73. कलीसिया के निष्‍कासन सम्‍बन्‍धी सिद्धान्‍त

(1) ऐसे बुरे लोगों को निष्‍कासित कर देना चाहिए जो सत्‍य से प्रेम नहीं करते या उसे स्‍वीकार नहीं करते, और जो कलीसिया के जीवन को बार-बार तहस-नहस तक करने में सक्षम हैं;

(2) ऐसे लोगों को निष्‍कासन का सामना करना अनिवार्य है जिनकी समझ बेहूदी है, जो असामान्‍य रूप से अहंकारी हैं, और जो परमेश्‍वर के बारे में अक्‍सर धारणाएँ और ग़लतफ़हमियाँ पालते रहते हैं और उसके बारे में फै़सले सुनाते रहते हैं;

(3) जो लोग अगुआओं और कार्यकर्ताओं के प्रति असन्‍तोष भड़काते हुए परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों को नियन्त्रित करने की निरन्‍तर महत्त्‍वाकांक्षा पाले रहते हैं वे मसीह-विरोधियों की कोटि में आते हैं और उन्‍हें निष्‍कासन का सामना करना चाहिए;

(4) ऐसे तमाम तरह के अविश्‍वासियों और बुरे लोगों को निष्‍कासित किया जाना चाहिए जो सत्‍य को ज़रा भी स्‍वीकार नहीं कर सकते या जिनकी काट-छाँट की जा रही हो और जिनसे निप्‍टा जा रहा हो, और जो, इसके अतिरिक्त तरह-तरह के दुष्‍कृत्‍य करने में सक्षम हों;

(5) उन लोगों को निष्‍कासित किया जाना चाहिए जो दैत्‍यों के वशीभूत हैं या जिनके भीतर दुरात्‍माएँ सक्रिय हैं, और जो, इसके अतिरिक्त, निरन्‍तर झूठ फैलाते हुए दूसरे को छलते रहते हैं और कलीसिया के जीवन को तहस-नहस करते रहते हैं;

(6) जो लोग बार-बार परमेश्‍वर को दी गयी बलि का ग़बन करते हैं या उसके प्रति अपव्‍ययी होते हैं और जो, तरह-तरह के बहानों से, उसको दी गयी बलि के प्रति ललचाये रहते हैं, ऐसे लोगों को, सारे गम्‍भीर मामलों में, निष्‍कासित किया जाना चाहिए;

(7) जिन लोगों का अक्‍सर रोमानी रिश्‍तों और व्‍यभिचार में मुब्तिला होना प्रमाणित हो चुका हो, और जो असामान्‍य रूप से दुष्‍कर्मी हों, और इस तरह जो दूसरे लोगों पर अत्‍यन्‍त बुरा प्रभाव डाल रहे हों, और जो, बार-बार निष्‍कासित किये जाने के बावजूद, अपने रवैये को न बदलते हों, उन्‍हें निष्‍कासित किया जाना चाहिए;

(8) ऐसे छद्म अगुआओं और मसीह-विरोधियों को निष्‍कासित किया जाना चाहिए जो कार्य-व्‍यवस्‍थाओं के गम्‍भीर उल्‍लंघन और स्‍वेच्‍छाचार से कलीसिया में अव्‍यवस्‍था फैलाते हों और परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों को फँसाते हों;

(9) जो भी कोई लोग प्रभु या उसके सहचरों के साथ विश्‍वासघात करें और कलीसिया को बड़े लाल अजगर की सेवा में उलझायें, उनकी पिछली उपलब्धियाँ चाहे जो भी हों, उन्‍हें निष्‍कासन का सामना करना चाहिए;

(10) अगर किसी व्‍यक्ति को निष्‍कासित किया जाना है, तो कलीसिया के पास ऐसे समुचित साक्ष्‍य होने चाहिए जिनकी तथ्‍यों के साथ पूरी संगति बैठती हो, और जिनपर अधिकांश सदस्‍य एकमत हों।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

बड़े लाल अजगर के देश में मैंने कार्य का एक ऐसा चरण पूरा कर लिया है, जिसकी थाह मनुष्य नहीं पा सकते, इसके कारण वे हवा में डोलने लगते हैं, जिसके बाद कई लोग हवा के वेग में चुपचाप बह जाते हैं। सचमुच, यह एक ऐसी "खलिहान" है जिसे मैं साफ़ करने वाला हूँ, यही मेरी लालसा है और यही मेरी योजना है। क्योंकि जब मैं कार्य कर रहा होता हूँ, तो कई दुष्ट लोग चोरी-छिपे आ घुसे हैं, लेकिन मुझे इन्हें खदेड़ कर निकालने की कोई जल्दी नहीं है। इसके बजाय, सही समय आने पर मैं उन्हें छिन्न-भिन्न कर दूँगा। केवल इसके बाद ही मैं जीवन का सोता बनूँगा, और उन लोगों को जो मुझे सच में प्रेम करते हैं, मुझसे अंजीर के पेड़ का फल और कुमुदिनी की सुगंध प्राप्त करने दूँगा। उस देश में जहाँ शैतान का डेरा है, जो गर्दो-गुबार का देश है, वहाँ अब शुद्ध सोना नहीं रहा, सिर्फ रेत ही रेत है, और इसलिए इन हालत को देखते हुए, मैं कार्य का ऐसा चरण पूरा करता हूँ। तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं जो प्राप्त करता हूँ वह रेत नहीं बल्कि शुद्ध, परिष्कृत सोना है। दुष्ट लोग मेरे घर में कैसे रह सकते हैं? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवी कैसे बनने दे सकता हूँ। मैं इन चीज़ों को खदेड़ने के लिए हर संभव तरीका अपनाता हूँ। मेरी इच्छा प्रकट होने से पहले कोई भी यह नहीं जानता कि मैं क्या करने वाला हूँ। इस अवसर का लाभ उठाते हुए, मैं उन दुष्टों को दूर खदेड़ देता हूँ, और वे मेरी उपस्थिति को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मैं दुष्टों के साथ यही करता हूँ, लेकिन फिर भी उनके लिए एक ऐसा दिन होगा जब वे मेरे लिए सेवा कर पाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सात गर्जनाएँ गूँजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएँगे' से उद्धृत

अब मैं यथाशीघ्र उन लोगों का एक समूह बनाना चाहता हूँ, जो मेरे हृदय के अनुरूप हैं, ऐसे लोगों का समूह, जो मेरे बोझ पर ध्यान देने में सक्षम हैं। किंतु मैं अपनी कलीसिया की सफाई और शुद्धि करने से नहीं रुक सकता; कलीसिया मेरा हृदय है। मैं उन सभी दुष्ट लोगों से घृणा करता हूँ, जो तुम लोगों को मेरे वचन को खाने और पीने से रोकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुछ दूसरे लोग हैं, जो वास्तव में मुझे नहीं चाहते। वे लोग छल से भरे हुए हैं, वे अपने सच्चे हृदय से मेरे पास नहीं आते; वे दुष्ट हैं, और वे ऐसे लोग हैं जो मेरी इच्छा पूरी करने में बाधा डालते हैं; वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सत्य को अमल में लाते हैं। वे लोग दंभ और अहंकार से भरे हुए हैं, वे बेतहाशा महत्वाकांक्षी हैं, वे दूसरों को नीचा दिखाना पसंद करते हैं, और हालाँकि वे जो वचन बोलते हैं वे सुनने में सुखद होते हैं, लेकिन एकांत में वे सत्य का अभ्यास नहीं करते। इन सभी दुष्ट लोगों को अलग कर बुहार दिया जाएगा; वे आपदा में मुरझा जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 24' से उद्धृत

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

ज़्यादातर लोगों ने अपराध किये हैं, उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने हमेशा परमेश्वर का विरोध किया, कुछ ने परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, कुछ ने परमेश्वर के ख़िलाफ़ शिकायत भरे शब्द बोले या दूसरे लोगों ने कलीसिया के ख़िलाफ़ काम किया या परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाने वाली हरकतें कीं। इन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? उनके परिणाम, उनकी प्रकृति और उनके निरंतर व्यवहार के अनुसार निर्धारित किए जाएंगे। कुछ लोग दुष्ट हैं, कुछ लोग मूर्ख हैं, कुछ भोले हैं, और कुछ लोग तो जानवर हैं। सब लोग अलग-अलग हैं। कुछ दुष्ट लोग दुष्ट आत्माओं से ग्रसित हैं, जबकि अन्य लोग दुष्ट शैतान के दूत हैं। अपने स्वभाव के लिहाज़ से कुछ विशेष रूप से भयावह हैं, कुछ विशेष रूप से धूर्त हैं, कुछ लोग विशेष रूप से धन के लोभी हैं, कुछ लोग स्वच्छंद वासना से भरे हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार अलग है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यवहार और व्यक्तिगत स्वभाव के अनुसार व्यापक रूप से देखा जाना चाहिये। ... परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के साथ उस वक्त के हालात और संदर्भ, वास्तविक परिस्थिति, लोगों के कर्मों, उनके व्यवहार और अभिव्यक्तियों के अनुसार निपटता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ गलत नहीं करेगा। यही परमेश्वर की धार्मिकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर किस आधार पर लोगों से बर्ताव करता है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया का शुद्धिकरण उन पाँच प्रकार के लोगों के निष्कासन के साथ शुरू किया जाना चाहिए जिनका निष्कासन करना ज़रूरी है। लोगों के गुस्से को शाँत करने और परमेश्वर को मनाने के लिए, उन सभी मसीह विरोधी राक्षसों को पूरी तरह से निष्कासित कर देना चाहिए जो कलीसिया के काम में रुकावट डालते और बखेड़ा खड़ा करते हैं। जिन पाँच प्रकार के लोगों को निष्कासित किया जाना चाहिए उनका स्पष्ट ब्यौरा नीचे दिया गया है:

1. जिन लोगों का संबंध सचमुच राक्षसों के वश में रहने वाले लोगों के समूह से है या जिनके पास दुष्टात्माओं का गंभीर कार्य है उन्हें निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। ऐसा करना कभी भी गलत नहीं होगा। ऐसे सभी समलैंगिक लोग जो पश्चाताप नहीं करते हैं वे राक्षसों के वश में हैं। उन्हें भी निष्कासित किया जाना बिलकुल स्वाभाविक है। जिन लोगों के पास दुष्टात्माओं का सिर्फ़ थोड़ा सा काम हैं उनके साथ अलग तरीके से बर्ताव किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, ऐसे लोग जो कभी-कभार अलग-अलग भाषाओं में बात करते हैं, जिन्हें चीज़ें दिखाई देती हैं, आवाजें सुनाई देती हैं या सपने आते हैं आदि। ऐसे लोगों का संबंध राक्षसों के वश में रहने वालों से नहीं है। अगर ऐसे लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, तो उन्हें पक्के तौर पर बचाया जा सकता है। इसलिए, ऐसे लोगों को निष्कासित करने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दी जाती है जिनके पास दुष्टात्माओं के काम की ज़रा सी झलक दिखती है। जिनके बारे में सार्वजनिक तौर पर जाना जाता है कि वे राक्षसों के वश में हैं, जिनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिनके पास दुष्टात्माओं के काम की झलक स्पष्ट नज़र आती है, उन्हें निष्कासित किया जा सकता है।

2. जिनका संबंध सचमुच लोगों को धोखा देने वाले झूठे मसीहों और मसीह विरोधियों की श्रेणी से हैं, उन्हें अवश्य निष्कासित किया जाना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं होगा। वे सभी जो हमेशा खुद को परमेश्वर का पहला पुत्र या परमेश्वर की सबसे प्रिय संतान समझते हैं और लोगों को अपना समर्थन करने और अपने सामने समर्पण करने को कहते हैं, वे सभी जो यह गवाही देते हैं कि वे खुद ही मसीह हैं या परमेश्वर द्वारा नया कार्य करने के लिए भेजे गए हैं, वे सभी जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये गए इंसान के मार्गदर्शन को ठुकराते हैं और उनका कहा नहीं मानते हैं, वे सभी जो अक्सर परमेश्वर के कार्य की आलोचना करते हैं, परमेश्वर को गाली देते और ऐसी अफवाहें फैलाते हैं जिनसे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये गए इंसान को नीचा दिखाने और चोट पहुँचाने की मंशा होती है, और वे सभी जो दुष्टात्माओं के काम का स्वागत करते हैं, जो डाकुओं के जहाज में सवार हो गए हैं और लोगों को धोखा देने लगे हैं, ऐसे लोग झूठे मसीह, मसीह विरोधी और कपटी हैं। कुछ लोग परमेश्वर के बारे में सिर्फ़ कुछ धारणाएं रखते हैं या पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये गए इंसान के बारे में कुछ पूर्वाग्रह रखते हैं, लेकिन उनके मन में शत्रुता की भावना नहीं होती है, वे सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के सभी कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं और सच्चे मन से पश्चाताप करते हैं। भले ही इस तरह के लोग कभी-कभार कुछ गलत कहते या करते हैं, उनके साथ मसीह विरोधयों की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए और उन्हें निष्कासित नहीं करना चाहिए। जो सचमुच मसीह विरोधी हैं वे परमेश्वर के चुने गए लोगों को काबू में करके एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो काम करते समय ऊपर की व्यवस्थाओं का पालन नहीं करते, बल्कि बिल्कुल अलग तरीके से काम करते हैं या यहां तक कि ऊपर की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और सहभागिताओं को ठुकराते हुए यह बहाना बनाते हैं कि ये व्यवस्थाएँ, उपदेश और सहभागिताएं गलत भी हो सकती हैं। वे परमेश्वर के चुने हुए इंसानों को पूरी तरह से अपने काबू में रखते हैं। वे ऊपर के केंद्रीकृत सिंचन, पोषण और रखवाली को ठुकरा देते हैं। ऐसे लोग पक्के मसीह विरोधी हैं। इसमें कोई शक नहीं। ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बेशक बदल देना चाहिए। अधिक गंभीर मसीह विरोधियों को निष्कासित कर देना चाहिए।

3. जो लोग असल में यहूदा के समूह से संबंध रखते हैं, अपने प्रभु और साथी विश्वासियों को धोखा देते हैं, जो शैतान की ओर से काम करते हुए अपने भाई-बहनों की गिरफ़्तारी करवाते हैं, ऐसे लोगों को निष्कासित कर देना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति गिरफ़्तारी के बाद, केवल थोड़ी सी जानकारी साझा करता है, मगर अपने भाई-बहनों की निगरानी या गिरफ़्तारी करवाने में शैतान की मदद नहीं करता, साथ ही अगर उस व्यक्ति ने अतीत में अपेक्षाकृत अच्छा काम करते हुए पश्चाताप किया है, तो उसे निष्कासित नहीं करना चाहिए। उसे तीन से पाँच महीनों के लिए सबसे अलग कर देना चाहिए, ताकि वो आत्मचिंतन कर सके। अगर उसमें कोई बड़ी समस्या नहीं नज़र आती है, तो उसे कलीसिया जीवन में वापस लाया जा सकता है। ऐसा व्यक्ति जिसके पास अच्छी इंसानियत नहीं है और जिसने अतीत में कोई अच्छा काम नहीं किया है, अगर वो गिरफ़्तारी के बाद यहूदा बन जाता है तो उसे निष्कासित किया जा सकता है। अगर ऐसे लोग शैतान के साथी बनकर भाई-बहनों की निगरानी और गिरफ़्तारी कराने के लिए बड़े लाल अजगर की सेवा करने लगते हैं, तो उन्हें अवश्य निष्कासित कर देना चाहिए। ऐसे लोगों को निष्कासित करना कभी भी गलत नहीं हो सकता जो परमेश्वर को धोखा देते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाने के लिए शैतान के साथी बनकर काम करते हैं।

4. जो वास्तव में बुरे लोग हैं उनका निष्कासन ज़रूर होना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं हो सकता। बुरे लोग इस तरह के होते हैं: कुछ ऐसे लोग हैं जो लगातार कलीसिया जीवन में रुकावट डालते हैं, गिरोह बनाते हैं, मतभेद के बीज बोते हैं, और कलीसिया की एकता को तोड़ते हैं—ये ऐसे भ्रष्ट लोग हैं जो दूसरों के साथ मिल-जुलकर नहीं रह पाते और जिनसे सभी नफ़रत करते हैं; दूसरे प्रकार के बुरे लोगों में वे लोग शामिल हैं जो कलीसिया और उसके अगुआओं पर मुकदमे करते हैं—ऐसे लोग हर तरह के बुरे काम करने में सक्षम होते हैं; एक अन्य समूह में वे लोग शामिल हैं जो लगातार व्यभिचार करते हैं, पश्चाताप करने से इनकार करते हैं और लोगों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं; और आखिर में आते हैं ऐसे बुरे लोग जो अपने रुतबे को बचाने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बेधड़क दबाने और फंसाने का काम करते हैं, यहाँ तक कि बेवजह दूसरों को निष्कासित करने में सक्षम होते हैं, इन्हें मसीह विरोधियों की श्रेणी में रखा जाता है। इस तरह के लोग वाकई बुरे होते हैं। केवल ऐसे लोगों को निष्कासित किया जाना चाहिए जिन्हें कलीसिया में हर किसी ने सार्वजनिक तौर पर बुरा बताया और माना है। ऐसे लोग जिन्होंने केवल एक बार कोई बुरा काम किया है, कोई पाप किया है या किसी अगुआ के ख़िलाफ़ कोई अपराध किया है, उन्हें बुरा इंसान मानकर निष्कासित नहीं करना चाहिए। एक बार बुरा काम करना एक पाप करने की श्रेणी में आता है। मगर इसका मतलब ये नहीं कि वो इंसान ही बुरा है। केवल ऐसे लोग जो बहुत सारे अलग-अलग प्रकार के बुरे काम करते हैं वही असल में बुरे हैं। पाप करने के बाद भी अगर कोई इंसान पश्चाताप करने में सक्षम है, तो यह उम्मीद रहती है कि उसे बचाया जा सकता है। ऐसे इंसान को बिल्कुल भी निष्कासित नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को सार्वजनिक तौर पर बुरा माना गया है, केवल उन्हें ही निष्कासित किया जाना चाहिए।

5. जो लोग परमेश्वर की भेंट को खुले हाथों से लुटाते हैं, चोरी करते हैं, गबन करते हैं और कलीसिया को धोखा देते हैं, उन्हें निष्कासित किया जाना चाहिए। ऐसा करना कभी गलत नहीं हो सकता। वे सभी जो परमेश्वर की भेंट को खुले हाथों से लुटाते हैं, गबन करते हैं और कलीसिया को धोखा देते हैं या उन भेंटों को दुष्टात्माओं, मसीह विरोधियों या दुष्ट लोगों को सौंप देते हैं, या फ़िर उन भेंटों को खतरे में देखकर भी ऐसी परिस्थितियों से फ़ौरन निपटने की कोशिश नहीं करते, जिसके कारण परमेश्वर के घर को गंभीर नुकसान झेलने पड़ते हैं, ऐसे लोगों को भेंट की चोरी करने वालों में गिना जा सकता है। ऐसे सभी लोगों को ज़रूर निष्कासित किया जाना चाहिए। खासकर ऐसे लोग जिन्होंने परमेश्वर के घर से बड़ी रकम का गबन किया है, उन्हें तो अवश्य निष्कासित किया जाना चाहिए; उनसे उनके ऋणों की अदायगी करने और उनके ऊपर खर्च किए गए सभी पैसे कलीसिया को लौटाने पर ज़ोर डाला जाना चाहिए। अगर किसी ने पैसों का गलत तरीके से इस्तेमाल किया है और इस कारण सभी उसकी आलोचना करते हैं, तो यह एक पाप है और इसके साथ अलग ढंग से निपटाना चाहिए। ऐसा करने वालों को पश्चाताप करने का एक मौक़ा देना चाहिए। ऐसे हालातों से निपटने का यही सही तरीका है।

ऊपर ऐसे पाँच प्रकार के लोगों के बारे में बताया गया है जिन्हें कलीसिया को निष्कासित कर देना चाहिए। वे सभी जो इन श्रेणियों में आते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य से हटा दिया गया है क्योंकि उन्हें छुटकारा दिलाना संभव नहीं। परमेश्वर के घर को ऐसे लोगों के बने रहने से कोई फ़ायदा नहीं होगा, बल्कि वे हद से ज़्यादा परेशानियाँ भी खड़ी करेंगे, क्योंकि उनमें इंसानियत नाम की चीज़ ही नहीं है, उनमें परमेश्वर के लिए लेशमात्र भी श्रद्धा नहीं है, ऐसे लोग पूरी तरह से शैतान के हो चुके हैं। हालाँकि ये लोग जो करते हैं वह बाहर से भ्रष्टता की अभिव्यक्ति के समान है, मगर ये उन लोगों में से नहीं हैं जो वाकई परमेश्वर में विश्वास करते हैं, न ही ये उनमें से हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य का अनुसरण करते हों; ये उन लोगों की श्रेणी में शामिल नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया जाएगा। जैसा कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है: "शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी')। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पता होना चाहिए कि असली दानव शैतान को कैसे पहचाना जाए। जो लोग वास्तव में परमेश्वर और दानव शैतान, दोनों में विश्वास करते हैं वे एक भ्रष्ट स्वभाव होने की अभिव्यक्ति करते हैं, मगर उनमें अंतर क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसकी थाह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को ज़रूर लेनी चाहिए। ऐसे लोग जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे कुछ वर्षों तक विश्वास करने के बाद जब सत्य को समझना शुरू करते हैं, तो वे अपने भ्रष्ट स्वभाव के बारे में जानने और परमेश्वर के लिए थोड़ी श्रद्धा रखने में सक्षम होते हैं। भले ही उन्हें सत्य की कोई वास्तविक समझ न हो, मगर वे ऐसे काम नहीं कर सकते जो साफ़ तौर पर बुरे और परमेश्वर विरोधी हैं। इसके अलावा, जब उनके कांट-छांट और निपटान, न्याय और ताड़ना, परीक्षा और शुद्धिकरण से गुज़रने की बारी आती है, तो वे खुद को जानने और वास्तविक पश्चाताप करने के साथ-साथ खुद से नफ़रत और शैतान से घृणा करके कुछ हद तक सच्चा पश्चाताप करने और अपने आप में बदलाव लाने में सक्षम होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जो लोग सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें बचाया जा सकता है। आइए अब दानव शैतान की बात करते हैं। चाहे वे कितने भी बुरे काम करें या उन्हें कितनी बार भी काँट-छाँट या निपटारे का सामना करना पड़े, मगर वे कभी भी सत्य को स्वीकार नहीं करते या खुद को पहचानने के लिए आत्मचिंतन नहीं करते। उनके शब्दकोष में कभी भी "पश्चाताप" नाम का शब्द नहीं होता। असली दानव शैतान के प्रकृति सार और सत्य का अनुसरण करने में सक्षम भ्रष्ट लोगों के प्रकृति सार के बीच यही अंतर है। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग उन्हें इस तरह से पहचान सकें, तो वे आसानी से जान पाएँगे कि किन लोगों को बचाया जा सकता है और कौन असली दानव शैतान हैं जिन्हें बचाया जाना नामुमकिन है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

वे लोग जो परमेश्वर के कार्य में रुकावट डालने और गड़बड़ी करने के लिए सभी तरह के हंगामे करते हैं, कलीसिया के काम और कलीसिया जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं, वे मसीह विरोधी राक्षस हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर के बारे में धारणाएँ फैलाते हैं, वे ऐसे मसीह विरोधी राक्षस हैं जो सीधे तौर पर परमेश्वर का विरोध करते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों पर हमला करते हैं, उँगली उठाते हैं और बदनाम करते हैं, वे असल में परमेश्वर का विरोध करने वाले मसीह विरोधी राक्षस हैं। जो लोग दूसरों को धोखा देने और छलने के लिए, उनसे परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की अवहेलना करवाने के लिए ऐसी भ्रांतियां फैलाते हैं कि "पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए इंसान का कार्य मानवीय कार्य है; हमें परमेश्वर की सुननी चाहिए, इंसान की नहीं," या, "यहाँ तक कि पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए इंसान भी भ्रष्ट हैं; हमें केवल परमेश्वर की बात सुनते हैं, इंसान की नहीं," आदि आदि, ऐसे लोग मसीह विरोधी राक्षस हैं। जो विभिन्न स्तरों पर सेवारत सभी अगुआओं और कार्यकर्ताओं की आलोचना करते हुए उन्हें झूठा बताते हैं, जो हर स्तर पर परमेश्वर के चुने हुए लोगों और अगुआओं और कार्यकर्ताओं के बीच के संबंधों से खिलवाड़ करते हैं, और जो लगातार कलीसिया के काम में रुकावट डालते और परेशानियाँ खड़ी करते हैं, ऐसे लोग मसीह विरोधी राक्षस हैं। सभी मसीह विरोधी राक्षसों को कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए, ताकि इनका नामोनिशान मिट जाए! मसीह विरोधी राक्षसों के सभी ख़ास लोग, उनके साथी और कट्टर समर्थक भी असल में मसीह विरोधी राक्षसों के समूह से ही आते हैं। वे यकीनन उन लोगों में से नहीं हैं जिन्हें बहकाया गया हो या जिनका फ़ायदा उठाया जा रहा हो। उन्हें पश्चाताप करने का मौक़ा दिए बिना मसीह विरोधी राक्षसों के साथ ही निष्कासित कर देना चाहिए। जिन लोगों को सही मायने में मसीह विरोधियों द्वारा बहकाए गए लोगों की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है वे सिर्फ़ ऐसे नए विश्वासी हैं जो सत्य को बिल्कुल भी नहीं समझते और जिनमें विवेक की कमी है, और जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और जिनके पास बेहतर इंसानियत है। उन्हें पश्चाताप करने का मौका दिया जाना चाहिए। जिन्होंने मसीह विरोधियों का अनुसरण किया है, लेकिन कोई बहुत बुरा काम नहीं किया, जिन्हें यह पता चल गया है कि सभी मसीह विरोधी ऐसे दुष्ट लोग हैं जिनके पास सत्य नहीं है, और जिन्होंने बाद में मसीह विरोधियों को त्याग दिया और सही रास्ते पर लौट आए हैं, उन्हें उनके अतीत के कर्मों के दंड से छुटकारा दिया जा सकता है। जिन्होंने अतीत में लोगों से बुरे काम कराने, बहकाने और उकसाने में मसीह विरोधियों के गिरोह का अनुसरण किया है, और जिन्होंने कलीसिया के काम में रुकावट डाली है, उन्हें निष्कासन से केवल तभी छूट दी जा सकती है अगर वे सच्चा पश्चाताप करें, मसीह विरोधियों के बुरे कर्मों को उजागर करें, और खुले तौर पर उनकी निंदा करते हुए उन्हें दोषी ठहराएं; ऐसा नहीं करने पर उन सभी निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोग काँट-छाँट और निपटाने को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते; विभिन्न स्तरों के अगुआ और कार्यकर्ता इसके बारे में चाहे उनसे कितनी भी सहभागिता करें, मगर ऐसे लोग सत्य को स्वीकार करने से मना कर देते हैं; ऐसे लोग कभी भी आत्मचिंतन नहीं करते और इनका पश्चाताप करने का कोई इरादा नहीं होता। इतना ही नहीं, वे तो विभिन्न स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं का विरोध और निंदा तक करते हैं, उन्हें रास्ते में आने वाले काँटों के समान मानते हैं; वे सत्य के साथ-साथ सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं से अत्यधिक घृणा करते हैं और इस कहावत को चरितार्थ करते हैं, "जो समर्पण करेंगे वे समृद्ध होंगे; जो विरोध करेंगे उनका नाश हो जाएगा," वे किसी भी इंसान से अपनी आलोचना या अपना खुलासा सहन नहीं करते, मानो वे ऐसे संत हों जिनमें कोई भ्रष्टता नहीं है। वे दूसरों के ख़िलाफ़ साजिशें रचकर और उन्हें झूठे आरोपों में फँसाकर अपना रास्ता बनाते हैं और ऐसा बर्ताव करते हैं मानो चोर ही "चोर-चोर" चिल्ला रहा हो। ऐसे लोग जंगली जानवरों की तरह तर्कहीन रूप से काम करते हैं, उनके असली दुष्ट और छिपे हुए शैतानी चेहरे काफ़ी समय पहले उजागर हो चुके हैं। वे वास्तव में मसीह विरोधी राक्षस हैं, जिन्हें हर हाल में निष्कासित किया जाना चाहिए, ताकि कलीसिया में किसी भी हंगामे की संभावना को पूरी तरह से ख़त्म किया जा सके।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के घर में किये जाने वाले सभी कार्यों के लिए सिद्धांत होते हैं। लोगों को प्रोन्नत करने और उनका इस्तेमाल करने के लिए सिद्धांत होते हैं; लोगों को छांटने और निष्कासित करने के लिए भी सिद्धांत होते हैं। छंटाई का कार्य करते समय सिद्धांत के अनुसार मामलों को निपटाने के लिए, लोगों को बाहरी व्यवहार के हिसाब से नहीं चलना चाहिए, बल्कि लोगों के सार को समझना चाहिए; केवल इसी तरीके से व्यक्ति लोगों को सही तरीके से, निष्पक्षता से और बिना भेदभाव के पहचान सकता है और निपटा सकता है। ऐसा करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। जब हम लोगों के सार को समझने में असमर्थ होते हैं, तो हम आसानी से सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकते हैं और सख्ती से "सभी के लिए एक ही नियम" वाला दृष्टिकोण लागू कर सकते हैं। फ़िलहाल, कुछ अगुआ और कार्यकर्ता बहुत कम सत्यों को ही समझ पाते हैं और वे ज़्यादातर लोगों के सार को समझने में असमर्थ होते हैं। इसलिए, जब मामले सामने आते हैं, तो वे पूरी तरह से उलझन में पड़ जाते हैं और वे बस सख्ती से नियमों का पालन करने लगते हैं। इसलिए, वे यह पक्का करने में असमर्थ होते हैं कि वे सही तरीके से लोगों की छंटाई का काम कर सकते हैं। कलीसिया द्वारा किसी व्यक्ति की छंटाई या निष्कासन से पहले, उसे पहले उस व्यक्ति की प्रकृति सार को अच्छी तरह से समझना चाहिए। कम से कम, उसे यह अच्छी तरह से समझना चाहिए कि वह व्यक्ति सत्य का अनुसरण बिल्कुल भी नहीं करता है, उसके पास मूलतः एक सामान्य व्यक्ति का विवेक और समझ नहीं है, वह चाहे और कितने ही सालों तक विश्वास करता रहे, उसमें कोई बदलाव नहीं आएगा, और यह कि पवित्र आत्मा उस व्यक्ति पर बिल्कुल भी कार्य नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति को सिर्फ़ तभी छांटा या निष्कासित किया जा सकता है जब हर कोई यह मानता हो कि वह ऐसा ही है। केवल इसी तरीके से यह गारंटी दी जा सकती है इस कार्य में कोई गलती नहीं होगी। अगर लोग इस संदर्भ में परमेश्वर की इच्छा को पूरी तरह से समझते हैं कि किन लोगों को बचाया जाना चाहिए, किन्हें छोड़ा या हटाया जाना चाहिए, तो वे लोगों को छांटने या निष्कासित करते समय सही प्रथाओं को अपनाएंगे, किसी भी नेक इंसान के साथ गलत नहीं करेंगे और किसी भी बुरे इंसान को नहीं छोड़ेंगे। कलीसिया को किसी व्यक्ति को छांटने या निष्कासित करने का अपना फ़ैसला उस व्यक्ति के सार के आधार पर लेना चाहिए। केवल इसी तरीके से यह गारंटी दी जा सकती है कि फ़ैसला परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप लिया गया है और कोई गलती नहीं की जाएगी। उदाहरण के लिए, शैतानों के वश में रहने वाले लोग और मसीह विरोधी जो लगातार परमेश्वर के कार्य या पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये गए लोगों की आलोचना करते रहते हैं, जो लगातार व्यभिचार करते हैं या समलैंगिक गतिविधियों में लगे रहते हैं, और जो लगातार लापरवाही से काम करते हैं और परमेश्वर के घर के काम में रुकावट पैदा करते हैं, उन सभी को निष्कासित कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि अपने प्रकृति सार से वे शैतान के साथी हैं और उन्हें बचाया नहीं जा सकता। जैसा कि उनके सार से पता चलता है, ऐसे लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया और चुना नहीं गया है, बल्कि ये दुष्ट और मौकापरस्त लोग हैं जो परमेश्वर के घर में चोरी-छिपे घुस आये हैं। इसलिए, हमें इस तरह के सभी लोगों को निष्कासित कर देना चाहिए। ऐसे काम कभी भी गलत नहीं हो सकते। इसका कारण यह है कि ऐसी प्रक्रियाएं व्यक्ति के सार के आधार पर लागू की जाती हैं, उसके तात्कालिक अपराधों के आधार पर नहीं। फिर यह भी संभव है कि कुछ लोग जो अपराध तो करते हैं मगर सच्चे मन से पश्चाताप कर सकते हैं, वे भी बरबाद हो जाएं। परमेश्वर के परिवार ने ऐसे लोगों के निष्कासन की अनुमति कभी नहीं दी है जिन्होंने गंभीर अपराध तो किये हैं मगर सच्चे मन से पश्चाताप करने में सक्षम हैं।

यह पक्का करने के लिए कि कलीसिया लोगों को निष्कासित करने और छांटने के मामले में सही तरीके से कदम उठाती है, परमेश्वर के घर ने पहले यह नियम बनाया था कि किसी भी व्यक्ति को छांटने के लिए कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों की पूर्ण स्वीकृति लेना ज़रूरी है। किसी भी व्यक्ति को निष्कासित किये जाने से पहले कलीसिया के 80% से ज़्यादा सदस्यों से स्वीकृति ज़रूर ली जानी चाहिए। इस सिद्धांत का पालन करना ज़रूरी है। इसके अलावा, अगर किसी व्यक्ति को पहले छांटा या निष्कासित किया गया है और किसी व्यक्ति में अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत है, मगर तात्कालिक अपराध के कारण उसे गलती से निकाल दिया गया है, तो उसे अपना कलीसिया जीवन फिर से शुरू करने के लिए वापस बुलाया जा सकता है। बुरी इंसानियत वाले लोगों के मामले में, उन्हें हमेशा के लिए त्याग दिया जाना चाहिए। जब तुम लोगों के सार को समझने और यह जानने में सक्षम होते हो कि वे किस तरह के लोग हैं, तो काम को करना बहुत आसान हो जाता है और मामलों को सिद्धांतों के अनुसार निपटाना भी आसान हो जाता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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