73. कलीसिया से निष्‍कासन के सिद्धांत

(1) ऐसे बुरे लोगों को निष्‍कासित कर देना चाहिए जो सत्‍य से प्रेम नहीं करते या उसे स्‍वीकार नहीं करते, और जो कलीसिया के जीवन में बार-बार व्यवधान पैदा करने में सक्षम हैं।

(2) ऐसे लोगों के लिए निष्‍कासन का सामना करना अनिवार्य है जिनकी समझ बेहूदी है, जो असामान्‍य रूप से अहंकारी हैं, और जो परमेश्‍वर के बारे में अक्‍सर धारणाएँ और गलतफहमियाँ पालते रहते हैं और उसके बारे में फै़सले सुनाते रहते हैं।

(3) जो लोग अगुआओं और कार्यकर्ताओं के प्रति असंतोष भड़काते हुए परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करने की निरंतर महत्त्‍वाकांक्षा पाले रहते हैं, वे मसीह-विरोधियों की कोटि में आते हैं और उन्‍हें निष्‍कासन का सामना करना चाहिए।

(4) ऐसे तमाम तरह के अविश्‍वासियों और बुरे लोगों को निष्‍कासित किया जाना चाहिए जो सत्‍य को जरा-भी स्‍वीकार नहीं कर सकते या जो काट-छाँट और, निपटारे को स्वीकार नहीं कर सकते, और जो, इसके अतिरिक्त तरह-तरह के दुष्‍कृत्‍य करने में सक्षम हैं।

(5) उन लोगों को निष्‍कासित किया जाना चाहिए जो दैत्‍यों के वशीभूत हैं या जिनके भीतर दुष्ट आत्‍माएँ सक्रिय हैं, और जो, इसके अतिरिक्त, निरंतर झूठ फैलाते हुए दूसरों को छलते रहते हैं और कलीसिया के जीवन में बाधा पहुंचाते रहते हैं।

(6) जो लोग बार-बार परमेश्‍वर को अर्पित चढ़ावे में हेराफेरी करते हैं या उसके प्रति अपव्‍ययी होते हैं, और जो, तरह-तरह के बहानों से, परमेश्वर को अर्पित चढ़ावे को लेकर ललचाए रहते हैं, ऐसे लोगों को, सारे गंभीर मामलों में, निष्‍कासित किया जाना चाहिए।

(7) जिन लोगों का अक्‍सर रोमानी रिश्‍तों और व्‍यभिचार में लिप्त होना प्रमाणित हो चुका हो, और जो असामान्‍य रूप से दुष्‍कर्मी हों, और इस तरह जो दूसरे लोगों पर अत्यंत बुरा प्रभाव डाल रहे हों, और जो, बार-बार समझाए जाने के बावजूद, अपने रवैये को न बदलते हों, उन्‍हें निष्‍कासित किया जाना चाहिए।

(8) ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह-विरोधियों को निष्‍कासित किया जाना चाहिए जो कार्य-व्‍यवस्‍थाओं का गंभीर उल्‍लंघन करते हैं और स्‍वेच्‍छाचार से कलीसिया में अव्‍यवस्‍था फैलाते हैं और परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों को अपने मोहपाश में फँसाते हैं।

(9) जो कोई भी प्रभु या अपने भाई-बहनों के साथ विश्‍वासघात करता है, और कलीसिया को बड़े लाल अजगर की सेवा में उलझाता है, उसकी पिछली उपलब्धियाँ चाहे जो भी हों, उसे निष्‍कासन का सामना करना चाहिए।

(10) अगर किसी व्‍यक्ति को निष्‍कासित किया जाना है, तो कलीसिया के पास ऐसे समुचित साक्ष्‍य होने चाहिए जिनकी तथ्‍यों के साथ पूरी संगति बैठती हो, और जिन पर सदस्यों के बहुमत की सहमति हो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

बड़े लाल अजगर के देश में मैंने कार्य का एक ऐसा चरण पूरा कर लिया है, जिसकी थाह मनुष्य नहीं पा सकते, इसके कारण वे हवा में डोलने लगते हैं, जिसके बाद कई लोग हवा के वेग में चुपचाप बह जाते हैं। सचमुच, यह एक ऐसी "खलिहान" है जिसे मैं साफ़ करने वाला हूँ, यही मेरी लालसा है और यही मेरी योजना है। क्योंकि जब मैं कार्य कर रहा होता हूँ, तो कई दुष्ट लोग चोरी-छिपे आ घुसे हैं, लेकिन मुझे इन्हें खदेड़ कर निकालने की कोई जल्दी नहीं है। इसके बजाय, सही समय आने पर मैं उन्हें छिन्न-भिन्न कर दूँगा। केवल इसके बाद ही मैं जीवन का सोता बनूँगा, और उन लोगों को जो मुझे सच में प्रेम करते हैं, मुझसे अंजीर के पेड़ का फल और कुमुदिनी की सुगंध प्राप्त करने दूँगा। उस देश में जहाँ शैतान का डेरा है, जो गर्दो-गुबार का देश है, वहाँ अब शुद्ध सोना नहीं रहा, सिर्फ रेत ही रेत है, और इसलिए इन हालत को देखते हुए, मैं कार्य का ऐसा चरण पूरा करता हूँ। तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं जो प्राप्त करता हूँ वह रेत नहीं बल्कि शुद्ध, परिष्कृत सोना है। दुष्ट लोग मेरे घर में कैसे रह सकते हैं? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवी कैसे बनने दे सकता हूँ। मैं इन चीज़ों को खदेड़ने के लिए हर संभव तरीका अपनाता हूँ। मेरी इच्छा प्रकट होने से पहले कोई भी यह नहीं जानता कि मैं क्या करने वाला हूँ। इस अवसर का लाभ उठाते हुए, मैं उन दुष्टों को दूर खदेड़ देता हूँ, और वे मेरी उपस्थिति को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मैं दुष्टों के साथ यही करता हूँ, लेकिन फिर भी उनके लिए एक ऐसा दिन होगा जब वे मेरे लिए सेवा कर पाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सात गर्जनाएँ गूँजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएँगे' से उद्धृत

मेरा योजनाबद्ध कार्य पल भर भी रुके बिना आगे बढ़ता रहता है। राज्य के युग में रहने लगने के बाद, और तुम लोगों को अपने लोगों के रूप में अपने राज्य में ले जाने के बाद, मेरी तुम लोगों से अन्य माँगें होंगी; अर्थात्, मैं तुम लोगों के सामने उस संविधान को लागू करना आरंभ करूँगा जिसके साथ मैं इस युग पर शासन करूँगा :

चूँकि तुम सभी मेरे लोग कहलाते हो, इसलिए तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि मेरे नाम को महिमामंडित कर सको; अर्थात्, परीक्षण के बीच गवाही दे सको। यदि कोई मुझे मनाने की कोशिश करता है और मुझसे सच छुपाता है, या मेरी पीठ पीछे अपकीर्तिकर व्यवहार करता है, तो ऐसे लोगों को, बिना किसी छूट के मेरे घर से खदेड़ और बाहर निकाल दिया जाएगा ताकि वे इस बात के लिए मेरा इंतज़ार करें कि मैं उनसे कैसे निपटूँगा। अतीत में जो लोग मेरे प्रति विश्वासघाती रहे हैं और संतान की भांति नहीं रहे हैं, और आज फिर से खुलकर मेरी आलोचना करने के लिए उठ खड़े हुए हैं, उन्हें भी मेरे घर से खदेड़ दिया जाएगा। जो मेरे लोग हैं उन्हें लगातार मेरी ज़िम्मेदारियों के प्रति चिंता दर्शानी चाहिए और साथ ही मेरे वचनों को जानने की खोज करते रहना चाहिए। केवल इस तरह के लोगों को ही मैं प्रबुद्ध करूँगा, और वे निश्चित रूप से, कभी भी ताड़ना को प्राप्त न करते हुए, मेरे मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के अधीन रहेंगे। जो मेरी ज़िम्‍मेदारियों के प्रति चिंता दर्शाने में असफल रहते हुए, अपने खुद के भविष्य की योजना बनाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं—अर्थात वे जो अपने कार्यों के द्वारा मेरे हृदय को संतुष्ट करने का लक्ष्य नहीं रखते हैं, बल्कि इसके बजाय भोजन, धन, आदि सामान की तलाश में रहते हैं, मैं इन भिखारी-जैसे प्राणियों का उपयोग करने से पूरी तरह इनकार करता हूँ, क्योंकि वे जब से पैदा हुए हैं, वे बिलकुल नहीं जानते कि मेरी ज़िम्मेदारियों के प्रति चिंता दर्शाने के मायने क्या हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनमें सामान्य समझ का अभाव है; ऐसे लोग मस्तिष्क के "कुपोषण" से पीड़ित हैं, और उन्हें कुछ "पोषण" पाने के लिए घर जाने की आवश्यकता है। मेरे लिए ऐसे लोग किसी काम के नहीं हैं। जो मेरे लोग हैं उनमें से प्रत्येक को, मुझे अंत तक वैसे अनिवार्य कर्तव्य के रूप में जानना जरूरी होगा जैसे कि खाना, पहनना, सोना, जिसे कोई एक पल के लिए भी भूलता नहीं, ताकि अंत में, मुझे जानना खाना खाने जितनी जानी-पहचानी चीज़ बन जाए, जिसे तुम सहजतापूर्वक अभ्यस्त हाथों से करते हो। जहाँ तक उन वचनों की बात है जो मैं बोलता हूँ, तो प्रत्येक शब्द को अत्यधिक निष्ठा और पूरी तरह से आत्मसात करते हुए ग्रहण करना चाहिए; इसमें अन्यमनस्क ढंग से किए गए आधे-अधूरे प्रयास नहीं हो सकते हैं। जो कोई भी मेरे वचनों पर ध्यान नहीं देता है, उसे सीधे मेरा विरोध करने वाला माना जाएगा; जो कोई भी मेरे वचनों को नहीं खाता, या उन्हें जानने की इच्छा नहीं करता है, उसे मुझ पर ध्यान नहीं देने वाला माना जाएगा, और उसे मेरे घर के द्वार से सीधे बाहर कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए है, जैसा कि मैंने अतीत में कहा है, कि मैं जो चाहता हूँ, वह यह नहीं है कि बड़ी संख्या में लोग हों, बल्कि उत्कृष्टता हो। सौ लोगों में से, यदि कोई एक भी मेरे वचनों के द्वारा मुझे जानने में सक्षम है, तो मैं इस एक व्यक्ति को प्रबुद्ध और रोशन करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अन्य सभी को स्वेछा से छोड़ दूँगा। इससे तुम देख सकते हो कि यह अनिवार्य रूप से सत्य नहीं है कि बड़ी संख्या ही मुझे अभिव्यक्त कर सकती है, और मुझे जी सकती है। मैं गेहूँ (चाहे दाने पूरे भरे न हों) चाहता हूँ, न कि जंगली दाने (चाहे उसमें दाने इतने भरे हों कि मन प्रसन्न हो जाए)। उन लोगों के लिए जो तलाश करने की परवाह नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय शिथिलता से व्यवहार करते हैं, उन्हें स्‍वेच्‍छा से चले जाना चाहिए; मैं उन्हें अब और देखना नहीं चाहता हूँ, अन्‍यथा वे मेरे नाम को अपमानित करते रहेंगे। मैं अपने लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ उस बारे में, अभी मैं इन निर्देशों पर रुकता हूँ, और परिस्थितियाँ कैसे बदलती हैं, इस बात पर निर्भर करते हुए और स्वीकृतियाँ देने के लिए प्रतीक्षा करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 5' से उद्धृत

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर दुष्ट हरकतें करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

कुछ लोग मेरा अनुमोदन प्राप्त करने के लिए हमेशा मेरे सामने दिखावा करते हैं, वे मेरे सामने एक तरह से और मेरी पीठ पीछे दूसरी तरह से पेश आकर हमेशा मुझे धोखा देने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग दानव हैं, मैं चाहता हूँ कि वे मुझसे जितना हो सके दूर रहें, मैं उन्हें दोबारा कभी नहीं देखना चाहता। जब लोग कमजोर और अभावग्रस्त होते हैं, तो मैं उनका समर्थन कर सकता हूँ और उन्हें पोषण प्रदान कर सकता हूँ; अगर तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है, तो मैं तुम्हारे साथ सत्य के बारे में संगति कर सकता हूँ। लेकिन मैं दानवों के साथ लेन-देन नहीं करता, मैं उनकी बातें और उनके बहाने नहीं सुनता। शुरुआत में, जब हम बस मिले ही होते हैं, तुम एक नए विश्वासी होते हो, कुछ सत्य होते हैं जिन्हें तुम नहीं समझते, और तुम्हारे मूर्खतापूर्ण चीजें करने और कहने की संभावना होती है। इसलिए हम सत्य के बारे में संगति करते हैं। लेकिन अगर तुम कुछ सत्य समझते हो, और फिर भी ख्वाहमख्वाह समस्याएँ खड़ी करते हो, अगर तुम हमेशा मेरा विरोध करते हो और मेरे मामलों में बाल की खाल निकालते हो, तो मैं इतनी विनम्रता से पेश नहीं आऊँगा। क्यों? क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जिसे बचाया जा सकता है, तो मुझे तुम्हारे प्रति विनम्र क्यों होना चाहिए? विनम्र होने का अर्थ है सहिष्णु और धैर्यवान होना। मैं मूर्खों के साथ, साधारण भ्रष्ट लोगों के साथ धैर्य रखता हूँ—शत्रुओं और दानवों के साथ नहीं। अगर दानव और शत्रु तुम्हें आश्वस्त करने और धोखा देने के लिए, तुम्हें क्षणभंगुर खुशियाँ दिलाने के लिए अच्छी बातें कहने का दिखावा करते हैं और तुम्हें धोखा देते हैं, तो क्या तुम उनकी बातों पर विश्वास कर सकते हो? (नहीं।) क्यों? उनके असली रंग पहले ही सामने आ चुके हैं; एक ही चीज में, उनका सार प्रकट कर दिया गया था, वे उजागर हो गए थे। ऐसे लोग कभी सत्य का अनुसरण नहीं कर सकते, सत्य से तो प्रेम बिलकुल भी नहीं कर सकते। वे सत्य के शत्रु हैं, वे उसे नापसंद करते हैं और उससे घृणा करते हैं। वे राक्षस हैं। क्या उन्हें निष्कासित करने से समस्या हमेशा के लिए हल नहीं हो जाएगी? कुछ लोग पूछते हैं, "क्या उन्हें कुछ छूट नहीं दी जा सकती?" ऐसा कोई अवसर नहीं होता जब ऐसे लोग पश्चात्ताप करें, वे कभी पश्चात्ताप नहीं कर सकते। वे शैतान से अलग नहीं हैं—जो परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के बावजूद यह नहीं सोचता कि यह वह सार है जो परमेश्वर के पास होना चाहिए, और परमेश्वर को परमेश्वर नहीं मानता; वह यह मानता है कि उसकी कपटी योजनाएँ बुद्धिमत्तापूर्ण हैं, कि उसकी प्रकृति और सार सत्य है, और कि परमेश्वर सत्य नहीं है। और इसलिए, यह उसके लिए खत्म हो गया है; वह अंत तक परमेश्वर से शत्रुता रखने के लिए अभिशप्त है। इस प्रकार, जो दुष्ट हैं, उनकी नियति कभी सत्य से प्रेम न करना, और कभी सत्य का अनुसरण न करना है, और इसलिए परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता। उन्हें कलीसियाओं से हटाना और परमेश्वर के घर से निकालना सबसे सही निर्णय है, और वह जरा-सा भी गलत नहीं है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग पाँच)' से उद्धृत

परमेश्वर का घर मसीह-विरोधियों को क्यों निकाल देता है? क्या परमेश्वर का घर उन्हें सेवाकर्मी के तौर पर रख सकता है? क्या परमेश्वर का घर उन्हें पश्‍चाताप करने का मौका दे सकता है? (नहीं।) यदि वे अब भी सत्य का अनुसरण कर सकते हों तो? (असंभव।) अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मसीह-विरोधी दुष्ट लोग होते हैं, वे शैतान के होते हैं, उनके लिए पश्चाताप करना असंभव है। इसलिए परमेश्वर का घर केवल उन्हें निकाल ही सकता है। जिन्हें निकाल दिया गया है, परमेश्वर के घर ने उन्हें बार-बार सहन किया है। परमेश्वर के घर ने उन्हें पश्चाताप करने का मौका दिया है और उनके लिए दरवाजे बंद नहीं किए हैं, कोशिश की है कि किसी अच्छे व्यक्ति के साथ कुछ गलत न हो, किसी का परमेश्वर में आस्था रखने वाला जीवन बर्बाद न हो, कोई तबाह न हो। किसी की प्रकृति पूरी तरह से स्पष्ट होने से पहले, किसी के पूरी तरह से उजागर होने से पहले, परमेश्वर का घर सभी के साथ सहनशील होता है। लेकिन क्या कोई मसीह-विरोधी पश्‍चाताप कर सकता है? नहीं कर सकता। परमेश्वर के घर में, वे शैतान के अनुचरों की तरह सेवा करते हैं। वे परमेश्वर के घर के कार्य को नष्ट, बाधित और अस्त-व्यस्त कर देते हैं। यदि उनमें कोई हुनर या प्रतिभा होती भी है, तो भी उनके लिए अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन कर पाना या सही रास्ते पर चलना असंभव होता है। भले ही ऐसे तरीके हों जिनसे कोई मसीह विरोधी उपयोगी हो सकता हो, तो भी वे किसी भी तरह से परमेश्वर के घर में परमेश्वर के कार्य में सकारात्मक योगदान नहीं दे सकते। वे कुछ भी सकारात्मक करने के बजाय, विनाश, व्यवधान और समस्याएँ ही पैदा करते हैं। वे कुछ भी अच्छा नहीं करते। तुम उन्हें रहने की छूट देकर उन पर निगाह रख सकते हो, उन्हें पश्चाताप का मौका दे सकते हो, लेकिन उनके लिए पश्चाताप करना असंभव होता है, और अंततः उन्हें संभालने का एकमात्र तरीका उन्हें निष्कासित करना होता है। ऐसे लोगों को निकालने से पहले, परमेश्वर का घर उन्हें अच्छी तरह से देख चुका होता है : वे मसीह विरोधी होते हैं। वे पश्चाताप करने के बजाय मरना पसंद करते हैं, वे परमेश्वर और सत्य के शत्रु होते हैं, इसलिए उन्हें निष्कासित करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता। क्या परमेश्वर का घर किसी अच्छे इंसान को निकालेगा? यदि कोई सत्य को स्वीकार कर पश्चाताप कर लेता है, तो क्या परमेश्वर का घर उसे निकालेगा? अधिक से अधिक, उसके काम को बदल दिया जाएगा या उसे आध्यात्मिक भक्ति और आत्म-चिंतन के लिए भेज दिया जाएगा, लेकिन निष्कासित नहीं किया जाएगा। परमेश्वर का घर जब किसी को निष्कासित करने का फैसला करता है, तो इसका मतलब है कि उसे परमेश्वर के घर में रखने से और अधिक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। वे कुछ भी सकारात्मक करने के बजाय तरह-तरह के बुरे काम करते हैं, तरह-तरह के व्यवधान डालते हैं और अशांति पैदा करते हैं। वे जहाँ कहीं होते हैं वहाँ अव्यवस्था और फूट होती है। काम ठप्प हो जाता है, उनके आस-पास के अधिकांश लोग खिन्न हो जाते हैं और वे परमेश्वर में विश्वास खो बैठते हैं, और कुछ लोग तो फिर आस्था रखना ही नहीं चाहते और अपना काम भी छोड़ देना चाहते हैं। तो इसका कारण क्या है? सब कुछ वापस मसीह विरोधी पर आकर टिक जाता है। उन्हें निष्कासित करने पर, अधिकांश लोग धीरे-धीरे सुधरने लगते हैं। तो, तुम स्वयं अवलोकन करो और देखो कि निष्कासित किए गए मसीह-विरोधियों और दुष्टों में से कितनों ने स्वयं को जाना है और कितनों ने सत्य का अनुसरण और सत्य से प्रेम किया है? क्या उन्होंने पश्चाताप किया? उनमें से किसी ने भी पश्चाताप नहीं किया, वे हठपूर्वक अपने पापों को नकारते हैं, और उन्हें वर्षों बाद भी देखोगे तो वे वैसे ही मिलेंगे। वर्षों पहले जो हुआ था उसे वे अभी भी छोड़ने को तैयार नहीं होते, बहस करते हैं और खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करते हैं, उनके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आता। यदि तुम उन्हें स्वीकार करके फिर से कलीसियाई जीवन जीने और काम करने की अनुमति दे भी दो, तो वे पौलुस की तरह, अपने पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। वे सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलते ही नहीं, वे अपने पुराने मार्ग पर, मसीह-विरोधी के मार्ग, पौलुस के मार्ग पर ही चलते रहते हैं। यही कारण है कि मसीह-विरोधियों को निष्कासित कर दिया जाता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग आठ)' से उद्धृत

ज्यादातर लोगों ने अपराध किए हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है, कुछ ने उसके खिलाफ विद्रोह किया है, कुछ ने उसके खिलाफ शिकायत भरे शब्द बोले हैं, और अन्य लोगों ने ऐसी चीजें की हैं जो कलीसिया के लिए हानिकारक थीं या जिन्होंने परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाया। इन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? उनके परिणाम उनकी प्रकृति और तदनुरूपी व्यवहार के अनुसार निर्धारित किए जाएँगे। कुछ लोग दुष्ट होते हैं, कुछ मूर्ख होते हैं, कुछ भोंदू होते हैं और कुछ जानवर होते हैं। हर व्यक्ति अलग है। कुछ दुष्ट लोग दुष्ट आत्माओं के वश में होते हैं, जबकि अन्य लोग दुष्ट शैतान के अनुचर हैं। अपनी प्रकृति के लिहाज से कुछ लोग विशेष रूप से भयावह हैं, कुछ विशेष रूप से धोखेबाज हैं, कुछ लोग धन के मामले में विशेष रूप से लालची हैं, और अन्य लोग कामुक होने का आनंद लेते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार अलग है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत प्रकृति और व्यवहार के अनुसार व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए। ... परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति से उस वक्त के परिवेश और संदर्भ, वास्तविक स्थिति, लोगों के कार्यों, व्यवहार और अभिव्यक्तियों के अनुसार निपटता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ गलत नहीं करेगा। यह परमेश्वर की धार्मिकता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर किस आधार पर लोगों से बर्ताव करता है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

कलीसिया की सफाई उन पाँच प्रकार के लोगों के निष्कासन के साथ शुरू की जानी चाहिए, जिनका निष्कासन करना जरूरी है। लोगों के गुस्से को शांत करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उन सभी मसीह-विरोधी राक्षसों को पूरी तरह से निष्कासित कर देना चाहिए, जो हमेशा कलीसिया के काम में रुकावट डालते और बखेड़ा खड़ा करते हैं। जिन पाँच प्रकार के लोगों को निष्कासित किया जाना चाहिए, उनका स्पष्ट ब्योरा नीचे दिया जा रहा है :

1. जिन लोगों का संबंध सचमुच राक्षसों के वश में रहने वाले लोगों के समूह से है या जिनके पास दुष्टात्माओं का गंभीर कार्य है, उन्हें निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। ऐसा करना कभी भी गलत नहीं होगा। जो समलैंगिक पश्चात्ताप नहीं करते, वे राक्षसों के वश में हैं। उन्हें भी निष्कासित किया जाना बिलकुल स्वाभाविक है। जिन लोगों के पास दुष्टात्माओं का सिर्फ थोड़ा ही काम हैं, उनके साथ अलग तरीके से बरताव किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, ऐसे लोग जो कभी-कभी अज्ञात भाषा में बात करते हैं, जिन्हें चीजें दिखाई देती हैं, आवाजें सुनाई देती हैं या सपने आते हैं, आदि। ऐसे लोगों का संबंध राक्षसों के वश में रहने वालों से नहीं है। अगर ऐसे लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, तो उन्हें पक्के तौर पर बचाया जा सकता है। इसलिए, ऐसे लोगों को निष्कासित करने की बिलकुल अनुमति नहीं है, जिनके पास दुष्टात्माओं का थोड़ा ही काम है। जिनके बारे में सार्वजनिक तौर पर जाना जाता है कि वे राक्षसों के वश में हैं, और साथ ही जिनके पास स्पष्ट रूप से दुष्टात्माओं का काम है, उन्हें निष्कासित किया जा सकता है।

2. जिनका संबंध सचमुच लोगों को धोखा देने वाले नकली मसीहों और मसीह-विरोधियों की श्रेणी से है, उन्हें अवश्य निष्कासित किया जाना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं होगा। वे सभी, जो हमेशा खुद को परमेश्वर के पहलौठे पुत्र या परमेश्वर की प्रिय संतान समझते हैं और लोगों से अपने को स्वीकृत और उनसे अपने आगे समर्पण करवाते हैं, वे सभी जो यह गवाही देते हैं कि वे खुद ही मसीह हैं या परमेश्वर द्वारा नया कार्य करने के लिए भेजे गए हैं, वे सभी जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इंसान के मार्गदर्शन को ठुकराते हैं और उनसे भिन्न प्रकार से कार्य करते हैं, वे सभी जो अकसर परमेश्वर के कार्य की आलोचना करते हैं, परमेश्वर की निंदा करते हैं और ऐसी अफवाहें फैलाते हैं, जिनसे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इंसान को नीचा देखना पड़ता है और उसे चोट पहुँचती है, और वे सभी जो दुष्टात्माओं के काम का स्वागत करते हैं, जो डाकुओं के जहाज में सवार हो गए हैं और लोगों को धोखा देने लगे हैं, वे नकली मसीह, मसीह-विरोधी और कपटी हैं। कुछ लोग परमेश्वर के बारे में सिर्फ कुछ धारणाएँ रखते हैं या पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इंसान के बारे में कुछ पूर्वाग्रह रखते हैं, लेकिन उनके मन में शत्रुता की भावना नहीं होती, और वे सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के सभी कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं और सच्चे मन से पश्चात्ताप करते हैं। भले ही इस तरह के लोग कभी-कभी कुछ गलत कह देते या कर देते हों, उनके साथ मसीह-विरोधयों की तरह बरताव बिलकुल नहीं करना चाहिए और उन्हें निष्कासित नहीं करना चाहिए। जो सचमुच मसीह-विरोधी हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करना चाहते हैं और एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो काम करते समय ऊपर वाले की व्यवस्थाओं का पालन नहीं करते, बल्कि बिलकुल अलग तरीके से काम करते हैं, यहाँ तक कि ऊपर वाले की कार्य-व्यवस्थाओं, उपदेशों और सहभागिताओं को यह बहाना करते हुए ठुकरा देते हैं कि उन्हें इस बारे में संदेह है कि ये व्यवस्थाएँ, उपदेश और सहभागिताएँ सच्ची हैं या नहीं। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पूरी तरह से अपने काबू में रखते हैं। वे ऊपर वाले के केंद्रीकृत सिंचन, पोषण और चरवाही को ठुकरा देते हैं। ऐसे लोग पक्के मसीह-विरोधी हैं। इसमें कोई शक नहीं। ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बदल देना चाहिए। अधिक गंभीर मसीह-विरोधियों को निष्कासित कर देना चाहिए।

3. जो लोग वास्तव में यहूदा के समूह से संबंध रखते हैं और अपने प्रभु और साथी विश्वासियों को धोखा देते हैं और शैतान की ओर से काम करते हुए अपने भाई-बहनों की गिरफ्तारी करवाते हैं, उन्हें निष्कासित कर देना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति गिरफ्तारी के बाद केवल थोड़ी-सी जानकारी साझा करता है, किंतु अपने भाई-बहनों की निगरानी या गिरफ्तारी करवाने में शैतान की मदद नहीं करता, और अगर उस व्यक्ति ने अतीत में अपेक्षाकृत अच्छा काम करते हुए पश्चात्ताप किया है, तो उसे निष्कासित नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों को तीन से पाँच महीनों के लिए सबसे अलग कर देना चाहिए, ताकि वे आत्मचिंतन कर सकें। अगर इसमें कोई बड़ी समस्या न हो, तो उन्हें कलीसियाई जीवन में बहाल किया जा सकता है। ऐसे व्यक्ति, जिनके पास अच्छी इंसानियत नहीं है और जिन्होंने अतीत में कोई अच्छा काम नहीं किया है, अगर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है और वे यहूदा बन जाते हैं, तो उन्हें निष्कासित किया जा सकता है। अगर वे शैतान के साथी बन जाते हैं और भाई-बहनों की निगरानी और गिरफ्तारी कराने के लिए बड़े लाल अजगर की सेवा करने लगते हैं, तो उन्हें अवश्य निष्कासित कर देना चाहिए। ऐसे लोगों को निष्कासित करना कभी भी गलत नहीं हो सकता, जो परमेश्वर को धोखा देते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाने के लिए शैतान के साथी की तरह काम करते हैं।

4. जो वास्तव में बुरे लोग हैं, उनका निष्कासन जरूर होना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं हो सकता। बुरे लोग निम्नलिखित प्रकार के होते हैं : कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो लगातार कलीसियाई जीवन में रुकावट डालते हैं, गिरोह बनाते हैं, मतभेद के बीज बोते हैं, और कलीसिया को तोड़ते हैं—वे सड़े हुए सेब जैसे हैं, जो दूसरों के साथ मिलजुलकर नहीं रह पाते और जिनसे सभी नफरत करते हैं; दूसरे प्रकार के बुरे लोगों में वे लोग शामिल हैं, जो कलीसिया और उसके अगुआओं पर मुकदमे करने को तत्पर रहते हैं—ऐसे लोग हर तरह के बुरे काम करने में सक्षम होते हैं; तीसरे समूह में वे लोग शामिल हैं, जो लगातार व्यभिचार करते हैं, पश्चात्ताप करने से इनकार करते हैं और लोगों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं; और अंत में, वे लोग आते हैं, जो अपने रुतबे को बचाने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बेधड़क दबाने और फँसाने का काम करते हैं, यहाँ तक कि बेवजह दूसरों को निष्कासित करने में सक्षम होते हैं, और जिन्हें मसीह-विरोधियों की श्रेणी में रखा जाता है। इस तरह के लोग वाकई बुरे होते हैं। केवल ऐसे लोगों को निष्कासित किया जाना चाहिए, जिन्हें कलीसिया में हर किसी ने सार्वजनिक तौर पर बुरा बताया और माना है। जिन लोगों ने केवल एक बार कोई बुरा काम किया है, कोई पाप किया है या किसी अगुआ के खिलाफ कोई अपराध किया है, उन्हें बुरा इंसान मानकर निष्कासित नहीं करना चाहिए। एक बार बुरा काम करना एक पाप करने की श्रेणी में आता है। इसका मतलब यह नहीं कि वह बुरा इंसान है। केवल वही लोग बुरे हैं, जो बहुत सारे और विभिन्न प्रकार के बुरे काम करते हैं। पाप करने के बाद भी अगर कोई इंसान पश्चात्ताप करने में सक्षम है, तो उन्हें बचाए जाने की अभी भी उम्मीद है। ऐसे इंसान को बिलकुल भी निष्कासित नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को सार्वजनिक तौर पर बुरा माना गया है, केवल उन्हें ही निष्कासित किया जाना चाहिए।

5. जो लोग कलीसिया में परमेश्वर के चढ़ावों को खुले हाथों से लुटाते हैं, उनकी चोरी करते हैं, उनका गबन करते हैं और उन्हें लेकर कलीसिया के साथ धोखाधड़ी करते हैं, उन्हें निष्कासित किया जाना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं हो सकता। वे सभी, जो कलीसिया में परमेश्वर के चढ़ावों को खुले हाथों से लुटाते हैं, उनका गबन करते हैं और उन्हें लेकर कलीसिया के साथ धोखाधड़ी करते हैं, या उन चढ़ावों को दुष्टात्माओं, मसीह-विरोधियों या दुष्ट लोगों को सौंप देते हैं, या फिर उन चढ़ावों को खतरे में देखकर भी ऐसी स्थिति से फौरन निपटने की कोशिश नहीं करते, जिसके कारण परमेश्वर के घर को गंभीर नुकसान झेलने पड़ते हैं, उन्हें चढ़ावों की चोरी करने वालों की श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे सभी लोगों को निष्कासित किया जाना चाहिए। खासकर ऐसे लोग, जिन्होंने परमेश्वर के घर से बड़ी रकम का गबन किया है, उन्हें तो अवश्य ही निष्कासित किया जाना चाहिए और उनसे उनके ऋणों की अदायगी करने और उनके ऊपर खर्च किए गए सभी पैसे कलीसिया को लौटाने पर जोर डाला जाना चाहिए। अगर किसी ने पैसों का गलत तरीके से इस्तेमाल किया है और इस कारण सभी उसकी आलोचना करते हैं, तो यह एक पाप है और इसके साथ अलग ढंग से निपटा जाना चाहिए। ऐसा करने वालों को पश्चात्ताप करने का एक मौका देना चाहिए। ऐसे हालात से निपटने का यही सही तरीका है।

ऊपर सूचीबद्ध किए गए पाँच प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिन्हें कलीसिया को निष्कासित कर देना चाहिए। इन श्रेणियों में आने वाले सभी लोगों को परमेश्वर के कार्य से हटा दिया गया है, क्योंकि उन्हें छुटकारा दिलाना संभव नहीं। अगर ऐसे लोग परमेश्वर के घर में बने रहते हैं, तो न केवल वे पूरी तरह से अनुपयोगी होंगे, बल्कि वे बेहद परेशानियाँ भी खड़ी करेंगे, क्योंकि उनमें इंसानियत नहीं है, परमेश्वर के लिए लेशमात्र भी श्रद्धा नहीं है, और ऐसे लोग पूरी तरह से शैतान के समान हैं। हालाँकि ये लोग जो करते हैं, वह बाहर से भ्रष्टता की अभिव्यक्ति के समान है, लेकिन ये वे लोग नहीं हैं, जो वाकई परमेश्वर में विश्वास करते हैं, सत्य से प्रेम और उसका अनुसरण करने वाले तो ये बिलकुल भी नहीं हैं, और ये उन लोगों की श्रेणी में शामिल नहीं हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया जाएगा। जैसा कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है : "शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी')। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पता होना चाहिए कि असली दानव शैतान को कैसे पहचाना जाए। जो लोग वास्तव में परमेश्वर और दानव शैतान, दोनों में विश्वास करते हैं, वे एक भ्रष्ट स्वभाव होने की अभिव्यक्ति करते हैं, लेकिन उनमें अनिवार्य अंतर क्या है? यह वह प्रश्न है, जिसकी थाह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को जरूर लेनी चाहिए। जो लोग वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे कुछ वर्षों तक विश्वास करने के बाद जब सत्य को समझना शुरू करते हैं, तो वे अपने भ्रष्ट स्वभाव के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करने और परमेश्वर के लिए थोड़ी श्रद्धा हासिल करने में सक्षम होते हैं। भले ही उन्हें सत्य की कोई वास्तविक समझ न हो, वे ऐसे काम नहीं कर सकते जो साफ तौर पर बुरे और परमेश्वर-विरोधी हैं। इसके अलावा, जब वे काट-छाँट किए जाने और निपटे जाने, न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने का सामना करते हैं, या उनकी परीक्षा ली जाती है और उनका शोधन किया जाता है, तो वे खुद को जान सकते हैं और वास्तविक पश्चात्ताप महसूस कर सकते हैं, और खुद से नफरत और शैतान से घृणा करने और कुछ वास्तविक पश्चाताप और बदलाव से गुजरने में सक्षम होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जो लोग सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें बचाया जा सकता है। आओ, अब दानव शैतान की बात करें। चाहे वे कितने भी बुरे काम करें या कितनी भी काट-छाँट और निपटारे का सामना करें, वे कभी सत्य को स्वीकार नहीं करते या खुद को जानने के लिए आत्मचिंतन नहीं करते। "पश्चात्ताप" शब्द उनके शब्दकोष में कभी नहीं होता। असली दानव शैतान के प्रकृति-सार और सत्य का अनुसरण कर सकने वाले भ्रष्ट लोगों के प्रकृति-सार के बीच यही अंतर है। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग उन्हें इस तरह से पहचान सकें, तो वे जान जाएँगे कि किन लोगों को बचाया जा सकता है और कौन असली दानव शैतान हैं जिन्हें बचाया जाना नामुमकिन है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

पिछला: 72. कलीसिया से हटाए जाने के सिद्धांत

अगला: 74. कर्तव्य के प्रति दृष्टिकोण के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें