110. असली और नकली कलीसियाओं के बीच भेद करने के सिद्धांत

(1) यह निर्धारित करो कि क्या कलीसिया के जीवन में पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है; क्या इसकी सभा परमेश्वर के वचनों को खाती और पीती है और वास्तव में सत्य पर सहभागिता करती है; और क्या इससे एक व्यावहारिक प्रभाव उत्पन्न होता है;

(2) यह निर्धारित करो कि क्या कलीसिया के अगुवा सत्य से प्रेम और उसका अनुसरण करते हैं; क्या उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है; और क्या वे वास्तव में सत्य को समझते और इसे व्यवहार में लाते हैं;

(3) यह निर्धारित करो कि क्या वास्तव में, कलीसिया में सत्य का बोलबाला है, या दुष्ट लोगों का; और क्या सत्य का अनुसरण करने वाले लोग वहाँ शासन करते हैं, या बुरे और उपद्रवी लोग;

(4) केवल उन लोगों की सभा एक कलीसिया कहलाने के योग्य होती है जो सत्य का अनुसरण करती हो और जिसके पास पवित्र आत्मा का कार्य हो; जहाँ दुष्ट और संभ्रमित लोग इकट्ठा होते हैं, वह धर्म का स्थान होता है, किसी कलीसिया का नहीं।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" (मत्ती 18:19-20)।

"यीशु ने परमेश्‍वर के मन्दिर में जाकर उन सब को, जो मन्दिर में लेन-देन कर रहे थे, निकाल दिया, और सर्राफों के पीढ़े और कबूतर बेचनेवालों की चौकियाँ उलट दीं; और उनसे कहा, 'लिखा है, "मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा"; परन्तु तुम उसे डाकुओं की खोह बनाते हो'" (मत्ती 21:12-13)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं, वे शैतान के नियंत्रण में और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और उसमें सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा में मौजूद लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीएँगे और पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा, जो उसके नाम की खातिर उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें परमेश्वर के साथ उचित सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए सिद्धांत के अनुसार होता है। यह वह नहीं है, जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मेलन कहा जा सकता है, उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में तो बिलकुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई संबंध नहीं है, और वह परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ तो बिलकुल भी नहीं सकता। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और एकदम अनुल्लेखनीय हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिया गया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं, क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नाम की तख्ती के नीचे जो उन्हें अच्छा लगता है, वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके प्रति शत्रुता रखते हैं और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

क्यों यहोवा पर विश्वास करने वालों को परमेश्वर कौन-सा नाम देता है? यहूदी धर्म। वे एक प्रकार का धार्मिक समूह बन गए। और परमेश्वर उन लोगों को कैसे परिभाषित करता है जो यीशु पर विश्वास करते हैं? (ईसाई धर्म।) परमेश्वर की नज़रों में, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म धार्मिक समूह हैं। परमेश्वर उन्हें इस प्रकार क्यों परिभाषित करता है? उन सभी के बीच जो परमेश्वर द्वारा परिभाषित इन धार्मिक निकायों के सदस्य हैं, क्या कोई ऐसा है जो परमेश्वर से डरता है और बुराई से दूर रहता है, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है? (नहीं।) यह इस बात को स्पष्ट करता है। परमेश्वर की नज़रों में, क्या वे सभी लोग जो परमेश्वर का नाममात्र के लिए अनुसरण करते हैं, ऐसे लोग होते हैं जिन्हें परमेश्वर विश्वासियों के रूप में होना स्वीकार करता है? क्या उन सभी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध हो सकता है? क्या वे सभी परमेश्वर के उद्धार के लिए लक्ष्य हो सकते हैं? (नहीं।) तो क्या ऐसा दिन आएगा जब तुम लोग उसमें बदल जाओगे जिसे परमेश्वर धार्मिक समूह के रूप में देखता है? (यह संभव है।) एक धार्मिक समूह के रूप में देखा जाना, यह अचिंतनीय प्रतीत होता है। यदि लोग परमेश्वर की नज़र में एक धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं, तो क्या वे उसके द्वारा बचाए जाएंगे? क्या वे परमेश्वर के घर के हैं? (नहीं वे नहीं।) तो सारांश करने का प्रयास करो: ये लोग, जो नाममात्र के लिए सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन जिन्हें परमेश्वर एक धार्मिक समूह का हिस्सा मानता है—वे किस रास्ते पर चलते हैं? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि ये लोग कभी भी उसके परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग का अनुसरण या उसकी आराधना नहीं करते हुए और उसका त्याग करते हुए, विश्वास के झंडे को लहराने के मार्ग पर चलते हैं? अर्थात्, वे परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग पर चलते हैं लेकिन परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं करते और उसे त्याग देते हैं; उनका मार्ग ऐसा है जिसमें वे विश्वास तो परमेश्वर पर करते हैं लेकिन शैतान की पूजा करते हैं, वे हैवान की आराधना करते हैं, वे अपने स्वयं के प्रबंधन को अंजाम देने, और अपना राज्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं। क्या यही इसका सार है? क्या इस तरह के लोगों का मनुष्य के उद्धार की परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई संबंध है? (नहीं।) चाहे कितने भी लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, जैसे ही उनके विश्वासों को परमेश्वर द्वारा धर्म या समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, तब परमेश्वर ने निर्धारित किया है कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? किसी गिरोह या लोगों की भीड़ में जो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से रहित हैं और जो उसकी आराधना बिल्कुल भी नहीं करते हैं, वे किसकी आराधना करते हैं? वे किसका अनुसरण करते हैं? रूप और नाम में, वे एक इंसान का अनुसरण करते हैं, लेकिन वास्तव में वे किसका अनुसरण करते हैं? अपने हृदय में वे परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे मानवीय हेरफेर, व्यवस्थाओं और नियंत्रण के अधीन हैं। वे शैतान, हैवान का अनुसरण करते हैं; वे उन ताक़तों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, जो परमेश्वर की दुश्मन हैं। क्या परमेश्वर इस तरह के लोगों के झुण्ड को बचाएगा? (नहीं।) क्यों? क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? (नहीं।) वे मानव उद्यमों को चलाते हुए, अपने स्वयं के प्रबंधन का संचालन करते हुए विश्वास का झंडा लहराते हैं, और मनुष्यजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत चलते हैं। उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किया जाना है; परमेश्वर इन लोगों को संभवतः नहीं बचा सकता है, वे संभवतः पश्चाताप नहीं कर सकते है, वे पहले से ही शैतान के द्वारा पकड़ लिए गए हैं—वे पूरी तरह से शैतान के हाथों में हैं। तुमने कितने वर्ष परमेश्वर में विश्वास किया है, क्या तुम्हारी आस्था में इसका असर इस बात पर पड़ता है कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? क्या तुम्हारे रस्मों और विनियमों के पालन करने का कुछ महत्व है? क्या परमेश्वर लोगों के अभ्यास के तौर-तरीकों को देखता है? क्या वह देखता है कि वहाँ कितने लोग हैं? उसने मानवजाति के एक हिस्से को चुना है; वह कैसे मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है और बचाया जाना चाहिए? उसका यह निर्णय उन मार्गों पर आधारित होता है जिन पर ये लोग चलते हैं। अनुग्रह के युग में, हालांकि परमेश्वर द्वारा लोगों को बताए गए सत्य आज की तरह इतने अधिक नहीं थे और इतने विशिष्ट नहीं थे, वह फिर भी उस समय लोगों को पूर्ण बना सका और तब भी उनका उद्धार संभव था। और इसलिए इस युग के लोग, जिन्होंने बहुत से सत्य सुने हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को समझ पाये हैं, अगर वे परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और उद्धार के मार्ग पर चलने में असमर्थ हैं, तो उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम उन्हीं के समान होगा जो ईसाई और यहूदी धर्म को मानते हैं; कोई अंतर नहीं होगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है! चाहे तूने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, और तू कितने सत्यों को समझ चुका हो, यदि अंततः तू अभी भी लोगों का अनुसरण करता है और शैतान का अनुसरण करता है, और अंततः, तू अभी भी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में अक्षम हैं और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ है, तो इस तरह के लोगों से परमेश्वर द्वारा नफ़रत की जाएगी और उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। हर पहलू से, ये लोग जो परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किए जाते हैं वे पत्रों और सिद्धांतों के बारे में ज्यादा बात कर सकते हैं, और बहुत से सत्य समझते हैं और फिर भी वे परमेश्वर की आराधना करने में असमर्थ होते हैं; वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारी होने में असमर्थ हैं। परमेश्वर की नज़रों में, परमेश्वर उन्हें धर्म के रूप में, मनुष्य मात्र के एक समूह के रूप में, एक इंसानों का गिरोह और शैतान के लिए एक निवास स्थान के रूप में परिभाषित करता है। उन्हें सामूहिक रूप से शैतान का गिरोह कहा जाता है, और परमेश्वर उनसे पूरी तरह से घृणा करता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

मसीह के शत्रुओं द्वारा शासित किसी भी कलीसिया को कलीसिया नहीं कहा जा सकता, और जिसने भी इसका अनुभव किया है वह इस बात को समझता है। यहां पर शांतिपूर्ण, खुशहाल, सक्रिय माहौल नहीं है; इसके बजाय, यहां पर कोलाहल मचा हुआ है, जहां हर एक का दिल बेचैनी और व्यग्रता की भावना से बेहद परेशान है, और उनके अंदर घबराहट और संदेह की भावना घर कर गयी है, मानो कोई बड़ी आपदा आने वाली है। मसीह के शत्रुओं के भाषण और उनके कार्यों से एक ऐसा वातावरण बन सकता है जो लोगों के दिलों को मैला कर सकता है, जिससे वे सकारात्मक और नकारात्मक चीज़ों के बीच अंतर नहीं कर पाते हैं। इसके अलावा, जब मसीह के शत्रु लंबे समय तक लोगों को धोखा देते हैं, तब लोगों के दिल परमेश्वर से और भी दूर हो जाते हैं, और परमेश्वर के साथ उनका संबंध सामान्य नहीं रहता, मानो वे धर्म के दायरे में जी रह रहे हों। एक व्यवहारिक समस्या यह भी है कि कलीसिया में विभाजन दिखाई देता है, और जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उन्हें न तो वहां बैठक का आनंद आता है और न ही कोई लाभ प्राप्त होता है। वे कलीसिया छोड़कर अपनी अलग बैठकें आयोजित करना चाहते हैं। जब पवित्र आत्मा किसी कलीसिया में काम करता है, चाहे लोग सत्य को समझें या न समझें, तो हर कोई एक ही लक्ष्य के लिए काम करता है, और वातावरण शांतिपूर्ण, स्थिर और बाधारहित होता है। हालांकि, जैसे ही मसीह के शत्रु कोई कदम उठाते हैं, वातावरण बेचैन और विचित्र हो जाता है। जहां भी वे गड़बड़ी मचाते हैं, वहां पर अनेक गुट पैदा हो जाते हैं; लोग एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो जाते हैं, एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, एक-दूसरे पर हमला करते हैं, और पीठ पीछे एक-दूसरे की बुराई करते हैं। मसीह के शत्रु स्पष्ट रूप से क्या भूमिका निभा रहे हैं? उनकी भूमिका शैतान के अनुचरों जैसी है। मसीह के शत्रुओं के कार्यों के परिणाम: एक तो यह है कि भाई-बहन एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, एक-दूसरे पर संदेह करते हैं, और एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो जाते हैं; इसके अतिरिक्त, पुरुषों और महिलाओं के बीच अब कोई सीमा नहीं रह गयी है, वे आपस में घुलने-मिलने लगे हैं; एक और बात यह है कि लोगों के दिलों में दर्शन धुंधले हो रहे हैं, वे अब सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान नहीं दे रहे, और न ही सत्य के सिद्धांतों के अनुसार काम करना जानते हैं। पहले वे जिन बातों को जानते थे, वे अब लुप्त हो चुकी हैं। अब उनके विचार संभ्रमित हो गए हैं, और वे बाहरी प्रदर्शनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए और इधर-उधर भटकते हुए, आँखें मूंदकर मसीह के शत्रुओं का अनुसरण करते हैं। कुछ लोग समझ सकते हैं कि मसीह के शत्रुओं का अनुसरण करना वास्तव में एक अंधी गली में चलने की तरह है, और वे समझ सकते हैं कि अगर सभी लोग जिन्हें सत्य की खोज है, एक साथ मिलें और अपना कर्तव्य निभाएं तो कितना सुखद होगा। जब मसीह के शत्रु सत्ता छीन लेते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं करता, और सभी भाई-बहन अपने अंतर्मन के अंधेरे में खो जाते हैं, वे परमेश्वर पर विश्वास करने या अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित नहीं होते। यदि यह लंबे समय तक चलता रहे, तो क्या परमेश्वर उन्हें बाहर नहीं निकाले देगा?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (4)' से उद्धृत

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया क्या है? कलीसिया उन लोगों का समूह है जो परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं। ये लोग एक साथ इकट्ठा होकर परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, और परमेश्वर की आराधना करते हैं, अपना कर्तव्य निभाते हैं, और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हैं। केवल ऐसी जगह को ही कलीसिया कहा जा सकता है। दुष्ट लोग कलीसिया से संबंधित नहीं होते। यदि ऐसे लोगों का समूह एक साथ इकट्ठा हो जो सत्य की खोज नहीं करता और सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कुछ नहीं करता, तो यह कलीसिया नहीं है। तो, यह किस प्रकार की जगह होगी? यह बस एक धार्मिक स्थल या कोई जमावड़ा हो सकता है। इस प्रकार, जब तुम यह आंकलन करते हो कि कोई जगह कलीसिया है या नहीं, तो तुम्हें सबसे पहले यह देखना चाहिए कि इसकी सभा में किस प्रकार के लोग हैं। दूसरा, तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि उनमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। यदि उनमें यह नहीं है तो उनकी धार्मिक सभा कलीसिया नहीं है, और यदि यह उन लोगों का जनसमूह नहीं है जो सत्य की खोज करते हैं, तो यह कलीसिया नहीं है। यदि किसी कलीसिया में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सचमुच सत्य की खोज करता है, तो यह कलीसिया पवित्र आत्मा के कार्य से रहित है; यदि इसमें कोई व्यक्ति हो जो सत्य की खोज करना चाहता हो, फिर भी वह ऐसी कलीसिया में बना रहता है, तो उस व्यक्ति को बचाया नहीं जा सकता है। ऐसे व्यक्ति को उस जमावड़े को छोड़ देना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके किसी वास्तविक कलीसिया को ढूँढना चाहिए। यदि, किसी कलीसिया के भीतर, तीन या पाँच ऐसे लोग हों जो सत्य की खोज करते हों, और बाकी के तीस या पचास लोग केवल जमावड़ा हों, तो उन तीन या पाँच लोगों को जो परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं, एक साथ इकट्ठा हो जाना चाहिए; यदि वे एक साथ एकत्रित हो जाते हैं तो उनका जनसमूह तब भी एक कलीसिया कहला सकता है—बहुत कम सदस्यों वाली एक कलीसिया जो कि शुद्ध है। भले ही आप किसी भी कलीसिया का हिस्‍सा हों, आपको यह देखना चाहिए कि उसमें ऐसे कौन से लोग हैं, जो वास्‍तव में परमेश्‍वर के काम की रक्षा करते हैं, जो पवित्र आत्‍मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्‍यक्ति के मार्गदर्शन और चरवाही को स्‍वीकार कर सकते हैं, जो सत्‍य की खोज करते हुए परमेश्‍वर के वचनों और ऊपर की कार्य व्‍यवस्‍था के अनुसार अपने कर्तव्‍यों का पालन करते हैं। ये उस प्रकार के लोग हैं जो सत्‍य की खोज करते हैं, जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य होता है, और कुछ सत्‍य-वास्‍तविकताओं को समझते हैं; ये वे लोग हैं जो वास्‍तव में पूर्वनियत हैं और परमेश्‍वर द्वारा चुने गए हैं। जब तुम ऐसे ही लोगों को खोज कर उनके साथ एकजुट होगे तभी तुम्हारे पास कलीसिया का जीवन होगा। यदि, आंतरिक संघर्ष या आपदाओं से घिरने पर तुम्हारे साथ एक भी व्‍यक्ति ऐसा न हो जो वास्‍तव में सत्‍य की खोज करता हो, जिसके साथ तुम एकत्र हो सको, तब तुम्हारे लिए समस्‍या हो जाएगी और तुम्हें अपनी गवाही पर अडिग रहने में कठिनाई होगी। इस प्रकार, तुम्हें ऐसे ही लोगों की खोज करनी चाहिए जो सच्‍चे हृदय से परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हों और वास्‍तव में उसके द्वारा पूर्वनियत किए गए और चुने गए हों, उनके साथ एकत्र हो—कलीसिया का जीवन एक साथ जीते हुए, परमेश्‍वर के वचनों को खाते और पीते हुए, प्रार्थना करते हुए, भजन गाते हुए, स्‍तुति गान करते हुए—केवल तभी तुम पवित्र आत्‍मा के प्रबोधन और रोशनी को पा सकोगे। भले ही बहुत अधिक सदस्‍य न हों—बस गिने-चुने व्‍यक्ति हों, फिर भी यह एक कलीसिया होगी। यदि सभा में ऐसे कोई सदस्‍य न हों जो सत्‍य की खोज करें या जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य हो, तो भले ही उस सभा में कितने भी व्‍यक्ति क्‍यों न शामिल हों, यह फिर भी एक कलीसिया नहीं है। इस प्रकार, कलीसिया की परिभाषा जानना बहुत महत्‍वपूर्ण है। यह तुम्हारे लिए मार्गदर्शक का काम करती है। आपादाओं से घिरने पर या आंतरिक संघर्ष होने पर, तुम्हें उन लोगों के सभा में शामिल होना चाहिए जो सत्‍य की खोज करते हुए पवित्र आत्‍मा का प्रबोधन और रोशनी से युक्त हों; केवल तभी तुम्हारे पास कलीसिया का जीवन होगा।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

एक वास्‍तविक कलीसिया परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों से बनती है। इसमें ऐसे लोग शामिल होते हैं, जो वास्‍तव में परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं, सत्‍य की खोज करते हैंहुए, पवित्र आत्‍मा के कार्य से युक्त होते हैं। ऐसे लोग जब आपस में मिल कर, परमेश्‍वर के वचनों को खाते और पीते हैं और पवित्र आत्‍मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन किए जाते हैं, और उनकी संगति से सभी लोग आनंद, प्रतिफल, पवित्र आत्‍मा की स्वीकृति प्राप्‍त कर सकते हैं। यही एक वास्‍तविक कलीसिया है। कुछ व्‍यक्ति, जो दुष्ट शैतान हैं और जिन्‍हें परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों ने अलग करते हुए हटा दिया था, वे आपस में सभा करके निरंतर परस्‍पर बनावटी शब्दों और सिद्धांतों की बात करते हैं, उनके पास पवित्र आत्‍मा का लेश मात्र भी कार्य नहीं होता। ये झूठी कलीसियाएँ हैं; ऐसी सभाएं जमावड़े से अधिक कुछ नहीं हैं। हमें अपनी विवेक बुद्धि से जानना चाहिए कि कौन सी कलीसियाएँ झूठी हैं। सबसे पहले, हमें यह तय करना होगा कि कलीसिया में पवित्र आत्‍मा का कोई कार्य नहीं है, सभाओं के दौरान होने वाली संगति में बनावटी शब्दों और सिद्धांतों के अतिरिक्‍त कुछ न हो, परमेश्‍वर के वचनों की झूठी व्‍याख्‍या हो, कोई भी सच्चे ज्ञान के विषय में कुछ भी कहने के योग्‍य न हो, और किसी को भी किसी तरह के आनंद की अनुभूति न हो। दूसरे, एक कलीसिया के नेता ऐसे व्‍यक्ति नहीं हैं जो सत्‍य की खोज करते हुए पवित्र आत्‍मा के कार्य से युक्त होते हैं, और कोई ऐसा न हो, जो सही मायनों में सत्‍य को समझ सके और परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों का सिंचन और उनकी आपूर्ति कर सके। यह सुनिश्चित करता है कि इस कलीसिया में पवित्र आत्‍मा का कार्य नहीं है। तीसरे, संपूर्ण कलीसिया मूल रूप से दुष्‍ट व्‍यक्तियों के समूह के नियंत्रण में आ गयी है और उन व्‍यक्तियों के कब्‍जे में है जो पवित्र आत्‍मा के कार्य से रहित हैं, और सत्‍य की खोज करने वाले सदस्‍यों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, उनका दमन किया जाता है और वे सामान्‍य रूप से अपने कर्तव्‍यों का पालन नहीं कर सकते। कोई भी ऐसी सभा जो इन तीनों में से किन्‍हीं भी परिस्थितियों में हो, झूठी कलीसिया है। किसी सभा में पवित्र आत्‍मा के कार्य का अभाव क्‍यों होता है? मुख्‍य रूप से, ऐसा तब होता है जब इसके अगुआ ऐसे व्‍यक्ति नहीं होते जो सत्‍य की खोज करते हैं या जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य होता है। इसी वजह से सभा में भी पवित्र आत्‍मा का लेशमात्र भी कार्य नहीं होता। यदि एक कलीसिया झूठे अगुआओं और ऐसे लोगों के नियंत्रण में आ जाती है जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य नहीं होता, और इसके पवित्र आत्‍मा के कार्य से युक्त सदस्‍यों का दमन करते हुए प्रतिबंधित किया जाता है, और वे सामान्‍य तौर पर अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह नहीं कर पाते, तब यह सभा पूरी तरह से पवित्र आत्‍मा के कार्यो से रहित है और एक झूठी कलीसिया बन गयी है। यदि किसी कलीसिया के अगुआ पवित्र आत्‍मा के कार्य से रहित हैं परंतु वास्‍तव में, परमेश्‍वर पर विश्‍वास करते हैं, उनमें अपेक्षाकृत अच्‍छी मानवता है, और ऐसे व्‍यक्तियों की सहायता कर सकते हैं जो सत्य की खोज करते हैं और जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य होता है, और उन्‍हें महत्‍वपूर्ण पद प्रदान करते हैं, तब यह एक झूठी कलीसिया नहीं है। यदि सभा के कुछ लोग, जो सत्‍य की खोज करते है, जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य होता है और अपने कर्तव्‍यों का सामान्‍य रूप से निर्वाह कर सकते हैं, सत्‍य पर संगति कर सकते हैं और परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों का सिंचन और उनकी आपूर्ति कर सकते हैं, तो इस कलीसिया में भी पवित्र आत्‍मा का कार्य है। इस प्रकार, कोई कलीसिया सच्‍ची है अथवा झूठी, इसका निर्धारण करते समय, व्‍यक्ति को केवल इसके अगुआओं को ही नहीं देखना चाहिए। बस इसलिए कि किसी कलीसिया के अगुआ सत्‍य की खोज नहीं करते और पवित्र आत्‍मा के कार्य से युक्त नहीं हैं, यह दावा करना अनुचित होगा कि पूरी कलीसिया झूठी है। यहाँ मुख्य यह देखना है कि जो सदस्‍य सत्‍य की खोज करते हैं और जिनमें पवित्र आत्‍मा का कार्य है, वे सामान्‍य रूप से अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह कर पा रहे हैं या नहीं और कहीं उन्‍हें दबाया तो नहीं जा रहा। यदि इन लोगों का दमन होता है और वे सामान्‍य रूप से अपने कतर्व्‍यों का निर्वाह नहीं कर सकते, और पूरी सभा ऐसे व्‍यक्तियों के नियंत्रण में है जिनके पास पवित्र आत्‍मा का कार्य नहीं है, तब इसने पूरी तरह से पवित्र आत्‍मा के कार्य को खो दिया है, और वास्‍तव में, एक झूठी कलीसिया है। कोई कलीसिया झूठी है अथवा सच्‍ची, इसे इस तरह समझा जाता है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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