110. असली और नकली कलीसियाओं के बीच भेद करने के सिद्धांत

(1) यह निर्धारित करो कि क्या कलीसिया के जीवन में पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है; क्या इसकी सभा परमेश्वर के वचनों को खाती और पीती है और वास्तव में सत्य पर सहभागिता करती है; और क्या इससे एक व्यावहारिक प्रभाव उत्पन्न होता है।

(2) यह निर्धारित करो कि क्या कलीसिया के अगुवा सत्य से प्रेम और उसका अनुसरण करते हैं; क्या उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है; और क्या वे वास्तव में सत्य को समझते और इसे व्यवहार में लाते हैं।

(3) यह निर्धारित करो कि क्या वास्तव में, कलीसिया में सत्य का बोलबाला है, या दुष्ट लोगों का; और क्या सत्य का अनुसरण करने वाले लोग वहाँ शासन करते हैं, या बुरे और उपद्रवी लोग।

(4) केवल उन लोगों की सभा एक कलीसिया कहलाने के योग्य होती है जो सत्य का अनुसरण करते हों और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य हो; जहाँ दुष्ट और संभ्रमित लोग इकट्ठा होते हैं, वह धर्म का स्थान होता है, किसी कलीसिया का नहीं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं, वे शैतान के नियंत्रण में और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और उसमें सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा में मौजूद लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीएँगे और पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा, जो उसके नाम की खातिर उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें परमेश्वर के साथ उचित सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए सिद्धांत के अनुसार होता है। यह वह नहीं है, जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मेलन कहा जा सकता है, उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में तो बिलकुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई संबंध नहीं है, और वह परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ तो बिलकुल भी नहीं सकता। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और एकदम अनुल्लेखनीय हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिया गया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं, क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नाम की तख्ती के नीचे जो उन्हें अच्छा लगता है, वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके प्रति शत्रुता रखते हैं और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे? इन लोगों के कुकर्मों का उल्लेख होने पर कुछ लोग उन्हें कोसने के लिए आतुर होते हैं, जबकि परमेश्वर उन्हें अनदेखा करता है। मनुष्य के अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके कार्य परमेश्वर के नाम से संबंध रखते हैं, किंतु वास्तव में, परमेश्वर के अनुसार, उनका उसके नाम या उसकी गवाही से कोई संबंध नहीं है। ये लोग चाहे कुछ भी क्यों न करें, वह परमेश्वर से संबंध नहीं रखता : वह उसके नाम और उसके वर्तमान कार्य दोनों से संबंधित नहीं है। ये लोग स्वयं को ही अपमानित करते हैं और शैतान को अभिव्यक्त करते हैं; ये कुकर्मी हैं जो कोप के दिन के लिए संचय कर रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

यहोवा पर विश्वास करने वालों के धर्म को परमेश्वर कौन-सा नाम देता है? यहूदी धर्म। वे एक प्रकार का धार्मिक समूह बन गए। और परमेश्वर उन लोगों के धर्म को क्या कहता है जो यीशु पर विश्वास करते हैं? (ईसाई धर्म।) परमेश्वर की नज़रों में, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म धार्मिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। परमेश्वर उन्हें इस प्रकार क्यों परिभाषित करता है? उन सभी के बीच जो परमेश्वर द्वारा परिभाषित इन धार्मिक निकायों के सदस्य हैं, क्या कोई ऐसा है जो उससे डरता है और बुराई से दूर रहता है, उसके मार्ग का अनुसरण करता है और उसकी इच्छा पूरी करता है? (नहीं।) यह इस बात को स्पष्ट करता है। परमेश्वर की नज़रों में, क्या वे सभी लोग जो उसका नाममात्र के लिए अनुसरण करते हैं, ऐसे लोग होते हैं जिन्हें परमेश्वर विश्वासियों के रूप में स्वीकार करता है? क्या उन सभी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या वे सभी उसके उद्धार के लिए लक्ष्य हो सकते हैं? (नहीं।) तो क्या ऐसा दिन आएगा जब तुम लोग वे जाओगे जिसे परमेश्वर धार्मिक समूह के रूप में देखता है? (यह संभव है।) एक धार्मिक समूह के रूप में देखा जाना, यह अचिंतनीय प्रतीत होता है। यदि लोग परमेश्वर की नज़र में एक धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं, तो क्या वे उसके द्वारा बचाए जाएंगे? क्या वे उसके घर के हैं? (नहीं, वे नहीं।) तो चलो इसे संक्षेप में कहने का प्रयास करते हैं : ये लोग, जो नाममात्र के लिए सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन जिन्हें वह एक धार्मिक समूह का हिस्सा मानता है—वे किस रास्ते पर चलते हैं? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि ऐसे लोग कभी भी उसके परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग का अनुसरण या उसकी आराधना नहीं करते हुए बल्कि उसका त्याग करते हुए, विश्वास के झंडे को लहराने के मार्ग पर चलते हैं? अर्थात्, वे परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग पर चलते हैं लेकिन परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हैं लेकिन उसका त्याग कर देते हैं और उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करते; उनका मार्ग ऐसा है जिसमें वे विश्वास तो परमेश्वर पर करते हैं लेकिन शैतान की पूजा करते हैं, वे हैवान की आराधना करते हैं, वे अपने प्रबंधन को अंजाम देने, और अपना राज्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं। क्या यही इसका सार नहीं है? क्या इस तरह के लोगों का मनुष्य के उद्धार की परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई संबंध है? (नहीं।) चाहे कितने भी लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, जैसे ही उनके विश्वासों को परमेश्वर द्वारा धर्म या समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, वह पहले ही निर्धारित कर देता है कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? किसी गिरोह या लोगों की भीड़ में जो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से रहित हैं और जो उसकी आराधना बिल्कुल भी नहीं करते हैं, वे किसकी आराधना करते हैं? वे किसका अनुसरण करते हैं? रूप और नाम में, वे एक इंसान का अनुसरण करते हैं, लेकिन वास्तव में वे किसका अनुसरण करते हैं? मन ही मन वे परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे मानवीय हेरफेर, व्यवस्थाओं और नियंत्रण के अधीन हैं। वे शैतान, हैवान का अनुसरण करते हैं; वे उन ताकतों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, जो उसकी दुश्मन हैं। क्या परमेश्वर इस तरह के लोगों के झुण्ड को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं बचाएगा? क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? (नहीं।) वे मानव उद्यमों को चलाते हुए, अपने प्रबंधन का संचालन करते हुए विश्वास का झंडा लहराते हैं, और मनुष्यजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत चलते हैं। उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा नफरत और अस्वीकृत किया जाना है; वह इन लोगों को संभवतः नहीं बचा सकता है, वे संभवतः पश्चाताप नहीं कर सकते, वे पहले ही शैतान के द्वारा पकड़ लिए गए हैं—वे पूरी तरह से शैतान के हाथों में हैं। तुमने कितने वर्ष परमेश्वर में विश्वास किया है, क्या तुम्हारी आस्था में इसका असर इस बात पर पड़ता है कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? क्या तुम्हारे रस्मों और विनियमों के पालन करने का कुछ महत्व है? क्या परमेश्वर लोगों के अभ्यास के तौर-तरीकों को देखता है? क्या वह देखता है कि वहाँ कितने लोग हैं? उसने मानवजाति के एक हिस्से को चुना है; वह कैसे मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है और बचाया जाना चाहिए? उसका यह निर्णय उन मार्गों पर आधारित होता है जिन पर ये लोग चलते हैं। अनुग्रह के युग में, हालांकि परमेश्वर द्वारा लोगों को बताए गए सत्य आज की तरह इतने अधिक नहीं थे और इतने विशिष्ट नहीं थे, वह फिर भी उस समय लोगों को पूर्ण बना सका और तब भी उनका उद्धार संभव था। इस तरह, इस युग के लोग, जिन्होंने बहुत से सत्य सुने हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को समझ पाये हैं, अगर वे परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और उद्धार के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम उन्हीं के समान होगा जो ईसाई और यहूदी धर्म को मानते हैं; कोई अंतर नहीं होगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है! चाहे तूने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, या तू कितने सत्यों को समझ चुका हो, यदि अंततः तू अभी भी लोगों का अनुसरण करता है और शैतान का अनुसरण करता है, और अंततः, तू अभी भी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में अक्षम हैं और उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ है, तो ऐसे लोगों से परमेश्वर घृणा करेगा और उन्हें अस्वीकार कर देगा। हर पहलू से, ऐसे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें अस्वीकार करता है, वे पत्रों और सिद्धांतों के बारे में ज्यादा बात कर सकते हैं, और बहुत से सत्य समझते हैं, फिर भी वे परमेश्वर की आराधना करने में असमर्थ होते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते, परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारी नहीं हो पाते। परमेश्वर की नज़रों में, वह उन्हें धर्म के रूप में, मनुष्य मात्र के एक समूह के रूप में, एक इंसानों के गिरोह और शैतान के लिए एक निवास स्थान के रूप में परिभाषित करता है। उन्हें सामूहिक रूप से शैतान का गिरोह कहा जाता है, और परमेश्वर उनसे पूरी तरह से घृणा करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर का घर वास्तव में क्या है? यदि इसे सैद्धांतिक रूप से परिभाषित करना हो, तो परमेश्वर का घर एक ऐसा स्थान है जहाँ सत्य राज करता है, वह ऐसे लोगों का समूह है, जिनके अभ्यास के सिद्धांत परमेश्वर के वचन हैं। ... परमेश्वर का घर वह स्थान है, जहाँ परमेश्वर कार्य करता और बोलता है, जहाँ परमेश्वर लोगों को बचाता है, जहाँ लोगों द्वारा परमेश्वर के वचनों का अभ्यास किया जाता है और उन्हें फलीभूत किया जाता है, जहाँ परमेश्वर के उद्देश्य और इच्छा को बेरोकटोक कार्यान्वित किया जा सकता है, और जहाँ परमेश्वर की प्रबंधन योजना लागू और पूरी की जाती है। संक्षेप में, परमेश्वर का घर वह स्थान है, जहाँ परमेश्वर सामर्थ्य रखता है, जहाँ परमेश्वर के वचन और सत्य राज करते हैं; यह वह स्थान नहीं है जहाँ कोई व्यक्ति अधिकार का प्रयोग करता है, अपना व्यक्तिगत कार्य करता है, या अपनी इच्छाएँ, योजनाएँ या भव्य मनसूबे पूरे करता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे परमेश्वर के घर को अपना निजी क्षेत्र मानते हैं' से उद्धृत

कलीसिया में चाहे कितने ही लोग अपना कर्तव्य क्यों न निभा रहे हों, वे दो हों या दर्जनों, जब वे पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित हो जाते हैं तो वे परमेश्वर के कार्य को अनुभव नहीं कर पाते, और उनका परमेश्वर के कार्य से कोई संबंध या इसमें कोई हिस्सेदारी नहीं रहती। वे एक धार्मिक समूह बन जाते हैं। क्या ये लोग बहुत बड़े खतरे में नहीं हैं? कोई समस्या आने पर वे कभी भी सत्य की खोज नहीं करते, और सत्य सिद्धांतों के आधार पर नहीं चलते, बल्कि वे मनुष्यों की व्यवस्थाओं और तिकड़मों में फंस जाते हैं। बहुत-से ऐसे भी हैं जो अपना कर्तव्य निभाते समय कभी भी प्रार्थना या सत्य सिद्धांतों की खोज नहीं करते; वे सिर्फ दूसरों से पूछकर उनके अनुसार चलते रहते हैं, उनकी देखादेखी सब कुछ करते रहते हैं। दूसरे लोग जिस तरफ भी इशारा करते हैं, वे उसी तरफ चल देते हैं। अपनी आस्था में, उन्हें लगता है कि सत्य की खोज एक अस्पष्ट-सी और झंझट भरी चीज है, जबकि दूसरों पर निर्भर रहना और उनके अनुसार चलते रहना आसान और कहीं ज्यादा व्यावहारिक है, और इसलिए, वे वही करते हैं जो सबसे सीधा-सरल और कष्टरहित होता है, हर काम में दूसरों से पूछते रहना और वैसा ही करते रहना। परिणामस्वरूप, वर्षों के विश्वास के बाद भी, जब भी वे किसी समस्या का सामना करते हैं तो वे कभी भी परमेश्वर के सम्मुख आकर प्रार्थना नहीं करते और उसकी इच्छा और सत्य को जानने की कोशिश नहीं करते, ताकि उन्हें सत्य की समझ आ सके, और वे परमेश्वर की इच्छानुसार कार्य और व्यवहार कर सकें—उन्हें कभी भी ऐसा कोई अनुभव नहीं हो पाता। क्या ऐसे लोग सचमुच परमेश्वर में आस्था का अभ्यास करते हैं? मैं सोचता हूँ : ऐसा क्यों होता है कि जैसे ही कुछ लोग किसी समूह के अंग बन जाते हैं तो उनके लिए—स्वरूप की दृष्टि से—झट से परमेश्वर की बजाय मनुष्य में आस्था रखने वाला बन जाना, और परमेश्वर की बजाय मनुष्य का अनुसरण करने वाला बन जाना इतना आसान हो जाता है? वे लोग इतनी जल्दी बदल क्यों जाते हैं? परमेश्वर में इतने वर्षों से विश्वास रखने के बाद भी वे ऐसा व्यवहार क्यों करने लगते हैं? वे भले ही इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं, पर विचित्र बात यह है कि उनके दिल में परमेश्वर का कभी कोई स्थान रहा ही नहीं है। उनका परमेश्वर के साथ कभी कोई संपर्क नहीं रहा है। उनके कृत्य, उनके शब्द, उनका आचरण और मामलों से निपटने का उनका तरीका, और उनका कर्तव्य पालन और परमेश्वर के लिए उनकी सेवा भी—जो कुछ भी वे करते हैं, जैसा भी व्यवहार वे प्रकट करते हैं, जो कुछ भी वे अभिव्यक्त करते हैं, यहाँ तक कि उनकी हर सोच और उनका हर विचार भी—इनमें से किसी का भी परमेश्वर में आस्था से कोई संबंध नहीं होता। तो क्या ऐसा व्यक्ति सच्चे विश्वासियों में शामिल है? क्या किसी व्यक्ति की आस्था के वर्षों का कुल जोड़ यह बता सकता है कि परमेश्वर में उनके विश्वास का आध्यात्मिक कद कितना ऊँचा है? क्या यह इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर के साथ उनका संबंध सामान्य है? बिल्कुल नहीं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

नकली अगुआ लोगों को भ्रमित और गुमराह करने के लिए अकसर सतह पर सही लगने वाली बातें कहते हैं, जिससे उन लोगों के जीवन-प्रवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके कुछ ऐसे परिणाम भी होते हैं, जो कभी नहीं होने चाहिए। नकली अगुआओं की तथाकथित आध्यात्मिक उक्तियों और अभिव्यक्तियों को पाखंड और भ्रम कहा जा सकता है। सतही तौर पर ऐसा नहीं लगता कि उनमें कुछ गलत है, लेकिन असल में वे लोगों के जीवन-प्रवेश और उस मार्ग में, जिस पर वे चलते हैं, बाधाएँ, व्यवधान और भ्रम पैदा करने का काम करते हैं। यहाँ तक कि उनके कारण कुछ लोगों में परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ भी पैदा हो जाती हैं और परमेश्वर के वचनों के प्रति संदेह और प्रतिरोध उनके मन में घर कर लेते हैं। ये वे प्रभाव हैं, जो नकली अगुआओं के वचन लोगों पर डालते हैं। नकली अगुआ दूसरों का मार्गदर्शन करने के लिए ऐसे पाखंडों और भ्रमों का उपयोग करते हैं, ताकि जिस समय वे लोग परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होते हैं, उस समय ये लगातार उसके बारे में धारणाओं, प्रतिवादों और संदेहों को जन्म दे रहे होते हैं। इसलिए नकली अगुआओं के भ्रम और प्रभाव के तहत एक नया धर्म अस्तित्व में आ जाता है। इस तरह का नया धर्म 2,000 साल पहले के ईसाई धर्म की तरह है, जो परमेश्वर के मार्ग का पालन किए बिना, केवल मानवीय शब्दों और शिक्षाओं का समर्थन करता है, जैसे कि पौलुस या किसी अन्य शिष्य की शिक्षाएँ। नकली अगुआओं का हर काम गुमराह करने वाला होता है, और वे सत्य का अनुसरण करने के सामान्य और उचित मार्ग पर चलने वालों के रास्ते में बाधक बन जाते हैं। वे लोगों को सत्य का अनुसरण करने के सही रास्ते से ज़बरदस्ती हटा देते हैं और छद्म आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाते हैं; वे उन्हें धार्मिक प्रणाली से विश्वास करने के रास्ते पर ले आते हैं। जब नकली अगुआ लोगों को भ्रमित करते, उनकी अगुआई और मार्गदर्शन करते हैं, तो वे लगातार ऐसे सिद्धांत, उक्तियाँ, कार्य या दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता, हालाँकि वे पूरी तरह से सही दिखाई देते हैं। ये चीज़ें सत्य के पूरी तरह से विपरीत और उससे पूरी तरह से असंबंधित होती हैं। लेकिन नकली अगुआओं के मार्गदर्शन में हर कोई इन चीज़ों को सत्य मानता है और वे सभी गलत ढंग से यह विश्वास करते हैं कि वे वास्तव में सत्य हैं। वे सोचते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अच्छा बोलता है और उसके दिल में विश्वास है और वह अपने मुँह से आस्था को स्वीकार करता है, तो उस व्यक्ति ने सत्य प्राप्त कर लिया है। इन विचारों और मतों के भुलावे में आकर लोग न केवल सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने, या परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने या उन्हें अभ्यास में लाने, या उसके वचनों के भीतर रहने में असमर्थ हो जाते हैं, बल्कि परमेश्वर के वचनों से लगातार दूर भी हो जाते हैं। वे सब-कुछ परमेश्वर के वचनों के अनुसार करते प्रतीत होते हैं, लेकिन परमेश्वर के ये तथाकथित वचन परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसकी इच्छा से कोई संबंध नहीं रखते। सत्य-सिद्धांतों से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। फिर उनका किस चीज से लेना-देना होता है? नकली अगुआओं की शिक्षाओं, नकली अगुआओं के इरादों, और उन नकली अगुआओं की अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और समझ से। उनकी अगुआई का तरीका अधिक लोगों को धार्मिक कर्मकांडों और कठोर नियमों में, केवल सैद्धांतिक शब्दों में, ज्ञान और दर्शन की ओर ले जाता है। यद्यपि, मसीह-विरोधियों के विपरीत, नकली अगुआ दूसरों को अपने या शैतान के सामने नहीं लाते, किंतु फिर भी, लोगों का दिल इन पाखंडों और भ्रमों द्वारा नियंत्रित हो जाता है। जब इन पाखंडों और भ्रमों से ग्रस्त लोग, गलत ढंग से यह मान लेते हैं कि उन्होंने पहले ही जीवन प्राप्त कर लिया है, तो वे कट्टरपंथी हो जाते हैं, वे सत्य, परमेश्वर के वचनों और उसकी माँगों के परम शत्रु हो जाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (2)' से उद्धृत

मसीह के शत्रुओं द्वारा शासित किसी भी कलीसिया को कलीसिया नहीं कहा जा सकता, और जिसने भी इसका अनुभव किया है वह इस बात को समझता है। यहां पर शांतिपूर्ण, खुशहाल, सक्रिय माहौल नहीं है; इसके बजाय, यहां पर कोलाहल मचा हुआ है, जहां हर एक का दिल बेचैनी और व्यग्रता की भावना से बेहद परेशान है, और उनके अंदर घबराहट और संदेह की भावना घर कर गयी है, मानो कोई बड़ी आपदा आने वाली है। मसीह के शत्रुओं के भाषण और उनके कार्यों से एक ऐसा वातावरण बन सकता है जो लोगों के दिलों को मैला कर सकता है, जिससे वे सकारात्मक और नकारात्मक चीज़ों के बीच अंतर नहीं कर पाते हैं। इसके अलावा, जब मसीह के शत्रु लंबे समय तक लोगों को धोखा देते हैं, तब लोगों के दिल परमेश्वर से और भी दूर हो जाते हैं, और परमेश्वर के साथ उनका संबंध सामान्य नहीं रहता, मानो वे धर्म के दायरे में जी रह रहे हों; आम तौर पर वे परमेश्वर में आस्था रखते हैं, फिर भी उनके दिल में परमेश्वर नहीं है। एक व्यवहारिक समस्या यह भी है कि कलीसिया में विभाजन दिखाई देता है, और जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उन्हें न तो वहां बैठक का आनंद आता है और न ही कोई लाभ प्राप्त होता है। वे कलीसिया छोड़कर अपनी अलग बैठकें आयोजित करना चाहते हैं। जब पवित्र आत्मा किसी कलीसिया में काम करता है, चाहे लोग सत्य को समझें या न समझें, तो हर कोई एक ही लक्ष्य के लिए काम करता है, और वातावरण शांतिपूर्ण, स्थिर और बाधारहित होता है। हालांकि, जैसे ही मसीह के शत्रु कोई कदम उठाते हैं, वातावरण बेचैन और विचित्र हो जाता है। जहां भी वे गड़बड़ी मचाते हैं, वहां पर अनेक गुट पैदा हो जाते हैं; लोग एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो जाते हैं, एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, एक-दूसरे पर हमला करते हैं, और पीठ पीछे एक-दूसरे की बुराई करते हैं। मसीह के शत्रु स्पष्ट रूप से क्या भूमिका निभा रहे हैं? उनकी भूमिका शैतान के अनुचरों जैसी है। मसीह के शत्रुओं के कार्यों के परिणाम: एक तो यह है कि भाई-बहन एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, एक-दूसरे पर संदेह करते हैं, और एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो जाते हैं; इसके अतिरिक्त, पुरुषों और महिलाओं के बीच अब कोई सीमा नहीं रह गयी है, वे धीरे-धीरे करीब आ जाते हैं; एक और बात यह है कि लोगों के दिलों में दर्शन धुंधले हो रहे हैं, वे अब सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान नहीं दे रहे, और न ही सत्य के सिद्धांतों के अनुसार काम करना जानते हैं। पहले वे जिन बातों को जानते थे, वे अब लुप्त हो चुकी हैं। अब उनके विचार संभ्रमित हो गए हैं, और वे बाहरी प्रदर्शनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए और इधर-उधर भटकते हुए, आँखें मूंदकर मसीह के शत्रुओं का अनुसरण करते हैं। कुछ लोग समझ सकते हैं कि मसीह के शत्रुओं का अनुसरण करना वास्तव में एक अंधी गली में चलने की तरह है, और वे समझ सकते हैं कि अगर सभी लोग जिन्हें सत्य की खोज है, एक साथ मिलें और अपना कर्तव्य निभाएं तो कितना सुखद होगा। जब मसीह के शत्रु सत्ता छीन लेते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं करता, और सभी भाई-बहन अपने अंतर्मन के अंधेरे में खो जाते हैं, वे परमेश्वर पर विश्वास करने या अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित नहीं होते। यदि यह लंबे समय तक चलता रहे, तो क्या परमेश्वर उन्हें बाहर नहीं निकाले देगा?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अजीब और रहस्यमय तरीके से व्यवहार करते हैं, वे स्वेच्छाचारी और तानाशाह होते हैं, वे कभी दूसरों के साथ संगति नहीं करते, और वे दूसरों को अपने आज्ञापालन के लिए मजबूर करते हैं' से उद्धृत

मसीह-विरोधी अपना क्षेत्र एक सामाजिक समूह में, मसीह-विरोधियों के एक गिरोह में बदल देता है। वे घृणित, विनाशकारी कृत्यों में संलग्न हो जाते हैं, और बोलने और कार्य करने में अविश्वासियों के समान आचरण करते हैं। वे सभी वाक्पटु और बकवादी होते हैं, पूरी तरह बदमाश होते हैं, और कपटी और दुष्ट होते हैं। उनमें से कोई भी सत्य स्वीकार नहीं करता। बाहर से वे विनम्र होने का दिखावा करते हैं, सभ्य लगते हैं, शिष्टाचार और व्यवहार के नियमों का पालन करते हैं, यहाँ तक कि शिक्षित, अच्छी क्षमता और अच्छे चरित्र वाले भी हो सकते हैं। लेकिन वास्तव में, उनमें से प्रत्येक कपटी, नीच, धोखेबाज और दुष्ट होता है। वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर एक-दूसरे के साथ षड्यंत्र रचते हैं। वे सत्ता और प्रतिष्ठा की, समाज में जातियों के बीच संबंधों की, अधिक सामाजिक शक्ति रखने वालों की, सर्वोच्च हैसियत और प्रतिष्ठा वालों की, और सामाजिक कौशलों में सर्वोत्तम लोगों की परवाह करते हैं। इसमें परमेश्वर के वचन, सत्य, प्रशासनिक आदेश, और साथ ही उनका विश्वास शायद ही दिखाई दे। उनका विश्वास सिर्फ एक खेल और एक चाल होती है। ऐसे दुष्ट लोग परमेश्वर के घर को एक सामाजिक समूह में बदल देते हैं, ऐसे बुरे लोगों के क्षेत्र में, जो एक-दूसरे के साथ षड्यंत्र करते हैं और फिर भी बार-बार कहते हैं, "हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभाते हैं। हमने परमेश्वर के घर में ये-ये किया है और परमेश्वर का इस-इस तरह से अनुसरण किया है; हमने अपने भाई-बहनों के कल्याण के लिए यह किया है और उनकी मदद और समर्थन के लिए वह किया है, और एक समूह के रूप में एक-साथ आने के लिए और बहुत-कुछ किया है," और इसी तरह के अन्य भव्य वक्तव्य। वे अपने भाई-बहनों से बुरे तरीकों, मानवीय तकनीकों और जीने के शैतानी फलसफों के अनुसार व्यवहार करते हैं, जिन तरीकों से शैतान बुरे लोगों के साथ व्यवहार करता है, और वे यही सूत्र परमेश्वर के घर में दोहराते हैं। इस दौरान हर समय, वे वास्तव में यह विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर के घर की खातिर कार्य कर रहे हैं, अपने भाई-बहनों की मदद कर रहे हैं, परमेश्वर को महिमा-मंडित कर रहे हैं और उसकी गवाही दे रहे हैं। लेकिन क्या ये व्यवहार और दाँव-पेच सार में मसीह-विरोधियों की परदे के पीछे की तिकड़में नहीं हैं? मसीह-विरोधी परमेश्वर के अनुयायियों को अपने अधीन कर लेते हैं, और कलीसिया को अपने क्षेत्र में, एक सामाजिक समूह में, और ऐसे लोगों के समूह में बदल देते हैं, जो शैतान के अधिकार-क्षेत्र में होते हैं। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के परिवार का हिस्सा हो सकता है? (नहीं।) क्या मसीह-विरोधियों का ऐसा करना घृणास्पद नहीं है? (है।) क्या तुम लोगों ने कभी मसीह—विरोधियों का ऐसा मजमा देखा है? जब तुम उनके बीच होते हो, तो तुम क्या महसूस करते हो? बाहर से वे बहुत शिष्ट प्रतीत होते हैं—लेकिन जब तुम उनके साथ सत्य और परमेश्वर की इच्छा के बारे में सहभागिता करते हो, तो वे जो रवैया प्रदर्शित करते हैं, वह उनकी बाहरी शिष्टता के बिलकुल विपरीत होता है, अर्थात वे अत्यधिक विमुख और पूरी तरह से उदासीन होते हैं। जब तुम उनके साथ सत्य के बारे में सहभागिता करते हो, तो वे तुम्हें बाहरी व्यक्ति समझते हैं, और जब तुम कलीसिया के काम के बारे में सहभागिता करते हो, तो उन्हें और भी ज्यादा ऐसा लगता है; जब तुम इस बारे में सहभागिता करते हो कि क्या कलीसिया के कार्य के विशिष्ट अंश पूरे किए गए हैं, और उन्हें कितनी अच्छी तरह से किया गया है, तो उनके सो जाने और दानवता उजागर करने की संभावना होती है, वे अपना सिर खुजाते हैं और अपने कान साफ करते हैं, वे जम्हाई लेते हैं, उनकी आँखों में पानी भर आता है, वे छींक भी सकते हैं। क्या यह एक दुष्टात्मा द्वारा कब्जा करना नहीं है? तुम्हारे सत्य के बारे में सहभागिता करते ही उनकी दानवता क्यों उभर आती है? क्या उनमें से प्रत्येक के हृदय में काफी प्रेम नहीं है? जब तुम सत्य के बारे में सहभागिता करना शुरू करते हो, तो उनकी दिलचस्पी खत्म क्यों हो जाती है? क्या इससे वे उजागर नहीं हो जाते? क्या उनमें बाहरी कार्य करने के लिए अत्यधिक उत्साह और प्रतिबद्धता नहीं होती? और अगर वे प्रतिबद्ध हैं, तो क्या उनमें वास्तविकता नहीं हैं? अगर उनमें वास्तविकता है, तो उन्हें लोगों को सत्य के बारे में सहभागिता करते सुनकर खुश होना चाहिए, उनमें इसकी लालसा होनी चाहिए। तो दुष्टात्माओं के कब्जे की स्थिति क्यों उत्पन्न होती है? यह साबित करता है कि उनकी सामान्य शिष्टता पूरी तरह से झूठी है—सत्य ने उन्हें उजागर कर दिया है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे परमेश्वर के घर को अपना निजी क्षेत्र मानते हैं' से उद्धृत

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर दुष्ट हरकतें करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

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