49. स्‍वयं को नकारने और शारीरिक इच्‍छाओं को त्‍यागने के सिद्धांत

(1) परमेश्‍वर के वचनों के आधार पर, व्‍यक्ति का अपने भ्रष्‍ट सार के बारे में जानना, और इस सत्‍य को समझना जरूरी है कि शरीर शैतानी प्रकृति से नियंत्रित है। इस तरह, व्‍यक्ति शरीर से सच्‍चे अर्थों में घृणा कर सकता है।

(2) कोई मामला मनुष्‍य द्वारा जितना ही ज्यादा असंभव मान लिया गया हो, और जितना ही कम वह उसकी धारणाओं और कल्पनाओं से मेल खाता हो, उतनी ही ज्यादा उसे सत्‍य की खोज करनी चाहिए, खुद को नकारना चाहिए, और परमेश्‍वर के प्रति समर्पण करना चाहिए।

(3) मनुष्‍य की धारणाएँ, कल्‍पनाएँ, और अनुभूतियाँ चाहे कितनी ही सही क्‍यों न हों, वे सत्‍य नहीं हैं, और परमेश्‍वर के वचन मनुष्‍य की धारणाओं से कितना ही कम मेल क्‍यों न खाते हों, उसके वचन सत्‍य हैं।

(4) तमाम मामलों में सत्‍य-सिद्धांत को तलाशना, अपनी मान्‍यताओं और दृ‍ष्टिकोणों को त्‍यागना, और शारीरिक इच्‍छाओं का परित्‍याग करना आवश्‍यक है। केवल इसी तरह व्‍यक्ति सत्‍य का अभ्‍यास कर सकता है और मनुष्‍य की तरह जी सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यदि लोग वास्तव में मानव-जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव-जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकें, तो वे अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को एक खजाने के रूप में अपने दिल में थामे नहीं रहेंगे। तब वे अपने उन माता-पिता की सेवा करने में और दिलचस्पी नहीं रखेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य का भविष्य और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित "माता-पिता" नहीं हैं? वे मनुष्य के मांस और रक्त की तरह हैं। देह का गंतव्य और भविष्य भला क्या होगा? क्या वह जीते-जी परमेश्वर का दर्शन करना होगा, या मृत्यु के बाद आत्मा का परमेश्वर से मिलना? क्या कल देह क्लेशों की एक बड़ी भट्ठी में नष्ट होगी, या अग्निकांड में? क्या इस तरह के प्रश्न इससे संबंधित नहीं हैं कि क्या मनुष्य की देह दुर्भाग्य सहन करेगी, या उस सबसे बड़ी खबर से पीड़ित होगी, जिससे इस वर्तमान धारा में कोई भी व्यक्ति, जिसके पास दिमाग है और जो समझदार है, सबसे ज्यादा चिंतित है? (यहाँ पीड़ा आशीर्वाद पाने से संबंध रखती है; इसका अर्थ है कि भविष्य के परीक्षण मनुष्य के गंतव्य के लिए लाभदायक हैं। दुर्भाग्य का मतलब है दृढ़ता से खड़ा न रह पाना या धोखा खाना; या इसका मतलब है व्यक्ति को दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ मिलेंगी और वह आपदाओं के बीच अपना जीवन गँवा देगा, और कि व्यक्ति की आत्मा के लिए कोई उपयुक्त गंतव्य नहीं है।) यद्यपि मनुष्यों के पास ठोस विवेक है, लेकिन संभवतः वे जो सोचते हैं, वह उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता, जिससे उनका विवेक सुसज्जित होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे सब अपेक्षाकृत भ्रमित हैं और आँख मूँदकर चीज़ों का अनुसरण करते हैं। उन सभी को इस बात की पूरी समझ होनी चाहिए कि उन्हें किस चीज़ में प्रवेश करना चाहिए, और विशेष रूप से, उन्हें यह पता लगाना चाहिए कि क्लेश के दौरान किस चीज़ में प्रवेश किया जाना चाहिए (यानी, भट्ठी में शुद्धिकरण के दौरान), और साथ ही, उन्हें अग्नि-परीक्षाओं के दौरान किस-किस चीज़ से लैस होना चाहिए। हमेशा अपने माता-पिता (अर्थात देह) की सेवा न करो, जो सूअरों और कुत्तों की तरह हैं, और चींटियों और कीड़ों से भी बदतर हैं। इस पर दुखी होने, इतना सोच-विचार करने और अपने दिमाग को परेशान करने से क्या फायदा? यह देह तेरी अपनी नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर के हाथों में है, जो न केवल तुझे नियंत्रित करता है, बल्कि शैतान को भी आज्ञा देता है। (मूलतः इसका अर्थ है कि यह देह मूलत: शैतान की है। चूँकि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है, इसलिए इसे केवल इसी तरह से कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि इसे इस तरह से कहना अधिक प्रेरणास्पद है; यह बताता है कि मानव पूरी तरह से शैतान के अधिकार-क्षेत्र में नहीं, बल्कि परमेश्वर के हाथों में हैं।) तू देह के उत्पीड़न तले जी रहा है, लेकिन क्या देह तेरी है? क्या यह तेरे नियंत्रण में है? इस पर परेशान होकर क्यों अपना दिमाग ख़राब करता है? क्यों पागलों की तरह अपनी बदबूदार देह के लिए, जो लंबे समय से निंदित, शापित और अशुद्ध आत्माओं द्वारा मलिन की गई है, परमेश्वर से आग्रह करने की परेशानी उठाता है? शैतान के सहयोगियों को हमेशा अपने दिल के इतने करीब रखने की क्या ज़रूरत है? क्या तुझे चिंता नहीं है कि देह तेरे वास्तविक भविष्य को, तेरी अद्भुत आशाओं को और तेरे जीवन के वास्तविक गंतव्य को बरबाद कर सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य' से उद्धृत

यदि तू आखिरी दिनों के तीस प्रतिशत कार्य को समझ सके (इस केवल तीस प्रतिशत का अर्थ है आज पवित्र आत्मा के कार्य के साथ-साथ अंत के दिनों में परमेश्वर के वचन के कार्य को समझना), तो तू आज की तरह अपनी देह की "सेवा" करना या उसके साथ "संतानोचित" व्यवहार करना जारी नहीं रखेगा, जो कई वर्षों से भ्रष्ट हो गई है। तुझे स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि मनुष्य अब एक अभूतपूर्व स्थिति में आगे बढ़ चुके हैं और अब वे इतिहास के पहियों की तरह आगे लुढ़कते नहीं रहेंगे। तेरी फफूंदी लगी हुई देह लंबे समय से मक्खियों से आच्छादित है, तो कैसे उसमें इतिहास के उन पहियों को उलटाने की शक्ति हो सकती है, जिन्हें परमेश्वर ने आज तक चलते रहने में समर्थ बनाया है? कैसे वह अंत के दिनों की चुपचाप टिकटिक करती घड़ी को दोबारा चालू कर सकती है और उसकी सुइयाँ घड़ी की दिशा में मोड़ सकती है? कैसे वह घने कोहरे में लिपटी प्रतीत होने वाली दुनिया को पुनः रूपांतरित कर सकती है? क्या तेरी देह पहाड़ों और नदियों को फिर से जीवित कर सकती है? क्या तेरी देह, जिसका छोटा-सा काम है, वास्तव में मानव की उस तरह की दुनिया को बहाल कर सकती है, जिसकी तूने लालसा की है? क्या तू वास्तव में अपने वंशजों को "मानव" बनने के लिए शिक्षित कर सकता है? क्या तू अब समझ सकता है? तेरी देह वास्तव में किसकी है? मानव को बचाने, उसे परिपूर्ण करने और उसे रूपांतरित करने का परमेश्वर का मूल इरादा तुझे एक खूबसूरत मातृभूमि देना या मनुष्य की देह को शांतिपूर्ण आराम प्रदान करना नहीं था; यह परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए था, भविष्य में मनुष्यों के बेहतर आनंद के लिए था, और इसलिए था कि वे शीघ्र ही आराम कर सकें। फिर भी, यह तेरी देह के लिए नहीं था, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन की पूँजी है और मनुष्य की देह एक अनुलग्नक मात्र है। (मानव आत्मा और शरीर दोनों का पिंड है, जबकि देह केवल एक सड़ने वाली चीज़ है। इसका मतलब है कि देह प्रबंधन योजना में इस्तेमाल के लिए एक उपकरण है।) तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्यों को पूर्ण बनाना, उन्हें पूरा करना और उन्हें प्राप्त करना उसकी देह पर तलवारों और प्रहारों के, और साथ ही अंतहीन पीड़ा, अग्निकांड, निष्ठुर न्याय, ताड़ना, शाप और असीम परीक्षणों के सिवाय कुछ नहीं लाया है। ऐसी है मानव का प्रबंधन करने के कार्य की अंदर की कहानी और सच्चाई। किंतु ये सभी चीज़ें मनुष्य की देह पर निर्देशित हैं, और शत्रुता के सभी तीर निर्दयतापूर्वक मनुष्य की देह पर लक्षित हैं (क्योंकि मनुष्य निर्दोष है)। यह सब परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए है। इसका कारण यह है कि उसका कार्य केवल मानव-जाति के लिए नहीं है, बल्कि पूरी योजना के लिए भी है और साथ ही मानव-जाति के सृजन के समय की उसकी मूल इच्छा पूरी करने के लिए भी है। इसलिए, मनुष्य जो अनुभव करता है, उसके शायद नब्बे प्रतिशत में पीड़ाएँ और अग्नि-परीक्षाएँ शामिल हैं, और वे मीठे और सुखद दिन बहुत कम या बिलकुल नहीं हैं, जिनके लिए मनुष्य की देह लालायित रही है। परमेश्वर के साथ खूबसूरत समय बिताते हुए देह में सुखद पलों का आनंद लेने में तो मनुष्य बिलकुल भी सक्षम नहीं है। देह मलिन है, इसलिए मनुष्य की देह जो देखती है या भोगती है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे मनुष्य प्रतिकूल पाता है, मानो उसमें सामान्य बुद्धि की कमी हो। इसका कारण यह है कि परमेश्वर अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करेगा, जो मनुष्य को पसंद नहीं है, जो मनुष्य के अपराधों को बरदाश्त नहीं करता, और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर अपना स्वभाव किसी भी तरीके से खुले तौर पर प्रकाशित करता है, और इस तरह शैतान के साथ अपने छह-हजार-वर्षीय युद्ध का कार्य पूरा करता है—जो संपूर्ण मानव-जाति के उद्धार और पुराने शैतान के विनाश का कार्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य' से उद्धृत

जब ऐसा कुछ होता है, जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को एक तरफ़ रख दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज़ नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए, और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तो सबसे पहले तुम्हें अपने आपको एक तरफ़ रखना और देह को सभी चीज़ों में सबसे अधम समझना चाहिए। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक स्वतंत्रता लेता है; यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो, तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगा। जब यह जारी रहता है, लोग देह को और अधिक प्रेम करने लग जाते हैं। देह की हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा चाहता है कि तुम इसे संतुष्ट और भीतर से प्रसन्न करो, चाहे यह उन चीज़ों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो, या जिनमें आपा खो देते हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही बड़ी हो जाती हैं, और उतना ही अधिक वह ऐयाश बन जाता है, जब तक कि वह उस स्थिति तक नहीं पहुँच जाता, जहाँ लोगों का देह और अधिक गहरी धारणाओं को आश्रय देता है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है और स्वयं को महिमामंडित करता है, और परमेश्वर के कार्य के बारे में संशयात्मक हो जाता है। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उतनी ही बड़ी देह की कमज़ोरियाँ होती हैं; तुम हमेशा महसूस करोगे कि कोई भी तुम्हारी कमज़ोरियों के साथ सहानुभूति नहीं रखता, तुम हमेशा विश्वास करोगे कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया है, और तुम कहोगे : "परमेश्वर इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? वह लोगों का पीछा क्यों नहीं छोड़ देता?" जब लोग देह को संतुष्ट करते हैं, और उससे बहुत अधिक प्यार करते हैं, तो वे अपने आपको बरबाद कर बैठते हैं। यदि तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हो, और देह को संतुष्ट नहीं करते, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह बहुत सही और बहुत अच्छा होता है, और यह कि तुम्हारे विद्रोह के लिए उसका शाप और तुम्हारी अधार्मिकता के बारे में उसका न्याय तर्कसंगत है। कई बार ऐसा होगा, जब परमेश्वर तुम्हें अपने सामने आने के लिए बाध्य करते हुए ताड़ना देगा और अनुशासित करेगा, और तुम्हें तैयार करने के लिए माहौल बनाएगा—और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है, वह अद्भुत है। इस प्रकार तुम ऐसा महसूस करोगे, मानो कोई ज्यादा पीड़ा नहीं है, और यह कि परमेश्वर बहुत प्यारा है। यदि तुम देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देते हो, और कहते हो कि परमेश्वर अति कर देता है, तो तुम हमेशा पीड़ा का अनुभव करोगे और हमेशा उदास रहोगे, और तुम परमेश्वर के समस्त कार्य के बारे में अस्पष्ट रहोगे, और ऐसा प्रतीत होगा मानो परमेश्वर मनुष्यों की कमज़ोरियों के प्रति बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं रखता, और वह मनुष्यों की कठिनाइयों से अनजान है। और इस प्रकार से तुम हमेशा दुःखी और अकेला महसूस करोगे, मानो तुमने बड़ा अन्याय सहा है, और उस समय तुम शिकायत करना आरंभ कर दोगे। जितना अधिक तुम इस प्रकार से देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा दोगे, उतना ही अधिक तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर बहुत अति कर देता है, जब तक कि यह इतना बुरा नहीं हो जाता कि तुम परमेश्वर के कार्य को नकार देते हो, और परमेश्वर का विरोध करने लगते हो, और अवज्ञा से भर जाते हो। इसलिए तुम्हें देह से विद्रोह करना चाहिए और उसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए : "मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, सम्भावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर है, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए भरसक प्रयास करना चाहिए और देह को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।" तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, और अपने आप को एक ओर करोगे, तो तुम ऐसा बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाओगे। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने एक साँप देखा, जो सड़क पर बर्फ में जम कर कड़ा हो गया था। किसान ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और साँप ने जीवित होने के पश्चात् उसे डस लिया, जिससे उस किसान की मृत्यु हो गई। मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार उसके जीवन को हानि पहुँचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तुम जीवन पर से अपना अधिकार खो बैठते हो। देह शैतान से संबंधित है। इसके भीतर असंयमित इच्छाएँ हैं, यह केवल अपने बारे में सोचता है, यह आरामतलब है और फुरसत में रंगरलियाँ मनाता है, सुस्ती और आलस्य में धँसा रहता है, और इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करने के बाद तुम अंततः इसके द्वारा खा लिए जाओगे। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे, तो अगली बार यह और अधिक की माँग करने आ जाएगा। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं, और अपने आपको और अधिक पोषित करवाने और उसके सुख के बीच रहने के लिए तुम्हारे द्वारा अपने को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाता है—और यदि तुम इस पर विजय नहीं पाओगे, तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे। तुम परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकते हो या नहीं, और तुम्हारा परम अंत क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे कार्यान्वित करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है, और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के लिए तैयार नहीं हो, तुम सत्य को अभ्यास में लाने के लिए तैयार नहीं हो, तुम अपनी देह के विरुद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने के लिए तैयार नहीं हो, जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता हो, तो अंततः तुम अपने आप को बरबाद कर लोगे, और इस प्रकार चरम पीड़ा सहोगे। यदि तुम हमेशा अपनी देह को खुश करते हो, तो शैतान तुम्हें धीरे-धीरे निगल लेगा, और तुम्हें जीवन या पवित्रात्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो जाते। जब तुम अंधकार में रहोगे, तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में अब परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे। इसलिए, यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें पीड़ा की क़ीमत चुकानी चाहिए और कठिनाई सहनी चाहिए। बाहरी जोश और कठिनाई, अधिक पढ़ने तथा अधिक भाग-दौड़ करने की कोई आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, उन्हें अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रख देना चाहिए : असंयमित विचार, व्यक्तिगत हित, और उनके स्वयं के विचार, धारणाएँ और प्रेरणाएँ। परमेश्वर की यही इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा लोगों के बाहरी स्वभाव से निपटना भी उसके कार्य का एक भाग है; उदाहरण के लिए, लोगों की बाहरी, असामान्य मानवता से, या उनकी जीवनशैली और आदतों, उनके तौर-तरीकों और रीति-रिवाजों, और साथ ही उनके बाहरी अभ्यासों और उनके जोश से निपटना। किंतु जब वह कहता है कि लोग सत्य को अभ्यास में लाएँ और अपने स्वभावों को बदलें, तो प्राथमिक रूप से जिन चीज़ों के साथ निपटा जा रहा है, वे हैं उनके भीतर के इरादे और प्रेरणाएँ। केवल तुम्हारे बाहरी स्वभाव से निपटना कठिन नहीं है; यह तुम्हें उन चीज़ों को खाने से मना करने के समान है जो तुम्हें पसंद हैं, जो कि आसान है। लेकिन जो तुम्हारे भीतर की धारणाओं को छूता है, उसे छोड़ना आसान नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग देह के खिलाफ़ विद्रोह करें, और एक क़ीमत चुकाएँ, और परमेश्वर के सामने कष्ट सहें। ऐसा विशेष रूप से लोगों के इरादों के साथ है। जबसे लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया है, उन्होंने कई ग़लत इरादों को प्रश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारे सभी इरादे सही हैं, किंतु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत-से गलत इरादे हैं। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम पहचान लेते हो कि तुम्हारे इरादे ग़लत हैं, तब यदि तुम अपनी धारणाओं और इरादों के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाते हो, और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो और अपने साथ घटित होने वाली हर बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। जब तुम देह के विरुद्ध विद्रोह करते हो, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान लोगों से अपना अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा, उनसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा और देह के हितों को बनाए रखेगा—किंतु परमेश्वर के वचन भीतर से लोगों को प्रबुद्ध करेंगे और उन्हें रोशनी प्रदान करेंगे, और उस समय यह तुम पर निर्भर करेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो या शैतान का। परमेश्वर लोगों से मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों से, उनके उन विचारों और धारणाओं से, जो परमेश्वर के मनोनुकूल नहीं हैं, निपटने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है। पवित्र आत्मा लोगों के हृदय में स्पर्श करता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है, उस सब के पीछे एक संघर्ष होता है : हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के लिए प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है, और यद्यपि अपने देह से सभी अच्छे दिखाई दे सकते हैं, किंतु वास्तव में, उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होता है—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद ही, अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार तय की जा सकती है। कोई यह नहीं जानता कि रोया जाए या हँसा जाए। क्योंकि मनुष्यों के भीतर के अनेक इरादे ग़लत हैं, या फिर चूँकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं के विपरीत होता है, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने से पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शोधन सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए व्यक्ति का अपने अंदर पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब-कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता न होती, और कोई संघर्ष न होता और वे पीड़ित न होते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीज़ें हैं, जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाए जाने योग्य नहीं हैं, और चूँकि देह का बहुत विद्रोही स्वभाव है, इसलिए लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है, जिसमें से उसने मनुष्य को अपने साथ गुज़रने के लिए कहा है। जब कठिनाइयों से तुम्हारा सामना हो, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कठिनाई सहना चाहता हूँ, और चाहे मैं कितनी भी बड़ी असफलताओं का सामना करूँ, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि मुझे अपना संपूर्ण जीवन भी त्यागना पड़े, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए!" इस संकल्प के साथ, जब तुम इस प्रकार प्रार्थना करोगे, तो तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

सत्य का अनुसरण दृढ़ता और दृढ़ संकल्प की माँग करता है। यदि इस बार तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में नाकाम हुए, तो तुम्हें अपने आप से घृणा हो जानी चाहिए, चुपचाप अपने दिल में दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि अगली बार तुम परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करोगे। यदि इस बार तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील नहीं रहे, तो तुम्हें भविष्य में समान बाधा का सामना करने पर शरीर के खिलाफ विद्रोह के लिए संकल्पित, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना चाहिए। इस प्रकार तुम प्रशंसा को पाने योग्य बनोगे। कुछ लोग तो यह भी नहीं जानते कि उनकी सोच और विचार सही हैं या नहीं; ऐसे लोग मूर्ख होते हैं! यदि तुम अपने दिल को वश में करना और शरीर के खिलाफ विद्रोह करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह जानना होगा कि क्या तुम्हारे इरादे अच्छे हैं; तभी तुम अपने दिल को वश में कर सकते हो। यदि तुम्हें यही नहीं पता कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं, तो क्या तुम अपने दिल को वश में और शरीर से विद्रोह कर सकते हो? यदि तुम विद्रोह कर भी दो, तो भी तुम ऐसा भ्रमित स्थिति में करोगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि अपने पथभ्रष्ट इरादों से विद्रोह कैसे करें; इसी को देह से विद्रोह करना कहते हैं। एक बार जब तुम जान लेते हो कि तुम्हारे इरादे, सोच और ख्याल गलत हैं, तो तुम्हें तत्काल मुड़ जाना चाहिए और सही पथ पर चलना चाहिए। सबसे पहले इस मुद्दे का समाधान करो, और इस संबंध में प्रवेश पाने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करो, क्योंकि तुम ही बेहतर जानते हो कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं। एक बार जब तुम्हारे गलत इरादे सही हो जाएँगे, और परमेश्वर के लिए होंगे, तब तुम अपने दिल को वश में करने के लक्ष्य को प्राप्त कर चुके होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

जब तुम्हारे साथ कुछ ऐसा होता है, जिसका तुम्हारी अवधारणाओं पर कोई असर नहीं होता, तुम परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाने में लगे रहतेहो। लेकिन जब कुछ ऐसा होता है जो तुम्हारी अवधारणाओं के विपरीत जाकर उनसे आगे निकल जाता है और उससे विरोधाभास पैदा होते हैं, तो तुम उन्हें कैसे दूर करते हो? क्या तुम अपनी अवधारणाओं की लगाम ढीली छोड़कर उन्हें मनमानी करने देते हो, या तुम उनसे निपटते हो, उन्हें रोकने की कोशिश करते हो और उनका त्याग कर देते हो? कुछ लोगों के सामने जब कोई समस्या आती है, तो उनमें अवधारणाएँ होती हैं, वे उन्हें दर-किनार करने के बजाय, उन्हें दूसरों तक फैलाने की कोशिश करते हैं। वे इन अवधारणाओं को हवा देने का मौका तलाशते हैं, ताकि दूसरों के अंदर भी ये अवधारणाएं पैदा हो जाएँ। कुछ लोग खुद को सही ठहराने की कोशिश करते हैं: "तुम लोग कहते हो कि परमेश्वर की हर बात का अर्थ होता है, लेकिन जहां तक मैं बता सकता हूं, जो हुआ उसका कोई अर्थ नहीं है। यह सत्य के विपरीत है और जब मेरा सामना ऐसी चीज़ों से होता है, जो सत्य के विपरीत होती हैं, तो फिर मेरे पास कहने के लिए कुछ होता है, मुझे धार्मिकता के लिए खड़ा होना होता है! "क्या ऐसा व्यवहार उचित है? सही राह पर चलने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? कुछ लोग ऐसी अवधारणाओं वाले होते हैं जो चीजों पर विचार करते हैं और महसूस करते हैं कि परमेश्वर के साथ उनका संबंध सामान्य नहीं है, कि उनके भीतर परमेश्वर के बारे में गलतफहमी पैदा हो गई है, और उनकी ऐसी अवधारणाएं होना एक गंभीर समस्या है। उन्हें लगता है कि यदि उनकी अवधारणाएँ दूर नहीं हुईं, तो वे बहुत बड़े खतरे में पड़ सकते हैं और वे परमेश्वर का विरोध करने, उस पर संदेह करने और उसकी ओर से मुँह मोड़ लेने के लिए उत्तरदायी बन सकते हैं। इसलिए वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और अपनी अवधारणाओं को एक तरफ रख देते हैं। पहले तो वे अपने ही भ्रांतिपूर्ण दृष्टिकोण का खंडन करते हैं और फिर सत्य की तलाश करते हैं। परिणामस्वरूप, जैसे-जैसे समय बीतता है, शायद वे अपनी अवधारणाओं का विश्लेषण पूरी तरह से न कर पाए हों, या पूरी तरह से दर-किनार करके उन्हें दूर न कर पाए हों, फिर भी सत्य उनके विचारों और व्यवहार को भीतर से निर्देशित करता है और उन्हें उनके कर्तव्य के निर्वहन में भी मार्गदर्शन देता है, इसलिए उनका कर्तव्य प्रभावित नहीं होता। हो सकता है कि ऐसा दिन आए जब उनके साथ कुछ हो और उनकी अवधारणाओं का समाधान हो जाए। क्या यह अभ्यास करने का सही तरीका नहीं है? हो सकता है कि कुछ लोग परमेश्वर द्वारा उनके लिए बनाई गई व्यवस्था से या परमेश्वर ने जो कुछ किया है, जो उनकी अवधारणाओं के लिए खतरा है, उससे कुछ हद तक असंतुष्ट हों, वे लोग बाद में अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन हो जाते हैं और उसे ठीक से नहीं निभाते। वे लगातार मन में प्रतिरोध, असंतोष और आक्रोश के साथ एक प्रकार की नकारात्मक स्थिति में रहते हैं। क्या ऐसा व्यवहार सही है? क्या ऐसी चीजों का समाधान आसान है? उदाहरण के लिए, तुम खुद को बहुत होशियार समझते हो, जबकि मैं कहता हूं कि तुम मूर्ख हो और आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते। यह सुनकर तुम क्रोधित और विरोधी हो जाते हो : "कोई यह कहने की हिम्मत नहीं करता कि मैं आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता। आज पहली बार मैंने ऐसा सुना है। मैं इन शब्दों को स्वीकार नहीं कर सकता। अगर मैं आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता तो क्या मैं कलीसिया की अगुआई कर सकता था? क्या मैं इतना बड़ा काम कर सकता था?" एक संघर्ष पैदा होता है न? तो क्या किया जाना चाहिए? जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो क्या उनके लिए आत्म-मंथन करना आसान है? किस तरह के लोग आत्म-मंथन कर पाते हैं? वे लोग जो को सत्य को स्वीकार कर तलाश करते हैं। सबसे पहले तो अपना खंडन करो। भले ही तुम्हें अपना सटीक ज्ञान न हो, इस बात की समझ न हो कि तुम सही हो या गलत या कुछ हद तक तुममें अज्ञानता हो, जैसे ही तुम परमेश्वर को यह कहते सुनो कि तुम मूर्ख हो और आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते हो, हालांकि तुम स्वयं ही इस बारे में नहीं जानते, यह तुम्हारी प्रकृति-सार के विषय में परमेश्वर की परिभाषा है—तुम्हें इन वचनों को सत्य मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए और उन्हें अपने आप पर लागू करना चाहिए, भले ही तुम अलग तरीके से सोचते हो। बाद में, काम करते हुए और दूसरों के साथ बातचीत करते हुए, उनसे अपनी तुलना करने पर, तुम देखोगे कि तुम न केवल आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, बल्कि तुम बहुत अज्ञानी भी हो। यह पता लगने पर कि तुममें कोई गंभीर समस्या है, जो परमेश्वर ने कहा, क्या तुम उसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पा रहे हो? तुम्हें इन वचनों को स्वीकार कर लेना चाहिए। पहले तो उन्हें एक नियम, एक परिभाषा या एक अवधारणा के रूप में स्वीकार करो और फिर उन्हें अपने वास्तविक जीवन में खुद पर लागू करने का कोई तरीका सोचो, उन्हें जानने और अनुभव करने के लिए एक साधन के बारे में सोचो। जैसे-जैसे समय बीतेगा, तुम अपना सही मूल्यांकन कर पाओगे। क्या फिर भी तुममें परमेश्वर के बारे में गलतफहमी होगी? जब इस मामले पर तुममें और परमेश्वर में कोई मतभेद नहीं होगा, तो क्या तुम तब भी अपने बारे में परमेश्वर के मूल्यांकन पर आपत्ति करोगे? तुम इसे स्वीकार करोगे और अवज्ञा नहीं करोगे। यदि तुम सत्य को स्वीकार कर, इस मामले को पूरी तरह से समझ लोगे, तो तुम एक कदम आगे बढ़ जाओगे; यदि तुम इसे स्वीकार नहीं करोगे, तो तुम हमेशा के लिए वहीं अटक जाओगे जहाँ तुम हो और कोई प्रगति नहीं कर पाओगे। क्या सत्य को स्वीकार करना जरूरी है? (हाँ।) लोगों को परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएँ अलग रखनी चाहिए, और उसके वचनों के प्रति कोई शत्रुता या प्रतिरोध नहीं रखना चाहिए; केवल यही सत्य के प्रति स्वीकृति का दृष्टिकोण है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

जब लोग परमेश्वर के बारे में गलतफहमियों और अवधारणाओं को जन्म देते हैं, तो उन्हें पहले यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि परमेश्वर सत्य है तथा लोगों में सत्य नहीं है और निश्चित रूप से गलत वही लोग हैं। क्या यह एक तरह की औपचारिकता है? यदि तुम इस अभ्यास को केवल एक औपचारिकता समझोगे, सतही तौर पर लोगे, तो क्या तुम अपनी गलतियों को जान सकते हो? कभी नहीं। इसमें कई कदम होते हैं। पहले तो यह तय करो कि तुम्हारे क्रियाकलाप सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं। पहले अपने इरादों को मत देखो; कभी-कभी ऐसा भी होता है कि तुम्हारे इरादे तो सही होते हैं लेकिन तुम जिन सिद्धांतों पर अमल करते हो, वे गलत होते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूं कि तुम जिन सिद्धांतों पर अमल करते हो, वे गलत होते हैं? तुमने खोज की होगी, लेकिन शायद तुम्हें सिद्धांतों की कोई समझ ही न हो; शायद तुमने खोज ही न की हो और तुम्हारे क्रियाकलाप मात्र नेक इरादों और उत्साह पर ही आधारित हों, तुम्हारी कल्पना और अनुभव पर आधारित हों और तुमने गलती कर दी हो। क्या तुम इसकी कल्पना कर सकते हो? जब तुम किसी चीज का अनुमान नहीं लगा पाते हो, तो तुमसे गलती हो जाती है—और तब क्या तुम उजागर नहीं हो जाते हो? एक बार जब तुम उजागर हो जाते हो, अगर तुम परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा करते रहते हो, तो तुम्हारी गलती क्या रही? तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह नहीं थी कि तुमने कुछ गलत किया और सिद्धांतों का उल्लंघन किया, जिसके कारण नुकसान हुआ या उसके कुछ और परिणाम हुए, बल्कि कुछ गलत करके भी तुम अड़े रहे और तुमने अपनी गलती को स्वीकारा नहीं; तुम फिर भी अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं को लेकर परमेश्वर का विरोध करते रहे और उसके सही कार्य को नकारते रहे। यही तुम्हारी सबसे बड़ी और सबसे भयंकर भूल थी। किसी व्यक्ति में ऐसी अवस्था परमेश्वर का प्रतिरोध क्यों होगी? लोग इस बात को मानें या न मानें कि सबकुछ परमेश्वर करता है और उसकी संप्रभुता उचित है और उनकी क्या महत्ता है, अगर वे पहले यही न समझ पाएँ कि वे गलत हैं, तो उनकी अवस्था परमेश्वर के प्रतिरोध की है। इस अवस्था को सुधारने के लिए क्या किया जाना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा को खोजना, जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, यह लोगों के लिए इतना व्यावहारिक नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, "यदि खोजना इतना व्यावहारिक नहीं है, तो क्या इसका मतलब यह है कि यह आवश्यक नहीं है और जिसे खोजा और समझा जा सकता है, वह ज़रूरी नहीं है? मैं इस कदम को छोड़ सकता हूं।" क्या ऐसे चलेगा? जो ऐसा करता है, क्या वह बचाए जाने की स्थिति से बाहर नहीं हो जाता? ऐसे लोग अपनी व्याख्याओं को लेकर सच में टेढ़े और गलत होते हैं। लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा की खोज करना कुछ हद तक एक घुमावदार काम है; यदि वे अधिक यथार्थवादी शॉर्टकट लेना चाहते हैं, तो उन्हें खुद को नकार कर, खुद को अलग रखकर, यह जानना चाहिए कि उनके कार्य गलत हैं और सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तब उन्हें सत्य-सिद्धांत की खोज करनी चाहिए। ये हैं वे कदम। ये देखने में सरल लग सकते हैं, लेकिन इन्हें व्यवहार में लाने में बहुत-सी कठिनाइयाँ हैं, क्योंकि मनुष्यों का स्वभाव भ्रष्ट होने के साथ-साथ उनके अंदर तरह-तरह की कल्पनाएं हैं, तरह-तरह की अपेक्षाएँ हैं, इच्छाएं हैं, जो उन्हें अपने दैहिक-सुखों को नकारने से रोकती हैं और उनमें ठहराव नहीं आने देतीं। ये सब करना इतना आसान नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

सत्य के सहारे किसी भी समस्या या स्थिति का समाधान संभव है, चाहे समस्या या स्थिति कैसी भी क्यों न हो। किसी प्रकार की भी समस्या से तुम क्यों न घिरे हो, अगर तुम सत्य को स्वीकार कर लो और उसे सिद्धांत से अपनी वास्तविकता में बदल दो तथा इसका अभ्यास करो और इसमें प्रविष्ट हो जाओ, तो तुम कैसे भी व्यक्ति क्यों न हो, तुम्हारा रूपांतरण और विकास होगा। यह निश्चित है; यह पूरी तरह सच है। यहाँ ज़ोर लोगों के हृदय और उनकी पसंद पर है, और इस पर है कि जब उनका सामना किसी समस्या से होता है, तो क्या वे परमेश्वर से अपना मुँह मोड़ लेते हैं या उसकी आज्ञा का पालन करते हैं और उसके वचन को स्वीकार करते हैं। यह इस बारे में भी है कि किसी बात से सामना होने पर क्या लोग अपनी देह की लालसा को तृप्त करना पसंद करते हैं, या ऐसा करने के बजाय, वे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप कर्म करते हुए अपनी दैहिक-इच्छाओं को त्याग देते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं। मुख्य ध्यान इन्हीं चीजों पर केंद्रित है। जहाँ तक ऐसे लोगों की बात है जो हर परिस्थिति में अपनी वासनाओं को तृप्त करना और अपनी लालसा की पूर्ति करना पसंद करते हैं, और अपनी शारीरिक पसंद और इच्छाओं का अनुसरण करते हैं, वे कभी भी सत्य के अभ्यास का अर्थ और महत्व का अनुभव नहीं कर पाएंगे। दूसरी तरफ, ऐसे लोग जो शारीरिक वासना का त्याग कर सकते हैं, अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ सकते हैं, सत्य का अभ्यास कर सकते हैं और सत्य-वास्तविकता में प्रविष्ट हो सकते हैं, वे धीरे-धीरे अनुभव कर सकते हैं कि सत्य का अभ्यास करने का अर्थ क्या है, उन्हें सत्य का अभ्यास करने के मज़े और आनंद का अहसास हो सकता है, वे क्रमशः परमेश्वर के वचनों के महत्व को समझ सकते हैं, परमेश्वर की मनुष्य से इसी तरह व्यवहार करने की जो अपेक्षा है उसका अर्थ और मूल्य समझ सकते हैं। लोग जब ऐसा करते हैं तो इसका परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम होता है कि लोग सकारात्मक चीजों में ज्यादा से ज्यादा आनंद पाने लग जाते हैं, और नकारात्मक चीजों को पहचानने की पहले से कहीं अधिक सशक्त क्षमता प्राप्त कर लेते हैं, और उनके अंदर उन चीज़ों के प्रति अधिकाधिक घृणा, नफ़रत और तिरस्कार का भाव आ जाता है। लोग जैसे ही इन दशाओं और अभिव्यक्तियों को प्राप्त होंगे, परमेश्वर में उनकी आस्था और भी बढ़ जाएगी। अगर वे ऐसा अभ्यास अक्सर करें, तो वे अपने ही भ्रष्ट आचरण, बुराई, अहंकार, स्वार्थ, अवज्ञा, और प्रतिरोध से घृणा करने लग जाएंगे, अपने प्रकृति-सार के प्रति उनमें घृणा, बैर-भाव, और नफ़रत के भाव पैदा हो जाएंगे। इस बीच अपने संपर्क में आने वाली आसपास की सभी नकारात्मक चीजों के प्रति भी उनमें नापसंदगी का भाव पैदा हो जाएगा। वे इन स्थितियों को बढ़ावा देंगे। एक तरफ तो खुद को जानने का यह प्रभाव होता है। दूसरी तरफ, इस घृणा और नफ़रत के पैदा होने पर, सत्य के प्रति लोगों के रवैये में कैसा परिवर्तन आता है? वे सत्य को अभ्यास में लाने के लिए आध्यात्मिक कद और पर्याप्त इच्छाशक्ति प्राप्त करने में सक्षम होने की लालसा करना शुरू कर देते हैं, और वे उम्मीद करते हैं कि वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने लायक हो जाएं, परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर पाएं, और ऐसे इंसान बन जाएँ जिसमें विवेक, समझदारी, और सत्य-वास्तविकता हो। वे परमेश्वर के प्रति तथा परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित समस्त वातावरण के प्रति समर्पित होने, और परमेश्वर का विरोध करने से बचने के लिए भी लालायित रहते हैं; वे परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में सक्षम होना चाहते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज में सत्य की तलाश से ही सत्य-वास्तविकता में प्रवेश किया जा सकता है' से उद्धृत

यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना : उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा हुए और वे कहाँ से आये। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है। यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

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