21. परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के समस्त न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना और उनके प्रति समर्पित होना आवश्यक है। इसके अलावा, व्यक्ति को काट-छाँट, निपटारे के साथ ही परीक्षण और परिशोधन को स्वीकार करना चाहिए। केवल इसी प्रकार उसे शुद्ध किया और बचाया जा सकता है।

(2) परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्य को स्वीकार करो और उसके प्रति समर्पण करो। चाहे व्यक्ति इसका कितना भी अंश समझे, उसे इसका अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। केवल इसी प्रकार वह सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है।

(3) जब क्लेश और परीक्षण होते हैं, तो सत्य की तलाश करना, परमेश्वर का आदर करना और उस पर निर्भर होना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई परमेश्वर के कार्यों को देख सकता है और सचमुच उसे जान सकता है।

(4) पवित्र आत्मा के प्रबोधन, रोशनी और आंतरिक मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करना और सत्य-सिद्धांत के अनुसार अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना आवश्यक है। यह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने की सच्ची गवाही है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर को जानने का पहला कदम है। परमेश्वर में इस आरंभिक विश्वास से उसमें अत्यधिक गहन विश्वास की ओर जाने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम केवल परमेश्वर में विश्वास रखने के वास्ते परमेश्वर में विश्वास रखते हो, न कि उसे जानने के वास्ते, तो तुम्हारे विश्वास की कोई वास्तविकता नहीं है और तुम्हारा विश्वास शुद्ध नहीं हो सकता—इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यदि उस प्रक्रिया के दौरान जिसके ज़रिए मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, धीरे-धीरे परमेश्वर को जान लेता है, तो उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सत्य होता जाएगा। इस तरह, जब मनुष्य परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेता है, तो उसने पूरी तरह परमेश्वर को पा लिया होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य दिन-ब-दिन बदलता रहता है। वह हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है, आने वाले कल का प्रकाशन आज से कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है। कदम-दर-कदम ऊपर चढ़ता जाता है। ऐसे ही कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है। यदि मनुष्य कदम से कदम न मिला पाए, तो उसे किसी भी समय बाहर किया जा सकता है। यदि उसका हृदय आज्ञाकारी न हो, तो वह बिलकल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकेगा। पहले का युग गुज़र चुका है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना चाहिए। विशेषकर अंतिम युग में, जिसमें लोगों को पूर्ण बनाया जाता है, परमेश्वर ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा, इसलिए, हृदय में आज्ञाकारिता के भाव के बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता, न ही वह अपने कार्य के किसी चरण को अपरिवर्तनीय मानता है। वह जो भी कार्य करता है, वह हमेशा नया और ऊँचा होता है। हर चरण के साथ उसका कार्य और भी व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप होता जाता है। इस प्रकार के कार्य का अनुभव करने पर ही मनुष्य अपने स्वभाव का अंतिम रूपांतरण कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान उच्च स्तरों तक पहुँचता जाता है, और उसी तरह परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँचता जाता है। इसी तरह से मनुष्य को पूर्ण बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का मुकाबला करने तथा उन्हें पलटने के लिए इस तरह से कार्य करता है, और दूसरी ओर, मनुष्य की उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर में आस्था के उच्चतम आयाम में अगुवाई करने के लिए इस तरह कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। जो लोग अवज्ञाकारी प्रकृति के होते हैं और जानबूझ कर विरोध करते हैं, उन्हें परमेश्वर के द्रुतगामी और मजबूती से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा बाहर कर दिया जाएगा; जो लोग स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं, केवल वही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी धारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए। यदि तुम लोग लापरवाह बनोगे, तो तुम्हें निश्चित रूप से पवित्र आत्मा द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, और तुम परमेश्वर के कार्य में रुकावट डालोगे। कार्य के इस चरण से गुज़रने से पहले, मनुष्य के पुराने नियम-कानून इतने ज़्यादा थे कि वह भटक गया, परिणामस्वरूप, वह अहंकारी होकर स्वयं को भूल गया। ये सारी ऐसी बाधाएँ हैं जो मनुष्य को परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने से रोकती हैं; ये मनुष्य के परमेश्वर-ज्ञान की शत्रु हैं। मनुष्य के हृदय में आज्ञाकारिता और सत्य के लिए लालसा न होना खतरनाक है। यदि तुम केवल सरल कार्यों और वचनों के प्रति ही समर्पित होते हो, और गहन कार्यों या वचनों को स्वीकार नहीं कर पाते हो, तो तुम पुराने मार्गों से चिपके रहने वाले व्यक्ति हो और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते। परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में अलग-अलग होता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक चरण में पूरी आज्ञाकारिता दिखाते हो, मगर अगले ही चरण में तुम्हारी आज्ञाकारिता कम हो जाती है या तुम कोई आज्ञाकारिता दिखा ही नहीं पाते, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाए तब भी तुम्हें उसके कदम से कदम मिलाना चाहिए; तभी तुम पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी बनोगे। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अटल रहना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि तुम जब चाहे आज्ञाकारी बन जाओ, जब चाहे उसकी अवज्ञा कर दो। परमेश्वर इस प्रकार की आज्ञाकारिता पसंद नहीं करता। मैं जिस नए कार्य पर संगति कर रहा हूँ, यदि तुम उसके साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते, और पुरानी बातों से ही चिपके रहते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों से तुम्हें पोषण देना है। यदि तुम उसके वचनों का पालन करोगे, उन्हें स्वीकारोगे, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं बता रहा हूँ; जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के अवलोकन के लिए नया प्रकाश देता हूँ और तुम लोगों को आज के प्रकाश में लाता हूँ, और जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुममें कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अड़ियल हो सकते हैं, वे कहेंगे, "तुम जैसा कहते हो मैं वैसा बिलकुल नहीं करूँगा।" ऐसी स्थिति में, मैं कहूँगा कि तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है; तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुममें जीवन नहीं बचा है। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपांतरण का अनुभव करने के लिए, आज के प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना बहुत आवश्यक है। पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। किसी अन्य समय शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें शीघ्र अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। उसी प्रकार अनुभव करो जैसा उसने किया है, तो तुम्हें उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। ऐसा करने से तुम तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य के लिए पूर्णता का ऐसा मार्ग है जिससे जीवन विकसित होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना, चीज़ के जरिए वह तुम्हें पाने या देखने देगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है। एक बार जब तुम सही पथ पर आ जाओगे, तो तुम्हें सभी चीज़ों में प्रकाशन प्राप्त होगा। पवित्र आत्मा दूसरों पर कुछ भी प्रकट करे, यदि तुम उनके ज्ञान के आधार पर अपने दम पर चीज़ों का अनुभव करते हो, तो यह अनुभव तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा, और इस अनुभव से तुम दूसरों को भी पोषण दे पाओगे। तोते की तरह वचनों को रटकर दूसरों को पोषण देने वाले लोगों के पास अपना कोई अनुभव नहीं होता; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बोलना शुरू करने से पहले, दूसरों की प्रबुद्धता और रोशनी के माध्यम से, अभ्यास करने का तरीका ढूँढ़ना सीखना होगा। यह तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसका पालन करते हुए, तुम्हें इस तरह से अनुभव करना चाहिए। सभी चीज़ों में तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को खोजना चाहिए और हर चीज़ से सीखना चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन विकसित हो सके। ऐसे अभ्यास से सबसे जल्दी प्रगति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

अगर तुम्हें परमेश्वर के काम का ज्ञान नहीं है, तो तुम्हें यह नहीं पता होगा कि परमेश्वर के साथ सहयोग कैसे करना है। अगर तुम परमेश्वर के काम के सिद्धांतों को नहीं जानते और इस बात से अनजान हो कि शैतान मनुष्य पर कैसे काम करता है, तो तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। मात्र उत्साह भरा अनुसरण तुम्हें वे परिणाम नहीं पाने देगा, जिनकी माँग परमेश्वर करता है। अनुभव करने का यह तरीका लॉरेंस के तरीके के समान है : किसी तरह का कोई फर्क न करना और केवल अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना, इन बातों से पूरी तरह से अनजान रहना कि शैतान का क्या काम है, पवित्र आत्मा का क्या काम है, परमेश्वर की उपस्थिति के बिना मनुष्य किस स्थिति में होता है, और किस तरह के लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाना चाहता है। विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करते हुए किन सिद्धांतों को अपनाना चाहिए, वर्तमान में परमेश्वर की इच्छा को कैसे समझें, परमेश्वर के स्वभाव को कैसे जानें, और परमेश्वर की दया, उसकी महिमा और धार्मिकता किन लोगों, परिस्थितियों और युग पर निर्देशित की जाती हैं—वह इनमें से किसी में अंतर नहीं करता। अगर लोगों के पास अपने अनुभवों के लिए नींव के रूप में अनेक दर्शन नहीं हैं, तो जीवन नामुमकिन है, और अनुभव उससे भी ज्यादा नामुमकिन; वे मूर्खतापूर्ण ढंग से किसी के भी प्रति समर्पित होते रहते हैं और सब-कुछ सहते रहते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाया जाना बहुत मुश्किल है। यह कहा जा सकता है कि अगर तुम्हारे पास उपर्युक्त में से कोई दर्शन नहीं है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि तुम महामूर्ख हो, नमक के खंभे के समान, जो हमेशा इजराइल में खड़ा रहता है। ऐसे लोग बेकार और निकम्मे हैं! कुछ लोग केवल आँख मूँदकर समर्पण कर देते हैं, वे हमेशा अपने आपको जानते हैं और नए मामलों से निपटने के लिए हमेशा आचार-व्यवहार के अपने ही तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, या उल्लेख के भी योग्य न होने वाले तुच्छ मामलों से निपटने के लिए "बुद्धि" का उपयोग करते हैं। ऐसे लोग विवेकहीन होते हैं, मानो उनका स्वभाव ही चुने जाने से इनकार कर देने वाला हो, और वे हमेशा एक जैसे रहते हैं, कभी नहीं बदलते। ऐसे लोग मूर्ख होते हैं, जिनके पास थोड़ा भी विवेक नहीं होता। वे कभी भी परिस्थितियों या विभिन्न लोगों के लिए उपयुक्त उपाय करने की कोशिश नहीं करते। ऐसे लोगों के पास अनुभव नहीं है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो स्वयं के ज्ञान से इतने बँधे हुए हैं कि जब उनका बुरी आत्माओं के काम से जुड़े लोगों से सामना होता है, तो वे अपना सिर झुका लेते हैं और पाप स्वीकार कर लेते हैं, खड़े होकर उनकी निंदा करने का साहस नहीं करते। और जब उनका ज़ाहिर तौर पर पवित्र आत्मा के कार्य से सामना होता है, तो वे उसका पालन करने की हिम्मत नहीं करते। वे यह विश्वास करते हैं कि बुरी आत्माएँ भी परमेश्वर के हाथों में हैं, और उनमें खड़े होकर उनका विरोध करने का ज़रा-सा भी साहस नहीं होता। ऐसे लोग परमेश्वर पर अपमान लाते हैं, और वे उसके लिए भारी बोझ सहन कर पाने में बिलकुल असमर्थ हैं। ऐसे मूर्ख किसी प्रकार का भेद नहीं करते। अनुभव करने के इस तरह के तरीके को इसलिए त्याग दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर की दृष्टि में असमर्थनीय है।

परमेश्वर वास्तव में लोगों पर बहुत काम करता है; वह कभी उनकी परीक्षा लेता है, कभी उन्हें दृढ़ बनाने के लिए वातावरण बनाता है, और कभी उनका मार्गदर्शन करने और उनकी कमियाँ सुधारने के लिए वचन बोलता है। कभी-कभी पवित्र आत्मा लोगों को परमेश्वर द्वारा उनके लिए तैयार किए गए वातावरण में ले जाता है, ताकि वे अनजाने ही ऐसी कई चीजों की खोज कर सकें, जिनकी उनमें कमी होती है। अनजाने में लोग जो कहते और करते हैं, जिस तरह से वे दूसरों के साथ व्यवहार करते हैं और चीजों से निपटते हैं, उसके द्वारा पवित्र आत्मा उन्हें कई ऐसी चीजों की जानकारी देता है, जिन्हें वे पहले नहीं समझते थे, और उन्हें अनेक चीजों और लोगों को और अधिक अच्छी तरह से समझने देता है, उन्हें ऐसी अनेक चीजों के भीतर देखने देता है, जिनसे वे पहले अनजान थे। जब तुम दुनिया से जुड़ते हो, तो तुम धीरे-धीरे दुनिया की चीजों को पहचानने लगते हो, और जब तुम मौत के करीब पहुँच जाते हो, तो तुम यह निष्कर्ष निकाल सकते हो : "आदमी होना वास्तव में कठिन है।" अगर तुम कुछ समय परमेश्वर के समक्ष अनुभव करने में बिताते हो, और परमेश्वर के काम और उसके स्वभाव को समझने लगते हो, तो तुम अनजाने में ही अधिक अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लोगे, और तुम्हारा आध्यात्मिक कद धीरे-धीरे बढ़ जाएगा। तुम कई आध्यात्मिक चीजों को बेहतर तरीके से समझोगे, और विशेष रूप से परमेश्वर के काम के बारे में अधिक स्पष्ट होगे। तुम परमेश्वर के शब्द, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर की हर क्रिया, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के स्वरूप और उसकी सत्ता को अपनी जिंदगी के समान स्वीकार कर लोगे। अगर तुम बस दुनिया में भटकने का ही काम करोगे, तो तुम्हारे पंख हमेशा कड़े होते जाएँगे, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा विरोध बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा; तब परमेश्वर तुम्हारा उपयोग कैसे कर सकता है? चूँकि तुम्हारे अंदर "मेरी राय में" की भावना बहुत ज्यादा है, इसलिए परमेश्वर तुम्हारा उपयोग नहीं करता है। जितना अधिक तुम परमेश्वर की उपस्थिति में होगे, उतने ही अधिक अनुभव तुम्हें होंगे। अगर तुम अभी भी दुनिया में एक जानवर की तरह जीते हो—तुम्हारा मुँह तो परमेश्वर पर विश्वास की घोषणा करता है, लेकिन तुम्हारा दिल कहीं और होता है—और अगर तुम अभी भी जीने के सांसारिक फलसफों का अध्ययन करते हो, तो क्या तुम्हारी पिछली सारी मेहनत बेकार नहीं हो जाएगी? इसलिए, लोग जितना अधिक परमेश्वर की उपस्थिति में रहेंगे, उनका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना उतना ही ज्यादा आसान होगा। यह वह मार्ग है, जिसके द्वारा पवित्र आत्मा अपना कार्य करता है। अगर तुम इसे नहीं समझते, तो तुम्हारे लिए सही रास्ते पर प्रवेश करना असंभव होगा, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने में असमर्थ होगे; यह ऐसा होगा, मानो तुम विकलांग हो, और तुम्हारे पास केवल अपनी कड़ी मेहनत होगी, परमेश्वर का कोई कार्य तुम्हारे पास नहीं होगा। क्या यह तुम्हारे अनुभव में गलती नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अनुभव पर' से उद्धृत

मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, स्वयं को जान लेता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है और जीवन में विकास की तलाश करता है, यह सब परमेश्वर को जानने के वास्ते करता है। यदि तुम केवल अपने आप को जानने और अपने भ्रष्ट स्वभाव से निपटने का प्रयास करते हो, मगर तुम्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य पर क्या कार्य करता है, उसका उद्धार कितना महान है या इसका कोई ज्ञान नहीं है कि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हो और उसके कर्मों की गवाही कैसे देते हो, तो तुम्हारा यह अनुभव अनर्गल है। यदि तुम सोचते हो कि किसी के जीवन में केवल इसलिए परिपक्वता आई है क्योंकि वह सत्य को व्यवहार में लाने और सहन करने में समर्थ है, तो इसका मतलब है कि तुमने अभी भी जीवन का सच्चा अर्थ या मनुष्य को पूर्ण करने का परमेश्वर का उद्देश्य नहीं समझा है। एक दिन, जब तुम पश्चाताप कलीसिया (रिपेंटेंस चर्च) या जीवन कलीसिया (लाइफ़ चर्च) के सदस्यों के बीच, धार्मिक कलीसियाओं में होगे, तो तुम कई धर्मपरायण लोगों से मिलोगे, जिनकी प्रार्थनाएं "दर्शनों" से युक्त होती हैं और जो जीवन की अपनी खोज में, स्पर्श किए गए और वचनों द्वारा मार्गदर्शित महसूस करते हैं। इसके अलावा, वो कई मामलों में सहने और स्वयं का त्याग करने और देह द्वारा अगुआई न किए जाने में समर्थ हैं। उस समय, तुम अंतर बताने में समर्थ नहीं होगे: तुम विश्वास करोगे कि वो जो कुछ करते हैं, सही है, जीवन की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है और यह कितनी दयनीय बात है कि जिस नाम में वो विश्वास रखते हैं, वही ग़लत है। क्या ऐसे विचार मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? ऐसा क्यों कहा जाता है कि कई लोगों का कोई जीवन नहीं है? क्योंकि वो परमेश्वर को नहीं जानते और इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि उनके हृदय में कोई परमेश्वर नहीं है और उनका कोई जीवन नहीं है। यदि परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास एक स्थिति तक पहुँच गया है, जहां तुम परमेश्वर के कर्मों, परमेश्वर की वास्तविकता और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को पूरी तरह जानने में सक्षम हो, तो तुम सत्य के अधीन हो। यदि तुम परमेश्वर के कार्य और स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम्हारे अनुभव में अभी भी कुछ दोष है। यीशु ने कैसे अपने कार्य के उस चरण को कार्यान्वित किया, कैसे इस चरण को कार्यान्वित किया जा रहा है, कैसे अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने अपना कार्य किया और क्या कार्य किया, कौन सा कार्य इस चरण में किया जा रहा है—यदि तुम्हें इन बातों का पूरी तरह ज्ञान नहीं है, तो तुम कभी भी आश्वस्त महसूस नहीं करोगे और तुम हमेशा असुरक्षित रहोगे। यदि एक अवधि के अनुभव के बाद, तुम परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य और उसके हर चरण को जानने में समर्थ हो और यदि तुमने परमेश्वर के वचनों के बोलने में उसके लक्ष्यों का और इस बात का पूरी तरह ज्ञान प्राप्त कर लिया है और क्यों उसके द्वारा बोले गए इतने सारे वचन पूरे नहीं हुए हैं, तो तुम साहस के साथ और बिना हिचकिचाए, चिंता और शोधन से मुक्त होकर, आगे के मार्ग पर चल सकते हो। तुम लोगों को देखना चाहिए कि परमेश्वर किन तरीक़ों से अपना इतना अधिक कार्य कर पाता है। वह भिन्न-भिन्न प्रकार के बहुत से वचनों के ज़रिए मनुष्य का शोधन करते और उसकी धारणाओं को रूपांतरित करते हुए अपने बोले गए वचनों का उपयोग करता है। समस्त पीड़ा जो तुम लोगों ने सहन की हैं, सभी शोधन जिनसे तुम लोग गुज़रे हो, जिस व्यवहार को तुम लोगों ने अपने भीतर स्वीकारा है, प्रबुद्धता जो तुम लोगों ने अनुभव की है—ये सभी उन वचनों के ज़रिए प्राप्त किए गए हैं, जो परमेश्वर ने बोले हैं। मनुष्य किस कारण परमेश्वर का अनुसरण करता है? वह परमेश्वर के वचनों की वजह से अनुसरण करता है! परमेश्वर के वचन गहन रूप से रहस्यमय हैं और इसके अलावा वो मनुष्य के हृदय को प्रेरित कर सकते हैं, उसके भीतर दबी चीज़ों को प्रकट कर सकते हैं, उसे अतीत में हुई चीजें ज्ञात करवा सकते हैं और उसे भविष्य में प्रवेश करने दे सकते हैं। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के वचनों की वजह से पीड़ाएं सहता है और उसे परमेश्वर के वचनों की वजह से ही पूर्ण भी बनाया जाता है: केवल इसी समय मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करता है। इस चरण में मनुष्य को जो करना चाहिए, वह है परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करना और इसकी परवाह किए बिना कि उसे पूर्ण बनाया जाता है या शोधन किया जाता है, जो महत्वपूर्ण है, वह है परमेश्वर के वचन। यह परमेश्वर का कार्य है और यही वह दर्शन भी है, जो आज मनुष्य के जानने योग्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

लोगों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए सबसे पहले उसके वर्तमान कार्य को समझना चाहिए और यह भी कि मानवजाति को कैसे सहयोग करना चाहिए। वास्तव में, यह कुछ ऐसा है, जिसे हर किसी को समझना चाहिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या करता है, चाहे वह शुद्धिकरण हो या भले ही वह बोल नहीं रहा हो, परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण मानवजाति की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं होता। उसके कार्य का प्रत्येक चरण लोगों की अवधारणाओं को खंड-खंड कर देता है। यह उसका कार्य है। लेकिन तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर का कार्य एक निश्चित चरण में पहुँच गया है, इसलिए चाहे जो हो जाए, वह मानवजाति को मौत के घाट नहीं उतारेगा। वह मानवजाति को वादे और आशीष दोनों देता है, और वे सभी जो उसका अनुसरण करते हैं, उसके आशीष प्राप्त करने में सक्षम होंगे, लेकिन जो अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। यह तुम्हारे अनुसरण पर निर्भर करता है। चाहे कुछ भी हो, तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हर एक व्यक्ति की उचित मंजिल होगी। परमेश्वर ने मनुष्यों को सुंदर आकांक्षाएँ प्रदान की हैं, लेकिन यदि वे अनुसरण नहीं करते, तो वे अप्राप्य हैं। तुम्हें अब इसे देखने में सक्षम होना चाहिए—परमेश्वर द्वारा लोगों का शुद्धिकरण और ताड़ना उसका कार्य है, लेकिन लोगों को अपनी तरफ से हर समय अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यावहारिक अनुभव में तुम्हें पहले जानना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएँ और पीएँ; तुम्हें उसके वचनों में यह ढूँढ़ना चाहिए कि तुम्हें किस चीज़ में प्रवेश करना चाहिए और तुम्हारी कमियाँ क्या हैं, तुम्हें अपने व्यावहारिक अनुभव में प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के उस भाग को लेना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाया जाना चाहिए, और वैसा करने का प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना एक पहलू है। उसके अतिरिक्त, कलीसिया का जीवन बनाए रखा जाना चाहिए, तुम्हें एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना चाहिए, और तुम्हें अपनी सभी वर्तमान अवस्थाओं को परमेश्वर को सौंपने में सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य रहना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन तुम्हारे सामान्य प्रवेश को बनाए रख सकता है। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन निर्बाध जारी रखना और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही काम है, जो लोगों को करना चाहिए। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है, लेकिन सामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह पूर्ण बनाया जाना है, जबकि एक असामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह एक परीक्षण है। पवित्र आत्मा के शुद्धिकरण के कार्य के वर्तमान चरण में, कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत महान है और कि लोगों को पूरी तरह से शुद्धिकरण की आवश्यकता है, अन्यथा उनकी अध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी हो जाएगी और उनके पास परमेश्वर की इच्छा प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं होगा। हालाँकि, जिन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, उनके लिए यह परमेश्वर का अनुसरण न करने और सभाओं में भाग न लेने या परमेश्वर के वचन को न खाने-पीने का एक कारण बन जाता है। परमेश्वर के कार्य में, चाहे वह कुछ भी करे या कोई भी बदलाव लाए, लोगों को एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन की एक आधार-रेखा अवश्य बनाए रखनी चाहिए। शायद तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के इस वर्तमान चरण में शिथिल नहीं हुए हो, लेकिन तुमने अभी भी बहुत-कुछ प्राप्त नहीं किया है, और बहुत अच्छी फसल नहीं काटी है। इस तरह की परिस्थितियों में तुम्हें अभी भी नियमों का पालन करना चाहिए; तुम्हें इन नियमों के अनुसार चलना चाहिए, ताकि तुम अपने जीवन में नुकसान न झेलो और ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करो। यदि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन असामान्य है, तो तुम परमेश्वर के वर्तमान कार्य को नहीं समझ सकते; बल्कि हमेशा महसूस करते हो कि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, और यद्यपि तुम उसका अनुसरण करने के लिए तैयार होते हो, लेकिन तुममें अंत:प्रेरणा का अभाव रहता है। तो भले ही परमेश्वर वर्तमान में कुछ भी कर रहा हो, लोगों को सहयोग अवश्य करना चाहिए। यदि लोग सहयोग नहीं करते, तो पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर सकता, और यदि लोगों के पास सहयोग करने वाला दिल नहीं है, तो वे शायद ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं। यदि तुम अपने अंदर पवित्र आत्मा का कार्य चाहते हो, और यदि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख अपनी मूल भक्ति बनाए रखनी चाहिए। अब, तुम्हारे पास गहन समझ, उच्च सिद्धांत, या ऐसी अन्य चीजों का होना आवश्यक नहीं है—बस इतना ही आवश्यक है कि तुम परमेश्वर के वचन को मूल आधार पर बनाए रखो। यदि लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते और गहरे प्रवेश की कोशिश नहीं करते, तो परमेश्वर उन चीजों को छीन लेगा, जो मूलत: उसकी थीं। अंदर से लोग हमेशा सुविधा के लोभी होते हैं और उसका आनंद लेते हैं, जो पहले से ही उपलब्ध होता है। वे बिना कोई भी कीमत चुकाए परमेश्वर के वादे प्राप्त करना चाहते हैं। ये अनावश्यक विचार हैं, जो मनुष्य रखता है। बिना कोई कीमत चुकाए स्वयं जीवन प्राप्त करना—पर क्या कभी कुछ भी इतना आसान रहा है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करता है और अपने स्वभाव में बदलाव चाहता है, तो उसे उसकी कीमत अवश्य चुकानी चाहिए और वह अवस्था प्राप्त करनी चाहिए, जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा, चाहे परमेश्वर कुछ भी करे। यह ऐसा काम है, जिसे लोगों को अवश्य करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि तुम इस सबका एक नियम के रूप में पालन करते हो, तो भी तुम्हें हमेशा इस पर टिके रहना चाहिए, और चाहे परीक्षण कितने भी बड़े हों, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य संबंध को जाने नहीं दे सकते। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया-जीवन को बनाए रखने, और अपने भाइयों और बहनों को कभी न छोड़ने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले, तब भी तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए। आध्यात्मिक जीवन के लिए यह न्यूनतम अपेक्षा है। हमेशा खोज करने की इच्छा रखना, सहयोग करने का भरसक प्रयास करना, अपनी समस्त ऊर्जा लगा देना—क्या यह किया जा सकता है? यदि लोग इसे आधार के रूप में लें, तो वे विवेक हासिल करने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। तुम्हारी स्वयं की अवस्था सामान्य होने पर परमेश्वर का वचन स्वीकार करना आसान है, इन परिस्थितियों में सत्य का अभ्यास करना मुश्किल नहीं लगता, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य महान है। लेकिन यदि तुम्हारी हालत खराब है, तो परमेश्वर का कार्य कितना भी महान क्यों न हो, और चाहे कोई कितनी भी खूबसूरती से क्यों न बोलता हो, तुम उस पर कोई ध्यान नहीं दोगे। जब व्यक्ति की हालत सामान्य नहीं होती, तो परमेश्वर उसमें कार्य नहीं कर सकता, और वे अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना, अनुग्रह का आनन्द लेने के बारे में नहीं है बल्कि उसके प्रति तुम्हारे प्रेम के कारण कष्ट सहने के बारे में है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना का भी आनन्द अवश्य लेना चाहिए; तुम्हें इन सभी चीज़ों का अनुभव अवश्य करना चाहिए। तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता को अपने अंदर अनुभव कर सकते हो, और तुम यह अनुभव भी कर सकते हो कि कैसे परमेश्वर तुम्हारे साथ व्यवहार करता तथा न्याय करता है। इस प्रकार, तुम्हारा अनुभव व्यापक होता है। परमेश्वर ने तुम पर न्याय और ताड़ना का काम किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारे साथ व्यवहार किया है, लेकिन इतना ही नहीं; इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम नकारात्मक और कमज़ोर होते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे लिए चिंता करता है। यह सब तुम्हें यह ज्ञात कराने के लिए है कि मनुष्य के बारे में सब कुछ परमेश्वर के आयोजन के अंतर्गत है। तुम सोच सकते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना कष्ट सहने के बारे में है, या उसके लिए कई चीजें करना है; शायद तुम सोचो कि परमेश्वर में विश्वास का प्रयोजन तुम्हारी देह की शान्ति के लिए है, या इसलिए है कि तुम्हारी ज़िन्दगी में सब कुछ ठीक रहे, या इसलिए कि तुम आराम से रहो, सब कुछ में सहज रहो। परन्तु इनमें से कोई भी ऐसा उद्देश्य नहीं है जिसे लोगों को परमेश्वर पर अपने विश्वास के साथ जोड़ना चाहिए। यदि तुम इन प्रयोजनों के लिए विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, और उसकी अद्भुतता और अगाधता, इन सभी बातों को मनुष्यों को अवश्य समझना चाहिए। इस समझ को पा लेने के बाद तुम्हें इसका उपयोग अपने हृदय के व्यक्तिगत अनुरोधों, आशाओँ और धारणाओं से छुटकारा पाने के लिए करना चाहिए। केवल इन्हें दूर करके ही तुम परमेश्वर के द्वारा माँग की गई शर्तों को पूरा कर सकते हो। केवल ऐसा करने के माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करना उसे संतुष्ट करने के वास्ते और उस स्वभाव को जीने के लिए है जो वह अपेक्षा करता है, ताकि इन अयोग्य लोगों के समूह के माध्यम से परमेश्वर के कार्यकलाप और उसकी महिमा प्रदर्शित हो सके। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए यही सही दृष्टिकोण है और यह वो लक्ष्य भी है जिसे तुम्हें खोजना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में तुम्हारा सही दृष्टिकोण होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने की आवश्यकता है, और तुम्हें सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यवहारिक कर्मों को देखने, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उसके अद्भुत कर्मों को देखने, और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यवहारिक कार्य को देखने में सक्षम होना चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों के द्वारा, लोग इस बात की सराहना कर सकते हैं कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है, उनके प्रति उसकी क्या इच्छा है। यह सब लोगों के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करने के लिए है। अपने भीतर की सारी अशुद्धता और अधार्मिकता बाहर निकाल देने, अपने गलत इरादों को निकाल फेंकने, और परमेश्वर में सच्चा विश्वास उत्पन्न करने के बाद—केवल सच्चे विश्वास के साथ ही तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

चाहे परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे या उसे शाप दे, ये दोनों ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं : दोनों का उपयोग मनुष्य के भीतर की विकृतियों के परिष्कार के लिए किया जाता है। इस माध्यम से मनुष्य का शोधन किया जाता है, और मनुष्य में जिस चीज़ की कमी होती है उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य के द्वारा पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे यह कठोर शब्द हों, न्याय हो या ताड़ना हो—मनुष्य को पूर्ण बनाता है और बिलकुल उचित होता है। युगों-युगों में कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम लोगों के भीतर कार्य करता है ताकि तुम उसकी बुद्धि को सराहो। यद्यपि तुम लोगों ने अपने भीतर कुछ कष्ट सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय स्थिर और शांत महसूस करते हैं; यह तुम्हारे लिए आशीष है कि तुम परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद ले सकते हो। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम भविष्य में क्या प्राप्त कर सकते हो, आज अपने भीतर परमेश्वर के जिस कार्य को तुम देखते हो, वह प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और उसके शोधन का अनुभव नहीं करता, तो उसके कार्यकलाप और उसका उत्साह सदैव सतही रहेंगे, और उसका स्वभाव सदैव अपरिवर्तित रहेगा। क्या इसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया माना जा सकता है? यद्यपि आज भी मनुष्य के भीतर बहुत कुछ है जो काफी अहंकारी और दंभी है, फिर भी मनुष्य का स्वभाव पहले की तुलना में बहुत ज्यादा स्थिर है। तुम्हारे प्रति परमेश्वर का व्यवहार तुम्हें बचाने के लिए है, और हो सकता है कि यद्यपि तुम इस समय कुछ पीड़ा महसूस करो, फिर भी एक ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारे स्वभाव में बदलाव आएगा। उस समय, तुम पीछे मुड़कर देखने पर पाओगे कि परमेश्वर का कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण है और उस समय तुम परमेश्वर की इच्छा को सही मायने में समझ पाओगे। आज कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, परंतु यह वास्तविकता नहीं है, वास्तव में वे झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि वर्तमान में उन्हें अभी यह समझना शेष है कि क्या परमेश्वर की इच्छा मनुष्य को बचाने की है या मनुष्य को शाप देने की है। शायद तुम इसे अभी स्पष्ट नहीं देख सकते, परंतु एक दिन आएगा जब तुम देखोगे कि वह दिन आ गया है जब परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है, और परमेश्वर से प्रेम करना कितना अर्थपूर्ण है, जिससे तुम मानवीय जीवन को जान सकोगे, और तुम्हारी देह परमेश्वर-प्रेम की दुनिया में रहेगी, तुम्हारी आत्मा स्वतंत्र कर दी जाएगी, तुम्हारा जीवन आनंदमय हो जाएगा, और तुम सदैव परमेश्वर के समीप रहोगे और उस पर भरोसा करोगे। उस समय, तुम सही मायने में जान जाओगे कि परमेश्वर का कार्य आज कितना मूल्यवान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है। जितना अधिक मनुष्य का शुद्धिकरण होगा, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना अधिक विशाल होगा, और परमेश्वर की शक्ति उसमें उतनी ही अधिक प्रकट होगी। इसके विपरीत, मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होगी। एक व्यक्ति का शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा जितनी अधिक यातना वो सहता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होगा एवं परमेश्वर में उसका विश्वास उतना ही अधिक सच्चा होगा, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहन होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि जो शुद्धि पाते हुए अत्यधिक दर्द सहते हैं, जिनके साथ काफी निपटारा तथा अनुशासन का व्यवहार किया जाता है, और तुम देखोगे कि यही लोग हैं जिनके पास परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं तीक्ष्ण ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने निपटारा किए जाने का अनुभव नहीं किया है, जिनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और जो केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें।" यदि लोगों ने निपटारा किए जाने का अनुभव किया है और अनुशासित किए गए हैं, तो वे परमेश्वर के विषय में सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने और तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ होता है, और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व बहुत अधिक है! यदि उसने मनुष्य को इस तरीके से शुद्ध नहीं किया, यदि उसने इस पद्धति के अनुसार कार्य नहीं किया, तो उसका कार्य अप्रभावी और महत्वहीन होगा। पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चुनेगा और प्राप्त करेगा, वह उन्हें अंत के दिनों में पूर्ण बनाएगा; इसमें असाधारण महत्व है। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धि के बारे में समझने में तुम लोग समर्थ होते हो और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर की 6,000 साल की प्रबंधन योजना का अंत हो जाएगा। क्या यह इतनी आसानी से समाप्त हो सकती है? एक बार जब वह मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लेगा, तो क्या उसका कार्य पूरा हो जाएगा? क्या यह इतना आसान हो सकता है? लोग वास्तव में कल्पना करते हैं कि यह इतना ही सरल है, परन्तु परमेश्वर जो करता है वह इतना आसान नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम परमेश्वर के कार्य के कौन-से भागका उल्लेख करते हो, मनुष्य के लिए सब कुछ अथाह है। यदि तुम इसे मापने के योग्य होते, तो परमेश्वर के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाता। परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अथाह है; यह तुम्हारी धारणाओं से पूरी तरह विपरीत है, और यह तुम्हारी धारणाओं से जितना ज़्यादा असंगत होता है, उतना ही ज़्यादा यह दर्शाता है कि परमेश्वर का कार्य अर्थपूर्ण है; यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो यह अर्थहीन होता। आज, तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत अद्भुत है, और तुम्हें यह जितना अधिक अद्भुत महसूस होता है, उतना ही अधिक तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर अथाह है, और तुम देखते हो कि परमेश्वर के कर्म कितने महान हैं। यदि उसने मनुष्य को जीतने के लिए केवल सतही और बेपरवाही से कार्य किए होते, और उसके बाद कुछ नहीं किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के कार्य के महत्व को देखने में असमर्थ होता। यद्यपि आज तुम थोड़ा-सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए बहुत लाभदायक है; और इसलिए ऐसी कठिनाईयों से गुज़रना तुम लोगों के लिए सर्वथा आवश्यक है। आज, तुम थोड़ा-सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु बाद में तुम सचमुच में परमेश्वर के कार्यों को देखने में सक्षम होगे, और अंततः तुम कहोगे : "परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!" तुम्हारे हृदय में ये वचन होंगे। कुछ समय के लिए परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का अनुभव करने के बाद (सेवा करने वालों की परीक्षा और ताड़ना का समय), अंततः कुछ लोगों ने कहा : "परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!" यह तथ्य कि वे "वास्तव में कठिन" इन शब्दों का प्रयोग करते हैं दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, परमेश्वर का कार्य अत्यधिक महत्व और मूल्य से सम्पन्न है, और मनुष्य के द्वारा संजोकर रखे जाने के बहुत ही योग्य है। यदि, मेरे इतना अधिक काम करने के बाद, तुम्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? इस कारण तुम कहोगे : "परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सचमुच में विवेकी है! वह बहुत प्यारा है!" यदि, अनुभव की एक अवधि से गुज़रने के बाद, तुम ऐसे शब्दों को कहने में समर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुमने स्वयं में परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर का कार्य और वचन तुम्हारे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए हैं; उसका लक्ष्य मात्र अपने कार्य और वचन को तुम लोगों को समझाना या ज्ञात कराना नहीं है। इतना पर्याप्त नहीं है। तुम्हारे अंदर सोचने-समझने की योग्यता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन इंसानी भाषा में लिखे हैं, और वह बड़ी स्पष्टता से बोलता है। मिसाल के तौर पर, तुम इस बात को पूरी तरह से जानने में सक्षम हो कि परमेश्वर तुम्हें क्या बात समझाना और किस पर अमल करवाना चाहता है; यह ऐसी बात है जिसे सूझ-बूझ रखने वाला एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है। विशेषकर, वर्तमान चरण में परमेश्वर जो वचन कह रहा है, वे खासतौर पर स्पष्ट और पारदर्शी हैं, और परमेश्वर ऐसी अनेक बातों की ओर इशारा कर रहा है जिन पर लोगों ने विचार नहीं किया है इसके साथ-साथ हर तरह की इंसानी स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है। उसके वचन व्यापक हैं और पूरी तरह से स्पष्ट हैं। इसलिए अब, लोग बहुत-से मुद्दों को समझते हैं, लेकिन एक चीज़ अभी भी छूट रही है—लोगों का उसके वचनों को अमल में लाना। लोगों को सत्य के हर पहलू का विस्तार से अनुभव करना चाहिए, उसकी छान-बीन और खोज ज़्यादा विस्तार से करनी चाहिए, बजाय इसके कि जो कुछ भी उन्हें उपलब्ध कराया जाए, महज़ उसे आत्मसात करने का इंतज़ार करें; वरना वे परजीवी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों को जानते तो हैं, फिर भी उस पर अमल नहीं करते। इस तरह का व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता और अंतत: उसे हटा दिया जाएगा। 1990 के पतरस जैसा बनने के लिए तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहिए, अपने अनुभव में सच्चा प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ अपने सहयोग में ज़्यादा और कहीं अधिक विशाल प्रबोधन प्राप्त करना चाहिए, जो तुम्हारे अपने जीवन के लिए सदा अधिक सहायक होगा। अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, तुम लोगों द्वारा परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया ही उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है, या इसे और अधिक साफ तौर कहें तो, परमेश्वर में विश्वास रखना उसके वचनों को जानना, समझना, उनका अनुभव करना और उन्हें जीना है; परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की सच्चाई ऐसी ही है। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अनंत जीवन पाने की आशा करते हो लेकिन परमेश्वर के वचनों को इस प्रकार अमल में लाने का प्रयास नहीं करते मानो कि वह ऐसी कोई चीज़ है जो तुम्हारे भीतर है, तो तुम मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जा कर केवल भोज्य-पदार्थों को देखा और उनमें से किसी भी चीज़ का स्वाद चखे बिना स्वादिष्ट चीज़ों को रट लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

क्या तुम लोग अपने दैनिक कर्तव्य-निर्वहन में परमेश्वर के कार्य को महसूस करते हो? क्या समस्याओं का सामना होने पर तुमने परमेश्वर से प्रार्थना की है, और क्या तुम सत्य की तलाश कर उनका समाधान कर सकते हो? यह बात जीवन में प्रवेश के मामले से जुड़ी है। अगर व्यक्ति अपनी अवस्था पर विचार नहीं करता, और अपने कर्तव्य-निर्वहन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए परमेश्वर के वचनों का उपयोग करता है, तो उस कर्तव्य के निर्वहन का परमेश्वर में विश्वास से कोई लेना-देना नहीं है। चाहे तुम जिस भी कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो या जो भी काम कर रहे हो, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के संबंधित पहलुओं पर, और साथ ही अपने विचारों, मतों या गलत मंशाओं पर भी, जो सभी व्यक्ति की अवस्था के हिस्से होते हैं, विचार करना चाहिए। व्यक्ति की अवस्था में क्या शामिल है? इसमें लोगों की स्थितियां, रवैये, मंशाएं, दृष्टिकोण, और साथ ही कुछ दर्शन, तर्क और ज्ञान शामिल होते हैं—और संक्षेप में, ये सारी चीजें लोगों की सामान्य कार्यशैलियों और विधियों तथा दूसरों के प्रति उनके व्यवहार से जुड़ी होती हैं। कोई कार्य सामने आने पर पहले तुम्हें यह जांच करनी चाहिए कि तुम्हारा दृष्टिकोण क्या है—यह पहला कदम है। दूसरा कदम यह जांच करना है कि क्या वह दृष्टिकोण सही है। तो, तुम्हें यह कैसे निर्धारित करना चाहिए कि तुम्हारा दृष्टिकोण सही है या नहीं? यह एक ओर परमेश्वर के वचनों से निर्धारित किया जाता है, और दूसरी ओर, संबंधित कार्य के प्रकार के सिद्धांतों के आधार पर : उदाहरण के लिए, परमेश्वर के वचनों की स्पष्ट अपेक्षाएँ, या परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ और नियम, या परमेश्वर के घर के हित। दृष्टिकोण सही है या नहीं, इसके निर्धारण के लिए इन चीजों का उपयोग करो—ये माप की कसौटियां हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के शासन में विश्वास करते हो, तो तुम्हें यह विश्वास करना होगा कि हर दिन जो भी अच्छा-बुरा होता है, वो यूँ ही नहीं होता। ऐसा नहीं है कि कोई जानबूझकर तुम पर सख़्त हो रहा है या तुम पर निशाना साध रहा है; यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित है। परमेश्वर इन चीज़ों को किस लिए आयोजित करता है? यह तुम्हारी वास्तविकता को प्रकट करने के लिए या तुम्हें उजागर करने के लिए नहीं है; तुम्हें उजागर करना अंतिम लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तुम्हें पूर्ण बनाना और बचाना है। परमेश्वर ऐसा कैसे करता है? सबसे पहले, वह तुम्हें तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव, प्रकृति, सार, तुम्हारे दोषों और कमियों से अवगत कराता है। उन्हें साफ तौर पर समझकर और जानकर ही तुम सत्य का अनुसरण कर सकते हो और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर कर सकते हो। यह परमेश्वर का तुम्हें एक अवसर प्रदान करना है। तुम्हें यह जानना होगा कि इस अवसर को कैसे पाया जाए, और तुम्हें परमेश्वर के साथ लड़ाई में नहीं उलझना है। विशेष रूप से उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों का सामना करते समय, जिनकी परमेश्वर तुम्हारे लिए व्यवस्था करता है, सदा यह मत सोचो कि चीजें तुम्हारे मन के हिसाब से नहीं हैं; हमेशा उनसे बच निकलने की मत सोचो, परमेश्वर को दोष मत दो या उसे गलत मत समझो। अगर तुम लगातार ऐसा कर रहे हो तो तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो, और इससे तुम्हारे लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। ऐसी कोई भी समस्या आए जिसे तुम समझ न पाओ, तो तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करनी चाहिए। इस तरह, इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम्हारी आंतरिक स्थिति में एक बदलाव आएगा और तुम अपनी समस्या को हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाओगे। इस तरह तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर पाओगे। जब ऐसा होगा, तो तुम्हारे भीतर सत्य-वास्तविकता गढ़ी जायेगी, और इस तरह से तुम प्रगति करोगे और तुम्हारे जीवन की स्थिति का रूपांतरण होगा। एक बार जब ये बदलाव आएगा और तुममें सत्य-वास्तविकता होगी, तो तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा, और आध्यात्मिक कद के साथ जीवन आता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो उसके बारे में उनका पहला ज्ञान यह होता है कि वह अथाह, बुद्धिमान और अद्भुत है, और वे अनजाने में उसका आदर करते हैं और उस कार्य के रहस्य को महसूस करते हैं जो वह करता है, जो कि मनुष्य के दिमाग की पहुँच से परे है। लोग केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करने में समर्थ होना चाहते हैं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच और कल्पना से परे होता है और वह परमेश्वर के बदले उस कार्य को नहीं कर सकता। यहाँ तक कि मनुष्य खुद अपनी कमियों को नहीं जानता, फिर भी परमेश्वर ने एक नया मार्ग प्रशस्त किया है और वह मनुष्य को एक अधिक नए और अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मनुष्य ने नई प्रगति और एक नई शुरुआत की है। लोगों के मन में परमेश्वर के लिए जो भाव है वो प्रशंसा का भाव नहीं है, या सिर्फ प्रशंसा नहीं है। उनका गहनतम अनुभव श्रद्धा और प्रेम है; और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, और ऐसी बातें कहता है जिसे कहने में मनुष्य असमर्थ है। जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है उन्हें हमेशा एक अवर्णनीय एहसास होता है। पर्याप्त गहरे अनुभव वाले लोग परमेश्वर के लिए प्रेम को समझ सकते हैं; वे हमेशा उसकी मनोरमता को महसूस कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं कि उसका कार्य बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण और बहुत अद्भुत है, और परिणामस्वरूप उनके बीच असीमित सामर्थ्य उपजती है। यह भय या कभी-कभार का प्रेम और श्रद्धा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता की गहरी भावना है। हालाँकि, जिन लोगों ने उसकी ताड़ना और न्याय का अनुभव किया है, उन्हें बोध है कि वह प्रतापी है और अपमान सहन नहीं करता। यहाँ तक कि जिन लोगों ने उसके अधिकांश कार्य का अनुभव किया है, वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; जो लोग सचमुच उसका आदर करते हैं, जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता बल्कि हमेशा उनकी धारणाओं के विरुद्ध होता है। उसे लोगों की संपूर्ण प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है या वे उसके प्रति समर्पण-भाव का दिखावा करें; बल्कि वह चाहता है कि उनके अंदर सच्ची श्रद्धा और सच्चा समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, सच्चे अनुभव वाला कोई भी व्यक्ति उसके प्रति श्रद्धा रखता है, जो प्रशंसा से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना और न्याय के उसके कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धेय और आज्ञापालन करने योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व और उसका स्वभाव सृजित प्राणियों के समान नहीं है, ये सृजित प्राणियों से ऊपर हैं। परमेश्वर स्व-अस्तित्वधारी, चिरकालीन और गैर-सृजित प्राणी है, और केवल परमेश्वर ही श्रद्धा और समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। इसलिए, जिन लोगों ने उसके कार्य का अनुभव किया है और जिन्होंने सचमुच में उसे जाना है, वे उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। लेकिन, जो लोग उसके बारे में अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ते—जो उसे परमेश्वर मानते ही नहीं—उनके अंदर उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, हालाँकि वे उसका अनुसरण करते हैं फिर भी उन्हें जीता नहीं जाता; वे प्रकृति से ही अवज्ञाकारी लोग हैं। वह ऐसे परिणाम को प्राप्त करने के लिए इस कार्य को करता है ताकि सभी सृजित प्राणी सृजनकर्ता का आदर करें, उसकी आराधना करें, और बिना किसी शर्त के उसके प्रभुत्व के अधीन हो सकें। उसके समस्त कार्य का लक्ष्य इसी अंतिम परिणाम को हासिल करना है। यदि जिन लोगों ने ऐसे कार्य का अनुभव कर लिया है, वे परमेश्वर का जरा-सा भी आदर नहीं करते हैं, यदि अतीत की उनकी अवज्ञा बिल्कुल भी नहीं बदलती है, तो उन्हें निश्चित ही हटा दिया जाएगा। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति केवल दूर से ही प्रशंसा करना या सम्मान प्रकट करना है और जरा-सा भी प्रेम करना नहीं है, तो यह वो परिणाम है जिस पर वह व्यक्ति आ पहुँचा है जिसके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में पूर्ण किए जाने की शर्तों का अभाव है। यदि इतना अधिक कार्य भी किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को प्राप्त करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य की खोज नहीं कर रहा। जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम नहीं करता, वह सत्य से भी प्रेम नहीं करता और इस तरह वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता, वह परमेश्वर की स्वीकृति तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसे लोग, पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव चाहे जैसे कर लें, और न्याय का चाहे जैसे अनुभव कर लें, वे परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रख सकते। ऐसे लोगों की प्रकृति अपरिवर्तनीय होती है, और उनका स्वभाव अत्यंत दुष्ट होता है। जो लोग परमेश्वर पर श्रद्धा नहीं रखते, उन्हें हटा दिया जाएगा, वे दण्ड के पात्र बनेंगे, और उन्हें उसी तरह दण्ड दिया जाएगा जैसे दुष्टों को दिया जाता है, और ऐसे लोग उनसे भी अधिक कष्ट सहेंगे जिन्होंने अधार्मिक दुष्कर्म किए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

बरसों बीत जाने के बाद, शुद्धिकरण और ताड़ना की कठिनाइयाँ सहकर मनुष्य वैसा मजबूत हो गया है, जैसा मौसम की मार से हो जाता है। हालाँकि मनुष्य ने अतीत की "महिमा" और "रोमांस" खो दिया है, पर उसने अनजाने ही मानवीय आचरण के सिद्धांतों को समझ लिया है, और वह मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के वर्षों के समर्पण को समझ गया है। मनुष्य धीरे-धीरे अपनी बर्बरता से घृणा करने लगता है। वह अपनी असभ्यता से, परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की गलतफहमियों से और परमेश्वर से की गई अपनी सभी अनुचित माँगों से घृणा करने लगता है। समय को वापस नहीं लाया जा सकता। अतीत की घटनाएँ मनुष्य की खेदजनक स्मृतियाँ बन जाती हैं, और परमेश्वर के वचन और उसके प्रति प्रेम मनुष्य के नए जीवन में प्रेरक शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन-प्रतिदिन भरने लगते हैं, उसकी सामर्थ्य लौट आती है, और वह उठ खड़ा होता है और सर्वशक्तिमान के चेहरे की ओर देखने लगता है ... और यही पाता है कि परमेश्वर हमेशा मेरे साथ रहा है, और उसकी मुस्कान और उसका सुंदर चेहरा अभी भी भावोद्दीपक हैं। उसके हृदय में अभी भी अपने द्वारा सृजित मानवजाति के लिए चिंता रहती है, और उसके हाथ अभी भी उतने ही गर्मजोशी से भरे और सशक्त हैं, जैसे वे आरंभ में थे। यह ऐसा है, मानो मनुष्य अदन के बाग में लौट आया हो, लेकिन इस बार मनुष्य साँप के प्रलोभन नहीं सुनता और अब वह यहोवा के चेहरे से विमुख नहीं होता। मनुष्य परमेश्वर के सामने घुटने टेकता है, परमेश्वर के मुस्कुराते हुए चेहरे को देखता है, और उसे अपनी सबसे कीमती भेंट चढ़ाता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

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