63. अगुआओं और कार्यकर्ताओं के चुनाव के सिद्धान्‍त

(1) यह सर्वथा उचित है कि जो लोग अगुआओं और कर्मचारियों के तौर पर चुने गये हों उन्‍हें सत्‍य की स्‍पष्‍ट समझ हो और वे उसे स्‍वीकार कर सकते हों; उन्‍हें सत्‍य का अनुसरण करना चाहिए और उन्‍हें पर्याप्‍त काबिल होना चाहिए;

(2) अहंकारी स्‍वभाव के तमाम लोगों को समान रूप से बुरा नहीं समझना चाहिए। अगर कोई व्‍यक्ति सत्‍य को स्‍वीकार करने और व्‍यावहारिक कार्य करने में सक्षम हैं, तो उन्‍हें चुना जा सकता है;

(3) जिन अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने अतीत में अपराध किये हैं और इस वजह से वे बरखास्‍त किये गये हैं, उन्‍होंने अगर सच्‍चे मन से पश्‍चाताप कर लिया है, तो वे चुने जा सकते हैं;

(4) अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में चुने गये लोग उन लोगों में सर्वश्रेष्‍ठ होने चाहिए जो सत्‍य पर संवाद के माध्‍यम से समस्‍याएँ सुलझाने में अपेक्षाकृत सक्षम हों और जो व्‍यावहारिक कार्य कर सकते हों।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित किया है, जिसमें हर सामाजिक वर्ग के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन स्वयं की इच्छा को पूरा करना और पृथ्वी पर अपने कार्य को सुचारु रूप से पूरा करना है। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसका यह कार्य परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को लोगों के समक्ष बेहतर ढंग से ज़ाहिर करता है। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग, लोगों का यह समूह, भाग्यशाली है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, परमेश्वर ने तुम लोगों का स्तर बढ़ा दिया है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष उसकी सेवा करते हैं, ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा का कार्य है; और इसलिए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए ' से उद्धृत

जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया के अगुवाओं और उपयाजकों के चुनाव के सिद्धांत

नवागंतुकों की कलीसिया की स्थापना के बाद, एक साल तक कलीसियाई जीवन जीने से परमेश्वर के चुने हुए लोग स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से परिचित हो जाएँगे, और कलीसिया के अगुवाओं और उपयाजकों के लिए वार्षिक चुनाव पेश किए जा सकते हैं। चुनावों से पहले उनके सिद्धांतों पर सहभागिता की जानी चाहिए, और परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों के प्रकाश में, सत्य पर भी सहभागिता होनी चाहिए। चुनाव केवल तभी सही और उचित होंगे यदि उनके पीछे के सिद्धांतों को अधिकांश लोग पहले समझ लेते हैं। कलीसिया के अगुवाओं और उपयाजकों का चुनाव परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार किया जाना चाहिए। लोगों को अपनी ही मर्ज़ी का पालन करके, या अनुमान और कल्पना पर भरोसा करके, लोगों का चुनाव नहीं करना चाहिए। इन मामलों को एक सैद्धांतिक तरीके से संभाला जाना चाहिए, ताकि अधिक लोग निष्पक्ष मतदान कर सकें। नवागंतुकों की कलीसियाओं में अगुवाओं और उपयाजकों का चुनाव इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि कोई व्यक्ति कितने समय से परमेश्वर में विश्वास करता आया है; यदि किसी व्यक्ति ने छह महीने से अधिक समय के लिए परमेश्वर पर विश्वास किया हो, वह परमेश्वर में दिल से विश्वास करता हो, अच्छी मानवता वाला हो, सत्य से प्रेम करता हो, और कलीसिया के प्रति एक दायित्व-भार की भावना महसूस करता हो, तो उसे एक अगुवा या उपयाजक के रूप में चुना जा सकता है। इन सिद्धांतों के आधार पर कलीसिया के अगुवाओं और उपयाजकों का चुनाव करना, यह सुनिश्चित करता है कि अधिकांश लोग मजबूती से खड़े रह सकेंगे। कलीसिया के अगुवाओं और उपयाजकों के चुनाव के सिद्धांत अब निम्नानुसार उल्लिखित किए जाते हैं:

1. वे समझदार, अच्छे विवेक वाले, दयालु हों, और उन्हें सत्य से प्रेम होना चाहिए;

2. उन्हें सत्य को स्वीकार करने, आत्म-निरीक्षण और आत्म-बोध पर ध्यान केंद्रित करने, और सच्चा पश्चाताप करने में सक्षम होना चाहिए;

3. उनमें कलीसिया के प्रति एक दायित्व-भार की भावना होनी चाहिए, अपने भाइयों और बहनों को ईमानदारी से मदद करने में सक्षम होना चाहिए, उन्हें अपेक्षाकृत नेक और ईमानदार होना चाहिए, और उनमें न्याय की एक भावना होनी चाहिए।

जो लोग मूल रूप से उपर्युक्त तीन शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें अगुवाओं या उपयाजकों के रूप में चुना जा सकता है। चुनावों से पहले, प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना चाहिए। उनके द्वारा इस बात का आश्वासन दिया जाना चाहिए कि वे चुनाव में परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार मतदान करेंगे, और परमेश्वर को इस बात की गारंटी देनी होगी कि वे लोग सत्य के प्रति आज्ञा-पालन करेंगे, देह-चेतना का त्याग करेंगे, और तथ्यों के, आधार पर न्यायपूर्ण और निष्पक्ष मतदान करेंगे न कि अपनी भावनाओं और कल्पनाओं के आधार पर।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के घर में सभी स्तरों पर अगुआओं का चयन मुख्यतः तीन मानदंडों के आधार पर किया जाता है, लेकिन यह तय करना आसान नहीं है कि कोई व्यक्ति इन तीन मानदंडों को पूरा करता है या नहीं। यकीनन किसी एक व्यक्ति के निजी निर्णय पर निर्भर रहना सही नहीं है; इसलिए यह पक्का करने के लिए कि लिया गया निर्णय सही है, ऐसे तीन या चार पक्षों द्वारा साक्ष्य दिया जाना ज़रूरी है जो उम्मीदवार की परिस्थितियों से परिचित हैं। यही कारण है कि किसी अगुआ का चयन करने से पहले, हमें उसके बारे में कई पक्षों से समझ हासिल करनी होगी और साक्ष्य प्राप्त करना होगा। साथ ही, उम्मीदवार से परिचित लोगों, उम्मीदवार के अगुआओं और वरिष्ठ सहकर्मियों और उम्मीदवार के अधीन काम करने वाले लोगों से जानकारी लेनी होगी। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के पास व्यापक विश्लेषण करने की समझ होनी चाहिए जिसके द्वारा खूबियों और खामियों में संतुलन बिठाया जा सके। आखिर में, अगर हमने यह पता लगा किया कि यह व्यक्ति सचमुच इन तीन मानदंडों को पूरा करता है, तो उसका चयन किया जा सकता है। यह सभी स्तरों पर अगुआओं के चयन के लिए ज़रूरी प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष, उचित और सही है। उम्मीदवार से परिचित उन चार पक्षों द्वारा दिये गए साक्ष्य में ये चीज़ें शामिल हो सकती हैं:

1. कलीसिया में मौजूद ऐसे लोगों द्वारा दिया गया साक्ष्य जो इस व्यक्ति को सबसे ज़्यादा समय से जानते हैं और जिनका इस व्यक्ति के साथ सबसे अधिक करीबी संबंध रहा है (कम से कम तीन से पाँच लोग);

2. कलीसिया के ज़्यादातर लोगों द्वारा प्रस्तुत किया गया साक्ष्य;

3. इस व्यक्ति के परिवार के लोगों, दोस्तों और रिश्तेदारों द्वारा दिया गया साक्ष्य;

4. उच्च और निम्न स्तर के सहकर्मियों द्वारा प्रस्तुत किया गया साक्ष्य (कम से कम तीन से पाँच लोग)।

ये चार पहलुओं से लिये गए साक्ष्य हैं जो यह समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं कि क्या कोई व्यक्ति इन तीन मानदंडों को पूरा करता है। सिर्फ़ एक या दो पहलुओं से मिला साक्ष्य अपर्याप्त है, इसलिए हमें तीन या चार पहलुओं से साक्ष्य हासिल करना होगा। मुख्य रूप से, साक्ष्य का इस्तेमाल करके हमें इन पाँच परिस्थितियों की पुष्टि करनी होगी:

1. हमें यह पुष्टि करनी होगी कि क्या इस व्यक्ति की इंसानियत अपेक्षाकृत सच्ची और ईमानदार है, क्या उसमें न्याय की समझ है और क्या वह पक्के तौर पर कुटिल, धोखेबाज, असंयमित या दुष्ट व्यक्ति नहीं है;

2. हमें यह पुष्टि करनी होगी कि क्या सत्य के बारे में उसकी समझ पक्की है और क्या वह सत्य का अनुसरण करना पसंद करता है, क्या वह पक्के तौर पर ऐसा व्यक्ति नहीं है जो विवेकहीन है और जिसे आध्यात्मिक बातों की समझ नहीं है या सत्य के बारे में जिसकी समझ बहुत ही सतही है;

3. हमें यह पुष्टि करनी होगी कि क्या वह अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सक्षम और वफ़ादार है, क्या वह पक्के तौर पर ऐसा व्यक्ति नहीं है जो कड़ी मेहनत से जी चुराता है और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय इधर-उधर की बातें करता है;

4. हमें यह पुष्टि करनी होगी कि क्या उसे परमेश्वर की सही समझ है, क्या उसमें सच्ची आज्ञाकारिता है और क्या वह पक्के तौर पर ऐसा व्यक्ति नहीं है जो धारणाएं रखता है और मसीह के साथ-साथ पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये गए व्यक्ति का विरोध करता है;

5. हमें यह पुष्टि करनी होगी कि क्या वह ऐसा व्यक्ति है जो ऊपर की व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य कर पाने में सक्षम है और क्या वह पक्के तौर पर ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अलग तरह से व्यवहार करता है और अपने ही सुझावों पर काम करता है।

इन पाँच परिस्थितियों के संबंध में सटीक साक्ष्य, उम्मीदवार से परिचित उन चार पक्षों से हासिल किया जाना ज़रूरी है। अगर इन पाँच पहलुओं में शामिल बातों की पुष्टि नहीं की जा सकती है, तो तीन मानदंड पक्के तौर पर पूरे नहीं किये गए हैं। यह तय करने से पहले कि व्यक्ति ने तीन मानदंडों को पूरा किया है, इन सभी पाँच पहलुओं की पुष्टि करना ज़रूरी है और तभी उस व्यक्ति का चयन किया जा सकता है। केवल उम्मीदवार से परिचित उन चार पक्षों द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर व्यक्ति का चयन करके ही सटीकता सुनिश्चित की जा सकती है। अगर कोई उस व्यक्ति से परिचित चार पक्षों से साक्ष्य हासिल किये बिना ही अगुआओं का चयन कर लेता है, तो ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति गैर-जिम्मेदार होगा। वह ऐसा व्यक्ति होगा जो मनमाने ढंग से काम करेगा, वह अभिमानी और दंभी होगा। जिन लोगों का चयन निजी राय के आधार पर किया गया है, जिनके लिए उनसे परिचित चार पक्षों से साक्ष्य हासिल नहीं किया गया है, ऐसे सभी लोगों का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए (सिवाय उनके जो काफ़ी जाने-पहचाने हैं)। यह परमेश्वर के घर का नियम है। हर किसी को इसका पालन करना चाहिए; इसका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए! ऐसा कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर के घर के नियम के ख़िलाफ़ जाता है और अपने निजी निर्णय के आधार पर अगुआओं का चयन करता है, वह परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह और उसका विरोध कर रहा है; ऐसा व्यक्ति मसीह का शत्रु है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन कलीसिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास कम से कम कुछ सत्य की वास्तविकताएं होनी चाहिए, लोगों के बारे में उनकी अपनी समझ होनी चाहिए, उन्हें प्रतिभा की खोज करने और सत्य का अनुसरण करने वालों का पोषण करने में सक्षम होना चाहिए। अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता यह नहीं बता सकता है कि क्या किसी व्यक्ति के पास सत्य वास्तविकता है, क्या किसी व्यक्ति के पास ज़्यादा या कम काबिलियत है, बल्कि वह केवल इस बात पर ध्यान देता है कि उस व्यक्ति के पास क्या गुण है, तो उसमें विवेक का अभाव है और उसे आध्यात्मिक समझ नहीं है। ऐसा व्यक्ति निस्संदेह एक अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए उपयुक्त नहीं है। अगर कोई ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन करता है जिसके पास विवेक नहीं है, तो वह खुद ही अंधा है और अनजाने में बहुत बड़ी समस्या को दावत दे रहा है। उसे यह समझने का तरीका नहीं पता कि क्या अमुक व्यक्ति के पास आध्यात्मिक समझ है या क्या उस व्यक्ति की काबिलियत अच्छी है या बुरी। ऐसे लोगों के पास खुद भी काबिलियत नहीं होती। कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा, यह समझने के लिए सत्य को समझना आवश्यक है। इसे अनावश्यक समझा जा सकता है, क्योंकि जो चीज़ किसी व्यक्ति को अच्छा या बुरा बनाती है उसका पता व्यक्ति के विवेक के आधार पर लगाया जा सकता है। जो व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार काम करते हैं वे निस्संदेह अच्छे लोग हैं और वे बहुत बुरे काम नहीं कर सकते। अगर वे दूसरे लोगों के प्रति शत्रुता का भाव भी रखते हैं, तो वे उन्हें नुकसान पहुँचाने की हद तक नहीं जाएंगे। जो लोग अपने विवेक के ख़िलाफ़ काम करते हैं और जो कपटी और कुटिल मंशाएं रखते हैं वे दुष्ट हैं। इसलिए, कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा, इसकी पहचान अपने विवेक से की जा सकती है। हालांकि, किसी व्यक्ति के पास सत्य वास्तविकता है या नहीं, और क्या वह सत्य से प्रेम करता है या नहीं, इसकी पहचान करने के लिए हमारे पास कम से कम सत्य की थोड़ी समझ होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, हम यह कैसे देख सकते हैं कि किसी व्यक्ति के पास अपने मामलों को संभालने के लिए ज़रूरी सिद्धांत हैं या नहीं? हम यह कैसे पता लगाएं कि किसी व्यक्ति के पास सत्य वास्तविकता है या नहीं? क्या जो व्यक्ति शब्दों और सिद्धांतों का प्रचार करता है उसके पास सत्य वास्तविकता है? लोग आम तौर पर इन चीज़ों की पहचान नहीं कर पाते हैं। उन्हें कम से कम सत्य की थोड़ी सी समझ तो ज़रूर होनी चाहिए, क्योंकि अगर उनके पास इसकी समझ नहीं है, तो वे यह नहीं जान सकते कि लोगों के पास कोई सत्य वास्तविकता है या नहीं। किसी व्यक्ति के सार को जानने और स्पष्ट रूप से यह समझने में सक्षम होने के लिए कि वह व्यक्ति कौन है, सत्य को समझना ज़रूरी है। अगर अगुआ और कार्यकर्ता यह समझ पाने में भी असमर्थ हैं कि किसी व्यक्ति के पास अच्छी काबिलियत है या बुरी, और उसके पास सत्य वास्तविकता है या नहीं, यह साबित करता है कि ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास खुद भी सत्य वास्तविकता नहीं है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लिए वोट देने का निर्णय भी इस आधार पर होना चाहिए कि क्या सत्य की परीक्षा के सवालों पर उनके लिखित जवाबों में कोई वास्तविक अनुभव और ज्ञान शामिल है या नहीं। सत्य की परीक्षा के सवालों पर दिये गए किसी व्यक्ति के जवाब इस बात का सबसे अधिक ख़ुलासा करते हैं कि ऐसे व्यक्ति के पास कोई सत्य वास्तविकता है या नहीं। चुनाव के समय, सभी उम्मीदवारों को परीक्षा के सवालों पर उनके लिखित जवाबों को पढ़कर सुनाना चाहिए ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग उन्हें सुन सकें, जो फिर इस आधार पर वोट करेंगे कि उम्मीदवार आम तौर पर कैसा प्रदर्शन करते हैं और उनकी परीक्षा के जवाब क्या हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को यह समझना चाहिए कि कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं के चयन में परमेश्वर के घर के सिद्धांत ये हैं : 1. वे समझदार, अच्छे विवेक वाले, दयालु हों, और उन्हें सत्य से प्रेम होना चाहिए; 2. उन्हें सत्य को स्वीकार करने, आत्म-निरीक्षण और आत्म-बोध पर ध्यान केंद्रित करने, और सच्चा पश्चाताप करने में सक्षम होना चाहिए; 3. उनमें कलीसिया के प्रति एक दायित्व-भार की भावना होनी चाहिए, अपने भाइयों और बहनों को ईमानदारी से मदद करने में सक्षम होना चाहिए, उन्हें अपेक्षाकृत नेक और ईमानदार होना चाहिए, और उनमें न्याय की एक भावना होनी चाहिए। ये कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं के चयन के लिए ज़रूरी तीन सिद्धांत हैं। अगर इनमें से कोई एक सिद्धांत भी पूरा नहीं किया जाता है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अगुआ या कार्यकर्ता के तौर पर ऐसे उम्मीदवार का चयन नहीं करना चाहिए। केवल ऐसे लोगों का चयन किया जा सकता है जो इन तीन सिद्धांतों को पूरा करने के लिए अपेक्षाकृत योग्य हैं और ज़्यादातर लोगों की तुलना में थोड़े बेहतर हैं। परमेश्वर का घर ऐसी किसी भी कलीसिया के अगुआओं से हिसाब मांगेगा जो चयन के इन सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। कलीसिया अगुआ या कार्यकर्ता के तौर पर किसी दुष्ट या धोखेबाज व्यक्ति को चुना जाना सबसे गंभीर समस्या है जो परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डालती है और उसे बिगाड़ती है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इस तरह की घटना को समय पर उजागर करना चाहिए, उसकी शिकायत करनी चाहिए और उससे निबटना चाहिए। कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं को हर जगह कलीसिया के चुनावों की सख्ती से निगरानी करनी चाहिए। उन्हें दुष्ट लोगों को इस प्रक्रिया से छेड़छाड़ करने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं देनी चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर पाते हैं या नहीं। जो लोग नियमित सहभागिता में व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं उन्हें ही अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में चुना जाना चाहिए। जो व्यक्ति सबसे अधिक समस्याओं का समाधान कर पाता है उसे मुख्य अगुआ या कार्यकर्ता होना चाहिए, जबकि जो लोग कम समस्याओं का समाधान कर पाते हैं उन्हें सामान्य अगुआओं या कार्यकर्ताओं के तौर पर चुना जा सकता है। अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन इसी मानक के अनुसार किया जाना चाहिए। व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए क्या कोई आयु सीमा है? इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति साठ या सत्तर साल की उम्र का बुजुर्ग भाई या बहन है या कोई बीस या तीस साल की उम्र का युवा भाई या बहन है, अगर वह सत्य के बारे में सहभागिता करने और कुछ व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर पाने में सक्षम है, तो उसे अगुआ के तौर पर चुना जा सकता है। इसके लिए उम्र की कोई पाबंदी नहीं है, इसलिए नए नियम बनाने की कोशिश न करें। अगर व्यक्ति व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर सकता है, तो उसके अनुभव की गहराई पर ध्यान दिये बिना उसे चुना जा सकता है। कुछ लोगों ने कई सालों तक परमेश्वर में विश्वास किया है और देखने से लगता है कि उनके पास काफ़ी अनुभव है, लेकिन अगर वे किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते हैं तो वे एक अगुआ होने के योग्य नहीं हैं। किस तरह का व्यक्ति एक अगुआ होने के योग्य है? जो लोग परमेश्वर के चुने हुए लोगों की व्यावहारिक समस्याओं और मुश्किलों को हल कर सकते हैं। वे लोग इस बात से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का इस्तेमाल कर सकते हैं कि परमेश्वर के चुने हुए लोग जीवन में कैसे प्रवेश कर सकते हैं, परीक्षणों का सामना करते समय या कांट-छांट और निपटारा किये जाते समय लोगों के सामने आने वाली समस्याएं और जब उनके लिए समर्पण करना मुश्किल होता है, परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय उन्हें समझ न पाने से संबंधित लोगों की समस्याएं, और भौतिक जीवन और देह के रिश्तेदारों से निपटने के तरीके से जुड़ी समस्याएं। ऐसे लोग उपयुक्त अगुआ बनते हैं। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ़ शब्दों और सिद्धांतों का उपदेश देता है और किसी व्यावहारिक समस्या को हल नहीं कर पाता है, तो ऐसा व्यक्ति एक धार्मिक बहुरूपिया है, उसमें सत्य वास्तविकता बिल्कुल भी नहीं है। क्या अब तुम्हें समझ आ गया है कि किसी के पास सत्य वास्तविकता होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सभी तरह की व्यावहारिक समस्याओं को हल कर पाने में सक्षम होना। इसका मतलब है व्यक्ति में सत्य वास्तविकता होना जो यह साबित करता है कि उस व्यक्ति के पास अनुभव है, वह चीज़ों को समझने और कार्य करने में सक्षम है। संक्षेप में, उसके पास क्षमता है। अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर के चुने हुए लोगों की समस्याएं हल नहीं कर सकता है, तो पहली बात यह है कि उसके पास सत्य वास्तविकता नहीं है, दूसरी बात, वह कार्य को पूरा कर पाने में असमर्थ है। तीसरी बात, वह चीज़ों को समझ पाने में असमर्थ है। उसके पास बिल्कुल भी क्षमता नहीं है और ऐसे लोग अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में बिल्कुल भी नहीं चुने जा सकते। अगर ऐसे लोगों को चुन लिया जाता है, तो फिर उन्हें हटा दिया जाना चाहिए!

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

बदले जाने और कांट-छाँट और निपटारे की कई घटनाओं के बाद, परमेश्वर के घर के कई लोग आखिरकार जाग गए हैं। उन्हें यह एहसास हो गया है कि उनके पास सत्य वास्तविकता नहीं है, वे बहुत अधिक भ्रष्ट हो चुके हैं और आज्ञाकारी नहीं रहे हैं, अब उन्होंने पश्चाताप करना शुरू कर दिया है। अगर उन्हें अपने बारे में सही समझ हो गयी है और वे ईमानदारी से पश्चाताप करते हैं, खास तौर पर बदले जाने और फिर कई बार फिर से चुने जाने के बाद, तो ऐसे लोगों में कुछ सच्चा बदलाव दिखा है और उन्हें प्रोन्नत किया जाना चाहिए। उन्हें प्रोन्नत क्यों किया जाना चाहिए? क्योंकि व्यावहारिक कार्य कर पाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। इंसान बहुत भ्रष्ट है, वह न्याय और ताड़ना के बिना सचमुच बदल पाने में असमर्थ है। कोई भी व्यक्ति परीक्षणों और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रे बिना, कांट-छांट और निपटारे के बिना परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किये जाने के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। शैतान द्वारा भ्रष्ट किये गए सभी लोगों में एक शैतानी स्वभाव और शैतानी प्रकृति होती है। इसलिए, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना तथा कांट-छांट और निपटारे का अनुभव करना, परमेश्वर के कार्य को अनुभव करना है। अगर किसी व्यक्ति ने कई बार बदले जाने का अनुभव किया है, विफलताओं और गिरावट को अनुभव किया है, और अब भी फिर से खड़ा होने और सचमुच पश्चाताप करने में में सक्षम है, तो यह परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का प्रभाव है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट हो, जो परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना पर ध्यान देने और अपनी भ्रष्टता के बारे में जानने और हर दिन नियमित रूप से सभाओं में जाने के बाद, अनजाने में अपने स्वभाव में ज़बरदस्त परिवर्तन का अनुभव करता है? क्या कोई ऐसा व्यक्ति है? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। हर व्यक्ति को न्याय और ताड़ना, कांट-छांट और निपटारे, तथा परीक्षणों और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है, उसे सैकड़ों बार परीक्षणों और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गज़रना पड़ता है, उसके बाद ही उसे पूर्ण बनाया जा सकता है। इसका क्या मतलब है? इंसान इतनी गहराई तक भ्रष्ट हो चुका है कि वह कई बार कांट-छांट और निपटारे की प्रक्रिया से गुज़रे बिना बदलाव हासिल नहीं कर सकता है। इसलिए, भ्रष्ट इंसान जितना अधिक न्याय और ताड़ना तथा कांट-छांट और निपटारे की प्रक्रिया से गुज़रता है, यह उसके लिए उतना ही बेहतर है, यह परमेश्वर का अथाह प्रेम है। कुछ लोग कई बार विफल होने और गिरने के बाद भी या प्रोन्नत और अवनत किये जाने के बाद भी उठकर खड़ा होने और अपने कर्तव्य निभाने में सक्षम होते हैं। इससे पता चलता है कि वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। अगर वे सत्य का अनुसरण करनेवाले लोग नहीं हैं, तो शायद पहली बार बदले जाने के बाद ही उन्हें उजागर करके हटा दिया गया है। जो लोग अब भी सत्य का अनुसरण करते हैं और बार-बार विफल होने और गिरने के बावजूद अपने कर्तव्य निभाते रहते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिनकी परमेश्वर में आस्था है। परमेश्वर उसके साथ चाहे जैसा भी व्यवहार करे, वे उसे बिल्कुल कभी नहीं छोड़ेंगे। कई बार बदले और उजागर किये जाने के बाद भी वे आत्मचिंतन कर पाने, खुद को जानने की कोशिश करने, वास्तव में पश्चाताप करने और फिर से उठकर खड़ा होने में सक्षम हैं। परमेश्वर चाहे उनका इस्तेमाल करे या न करे, फिर भी वे उसका अनुसरण करते हैं और उसके प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए अपने कर्तव्य पूरे करते हैं। सिर्फ़ इसी तरह के लोग सचमुच सत्य से और परमेश्वर से प्रेम करते हैं। जिन्होंने पश्चाताप दिखाया है और जिनमें सत्य वास्तविकता है, इस तरह के लोगों की तुलना ऐसे व्यक्ति से करते समय, जिसने विफलताओं या गिरावट का अनुभव नहीं किया है, कौन सा व्यक्ति एक अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए अधिक उपयुक्त है? वह व्यक्ति जो बार-बार बदले जाने के बाद भी उठकर खड़ा हो सकता है उसकी गवाही असली है, जबकि ऐसा व्यक्ति जिसने कभी कांट-छांट और निपटारे का अनुभव नहीं किया है, जो कभी विफल नहीं हुआ और कभी गिरा नहीं है, उसके पास अनुभव की असली गवाही नहीं है। अगर उन्हें वाकई बदल दिया गया, वे विफल हो गए और गिर गए, तो यह कहना मुश्किल है कि क्या वे निष्क्रिय और कमज़ोर हैं या वे फिर से उठ कर खड़ा होने में असमर्थ हैं। कुछ व्यक्ति लगातार परमेश्वर का अनुसरण कर पाने में सक्षम होंगे या नहीं, यह अज्ञात है। कुछ लोग अनुशासित होने पर बेहतर और ज़्यादा जोश से काम करते हैं; जबकि अन्य लोगों के साथ प्यार से बात करने पर भी वे कभी-कभी गिर जाते हैं, रोने लगते हैं और उठकर खड़े नहीं हो पाते। इन दोनों में से किस तरह के लोग ज़्यादा मजबूत होते हैं? वह व्यक्ति जो अनुशासित है, है न? इसलिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन करने में, आपको यह जानने में सक्षम होना चाहिए कि अनुशासित लोग मजबूती से आगे बढ़ते हैं, क्योंकि वे लगातार कांट-छांट और निपटारे का अनुभव कर रहे हैं। इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद, वे आज्ञाकारी हो सकते हैं और सचमुच पश्चाताप कर सकते हैं। ऐसे लोग निश्चित रूप से प्रगति करते हैं, वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में चुने जाते पर विश्वसनीय और भरोसेमंद होते हैं। ऐसे व्यक्ति को न चुनें जिसके साथ प्यार से बर्ताव किया गया है। वे बहुत कमज़ोर होते हैं और वे किसी भी परीक्षण या ताड़ना की प्रक्रिया से नहीं गुजरे हैं। उनके पास कोई आध्यात्मिक कद नहीं है, अपनी असभ्यता में, वे इंसानियत से वंचित हैं। वे बच्चों की तरह और नादान हैं, भरोसे के लायक नहीं हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कलीसिया अगुआओं और उपयाजकों का चयन करते समय हमें इन बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए:

1. ऐसे लोगों को कभी न चुनें जो राक्षसों के वश में या जिन्होंने अक्सर बुरी भावनाओं के साथ काम किया है।

2. ऐसे मसीह-विरोधियों को कभी न चुनें जो अहंकारी और दंभी हैं, जो किसी की बात नहीं सुनते और अविवेकी हैं, जो परमेश्वर के कार्य की आलोचना करने का साहस करते हैं, और जो अपनी धारणाओं और भ्रांतियों का प्रचार करते हैं।

3. "खुशामदी" लोगों को कभी न चुनें जो भावनाओं के आधार पर बात और काम करते हैं, सिद्धांतों का पालन नहीं करते, और परमेश्वर के घर के हितों को कायम नहीं रखते।

4. ऐसे लोगों को कभी न चुनें जो शब्दों और सिद्धांतों के बारे में बात करना पसंद करते हैं, सत्य पर अमल नहीं करते, अपने कर्तव्य का निर्वहन करते समय कोई बोझ नहीं उठाते और कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं।

5. कमज़ोर इंसानियत वाले ऐसे लोगों को कभी न चुनें जो गिरोह बनाना, शत्रुता करना पसंद करते हैं, जो कुटिल और धोखेबाज हैं या जिनका स्वभाव दुर्भावनापूर्ण है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

पिछला: 62. कलीसिया के चुनावों के सिद्धान्‍त

अगला: 64. अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर अभियोग लगाने के सिद्धान्‍त

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।

संबंधित सामग्री

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें