166. परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के सिद्धांत

(1) चाहे कोई कितने भी अनुग्रह का आनंद ले, उसे परमेश्वर की इच्छा के प्रति चौकस रहना सीखना चाहिए। व्यक्ति को अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने और परमेश्वर के प्रेम को लौटाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए;

(2) परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने में, व्यक्ति को मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझना चाहिए, उसके प्रेम को जानना चाहिए, और उसके लिए गवाही देना सीखना चाहिए। केवल यही उसकी इच्छा के अनुसार होता है;

(3) मनुष्य के प्रति परमेश्वर का अनुग्रह उसके प्रेम की अभिव्यक्ति है, फिर भी उसका उद्देश्य है कि मानवजाति को शैतान के प्रभाव से बचाया जाए, और लोग एक मानवीय सदृशता को जिएँ;

(4) परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेकर ही संतुष्ट न हो जाओ। तुम्हें सत्य की, और परमेश्वर के ज्ञान की, तलाश करनी चाहिए। परमेश्वर द्वारा परिपूर्ण किए जाने के बिंदु तक पहुँच पाना ही उसे सबसे अधिक प्रसन्न करता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर ने मुक्त रूप से अपना जीवन और स्वरूप मनुष्यों को दिया है ताकि वे इसे जी सकें, ताकि वे परमेश्वर के स्वरूप को और जो वो उन्हें देता है उसे जीने के लिए एक दिशा और मार्ग में रूपांतरित कर सकें, अर्थात, वे इस पर निर्भर होकर जी सकें और उसके वचनों को अपना जीवन बना सकें। तो, क्या हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर ने मुक्त रूप से अपना जीवन मनुष्यों को दिया है, जिससे ये उनका जीवन बन गया है? तो फिर मनुष्यों ने परमेश्वर से क्या पाया है? परमेश्वर की अपेक्षा? परमेश्वर की प्रतिज्ञा? क्या? उन्होंने जो परमेश्वर से पाया है वो खोखला वचन नहीं बल्कि परमेश्वर का जीवन है। मनुष्यों को जीवन प्रदान करने के अलावा, एक अपेक्षा जो परमेश्वर उनसे करता है वह यह है कि वे परमेश्वर के इस जीवन को लेकर इसे अपने जीवन में बदल दें, और इसे जीएं। जब परमेश्वर लोगों को इस जीवन को जीते हुए देखता है, तो वह संतुष्ट महसूस करता है। यही परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। इस प्रकार, मनुष्य जो परमेश्वर से प्राप्त करता है वह अनमोल है, और जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों में सबसे अनमोल इस वस्तु मनुष्य को प्रदान कर रहा है, तो परमेश्वर को कुछ भी हासिल नहीं होता है; सबसे बड़ी लाभार्थी मानवजाति है। मनुष्य सबसे बड़ा लाभ उठाते हैं; वे सबसे बड़े लाभार्थी हैं। परमेश्वर के जीवन को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हुए, मनुष्य सत्य को भी समझ जाते हैं, मनुष्य होने के सिद्धांतों को प्राप्त करते हैं, उन जड़ों को विकसित करते हैं जिनकी उन्हें मनुष्य होने के लिए आवश्यकता होती है, और मनुष्य होने के लिए उन्हें जिस दिशा में चलने की आवश्यकता होती है उसे प्राप्त करते हैं। वे अब शैतान से और धोखा नहीं खाते हैं, उसके द्वारा बांधे नहीं जाते हैं, दुष्ट लोगों द्वारा धोखा नहीं खाते और इस्तेमाल नहीं किए जाते, और न ही वे बुरी प्रवृत्तियों द्वारा प्रदूषित और अशुद्ध किए जाते, बांधे या बहकाये जाते हैं। मनुष्य स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आज़ादी से रहते हैं, और वे मुक्त हो जाते हैं। वे अब और बंधे नहीं हैं या कष्ट नहीं सहते हैं। अब और कोई कठिनाइयाँ नहीं हैं, वे मुक्त होकर जीते हैं और वे वास्तव में परमेश्वर के प्रभुत्व में जीने में सक्षम हो जाते हैं, अब कोई भी बुरी या अंधकारमय ताकतें उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं। अर्थात, जब वे इस जीवन को अपना मानते हुए, इस जीवन को जी रहे होते हैं, उन्हें अब किसी भी पीड़ा का अनुभव नहीं होता है, बल्कि वे खुशी से बिना कष्ट के रहते हैं; वे स्वतंत्र रूप से रहते हैं और परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखते हैं। वे अब परमेश्वर के खिलाफ बगावत या विरोध नहीं कर सकते हैं; बल्कि, वे वास्तव में परमेश्वर के प्रभुत्व में रह सकते हैं। वे पूरी तरह से एक सही और उचित जीवन जीते हैं, और वास्तविक मनुष्य बन जाते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना का सर्वाधिक लाभार्थी मनुष्‍य है' से उद्धृत

अंत के दिनों में, इन दिनों में परमेश्वर के कार्य के वर्तमान चरण में, वह मनुष्य को पहले की तरह अनुग्रह एवं आशीषें प्रदान नहीं करता है, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए फुसलाता है। कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिसका उसने अनुभव किया है? मनुष्य ने परमेश्वर के प्रेम को, परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को देखा है। इस समयावधि के दौरान, परमेश्वर मनुष्य का भरण पोषण करता है, उसे सहारा देता है, प्रबुद्ध करता है और उसका मार्गदर्शन करता है, ताकि मनुष्य उसके बोले वचनों को और उसके द्वारा मनुष्य को प्रदत्त सत्य को जानने के लिए धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगे। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब वो हतोत्साहित होता है, जब उसके पास कहीं और जाने के लिए कोई स्थान नहीं होता, तब परमेश्वर मनुष्य को सान्त्वना, सलाह, एवं प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करेगा, ताकि मनुष्य की छोटी कद-काठी धीरे-धीरे मजबूत हो सके, सकारात्मकता में उठ सके और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो सके। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर की अवज्ञा करता है या उसका विरोध करता है, या अपनी भ्रष्टता को प्रकट करता है, तो परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देने में और उसे अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाएगा। हालाँकि, मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता, एवं अपरिपक्वता के प्रति, परमेश्वर सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाएगा। इस तरीके से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बड़ा होता है, और परमेश्वर के इरादों को जानने लगता है, कुछ निश्चित सत्‍यों को जानने लगता है, कौन सी चीज़ें सकारात्मक हैं और कौन सी नकारात्मक हैं, यह जानने लगता है, यह जानने लगता है कि बुराई और अंधकार क्या हैं। परमेश्वर सदैव मनुष्य को ताड़ित एवं अनुशासित करने का ही एकमात्र दृष्टिकोण नहीं रखता है, लेकिन वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य भी नहीं दिखाता है। बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति का, भिन्न-भिन्न तरीकों से, उनके विभिन्न चरणों में और उनके भिन्न-भिन्न स्‍तरों और क्षमता के अनुसार, भरण-पोषण करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक चीज़ें करता है और बड़ी क़ीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत या इन चीज़ों के बारे में कुछ भी महसूस नहीं करता है, फिर भी व्यवहार में, वह जो कुछ करता है उसे सच में हर एक व्यक्ति पर कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम व्यवहारिक है : परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा से बचता है, और इस पूरे समय मनुष्य की दुर्बलता के प्रति, परमेश्वर बार-बार अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, परमेश्वर का मनुष्य को प्रबुद्ध करना एवं उसका मार्गदर्शन, ये सब मानवजाति को सत्य के सार को और भी अधिक जानने देते हैं, और उत्तरोत्तर यह जानने देते हैं कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, वे किसके लिए जीते हैं, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्‍या है, और कैसे आगे के मार्ग पर चलना है। ये सभी कार्य जो परमेश्वर करता है, वे उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो, यह उद्देश्य क्या है? क्यों परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करने के लिए इन विधियों का उपयोग करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है? वह उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है? परमेश्वर जो देखना चाहता है वह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सके। ये विधियाँ जिन्हें वह मनुष्य पर कार्य करने के लिए उपयोग करता है, निरंतर प्रयास हैं, मनुष्य के हृदय को जागृत करने के लिए, मनुष्य की आत्मा को जागृत करने के लिए, मनुष्य को यह जानने में समर्थ बनाने के लिए कि वह कहाँ से आया है, कौन उसका मार्गदर्शन, उसकी सहायता, उसका भरण-पोषण कर रहा है, और किसने मनुष्य को वर्तमान दिन तक जीवित रहने दिया है; वे मनुष्य को यह जानने देने का साधन है कि सृष्टिकर्ता कौन है, उसे किसकी आराधना करनी चाहिए, उसे किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस तरह से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; वे मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने का साधन है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान ले, परमेश्वर के हृदय को समझ ले, और मनुष्य को बचाने के उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ ले। जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब मनुष्य एक पतित एवं भ्रष्ट स्वभाव के साथऔर जीने की इच्छा नहीं करता, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अनुसरण करने की इच्छा करता है। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो मनुष्य खुद को शैतान से पूरी तरह अलग करने में सक्षम हो जाता है। अब उसे शैतान के द्वारा हानि नहीं पहुँचेगी, उसके द्वारा वो अब और नियंत्रित या मूर्ख नहीं बनेगा। इसके बजाय, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए, परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों में सक्रियात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय और बुराई को त्यागने को प्राप्त करता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

मनुष्य शरीर के बीच रहता है, जिसका मतलब है कि वह मानवीय नरक में रहता है, और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के बगैर, मनुष्य शैतान के समान ही अशुद्ध है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस मानता था कि परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा और महान अनुग्रह है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से ही मनुष्य जाग सकता है, और शरीर और शैतान से घृणा कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, उसे उसके खुद के छोटे-से संसार से मुक्त करता है, और उसे परमेश्वर की उपस्थिति के प्रकाश में जीवन बिताने का अवसर देता है। ताड़ना और न्याय से बेहतर कोई उद्धार नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता और मेरा न्याय करता रहेगा, मुझे पता होगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनंद या शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से प्रताड़ित करे, किंतु जब तक तू मुझे छोड़ेगा नहीं, तब तक मेरा हृदय सुकून में रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी बेहतरीन सुरक्षा और महानतम आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। जो अनुग्रह आज तू मुझे देता है वह तेरे धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और ताड़ना और न्याय है; इसके अतिरिक्त, यह एक परीक्षा है, और इससे भी बढ़कर, यह एक कष्टों भरा जीवनयापन है।" पतरस ने दैहिक सुख को एक तरफ रखकर, एक ज्यादा गहरे प्रेम और ज्यादा बड़ी सुरक्षा की खोज की, क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से बहुत सारा अनुग्रह हासिल कर लिया था। अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होकर अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने-आपसे दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके, और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है, और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के सार को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियों को और इस बात को जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। इस प्रकार, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है। शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ, यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो तुमने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है, और परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को सफल नहीं माना जा सकता। परमेश्वर ने अनुग्रह के कार्य के एक चरण को देह में पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें पहले ही प्रदान कर दी हैं—परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। मनुष्य अपने अनुभवों में परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह, उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को पूर्ण बनाने में असमर्थ हैं, और मनुष्य के भीतर के भ्रष्ट तत्वों को प्रकट करने में भी असमर्थ हैं, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं, न उसके प्रेम और विश्वास को पूर्ण बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए उसके अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की दयालुता और मनोरमता की थोड़ी-सी भी समझ है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते, और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों का पालन नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं, लेकिन उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए या पूर्ण नहीं बनाए जाएँगे। परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और उसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का प्रयास करना—यही जागृत रहकर परमेश्वर की आज्ञा मानने का अर्थ है; और परमेश्वर ऐसा ही विश्वास चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के अलावा कुछ नहीं करते, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, प्रेम तथा धैर्य सभी सतही होते हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं, वे परमेश्वर को सच्चे अर्थ में नहीं जान सकते, यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान भी जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला ही होता है, और वे "परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है", या "परमेश्वर मनुष्य के प्रति करुणामय है" जैसी बातें करते हैं। यह मनुष्य के जीवन का द्योतक नहीं है, न ही इससे यह सिद्ध होता है कि लोग सचमुच परमेश्वर को जानते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर तथाकथित "पूर्वी एशिया के बीमार मनुष्य" में काम कर पाया है यह उसकी महान सामर्थ्य है। यह उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता है। हमारे प्रति उसके कठोर वचनों या ताड़ना की परवाह के बिना, हमें उसकी विनम्रता के लिए अपने दिल की गहराई से उसकी स्तुति करनी चाहिए, और इसके लिए बिल्कुल अंत तक उससे प्रेम करना चाहिए। जिन लोगों को शैतान द्वारा हजारों वर्षों से बाध्य किया गया है, उन्होंने उसके प्रभाव के अधीन रहना जारी रखा हुआ है और उसे ठुकराया नहीं है। उन्होंने कड़ुवाहट के साथ टटोलना और संघर्ष करना जारी रखा है। अतीत में वे धूप जलाया करते थे और शैतान के आगे झुकते और उसे प्रतिष्ठापित किया करते थे, और वे परिवार और दुनियावी उलझनों और साथ ही सामाजिक अंतःक्रियाओं से कस कर बँधे हुए थे। वे उन्हें ठुकराने में असमर्थ थे। इस प्रकार के गला-काट-प्रतियोगिता वाले समाज में, कोई भी एक सार्थक जीवन कहाँ प्राप्त कर सकता है? लोग जिसका वर्णन करते हैं वह पीड़ा का जीवन है, और सौभाग्य से, परमेश्वर ने इन निर्दोष लोगों को बचाया है, हमारे जीवन को अपनी देखभाल और अपने संरक्षण के अधीन रखा है, ताकि हमारी जिंदगियाँ आनंदित रहें और चिंता से अब और भरी न हों। अभी तक हमने उसके अनुग्रह के अधीन रहना जारी रखा है। क्या यह परमेश्वर का आशीष नहीं है? किसी में भी कैसे परमेश्वर से अतिव्ययी माँग करने की धृष्टता हो सकती है? क्या उसने हमें इतना कम दिया है? क्या तुम लोग अभी भी संतुष्ट नहीं हो? मुझे लगता है कि हमारे लिए परमेश्वर का प्यार चुकाने का समय आ गया है। हम उपहास, अपयश और उत्पीड़न की कोई छोटी मात्रा नहीं भुगत सकते हैं क्योंकि हम परमेश्वर में विश्वास के मार्ग का अनुसरण करते हैं, बल्कि मेरा मानना है कि यह एक सार्थक चीज़ है। यह एक महिमा की बात है, शर्म की नहीं, और कुछ भी हो, बहुत से आशीष हैं जिनका हम आनंद लेते हैं। असंख्यों बार निराश होने पर, परमेश्वर के वचनों ने आराम पहुँचाया है, और इससे पहले कि यह हमें पता चले, दुःख प्रसन्नता में पलट गया है। असंख्यों बार आवश्यकता पड़ने पर, परमेश्वर आशीषों को लाया है और उसके वचनों के माध्यम से हमारा भरण-पोषण किया गया है। असंख्यों बार बीमार पड़ने पर, परमेश्वर के वचनों ने जीवन प्रदान किया है—हमें ख़तरे से मुक्त किया गया है, और खतरे से सुरक्षा में पलट दिया है। तुम महसूस किए बिना पहले से ही इन जैसी बहुत सी चीज़ों का आनंद उठा चुके हो। क्या तुम्हें इसमे से कुछ भी याद नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मार्ग... (2)' से उद्धृत

जैसे-जैसे लोग बड़े होते हैं, शैतान की निगाह उनमें से प्रत्येक पर जम जाती है, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। परन्तु अपने कार्य को करने में, परमेश्वर कभी भी लोगों, घटनाओं या चीज़ों, अन्तराल या समय की सीमाओं के अधीन नहीं रहा है; वह वही करता है जो उसे करना चाहिए और वही करता है जो उसे करना चाहिए। बड़े होने की प्रक्रिया में, हो सकता है कि तुम कई चीज़ों का सामना कर सकते हो जो तुम्हारी पसन्द की न हों, जैसे कि बीमारी एवं कुंठा। परन्तु जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम्हारा जीवन और तुम्हारा भविष्य पूरी तह से परमेश्वर की देखरेख के अधीन होता है। परमेश्वर तुम्हें एक विशुद्ध गारंटी देता है जो सम्पूर्ण जीवन भर बनी रहती है, क्योंकि वह, तुम्हारी रक्षा करते हुए और तुम्हारी देखभाल करते हुए, बिलकुल तुम्हारे बगल में ही है। तुम इस बात से अनजान रहते हुए बड़े होते हो। तुम नई-नई चीज़ों के सम्पर्क में आने लगते हो और इस संसार को और इस मानवजाति को जानना आरम्भ करते हो। तुम्हारे लिए हर एक चीज़ ताज़ी और नयी होती है। कुछ बातें हैं जो तुम्हें करनी अच्छी लगती हैं। तुम अपनी मानवता के भीतर रहते हो, अपने दायरे के भीतर जीते हो, और तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जरा-सी भी अनुभूति नहीं होती है। परन्तु जैसे-जैसे तुम बड़े होते हो परमेश्वर मार्ग के हर कदम पर तुम्हें देखता है, और तुम्हें देखता है जब तुम आगे की ओर हर कदम उठाते हो। यहाँ तक कि जब तुम ज्ञान की बातें सीखते हो, या विज्ञान का अध्ययन करते हो, तब एक कदम के लिए भी परमेश्वर ने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा है। इस मामले में तुम भी अन्य लोगों के ही समान हो, इस संसार को जानने और उसके जुडने के दौरान, तुमने अपने स्वयं के आदर्शों को स्थापित कर लिया है, तुम्हारे अपने शौक, तुम्हारी स्वयं की रूचियाँ हैं, और तुम ऊँची महत्वाकांक्षाओं को भी मन में रखते हो। तुम प्रायः अपने स्वयं के भविष्य पर विचार करते हो, प्राय: रूपरेखा खींचते हो कि तुम्हारा भविष्य कैसा दिखना चाहिए। परन्तु मार्ग पर जो भी होता है, परमेश्वर स्पष्टता से सब कुछ होते हुए देखता है। हो सकता है कि तुम स्वयं अपने अतीत को भूल गए हो, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कोई नहीं है जो उससे बेहतर तुम्हें समझ सकता है। तुम बड़े होते हुए, परिपक्व होते हुए, परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीते हो। इस अवधि के दौरान, परमेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुछ ऐसा है जिसका कोई कभी एहसास नहीं करता है, कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता है। परमेश्वर निश्चित रूप से किसी को इसके बारे में नहीं बताता है। तो, सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? कहा जा सकता है कि यह एक गारंटी है कि परमेश्वर एक व्यक्ति को बचाएगा। इसका अर्थ है कि अगर परमेश्वर इस व्यक्ति को बचाना चाहता है, तो उसे यह करना ही होगा। यह कार्य मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्या तुम जानते हो ये क्या है? क्या तुम लोग यह जानते हो? ऐसा लगता है कि तुम लोगों के पास इसके बारे में कोई अनुभूति नहीं है, या इसके बारे में कोई धारणा नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों को बताऊँगा। जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर ने तुम पर बहुत सा कार्य सम्पन्न किया है, परन्तु हर चीज़ जो उसने की है वह उसका तुम्हें विस्तृत विवरण नहीं देता है। परमेश्वर ने यह जानने की तुम्हें अनुमति नहीं दी, न ही उसने तुम्हें बताया। हालाँकि, मानवजाति के लिए, हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह महत्वपूर्ण है। जहाँ तक परमेश्वर की बात है, यह कुछ ऐसी चीज़ है जो उसे अवश्य करनी चाहिए। उसके हृदय में ऐसी कोई महत्वपूर्ण चीज़ है जो उसे करनी है, जो इन चीज़ों में से किसी से भी कहीं बढ़कर है। अर्थात, जब एक व्यक्ति पैदा होता है, उस समय से लेकर वर्तमान दिन तक, परमेश्वर को उसकी सुरक्षा की गारंटी अवश्य देनी चाहिए। इन वचनों को सुनने के बाद, हो सकता है कि तुम लोग ऐसा महसूस करो मानो कि तुम लोगों को पूरी तरह समझ नहीं आ रहा है। तुम पूछ सकते हो, "क्या यह सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है?" "सुरक्षा" का शाब्दिक अर्थ क्या है? हो सकता है कि तुम लोग इसका अर्थ शांति समझते हो या हो सकता है कि तुम लोग इसका अर्थ कभी भी विपत्ति या आपदा का अनुभव न करना, अच्छी तरह से जीवन बिताना, एक सामान्य जीवन बिताना समझते हो। परन्तु अपने हृदय में, तुम लोगों को जानना चाहिए कि यह इतना सरल नहीं है। तो आखिर यह क्या चीज़ है जिसके बारे में मैं बात करता रहा हूँ, जिसे परमेश्वर को करना है? परमेश्वर के लिए सुरक्षा का क्या अर्थ है? क्या यह वास्तव में "सुरक्षा" के सामान्य अर्थ की गारंटी है? नहीं। तो वह क्या है जो परमेश्वर करता है? इस "सुरक्षा" का अर्थ यह है कि तुम शैतान के द्वारा निगले नहीं जाओगे। क्या यह महत्वपूर्ण है? शैतान के द्वारा निगला नहीं जाना, यह तुम्हारी सुरक्षा से सम्बन्धित है या नहीं? हाँ, यह तुम्हारी व्यक्तिगत सुरक्षा से सम्बन्धित है, और इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता है। जब एक बार तुम शैतान के द्वारा निगल लिए जाते हो, तो तुम्हारी आत्मा और तुम्हारा शरीर परमेश्वर से संबंधित नहीं रह जाता है। परमेश्वर तुम्हें अब और नहीं बचाएगा। परमेश्वर इस तरह की आत्माओं और लोगों को त्याग देता है जो शैतान द्वारा निगले जा चुके हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो परमेश्वर को करनी है वह है तुम्हारी इस सुरक्षा की गारंटी देना, यह गारंटी देना कि तुम शैतान के द्वारा निगले नहीं जाओगे। यह बहुत महत्वपूर्ण है, है न? तो तुम लोग उत्तर क्यों नहीं दे पा रहे हो? लगता है कि तुम लोग परमेश्वर की महान दया को महसूस नहीं कर पा रहे हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

पिछले कई दशकों के अपने जीवन के दौरान, अय्यूब ने यहोवा के कर्म देखे थे और अपने लिए यहोवा परमेश्वर के आशीष प्राप्त किए थे। वे ऐसे आशीष थे जिन्होंने उसे अत्यंत असहज और ऋणी महसूस करते छोड़ दिया था, क्योंकि वह मानता था कि उसने परमेश्वर के लिए कुछ भी नहीं किया था, फिर भी उसे इतने बड़े आशीष वसीयत में दिए गए थे और उसने इतने अधिक अनुग्रह का आनंद लिया था। इस कारण से, वह प्रायः अपने हृदय में प्रार्थना करता था, यह आशा करते हुए कि वह परमेश्वर का ऋण चुका पाएगा, यह आशा करते हुए कि उसे परमेश्वर के कर्मों और महानता की गवाही देने का अवसर मिलेगा, और यह आशा करते हुए कि परमेश्वर उसकी आज्ञाकारिता की परीक्षा लेगा, और, इससे बढ़कर, यह भी कि उसके विश्वास को शुद्ध किया जा सकता था, जब तक कि उसकी आज्ञाकारिता और उसका विश्वास परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर लेते हैं। फिर, जब परीक्षण अय्यूब के ऊपर आ पड़ा, तो उसने मान लिया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाएँ सुन ली हैं। अय्यूब ने यह अवसर किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर सँजोया, और इस प्रकार उसने इसे हल्के ढंग से बरतने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि उसकी जीवन भर की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो सकती थी। इस अवसर के आगमन का अर्थ था कि उसकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर के भय की परीक्षा ली जा सकती थी, और उन्हें शुद्ध किया जा सकता था। इतना ही नहीं, इसका अर्थ था कि अय्यूब के पास परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का एक अवसर था, जो उसे इस प्रकार परमेश्वर के और क़रीब ला रहा था। परीक्षण के दौरान, ऐसे विश्वास और अनुसरण ने उसे और अधिक पूर्ण होने दिया, और परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्राप्त करने दी। अय्यूब परमेश्वर के आशीषों और अनुग्रहों के लिए और अधिक कृतज्ञ हो गया, अपने हृदय में उसने परमेश्वर के कर्मों पर और अधिक स्तुति की झ़ड़ी लगा दी, और वह परमेश्वर के प्रति और अधिक भयभीत और श्रद्धालु था, और परमेश्वर की सुंदरता, महानता तथा पवित्रता के लिए और अधिक लालायित था। इस समय, यद्यपि परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब अब भी वह व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, फिर भी उसके अनुभवों को मानते हुए, अय्यूब का विश्वास और ज्ञान बहुत तेज़ी से कई गुना बढ़ गया था : उसके विश्वास में बढ़ोतरी हुई थी, उसकी आज्ञाकारिता को पाँव रखने की जगह मिल गई थी, और परमेश्वर के प्रति उसका भय और अधिक गहरा हो चुका था। यद्यपि इस परीक्षण ने अय्यूब की आत्मा और जीवन को रूपांतरित कर दिया, फिर भी ऐसे रूपांतरण ने अय्यूब को संतुष्ट नहीं किया, न ही इसने उसकी आगे की प्रगति को धीमा किया। साथ ही साथ, इस परीक्षण से उसने जो प्राप्त किया था उसका हिसाब लगाते हुए, और स्वयं अपनी कमियों पर विचार करते हुए, उसने ख़ामोशी से प्रार्थना की, अगले परीक्षण के अपने ऊपर आने की प्रतीक्षा करने लगा, क्योंकि वह अपने विश्वास, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के प्रति भय को परमेश्वर के अगले परीक्षण के दौरान ऊँचा उठाने के लिए लालायित था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अपने हृदय में, अय्यूब गहराई से मानता था कि उसके पास जो कुछ भी था वह सब परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान किया गया था, और उसके अपने श्रम की उपज नहीं था। इस प्रकार, वह इन आशीषों को कोई ऐसी चीज़ के रूप में नहीं देखता था जिसका लाभ उठाया जाए, बल्कि इसके बजाय उसने अपने जीवित रहने के सिद्धांतों का सहारा लेकर उस मार्ग को अपनी पूरी शक्ति से थामे रखा जो उसे थामना ही चाहिए था। उसने परमेश्वर की आशीषों को सँजोकर रखा और उनके लिए धन्यवाद दिया, किंतु वह आशीषों से आसक्त नहीं था, न ही उसने और अधिक आशीषों की खोज की। ऐसी थी उसकी प्रवृत्ति संपत्ति के प्रति। उसने आशीष प्राप्त करने की ख़ातिर न तो कभी कुछ किया था, न ही वह परमेश्वर के आशीषों के अभाव या हानि से चिंतित या व्यथित था; वह परमेश्वर के आशीषों के कारण न तो ख़ुशी से पागल या उन्मत्त हुआ था, न ही उसने बारंबार आनंद लिए गए इन आशीषों के कारण परमेश्वर के मार्ग की उपेक्षा की या परमेश्वर का अनुग्रह विस्मृत किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अब्राहम ने इसहाक को बलिदान किया—तुमने किसे बलिदान किया है? अय्यूब ने सब-कुछ बलिदान किया—तुमने क्या बलिदान किया है? इतने सारे लोगों ने अपना जीवन दिया है, अपने सिर कुर्बान किए हैं, अपना खून बहाया है, सही राह तलाशने के लिए। क्या तुम लोगों ने वह कीमत चुकाई है? उनकी तुलना में तुम इस महान अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हो। तो क्या आज यह कहना तुम्हारे साथ अन्याय करना है कि तुम लोग मोआब के वंशज हो? तुम लोग खुद को बहुत ऊँचा मत समझो। तुम्हारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा महान उद्धार, ऐसा महान अनुग्रह तुम लोगों को मुफ्त में दिया जा रहा है। तुम लोगों ने कुछ भी बलिदान नहीं किया है, फिर भी तुम अनुग्रह का मुफ्त आनंद उठा रहे हो। क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या यह सच्चा मार्ग तुम लोगों ने स्वयं खोजा और पाया था? क्या पवित्र आत्मा ने तुम लोगों को इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया? तुम लोगों के पास कभी भी एक खोजने वाला दिल नहीं था, सत्य की खोज करने वाला और उसकी लालसा रखने वाला दिल तो बिलकुल भी नहीं था। तुम बस बैठे-बिठाए इसका आनंद ले रहे हो; तुमने इस सत्य को ज़रा भी प्रयास किए बिना पाया है। तुम्हें शिकायत करने का क्या अधिकार है? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मोल सबसे बड़ा है? उन लोगों की तुलना में, जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान किया और अपना रक्त बहाया, तुम लोगों के पास शिकायत करने को क्या है? अब तुम लोगों को नष्ट करना सही और स्वाभाविक होगा! तुम्हारे पास आज्ञा का पालन और अनुसरण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। तुम लोग बस योग्य नहीं हो! तुम्हारे बीच में से अधिकतर लोगों को बुलाया गया था, लेकिन अगर तुम्हें तुम्हारे परिवेश ने मजबूर नहीं किया होता या अगर तुम्हें बुलाया नहीं गया होता, तो तुम लोग बाहर आने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक होते। ऐसे त्याग को लेने के लिए कौन तैयार है? देह का सुख छोड़ने के लिए कौन तैयार है? तुम सब वे लोग हो, जो लालच के साथ आराम से ऐश करते हैं और एक विलासी जीवन की चाह रखते हैं! तुम लोगों को इतने बड़े आशीष मिल गए हैं—तुम्हें और क्या कहना है? तुम्हें क्या शिकायतें हैं? तुम लोगों को स्वर्ग में सबसे बड़े आशीषों और सबसे बड़े अनुग्रह का आनंद लेने दिया गया है, और जो कार्य पृथ्वी पर पहले कभी नहीं किया गया था, उसे आज तुम पर प्रकट किया गया है, क्या यह एक आशीष नहीं है? आज तुम्हारी इसलिए इतनी ताड़ना की गई है, क्योंकि तुम लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है और उसके खिलाफ विद्रोह किया है। इस ताड़ना के कारण तुम लोगों ने परमेश्वर की दया और प्रेम देखा है, और उससे भी अधिक तुमने उसकी धार्मिकता और पवित्रता देखी है। इस ताड़ना की वजह से और मानव की गंदगी के कारण, तुम लोगों ने परमेश्वर की महान शक्ति देखी है, और उसकी पवित्रता और महानता देखी है। क्या यह एक दुर्लभतम सत्य नहीं है? क्या यह एक अर्थपूर्ण जीवन नहीं है? परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थ से भरा है! अतः जितनी निम्न तुम लोगों की स्थिति है, उतना अधिक वह यह साबित करती है कि परमेश्वर ने तुम्हारा उत्थान किया है, और उतना ही अधिक आज तुम लोगों पर उसके कार्य का महान मूल्य साबित होता है। यह बस एक अनमोल खजाना है, जो कहीं और नहीं पाया जा सकता! युगों तक किसी ने भी ऐसे महान उद्धार का आनंद नहीं लिया है। यह तथ्य कि तुम्हारी स्थिति निम्न है, यह दर्शाता है कि परमेश्वर का उद्धार कितना महान है, और यह दर्शाता है कि परमेश्वर मानवजाति के प्रति वफादार है—वह बचाता है, नष्ट नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

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