63. अगुआओं और कार्यकर्ताओं के चुनाव के सिद्धांत

(1) यह सर्वथा उचित है कि जो लोग अगुआओं और कार्यकर्ताओं के तौर पर चुने गए हों उन्‍हें सत्‍य की स्‍पष्‍ट समझ हो और वे उसे स्‍वीकार कर सकते हों; उन्‍हें सत्‍य का अनुसरण करने वाला और अच्छी क्षमता वाला होना चाहिए।

(2) अहंकारी स्‍वभाव के तमाम लोगों को समान रूप से बुरा नहीं समझना चाहिए। अगर कोई व्‍यक्ति सत्‍य को स्‍वीकार करने और व्‍यावहारिक कार्य करने में सक्षम हैं, तो उन्‍हें चुना जा सकता है।

(3) जिन अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने अतीत में अपराध किए हैं और इस वजह से वे बर्खास्त किए गए हैं, उन्‍होंने अगर सच्‍चे मन से पश्‍चाताप कर लिया है, तो वे चुने जा सकते हैं।

(4) अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में चुने गए लोग उन लोगों में सर्वश्रेष्‍ठ होने चाहिए जो सत्‍य पर सहभागिता के माध्‍यम से समस्‍याएँ सुलझाने में अपेक्षाकृत सक्षम हों और जो व्‍यावहारिक कार्य कर सकते हों।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित किया है, जिसमें हर सामाजिक वर्ग के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन स्वयं की इच्छा को पूरा करना और पृथ्वी पर अपने कार्य को सुचारु रूप से पूरा करना है। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसका यह कार्य परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को लोगों के समक्ष बेहतर ढंग से ज़ाहिर करता है। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग, लोगों का यह समूह, भाग्यशाली है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, परमेश्वर ने तुम लोगों का स्तर बढ़ा दिया है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष उसकी सेवा करते हैं, ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा का कार्य है; और इसलिए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए' से उद्धृत

चुनावों के दौरान बहुत-से लोग यह समझने में असफल रहते हैं कि अगुआ चुनने के सच्चे सिद्धांत क्या हैं, उन्हें किस तरह के व्यक्ति को अगुआ के रूप में चुनना चाहिए, और किस तरह का व्यक्ति अगुआ के रूप में भाई-बहनों को परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में ले जा सकता है, और अगुआ बनने के लिए उपयुक्त है; वे ऐसी चीजों के बारे में बहुत जागरूक या स्पष्ट नहीं होते। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं, जो चुनावों के दौरान जान-बूझकर नकली अगुआओं का चुनाव करते हैं; जो भी कोई नकली अगुआ होता है, वे उसी को चुन लेते हैं और उन लोगों से आँखें मूँद लेते हैं जो वास्तव में इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त और अगुआ बनने में सक्षम होते हैं, जिनमें अगुआ बनने की क्षमता और मानवता होती है। अगुआ होने की क्षमता और मानवता से रहित लोग उन चीजों की वजह से चुने जाते हैं, जिन्हें लोग अपनी धारणाओं में अच्छा मानते हैं, जैसे कि जुनून या अच्छे व्यवहार की बाहरी प्रतीति, आदि; जबकि जो लोग वास्तव में अगुआ होने के असंख्य मानदंड पूरे करते हैं, वे कभी नहीं चुने जाते। ध्यान आकर्षित करने के इच्छुक वे लोग, जो उत्साह से खुद को खपाते हैं लेकिन काम करने की क्षमता से रहित होते हैं, हर प्रसंग में पाए जा सकते हैं; वे बेहद सकारात्मक लगते हैं, और ज्यादातर लोग उन्हें अगुआ बनने के योग्य मानते हैं, और सोचते हैं कि उन्हें ऐसे लोगों को चुनना चाहिए। लेकिन नतीजा यह होता है कि जब वे लोग चुन लिए जाते हैं, तो उनके लिए काम बहुत ज्यादा हो जाता है, और वे उच्च की कोई भी कार्य-व्यवस्था पूरी करने में असमर्थ रहते हैं, वे नहीं जानते कि उन्हें कैसे पूरा किया जाए। वे पूरे दिन सक्रिय रहते हैं, लेकिन कलीसिया के किसी भी काम में कोई सुधार या प्रगति नहीं होती, और कलीसिया में अकसर ऐसी स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं, जिनके परिणामस्वरूप दुष्ट लोग सत्ता का इस्तेमाल करने लगते हैं या उसे हासिल कर लेते हैं, कलीसिया का काम आकाश-कुसुम हो जाता है, या ऐसा, जिसमें लोग दिल से जुदा होते हैं। यह परिणाम तब होता है, जब नकली अगुआ काम करते हैं। नकली अगुआओं का चुनाव न केवल भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश को प्रभावित करता और उसे नुकसान पहुँचाता है, बल्कि परमेश्वर के घर के समस्त कार्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है; वह इस कार्य को सफलतापूर्वक आगे बढ़ने से रोक देता है और उसके प्रभावी ढंग से किए जाने को बाधित करता है। आंशिक रूप से यह स्वयं नकली अगुआओं से जुड़ी समस्या है, और आंशिक रूप से यह उनमें से प्रत्येक से जुड़ी है जो उन्हें चुनते हैं। तुम उनका असल व्यक्तित्व नहीं पहचान पाते, तुम अंधे होते हो और उनकी असलियत नहीं देखते, और तुम सत्य-सिद्धांतों को नहीं समझते; उन्हें चुनकर तुम न केवल खुद को और दूसरों को चोट पहुँचाते हो, बल्कि परमेश्वर के घर का काम भी संकट में पड़ जाता है। नकली अगुआओं के कारण लोगों और परमेश्वर के कार्य पर ऐसा प्रभाव पड़ता और उनका ऐसा नुकसान होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (1)' से उद्धृत

योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में एक मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

विभिन्न कामों के प्रभारियों से कौन-से मानक अपेक्षित हैं? सबसे बढ़कर, उन्हें सत्य समझने में सक्षम होना चाहिए; उनमें सत्य समझने की क्षमता होनी चाहिए। ये सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। अधिक विशेष रूप से, उन्हें आध्यात्मिक चीजें समझनी चाहिए, बिना सहायता के परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में सक्षम होना चाहिए, उसके वचनों में अभ्यास के लिए सिद्धांतों को खोजने में सक्षम होना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के माध्यम से उन विभिन्न अवस्थाओं को समझने में सक्षम होना चाहिए, जिनमें लोग खुद को पाते हैं। उन्हें अपने आप अनुभव करने में सक्षम होना चाहिए; कोई समस्या सामने आने पर उन्हें अपने बारे में चिंतन करने, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित किए जाने वाले परिवेशों का अनुभव करने और वे सबक सीखने में, जो उन्हें सीखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों का उपयोग करने में उपयुक्त होना चाहिए। सत्य समझने की योग्यता और क्षमता का होना पहली चीज है, जो उनसे अपेक्षित है। निस्संदेह, ऐसे लोगों में विवेक और समझ भी होनी चाहिए और उनकी मानवता अपेक्षित स्तर की होनी चाहिए। दूसरे, उन्हें कोई दायित्व उठाना चाहिए। यदि वे केवल अच्छी क्षमता के हैं और सत्य समझने में सक्षम हैं, लेकिन आलसी हैं और दैहिक सुखों की लालसा करते हैं, यदि वे केवल तभी काम करते हैं जब जरूरत होती है या जब उच्च संकेत करता है, और जब वे काम करते भी हैं तो केवल बेमन से करते हैं और शायद ही कभी मूलभूत स्तर पर संलग्न होते हैं, और यदि वे पीड़ा सहने या कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं होते और कोई बोझ नहीं उठाते, तो क्या उन्हें ऐसी प्रतिभाएँ माना जा सकता है, जो विकसित किए जाने योग्य हैं? (नहीं।) तो, यह दूसरी अपेक्षा है : ऐसे लोगों को बोझ उठाना चाहिए। तीसरी बात यह है कि उन्हें अपने काम में सक्षम होना चाहिए। अर्थात्, परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य निष्पादित करने के अलावा, उन्हें कोई विशेष कार्य करते समय समस्याओं की पहचान करने और उन्हें तुरंत हल करने में सक्षम होना चाहिए; उन्हें अपना काम प्रभावी ढंग से और गहराई से करना चाहिए, और उसे लापरवाही से नहीं करना चाहिए; साथ ही, उन्हें यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं में उन्हें कौन-सा कार्य करना चाहिए, और साथ ही उन कार्य-व्यवस्थाओं को लागू करना और उन्हें सही ढंग से पूरा करना चाहिए। यदि उन्हें कोई कार्य करते समय किसी समस्या का पता चले, तो उन्हें परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के विनियमों के संदर्भ में उसे सँभालने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें विशेष चीजों या परिस्थितियों को उनके वास्तविक रूप में समझने में भी सक्षम होना चाहिए, और उस आधार पर सटीक निर्णय लेने और फिर सही समाधान प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए। अपने काम में सक्षम होने का यही मतलब है। अपने काम में सक्षम होने का अर्थ मुख्य रूप से कार्य के प्रमुख बिंदुओं को समझने, समस्याओं की तुरंत पहचान करने और उन्हें सिद्धांत के अनुसार हल करने में सक्षम होना है—अर्थात् अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम होना। जब उच्च ने कोई कार्य सौंप दिया है और कुछ सिद्धांत भी संप्रेषित कर दिए हैं, तो इन लोगों को सिद्धांतों को समझने और उनके अनुसार कार्य निष्पादित करने में सक्षम होना चाहिए; उन्हें मूलत: बहुत अधिक विचलनों या बहुत अधिक चूकों के बिना सही कार्य-प्रणाली का अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए। सक्षम होने का यही अर्थ है। उदाहरण के तौर पर : जब परमेश्वर का घर सिद्धांत के अनुसार लोगों को परिष्कृत और निष्कासित करने के लिए और मसीह-विरोधियों और दुष्टों को पहचानने के लिए कहता है, तो सक्षम लोग मूलत: इस कार्य को करते समय विचलित नहीं होते। मसीह-विरोधियों के प्रकट होने पर उन्हें उजागर और निष्कासित किए जाने में देर नहीं लगती; जो सक्षम हैं, वे मसीह-विरोधियों की जल्दी से पहचान करने में सक्षम होते हैं, साथ ही अपने भाई-बहनों की भी उन्हें पहचानने और ठगे न जाने में मदद करते हैं। एक-साथ मिलकर हर कोई मसीह-विरोधियों को उजागर करने और त्यागने, और अंततः उन्हें निकालने में सफल होता है। जब सक्षम लोगों का अपने काम के दायरे में मसीह-विरोधियों या दुष्टों से सामना होता है, तो उनके कम से कम पंचानवे प्रतिशत भाई-बहन ठगे नहीं जाते या प्रभावित नहीं होते; कभी-कभी तो एक भी धोखा नहीं खाता या गुमराह नहीं होता। अच्छी क्षमता वाले और अपने काम में सक्षम लोग ऐसे ही होते हैं; ऐसे लोग सत्य-वास्तविकता से युक्त अगुआ और कार्यकर्ता होने के योग्य होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

कुछ लोग किसी नकली आध्यात्मिक व्यक्ति को अगुआ के रूप में चुनकर बहुत खुश महसूस करते हैं और सोचते हैं, "अब हमारे पास एक अच्छा अगुआ है। हमारा अगुआ एक महान उपदेशक है। उसका उपदेश बहुत अर्थपूर्ण है, और एक ही उपदेश कई घंटों तक चल सकता है, और वह कई दिनों तक ऐसा कर सकता है। जब वह उपदेश देता है, तो हर किसी की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। हम अपने अगुआ से इतने जुड़े हुए हैं और उससे अलग होने के इतने अनिच्छुक हैं कि अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए भी नहीं जाना चाहते।" लेकिन जब वे अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो उन्हें एहसास होता है, "ऐसा कैसे है कि मुझे अब कुछ समझ नहीं आ रहा है? ऐसा कैसे है कि जैसे ही मैं व्यावहारिक काम में हाथ डालता हूँ, मुझे वह समझ में नहीं आता? इस काम में अभी भी बहुत सारी समस्याएँ हैं! अपने अगुआ की संगति सुनने के बाद हम सब इतने उत्साहित हो गए थे, तो फिर हम अपने काम में आने वाली समस्याओं का समाधान क्यों नहीं कर पाते? अगर हम सब उत्साहित हैं, तो क्या इनका समाधान नहीं हो सकता? सच तो यह है कि ये समस्याएँ उठनी ही नहीं चाहिए।" यहाँ मुद्दा क्या है? इस तरह के नकली अगुआ के सब उपदेश मात्र शब्द और सिद्धांत, खोखली बातें, नारे और बकवास हैं। वे तुम्हारी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। इन नकली अगुआओं ने तुम्हें धोखा दिया है। वे भ्रमों से तुम्हारा पेट भर रहे हैं। कुछ नारे लगाकर वे तुम्हें यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि तुम्हारी समस्याओं का समाधान हो गया है। अगर उन्होंने संगति में समस्या का विशेष रूप से समाधान नहीं किया है, तो वास्तव में तुम्हारी समस्या का समाधान कैसे हो सकता है? उनके उपदेश सभी समस्याओं के ऊपर से उड़ जाते हैं और उन सभी समस्याओं को खोखले भाषण और खोखली वाक्पटुता से टाल देते हैं। वे अपनी संगति में समस्याओं का समाधान नहीं करते, बल्कि किसी सिद्धांत झाड़ने वाले विद्वान की तरह केवल नारों और सिद्धांतों का उपदेश देते हैं। वे नहीं जानते कि अभ्यास क्या होता है, और उनके उपदेशों का उन समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं होता जो अभ्यास की बारी आने पर उत्पन्न होती हैं। यह केवल एक प्रकार की शिक्षा है, एक प्रकार का ज्ञान या सिद्धांत है। इस प्रकार का नकली अगुआ परमेश्वर के वचनों और सत्य को, केवल अक्षरों और शब्दों से युक्त एक प्रकार का सिद्धांत या उपदेश देने के लिए एक प्रकार का नारा मानता है, और सभी वास्तविक समस्याओं से परहेज करता है। और परिणाम क्या होता है? जितनी देर तक वे उपदेश देते हैं, सभी लोग ऊर्जा का एक तेज प्रवाह प्राप्त करते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। सत्य वास्तविकता से कटा हुआ नहीं होता, बल्कि वास्तविकता से और अभ्यास में मौजूद समस्याओं के हर पहलू से जुड़ा होता है। तो, अगर तुम लोगों का दोबारा इस तरह के किसी छद्म आध्यात्मिक नकली अगुआ से सामना हो तो, क्या तुम पहचान पाओगे? अगर तुम लोग न पहचान पाओ, तो जिसे तुम लोग अगुआ के रूप में चुनना चाहते हो, उसे पहले कुछ समस्याओं का समाधान करने दो। अगर वह उन्हें सिद्धांतों के अनुसार हल करे और परिणाम काफी अच्छे हों, और वह उन समस्याओं को सत्य-वास्तविकता से हल करे, तो उसे चुन लो। अगर वह समस्याओं के सार के बारे में, समस्याओं की उनके वास्तविक रूप में बात करने से बचे, और केवल सिद्धांतों और नारों का उपदेश दे, तो तुम उसे नहीं चुन सकते। क्यों नहीं? (क्योंकि वह व्यावहारिक समस्याएँ हल करने में असमर्थ है।) और यह व्यक्ति कौन है, जो व्यावहारिक समस्याएँ हल नहीं कर सकता? चूँकि वह केवल सिद्धांत के अक्षरों और शब्दों का ही उपदेश दे सकता है, इसलिए वह एक पाखंडी, छद्म आध्यात्मिक फरीसी होता है। उसमें सत्य को समझने की काबिलियत या समस्याएँ हल करने की क्षमता नहीं होती, और वह समस्याएँ हल करने में असमर्थ होता है। इसलिए अगर तुम उसे अपना अगुआ चुनते हो, तो उसका नकली अगुआ होना निश्चित है। वह अगुआ का काम करने या उसकी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में असमर्थ होता है। इसलिए, जब तुम उसे चुनते हो, तो क्या तुम उसे नुकसान नहीं पहुँचा रहे होते? कुछ लोग कहेंगे, "यह उसे नुकसान पहुँचाना कैसे है? हम उसे सर्वोत्तम इरादों के साथ चुनते हैं। उसमें कुछ क्षमता होती है, और अगर हम उसे चुनते हैं, तो क्या हमारे पास काम करने के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति नहीं होगा?" एक जिम्मेदार व्यक्ति का होना महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर वह व्यक्ति ऐसा होने में असमर्थ है और केवल खोखली बात करता है, जिसमें चीजें अपने वास्तविक रूप में शामिल नहीं होतीं और जो समस्याएँ हल करने में कोई मदद नहीं करती, तो उसे चुनकर क्या तुम उसे बुराई करने का मौका नहीं दे रहे? क्या तुम उसे नकली अगुआई के मार्ग पर चलने के लिए मजबूर नहीं कर रहे? इसीलिए तुम ऐसे व्यक्ति को अपना अगुआ नहीं चुन सकते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

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