36. मसीह का अनुसरण करने के सिद्धांत

(1) यह जानना आवश्यक है कि केवल अंतिम दिनों का मसीह ही लोगों को शुद्ध कर सकता और उन्हें बचा सकता है, और वही व्यावहारिक परमेश्वर है। केवल इसी प्रकार अस्पष्ट परमेश्वर को किसी के दिल से निकाला जा सकता है।

(2) मसीह द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्य को स्वीकार करना, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना, और अपना कर्तव्य पूरा करना आवश्यक है। केवल ऐसा करने वाला ही मसीह का अनुयायी होता है।

(3) केवल मसीह के वचनों के न्याय से गुजरने और उसके सभी कार्यों के प्रति समर्पण करने से ही कोई यह जान सकता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।

(4) मसीह को अपने हृदय में सर्वोपरि रखना आवश्यक है; केवल ऐसा करने में ही कोई परमेश्वर को महान मानते हुए ऊँचा उठा सकता है। न तो किसी इंसान की आराधना करो और न ही किसी इंसान का अनुसरण; केवल मसीह को ऊँचा उठाओ और उसी की गवाही दो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है। अगर तुम इन सत्यों को महत्वपूर्ण नहीं समझते, अगर तुम सिवाय इसके कुछ नहीं समझते कि इनसे कैसे बचा जाए, या किस तरह कोई ऐसा नया तरीका ढूँढ़ा जाए जिनमें ये शामिल न हों, तो मैं कहूँगा कि तुम घोर पापी हो। अगर तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है, फिर भी तुम सत्य को या परमेश्वर की इच्छा को नहीं खोजते, न ही उस मार्ग से प्यार करते हो, जो परमेश्वर के निकट लाता है, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है, और यह कि तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो, जो महान श्वेत सिंहासन से भागता है। परमेश्वर ऐसे किसी भी विद्रोही को नहीं छोड़ेगा, जो उसकी आँखों के नीचे से बचकर भागता है। ऐसे मनुष्य और भी अधिक कठोर दंड पाएँगे। जो लोग न्याय किए जाने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आते हैं, और इसके अलावा शुद्ध किए जा चुके हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे। बेशक, यह कुछ ऐसा है, जो भविष्य से संबंधित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लेकर आता है। यह सत्य वह मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यह एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते हो, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के फाटक में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। वे लोग जो नियमों से, शब्दों से नियंत्रित होते हैं, और इतिहास की जंजीरों में जकड़े हुए हैं, न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का शाश्वत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पास, सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल की बजाय, बस मैला पानी ही है जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। वे जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की गई है, हमेशा के लिए मुर्दे, शैतान के खिलौने, और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की कोशिश करते हो, केवल जड़वत खड़े रहकर चीजों को जस का तस रखने की कोशिश करते हो, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को ख़ारिज़ करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के चरण उमड़ती लहरों और गरजते तूफानों की तरह विशाल और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निठल्ले बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, अपनी नादानी से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? तुम जिस परमेश्वर को थामे हो उसे उस परमेश्वर के रूप में सही कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को ढूँढ़ने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? तुम अपने हाथों में जो थामे हो वे शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं दे सकते। तुम जो शास्त्र पढ़ते हो वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं और ये दर्शनशास्त्र के वचन नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हैं, तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए गहन चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों का बोध नहीं करवाती है? क्या तुम परमेश्वर से अकेले में मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग को सौंप देने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा सुझाव यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—उसकी ओर देखो जो अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आसपास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि जो तुम संवाद और अनुसरण करते हो, वह आज परमेश्वर के वचनों के आसपास केंद्रित नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से परे हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वो सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वो आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँभी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी काम करें या उनकी पीड़ा जितनी भी ज़्यादा हो या वो कितनी ही भागदौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों की परमेश्वर द्वारा सराहना नहीं की जाती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

चाहे परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारी कितनी भी धारणाएँ और कल्पनाएँ हों, और चाहे तुमने पहले अपनी मर्जी के मुताबिक जैसे भी काम किया हो और परमेश्वर के खिलाफ़ जैसे भी बग़ावत की हो, अगर तुम वास्तव में सत्य की तलाश करते हो, और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हो, और परमेश्वर के वचनों द्वारा काट-छाँट और निपटने को स्वीकार करते हो; अगर, हर चीज़ में जिसे परमेश्वर आयोजित करता है, तुम उसके तरीके का पालन करने में सक्षम होते हो, परमेश्वर के वचनों को मानते हो, उसकी इच्छा की तलाश करते हो, उसके वचनों और उसकी इच्छा के अनुसार अभ्यास करते हो, समर्पण की कोशिश करने में सक्षम होते हो, और अपनी समस्त इच्छाओं, अभिलाषाओं, विचारों, अभिप्रेरणाओं, और परमेश्वर के प्रति अपने विरोध को दूर कर सकते हो—केवल तभी तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो! तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम जो भी करते हो, वह सब अपनी मर्जी के मुताबिक़ करते हो। तुम्हारी हर क्रिया में, तुम्हारे अपने उद्देश्य, तुम्हारी अपनी योजनाएँ होती हैं; तुम इसे परमेश्वर पर नहीं छोड़ देते। तो क्या परमेश्वर अभी भी तुम्हारा परमेश्वर है? यदि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो, जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तब क्या ये खोखले शब्द नहीं होते हैं? क्या ऐसे शब्द लोगों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं हैं? तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम्हारे सारे कार्य और व्यवहार, जीवन पर तुम्हारा दृष्टिकोण, तुम्हारे मूल्य, और तुम्हारे दृष्टिकोण और सिद्धांत जिनके साथ तुम मुद्दों के साथ पेश आते और उन्हें संभालते हो, वे सभी शैतान से आते हैं—तुम यह सब पूरी तरह से शैतान के सिद्धांतों और तर्क के अनुसार संभालते हो। तो, क्या तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो?

... परमेश्वर में विश्वास के वर्णन का सबसे सरल तरीका है इस भरोसे का होना कि एक परमेश्वर है, और इस आधार पर, उसका अनुसरण करना, उसका आज्ञा-पालन करना, उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना, उसके वचनों को सुनना, उसके वचनों के अनुसार जीवन जीना, हर चीज़ को उसके वचनों के अनुसार करना, एक सच्चा सृजित प्राणी बनना, और उसका भय मानना और बुराई से दूर रहना; केवल यही परमेश्वर में सच्चा विश्वास होता है। परमेश्वर के अनुसरण का यही अर्थ होता है। तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन, अपने हृदय में, तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते, और तुम उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं करते हो। यदि परमेश्वर जो करता है उसके बारे में तुम हमेशा अवधारणाएँ रखते हो, और तुम हमेशा वह जो करे उसे ग़लत समझते हो, और इसके बारे में शिकायत करते हो; यदि तुम हमेशा असंतुष्ट रहते हो, और वह जो भी करे उसे तुम हमेशा अपनी ही अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके मापते और उनसे पेश आते हो; अगर तुम्हारे पास हमेशा अपनी ही समझ होती है—तो यह परेशानी का कारण होगा। तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो, और तुम्हारे पास वास्तव में उसका अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करना ऐसा नहीं होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

पतरस ने कई वर्षों तक यीशु का अनुगमन किया और उसमें कई बातें ऐसी देखीं, जो औरों में नहीं थीं। एक वर्ष तक अपना अनुगमन करने के पश्चात् यीशु ने उसे बारह शिष्यों में से एक चुना। (निस्संदेह यीशु ने इसे जोर से नहीं बोला और दूसरे इससे बिलकुल अनजान थे।) जीवन में, पतरस ने यीशु द्वारा की गई हर चीज से खुद को मापा। सबसे बढ़कर, यीशु ने जिन संदेशों का प्रचार किया, वे उसके हृदय में अंकित हो गए। वह यीशु के प्रति अत्यधिक समर्पित और वफादार था, और उसने यीशु के खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं की। परिणामस्वरूप जहाँ कहीं यीशु गया, वह यीशु का विश्वसनीय साथी बन गया। पतरस ने यीशु की शिक्षाओं, उसके नम्र शब्दों, उसके भोजन, उसके कपड़ों, उसके आश्रय और उसकी यात्राओं पर ग़ौर किया। उसने हर मामले में यीशु का अनुकरण किया। वह कभी पाखंडी नहीं था, लेकिन फिर भी उसने वह सब त्याग दिया, जो पुराना था और कथनी और करनी दोनों से यीशु के उदाहरण का अनुगमन किया। तभी उसे अनुभव हुआ कि आकाश और पृथ्वी और सभी वस्तुएँ सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और इस कारण उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं थी। उसने यीशु को पूर्णरूपेण आत्मसात कर लिया और उसे उदाहरण की तरह इस्तेमाल किया। यीशु का जीवन दर्शाता है कि उसने जो कुछ किया, वह पाखंडी नहीं था; अपने बारे में डींगें मारने के बजाय उसने प्रेम से लोगों को प्रभावित किया। विभिन्न चीजों ने दिखाया कि यीशु क्या था, और इस कारण से पतरस ने उसकी हर बात का अनुकरण किया। पतरस के अनुभवों ने उसे यीशु की मनोरमता का अधिकाधिक बोध कराया और उसने इस तरह की बातें कहीं : "मैंने पूरे ब्रह्मांड में सर्वशक्तिमान की खोज की है और आकाश, पृथ्वी और सभी चीजों के आश्चर्यों को देखा है, और इस प्रकार मैंने सर्वशक्तिमान की मनोरमता का गहरा अनुभव प्राप्त किया है। परंतु इस पर भी मेरे हृदय में वास्तविक प्रेम कदापि नहीं था और मैंने अपनी आँखों से सर्वशक्तिमान की मनोरमता को कभी नहीं देखा था। आज सर्वशक्तिमान की दृष्टि में मुझे उसके द्वारा कृपापूर्वक देखा गया है, और मैंने अंतत: परमेश्वर की मनोरमता का अनुभव कर लिया है। मैंने अंतत: जान लिया है कि मानव-जाति सिर्फ इसलिए परमेश्वर से प्रेम नहीं करती, क्योंकि उसने सब चीजें बनाई हैं, बल्कि अपने दैनिक जीवन में मैंने उसकी असीम मनोरमता पाई है। यह भला उस स्थिति तक सीमित कैसे हो सकती है, जो अभी दिखाई पड़ रही है?" जैसे-जैसे समय बीता, पतरस में भी बहुत-सी मनोहर बातें आती गईं। वह यीशु के प्रति बहुत आज्ञाकारी हो गया, और निस्संदेह उसे अनेक विघ्नों का भी सामना करना पड़ा। जब यीशु उसे विभिन्न स्थानों पर प्रचार करने के लिए ले गया, तो उसने सदैव विनम्र होकर यीशु के उपदेशों को सुना। वर्षों से यीशु का अनुगमन करने के कारण वह कभी अहंकारी नहीं हुआ। यीशु द्वारा यह बताए जाने के बाद कि उसके आने का कारण क्रूस पर चढ़ाया जाना है, ताकि वह अपना कार्य पूरा कर सके, पतरस अकसर अपने दिल में पीड़ा अनुभव करता और एकांत में छुपकर रोया करता। फिर भी, आखिरकार वह "दुर्भाग्यपूर्ण" दिन आ ही गया। यीशु के पकड़े जाने के बाद पतरस अपनी मछली पकड़ने की नाव में अकेले रोता रहा और उसके लिए बहुत प्रार्थनाएँ कीं। परंतु अपने हृदय में वह जानता था कि यह पिता परमेश्वर की इच्छा है और इसे कोई नहीं बदल सकता। यीशु के प्रति अपने प्रेम के कारण ही वह दुखी होकर रोता रहा था। निस्संदेह यह मानवीय दुर्बलता है। अत: जब उसे ज्ञात हुआ कि यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया जाएगा, उसने यीशु से पूछा : "अपने जाने के बाद क्या तू हमारे बीच लौटेगा और हमारी देखभाल करेगा? क्या हम फिर भी तुझे देख पाएँगे?" हालाँकि ये शब्द बहुत सीधे-सादे और मानवीय धारणाओं से भरे थे, पर यीशु पतरस की पीड़ा की कड़वाहट के बारे में जानता था, अत: अपने प्रेम के द्वारा उसने उसकी दुर्बलता को ध्यान में रखा : "पतरस, मैंने तुझसे प्रेम किया है। क्या तू यह जानता है? हालाँकि तू जो कहता है, उसका कोई कारण नहीं है, फिर भी, पिता ने वादा किया है कि अपने पुनरुत्थान के बाद मैं 40 दिनों तक लोगों को दिखाई दूँगा। क्या तुझे विश्वास नहीं है कि मेरा आत्मा तुम लोगों पर निरंतर अनुग्रह करता रहेगा?" हालाँकि इससे पतरस को कुछ सुकून मिला, फिर भी उसने महसूस किया कि किसी चीज की कमी है, और इसलिए, पुनरुत्थान के बाद, यीशु पहली बार खुले तौर पर उसके सामने आया। किंतु पतरस को अपनी धारणाओं से चिपके रहने से रोकने के लिए यीशु ने उस भव्य भोजन को अस्वीकार कर दिया, जो पतरस ने उसके लिए तैयार किया था, और पलक झपकते ही गायब हो गया। उस क्षण से पतरस को प्रभु यीशु की गहन समझ प्राप्त हुई, और वह उससे और अधिक प्रेम करने लगा। पुनरुत्थान के बाद यीशु अकसर पतरस के सामने आया। चालीस दिन पूरे होने पर स्वर्गारोहण करने के बाद वह पतरस को तीन बार और दिखाई दिया। हर बार जब वह दिखाई दिया, तब पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण होने वाला और नया कार्य आरंभ होने वाला था।

अपने पूरे जीवन में पतरस ने मछलियाँ पकड़कर अपना जीवनयापन किया, परंतु इससे भी अधिक वह सुसमाचार के प्रचार के लिए जीया। अपने बाद के वर्षों में उसने पतरस की पहली और दूसरी पत्री लिखी, साथ ही उसने उस समय के फिलाडेल्फिया की कलीसिया को कई पत्र भी लिखे। उस समय के लोग उससे बहुत प्रभावित थे। लोगों को अपनी खुद की साख का इस्तेमाल करके उपदेश देने के बजाय उसने उन्हें जीवन की उपयुक्त आपूर्ति उपलब्ध करवाई। वह जीते-जी कभी यीशु की शिक्षाओं को नहीं भूला और जीवनभर उनसे प्रेरित रहा। यीशु का अनुगमन करते हुए उसने प्रभु के प्रेम का बदला अपनी मृत्यु से चुकाने और सभी चीजों में उसके उदाहरण का अनुसरण करने का संकल्प लिया था। यीशु ने इसे स्वीकार कर लिया, इसलिए जब पतरस 53 वर्ष का था (यीशु के जाने के 20 से अधिक वर्षों के बाद), तो यीशु उसकी आकांक्षा की पूर्ति में मदद करने के लिए उसके सामने प्रकट हुआ। उसके बाद के सात वर्षों में पतरस ने अपना जीवन स्वयं को जानने में व्यतीत किया। इन सात वर्षों के पश्चात एक दिन उसे उलटा क्रूस पर चढ़ा दिया गया और इस तरह उसके असाधारण जीवन का अंत हो गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'पतरस के जीवन पर' से उद्धृत

जब तुम किसी दिन-विशेष तक अनुभव कर लोगे, तो तुम समझ जाओगे कि परमेश्वर का देहधारण, मानवता, उसका स्वरूप और जो वो प्रकट करता है, जितना सामान्य होता है, उतना ही बड़ा हमारा उद्धार होता है, और ये चीज़ें जितनी अधिक सामान्य होती हैं, उतनी ही हमारी ज़रूरत के अनुरूप होती हैं। अगर परमेश्वर का देहधारण अलौकिक होता, तो भले ही हम धरती पर परमेश्वर द्वारा चुने गए और बचाये गए होते, लेकिन हम में से किसी को भी उद्धार प्राप्त न होता। परमेश्वर की दीनता और अप्रत्यक्षता के कारण ही, देखने में असाधारण लगने वाले परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के कारण ही, इंसान को उद्धार का अवसर मिलता है। क्योंकि लोगों में आज्ञाकारिता का अभाव और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव का सार है, परमेश्वर के प्रति सभी तरह की अवधारणाएं, ग़लतफहमियां और शत्रुता पैदा होती हैं; यही कारण है कि इन अवधारणाओं के परिणाम स्वरूप लोग अक्सर घमंड और आत्म-विश्वास से इस मसीह को अस्वीकार करते हैं और उसकी सामान्य मानवता को नकारते हैं—यह एक बड़ी गलती है। अगर तुम संपूर्ण उद्धार पाना चाहते हो, यदि तुम परमेश्वर का उद्धार पाना चाहते हो, उसका न्याय और उसकी ताड़ना पाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपनी विभिन्न अवधारणाओं और मसीह और उसकी सामान्य मानवता के बारे में भ्रामक परिभाषाओं को भुला देना होगा, तुम्हें मसीह के बारे में अपनी विभिन्न अंतर्दृष्टियों और रायों को अलग रखना होगा और परमेश्वर से आने वाली हर बात को स्वीकार करने के तरीके पर विचार करना होगा। केवल तभी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन और उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य धीरे-धीरे तुम्हारे हृदय में प्रवेश कर पाएंगे और तुम्हारा जीवन बन पाएंगे। अगर तुम उसका अनुसरण करना चाहते हो, तो तुम्हें उससे जुड़ी हर चीज़ को स्वीकार करना होगा; तुम्हें उसे हमेशा गलत समझने के लिए अपनी अवधारणाओं का इस्तेमाल करते हुए, उसके ख़िलाफ़ नहीं खड़ा होना चाहिए, तुम्हें अपनी अवधारणाओं से चिपकना छोड़ना होगा और लगातार उसके प्रति ग़लतफहमी और संदेह नहीं रखना होगा या उसका विरोध और प्रतिरोध भी नहीं करना होगा। ऐसी प्रवृत्ति के साथ, तुम सिर्फ़ अपना नुकसान कर सकते हो; इससे तुम्हें ज़रा सा भी लाभ नहीं होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

तुम सबके शब्दों और व्यवहार में मसीह के प्रति तुम्हारे अविश्वास के तत्व प्रकट होते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो उसके इरादों और लक्ष्यों में अविश्वास व्याप्त रहता है। यहाँ तक कि तुम सबकी नज़रों में भी मसीह के प्रति अविश्वास होता है। यह कहा जा सकता है कि पल-प्रति-पल तुम सब अविश्वास के तत्वों को स्थान देते हो। इसका अर्थ है किहर पल तुम सब मसीह के साथ विश्वासघात करने के खतरे में हो, क्योंकि तुम सबके शरीर में दौड़ने वाला रक्त देहधारी परमेश्वर में अविश्वास से तर रहता है। इसलिए, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर पर विश्वास के मार्ग पर जिन पदचिह्नों को तुम छोडते हो, वे वास्तविक नहीं हैं; जब तुम लोग परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चलते हो, तो तुम जमीन पर अपने पैर मजबूती से नहीं रखते—तुम बस बेमन से कार्य करते हो। तुम सब कभी मसीह के वचनों पर पूरी तरह से विश्वास नहीं करते और उन्हें तुरंत अभ्यास में लाने में अक्षम हो। यही कारण है कि तुम सब मसीह पर विश्वास नहीं करते, और हमेशा उसके बारे में धारणाएँ रखना एक अन्य कारण है कि तुम मसीह पर विश्वास नहीं करते। मसीह के कार्य के बारे में हमेशा संशय ग्रस्त रहना, मसीह के वचनों पर कान न देना, मसीह के द्वारा किए गए जो भी कार्य हैं उनके बारे में राय रखना और उसके कार्य को सही तरह से समझने में समर्थ नहीं होना, तुम्हें चाहे कैसा भी स्पष्टीकरण क्यों न प्राप्त हो, अपनी धारणाओं को छोड़ने में कठिनाई महसूस करना, इत्यादि—ये सभी अविश्वास के तत्व तुम सबके हृदय में मिश्रित हो गए हैं। यद्यपि तुम सब मसीह के कार्य का अनुसरण करते हो और कभी भी पीछे नहीं रहते हो, किन्तु तुम सबके हृदयों में अत्यधिक विद्रोह मिश्रित हो गया है। यह विद्रोह परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की एक अशुद्धि है। शायद तुम सबको ऐसा न लगता हो, किन्तु यदि इसमें तुम अपने इरादों को नहीं पहचान सकते, तो तुम्हारा उन लोगों में से होना निश्चित है जो नष्ट होंगे, क्योंकि परमेश्वर केवल उन्हें ही पूर्ण करता है जो वास्तव में उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें नहीं जो उस पर संशय करते हैं, और उन सबको तो बिल्कुल नहीं जो कभी भी उसे परमेश्वर न मानने के बावजूद उसका अनिच्छा से अनुसरण करते हैं।

कुछ लोग सत्य में आनंदित नहीं होते, न्याय में तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग शक्ति के खोजी कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। हालंकि उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे आधा विश्वास करते हैं; और वे अपने दिलो-दिमाग को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं, वे मुख से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और वे मसीह की ओर दूसरी नजर भी नहीं डालते। उनके हृदय प्रसिद्धि, वैभव और महिमा पर ही टिक गए हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा मामूली व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाबना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ लोग परमेश्वर के द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वास करने से अधिक, वे बेहूदे जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते है और केवल बड़े समूहों और सम्प्रदायों को सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करता है; वे तो बस ऐसे गद्दार हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की प्रशंसा करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन व्यभिचारियों से प्रेम करते हो जो संसार की कीचड़ में लोट लगाते हैं। तुम मसीह की पीड़ा पर हँसते हो, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हो जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और अय्याशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, परन्तु उन धृष्ट मसीह-विरोधियों की बाँहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालाँकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अब भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत की ओर, उनके प्रभाव की ओर मुड़ता है। फिर भी तुम ऐसा रवैया बनाये रखते हो जहाँ तुम मसीह के कार्य को गले से उतारना कठिन पाते हो और उसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और चारा नहीं था। तुम्हारे हृदय में हमेशा बुलंद छवियों का स्थान रहा है; तुम न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हो। तुम सबके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह उत्कृष्ट तो बिल्कुल नहीं है।

बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य का सम्मान नहीं करते हैं वे सभी अविश्वासी और सत्य के प्रति गद्दार हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अधिक अविश्वास है, और मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुमको इस तरह से शिक्षा देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें सम्पूर्ण हृदय से खुद को समर्पित कर देना चाहिए; दुविधाग्रस्त या अधूरे मन वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर इस संसार या किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उन सबका है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, उन सबका जो उसकी आराधना करते हैं, और उन सबका है जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

तुम लोग लालायित रहते हो कि परमेश्वर तुम पर प्रसन्न हो, मगर तुम लोग परमेश्वर से दूर हो। यह क्या मामला है? तुम लोग केवल उसके वचनों को स्वीकार करते हो, उसके व्यवहार या काट-छाँट को नहीं, उसके प्रत्येक प्रबंध को स्वीकार करने, उस पर पूर्ण विश्वास रखने में तो तुम बिलकुल भी समर्थ नहीं हो। तो आखिर मामला क्या है? अंतिम विश्लेषण में, तुम लोगों का विश्वास अंडे के खाली खोल के समान है, जो कभी चूज़ा पैदा नहीं कर सकता। क्योंकि तुम लोगों का विश्वास तुम्हारे लिए सत्य लेकर नहीं आया है या उसने तुम्हें जीवन नहीं दिया है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों को पोषण और आशा का एक भ्रामक बोध दिया है। पोषण और आशा का बोध ही परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का उद्देश्य है, सत्य और जीवन नहीं। इसलिए मैं कहता हूँ कि परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का आधार चापलूसी और बेशर्मी से परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं रहा है, और उसे किसी भी तरह से सच्चा विश्वास नहीं माना जा सकता। इस प्रकार के विश्वास से कोई चूज़ा कैसे पैदा हो सकता है? दूसरे शब्दों में, इस तरह के विश्वास से क्या हासिल हो सकता है? परमेश्वर में विश्वास का प्रयोजन लक्ष्य पूरे करने में उसका उपयोग करना है। क्या यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के अपमान का एक और तथ्य नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, परंतु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो; लेकिन मैं तुम लोगों के विचार स्वीकार नहीं करता; मैं केवल उन लोगों की सराहना करता हूँ, जो अपने पैरों को ज़मीन पर रखते हैं और पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किंतु उनकी सराहना कभी नहीं करता, जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने भी वफादार क्यों न हों, अंत में वे दुष्टों को दंड देने वाले मेरे हाथ से बचकर नहीं निकल सकते। ये लोग दुष्ट हैं; ये वे बुरे लोग हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी खुशी से मसीह का आज्ञापालन नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सब सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते, और इसके अलावा, उसे स्वीकार नहीं करते। क्या तुम समझते हो कि जब तक तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति वफादार हो, तब तक मसीह के प्रति जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो? गलत! मसीह के प्रति तुम्हारी अज्ञानता स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति अज्ञानता है। तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति चाहे कितने भी वफादार क्यों न हो, यह मात्र खोखली बात और दिखावा है, क्योंकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य के लिए न केवल सत्य और अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त करने में सहायक है, बल्कि इससे भी अधिक, मनुष्य की भर्त्सना करने और उसके बाद दुष्टों को दंडित करने के लिए तथ्य हासिल करने में सहायक है। क्या तुमने यहाँ लाभदायक और हानिकारक परिणामों को समझ लिया है? क्या तुमने उनका अनुभव किया है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र ही किसी दिन इस सत्य को समझो : परमेश्वर को जानने के लिए तुम्हें न केवल स्वर्ग के परमेश्वर को जानना चाहिए, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, पृथ्वी के परमेश्वर को भी जानना चाहिए। अपनी प्राथमिकताओं को गड्डमड्ड मत करो या गौण को मुख्य की जगह मत लेने दो। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर के साथ वास्तव में एक अच्छा संबंध बना सकते हो, परमेश्वर के नज़दीक हो सकते हो, और अपने हृदय को उसके और अधिक निकट ले जा सकते हो। यदि तुम काफी वर्षों से विश्वासी रहे हो और लंबे समय से मुझसे जुड़े हुए हो, किंतु फिर भी मुझसे दूर हो, तो मैं कहता हूँ कि अवश्य ही तुम प्रायः परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हो, और तुम्हारे अंत का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होगा। यदि मेरे साथ कई वर्षों का संबंध न केवल तुम्हें ऐसा मनुष्य बनाने में असफल रहा है जिसमें मानवता और सत्य हो, बल्कि, इससे भी अधिक, उसने तुम्हारे दुष्ट तौर-तरीकों को तुम्हारी प्रकृति में बद्धमूल कर दिया है, और न केवल तुम्हारा अहंकार पहले से दोगुना हो गया है, बल्कि मेरे बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं, यहाँ तक कि तुम मुझे अपना छोटा सह-अपराधी मान लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारा रोग अब त्वचा में ही नहीं रहा, बल्कि तुम्हारी हड्डियों तक में घुस गया है। तुम्हारे लिए बस यही शेष बचा है कि तुम अपने अंतिम संस्कार की व्यवस्था किए जाने की प्रतीक्षा करो। तब तुम्हें मुझसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँ, क्योंकि तुमने मृत्यु के योग्य पाप किया है, एक अक्षम्य पाप किया है। मैं तुम पर दया कर भी दूँ, तो भी स्वर्ग का परमेश्वर तुम्हारा जीवन लेने पर जोर देगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के प्रति तुम्हारा अपराध कोई साधारण समस्या नहीं है, बल्कि बहुत ही गंभीर प्रकृति का है। जब समय आएगा, तो मुझे दोष मत देना कि मैंने तुम्हें पहले नहीं बताया था। मैं फिर से कहता हूँ : जब तुम मसीह—पृथ्वी के परमेश्वर—से एक साधारण मनुष्य के रूप में जुड़ते हो, अर्थात् जब तुम यह मानते हो कि यह परमेश्वर एक व्यक्ति के अलावा कुछ नहीं है, तो तुम नष्ट हो जाओगे। तुम सबके लिए मेरी यही एकमात्र चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जो लोग जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं सदा के लिए परमेश्वर उनसे घृणा करेगा। मसीह अंत के दिनों के दौरान राज्य में जाने के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है, और ऐसा कोई नहीं जो उससे कन्नी काटकर जा सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, और इसलिए तुम्हें उसके वचनों को स्वीकार करना और उसके मार्ग का पालन करना चाहिए। सत्य को प्राप्त करने में या जीवन का पोषण स्वीकार करने में असमर्थ रहते हुए तुम केवल आशीष प्राप्त करने के बारे में नहीं सोच सकते हो। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वह उसमें सच्चा विश्वास करने वाले सभी लोगों को जीवन प्रदान कर सके। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और उसका कार्य वह मार्ग है जिसे उन सभी लोगों को अपनाना चाहिए जो नए युग में प्रवेश करेंगे। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और इसकी बजाय उसकी भर्त्सना, निंदा, या यहाँ तक कि उसे उत्पीड़ित करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर करने के लिए अपना कार्य सौंपा है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते हो जो अंत के दिनों के मसीह के द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को जो प्रतिशोध सहना होगा वह सभी के लिए स्वत: स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करोगे, यदि तुम अंत के दिनों के मसीह को ठुकराओगे, तो तुम्हारी ओर से परिणाम भुगतने वाला कोई अन्य नहीं होगा। इतना ही नहीं, इस दिन के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का दूसरा अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने प्रायश्चित का प्रयास भी करते हो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देखोगे। क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, तुम जिसे ठुकरा रहे हो वह कोई अदना प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या परिणाम होंगे? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं, बल्कि एक जघन्य अपराध किया होगा। और इसलिए मैं सभी को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने जहरीले दाँत मत दिखाओ, या छिछोरी आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने नहीं दे सकता, और न ही तुम्हें दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

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