80. संभावित सुसमाचार लक्ष्यों का पता लगाने के सिद्धांत

(1) सबसे पहले, यह पता लगाना आवश्यक है कि एक संभावित सुसमाचार लक्ष्य की मानवता अच्छी है या बुरी, क्या वह सत्य स्वीकार कर सकता है, और क्या कोई बुरी आत्मा उसके भीतर काम कर रही है। इसके बाद, यह निर्धारित करो कि क्या उसे सुसमाचार सुनाया जा सकता है।

(2) एक बार इस बात की पुष्टि हो जाए कि एक संभावित सुसमाचार लक्ष्य अच्छा है, तो तुम्हें ईमानदारी से उससे बातचीत करनी चाहिए और सत्य पर सहभागिता के अवसर खोजने चाहिए, और इस प्रकार सुसमाचार फैलाने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

(3) तुम्हें किसी संभावित सुसमाचार लक्ष्य की योग्यता, वरीयताओं, मुख्य कमजोरियों, और संभावित धारणाओं को समझना और अनुभव करना होगा ताकि भविष्य में उन्हें गवाही प्रदान करने हेतु एक पृष्ठभूमि बन सके।

(4) यदि एक संभावित सुसमाचार लक्ष्य को इतना अहंकारी और आत्म-तुष्ट पाया जाता है कि वह सत्य को स्वीकार ही न कर सके, फिर भी उसमें सुसमाचार प्रचार करने की प्रतिभा और सेवा प्रदान करने की क्षमता पाई जाती है, तो तुम्हें उसे राजी करने का प्रयास करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के साए में रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्मा मृत हो चुके हैं जिनमें आत्मा नहीं है, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों की रचना की थी, वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने बनाया था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थीं, उसने उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसके प्रकाश में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होकर परमेश्वर-विरोधी हो गए हैं। मुख्यतः, सबसे आगे वही लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं, इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती। जीवित वे लोग हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं। इनमें सत्य और गवाही होती है, और यही लोग परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर का उद्धार देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के देहधारण में और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो पाते हैं, कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका स्वभाव बचाया जा सकता है या नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं और उनमें भेद इस बात से किया जाता है कि उनके पास किस प्रकार की आत्मा है। कुछ लोगों में मानवीय आत्माएँ होती हैं, और वे वही होते हैं जिन्हें परमेश्वर ने चयन के लिए पूर्वनियत किया था। कुछ में मानवीय आत्मा नहीं होती; वे दुष्टात्माएँ हैं, जो धोखा देकर घुस आई हैं। वे पूर्वनियत नहीं किए गए थे और उन्हें परमेश्वर द्वारा चुना नहीं गया था, भले ही वे अंदर आ गए हों, उन्हें बचाया नहीं जा सकता, और अंततः उन्हें दुष्टात्माओं द्वारा छीन लिया जाएगा। लोग परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर पाते हैं या नहीं, और उसे स्वीकार करने के बाद वे किस मार्ग पर चलते हैं और वे बदल सकते हैं या नहीं, यह सब उनके भीतर की आत्मा और प्रकृति पर निर्भर करता है। कुछ लोग भटकने से खुद को रोक नहीं पाते; उनकी आत्मा उन्हें ऐसे लोगों के रूप में नियत करती है, और वे बदल नहीं सकते। उनमें से कुछ में पवित्र आत्मा काम नहीं करता, क्योंकि वे सही मार्ग पर नहीं चलते; हालाँकि अगर वे वापस मुड़ जाएँ, तो अभी भी पवित्र आत्मा कार्य कर सकता है। अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उनके लिए सब खत्म हो जाएगा। हर तरह की स्थिति रहती है, लेकिन जो भी मामला हो, परमेश्वर हर व्यक्ति के साथ अपने व्यवहार में धार्मिक होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिनके दिल में सत्य और धार्मिकता के लिए तड़प है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो धार्मिकता, भलाई और सत्य के लिए तरसता है, और विवेक से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता परिमार्जित हो सके, और उनका जीवन-स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या धार्मिकता और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुराई का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो बुरी चीज़ों को दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य के साथ और उत्पन्न होने वाली घटनाओं के साथ लयबद्ध नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और अपने दम पर चीजों को संभालने या हल करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी सिफ़ारिश करवाने के लिए कुछ भी नहीं होता, उस पर कार्य किए जा सकने लायक कुछ भी नहीं होता। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन मैला होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे धार्मिकता के लिए तरसते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट या पारदर्शी रूप से सत्य की बात करे, वे प्रतिक्रिया नहीं करते, मानो वे पहले से ही मृत हों। क्या उनके लिए खेल ख़त्म नहीं हो गया है? किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी साँस बाक़ी हो, कृत्रिम श्वसन द्वारा बचाया जा सकता है, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ नहीं कर पाएगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

सुसमाचार फैलाने का कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें अपना उत्तरदायित्व पूरा करना चाहिए। "उत्तरदायित्व" शब्द का तुम क्या अर्थ समझते हो? इस उत्तरदायित्व को तुम कैसे उठाते और यथार्थ स्थितियों पर सटीक ढंग से कैसे लागू करते हो? यह तुम्हारी बाध्यता है कि तुम सुसमाचार की अपनी समझ और इस बारे में जो कुछ भी तुमने परमेश्वर से ग्रहण किया है, उसे उन लोगों तक पहुँचाओ जिन तक वह चाहता है कि तुम इसे फैलाओ। तो तुम इसे कैसे फैलाओगे? यह ऐसा काम नहीं है जिसे तुम अपने खाली समय में करो, न तो इसे तुम्हारी अपनी भावनाओं और पसंद के अनुसार, न ही प्रत्येक मेहमान के महत्व के बारे में तुम्हारी भावना के अनुरूप विकल्प-सूची बदलकर फैलाया जा सकता है। बल्कि, सामान्य रूप से कहें, तो इसे परमेश्वर की अपेक्षाओं और परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार फैलाया जाता है। विशेष रूप से कहें, तो तुमने जो ग्रहण किया है और तुम जो समझते हो, उसे उन लोगों के साथ साझा करने के लिए, जिनके साथ तुम्हें इसे साझा करना है, हर मौक़ा खोजो और वह सब करो जो तुम कर सकते हो। यह काम करते समय तुम्हें क्या करना चाहिए? अपना उत्तरदायित्व पूरा करो, वह सब करो जो तुम कर सकते हो, और कोई भी क़ीमत चुकाने से हिचकिचाओ मत। इसका क्या अर्थ है कि तुम जो कर सकते हो, वह सब करो? इसका अर्थ है कि भले ही तुम सुसमाचार का प्रसार कुछ ही समय से कर रहे हो और तुम्हें अधिक अनुभव नहीं है, या तुम बहुत अच्छे वक्ता नहीं हो, या अधिक पढ़े-लिखे नहीं हो, तो भी लोगों तक न पहुँच पाने का तुम्हारे पास कोई कारण या बहाना नहीं है। इस उद्यम में तुम्हें अपने प्रयास दोगुने करने होंगे, जिन लोगों के साथ तुम सुसमाचार साझा करते हो, उनकी परिस्थितियों को समझना होगा, और उनके साथ सुसमाचार साझा करने के उपयुक्त साधन खोजने होंगे। उदाहरण के लिए, देखो कि वह क्या है जो मत-परिवर्तन की संभावना रखने वाले लोग समझते हैं, उनका व्यक्तित्व किस तरह का है, क्या उन्हें बोलना अच्छा लगता है, और क्या वे जोशीली बातचीत पसंद करते हैं। यदि उन्हें जोशीली बातचीत पसंद नहीं है, तो तुम्हें उनके साथ कुछ अधिक सौम्य और धीमे स्वर में बात करनी चाहिए; यदि वे अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं और उनमें समझने की क्षमता का अभाव है, तो तुम्हें बहुत क़ायदे से, धीरे-धीरे और सधे हुए ढंग से, पंक्ति-दर-पंक्ति, थोड़ा-थोड़ा बोलने की जरूरत है; यदि उन्हें कुछ सांस्कृतिक ज्ञान है और अधिक विद्वतापूर्ण भाषा सुनना पसंद करते हैं, किन्तु तुम्हारी शिक्षा का स्तर अपर्याप्त है, तो तुम्हें कुछ विद्वतापूर्ण सामग्री तैयार करनी चाहिए, या किसी शिक्षित व्यक्ति को खोजकर उनके साथ चर्चा करते समय उसे अपना सहभागी बनाना चाहिए। यदि मत-परिवर्तन की संभावना रखने वाले व्यक्ति को बाइबल का अच्छा ज्ञान है किन्तु तुमने अपने जीवन में एक दिन भी बाइबल नहीं पढ़ी है, तो तुम क्या करोगे? तुम्हें बाइबल में विशेष रूप से वह खोजना चाहिए और स्वयं को उससे युक्त करना चाहिए जिसकी उस मत-परिवर्तन की संभावना रखने वाले व्यक्ति को आवश्यकता है, प्रासंगिक भविष्यवाणियों के लिए पुराने नियम और प्रासंगिक पदों के लिए नए नियम का ज्ञान होना चाहिए। जब तुम्हारे पास करने को कुछ न हो, तो तुम्हें पदों को पढ़ना, नोट्स बनाना या उन्हें कंठस्थ करना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें मनन करना चाहिए कि धर्मपरायण लोग बाइबल के इन पदों को किस तरह समझते हैं, और तुम उस बिन्दु पर कैसे पहुँच सकते हो जहाँ इन्हें सटीक और शुद्ध ढंग से समझने में इन लोगों की मदद कर सको, ताकि, बाद में, तुम इन पदों के साथ अपना तादात्म्य क़ायम करके अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य समझने के लिए उनका मार्गदर्शन कर सको। यही होम वर्क करना है। तुम्हें समझना चाहिए कि विभिन्न प्रकार के लोगों की आवश्यकताएँ क्या हैं, और फिर उन परिस्थितियों पर आधारित थोड़ा-सा होमवर्क करना चाहिए। ये सब काम करके तुम अपना उत्तरदायित्व पूरा कर सकते हो। शायद कुछ लोग कहें, "मुझे ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है; मुझे तो बस बाइबल को कुछ बार पढ़ने की जरूरत है। मैं इस पर बस उसी तरह चर्चा करूँगा, जिस तरह मैं हमेशा सभी के साथ करता हूँ, और यह उन पर है कि वे विश्वास करते हैं या नहीं। अगर वे नहीं करते, तो वे कुछ भी हासिल नहीं कर सकते, जो मेरी गलती नहीं होगी, क्योंकि, मैंने तो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है।" क्या ऐसे किसी व्यक्ति ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है? अगर तुम सुसमाचार के लक्ष्य का शैक्षिक स्तर, आयु, व्यक्तित्व, रुचियाँ आदि जाने बिना सुसमाचार का प्रसार करते हो, या अगर तुम होमवर्क करने की कोई कोशिश नहीं करते या उसके लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं करते, तो क्या तुम वास्तव में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हो? यह सिर्फ अपने कर्तव्यों को जैसे-तैसे निपटाने और उनके प्रति गैर-जिम्मेदार होने का रवैया है; यह एक लापरवाही भरा रवैया है। अगर तुम ऐसे रवैये के साथ सुसमाचार का प्रसार करते हो, लोगों को प्राप्त करने में असफल रहते हो, और फिर कहते हो कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वे आध्यात्मिक मामले नहीं समझते—अगर तुम उन पर जिम्मेदारी डालने का प्रयास करते हो और दावा करते हो कि तुमने कुछ भी गलत नहीं किया—तो तुम्हारा रवैया एक गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। यह स्पष्ट रूप से तुम्हारे द्वारा अपना होमवर्क न करने, अपनी जिम्मेदारी पूरी न करने और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन न करने का मामला होगा। लेकिन तुम अभी भी अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए हर तरह के बहाने बनाते हो और कुछ-न-कुछ कहते हो, तो तुम किस तरह का व्यवहार प्रदर्शित कर रहे हो? यह धोखा है; गैर-जिम्मेदारी से बकवास करना और चीजों को अविवेकपूर्ण ढंग से परिभाषित करना धोखा है; ये परमेश्वर को धोखा देने के कार्य हैं। परमेश्वर ने तुम्हें यह कर्तव्य दिया; तुम्हें सुसमाचार के हर लक्ष्य के साथ प्रेम और धैर्य के साथ अपनी सर्वोत्तम क्षमता से व्यवहार करना चाहिए, जो भी कठिनाई सहनी जरूरी हो, सहन करनी चाहिए, अपना कार्य अंत तक जिम्मेदारी की भावना के साथ करना चाहिए, और अपने सभी कार्यों का लेखा परमेश्वर को देने में सक्षम होना चाहिए। यही वह रवैया है, जिसके साथ तुम्हें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। अगर तुम्हारे सामने सुसमाचार का कोई लक्ष्य आता है और तुम अपने मन में कहते हो, "मैं इस मन:स्थिति में नहीं हूँ। मुझे परवाह नहीं कि वह कितने साल का है या वह कौन है, यह मेरा काम नहीं है। वह विश्वास करता है या नहीं, यह मेरे ऊपर नहीं है; अगर पवित्र आत्मा उसमें कार्य नहीं करता, तो मेरे द्वारा किए गए कितने भी होमवर्क से कुछ नहीं बदल सकता, इसलिए मैं प्रयास करने की जहमत नहीं उठाऊँगा। मैं सुसमाचार फैलाने के बारे में केवल इतना ही सत्य समझता हूँ। अगर परमेश्वर उसमें कार्य करता है तो वह विश्वास करेगा; अगर वह नहीं करता तो वह विश्वास नहीं करेगा, और यह उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा, लेकिन इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं होगा।" यह किस तरह का रवैया है? यह एक गैर-जिम्मेदाराना, निष्ठुर रवैया है। सुसमाचार फैलाने वाली टीमों में ऐसे बहुत-से लोग हैं। तो, किस बिंदु पर यह कहा जा सकता है कि तुमने अपना कर्तव्य यथेष्ट रूप से निभाया है? जब तुम अपने सामने आने वाले, सुसमाचार के पचानवे प्रतिशत से अधिक लक्ष्यों के लिए तैयारी करने में अपना होमवर्क करते हो, और फिर प्यार, धैर्य, सहनशीलता के साथ और जिम्मेदारी की भावना से अपना कर्तव्य निभाते हो, तो तुमने मूल रूप से अपना काम यथेष्ट रूप से किया है। विशेष अपवादों वाले शेष पाँच प्रतिशत सुसमाचार-लक्ष्य तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं हैं। ये अपवाद किस तरह के होते हैं? उदाहरण के लिए, कभी-कभी लोग तुम्हारे द्वारा सुसमाचार सुनाए जा सकने से पहले विभिन्न कारणों से मर जाते हैं; यह एक प्रकार का अपवाद है। दूसरा अपवाद वे लोग होते हैं, जिन्होंने हाल ही में अपनी पारिवारिक स्थिति में बदलाव का अनुभव किया है, या जिनकी अभी-अभी शादी हुई है या जिन्हें पदोन्नति मिली है। सिद्धांत रूप में वे उपयुक्त सुसमाचार-लक्ष्य हो सकते हैं, लेकिन सुसमाचार के उन तक पहुँचने का यह शायद सही समय न हो; इसलिए उन्हें सुसमाचार सूनाने के प्रयास बेहतर समय आने तक रोकने पड़ सकते हैं। कुछ अन्य अपवाद क्या हैं? एक उदाहरण यह है कि कुछ लोगों ने अनर्गल बातें बोलते हैं, और केवल कुछ दिनों या कुछ वर्षों के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक, हमेशा, हर जगह जहाँ भी वे गए हैं। ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं, और तुम उन्हें सुसमाचार नहीं सुना सकते। एक अन्य प्रकार का अपवाद वे लोग हैं, जो ऊपरी तौर पर अनुकूल लक्ष्य प्रतीत होते हैं, लेकिन फिर जब तुम उनके बारे में अधिक विशिष्टता से पूछते हो, तो तुम पाते हो कि उन्होंने बीस-तीस लोगों के साथ व्यभिचार किया है। अगर तुम सेवाकर्ताओं के रूप में उनका उपयोग अधिक लोगों तक सुसमाचार का प्रचार करने के लिए नहीं कर सकते तो तुम उन्हें उपदेश नहीं दे सकते; अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो तुम उन्हें उपदेश दे सकते हो। एक अन्य प्रकार का अपवाद वह व्यक्ति है, जिसकी मानवता बहुत दुष्ट है, जो प्रतिशोध लेना चाहता है और नाराज होने पर दूसरों को नुकसान पहुँचाता है। ऐसे लोगों का निष्कासित होना तय है, इसलिए तुम उन्हें उपदेश नहीं दे सकते। ऐसे नाबालिगों के मामले भी हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करना चाहते हैं, लेकिन जिनके अभिभावकों ने इसकी अनुमति नहीं दी है। तुम उन्हें सुसमाचार नहीं सुना सकते। जब वे बड़े हो जाएँ और स्वतंत्र नागरिक बन जाएँ, तो तुम फिर से उन्हें सुसमाचार सुनाने का प्रयास कर सकते हो। तुमने इन सभी अपवादों का सामना किया हो सकता है। अगर वस्तुनिष्ठ परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देतीं, तो उन्हें सुसमाचार सुनाना तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

परमेश्वर लोगों का न्याय करने और उन्हें निर्मल बनाने के लिए सत्य व्यक्त करते हुए अंत के दिनों का कार्य करता है। इस प्रकार, सिर्फ उन लोगों को उद्धार की उम्मीद है, जिनमें अच्छी इंसानियत है, जो सत्य से प्रेम करते हैं और जो परमेश्वर के वचनों को समझने और सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं। इसलिए व्यक्ति को अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत वाले नेक लोगों के आगे सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए, जो अपने अंतरतम से यह स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है, जो सच्चे मार्ग की खोज करने में सक्षम हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, चाहे वे धार्मिक प्रकार के लोग हों या अविश्वासी। ऐसे लोगों के आगे सुसमाचार का प्रचार नहीं करना चाहिए, जो इन शर्तों को पूरा नहीं करते। परमेश्वर का घर अब यह निर्धारित करता है कि सुसमाचार का प्रचार करते समय लोगों को ऐसा "प्रचार करने की पाँच बातों" और "कभी प्रचार न करने की आठ बातों" के सिद्धांतों के अनुसार करना चाहिए। कोई भी इन सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकता।

"प्रचार करने की पाँच बातों" के सिद्धांतों का सटीक ब्योरा इस प्रकार है :

1. सिर्फ़ ऐसे लोगों के आगे प्रचार करो, जो अपने दिलों में सचमुच यह मानते हैं कि परमेश्वर है और जो सच्चे मार्ग की खोज और जाँच-पड़ताल करने के इच्छुक हैं।

2. चाहे व्यक्ति किसी भी तरह का काम करता हो या उसने किसी भी स्तर की शिक्षा प्राप्त की हो, अगर उसमें अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत है और वह सत्य को स्वीकार कर सकता है, तो उसके आगे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

3. व्यक्ति पहले चाहे किसी भी धार्मिक समूह से जुड़ा हो—और इसमें वे लोग शामिल हैं, जो सभी तरह के अंधविश्वासों पर भरोसा करते हैं या जिन्होंने दुष्ट आत्माओं या झूठे देवताओं की आराधना तक की है—अगर उन्होंने पेशेवर तौर पर धार्मिक समूह का प्रबंधन नहीं किया है और वे दुष्ट आत्माओं के वश में नहीं हैं और सच्चे मार्ग की खोज और जाँच-पड़ताल करने के इच्छुक हैं, तो उनके आगे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

4. जहाँ तक समाज में मौजूद जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के मशहूर लोगों का संबंध है, अगर वे यह स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर मौजूद है, वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं और यह निश्चित है कि उनकी समझ बेतुकी नहीं है और वे किसी तरह के दुष्ट काम नहीं करते, तो उनके आगे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

5. जहाँ तक धार्मिक अगुआओं का संबंध है, अगर वे सच्चे मार्ग को मानते हैं और सत्य को स्वीकार करते हैं, उनकी प्रतिष्ठा ज्यादा खराब नहीं है, वे दुष्ट और बेतुके या आध्यात्मिक बातों को समझने में असमर्थ नहीं हैं, तो उनके आगे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है।

"कभी प्रचार न करने की आठ बातों" के सिद्धांतों का सटीक ब्योरा इस प्रकार है :

1. उन लोगों के आगे कभी प्रचार न करो, जो विश्वास नहीं करते कि ईश्वर है और जो अपने दिलों में ईश्वर के विचार को अस्वीकार करते हैं।

2. उन लोगों के आगे कभी सुसमाचार का प्रचार न करो, जिनमें बेहद खराब इंसानियत है, जिनकी प्रतिष्ठा अच्छी नहीं है, जो सभी तरह के बुरे कर्म करने में सक्षम हैं और जो दुष्ट लोग हैं।

3. उन लोगों के आगे कभी सुसमाचार का प्रचार मत करो, जो दुष्ट आत्माओं के वश में रहे हैं या जिनमें दुष्ट आत्माओं का संगीन काम है।

4. उन लोगों के आगे कभी सुसमाचार का प्रचार न करो, जो क्रूर, कुरूप और अजीब दिखते हैं और जो तुम्हें असहज या भयभीत तक कर देते हैं।

5. उन लोगों के आगे कभी प्रचार न करो, जो दुष्ट और अनैतिक हैं।

6. उन लोगों के आगे कभी सुसमाचार का प्रचार न करो, जिनमें गंभीर अक्षमताएँ हैं या जो गंभीर रूप से बीमार हैं।

7. उन लोगों के आगे कभी सुसमाचार का प्रचार न करो, जिनकी काबिलियत बहुत कम है, जिनकी बुद्धि कमजोर है और जो परमेश्वर के वचन सत्य को समझने में असमर्थ हैं।

8. उन लोगों के आगे कभी भी प्रचार न करो, जिनका व्यवहार किसी जासूस या स्काउट के समान संदिग्ध है।

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उपर्युक्त "प्रचार करने की पाँच बातों" और "कभी प्रचार न करने की आठ बातों" के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना चाहिए। अगर कोई इन आठ तरह के लोगों में से किसी के भी आगे सुसमाचार का प्रचार करता है, जिसे सुसमाचार का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए, तो वह सुसमाचार के कार्य में रुकावट और गड़बड़ी पैदा करने वाला व्यक्ति है। उसे ऐसा व्यक्ति माना जाएगा, जो बेवजह समस्या खड़ी करता है, जो जानबूझकर बुरा बरताव करता है, और उसे चेतावनी दी जानी चाहिए। अगर ऐसे लोग पश्चात्ताप नहीं करते, तो उन्हें उनका कर्तव्य निभाने से रोक दिया जाना चाहिए। कुछ विशेष परिस्थितियों में लचीला रवैया अपनाया जा सकता है, और "सभी को एक ही लाठी से हाँकने" वाला दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हो, लेकिन इस बात का शक हो कि वह "कभी प्रचार न करने की आठ बातों" वाली किसी श्रेणी में आता है, तो उसके आगे सुसमाचार का प्रचार तभी किया जा सकता है, जब इन बातों की गारंटी हो : एक, वह शैतानों के वश में नहीं है; दूसरा, वह दुष्ट व्यक्ति नहीं है; और तीसरा, वह कोई जासूस नहीं है। जिस व्यक्ति के आगे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है, अगर उसमें कुछ समस्याएँ है—शायद उसने कभी अजीब भाषा में बात की हो या किसी दुष्टात्मा-समूह में शामिल रहा हो, आदि—तो उसके आगे भी तभी सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है, जब इस बात की गारंटी हो कि वह कम से कम सुसमाचार के प्रचार में योगदान देने में सक्षम है। अगर वह व्यक्ति सुसमाचार के प्रचार में योगदान न कर सकता हो, बल्कि नुकसान या गड़बड़ी पैदा कर सकता हो, तो उसके आगे निश्चित रूप से सुसमाचार का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए। यह एक विशेष सिद्धांत है। इसके अलावा, अगर किसी अक्षम व्यक्ति की अच्छी प्रतिष्ठा हो और अगर यह गारंटी हो कि इस व्यक्ति में अच्छी इंसानियत है, यह सत्य को स्वीकार कर सकता है और सुसमाचार के प्रचार में योगदान दे सकता है, तो उसके आगे भी सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है। अगर कोई अनिश्चित स्थिति पैदा हो जाए, तो सहभागिता के माध्यम से बहुमत के सुझाव अपनाए जाने चाहिए। अतीत में, हर जगह सभी कलीसियाएँ सुसमाचार के प्रचार में कुछ नियमों से विवश थीं, जैसे कि उन लोगों के आगे सुसमाचार का प्रचार न करना जिनके चेहरों पर पैदाइशी निशान मौजूद हों, जिन लोगों को कभी बुरी बीमारियाँ हुई हों, जो लोग पिरामिड योजनाओं में संलग्न हों, जिन लोगों को सफ़ेद दाग हो, जिन लोगों में विभिन्न प्रकार की अक्षमताएँ हों, जो लोग चीज़ों को आँखें बंद करके देख सकते हों, जिन लोगों के पास अलौकिक शक्तियाँ हों, जो लोग अजीब घटनाएँ देख सकते हों, जो हमेशा अजीब सपने देखते हों, वगैरह-वगैरह। यह सब गलत और बेतुका है, इस पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए। अगर व्यक्ति अपने दिल में यह मानता है कि परमेश्वर है, उसमें अच्छी इंसानियत है, वह सत्य से प्रेम कर सकता है, सत्य को स्वीकार कर सकता है, दुष्ट व्यक्ति नहीं है, शैतानों के वश में नहीं है और ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें ज़ाहिर तौर पर दुष्ट आत्माएँ काम करती हैं, तो उसके आगे सुसमाचार का प्रचार किया जा सकता है। यह सबसे प्राथमिक और सबसे सरल सिद्धांत है। जो लोग अभी भी इसे समझ या जान नहीं सकते, वे भ्रमित लोग हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

पिछला: 79. परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के सिद्धांत

अगला: 81. सुसमाचार फैलाने और परमेश्वर की गवाही देने के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें