60. परमेश्‍वर का वचन सत्‍य पर सहभागिता के सिद्धान्‍त

(1) परमेश्‍वर के वचनों के न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करना, साथ ही उनके द्वारा की गयी काट-छाँट और निपटे जाने को स्‍वीकार करना आवश्‍यक है, और व्‍यक्ति को सत्‍य को स्‍वीकार करना तथा उसका अभ्‍यास करना अनिवार्य है। ऐसा करने के बाद सत्‍य के बारे में व्‍यक्ति की सहभागिता व्‍यावहारिक हो जाती है;

(2) परमेश्‍वर के वचनों की रोशनी में सत्‍य के हर पक्ष पर सहभागिता आवश्‍यक है। धारणाओं, पूर्वग्रहों, या कल्‍पनाओं से स्‍वयं को कलंकित मत करो, इसकी बजाय उस पर चर्चा करो जो तुम अनुभव से जानते हो;

(3) परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों के बीच वास्‍तविक समस्‍याओं पर सीधे-सीधे बात करो। उन्‍हें सीधे-सीधे लक्ष्‍य बनाओ और सत्‍य के सहारे उन्‍हें हल करो, और धर्म-मतों पर खोखली बातचीत से बचो;

(4) सत्‍य पर संवाद के दौरान पवित्र आत्‍मा की प्रबुद्धता और रोशनी का अनुसरण करना आवश्‍यक है। निर्धारित नियमों के मुताबिक़, यान्त्रिक ढंग से सहभागिता मत करो; दूसरों को सत्‍य को समझने और उसके अभ्‍यास का मार्ग चुनने की गुंजाइश दो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना तुम्हारी बातचीत का सिद्धांत होना चाहिए। आमतौर पर, जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत करनी चाहिए, उसके वचन को बातचीत का विषय बनाना चाहिए; बात करना चाहिए कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। जबतक तुम परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। परमेश्वर के वचन के संसार को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के सहयोग की आवश्यकता है। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो तो परमेश्वर अपना काम नहीं कर पाएगा। यदि तुम अपना मुँह बंद रखोगे और परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे तो वह तुम्हें रोशन नहीं कर पाएगा। जब भी तुम कोई दूसरा काम नहीं कर रहे, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करो। व्यर्थ की बातें मत करो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। कोई बात नहीं यदि तुम्हारी सहभागिता सतही है। सतह के बिना कोई गहराई नहीं हो सकती। एक प्रक्रिया का होना ज़रूरी है। अपने प्रशिक्षण द्वारा तुम पवित्र आत्मा से प्राप्त रोशनी को समझ लोगे और यह भी जान लोगे कि परमेश्वर के वचन को प्रभावी तरीके से कैसे खाएँ-पिएँ। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। केवल जब तुम सहयोग करने का संकल्प करोगे तभी पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में तुम समर्थ होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, लोगों का शुद्धिकरण करने और उनके स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; इस बारे में भी बात करो कि परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्क हीन माना जाएगा। तुम्हें अपने असल अनुभव की वास्तविक, सच्ची और दिल से निकली बातों पर ज़्यादा बात करनी चाहिए; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। अत: कोई भी व्यक्ति उस पर संगति नहीं कर सकता जिसका उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच पाता है, वे ऐसी चीज़ें हैं जो उसके भीतर नहीं हैं। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसके अनुभव से नहीं आया है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धांत है। सीधे-सीधे कहें तो, उसके वचनों में कोई वास्तविकता नहीं होती। यदि तुम समाज की चीज़ों से कभी संपर्क में न आते, तो तुम समाज के जटिल संबंधों की स्पष्टता से संगति करने में समर्थ नहीं होते। यदि तुम्हारा कोई परिवार न होता परन्तु अन्य लोग परिवारिक मुद्दों के बारे में बात करते, तो तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ पाते। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है, वे उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि किसी ने ताड़ना और न्याय के बारे में अपनी समझ की संगति की, परन्तु तुम्हारे पास उसका कोई अनुभव नहीं है, तो तुम उसके ज्ञान को नकारने का साहस नहीं करोगे उसके बारे में सौ प्रतिशत निश्चित होने का साहस तो बिलकुल भी नहीं करोगे। क्योंकि उसकी संगति ऐसी चीज़ है जिसका तुमने कभी अनुभव नहीं किया है, जिसके बारे में तुमने कभी जाना नहीं है, तुम्हारा मन उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। तुम उसके ज्ञान से बस भविष्य में ताड़ना और न्याय से गुज़रने का एक मार्ग पा सकते हो। परन्तु यह मार्ग केवल एक सैद्धांतिक ज्ञान ही हो सकता है; यह तुम्हारी समझ का स्थान नहीं ले सकता, तुम्हारे अनुभव का स्थान तो बिलकुल भी नहीं ले सकता। शायद तुम सोचते हो कि जो कुछ वह कहता है वह काफी सही है, परन्तु अपने अनुभव में, तुम इसे अनेक बातों में अव्यावहारिक पाते हो; उस समय तुम इसके बारे में धारणाएँ पाल लेते हो, तुम इसे स्वीकार तो करते हो, लेकिन केवल अनिच्छा से। परन्तु जब तुम अनुभव करते हो, तो वह ज्ञान जिससे तुमने धारणाएँ बनायी थीं, तुम्हारे अभ्यास का मार्ग बन जाता है। जितना अधिक तुम अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम उन वचनों के सही मूल्य और अर्थ को समझते हो जो तुमने सुने हैं। स्वयं अनुभव प्राप्त कर लेने के पश्चात्, तुम उस ज्ञान के बारे में बात कर पाते हो जो तुम्हारे पास उन चीज़ों के बारे में होना चाहिए जो तुमने अनुभव की हैं। इसके साथ, तुम ऐसे लोगों के बीच अंतर कर सकते हो जिनका ज्ञान वास्तविक और व्यावहारिक है और ऐसे लोग जिनका ज्ञान सिद्धांत पर आधारित है और बेकार है। इसलिए, वह ज्ञान जिसकी तुम चर्चा करते हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्‍हारे पास उसका व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सच्चाई होगी, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। तुम अपने अनुभव के माध्यम से, विवेक और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपने ज्ञान को गहरा कर सकते हो, तुम्हें कैसा आचरण करना चाहिए, इस बारे में अपनी बुद्धि और सामान्य बोध बढ़ा सकते हो। जिन लोगों में सत्य नहीं होता, उनके द्वारा व्यक्त ज्ञान मात्र सिद्धांत होता है, फिर भले ही वह ज्ञान कितना ही ऊँचा क्यों न हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो, परन्तु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तो वह अंतर नहीं कर पाता। क्योंकि आध्यात्मिक मामलों में ऐसे लोगों को कोई अनुभव नहीं होता। ऐसे लोग आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं होते और आध्यात्मिक मामलों को बिल्कुल नहीं समझते। चाहे तुम किसी भी तरह का ज्ञान व्यक्त करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल सिद्धांत की ही बात करते हैं—जिनमें सत्य या वास्तविकता नहीं होती—वे जिस बारे में बात करते हैं, उसे उनका अस्तित्व भी कहा जा सकता है, क्योंकि उनका सिद्धांत गहरे चिंतन से ही आया है और यह उनके गहरे मनन का परिणाम है। परन्तु यह केवल सिद्धांत ही है, यह कल्पना से अधिक कुछ नहीं है! विभिन्न प्रकार के लोगों के अनुभव उनकी आंतरिक चीज़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आध्यात्मिक अनुभव के बिना कोई सत्य के ज्ञान पर बात नहीं कर सकता, न ही विभिन्न आध्यात्मिक चीज़ों के सही ज्ञान के बारे में बात कर सकता है। इंसान वही व्यक्त करता है जो वह भीतर से होता है—यह निश्चित है। यदि कोई आध्यात्मिक चीज़ों और सत्य का ज्ञान पाना चाहता है, तो उसके पास वास्तविक अनुभव होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और वास्तविक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना अधिक ज्ञान बोल पाता है जितनी समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम; जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करवाता है। ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों को अनमोल खजाने की तरह मत बरत; वे दुखदाई हैं और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों की बात कर पाते हैं—लेकिन इनमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग दूसरों को सही राह पर ले जाने में अक्षम होते हैं और उन्हें केवल गुमराह ही करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे लोगों के वर्तमान कष्टों का निवारण तो करना ही चाहिए, उन्हें प्रवेश करने देना चाहिए; केवल यही समर्पण माना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्द मत बोला कर, और दूसरों को अपने आज्ञापालन में बाँधने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह केवल उनके भ्रम को ही बढ़ा सकता है। इस तरह करते रहने से बहुत वाद उत्पन्न होगा, जो लोगों को तुझसे घृणा करवाएगा। ऐसी है मनुष्य की कमी, और यह सचमुच अत्यंत लज्जाजनक है। इसलिए वास्तविक रूप में विद्यमान समस्याओं की अधिक बात कर। अन्य लोगों के अनुभवों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह मत बरत और उन्हें ऊँचा थामकर रख ताकि दूसरे प्रशंसा कर पाएँ; तुझे अपना विशिष्ट मुक्ति का मार्ग खोजना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

यदि तुम जो संगति करते हो वह लोगों को चलने के लिए मार्ग दे सकती है, तो यह तुम्हारे वास्तविकता से युक्त होने के बराबर है। तुम चाहे जो कहो, तुम्हें लोगों को अभ्यास में लाना और उन सभी को एक मार्ग देना चाहिए जिसका वे अनुसरण कर सकें। उन्हें केवल ज्ञान ही मत पाने दो; अधिक महत्वपूर्ण चलने के लिए मार्ग का होना है। लोग परमेश्वर में विश्वास करें, इसके लिए उन्हें परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में दिखाए गए मार्ग पर चलना चाहिए। अर्थात, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया पवित्र आत्मा द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने की प्रक्रिया है। तदनुसार, तुम्हारे पास एक ऐसा मार्ग होना चाहिए जिस पर तुम चल सको, फिर चाहे जो हो, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के मार्ग पर चलना चाहिए। बहुत अधिक पीछे मत छूट जाओ, और बहुत सारी चीज़ों की चिंता में मत पड़ो। यदि तुम बाधाएँ उत्पन्न किए बिना परमेश्वर द्वारा दिखाए मार्ग पर चलते हो, तभी तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो और प्रवेश का मार्ग पा सकते हो। यही परमेश्वर के प्रयोजनों के अनुरूप होना और मानवता का कर्तव्य पूरा करना माना जाता है। इस धारा का व्यक्ति होने के नाते, प्रत्येक व्यक्ति को अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करना चाहिए, वह और अधिक करना चाहिए जो लोगों को करना चाहिए, और मनमाने ढंग से काम नहीं करना चाहिए। कार्य कर रहे लोगों को अपने शब्द स्पष्ट करने चाहिए, अनुसरण कर रहे लोगों को कठिनाइयों का सामना करने और आज्ञापालन करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए, सभी को अपनी भूमिका तक सीमित रहना चाहिए और सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कैसे अभ्यास करना है और क्या कार्य पूरा करना है। पवित्र आत्मा द्वारा दिखाया गया मार्ग लो; भटक मत जाना या ग़लती मत करना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, हालाँकि वे सतही तौर पर परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते नज़र आते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचनों पर मात्र शाब्दिक चर्चा कर रहे होते हैं, उनकी बातों में सार्थक कुछ नहीं होता। उनके उपदेश किसी भाषा की पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं,मद-दर-मद, पहलू-दर-पहलू क्रम-बद्ध किये हुए, और जब वे बोल लेते हैं, तो यह कहकर हर कोई उनका स्तुति गान करता है: "इस व्यक्ति में वास्तविकता है। उसने इतने अच्छे ढंग से और इतने विस्तार से समझाया।" जब उनका उपदेश देना समाप्त हो जाता है, तो ये लोग दूसरे लोगों से इन सारी चीज़ों को इकट्ठा करके सभी को भेज देने के लिये कहते हैं। उनके कृत्य दूसरों का कपट बन जाते हैं और वे लोग जिन बातों का प्रचार करते हैं, वे सब भ्राँतियाँ होती हैं। देखने में ऐसा लगता है, जैसे ये लोग मात्र परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और यह सत्य के अनुरूप दिखता है। लेकिन अगर अधिक गौर से समझेंगे तो तुम देखोगे कि यह शब्दों और सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है। यह सब इंसानी कल्पनाओं और धारणाओं के साथ झूठी विवेक-बुद्धि है, साथ ही कुछ हिस्सा ऐसा है जो परमेश्वर को सीमांकित करता है। क्या इस तरह का उपदेश परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं है? यह एक ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का विरोध करती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कलीसिया के भीतर की असली समस्याओं को नहीं देख पाते। किसी सभा को संबोधित करते हुए उन्हें लगता है कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे सिर्फ खानापूरी करते हैं और कुछ अक्षर और धर्म-सिद्धांत उगल देते हैं। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो कुछ कह रहे हैं वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं, फिर भी वे बोलते चले जाते हैं। आखिर में, उन्हें खुद भी महसूस होता है कि उनके शब्द कितने नीरस हैं, और जब उनके भाई और बहनें इन्हें सुनते हैं तो वे भी सोचते हैं कि ये लोग कितने जड़बुद्धि हैं। क्या ऐसा ही नहीं होता है? अगर उन्हें यह सब बोलने के लिए खुद को मजबूर करना पड़ता है, तो एक तरफ तो पवित्र आत्मा उनके भीतर कार्य नही कर रहा है, और दूसरी तरफ़, उनके शब्दों से लोगों को कोई फायदा नहीं होता है। अगर तुमने सत्य का अनुभव नहीं किया है, लेकिन फिर भी तुम इसके बारे में बोलना चाहते हो, तो तुम चाहे जो भी कहते रहो, तुम सत्य तक नहीं पहुँच पाओगे; और तुम जो भी आगे कहोगे वे सिर्फ अक्षर और धर्म-सिद्धांत होंगे। तुम शायद यह सोचोगे कि वे काफी प्रबुद्ध बातें हैं, पर वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं; वे सत्य वास्तविकता नहीं हैं; और सुनने वाले कितनी ही कोशिश क्यों न करें, वे उनसे कुछ भी वास्तविक प्राप्त नहीं कर पाएंगे। हो सकता है कि सुनते समय वे ऐसा महसूस करें कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह सही है, लेकिन बाद में वे इसे पूरी तरह से भूल जाएंगे। अगर तुम अपनी वास्तविक अवस्थाओं के बारे में बात नहीं कर रहे हो, तो तुम लोगों के दिलों को नहीं छू पाओगे; वे इसे भूल जाएंगे, भले ही वे इसे याद रखना चाहें, और तुम उनकी कोई मदद नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हारा ऐसी किसी स्थिति से सामना होता है, जहाँ तुम बोलना चाहते हो लेकिन तुम्हें लगता है कि तुम चीजों के बारे में इस तरह से बात नहीं कर सकते कि सत्य तक पहुँच पाओ, और तुम्हारे पास सिर्फ कुछ धर्म-सिद्धांत से जुड़ी जानकारी है, जबकि तुम मूलभूत चीजों के बारे में कुछ भी नहीं जानते, और अगर दूसरों ने मूलभूत प्रकृति के प्रश्न उठा लिए तो तुम उनके उत्तर नहीं दे पाओगे, तो बेहतर यही है कि तुम कुछ भी न कहो। ऐसे अवसर भी होते हैं जब तुम एक सभा में किसी विषय पर चर्चा कर रहे होते हो, और ऐसा महसूस करते हो कि तुम इसके बारे में काफी जानकारी रखते हो, और कुछ वास्तविक चीजों के बारे में संगति कर सकते हो। लेकिन अगर तुम इसके बारे में सतही स्तर पर चर्चा करते हो और गहरे स्तर पर कुछ कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होता, तो सभी लोग यह समझ जाते हैं, क्योंकि हो सकता है कि दूसरों ने कुछ चीजों का अनुभव न किया हो, और तुम्हें भी ऐसा कोई अनुभव न हो। ऐसी स्थिति में, तुम्हें अपने-आपको बोलते रहने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए, बल्कि इस विषय पर हर किसी को संगति करने के लिए कहना चाहिए। यदि तुम्हें लगता है कि यह सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत है, तो इसके बारे में कुछ बोलना व्यर्थ है, और यह दूसरों को सन्मार्ग पर लाने का काम नहीं करेगा; इस स्थिति में, तुम चाहे कोई बात भी कहो, पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं करेगा, और जब तुम किसी भी तरह जबर्दस्ती अपने-आपको दूसरों पर थोपते हो तो तुम बेतुकी और विकृत बातें कर सकते हो, और लोगों को भटका सकते हो। लोग अपेक्षाकृत गहन विचारों को थोड़ी-सी अवधि में पूरी तरह अपने दिमाग में नहीं बिठा पाते; अधिकांश लोगों की नींव बहुत कमजोर होती है और उनकी क्षमता भी कम होती है, इसलिए वे जो कुछ सुनते हैं उसे आसानी से अपनी स्मृति में नहीं बिठा पाते। पर वे बेतुकी बातों और नियामकों और धर्म-सिद्धांतों से जुड़ी बातों को झट से स्वीकार कर लेते हैं। कितनी विचित्र बात है! इसलिए, इस विषय में तुम्हें विशेष ध्यान देना चाहिए। लोग अहंवादी होते हैं और कई बार उनका दंभ उन पर हावी रहता है; वे अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो कुछ कह रहे हैं वह धर्म-सिद्धांत है, फिर भी वे बोलते चले जाते हैं, यह सोचते हुए कि भाइयों और बहनों को पता नहीं चलेगा। अपना मान बचाने के लिए वे उन चीजों को अनदेखा करके सिर्फ उस वक्त की स्थिति से निपटने पर ध्यान दे सकते हैं। क्या यह लोगों को सिर्फ मूर्ख बनाना नहीं है? यह परमेश्वर के प्रति अनिष्ठा को दर्शाता है। अगर तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य को समझता है, तो तुम मन-ही-मन अपने-आपको धिक्कारोगे, और ऐसा महसूस करोगे कि तुम इस तरह अब और नहीं बोल सकते और तुम्हें विषय को बदल देना चाहिए। तुम्हें जिस चीज का अनुभव है, तुम उसके बारे में संगति कर सकते हो, या तुम सत्य के बारे में जो कुछ जानकारी रखते हो, उसके बारे में भी बात कर सकते हो; अगर तुम किसी विषय के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं बोल सकते, तो तुम इसकी बजाय दूसरों के साथ इस विषय पर संगति कर सकते हो। एक ही व्यक्ति द्वारा बोलते रहना कभी अच्छा नहीं होता। चूंकि तुममें अनुभव की कमी है, इसलिए तुम चाहे कितनी भी अच्छी तरह से किसी चीज की कल्पना और अवधारणा कर सकते हो, पर तुम जो बात करोगे वह अंततः सिर्फ धर्म-सिद्धांत या मानवीय धारणाओं पर आधारित होगी। सत्य की श्रेणी में रखी जाने वाली चीजों का अनुभव होना जरूरी है। अनुभव के बिना कोई भी व्यक्ति सत्य के सार को पूरी तरह नहीं समझ सकता, सत्य के अनुभव की स्थितियों की स्पष्ट रूप से व्याख्या कर पाना तो दूर की बात है। कहने के लिए सचमुच कुछ होने से पहले व्यक्ति को सत्य का अनुभव होना चाहिए। कोई भी अनुभव न होना स्वीकार्य नहीं है; अगर तुम्हारे पास अनुभव हो भी, तो भी यह एक सीमित दायरे के भीतर ही होगा, और तुम कुछ सीमित स्थितियों पर ही बात कर सकोगे, उससे अधिक कुछ नही। यदि कोई सभा एक या दो ही विषयों के आसपास घूमती रहती है, तो इन विषयों पर बार-बार संगति करने के बाद, कुछ ऐसे लोग होंगे जो थोड़ा-बहुत समझने लगेंगे। दूसरी संभावना यह है कि बोलना शुरू करते ही तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम बहुत व्यवहारिक तरीके से बात कर रहे हो, पर तुम्हारे भाई और बहनें अभी भी सचमुच समझ नहीं पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि तुम्हारी स्थिति तुम्हारी स्थिति है, और तुम्हारे भाइयों और बहनों की स्थितियाँ कोई जरूरी नहीं कि बिल्कुल तुम्हारे जैसी हों। साथ ही, तुम्हारे पास इस विषय में कुछ अनुभव है, जबकि हो सकता है कि तुम्हारे भाइयों और बहनों के पास ऐसा अनुभव न हो, इसलिए वे ऐसा सोच सकते हैं कि जो बात तुम कर रहे हो वह उन पर लागू नहीं होती। इस तरह की स्थिति से सामना होने पर तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें उनकी स्थिति को समझने के लिए उनसे कुछ प्रश्न पूछने चाहिए। उनसे पूछो कि यह विषय सामने आने पर उनके ख्याल से किसी व्यक्ति को क्या करना चाहिए, और व्यक्ति को सत्य के अनुरूप अभ्यास कैसे करना चाहिए। इस तरह से थोड़ी संगति करने से आगे का एक रास्ता खुलेगा। इस तरीके से, तुम लोगों को मूल बिंदु पर ला सकते हो, और अगर तुम आगे भी संगति करते हो, तो तुम परिणाम हासिल कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

इसे भविष्य में स्मरण रखना। खोखले ज्ञान के विषय में बात मत करना; मात्र अभ्यास के मार्ग, और वास्तविकता के विषय में बात करना। वास्तविक ज्ञान से वास्तविक अभ्यास में पारगमन और फिर अभ्यास करने से वास्तविकता के जीवनयापन में पारगमन। दूसरों को उपदेश मत दो और वास्तविक ज्ञान के विषय में बात मत करो। यदि तुम्हारी समझ कोई मार्ग है, तो इसके अनुसार जो कहना है मुक्त रूप से कहो; यदि यह मार्ग नहीं है, तब कृपा करके चुपचाप बैठ जाओ और बात करना बन्द कर दो! जो कुछ तुम कहते हो वह बेकार है। तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को जलाने के लिए समझदारी की बातें करते हो। क्या यही तुम्हारी अभिलाषा नहीं है? क्या यह जानबूझकर दूसरों के साथ खिलवाड़ करना नहीं है? क्या इसका कोई मूल्य है? अगर अनुभव करने के बाद तुम समझदारी की बातें करोगे तो तुम्हें डींगें मारने वाला नहीं कहा जायेगा, अन्यथा तुम मात्र एक ऐसे व्यक्ति होगे जो घमण्ड की बातें करता रहता है। तुम्हारे वास्तविक अनुभव में ऐसी अनेक बातें हैं जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते और तुम अपनी देह से विद्रोह नहीं कर सकते; तुम हमेशा वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, कभी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करते, परन्तु फिर भी तुम में सैद्धान्तिक ज्ञान की बात करने की हिम्मत है। तुम बेशर्म हो! तुम परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ की बात करने की हिमाकत करते हो—तुम कितने ढीठ हो! उपदेश देना और डींगें मारना तुम्हारी प्रवृति बन चुकी है, और तुम ऐसा करने के अभ्यस्त हो चुके हो। जब कभी भी तुम बात करना चाहते हो तो तुम सरलता से ऐसा कर लेते हो और जब अभ्यास करने की बात आती है तब तुम साज-सज्जा में डूब जाते हो। क्या यह दूसरों को मूर्ख बनाना नहीं है? तुम मनुष्यों को मूर्ख बना सकते हो, परन्तु परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। मनुष्यों को पता नहीं होता और न ही उनमें पहचानने की योग्यता होती है, परन्तु परमेश्वर ऐसे मसलों के विषय में गम्भीर है, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। हो सकता है तुम्हारे भाई और बहनें तुम्हारा समर्थन करें, तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा करें, तुम्हारी सराहना करें, परन्तु यदि तुम में वास्तविकता नहीं है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें नहीं छोड़ेगा। सम्भवतः व्यवहारिक परमेश्वर तुम्हारी गलतियों को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं देगा, और तुम इसे सह नहीं पाओगे। क्या तुम इस पर विश्वास करते हो? अभ्यास की वास्तविकता के विषय में अधिक बात करो; क्या तुम वह पहले ही भूल चुके हो? "उथले सिद्धान्तों की बात और निस्सार वार्तालाप कम करो; अभी से अभ्यास आरम्भ करना सर्वोत्तम है।" क्या तुम ये वचन भूल चुके हो? क्या तुम इसे बिल्कुल नहीं समझते? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हुए परमेश्वर की गवाही देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर ऐसा क्यों कहता है, परमेश्वर यह कहकर क्या परिणाम पाना चाहता है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, परमेश्वर का स्वभाव क्या है—इन सभी के बारे में स्पष्ट रूप से संगति की जानी चाहिए। परमेश्वर के वचनों पर इस तरह संगति करने से परिणाम प्राप्त होगा। परमेश्वर के वचनों पर संगति करना मूल रूप से मसीह की गवाही देना और उसे ऊँचा उठाना है, ताकि लोग मसीह के पास जो है और वह जो है, उसे जान सकें। केवल यही परमेश्वर के प्रति सच्ची गवाही है, और परमेश्वर के वचनों पर की गयी सच्ची संगति है। यदि, परमेश्वर के वचनों पर संगति करते समय, केवल कुछ वचन और सिद्धांत ही बोले जायें, मसीह के पास जो है और वह जो है, इसकी गवाही न हो और जो संगति की जाती है, उसकी विषयवस्तु का संबंध, परमेश्वर की इच्छा, मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं, परमेश्वर के पास जो है और जो वह है और परमेश्वर के स्वभाव से न हो, तो इस तरह की संगति का कोई महत्व नहीं है और यह निष्प्रभावी है—यह परमेश्वर के वचनों के बारे में की गयी खोखली बातें हैं। यदि, परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हुए तुम परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर मनुष्य से जो माँगता है, उसे शामिल नहीं करते हो, तो तुम्हारे वचन मात्र छलावा हैं; तुम ऐसा दिखा रहे हो कि तुम्हें परमेश्वर के वचनों की बड़ी समझ है, और तुममें उसके वचनों पर संगति करने का बहुत कौशल है, लेकिन वास्तव में तुम केवल दिखावा कर रहे हो और खुद को ऊँचा उठा रहे हो। जो लोग परमेश्वर के वचनों पर इस तरह संगति करते हैं, वे सभी झूठे अगुआ हैं, मसीह-विरोधी हैं। तुम परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हुए मसीह के पास जो है और वह जो है उसकी गवाही देते हो, गवाही देते हो कि मसीह ही परमेश्वर है, लोगों को परमेश्वर के वचन समझाते हो, और उनसे सच में मसीह की आज्ञा और उसका भय मनवाते, और उसकी आराधना करवाते हो। ऐसा करते हुए, तुम परमेश्वर के वचनों पर जितना अधिक संगति करते हो, उतना ही लोग परमेश्वर को जानेंगे, और मसीह के प्रति उनकी आज्ञाकारिता भी उतनी ही अधिक होगी। केवल परमेश्वर के वचनों की ऐसी संगति ही मसीह के प्रति सच्ची गवाही है और उसे ऊँचा उठाना है; केवल यही परमेश्वर की सेवा करने के लिए सच्चा काम है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

Iसमझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग,सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के लिए...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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