16. परमेश्वर को महान मानकर उसे ऊँचा उठाने के सिद्धांत

(1) न्याय और ताड़ना के दौर से गुजरते समय, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जान लो, और उसका भय मानो और बुराई से दूर रहो। ऐसा करने पर, तुम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर को अपने दिल में महान मानकर उसे ऊँचा उठा लोगे।

(2) केवल परमेश्वर के प्रति समर्पण करो और उसी की आराधना करो; किसी भी मानव की आराधना या उसका अनुसरण न करो। परमेश्वर के वचन सत्य को अपने जीवन में समस्त आचरण का आधार बनाओ, और सांसारिक चलन का पालन न करो।

(3) अपने आप को न्याय की ओर उन्मुख करना और सत्य-सिद्धांत का पालन करना, परमेश्वर को ऊँचा उठाना और उसकी गवाही देना, और शैतान की बुरी ताकतों को कोई रियायत दिए बिना परमेश्वर के काम को सुरक्षित रखने का प्रयास करना आवश्यक है।

(4) यह आवश्यक है कि परमेश्वर के वचन सत्य का व्यक्ति के हृदय में साम्राज्य बना रहे और यह पुष्टि की जाए कि मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है। केवल इसी प्रकार कोई परमेश्वर को ऊँचा उठा सकता और उसकी गवाही दे सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर ही एकमात्र है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को चलाता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है वही उसे चलाता है, जो कुछ है उस सब पर वही शासन करता है और जो कुछ है उस सब का वही भरण-पोषण करता है। यह परमेश्वर की प्रतिष्ठा और यही उसकी पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सब के लिए, परमेश्वर की असली पहचान, सृजनकर्ता, और सम्पूर्ण सृष्टि के शासक की है। परमेश्वर की ऐसी पहचान है और वह सभी चीज़ों में अद्वितीय है। परमेश्वर का कोई भी प्राणी—चाहे वह मनुष्य के बीच हो या आध्यात्मिक दुनिया में हो—परमेश्वर की पहचान और प्रतिष्ठा का का रूप लेने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ों में वही एक है जो इस पहचान, सामर्थ्य, अधिकार, और सृष्टि पर शासन करने की क्षमता से सम्पन्न है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं। वह सभी चीज़ों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीज़ों से ऊपर, सर्वोच्च स्थान तक उठ सकता है। वह मनुष्य बनकर, जो मांस और लहू के हैं, उनमें से एक बन कर, लोगों के साथ आमने-सामने होकर और उनके सुख—दुःख बाँट कर, अपने आप को विनम्र बना सकता है, जबकि वहीं दूसरी तरफ, जो कुछ भी है वह सब को नियंत्रित करता है, और जो कुछ भी है उस का भाग्य और उसे किस दिशा में जाना है यह तय करता है। इसके अलावा, वह संपूर्ण मानवजाति के भाग्य और मानवजाति की दिशा का पथप्रदर्शन करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए, उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए और उसे जानना चाहिए। इस प्रकार, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम मानवजाति में से किस समूह या किस प्रकार सम्बन्धित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का आदर करना, उसके शासन को स्वीकार करना, और अपने भाग्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी जीवित प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प—आवश्यक विकल्प—है। परमेश्वर की अद्वितीयता में, लोग देखते हैं कि उसका अधिकार, उसका धार्मिक स्वभाव, उसका सार, और वे साधन जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, सभी अद्वितीय हैं; यह अद्वितीयता, स्वयं परमेश्वर की असली पहचान को निर्धारित करती है, और यह उसकी प्रतिष्ठा को भी निर्धारित करती है। इसलिए, सभी प्राणियों के बीच, यदि आध्यात्मिक दुनिया में या मनुष्यों के बीच कोई जीवित प्राणी परमेश्वर की जगह खड़ा होने की इच्छा करता है, तो सफलता वैसे ही असंभव होगी, जैसे कि परमेश्वर का रूप धरने का कोई प्रयास। यह तथ्य है। इस तरह के सृजनकर्ता और शासक की, जो स्वयं परमेश्वर की पहचान, सामर्थ्य और प्रतिष्ठा को धारण करता है, मानवजाति के बारे में क्या अपेक्षाएँ हैं? यह हर एक को स्पष्ट हो जाना चाहिए, और हर एक द्वारा याद रखा जाना चाहिए; यह परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, और इसलिए वह समूची सृष्टि को अपने प्रभुत्व के अधीन लाता और अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पित करवाता है; वह सभी चीज़ों पर अधिकार रखेगा, ताकि सभी चीज़ें उसके हाथों में हों। परमेश्वर की सारी सृष्टि, पशुओं, पेड़-पौधों, मानवजाति, पहाड़ तथा नदियों, और झीलों सहित—सभी को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। आकाश में और धरती पर सभी चीज़ों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है और सभी को उसके आयोजनों के समक्ष समर्पण करना ही होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है। परमेश्वर सब कुछ पर अधिकार रखता है, और सभी चीज़ों का क्रम और उनकी श्रेणी निर्धारित करता है, जिसमें प्रत्येक को, परमेश्वर की इच्छानुसार, प्रकार के अनुरूप वर्गीकृत किया जाता है, और उनका अपना स्थान प्रदान किया जाता है। चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, कोई भी चीज़ परमेश्वर से बढ़कर नहीं हो सकती है, और सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की सेवा करती हैं, और कोई भी चीज़ परमेश्वर की अवज्ञा करने या परमेश्वर से कोई भी माँग करने की हिम्मत नहीं करती है। इसलिए मनुष्य को भी, परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते, मनुष्य का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। वह सभी चीज़ों का चाहे प्रभु हो या देख-रेख करने वाला हो, सभी चीजों के बीच मनुष्य का कद चाहे जितना ऊँचा हो, तो भी वह परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन एक अदना मानव भर है, और महत्वहीन मानव, परमेश्वर के सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं है, और वह कभी परमेश्वर से ऊपर नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

1. मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं दिखाना चाहिए, न अपनी बड़ाई करनी चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना और बड़ाई करनी चाहिए।

............

8. जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। किसी व्यक्ति को ऊँचा न ठहराओ, न किसी पर श्रद्धा रखो; परमेश्वर को पहले, जिनका आदर करते हो उन्हें दूसरे और ख़ुद को तीसरे स्थान पर मत रखो। किसी भी व्यक्ति का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और तुम्हें लोगों को—विशेषकर उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य या उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

लोगों का समूह जिन्हें देहधारी परमेश्वर आज प्राप्त करना चाहता है वे लोग हैं जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं। लोगों को केवल उसके कार्य का पालन करने की, न कि हमेशा स्वर्ग के परमेश्वर के विचारों से स्वयं को चिंतित करने, अस्पष्टता में रहने, या देहधारी परमेश्वर के लिए चीजें मुश्किल बनाने की आवश्यकता है। जो लोग उसकी आज्ञा का पालन करने में सक्षम हैं, वे ऐसे लोग हैं जो पूर्णतः उसके वचनों को सुनते हैं और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करते हैं। ये लोग इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हैं कि स्वर्ग का परमेश्वर वास्तव में किस तरह का है या स्वर्ग का परमेश्वर वर्तमान में मानवजाति के बीच किस प्रकार का कार्य कर रहा है; लेकिन वे पृथ्वी के परमेश्वर को पूर्णतः अपना हृदय दे देते हैं और वे उसके सामने अपना समस्त अस्तित्व रख देते हैं। वे अपनी स्वयं की सुरक्षा का कभी विचार नहीं करते, और वे देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता पर कभी भी उपद्रव नहीं करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे उसके द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हैं। जो लोग स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह स्वर्ग का परमेश्वर नहीं, बल्कि पृथ्वी का परमेश्वर है जो लोगों को वादे और आशीष प्रदान करता है। लोगों को स्वर्ग के परमेश्वर की ही हमेशा प्रशंसा नहीं करनी चाहिए और पृथ्वी के परमेश्वर को एक औसत व्यक्ति के रूप में नहीं देखना चाहिए; यह अनुचित है। स्वर्ग का परमेश्वर आश्चर्यजनक बुद्धि के साथ महान और अद्भुत है, किंतु इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है; पृथ्वी का परमेश्वर बहुत ही औसत और नगण्य है; वह अति सामान्य भी है। उसके पास कोई असाधारण मन नहीं है और न ही वह धरती हिला देने वाले कार्य करता है। वह सिर्फ एक बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक तरीके से बोलता और कार्य करता है। यद्यपि वह गड़गड़ाहट के माध्यम से बात नहीं करता है और न ही इसके लिए हवा और बारिश को बुलाता है, तब भी वह वास्तव में स्वर्ग के परमेश्वर का देहधारण है, और वह वास्तव में मनुष्यों के बीच रहने वाला परमेश्वर है। लोगों को उसे देखकर, जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते और अधम के रूप में तो बिलकुल भी कल्पना नहीं कर सकते, उसे बढ़ा-काढ़कर नहीं देखना चाहिए, जिसे वे समझने में सक्षम हैं और जो परमेश्वर के रूप में उनकी अपनी कल्पनाओं से मेल खाता है। यह सब लोगों की विद्रोहशीलता से आता है; यह परमेश्वर के प्रति मानवजाति के विरोध का स्रोत है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

"पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मंदिर" किसे संदर्भित करता है? आसान शब्दों में कहें तो, यह एक भव्य, ऊँची इमारत को संदर्भित करता है, और व्यवस्था के युग में मंदिर याजकों के लिए परमेश्वर की आराधना करने का स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," तो "वह" किसे संदर्भित करता है? स्पष्ट रूप से "वह" देह में मौजूद प्रभु यीशु है, क्योंकि केवल वही मंदिर से बड़ा था। इन वचनों ने लोगों को क्या बताया? उन्होंने लोगों को मंदिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही मंदिर को छोड़ चुका है और अब उसमें कार्य नहीं कर रहा, इसलिए लोगों को मंदिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्न ढूँढ़ने चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तो उसके वचनों के पीछे एक आधार था और वह यह कि व्यवस्था के अधीन लोग मंदिर को स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा समझने लगे थे। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाय मंदिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि उनके बजाय परमेश्वर की आराधना करें, क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहा : "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकतर लोग अब यहोवा की आराधना नहीं करते थे, बल्कि बेमन से केवल बलिदान करते थे, और प्रभु यीशु ने तय किया कि यह मूर्ति-पूजा है। इन मूर्ति-पूजकों ने मंदिर को परमेश्वर से बड़ी और ऊँची चीज़ समझ लिया था। उनके हृदय में केवल मंदिर था, परमेश्वर नहीं, और यदि उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ता, तो उनका निवास-स्थान भी छूट जाता। मंदिर के अतिरिक्त उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी, और वे अपने बलिदान नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित "निवास-स्थान" वह था, जहाँ वे यहोवा परमेश्वर की आराधना करने का झूठा दिखावा करते थे, ताकि वे मंदिर में रह सकें और अपने खुद के क्रियाकलाप कर सकें। उनका तथाकथित "बलिदान" मंदिर में सेवा करने की आड़ में अपने खुद के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहार कार्यान्वित करना भर था। यही कारण था कि उस समय लोग मंदिर को परमेश्वर से भी बड़ा समझते थे। प्रभु यीशु ने ये वचन लोगों को चेतावनी देने के लिए बोले थे, क्योंकि वे मंदिर का उपयोग एक आड़ के रूप में, और बलिदानों का उपयोग लोगों और परमेश्वर को धोखा देने के एक आवरण के रूप में करते थे। यदि तुम इन वचनों को वर्तमान में लागू करो, तो ये अभी भी उतने ही वैध और प्रासंगिक हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों की तुलना में परमेश्वर के एक भिन्न कार्य का अनुभव किया है, किंतु उनका प्रकृति-सार एक-समान है। आज के कार्य के संदर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ें करेंगे, जो इन वचनों में दर्शाई गई हैं, "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपना कर्तव्य निभाने को अपने कार्य के रूप में देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के लिए मानवाधिकारों की रक्षा हेतु किए जाने वाले राजनीतिक आंदोलनों के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को अपने कौशलों का उपयोग आजीविका में करने की ओर मोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं, बल्कि धार्मिक सिद्धांत के एक अंश के पालन के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या ये व्यवहार बिलकुल "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है" के समान नहीं हैं? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय भौतिक मंदिरों में कर रहे थे, जबकि आज लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय अमूर्त मंदिरों में करते हैं। जो लोग नियमों को महत्व देते हैं, वे नियमों को परमेश्वर से बड़ा समझते हैं; जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं, वे हैसियत को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं; जो लोग अपनी आजीविका से प्रेम करते हैं, वे आजीविका को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने के लिए बाध्य करती हैं : "लोग अपने वचनों से परमेश्वर को सबसे बड़ा कहकर उसकी स्तुति करते हैं, किंतु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बड़ी है।" ऐसा इसलिए है, क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने या अपना व्यवसाय या अपनी आजीविका चलाने का अवसर मिलता है, वे परमेश्वर से दूरी बना लेते हैं और अपने आप को अपनी प्यारी आजीविका में झोंक देते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, उसे और उसकी इच्छा को बहुत पहले ही त्याग दिया गया है। इन लोगों की स्थिति और दो हज़ार वर्ष पहले मंदिर में अपना व्यवसाय करने वाले लोगों की स्थिति में क्या अंतर है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

बुराई से दूर रहने में सक्षम होने की पूर्वशर्त एक ऐसा हृदय रखना है, जो परमेश्वर का भय मानता है। परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय किससे उत्पन्न होता है? परमेश्वर की बड़ाई से। परमेश्वर की बड़ाई करने का क्या मतलब है? इसका मतलब है परमेश्वर के वचनों को मानक के रूप में, मानदंड के रूप में उपयोग करते हुए सभी चीजों को परमेश्वर के वचनों द्वारा मापने में सक्षम होना। सीधे शब्दों में, इसका मतलब है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर है, कि अपने हृदय में तुम परमेश्वर के बारे में सोचते हो। इसका मतलब है कि तुम जो कुछ भी करते हो, तुम खुद को नहीं भूलते, तुम मनमाने ढंग से काम नहीं करते, तुम खुद को पहले नहीं रखते; इसके बजाय, तुम परमेश्वर को अपना मालिक बनने देते हो—हर चीज में यह सोचते हुए कि "मैं परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति हूँ, मैं परमेश्वर का अनुयायी हूँ, मैं परमेश्वर द्वारा चुना गया एक छोटा, तुच्छ प्राणी हूँ। मैं कोई मत नहीं बनाता, मैं कोई निर्णय नहीं लेता, मैं उन्हें परमेश्वर पर छोड़ देता हूँ, परमेश्वर मेरा मुख्य आधार और मेरे हर कार्य का मार्गदर्शक प्रकाश है; मुझे परमेश्वर के वचनों के आधार पर और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना चाहिए।" परमेश्वर को अपने हृदय में रखने का यही अर्थ है। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें आवेगशील या लापरवाह मत बनो। पहले इस बारे में सोचो कि परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं, इस तरह से कार्य करना परमेश्वर के लिए घृणास्पद तो नहीं, यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। पहले अपने हृदय में सवाल पूछो, इस पर विचार करो, इसका पता लगाने की कोशिश करो। उतावले न बनो। उतावलापन तुम्हारी स्वाभाविक अवस्था से, तुम्हारी उत्तेजनशीलता से, मानवीय इच्छा से उत्पन्न होता है। हमेशा उतावला रहना यह साबित करता है कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय से अनुपस्थित है। उस हालत में, क्या परमेश्वर की बड़ाई करने के तुम्हारे दावे सिर्फ खोखले शब्द नहीं हैं? तुम्हारी वास्तविकता कहाँ है? तुम्हारे पास कोई वास्तविकता नहीं है। तुम परमेश्वर की बड़ाई करने में असमर्थ हो; हर तरह से, तुम नियंत्रण लेने की कोशिश करते हो, और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हो। क्या तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होने के तुम्हारे दावे बकवास नहीं? तुम झूठ बोल रहे हो। जिन लोगों के पास परमेश्‍वर का भय मानने वाला हृदय होता है, उनमें विशेष रूप से क्या प्रदर्शित होता है? परमेश्वर की बड़ाई। परमेश्वर की बड़ाई विशेष रूप से तुम्हारे हृदय में परमेश्वर की उपस्थिति से प्रदर्शित होती है। तुम्हारे हृदय में परमेश्वर की उपस्थिति विशेष रूप से इस बात से प्रदर्शित होती है कि जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो तुम किस तरह शांत और विचारशील रहते हो, तुम उतावले नहीं होते, तुम अपनी उत्तेजनशीलता के भरोसे नहीं रहते, तुम परमेश्वर की इच्छा पर विचार करते हो, और तुम सत्य-सिद्धांत खोजते हो। जब तुम कार्य करते हो, तो वह परमेश्वर के वचनों पर आधारित होता है या तुम्हारी अपनी इच्छा के अनुसार होता है, तुम्हारी इच्छा पहले आती है या परमेश्वर के वचन—यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है या नहीं। तुम दावा करते हो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है, लेकिन जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो तुम उतावले हो जाते हो, तुम खुद फैसला करने की कोशिश करते हो, तुम परमेश्वर को एक तरफ कर देते हो। तुम कहते हो कि तुम्हें परमेश्वर का बहुत डर है, और जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो तुम हमेशा प्रार्थना करते हो। लेकिन जब तुम प्रार्थना कर चुके होते हो, तो तुम उस पर विचार करते हो, और अपने मन में कहते हो, "मुझे लगता है कि यह या वह सही तरीका है।" यह सब तुम्हारी व्यक्तिगत इच्छा है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे साथ कौन सहभागिता करता है। तो क्या तुममें ऐसा हृदय होने के संकेत का अभाव नहीं है, जो परमेश्वर का भय मानता हो? यदि तुमसे संबंधित कुछ भी ऐसे हृदय का संकेत नहीं करता जो परमेश्वर का भय मानता है, तो जब तुम परमेश्वर की बड़ाई करने का दावा करते हो, और यह कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है, तो वे सिर्फ खोखले शब्द होते हैं, वे वह नहीं होते जिसका तुम अभ्यास करते हो। जिनके हृदय में परमेश्वर नहीं है, और जो परमेश्वर की बड़ाई करने में असमर्थ हैं, क्या उनके पास सामान्य मानवता की भावना है? (नहीं।) सामान्य मानवता की भावना रखने वाले लोग पहली बात यह सोचते हैं, "मैं परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति हूँ, मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर का उद्धार पाने का प्रयास करता है, लेकिन मेरे पास भ्रष्ट स्वभाव हैं। मैं सभी मामलों में खुद को पहले रखता हूँ, मेरा भ्रष्ट स्वभाव हमेशा सर्वोच्च शासन करता है, मैं हमेशा स्वच्छंद और मनमौजी बना रहता हूँ, और मैं जो कुछ भी करना चाहता हूँ वह सत्य के विपरीत होता है, तो मैं ऐसे तरीके से कार्य कैसे कर सकता हूँ जो मेरे भ्रष्ट स्वभाव पर आधारित न हो? परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं? सत्य-सिद्धांत क्या हैं?" ये सामान्य मानवता की भावना से उत्पन्न विचार और संकेत हैं; ये उन सिद्धांतों और दृष्टिकोणों में से एक हैं जिनके द्वारा कार्य करना होता है। जब तुममें सामान्य मानवता की भावना होती है, तो तुम्हारा यही रवैया होता है। जब तुममें सामान्य मानवता की भावना नहीं होती, तो तुममें ऐसा रवैया नहीं होता। और इसलिए, मानवता की भावना महत्वपूर्ण है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

जब कोई व्यक्ति यह पहचानने लगता है कि वह एक सृजित वस्तु है, तो वह व्यक्ति परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए एक सच्चा सृजित प्राणी बनने की आशाओं को विकसित करेगा। साथ ही, ऐसे लोग परमेश्वर को अपना प्रभु भी मानेंगे और वे परमेश्वर की सभी अपेक्षाओं को और साथ ही उसके शासन को मानने की इच्छा रखेंगे। इसलिए वे मनमाने ढंग से व्यवहार करना बंद कर देंगे, और परमेश्वर के इरादों की तलाश करेंगे और वे जो कुछ भी करते हैं उसमें सत्य के सिद्धांतों की तलाश करेंगे। वे अब केवल अपनी मनमानी नहीं करेंगे या चीजों को अपनी खुद की योजनाओं के अनुसार नहीं करेंगे। अपने व्यक्तिगत ख्यालों पर भरोसा करने के बजाय, वे अपने विचारों में परमेश्वर को लगातार रखना शुरू कर देंगे, और उनकी व्यक्तिपरक इच्छा सभी पहलुओं में परमेश्वर को संतुष्ट करना, सत्य के अनुरूप होना, और अपने कृत्यों में परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करना होगी। ऐसी अवस्था में रहने वाले लोग निस्संदेह सत्य की तलाश करना, सत्य का अभ्यास करना, और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना सीखना शुरू कर चुके हैं। यदि तुम इस तरह की स्थिति में हो और इन चीजों को कैसे करें यह सीखना शुरू कर सकते हो, तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि तुम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की इच्छा की तलाश करने का तरीका सीखना शुरू कर दोगे, और यह भी कि किस तरह परमेश्वर के नाम का अनादर न किया जाए, परमेश्वर को कैसे भव्य बनाया जाए, परमेश्वर का भय कैसे माना जाए, और परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया जाए, बजाय इसके कि खुद को या किसी और को संतुष्ट किया जाए, अपनी स्वयं की इच्छाओं को संतुष्ट करने का प्रयास करने की बात तो छोड़ ही दो। जब लोग इस प्रकार की स्थिति में प्रवेश करते हैं, और ऐसी अवस्था रखने की शुरुआत कर चुके होते हैं, तो उनके सोचने के तरीके का मार्गदर्शन उनके भ्रष्ट स्वभाव से और उनकी भ्रष्ट प्रकृति से नहीं होगा, और अब ये उनके विचारों और दृष्टिकोणों को नियंत्रित या प्रभावित नहीं करेंगे। उनके भ्रष्ट स्वभाव और भ्रष्ट प्रकृति अब उनको नियंत्रित नहीं कर पाएँगे। एक बार जब तुम इस अवस्था में होते हो, तो तुम्हारी व्यक्तिपरक इच्छाएँ सकारात्मक चीजों के लिए होंगी, और तुम यह समझने में सक्षम होगे कि किस तरह अपनी भ्रष्टता को उजागर होने से रोका जाए, और मनमाने तरीके से चलने और स्वार्थी और घृणित काम करने से कैसे बचा जाए। इस तरह, भले ही तुम्हारे पास अभी भी एक भ्रष्ट स्वभाव होगा, पर अब यह तुम्हारी हर बात पर हावी नहीं हो पाएगा और तुम्हें और ज्यादा नियंत्रित नहीं कर पाएगा। क्या तब तुम अपने भीतर सत्य का बोलबाला महसूस करते हुए नहीं जियोगे?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ' से उद्धृत

यद्यपि अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था या स्वयं अपने कानों से परमेश्वर के वचन कभी नहीं सुने थे, फिर भी अय्यूब के हृदय में परमेश्वर का स्थान था। परमेश्वर के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्या थी? जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यह थी, "यहोवा का नाम धन्य है।" उसके द्वारा परमेश्वर के नाम को धन्य कहना बेशर्त, संदर्भ से निरपेक्ष था, और किसी तर्क से बंधा नहीं था। हम देखते हैं कि अय्यूब ने अपना हृदय परमेश्वर को दे दिया था, उसे परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होने दिया था; अपने हृदय में वह जो सोचता था, वह जो निर्णय लेता था, और वह जिसकी योजना बनाता था वह सब परमेश्वर के लिए खुला छोड़ दिया गया था और परमेश्वर से बंद नहीं रखा गया था। उसका हृदय परमेश्वर के विरोध में खड़ा नहीं हुआ था, और उसने परमेश्वर से कभी नहीं कहा कि वह उसके लिए कुछ करे या उसे कुछ दे, और उसने अंधाधुँध इच्छाएँ नहीं पालीं कि परमेश्वर की उसकी आराधना से उसे कुछ न कुछ प्राप्त जाए। उसने परमेश्वर से किन्हीं लेन-देनों की बात नहीं की, और परमेश्वर से कोई याचनाएँ या माँगें नहीं कीं। उसका परमेश्वर के नाम की स्तुति करना भी सभी चीज़ों पर शासन करने की परमेश्वर की महान सामर्थ्य और अधिकार के कारण था, और वह इस पर निर्भर नहीं था कि उसे आशीषें प्राप्त हुईं या उस पर आपदा टूटी। वह मानता था कि परमेश्वर लोगों को चाहे आशीष दे या उन पर आपदा लाए, परमेश्वर की सामर्थ्य और उसका अधिकार नहीं बदलेगा, और इस प्रकार, व्यक्ति की परिस्थितियाँ चाहे जो हों, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। मनुष्य को धन्य किया जाता है तो परमेश्वर की संप्रभुता के कारण किया जाता है, और इसलिए जब मनुष्य पर आपदा टूटती है, तो वह भी परमेश्वर की संप्रभुता के कारण ही टूटती है। परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य से संबंधित सब कुछ पर शासन करते हैं और उसे व्यवस्थित करते हैं; मनुष्य के सौभाग्य के उतार-चढ़ाव परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके अधिकार की अभिव्यंजना हैं, और जिसका चाहे जो दृष्टिकोण हो, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। यही वह है जो अय्यूब ने अपने जीवन के वर्षों के दौरान अनुभव किया था और जानने लगा था। अय्यूब के सभी विचार और कार्यकलाप परमेश्वर के कानों तक पहुँचे थे, और परमेश्वर के सामने आए थे, और परमेश्वर द्वारा महत्वपूर्ण माने गए थे। परमेश्वर ने अय्यूब के इस ज्ञान को सँजोया, और ऐसा हृदय होने के लिए अय्यूब को सँजोया। यह हृदय सदैव, और सर्वत्र, परमेश्वर के आदेश की प्रतीक्षा करता था, और समय या स्थान चाहे जो हो, उस पर जो कुछ भी टूटता उसका स्वागत करता था। अय्यूब ने परमेश्वर से कोई माँगें नहीं कीं। उसने स्वयं अपने से जो माँगा वह यह था कि परमेश्वर से आई सभी व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करे, स्वीकार करे, सामना करे, और आज्ञापालन करे; अय्यूब इसे अपना कर्तव्य मानता था, और यह ठीक वही था जो परमेश्वर चाहता था। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, न ही उसे कोई वचन बोलते, कोई आज्ञा देते, कोई शिक्षा देते, या उसे किसी चीज़ का निर्देश देते सुना था। आज के वचनों में, जब परमेश्वर ने उसे सत्य के संबंध में कोई प्रबुद्धता, मार्गदर्शन या पोषण नहीं दिया था, उसके लिए परमेश्वर के प्रति ऐसा ज्ञान और प्रवृत्ति रख पाना—यह बहुमूल्य था, और उसका ऐसी चीज़ें प्रदर्शित करना परमेश्वर के लिए पर्याप्त था, और उसकी गवाही परमेश्वर द्वारा सराही और सँजोई गई थी। अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा या व्यक्तिगत रूप से उसे कोई शिक्षा देते नहीं सुना था, परंतु परमेश्वर के लिए उसका हृदय और वह स्वयं उन लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक अनमोल थे जो परमेश्वर के सामने केवल गहन सिद्धांतों की शब्दावली में बोल सकते थे, जो केवल शेखी बघार सकते थे, और बलिदान चढ़ाने की बात कर सकते थे, परंतु जिनके पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान कभी नहीं था, और जिन्होंने कभी सच में परमेश्वर का भय नहीं माना था। क्योंकि अय्यूब का हृदय शुद्ध था, और परमेश्वर से छिपा हुआ नहीं था, और उसकी मानवता ईमानदार और दयालु हृदय थी, और वह न्याय से और जो सकारात्मक था उससे प्रेम करता था। केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही जो ऐसे हृदय और मानवता से युक्त था, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कर पाने में समर्थ था, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम था। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की संप्रभुता देख सकता था, उसका अधिकार और सामर्थ्य देख सकता था, और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता प्राप्त करने में समर्थ था। केवल इस जैसा व्यक्ति ही परमेश्वर के नाम की सच्ची स्तुति कर सकता था। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह यह नहीं देखता था कि परमेश्वर उसे आशीष देगा या उसके ऊपर आपदा लाएगा, क्योंकि वह जानता था कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ से नियंत्रित होता है, और यह कि मनुष्य का चिंता करना मूर्खता, अज्ञानता, या तर्कहीनता का, और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य के प्रति संदेह का, और परमेश्वर का भय न मानने का संकेत है। अय्यूब का ज्ञान ठीक वही था जो परमेश्वर चाहता था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

यद्यपि मनुष्य की अपेक्षा शैतान की कुशलताएँ और योग्यताएँ कहीं बढ़कर हैं, यद्यपि वह ऐसे काम कर सकता है जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, तुम चाहे शैतान से ईर्ष्या करो या वह जो करता है उसकी आकांक्षा करो, इन चीजों से नफरत करो या घृणा से भर जाओ, चाहे तुम उसे देख पाओ या नहीं, चाहे शैतान कितना भी हासिल कर पाए या वह कितने भी लोगों को धोखा देकर उनसे अपनी आराधना करवाए और खुद को पवित्र मनवाए, चाहे तुम इसे कैसे भी परिभाषित करो, तुम यह नहीं कह सकते कि उसके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, सिर्फ एक ही परमेश्वर है, इसके अतिरिक्त, तुम्हें यह जानना चाहिए कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही अधिकार है, सभी चीजो पर शासन करने और उन पर नियन्त्रण करने की सामर्थ्‍य उसी के पास है। सिर्फ इसलिए कि शैतान के पास लोगों को धोखा देने की क्षमता है, वह परमेश्वर का रूप धारण कर सकता है, परमेश्वर द्वारा किए गए चिन्हों और चमत्कारों की नकल कर सकता है, उसने परमेश्वर के समान ही कुछ समान काम किए हैं, तो तुम भूलवश विश्वास करने लग जाते हो कि परमेश्वर अद्वितीय नहीं है, बल्कि बहुत सारे परमेश्वर हैं, बस उनके पास कुछ कम या कुछ ज्यादा कुशलताएँ हैं और उस सामर्थ्‍य का विस्तार अलग-अलग है जिसे वे काम में लाते हैं। उनके आगमन के क्रम, उनके युग के अनुसार तुम उनकी महानता को आँकते हो, तुम यह विश्वास करने में गलती करते हो कि परमेश्वर से अलग कुछ अन्य देवता हैं, तुम यह सोचते हो कि परमेश्वर की सामर्थ्‍य और उसका अधिकार अद्वितीय नहीं हैं। यदि तुम्हारे विचार ऐसे हैं, यदि तुम परमेश्वर की अद्वितीयता को पहचान नहीं पाते हो, यह विश्वास नहीं करते हो कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, यदि तुम बहु-ईश्वरवाद को महत्व देते हो तो मैं कहूँगा कि तुम जीवधारियों में सबसे निकृष्ट हो, तुम शैतान का साकार रूप हो और तुम निश्चित तौर पर एक बुरे इंसान हो! क्या तुम समझ रहे हो कि मैं इन वचनों के द्वारा तुम्हें क्या सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि समय, स्थान या तुम्हारी पृष्ठभूमि क्या है, तुम परमेश्वर और किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, या चीज के बीच भ्रमित मत हो। भले ही तुम्‍हें स्वयं-परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का सार कितना ही अज्ञात और अगम्य लगे, शैतान के कार्य और शब्द तुम्हारी धारणा और कल्पना से कितना ही मेल खाते हों, वे तुम्हें कितनी ही संतुष्टि प्रदान करते हों, मूर्ख न बनो, इन धारणाओं में भ्रमित मत हो, परमेश्वर के अस्तित्व को नकारो मत, परमेश्वर की पहचान और हैसियत को नकारो मत, परमेश्वर को दरवाजे के बाहर मत धकेलो और परमेश्वर को हटाकर शैतान को अपना परमेश्‍वर बनाने के लिए उसे अपने हृदय के भीतर मत लाओ। मुझे कोई संदेह नहीं है कि तुम ऐसा करने के परिणामों की कल्पना करने में समर्थ हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

पिछला: 15. परमेश्वर के प्रति शपथ लेने के सिद्धांत

अगला: 17. परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें