगों को ईमानदार होना चाहिए, फिर भी ऐसे लोग हैं जो इस बात पर विचार नहीं करते कि ईमानदार होने में क्या शामिल है, कैसे उन्हें ईमानदारी का अभ्यास करना है, या उन चीज़ों में से जिन्हें वे जी रहे हैं और प्रकट करते हैं, कौन-सी ईमानदार नहीं हैं, और कौन-सी हैं। वे परमेश्वर के वचनों में सत्य के सार पर विचार नहीं करते हैं, लेकिन अविश्वासियों की एक पुस्तक ढूँढ लेते हैं और, इसे पढ़कर, वे कहते हैं, "ये अच्छे शब्द हैं—परमेश्वर के वचनों से भी बेहतर। 'निष्कपट लोग हमेशा जीतते हैं'—क्या ये ठीक वैसा नहीं जैसा कि परमेश्वर ने कहा है? यह भी सच ही है!" इस तरह, वे इन वचनों का पालन करते हैं। जब वे इन वचनों का पालन करते हैं तो वे कैसे जीते हैं? क्या वे सच्चाई की वास्तविकता को जीने में सक्षम होते हैं? क्या ऐसे कई लोग हैं? वे थोड़ा ज्ञान प्राप्त करते हैं, कुछ किताबें पढ़ लेते हैं, और थोड़ी अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं, और वे कोई प्रसिद्ध उक्ति या लोकप्रिय कहावत सुनते हैं और इन्हें सत्य मान लेते हैं। वे इन वचनों के अनुसार कार्य करते हैं, और उन्हें अपने कर्तव्यों और परमेश्वर में विश्वास के अपने जीवन पर लागू करते हैं, और यहाँ तक कि वे सोचते हैं कि यह परमेश्वर को संतुष्ट करता है। क्या यह हाथ की सफ़ाई नहीं है? क्या यह प्रवंचना नहीं है? यह ईश-निन्दा है! लोगों में इसकी बहुतायत है। वे मधुर लगने वाले, सही प्रतीत होने वाले लोक-सिद्धांतों का पालन करते हैं, मानो वे ही सत्य हों। वे परमेश्वर के वचनों को एक तरफ़ रख देते हैं और उनकी ओर कोई ध्यान नहीं देते हैं, और, चाहे वे उन्हें जितनी भी बार पढ़ लें, वे उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं या उन्हें सच्चाई नहीं मानते। क्या ऐसा करने वाला वो है जो परमेश्वर पर विश्वास करता है? क्या वह परमेश्वर का अनुसरण करता है? ऐसा व्यक्ति धर्म को मानता है; ऐसे लोग शैतान का अनुसरण करते हैं! वे दिल से सोचते हैं कि शैतान द्वारा कहे गए शब्दों में दर्शन होता है, कि इन शब्दों में गहरा अर्थ होता है, कि वे आधिकारिक शब्द हैं, बुद्धिमत्तापूर्ण कथन हैं, और, चाहे वे लोग और कुछ भी त्याग दें, वे इन शब्दों की कभी उपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसा करना तो, उनके लिए, जैसे कि अपने जीवन को गंवाना, या उनके दिलों को खोद निकालना होगा। यह किस तरह का व्यक्ति है? यह वो व्यक्ति है जो शैतान का अनुसरण करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

ज्यादातर लोगों के पास जब कोई समस्या नहीं होती है, जब उनके साथ सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा होता है, तो उन्हें लगता है कि परमेश्वर शक्तिशाली और धार्मिक है, और मनोहर है। जब परमेश्वर उनका परीक्षण करता है, उनके साथ निपटता है, उन्हें प्रताड़ित करता है, और अनुशासित करता है, जब वह उन्हें अपने स्वार्थों को अलग कर देने के लिए, देह-सुख का त्याग करने और सत्य का अभ्यास करने के लिए कहता है, जब परमेश्वर उन पर कार्य करता है, और उनके भाग्य और उनके जीवन को आयोजित और शासित करता है, वे विद्रोही बन जाते हैं, और अपने और परमेश्वर के बीच अलगाव पैदा करते हैं; वे अपने और परमेश्वर के बीच टकराव और एक खाई पैदा कर लेते हैं। ऐसे समय में, उनके दिलों में, परमेश्वर ज़रा भी मनोहर नहीं होता; वह बिलकुल भी शक्तिशाली नहीं होता, क्योंकि वह जो करता है, उससे उनकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती है। परमेश्वर उन्हें दुखी करता है; वह उन्हें परेशान करता है; वह उनके लिए कष्ट और पीड़ा लाता है; वह उन्हें अशांत महसूस कराता है। इसलिए वे परमेश्वर के प्रति बिलकुल ही समर्पण नहीं करते, इसके बजाय, वे उसके प्रति विद्रोह करते हैं और उसे नकारते हैं। ऐसा करके क्या वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्या वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं? नहीं। इसलिए, चाहे परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारी कितनी भी धारणाएँ और कल्पनाएँ हों, और चाहे तुमने पहले अपनी मर्जी के मुताबिक जैसे भी काम किया हो और परमेश्वर के खिलाफ़ जैसे भी बग़ावत की हो, अगर तुम वास्तव में सत्य की तलाश करते हो, और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हो, और परमेश्वर के वचनों द्वारा काट-छाँट और निपटने को स्वीकार करते हो; अगर, हर चीज़ में जिसे परमेश्वर आयोजित करता है, तुम उसके तरीके का पालन करने में सक्षम होते हो, परमेश्वर के वचनों को मानते हो, उसकी इच्छा की तलाश करते हो, उसके वचनों और उसकी इच्छा के अनुसार अभ्यास करते हो, समर्पण की कोशिश करने में सक्षम होते हो, और अपनी समस्त इच्छाओं, अभिलाषाओं, विचारों, अभिप्रेरणाओं, और परमेश्वर के प्रति अपने विरोध को दूर कर सकते हो—केवल तभी तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो! तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम जो भी करते हो, वह सब अपनी मर्जी के मुताबिक़ करते हो। तुम्हारी हर क्रिया में, तुम्हारे अपने उद्देश्य, तुम्हारी अपनी योजनाएँ होती हैं; तुम इसे परमेश्वर पर नहीं छोड़ देते। तो क्या परमेश्वर अभी भी तुम्हारा परमेश्वर है? यदि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो, जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तब क्या ये खोखले शब्द नहीं होते हैं? क्या ऐसे शब्द लोगों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं हैं? तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम्हारे सारे कार्य और व्यवहार, जीवन पर तुम्हारा दृष्टिकोण, तुम्हारे मूल्य, और तुम्हारे दृष्टिकोण और सिद्धांत जिनके साथ तुम मुद्दों के साथ पेश आते और उन्हें संभालते हो, वे सभी शैतान से आते हैं—तुम यह सब पूरी तरह से शैतान के सिद्धांतों और तर्क के अनुसार संभालते हो। तो, क्या तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो?

... परमेश्वर में विश्वास के वर्णन का सबसे सरल तरीका है इस भरोसे का होना कि एक परमेश्वर है, और इस आधार पर, उसका अनुसरण करना, उसका आज्ञा-पालन करना, उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना, उसके वचनों को सुनना, उसके वचनों के अनुसार जीवन जीना, हर चीज़ को उसके वचनों के अनुसार करना, एक सच्चा सृजित प्राणी बनना, और उसका भय मानना और बुराई से दूर रहना; केवल यही परमेश्वर में सच्चा विश्वास होता है। परमेश्वर के अनुसरण का यही अर्थ होता है। तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन, अपने हृदय में, तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते, और तुम उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं करते हो। यदि परमेश्वर जो करता है उसके बारे में तुम हमेशा अवधारणाएँ रखते हो, और तुम हमेशा वह जो करे उसे ग़लत समझते हो, और इसके बारे में शिकायत करते हो; यदि तुम हमेशा असंतुष्ट रहते हो, और वह जो भी करे उसे तुम हमेशा अपनी ही अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके मापते और उनसे पेश आते हो; अगर तुम्हारे पास हमेशा अपनी ही समझ होती है—तो यह परेशानी का कारण होगा। तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो, और तुम्हारे पास वास्तव में उसका अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करना ऐसा नहीं होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, "हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।" देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं? इस तरह के लोग पौलुस के प्रकार के ही हैं। ...

पहले, हो सकता है परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग किसी व्यक्ति का अनुसरण करते हों, या उन्होंने परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा न किया हो; इस अंतिम चरण में, उन्हें परमेश्वर के सामने आना होगा। यदि तुम्हारी नींव कार्य के इस चरण का तुम्हारा अनुभव है, फिर भी तुम किसी व्यक्ति का अनुसरण करते रहते हो, तो तुम अक्षम्य हो, और तुम्हारा अंजाम भी वही होने वाला है जो पौलुस का हुआ था।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अनुसरण करना ही परमेश्वर में सच्चे अर्थ में विश्वास करना है' से उद्धृत

कुछ लोग सत्य में आनंदित नहीं होते, न्याय में तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग शक्ति के खोजी कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। हालंकि उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे आधा विश्वास करते हैं; और वे अपने दिलो-दिमाग को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं, वे मुख से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और वे मसीह की ओर दूसरी नजर भी नहीं डालते। उनके हृदय प्रसिद्धि, वैभव और महिमा पर ही टिक गए हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा मामूली व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाबना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ लोग परमेश्वर के द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वास करने से अधिक, वे बेहूदे जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते है और केवल बड़े समूहों और सम्प्रदायों को सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करता है; वे तो बस ऐसे गद्दार हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की प्रशंसा करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन व्यभिचारियों से प्रेम करते हो जो संसार की कीचड़ में लोट लगाते हैं। तुम मसीह की पीड़ा पर हँसते हो, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हो जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और अय्याशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, परन्तु उन धृष्ट मसीह-विरोधियों की बाँहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालाँकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अब भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत की ओर, उनके प्रभाव की ओर मुड़ता है। फिर भी तुम ऐसा रवैया बनाये रखते हो जहाँ तुम मसीह के कार्य को गले से उतारना कठिन पाते हो और उसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और चारा नहीं था। तुम्हारे हृदय में हमेशा बुलंद छवियों का स्थान रहा है; तुम न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हो। तुम सबके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह उत्कृष्ट तो बिल्कुल नहीं है।

बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य का सम्मान नहीं करते हैं वे सभी अविश्वासी और सत्य के प्रति गद्दार हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अधिक अविश्वास है, और मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुमको इस तरह से शिक्षा देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें सम्पूर्ण हृदय से खुद को समर्पित कर देना चाहिए; दुविधाग्रस्त या अधूरे मन वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर इस संसार या किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उन सबका है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, उन सबका जो उसकी आराधना करते हैं, और उन सबका है जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

कुछ लोग अक्सर ऐसे लोगों के हाथों धोखा खा जाते हैं जो बाहर से आध्यात्मिक, कुलीन, ऊँचे और महान प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो वाक्पटुता से शाब्दिक और सैद्धांतिक बातें कर सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके हाथों धोखा खा चुके हैं उन्होंने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धांतों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं, इसे कभी नहीं देखा है। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, वे लोग सचमुच परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहते हैं या नहीं हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना। बल्कि, उनसे परिचित होने के साथ ही, थोड़ा-थोड़ा करके वे उन लोगों की तारीफ करने, और आदर करने लगते हैं, और अंत में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, मानते हैं कि वे अपने परिवार एवं नौकरियाँ छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें मन में लगता है कि परमेश्वर इन आदर्श लोगों की प्रशंसा करता है। उनके ऐसे विश्वास की वजह क्या है? इस मुद्दे का सार क्या है? इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? आओ, हम सबसे पहले इसके सार के मामले पर चर्चा करें।

सार रूप में, लोगों का दृष्टिकोण, उनका अभ्यास, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धांतों को चुनते हैं, और लोग किस चीज़ पर जोर देते हैं, इन सब बातों का लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं का कोई लेना-देना नहीं है। चाहे लोग सतही मसलों पर ध्यान दें या गंभीर मसलों पर, शब्दों एवं सिद्धांतों पर ध्यान दें या वास्तविकता पर, लेकिन लोग उसके मुताबिक नहीं चलते जिसके मुताबिक उन्हें सबसे अधिक चलना चाहिए, और उन्हें जिसे सबसे अधिक जानना चाहिए, उसे जानते नहीं। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते; इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धांतों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार मान लेते हैं; तब यही सारांश, खोज करने के लिए उनका लक्ष्य बन जाता है, जिसे वे अभ्यास में लाए जाने वाला सत्य मान लेते हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि लोग अच्छे मानवीय व्यवहार को, सत्य को अभ्यास में लाने के विकल्प के तौर पर उपयोग करते हैं, इससे परमेश्वर की कृपा पाने की उनकी अभिलाषा भी पूरी हो जाती है। इससे लोगों को सत्य के साथ संघर्ष करने का बल मिलता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा स्पर्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और जिन आदर्शों को वे सराहते हैं उन्हें परमेश्वर के स्थान पर रख देते हैं। लोगों के ऐसे अज्ञानता भरे कार्य और दृष्टिकोण का, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास का केवल एक ही मूल कारण है, आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा : कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के कथन पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते। और यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, और जानता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, किस चीज़ से वो घृणा करता है, वो क्या चाहता है, किस चीज़ को वो अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को वो नापसंद करता है, लोगों से अपेक्षाओं के उसके क्या मानक हैं, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति का व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँ ही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति लोगों का आदर्श बन सकता है? जो लोग परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, उनका दृष्टिकोण इसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्कसंगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करेंगे, न ही वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धांतों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

कलीसिया के भीतर अगुआओं और कार्यकर्ताओं का स्तर जो भी हो, अगर तुम लोग हमेशा उनकी आराधना करते हो और परमेश्वर पर विश्वास करने और उद्धार प्राप्त करने के लिए उन पर हर चीज़ के लिए भरोसा करते हो, तो यह प्रेरणा अपने आप में ग़लत है। अगुआओं में उनका स्तर चाहे जो हो, वे हैं तो अभी भी आम इंसान ही। अगर तुम उन्हें अपने से बड़ा समझते हो, अगर तुम्हें लगता है कि वे तुमसे ऊंचे हैं, तुमसे ज़्यादा योग्य हैं, वे तुम्हारी अगुवाई करें, वे उस वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हैं, तो फिर यह ग़लत है—यह तुम्हारा भ्रम है। और इस भ्रम का नतीजा क्या होता है? यह भ्रम और यह त्रुटिपूर्ण समझ तुम्हें अनजाने में अपने अगुआओं से ऐसी अपेक्षाएं करने की ओर ले जाएंगे जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं; साथ ही, तुम यह जाने बिना ही उनके तथाकथित रुझान और रौब, या उनकी योग्यताओं और प्रतिभाओं की ओर गहराई से आकर्षित होने लगोगे, इस हद तक कि तुम्हें पता भी न चलेगा और तुम उनकी आराधना कर रहे होगे, और वे तुम्हारे परमेश्वर बन चुके होंगे। जब वे तुम्हारे आदर्श और तुम्हारी आराधना के लक्ष्य बनना शुरू हो जाते हैं, तो यह पथ, उस क्षण से लेकर उस पल तक जब तुम उनके अनुयायियों में से एक बन जाते हो, तुम्हें अनजाने में परमेश्वर से दूर ले जाएगा। धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर जाते हुए भी, तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो, तुम परमेश्वर के घर में हो, तुम परमेश्वर की उपस्थिति में हो। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति लुभा चुका होगा जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, या जो मसीह का शत्रु है। यह बहुत ख़तरनाक स्थिति है। अतः इस समस्या को हल करने के लिए, तुम्हें मसीह के शत्रुओं के अलग-अलग स्वभाव और उनके काम करने के तरीकों को ठीक ढंग से समझने और पहचानने में सक्षम होना चाहिए। साथ ही, तुम्हें उनके कार्यों की प्रकृति और उनकी प्रणालियों और चालों को भी समझ लेना चाहिए जिनका उपयोग करना वे पसंद करते हैं; तुम्हें अपने आप पर भी काम करने की शुरुआत करनी चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करते हुए मनुष्य की आराधना करना सही रास्ता नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं: "हाँ, मैं अगुआओं की आराधना करता हूँ लेकिन ऐसा करने के मेरे अपने कारण हैं—जिनकी मैं आराधना करता हूँ वे मेरी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हैं।" तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हुए भी मनुष्य की आराधना करने पर क्यों तुले हुए हो? ये सब कुछ हो जाने के बाद, तुम्हें कौन बचाएगा? कौन है जो सचमुच तुम से प्रेम करता है और तुम्हारी रक्षा करता है—क्या तुम सचमुच नहीं देख पाते? तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसके वचन को सुनते हो, और अगर कोई सही तरीके से बोलता है और कार्य करता है, और सत्य के सिद्धांतों के अनुसार चलता है, तो क्या सत्य का पालन करना तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है? तुम इतने नीच क्यों हो कि अनुसरण के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करने की ज़िद करते हो जिसकी तुम आराधना करो? तुम शैतान के गुलाम क्यों बनना चाहते हो? इसके बजाय, तुम सत्य के सेवक क्यों नहीं बनते? किसी व्यक्ति में समझदारी और गरिमा है या नहीं, यह देखना है तो यहाँ देखो। तुम्हें ख़ुद पर काम करना शुरू करना चाहिए, अपने आप को उन सत्यों से युक्त करो जो विभिन्न लोगों और घटनाओं में फ़र्क बताते हैं, उन तमाम मार्गों में भेद करना सीखो जिनमें प्रत्येक प्रकार की घटना और व्यक्ति अभिव्यक्त होते हैं, यह जानो कि सभी मामलों में कौन-से सार और स्वभाव सामने आ रहे हैं। तुम्हें यह भी समझना चाहिए कि तुम किस तरह के व्यक्ति हो, तुम्हारे आसपास के लोग किस तरह के हैं और किस तरह के लोग तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। उन्हें सही ढंग से देखने में तुम्हें सक्षम होना चाहिए। जब तुम सत्य से लैस हो जाओगे, तो इस तरह के अध्यात्मिक कद के साथ तुम मसीह के शत्रुओं की चालों में आसानी से नहीं फंसोगे और न ही तुम उनकी चालाकियों से डरोगे।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अजीब और रहस्यमय तरीके से व्यवहार करते हैं, वे स्वेच्छाचारी और तानाशाह होते हैं, वे कभी दूसरों के साथ संगति नहीं करते, और वे दूसरों को अपने आज्ञापालन के लिए मजबूर करते हैं' से उद्धृत

चाहे कितने भी लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, जैसे ही उनके विश्वासों को परमेश्वर द्वारा धर्म या समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, वह पहले ही निर्धारित कर देता है कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? किसी गिरोह या लोगों की भीड़ में जो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से रहित हैं और जो उसकी आराधना बिल्कुल भी नहीं करते हैं, वे किसकी आराधना करते हैं? वे किसका अनुसरण करते हैं? रूप और नाम में, वे एक इंसान का अनुसरण करते हैं, लेकिन वास्तव में वे किसका अनुसरण करते हैं? मन ही मन वे परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे मानवीय हेरफेर, व्यवस्थाओं और नियंत्रण के अधीन हैं। वे शैतान, हैवान का अनुसरण करते हैं; वे उन ताकतों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, जो उसकी दुश्मन हैं। क्या परमेश्वर इस तरह के लोगों के झुण्ड को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं बचाएगा? क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? (नहीं।) वे मानव उद्यमों को चलाते हुए, अपने प्रबंधन का संचालन करते हुए विश्वास का झंडा लहराते हैं, और मनुष्यजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत चलते हैं। उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा नफरत और अस्वीकृत किया जाना है; वह इन लोगों को संभवतः नहीं बचा सकता है, वे संभवतः पश्चाताप नहीं कर सकते, वे पहले ही शैतान के द्वारा पकड़ लिए गए हैं—वे पूरी तरह से शैतान के हाथों में हैं। तुमने कितने वर्ष परमेश्वर में विश्वास किया है, क्या तुम्हारी आस्था में इसका असर इस बात पर पड़ता है कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? क्या तुम्हारे रस्मों और विनियमों के पालन करने का कुछ महत्व है? क्या परमेश्वर लोगों के अभ्यास के तौर-तरीकों को देखता है? क्या वह देखता है कि वहाँ कितने लोग हैं? उसने मानवजाति के एक हिस्से को चुना है; वह कैसे मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है और बचाया जाना चाहिए? उसका यह निर्णय उन मार्गों पर आधारित होता है जिन पर ये लोग चलते हैं। अनुग्रह के युग में, हालांकि परमेश्वर द्वारा लोगों को बताए गए सत्य आज की तरह इतने अधिक नहीं थे और इतने विशिष्ट नहीं थे, वह फिर भी उस समय लोगों को पूर्ण बना सका और तब भी उनका उद्धार संभव था। इस तरह, इस युग के लोग, जिन्होंने बहुत से सत्य सुने हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को समझ पाये हैं, अगर वे परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और उद्धार के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम उन्हीं के समान होगा जो ईसाई और यहूदी धर्म को मानते हैं; कोई अंतर नहीं होगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है! चाहे तूने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, या तू कितने सत्यों को समझ चुका हो, यदि अंततः तू अभी भी लोगों का अनुसरण करता है और शैतान का अनुसरण करता है, और अंततः, तू अभी भी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में अक्षम हैं और उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ है, तो ऐसे लोगों से परमेश्वर घृणा करेगा और उन्हें अस्वीकार कर देगा। हर पहलू से, ऐसे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें अस्वीकार करता है, वे पत्रों और सिद्धांतों के बारे में ज्यादा बात कर सकते हैं, और बहुत से सत्य समझते हैं, फिर भी वे परमेश्वर की आराधना करने में असमर्थ होते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते, परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारी नहीं हो पाते। परमेश्वर की नज़रों में, वह उन्हें धर्म के रूप में, मनुष्य मात्र के एक समूह के रूप में, एक इंसानों के गिरोह और शैतान के लिए एक निवास स्थान के रूप में परिभाषित करता है। उन्हें सामूहिक रूप से शैतान का गिरोह कहा जाता है, और परमेश्वर उनसे पूरी तरह से घृणा करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे अप्रत्याशित रूप से शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह समय अलग किए जाने का है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब हटा दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूंगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "उसे" शब्द शामिल नहीं है।

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