80. संभावित नवधर्मियों के मूल्यांकन के सिद्धांत

(1) सबसे पहले, यह पता लगाना आवश्यक है कि एक संभावित नवधर्मी अच्छी मानवता का है या बुरी, क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है, और क्या कोई बुरी आत्मा उसके भीतर अपना काम कर रही है। इसके बाद, यह निर्धारित करो कि क्या सुसमाचार उसके लिए प्रचारित किया जा सकता है;

(2) एक बार इस बात की पुष्टि हो जाए कि एक संभावित नवधर्मी अच्छा है, तो तुम्हें ईमानदारी से बातचीत करनी चाहिए और सत्य पर सहभागिता के अवसर खोजने चाहिए, और इस प्रकार सुसमाचार फैलाने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए;

(3) तुम्हें किसी संभावित नवधर्मी की योग्यता, वरीयताओं, मुख्य कमज़ोरियों, और संभावित अवधारणाओं को समझना और अनुभव करना होगा ताकि भविष्य में उनके लिए गवाही प्रदान करने हेतु एक पृष्ठभूमि बन सके;

(4) यदि एक संभावित नवधर्मी को इतना अहंकारी और आत्म-तुष्ट पाया जाता है कि वह सत्य को स्वीकार ही न कर सके, फिर भी उसमें सुसमाचार प्रचारित करने की प्रतिभा और सेवा प्रदान करने की क्षमता पाई जाती है, तो तुम्हें उसके परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के साए में रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्मा मृत हो चुके हैं जिनमें आत्मा नहीं है, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों की रचना की थी, वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने बनाया था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थीं, उसने उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसके प्रकाश में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होकर परमेश्वर-विरोधी हो गए हैं। मुख्यतः, सबसे आगे वही लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं, इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती। जीवित वे लोग हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं। इनमें सत्य और गवाही होती है, और यही लोग परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर का उद्धार देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के देहधारण में और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो पाते हैं, कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका स्वभाव बचाया जा सकता है या नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

सुसमाचार फैलाने का कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें अपना उत्तरदायित्व पूरा करना चाहिए। "उत्तरदायित्व" शब्द का तुम क्या अर्थ समझते हो? इस उत्तरदायित्व को तुम कैसे उठाते और यथार्थ स्थितियों पर सटीक ढंग से कैसे लागू करते हो? यह तुम्हारी बाध्यता है कि तुम सुसमाचार की अपनी समझ और इस बारे में जो कुछ भी तुमने परमेश्वर से ग्रहण किया है, उसे उन लोगों तक पहुँचाओ जिन तक वह चाहता है कि तुम इसे फैलाओ। तो तुम इसे कैसे फैलाओगे? यह ऐसा काम नहीं है जिसे तुम अपने खाली समय में करो, न तो इसे तुम्हारी अपनी भावनाओं और पसंद के अनुसार, न ही प्रत्येक मेहमान के महत्व के बारे में तुम्हारी भावना के अनुरूप विकल्प-सूची बदलकर फैलाया जा सकता है। बल्कि, सामान्य रूप से कहें, तो इसे परमेश्वर की अपेक्षाओं और परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार फैलाया जाता है। विशेष रूप से कहें, तो तुमने जो ग्रहण किया है और तुम जो समझते हो, उसे उन लोगों के साथ साझा करने के लिए, जिनके साथ तुम्हें इसे साझा करना है, हर मौक़ा खोजो और वह सब करो जो तुम कर सकते हो। यह काम करते समय तुम्हें क्या करना चाहिए? अपना उत्तरदायित्व पूरा करो, वह सब करो जो तुम कर सकते हो, और कोई भी क़ीमत चुकाने से हिचकिचाओ मत। इसका क्या अर्थ है कि तुम जो कर सकते हो, वह सब करो? इसका अर्थ है कि भले ही तुम सुसमाचार का प्रसार कुछ ही समय से कर रहे हो और तुम्हें अधिक अनुभव नहीं है, या तुम बहुत अच्छे वक्ता नहीं हो, या अधिक पढ़े-लिखे नहीं हो, तो भी लोगों तक न पहुँच पाने का तुम्हारे पास कोई कारण या बहाना नहीं है। इस उद्यम में तुम्हें अपने प्रयास दोगुने करने होंगे, जिन लोगों के साथ तुम सुसमाचार साझा करते हो, उनकी परिस्थितियों को समझना होगा, और उनके साथ सुसमाचार साझा करने के उपयुक्त साधन खोजने होंगे। उदाहरण के लिए, देखो कि वह क्या है जो मत-परिवर्तन की संभावना रखने वाले लोग समझते हैं, उनका व्यक्तित्व किस तरह का है, क्या उन्हें बोलना अच्छा लगता है, और क्या वे जोशीली बातचीत पसंद करते हैं। यदि उन्हें जोशीली बातचीत पसंद नहीं है, तो तुम्हें उनके साथ कुछ अधिक सौम्य और धीमे स्वर में बात करनी चाहिए; यदि वे अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं और उनमें समझने की क्षमता का अभाव है, तो तुम्हें बहुत क़ायदे से, धीरे-धीरे और सधे हुए ढंग से, पंक्ति-दर-पंक्ति, थोड़ा-थोड़ा बोलने की जरूरत है; यदि उन्हें कुछ सांस्कृतिक ज्ञान है और अधिक विद्वतापूर्ण भाषा सुनना पसंद करते हैं, किन्तु तुम्हारी शिक्षा का स्तर अपर्याप्त है, तो तुम्हें कुछ विद्वतापूर्ण सामग्री तैयार करनी चाहिए, या किसी शिक्षित व्यक्ति को खोजकर उनके साथ चर्चा करते समय उसे अपना सहभागी बनाना चाहिए। यदि मत-परिवर्तन की संभावना रखने वाले व्यक्ति को बाइबल का अच्छा ज्ञान है किन्तु तुमने अपने जीवन में एक दिन भी बाइबल नहीं पढ़ी है, तो तुम क्या करोगे? तुम्हें बाइबल में विशेष रूप से वह खोजना चाहिए और स्वयं को उससे युक्त करना चाहिए जिसकी उस मत-परिवर्तन की संभावना रखने वाले व्यक्ति को आवश्यकता है, प्रासंगिक भविष्यवाणियों के लिए पुराने नियम और प्रासंगिक पदों के लिए नए नियम का ज्ञान होना चाहिए। जब तुम्हारे पास करने को कुछ न हो, तो तुम्हें पदों को पढ़ना, नोट्स बनाना या उन्हें कंठस्थ करना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें मनन करना चाहिए कि धर्मपरायण लोग बाइबल के इन पदों को किस तरह समझते हैं, और तुम उस बिन्दु पर कैसे पहुँच सकते हो जहाँ इन्हें सटीक और शुद्ध ढंग से समझने में इन लोगों की मदद कर सको, ताकि, बाद में, तुम इन पदों के साथ अपना तादात्म्य क़ायम करके अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य समझने के लिए उनका मार्गदर्शन कर सको। यही होम वर्क करना है। तुम्हें समझना चाहिए कि विभिन्न प्रकार के लोगों की आवश्यकताएँ क्या हैं, और फिर उन परिस्थितियों पर आधारित थोड़ा-सा होमवर्क करना चाहिए। ये सब काम करके तुम अपना उत्तरदायित्व पूरा कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है' से उद्धृत

लोगों को ऐसी श्रेणियों में रखा जा सकता है, जिन्हें उनकी आत्मा के द्वारा निर्धारित किया जाता है| कुछ लोगों के पास मानवीय आत्मा होती है, और उनका चयन पूर्व-निर्धारित रूप से किया जाता है| मनुष्य की आत्मा में एक भाग होता है जो पूर्व-निर्धारित है| कुछ लोग आत्मा विहीन होते हैं; वे दुष्ट आत्माएं हैं जो चुपके से घुसपैठ कर चुकी हैं| वे परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित व चयनित नहीं होती हैं| हालांकि वे भीतर आ गए हैं, फिर भी उन्हें बचाया नहीं जा सकता है, और अंततः उन्हें दुष्ट-आत्माओं द्वारा खींच लिया जाएगा| इसे उस व्यक्ति के आंतरिक स्वभाव के द्वारा निर्धारित किया जाता है कि वह परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार करेगा या नहीं, या वह कौन सा मार्ग लेगा या उसे स्वीकार करने के बाद वह परिवर्तित होगा या नहीं| कुछ लोग पथभ्रष्ट होने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते| उनकी आत्मा निर्धारित करती है कि वे इस श्रेणी के हैं; वे बदल नहीं सकते हैं| ये वे लोग हैं जिनमें पवित्र आत्मा कार्य करना बंद देती है क्योंकि उन्होंने सही मार्ग नहीं लिया है| अगर वे वापस मुड़े तो पवित्र आत्मा अभी भी अपना कार्य कर सकती है, परन्तु यदि वे वापस ना मुड़ने की ज़िद करें तो वे पूर्णत: समाप्त हो जाते हैं| हर प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं|

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को कैसे जानें' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर लोगों का न्याय और शुद्धिकरण करने के लिए सत्य व्यक्त करते हुए अंत के दिनों का कार्य कर रहा है। इस प्रकार, सिर्फ़ उन लोगों को उद्धार की उम्मीद है जिनके पास अच्छी इंसानियत है, जो सत्य से प्रेम करते हैं और जो परमेश्वर के वचनों को समझने और सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं। सुसमाचार का प्रचार करने के दौरान, हमें पता चलता है कि भ्रष्ट इंसानों के बीच कुछ अच्छी इंसानियत वाले लोग भी मौजूद हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और जिन्हें बचाया जा सकता है; ज़्यादातर लोग सुसमाचार का प्रचार किये जाने की शर्तें पूरी नहीं करते हैं। इसलिए, सुसमाचार का प्रचार करते समय, हमें पहले अच्छे लोगों को पहचान कर उन नेक लोगों को चुनना चाहिए जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करते हैं और सत्य की खोज करते हैं। जो लोग सुसमाचार का प्रचार किये जाने की शर्तें पूरी करते हैं सिर्फ़ उन्हें परमेश्वर की गवाही देना इंसान को बचाने के परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग करना और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। अगर हम सुसमाचार का प्रचार करते समय भेदभाव नहीं करते हैं, तो हम ऐसे लोगों को परमेश्वर के घर में ला सकते हैं जो परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं। जैसे कि आध्यात्मिक बातों को नहीं समझने वाले लोग, दुष्ट आत्माएं, विवेकहीन लोग, मसीह विरोधी, दुष्ट लोग और झूठे विश्वासी, जो सिर्फ़ अपने हिस्से का खाना चाहते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें सत्य से बिल्कुल भी प्रेम नहीं है और सचमुच परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं या जो सीधे तौर पर सत्य को समझने में अक्षम हैं या जो दंगे करा सकते हैं और कई तरह के बुरे काम कर सकते हैं। ये लोग शैतान के साथी हैं और परमेश्वर द्वारा बचाये जाने के लिए चुना नहीं गया है। परमेश्वर के घर में उनका प्रवेश होने पर, उन्हें बिल्कुल भी नहीं बचाया जाएगा, बल्कि वे परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावटें और गड़बड़ियाँ पैदा करेंगे। इसलिए, सुसमाचार का प्रचार करते समय हमें भेदभाव करना चाहिए, ऐसे लोगों को खर-पतवार की तरह छांट कर निकाल देना चाहिए जो सुसमाचार का प्रचार किये जाने की शर्तें पूरी नहीं करते हैं। हमें ऐसे लोगों को परमेश्वर के सामने लाना चाहिए जो सुसमाचार का प्रचार करने के सिद्धांतों के अनुरूप चलते हैं। सिर्फ़ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

व्यक्ति को अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत वाले नेक लोगों को सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए जो अपने अंतरतम से यह स्वीकार करते हैं कि एक परमेश्वर है, जो सच्चे मार्ग की खोज करने में सक्षम हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, भले ही वे धार्मिक प्रकार के लोग हों या अविश्वासी। ऐसे लोगों को सुसमाचार का प्रचार नहीं करना चाहिए जो इन शर्तों को पूरा नहीं करते हैं। परमेश्वर के घर ने अब यह नियम बनाया है कि सुसमाचार का प्रचार करते समय लोगों को "प्रचार करने वाली पाँच चीज़ें" और "प्रचार न करने वाली पाँच चीज़ें" के सिद्धांत के अनुसार ऐसा करना चाहिए। कोई भी इन सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकता।

"प्रचार करने वाली पाँच चीज़ें" के सिद्धांत की विशेष बातें इस प्रकार हैं:

1. सिर्फ़ ऐसे लोगों को प्रचार करो जो सचमुच यह मानते हैं कि उनके दिलों में परमेश्वर है और वे सच्चे मार्ग की खोज और जांच-पड़ताल करने के इच्छुक हैं।

2. चाहे व्यक्ति किसी भी तरह का काम करता हो या उसने किसी भी स्तर की शिक्षा प्राप्त की हो, अगर उसके पास अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत है और वह सत्य को स्वीकार कर सकता है, तो उसे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

3. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति पहले किस धार्मिक समूह से जुड़ा था—और इसमें ऐसे लोग शामिल हैं जो सभी तरह के अंधविश्वासों पर भरोसा करते हैं या जिन्होंने दुष्ट आत्माओं या झूठे देवताओं की आराधना की हो—अगर उन्होंने पेशेवर तौर पर धार्मिक समूह का प्रबंधन नहीं किया है, वे दुष्ट आत्माओं के वश में नहीं हैं और वे सच्चे मार्ग की खोज और जांच-पड़ताल करने में सक्षम हैं, तो उन्हें सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

4. जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से समाज में मौजूद मशहूर लोगों के संबंध में, अगर वे यह स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर मौजूद है, वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं और यह आश्वस्त किया जाता है कि उनकी समझ बेतुकी नहीं है और वे सभी तरह के दुष्ट काम नहीं करते हैं, तो उन्हें सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

5. धार्मिक अगुआओं के संबंध में, अगर वे सच्चे मार्ग को मानते हैं और सत्य को स्वीकार करते हैं, उनका रुतबा भी बहुत बुरा नहीं है, वे दुष्ट नहीं हैं और वे विवेकहीन नहीं हैं या आध्यात्मिक बातों को समझने में असमर्थ नहीं हैं, तो उन्हें सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

"प्रचार न करने वाली पाँच चीज़ें" के सिद्धांत की विशेष बातें इस प्रकार हैं:

1. ऐसे लोगों को कभी सुसमाचार का प्रचार मत करो जो कुछ समय अवधि के लिए दुष्ट आत्माओं के वश में रहे हैं या जिनके पास दुष्ट आत्माओं का बहुत बुरा काम है।

2. ऐसे लोगों को कभी सुसमाचार का प्रचार मत करो जिनके पास बेहद खराब इंसानियत है, जिनका रुतबा अच्छा नहीं है, जो सभी तरह के बुरे कर्म करने में सक्षम हैं और जो दुष्ट लोग हैं।

3. ऐसे लोगों को कभी सुसमाचार का प्रचार मत करो जो दानवों की तरह क्रूर, कुरूप और अजीब दिखते हैं और जिनकी वजह से तुम परेशान या आतंकित महसूस करते हो।

4. ऐसे लोगों को कभी सुसमाचार का प्रचार मत करो जिनमें कई गंभीर अक्षमताएं हैं, जिनके मस्तिष्क विकृत हैं और जो आसानी से सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं।

5. ऐसे लोगों को कभी सुसमाचार का प्रचार मत करो जिनकी काबिलियत बहुत कम है, जिनकी बुद्धि कमज़ोर है और जो परमेश्वर के वचन सत्य को समझने में असमर्थ हैं।

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उपरोक्त "प्रचार करने वाली पाँच चीज़ें" और "प्रचार न करने वाली पाँच चीज़ें" के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना चाहिए। अगर कोई इन पाँच तरह के लोगों में से किसी को भी सुसमाचार का प्रचार करता है, जिसे सुसमाचार का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए, तो वह सुसमाचार के कार्य में रुकावट और गड़बड़ी पैदा करने वाला व्यक्ति है। उसे ऐसा व्यक्ति माना जाएगा जो बेवजह की समस्या खड़ी करता है, जो जानबूझकर बुरा बर्ताव करता है और उसे चेतावनी दी जानी चाहिए। अगर ऐसे लोग पश्चाताप नहीं करते हैं तो उन्हें उनके कर्तव्य निर्वहन से रोक दिया जाना चाहिए। कुछ विशेष परिस्थितियों में लचीला रवैया अपनाया जा सकता है और व्यक्ति को "सभी के लिए एक ही नियम" वाला दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति सत्य को स्वीकार करने में सक्षम है लेकिन संदेह है कि वह "प्रचार न करने वाली पाँच चीज़ें" वाली किसी एक श्रेणी के अंतर्गत आ सकता है, तो उसे सुसमाचार का प्रचार तभी किया जा सकता है जब इन बातों की गारंटी दी जा सकती हो: एक, वह शैतानों के वश में नहीं है; दूसरा, वह एक दुष्ट व्यक्ति नहीं है; और तीसरा, वह कोई जासूस नहीं है। अगर जिस व्यक्ति को सुसमाचार का प्रचार किया जाना चाहिए उसमें कोई समस्या है—शायद उसने कभी अलग भाषाओं में बात किया हो या किसी दुष्टात्मा समूह में शामिल रहा हो आदि—तो उसे भी तभी सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है अगर इस बात की गारंटी दी जा सके कि वह कम से कम सुसमाचार के प्रचार में योगदान देने में तो सक्षम है। अगर वह व्यक्ति सुसमाचार के प्रचार में योगदान नहीं कर सकता है और यहाँ तक कि नुकसान या गड़बड़ी पैदा कर सकता है, तो उसे निश्चित रूप से सुसमाचार का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए। यह एक विशेष सिद्धांत है। इसके अलावा, अगर किसी अक्षम व्यक्ति के पास अच्छी प्रतिष्ठा है और अगर यह गारंटी दी जा सकती है कि इस व्यक्ति में अच्छी इंसानियत है, वह सत्य को स्वीकार कर सकता है और सुसमाचार के प्रचार में योगदान दे सकता है, तो उसे भी सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है। अगर कोई अनिश्चित स्थिति पैदा होती है, तो सहभागिता के माध्यम से बहुमत के सुझावों को अपनाया जाना चाहिए। अतीत में, हर जगह की सभी कलीसियाएं सुसमाचार के प्रचार को लेकर कुछ नियमों के दायरे में सीमित थीं, जैसे कि ऐसे लोगों को सुसमाचार का प्रचार नहीं करना जिनके चेहरों पर पैदाइशी निशान मौजूद हैं, जिन लोगों को कभी बुरी बीमारियाँ हुई थीं, जो लोग पिरामिड स्कीम में शामिल हैं, जिन लोगों को सफ़ेद दाग है, जिन लोगों को कई तरह की अक्षमताएं हैं, ऐसे लोग जो चीज़ों को आँखें बंद करके देख सकते हैं, जिन लोगों के पास अलौकिक शक्तियां हैं, ऐसे लोग जो अजीब घटना को देख सकते हैं, ऐसे लोग जो हमेशा अजीब सपने देखते हैं, वगैरह वगैरह। यह सब कुछ गलत और बेतुका है, इन पर पाबंदी लगायी जानी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपने दिल से मानता है परमेश्वर मौजूद है, उसके पास अच्छी इंसानियत है, वह सत्य से प्रेम कर सकता है, सत्य को स्वीकार कर सकता है, वह दुष्ट व्यक्ति नहीं है, शैतानों के वश में नहीं है और ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें ज़ाहिर तौर पर दुष्ट आत्माएं काम करती हैं, तो उसे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है। यह सबसे मौलिक और सबसे सरल सिद्धांत है। जो लोग अभी भी इस बात को समझ या जान नहीं सकते, वे भ्रमित लोग हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

इस दुष्ट संसार में शैतान सत्ता में बना रहता है और बड़ा लाल अजगर अभी भी अपनी मौत के कगार पर है। इसलिए, जब कोई सुसमाचार का प्रचार करता है, तो उसे वास्तविक परिस्थिति के अनुसार बुद्धिमानी से सत्य के सिद्धांतों और प्रचार के तरीकों का पता लगाना चाहिए। हम सिर्फ़ उन लोगों को सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं जो यह मानते हैं कि परमेश्वर मौजूद है और सच्चे मार्ग की खोज करते हैं। इसलिए, पहले यह सीखना आवश्यक हो जाता है कि सुसमाचार का प्रचार करते समय लोगों की पहचान कैसे करें। हम ऐसे लोगों से बातचीत करके उन्हें परख सकते हैं जो नेक दिखते हैं, जो सम्मानित और सभ्य लोग हैं, फिर जब हमें यकीन हो जाता है कि वे सुसमाचार का प्रचार करने के सिद्धांतों के अनुरूप हैं, तभी हम उन्हें तभी सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं। ऐसे लोगों के पास प्रचार मत करो जो दुष्ट दिखते हैं या जो मूर्ख हैं या जिनके पास अच्छी काबिलियत नहीं है; यही बुद्धिमानी है। कुछ दानवी प्रवृत्ति वाले लोग देखने में सभ्य और मिलनसार लग सकते हैं, उनकी मनोदशा अच्छी हो सकती है, लेकिन वे अनिवार्य रूप से ऐसे अच्छे लोग नहीं हैं जो सत्य से प्रेम करते हों, वास्तव में वे सत्य से नफ़रत करने वाले नास्तिक हो सकते हैं। यह ऐसा है कि जिस तरह कुछ अधिकारी देखने में सम्मानित नज़र आ सकते हैं, लेकिन उनके सामने परमेश्वर का जिक्र आते ही वे गुस्से से आगबबूला हो जाते हैं, ऐसे लोग सत्य से नफ़रत करने वाले राक्षस हैं। ऐसे लोगों के पास सुसमाचार का प्रचार करना परेशानी को दावत देना है और वे आसानी से समस्याएं खड़ी कर सकते हैं। अगर तुम्हें पता चलता है कि कोई व्यक्ति सभ्य और निष्कपट है, तो तुम्हें उससे संपर्क करना चाहिए, मगर तभी जब इस बात की गारंटी दी जा सके कि ऐसा करना सुरक्षित है। जब तुम्हें यकीन हो जाये कि वह व्यक्ति सुसमाचार के प्रचार का लक्ष्य है, तो तुम्हें पहले परमेश्वर में विश्वास करने से जुड़ी कुछ अनुभव आधारित गवाहियों के बारे में बात करनी चाहिए, उसके जवाब को सुनकर यह समझना चाहिए कि क्या उसे सत्य में दिलचस्पी है और फिर यह फ़ैसला लेना चाहिए कि उसे परमेश्वर की गवाही दी जाये या नहीं। अभ्यास का यह तरीका अधिक सुरक्षित है। अगर सुसमाचार के प्रचार में दो लोग साथ मिलकर काम करते हैं, तो उन्हें पहले लोगों को परखने के संबंध में सहयोग करना सीखना चाहिए और फिर सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए। इसके अलावा, किसी अप्रत्याशित परिस्थिति के मामले में सुसमाचार का लक्ष्य रहे व्यक्ति की प्रतिक्रिया पर निरंतर ध्यान देना चाहिए। सुसमाचार का प्रचार करने में सिर्फ़ इसी तरीके से साथ मिलकर काम करना सुरक्षित होगा। इससे न केवल लोगों को हासिल करना आसान हो जाएगा बल्कि इसके साथ-साथ सुरक्षा की गारंटी भी होगी। जो लोग सुसमाचार का प्रचार करते हैं और परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें एक दिल और एक मन से परमेश्वर से प्रार्थना करती चाहिए, ताकि वे सही तरीके से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकें। इस तरह, वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में रहने में सक्षम होंगे। यह सुसमाचार के प्रचार के अभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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