96. परमेश्वर की प्रशंसा करने और गवाही देने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर की उसके महान और उच्च रूप में प्रशंसा करना आवश्यक है। उसके प्रति श्रद्धा रखो, और किसी भी मानव की न तो उपासना करो, न ही उसके प्रतिबंधनों को सहो; केवल परमेश्वर की उपासना करो और उसके प्रति समर्पण करो।

(2) परमेश्वर के वचनों का प्रचार करो और उसके कार्य की गवाही दो, और मनुष्य की धार्मिक धारणाओं और धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का खंडन करने हेतु उसके वचनों के उपयोग को एक आधार बनाओ, ताकि लोग समर्पण करने परमेश्वर के सामने आ सकें;

(3) अपने स्वयं के व्यक्तिगत अनुभव और परमेश्वर के ज्ञान पर, उसके वचनों के अनुसार, सहभागिता करो। सत्य को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए दूसरों की अगुवाई करो, और उन्हें परमेश्वर के सामने ले आओ;

(4) सत्य को परिपुष्ट करने और परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने में सक्षम बनो। शैतान की ताक़तों से समझौता न करो, न ही उनसे हार मानो, बल्कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करो;

(5) अपना कर्तव्य निभाते समय, सत्य का अभ्यास करने और वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित करो, ताकि तुम सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सको और एक सच्ची मानवीय सदृशता जी सको। ऐसा करना परमेश्वर के लिए सच्ची गवाही देना है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया और देखा है, वह हर युग के संतों और पैगंबरों के अनुभवों से बढ़कर है, लेकिन क्या तुम लोग अतीत के इन संतों और पैगंबरों के वचनों से बड़ी गवाही देने में सक्षम हो? अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अत: उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो चुने हुए लोगों, इजरायलियों को भी कभी नहीं मिला। उचित तो यही है कि तुम लोग मेरे लिए गवाही दो, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा। इसे मैंने पहले से नियत किया हुआ है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे होगे। इजराइलियों ने केवल मेरी दया, प्रेम और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का एक बहुत ही छोटा भाग देखा था; इतना कि तुम लोगों ने जो देखा और सुना है, वह उसका दस हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा था। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह मूसा और एलियाह के अनुभवों से कहीं बढ़कर है। क्योंकि जो कुछ इजरायलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की तसवीर थी। आज तुम लोग यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और आज के मेरे सभी कार्य देख रहे हो। तुम लोगों ने मेरे आत्मा के वचनों को भी सुना है, मेरी बुद्धिमत्ता की तारीफ की है, मेरे चमत्कार देखे हैं, और मेरे स्वभाव के बारे में जाना है। मैंने तुम लोगों को अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के बारे में भी बताया है। तुम लोगों ने मात्र एक प्यारा और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम लोगों ने मेरे आश्चर्यजनक कामों को देखा है और जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ। इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इजराइल के घराने पर अपने क्रोध का प्रकोप उड़ेला था, और आज यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने केवल मेरे सत्य, मेरे मार्ग और मेरे जीवन को ही प्राप्त नहीं किया है, अपितु मेरी उस दृष्टि और प्रकटीकरण को भी प्राप्त किया है, जो यूहन्ना को प्राप्त दृष्टि और प्रकटीकरण से भी बड़ा है। तुम लोग कई और रहस्य समझते हो, और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को अधिक स्वीकार किया है और मेरे धर्मी स्वभाव को अधिक जाना है। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

अब मैं तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब-कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है : तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, उसे मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और आज्ञाकारिता में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारे विश्वास का कर्तव्य है मेरी गवाही देना, मेरे प्रति वफादार होना, और किसी और के प्रति नहीं, और अंत तक आज्ञाकारी बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम मेरी गवाही कैसे दोगे? तुम मेरे प्रति वफादार और आज्ञाकारी कैसे बने रहोगे? तुम अपने कार्य के प्रति अपनी सारी निष्ठा समर्पित करते हो या उसे ऐसे ही छोड़ देते हो? इसके बजाय तुम मेरे प्रत्येक आयोजन (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित हो जाओगे या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हारी ताड़ना करता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, और मेरे प्रति निष्ठावान और आज्ञाकारी बनो। इतना ही नहीं, ताड़ना वर्तमान में मेरे कार्य के अगले चरण को प्रकट करने के लिए और उस कार्य को निर्बाध आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेतकी तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य किस तरह प्रकट होगा? तुम्हें मेरे कार्य के अपने अनुभव का महत्व और साथ ही मुझ पर अपने विश्वास का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है; मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने ऐसा व्यापक काम किया है; मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? निस्संदेह, मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ। यह सही है, लेकिन इससे भी बढ़कर तुम्हें जानना चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य आरंभ करने के लिए, और, सबसे बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने और आने वाले समय में सुसमाचार को फैलाने की नींव डालने तथा भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए, मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए अपना जीवन देना ही होगा, और इतना ही नहीं, तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना हगा। लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर, लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें समझना ही होगा कि मेरे हृदय में क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके पास जाने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के दिल के क़रीब है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही दे, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही अचूक और वास्तविक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर की गवाही देना मूलत: परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारा अपने ज्ञान को बताने का मामला है, और यह बताना है कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें जीते जाने की, पूर्ण बनाए जाने की और बचाए जाने की अनुमति देता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। ये बातें मात्र देहधारी परमेश्वर के ज़रिए व्यक्त की जाती हैं, फिर भी, असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी वास्तविकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता बताने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? चूँकि तुमने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, इसलिए उसने तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहा। अगर तुम्हें ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वो तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल उसकी सामान्य मानवीयता के बाह्य रूप की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वो दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए। अगर, तुम कहीं भी जाकर चिल्लाओगे : "हमारा परमेश्वर कार्य करने आया है, और उसका कार्य सचमुच व्यवहारिक है! उसने हमें बिना अलौकिक कार्यों के, बिना चमत्कारों और करामातों के प्राप्त कर लिया है!" तो लोग पूछेंगे : "तुम्हारा यह कहने का क्या मतलब है कि वो चमत्कार और करामात नहीं दिखाता? बिना चमत्कार और करामात दिखाए उसने तुम्हें कैसे जीत लिया?" और तुम कहते हो : "वह बोलता है और उसने बिना चमत्कार और करामात दिखाए, हमें जीत लिया। उसके कामों ने हमें जीत लिया।" आखिरकार, अगर तुम्हारी बातों में सार नहीं है, अगर तुम कोई विशिष्ट बात न बता सको, तो क्या यह सच्ची गवाही है? देहधारी परमेश्वर जब लोगों को जीतता है, तो यह कार्य उसके दिव्य वचन करते हैं। मानवीयता इस कार्य को नहीं कर सकती; इसे कोई नश्वर इंसान नहीं कर सकता, उच्चतम क्षमता वाले लोग भी इस कार्य को नहीं कर सकते, क्योंकि उसकी दिव्यता किसी भी सृजित प्राणी से ऊँची है। यह लोगों के लिए असाधारण है; आखिरकार, सृष्टिकर्ता सृजित प्राणी से ऊँचा है; सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता से ऊँचा नहीं हो सकता; अगर तुम उससे ऊँचे होते, तो वो तुम्हें जीत नहीं पाता, वह तुम्हें इसलिए ही जीत पाता है क्योंकि वह तुमसे ऊँचा है। जो सारी मानवता को जीत सकता है वह सृष्टिकर्ता है, और अन्य कोई नहीं, केवल वही इस कार्य को कर सकता है। ये वचन "गवाही" हैं—ऐसी गवाही जो तुम्हें देनी चाहिए। तुमने धीरे-धीरे ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षण, विफलता और कष्टों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हें पूरी तरह से जीत लिया है। हालाँकि तुम उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने जीवन में उतना आगे नहीं बढ़े हो, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। इस तरह, इसे वो गवाही कहा जा सकता है, जो असली और सच्ची है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का जो कार्य करने आया है, उसका उद्देश्य इंसान को जीतना है, लेकिन वह अपने कार्य को समाप्त भी कर रहा है, युग का अंत कर रहा है और समाप्ति का कार्य कर रहा है। वह पूरे युग का अंत कर रहा है, हर इंसान को बचा रहा है, इंसान को हमेशा के लिए पाप से मुक्त कर रहा है; वह पूरी तरह से अपने द्वारा सृजित मानव को हासिल कर रहा है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और व्यक्तिगत रुप से अनुभव किया है; एकदम अंत तक पहुँचकर तुम्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा करने में असफल नहीं होना चाहिए। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के असली मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा इंसान पर किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को साफ तौर पर बता सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम लोग साफ तौर पर इन पाँच चीज़ों के बारे में बता सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार, वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुमसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्ची खोज में लगे हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने के लिए दृढ़संकल्प हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के ज़रिए, तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसकी इच्छा को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए। तुम इतना ही कह सकते हो : "हम परमेश्वर को जानते हैं। उसका न्याय और ताड़ना बहुत कठोर हैं। उसके वचन बहुत सख्त हैं; वे धार्मिक और प्रतापी हैं, और कोई इंसान उनका उल्लंघन नहीं कर सकता," लेकिन क्या ये वचन अंतत: इंसान को पोषण देते हैं? लोगों पर इनका प्रभाव क्या होता है? क्या तुम वास्तव में जानते हो कि न्याय और ताड़ना का यह कार्य तुम्हारे लिए सर्वाधिक लाभकारी है? परमेश्वर के न्याय और ताड़ना तुम्हारी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता को उजागर करते हैं, है ना? वे तुम्हारे भीतर की उन गंदी और भ्रष्ट चीजों को साफ़ कर सकते हैं और बाहर निकाल सकते हैं, है न? अगर ताड़ना और न्याय न होते, तो तुम्हारा क्या होता? क्या तुम वास्तव में इस तथ्य को समझते हो कि शैतान ने तुम्हें गंभीरतम बिन्दु तक भ्रष्ट कर दिया है? आज, तुम लोगों को इन चीज़ों से युक्त होना चाहिए और इन चीज़ों को अच्छी तरह जानना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, लोगों का शुद्धिकरण करने और उनके स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; इस बारे में भी बात करो कि परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्क हीन माना जाएगा। तुम्हें अपने असल अनुभव की वास्तविक, सच्ची और दिल से निकली बातों पर ज़्यादा बात करनी चाहिए; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा। तुम लोग परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी थे और उनके प्रति समर्पित होने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अब परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम जीत लिए गए हो, इसे कभी नहीं भूलो। इन मामलों पर तुम्हें और विचार करना और सोचना चाहिए। एक बार जब लोग इसे ठीक से समझ जाएँगे, तो उन्हें गवाही देने का तरीका पता चल जाएगा; अन्यथा वे और अधिक बेशर्मी भरे मूर्खतापूर्ण कृत्य कर बैठेंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

मनुष्य अंततः कैसी गवाही परमेश्वर के बारे में देता है? वह गवाही देता है कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, उसके स्वभाव में धार्मिकता, क्रोध, ताड़ना और न्याय शामिल हैं; मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की गवाही देता है। परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है—परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि आतीत में परमेश्वर ने मनुष्य को शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, बल्कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाने का कार्य किया था। देह का सार वह है जो शैतान का है—परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम कर सको, ताकि तुम देह के सार को जान सको; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है कि तुम जागृत हो जाओ, तुम अपने भीतर की कमियों को जान सको और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध—ये सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और अपना धार्मिक स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है—यह सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए है। परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

अब तुम्हें किसका अनुसरण करना चाहिए? क्या तुम परमेश्वर के कार्य के लिए गवाही देने में समर्थ हो, क्या तुम परमेश्वर की गवाही और एक अभिव्यंजना बन सकते हो, और क्या तुम उसके द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य हो—ये वो बातें हैं जिन्हें तुम्हें खोजना चाहिए। परमेश्वर ने तुम में वास्तव में कितना काम किया है? तुमने कितना देखा है, तुमने कितना स्पर्श किया है? तुमने कितना अनुभव किया है और चखा है? चाहे परमेश्वर ने तुम्हारी परीक्षा ली हो, तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या तुम्हें अनुशासित किया हो, उसके व्यवहार और उसके कार्य तुम में किए गए हैं। परन्तु परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर के द्वारा परिपूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करने का उत्सुक है, क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो? क्या तुम अपने व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन को जी सकते हो? क्या तुम अपने स्वयं के व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से दूसरों का भरण पोषण करने, और परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के वास्ते अपना पूरा जीवन खपाने में सक्षम हो? परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देने हेतु तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और तुम्हारे द्वारा चुकाई गयी कीमत पर निर्भर होना होगा। केवल इसी तरह तुम उसकी इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्यों की गवाही देता है? क्या तुम्हारी यह अभिलाषा है? यदि तुम उसके नाम, और इससे भी अधिक, उसके कार्यों की गवाही देने में समर्थ हो, और साथ ही उस छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपने लोगों से अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाह हो। तुम वास्तव में, परमेश्वर के लिए किस प्रकार गवाही देते हो? परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास और लालसा करते हुए तुम ऐसा करते हो, अपने शब्दों के माध्यम से गवाही देने, लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानने और देखने देने और उसके क्रियाकलापों को देखने देने के द्वारा ऐसा करते हो—यदि तुम वास्तव में यह सब कुछ खोजोगे, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। यदि तुम बस परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना और अंत में धन्य किए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें खोज करनी चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, उसे कैसे संतुष्ट करें जब वह अपनी इच्छा को तुम्हारे सामने प्रकट करता है, और तलाश करनी चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और वह कैसे तुम्हें अनुशासित करता और तुमसे निपटता है, इसके लिए कैसे गवाही देनी है। अब तुम्हें इन सभी बातों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार सिर्फ इसलिए है कि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद उसकी महिमा को साझा कर सको, तो यह फिर भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता है। तुम्हें परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी माँगों को संतुष्ट करने और एक व्यावहारिक तरीके से उसके द्वारा लोगों पर किए गए कार्य का अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे वो कष्ट सहना हो या रोना और दुखित होना, तुम्हें अपने अभ्यास में इन सभी चीज़ों को अनुभव अवश्य करना चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं। वास्तव में अभी वह क्या है जो तुम्हें कष्ट सहने और पूर्णता तलाशने के लिए मजबूर करता है? क्या तुम्हारा वर्तमान कष्ट सच में परमेश्वर को प्रेम करने और उसके लिए गवाही देने के वास्ते है? या यह देह के आशीषों के लिए, भविष्य की तुम्हारी संभावनाओं और नियति के लिए है? खोज करने के तुम्हारे सभी इरादे, प्रेरणाएँ और तुम्हारे द्वारा अनुगमन किए जाने वाले लक्ष्य अवश्य सही किए जाने चाहिए और यह तुम्हारी स्वयं की इच्छा से मार्गदर्शित नहीं किए जा सकते। यदि एक व्यक्ति आशीषें प्राप्त करने और सामर्थ्य में शासन करने के लिए पूर्णता की तलाश करता है, जबकि दूसरा परमेश्वर को संतुष्ट करने, परमेश्वर के कार्य की व्यवहारिक गवाही देने के लिए पूर्ण बनाए जाने की खातिर प्रयास करता है, प्रयास के इन दोनों माध्यमों में से तुम किसे चुनोगे? यदि तुम पहले वाले को चुनते हो, तो तुम अभी भी परमेश्वर के मानकों से बहुत दूर होगे। मैंने पहले कहा है कि मेरे कार्य ब्रह्माण्ड भर में मुक्त रूप से जाने जाएंगे और मैं ब्रह्माण्ड पर एक सम्राट के रूप में शासन करूँगा। दूसरी ओर, जो तुम लोगों को सौंपा गया है वह है परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाह बनना, न कि राजा बनना और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में दिखाई देना। परमेश्वर के कर्मों को समस्त ब्रह्माण्ड को और आकाश को भर देने दो। हर एक को उन्हें देखने दो और उन्हें स्वीकार करने दो। ये वचन परमेश्वर स्वयं के सम्बन्ध में कहे जाते हैं और मानवजाति को जो करना चाहिए वह है परमेश्वर के लिए गवाही देना। अब तुम परमेश्वर के बारे में कितना जानते हो? तुम परमेश्वर के बारे में कितनी गवाही दे सकते हो? परमेश्वर का मनुष्यों को पूर्ण बनाने का उद्देश्य क्या है? एक बार जब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ जाते हो, तो तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति किस प्रकार से विचारशीलता दिखानी चाहिए? यदि तुम पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हो और जो तुम जीते हो उसके माध्यम से परमेश्वर के कार्य के लिए गवाह बनने को तैयार हो, यदि तुम्हारे पास यह प्रेरक शक्ति है, तो कुछ भी बहुत कठिन नहीं है। लोगों को अब सिर्फ आस्था की आवश्यकता है। यदि तुम्हारे पास यह प्रेरक शक्ति है, तो किसी भी नकारात्मकता, निष्क्रियता, आलस्य और देह की धारणाओं, जीने के दर्शनों, विद्रोही स्वभाव, भावनाओं इत्यादि को त्याग देना आसान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

आज तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास कर सकते हो या अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमता में विकास के लिए कोशिश कर सकते हो, परंतु प्रमुख महत्व की बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है, वह सार्थक और लाभकारी है : यह तुम्हें, जो गंदगी की धरती पर पैदा हुए हो, उस गंदगी से बच निकलने और उसे झटक देने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने में सक्षम बनाता है। इन बातों पर ध्यान देने से तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक गंदगी की भूमि पर पैदा होते हो किंतु पवित्र बनने में, पुन: कभी गंदगी से ओतप्रोत न होने के लिए, शैतान के अधिकार-क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेने के लिए, शैतान द्वारा न तो ग्रसित किए जाने के लिए और न ही सताए जाने के लिए, और सर्वशक्तिमान के हाथों में रहने के योग्य हो। यही गवाही और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, अपने जीवन में अब और शैतानी स्वभाव प्रकट नहीं करते, इसके बजाय उस स्थिति को जीते हो, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे : सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर से प्रेम करने का सामान्य संकल्प, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी द्वारा दी जाने वाली गवाही है। तुम कहते हो, "हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुआई के कारण, और क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है इसलिए, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। हम आज आज्ञा मान पाते हैं, तो यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिए नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम स्वभावत: परमेश्वर से प्रेम करते थे। चूँकि परमेश्वर ने हमें चुना और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसीलिए आज हम पर विजय पाई गई है, और इसीलिए हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिए भी है कि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इसी कारण हमें शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बचाया और छुड़ाया गया है, और हम गंदगी को पीछे छोड़, लाल अजगर के देश में शुद्ध किए जा सकते हैं।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (2)' से उद्धृत

जिन लोगों के पास सत्य है, वे वही हैं जो अपने वास्तविक अनुभवों में, कभी पीछे हटे बिना, अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, और जो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों के साथ सामान्य संबंध रख सकते हैं, जो अपने ऊपर कुछ बीतने पर पूर्णतः परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाते हैं, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा अभ्यास और तुम्हारे प्रकाशन परमेश्वर की गवाही हैं, वे मनुष्य का जीवनयापन करना और परमेश्वर की गवाही हैं, और यही वास्तव में परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेना है; जब तुमने इस बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम्हें यथोचित प्रभाव की प्राप्ति हो चुकी होगी। तुम्हारे पास वास्तविक जीवनयापन होता है और तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप अन्य लोगों द्वारा प्रशंसा से देखा जाता है। तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण है, किंतु तुम अत्यंत धर्मनिष्ठता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन संप्रेषित करते हो, तब तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित और प्रबुद्ध किए जाते हो। तुम अपने शब्दों के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा कह पाते हो, वास्तविकता संप्रेषित कर पाते हो, और तुम आत्मा से सेवा करने के बारे में बहुत-कुछ समझते हो। तुम अपनी वाणी में खरे हो, तुम शालीन और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं हो और मर्यादित हो, परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कर पाते हो और जब तुम पर कुछ बीतती है तब तुम अपनी गवाही पर दृढता से डटे रहते हो, और तुम चाहे जिससे निपट रहे हो, हमेशा शांत और संयमित रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने सच में परमेश्वर का प्रेम देखा है। कुछ लोग अब भी युवा हैं, परंतु वे मध्यम आयु के व्यक्ति के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व, सत्य से युक्त होते हैं, और दूसरों से प्रशंसित होते हैं—और ये वे लोग हैं जिनके पास गवाही है और वे परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

यदि लोग परमेश्वर का आदर करने वाले हृदय के साथ परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसके वचनों को अनुभव करते हैं, तो ऐसे लोगों में परमेश्वर का उद्धार और परमेश्वर का प्रेम देखा जा सकता है। ये लोग परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं; वे सत्य को जीते हैं, और जिसकी वे गवाही देते हैं, वह भी सत्य, परमेश्वर का स्वरूप और परमेश्वर का स्वभाव ही होता है। वे परमेश्वर के प्रेम के मध्य में रहते हैं और वे परमेश्वर का प्रेम देख चुके हैं। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर की सुंदरता का स्वाद चखना चाहिए और परमेश्वर की सुंदरता को देखना चाहिए; केवल तभी उनमें परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय जागृत हो सकता है, एक ऐसा हृदय जो लोगों को अपना सर्वस्व निष्ठापूर्वक परमेश्वर के लिए देने को प्रेरित करता है। परमेश्वर लोगों को वचनों और अभिव्यक्तियों के माध्यम से, या उनकी कल्पना के माध्यम से अपने से प्रेम नहीं कराता, और न ही वह अपने से प्रेम करने के लिए उन्हें बाध्य करता है। इसकी बजाय वह उन्हें उनकी इच्छा से अपने से प्रेम करने देता है, और वह अपने कार्य और कथनों में उन्हें अपनी सुंदरता को देखने देता है, जिसके बाद उनमें परमेश्वर के प्रति प्रेम जन्म लेता है। केवल इसी तरह लोग सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं तो इसलिए नहीं कि दूसरों ने उनसे ऐसा करने का आग्रह किया है, न ही यह कोई क्षणिक भावनात्मक आवेग होता है। वे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी सुंदरता देखी है, उन्होंने देखा है कि उसमें कितना कुछ है जो लोगों के प्रेम के योग्य है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का उद्धार, बुद्धि और आश्चर्यजनक कर्म देखे हैं—और परिणामस्वरूप, वे सचमुच परमेश्वर का गुणगान करते हैं, और सचमुच उसके लिए तड़पते हैं, और उनमें ऐसा जुनून उत्पन्न हो जाता है कि वे परमेश्वर को प्राप्त किए बिना जीवित नहीं रह सकते। जो सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे उसकी शानदार गवाही इसलिए दे पाते हैं क्योंकि उनकी गवाही परमेश्वर के सच्चे ज्ञान और उसके लिए सच्ची तड़प की नींव पर टिकी होती है। ऐसी गवाही किसी भावनात्मक आवेग के अनुसार नहीं, बल्कि परमेश्वर और उसके स्वभाव के उनके ज्ञान के अनुसार दी जाती है। चूँकि वे परमेश्वर को जानने लगे हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि उन्हें परमेश्वर की गवाही निश्चित रूप से देनी चाहिए, और उन सबको जो परमेश्वर के लिए तड़पते हैं, परमेश्वर को जानने, और परमेश्वर की सुंदरता एवं उसकी वास्तविकता से अवगत होने का अवसर मिलना चाहिए। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम की तरह उनकी गवाही भी स्वतः स्फूर्त होती है, वह वास्तविक होती है और उसका महत्व एवं मूल्य वास्तविक होता है। वह निष्क्रिय या खोखली और अर्थहीन नहीं होती। जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं केवल उन्हीं के जीवन में सर्वाधिक मूल्य और अर्थ होता है, और केवल वही लोग क्यों परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, इसका कारण यह है कि ये लोग परमेश्वर के प्रकाश में रह पाते हैं और परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जी पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अंधकार में नहीं जीते, बल्कि प्रकाश में जीते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर द्वारा धन्य किया गया जीवन जीते हैं। केवल वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं, केवल वे ही परमेश्वर के गवाह हैं, केवल वे ही परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हैं, और केवल वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कर पाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

आज महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम सब मनुष्य के सार को जानो, और यह जानो कि तुम लोगों को किसमें प्रवेश करना चाहिए; तुम्हें जीवन में प्रवेश, और स्वभाव में परिवर्तनों, वास्तव में कैसे विजित होना है, और परमेश्वर की आज्ञा का कैसे पूरी तरह से पालन करना है, परमेश्वर को अंतिम गवाही कैसे देनी है और मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी कैसे बने रहना है, इन बातों की चर्चा करनी चाहिए। तुम्हें इन बातों पर केंद्रित होना चाहिए, और जो बात वास्तविक या महत्वपूर्ण न हो, पहले उसे किनारे कर नज़रंदाज कर देना चाहिए। आज तुम्हें पता होना चाहिए कि विजित कैसे हुआ जाए, और विजित होने के बाद लोग अपना आचरण कैसा रखें। तुम कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गई है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रह सकते हो? इस बात की परवाह किए बिना कि इसमें कोई संभावना है या नहीं, तुम्हें बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए, और कैसा भी परिवेश हो, तुम्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पहलू प्राप्त करने चाहिए : अय्यूब की गवाही—मृत्युपर्यंत आज्ञाकारिता; और पतरस की गवाही—परमेश्वर से परम प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए : उसने समस्त भौतिक संपत्ति गँवा दी और शारीरिक पीड़ा से घिर गया, फिर भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस मृत्युपर्यंत परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम रहा। जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया और उसने अपनी मृत्यु का सामना किया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपनी संभावनाओं का विचार नहीं किया या सुंदर आशाओं अथवा अनावश्यक विचारों का अनुसरण नहीं किया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पूरी तरह से पालन करने की ही इच्छा की। इससे पहले कि यह माना जा सके कि तुमने गवाही दी है, इससे पहले कि तुम ऐसा व्यक्ति बन सको जिसे जीते जाने के बाद पूर्ण बना दिया गया है, तुम्हें यह स्तर हासिल करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई(2)' से उद्धृत

वे सभी जो उठकर गवाही नहीं देते हैं, वे अंधों के अग्रगामी हैं और अज्ञानता के राजा हैं। वे शाश्वत अज्ञानी, सतत मूर्ख बनेंगे; अनंत काल के लिए मृतक, जो अंधे हैं। इसलिए हमारी आत्माओं को जागृत होना चाहिए! सभी लोगों को उठ खड़े होना चाहिए! महिमा के राजा, दया के पिता, उद्धार के पुत्र, उदार सात आत्माओं की, सर्वशक्तिमान परमेश्वर जो प्रतापी उग्र आग और धार्मिक न्याय लाता है और जो सर्व-पर्याप्त, उदार, सर्वशक्तिमान और पूर्ण है, उसकी अनंत जय-जयकार, प्रशंसा और सराहना करो। उसके सिंहासन की हमेशा के लिए सराहना होगी! सभी लोगों को देखना चाहिए कि यह परमेश्वर की बुद्धि है; उद्धार का यह उसका अद्भुत तरीका है और उसकी महिमामय इच्छा की पूर्ति है। अगर हम नहीं उठते हैं और गवाही नहीं देते हैं, तो इस पल के बीत जाने के बाद, हम लौट कर नहीं जा सकेंगे। हम आशीर्वाद प्राप्त करेंगे या दुर्भाग्य, यह हमारी यात्रा के इस वर्तमान चरण में तय किया जा रहा है, अर्थात इस समय हम क्या करते हैं, क्या सोचते हैं और अभी कैसे जीते हैं। तो तुम सभी को कैसे कार्य करना चाहिए? गवाही दो और परमेश्वर की हमेशा सराहना करो; सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों के मसीहा—शाश्वत, अद्वितीय, सच्चे परमेश्वर का उत्कर्ष करो!

अब से तुम्हें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर के लिए गवाही नहीं देते—जो अद्वितीय, सच्चे परमेश्वर के लिए गवाही नहीं देते, साथ ही जो उसके बारे में संदेह रखते हैं—वे सभी बीमार और मरे हुए लोग हैं और ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं! प्राचीन काल से ही परमेश्वर के वचन सच साबित हो चुके हैं : जो लोग मेरे साथ नहीं हैं, वे बिखर जाते हैं, और जो भी मेरे साथ नहीं हैं, वे मेरे विरुद्ध हैं; पत्थर में तराशा गया यह एक अटल सत्य है! जो लोग परमेश्वर के लिए गवाही नहीं देते, वे शैतान के अनुचर हैं। ये लोग परमेश्वर की संतानों को परेशान करने और धोखा देने और उसके प्रबंधन में बाधा डालने के लिए आए हैं; उनका नाश किया जाना चाहिए! जो कोई भी उनके प्रति अच्छे इरादे प्रकट करते हैं, वो अपना विनाश चाहते हैं। तुम्हें परमेश्वर के आत्मा के कथनों को सुनना और उन पर विश्वास करना चाहिए, परमेश्वर के आत्मा के मार्ग पर चलना चाहिए और परमेश्वर के आत्मा के वचनों को जीना चाहिए। उससे भी बढ़कर, तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सिंहासन की अंत के दिनों तक सराहना करनी चाहिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 34' से उद्धृत

यद्यपि तुम लोगों का विश्वास बहुत सच्चा है, फिर भी तुम लोगों में से कोई भी मेरा पूर्ण विवरण दे पाने में समर्थ नहीं है कोई भी उन सारे तथ्यों की पूर्ण गवाही नहीं दे सकता जिन्हें तुम देखते हो। इसके बारे में सोचो: आज तुममें से ज्यादातर लोग अपने कर्तव्यों में लापरवाह हैं, शरीर का अनुसरण कर रहे हैं, शरीर को तृप्त कर रहे हैं, और लालचपूर्वक शरीर का आनंद ले रहे हैं। तुम लोगों के पास सत्य बहुत कम है। तो फिर तुम लोग उस सबकी गवाही कैसे दे सकते हो जो तुम लोगों ने देखा है? क्या तुम लोग सचमुच आश्वस्त हो कि तुम लोग मेरे गवाह बन सकते हो? यदि ऐसा एक दिन आता है जब तुम उस सबकी गवाही देने में असमर्थ हो जो तुमने आज देखा है, तो तुम सृजित प्राणी के कार्यकलाप गंवा चुके होगे, और तुम्हारे अस्तित्व का ज़रा-भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। तुम एक मनुष्य होने के लायक नहीं होगे। यह कहा जा सकता है कि तुम मानव नहीं रहोगे! मैंने तुम लोगों पर अथाह कार्य किया है, परन्तु चूंकि फिलहाल तुम न कुछ सीख रहे हो, न कुछ जानते हो, और तुम्हारा परिश्रम अकारथ है, इसलिए जब मेरे लिए अपने कार्य का विस्तार करने का समय होगा, तब तुम बस शून्य में ताकोगे, तुम्हारे मुँह से आवाज़ न निकलेगी और सर्वथा बेकार हो जाओगे। क्या यह तुम्हें सदा के लिए पापी नहीं बना देगा? जब वह समय आएगा, क्या तुम सबसे अधिक पछतावा महसूस नहीं करोगे? क्या तुम उदासी में नहीं डूब जाओगे? आज का मेरा सारा कार्य बेकारी और ऊब के कारण नहीं, बल्कि भविष्य के मेरे कार्य की नींव रखने के लिए किया जाता है। ऐसा नहीं है कि मैं बंद गली में हूँ और मुझे कुछ नया सोचने की जरूरत है। मैं जो कार्य करता हूँ, उसे तुम्हें समझना चाहिए; यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे सड़क पर खेल रहे किसी बच्चे द्वारा नहीं किया गया है, बल्कि यह ऐसा कार्य है जो मेरे पिता के प्रतिनिधित्व में किया जाता है। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि यह केवल मैं नहीं हूँ जो स्वयं यह सब कर रहा है; बल्कि, मैं अपने पिता का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। इस बीच, तुम लोगों की भूमिका केवल दृढ़ता से अनुसरण, आज्ञापालन, परिवर्तन करने और गवाही देने की है। तुम लोगों को समझना चाहिए कि तुम लोगों को मुझमें विश्वास क्यों करना चाहिए; यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है जो तुम लोगों में से प्रत्येक को समझना चाहिए। मेरे पिता ने अपनी महिमा के वास्ते तुम सब लोगों को उसी क्षण मेरे लिए पूर्वनियत कर दिया था, जिस क्षण उसने इस संसार की सृष्टि की थी। मेरे कार्य के वास्ते, और उसकी महिमा के वास्ते उसने तुम लोगों को पूर्वनियत किया था। यह मेरे पिता के कारण ही है कि तुम लोग मुझ में विश्वास करते हो; यह मेरे पिता द्वारा पूर्वनियत करने के कारण ही है कि तुम मेरा अनुसरण करते हो। इसमें से कुछ भी तुम लोगों का अपना चुनाव नहीं है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोग यह समझो कि तुम्हीं वे लोग हो जिन्हें मेरे लिए गवाही देने के उद्देश्य से मेरे पिता ने मुझे प्रदान किया है। चूंकि उसने तुम लोगों को मुझे दिया है, इसलिए तुम लोगों को उन तरीकों का पालन करना चाहिए, जो मैं तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, साथ ही उन तरीकों और वचनों का भी, जो मैं तुम लोगों को सिखाता हूँ, क्योंकि मेरे तरीकों का पालन करना तुम लोगों का कर्तव्य है। यह मुझ में तुम्हारे विश्वास का मूल उद्देश्य है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ: तुम मात्र वे लोग हो, जिन्हें मेरे पिता ने मेरे तरीकों का पालन करने के लिए मुझे प्रदान किया है। हालाँकि, तुम लोग सिर्फ़ मुझ में विश्वास करते हो; तुम लोग मेरे नहीं हो क्योंकि तुम लोग इस्राएली परिवार के नहीं हो, और इसके बजाय प्राचीन साँप जैसे हो। मैं तुम लोगों से सिर्फ़ इतना करने को कह रहा हूँ कि मेरे लिए गवाही दो, परन्तु आज तुम लोगों को मेरे तौर-तरीकों के अनुसार चलना ही चाहिए। यह सब भविष्य की गवाही के वास्ते है। यदि तुम लोग केवल उन लोगों की तरह कार्य करते हो जो मेरे तरीकों को सुनते हैं, तो तुम्हारा कोई मूल्य नहीं होगा और मेरे पिता द्वारा तुम लोगों को मुझे प्रदान किए जाने का महत्त्व व्यर्थ हो जायेगा। तुम लोगों को जो बताने पर मैं जोर दे रहा हूँ, वह यह है: तुम्हें मेरे तरीकों पर चलना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

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